बेख़ौफ, बेबाक, आज़ाद 'एंग्री यंग वीमेन' का नया दौर

वे न तो पीछे हटेंगी, न चुप बैठेंगी और न मैदान छोड़ेंगी। लड़ेंगी, अड़ेंगी और अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगी।

PNSPNS
Oct 11, 2026 - 21:48
 0
बेख़ौफ, बेबाक, आज़ाद 'एंग्री यंग वीमेन' का नया दौर

पत्रकार राजदीप सरदेसाई की किताब ‘2024: द इलेक्शन दैट सरप्राइज्ड इंडिया’ में अमित शाह की पहली चुनावी जीत को लेकर एक दिलचस्प वाकया दर्ज है। शाह तब छात्र थे और एक कॉलेज चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के उम्मीदवार थे। उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी एक छात्रा थी, जिसका अच्छा-खासा प्रभाव था। इससे भी अहम बात यह थी कि उस कॉलेज में छात्राओं की बड़ी तादाद थी। शाह और उनके समर्थकों को अंदेशा था कि अगर चुनाव में सीधा मुकाबला हुआ, तो वे हार जाएंगे। माना जाता है कि तभी युवा शाह ने एक रणनीति गढ़ी।

उनके साथियों ने कुछ छात्राओं के घरों के टेलीफोन नंबर जुटाए। वह लैंडलाइन का दौर था! उनके माता-पिता को फोन कर आगाह किया गया कि मतदान के दिन परिसर में बवाल हो सकता है। इस चेतावनी का मनचाहा असर हुआ। कुछ माता-पिता ने उस दिन अपनी बेटियों को कॉलेज न भेजने का फैसला किया। नतीजतन, महिला मतदाताओं की संख्या घट गई और करीबी मुकाबले में शाह चुनाव जीत गए।

सरदेसाई इस प्रसंग को किसी नैतिक सीख के तौर पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की रणनीतिक सोच के उदाहरण के रूप में पेश करते हैं जो आगे चलकर देश के सबसे ताकतवर नेताओं में शुमार हुआ।

यहां मकसद उस चुनावी जीत की नैतिकता पर बहस करना नहीं, बल्कि यह सोचना है कि अगर आज ऐसा कोई पैंतरा आजमाया जाए तो क्या होगा। मुझे लगता है कि नतीजा बिल्कुल उलट होगा। अगर आज कोई किसी युवती को डराने की कोशिश करे, तो वह पूछेगी: मुझे कौन डराने की कोशिश कर रहा है और क्यों? और अगर कोई उसे दूर रहने को कहे, तो मुमकिन है वह ठीक इसके विपरीत कदम उठाए!

चुपचाप जुल्म सहने, रोते हुए घर लौटने और रुलाने वाली बात को भूलने की कोशिश करने वाली महिलाओं का दौर अब तेजी से बीत रहा है। आज की भारतीय महिला, विशेष रूप से युवा पीढ़ी, कहीं अधिक आत्मविश्वासी है, अपने अधिकारों के प्रति सजग और किसी भी धमकी को अपनी नियति मानने को तैयार नहीं।

हमारे पास पुरुष सत्ता को चुनौती देने वाली महिलाओं के कई ऐतिहासिक उदाहरण हैं। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने राज्य की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया। तमिल साहित्यिक परंपरा में कण्णगी ने अपने निर्दोष पति के साथ हुए अन्याय के खिलाफ राजा को ललकारा और न्याय मांगा। वे महिलाएं इसलिए असाधारण थीं क्योंकि तब समाज पूरी तरह पितृसत्तात्मक था। आज वही अपवाद एक आम नियम बनता जा रहा है।

यह बदलाव अब सड़कों पर साफ देखा जा सकता है। जब नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना, देश भर के विरोध-प्रदर्शनों में महिलाएं आगे थीं। जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे परिसरों की छात्राओं ने पुलिस का डटकर सामना किया। 

इसके बाद शाहीन बाग का दौर आया। महिलाएं, जिनमें अधिकतर बुजुर्ग और साधारण परिवारों से थीं, दिल्ली की सड़क पर हफ्तों जमी रहीं। आलोचनाएं झेलीं, लांछन सहे और धमकियों का सामना किया, फिर भी नहीं हिलीं। अंततः कोविड 19 के कारण देश थम जाने पर ही उस धरने को स्थगित करना पड़ा।

मगर तब तक एक बुनियादी बदलाव आ चुका था: भारतीय समाज ने महिलाओं को एक राजनीतिक आंदोलन के केन्द्र में खड़े देखा था। इसका सबक साफ था- महिलाएं सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हटेंगी कि हुकूमत में बैठे पुरुषों ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म दिया है।

किसान आंदोलन ने इसी सच्चाई को और पुख्ता किया। जब तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान पंजाब और अन्य राज्यों के किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर रोका गया, तो झुलसाती धूप, बारिश और हाड़ कंपा देने वाली ठंड में महिलाएं उनके साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर डटी रहीं। वे किसी पुरुष-प्रधान आंदोलन की सजावटी मौजूदगी भर नहीं थीं, बल्कि उसका अटूट हिस्सा थीं।

इसके बाद छात्रों की बारी आई। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए आंदोलन ने युवा महिलाओं की एक नई पीढ़ी को सामने ला खड़ा किया, जो बैरिकेड्स से टकराईं और पुलिसिया सख्ती के सामने अड़ी रहीं।

शुरू में सरकार ने उन्हें कमतर आंका। यह भारी भूल साबित हुई, ठीक वैसे ही जैसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर किया गया क्रूर दमन। छात्राएं पहले से कहीं अधिक ताकत के साथ लौटीं। धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। अभी हम युवाओं और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच एक और बड़ा टकराव देख रहे हैं। इस बार सवाल भारत निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का है।

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विवाद विकराल रूप ले चुका है। 30 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए। चौतरफा घिरने के बाद आयोग ने 20 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में उन पात्र मतदाताओं की पहचान कर उन्हें जोड़ने का विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया है जो ‘छूट’ गए थे।

प्रदर्शनकारियों के लिए यह मतदाता सूची की कोई सामान्य प्रशासनिक कवायद नहीं। यह वोट देने के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार का सवाल है। और एक बार फिर, युवा महिलाएं इस लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और रील्स में जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है, वह सिर्फ उनका गुस्सा नहीं, बल्कि वर्दी के रौब के आगे दबने से उनका साफ इनकार है। युवतियां पुलिसकर्मियों को जवाब देती, हटने का आदेश मिलने पर अड़ी रहती और यह सवाल पूछती दिख रही हैं कि उन्हें किस अधिकार से पीछे धकेला जा रहा है।

कुछ युवतियां घिर जाने के बावजूद अपनी जगह पर जमी रहती हैं। कुछ अपने फोन से पूरा घटनाक्रम रिकॉर्ड करती हैं। वे न तो अपनी आवाज नीची करती हैं और न आंखें झुकाती हैं। पुलिस के पास शारीरिक बल हो सकता है, लेकिन इन लड़कियों के पास दृश्यता, एकजुटता और जनमत की ताकत है।

वे पुराने दौर के भारतीय सिनेमा में दिखाई जाने वाली लाचारी और त्याग की घिसी-पिटी मूरतें नहीं हैं। ये महिलाएं जींस और शॉर्ट्स पहनती हैं। उनके हाथों में स्मार्टफोन हैं। वे संवैधानिक अधिकारों की भाषा बोलती हैं। वे जानती हैं कि कैमरा उन पर नजर रखे हुए है। वे यह भी समझती हैं कि पुलिस की जिस ज्यादती को कभी थाने की डायरी में दबा दिया जाता था, वह अब कुछ ही मिनटों में एक राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है।

मौजूदा आंदोलन की एक घटना इसका जीता-जागता प्रमाण है। रोजी नाम की स्वतंत्र पत्रकार ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान एक आईपीएस अधिकारी ने उनका यौन उत्पीड़न किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी आपबीती साझा की और कार्रवाई की मांग की। इसके बाद अन्य पत्रकार उनके साथ थाने गए और प्राथमिकी दर्ज कराने का दबाव बनाया। पुलिस ने उसके कुछ आरोपों का खंडन किया है, लेकिन शिकायतों को जांच के लिए आगे भेज दिया गया है।

एक दौर था जब इस तरह के अपमान की शिकार महिला को बात न बढ़ाने की सलाह दी जाती थी। उसके परिजन सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले पुरुष के आचरण से ज्यादा परिवार की कथित प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित होते थे। खुद वह भी सोचती थी कि आवाज उठाने से कहीं उसके ‘चरित्र’ पर सवाल न खड़े हो जाएं। वे दिन अब लद चुके हैं। आज की मुखर महिला सिर्फ अपना बचाव नहीं कर रही। वह उस पुराने सामाजिक समझौते को मानने से इनकार कर रही है जहां महिलाओं से पुरुषों के गलत आचरण का बोझ खामोशी से ढोने की उम्मीद की जाती थी।

दिलचस्प है कि दिल्ली के प्रदर्शनों में शामिल कई युवा महिलाएं उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों से आई हैं। इनमें से कई के साथ उनके माता-पिता भी हैं। यह बेहद अहम पहलू है। वे घर से बगावत कर भागी हुई बेटियां नहीं हैं; उन्हें अपने माता-पिता का पूरा समर्थन हासिल है। इसका मतलब है कि यह बदलाव केवल किसी छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहरे सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है।

दिल्ली के प्रदर्शनों के एक वीडियो में कही गई बात भुलाए नहीं भूलती। एक युवती अपने सामने खड़ी उन महिला पुलिसकर्मियों से पूछती है जिन्होंने उसे धरना स्थल खाली करने को कहा था: ‘मुझे हटाने वाले आप होते कौन हैं?’ आखिर, जिस जमीन पर वह खड़ी है और जिस हवा में सांस ले रही है, वह पुलिस की मिल्कियत नहीं। वह हम सबकी साझी है।

पुलिस के पास खाकी की ताकत हो सकती है। हुकूमत के पास सरकारी तंत्र हो सकता है। चुनाव आयोग के पास संवैधानिक अधिकार हो सकता है। लेकिन इनमें से कोई भी इस गणराज्य का मालिक नहीं। यह मुल्क यहां के नागरिकों का है- आज की युवा महिलाएं यही हमें समझा रही हैं। और इसीलिए अमित शाह के उस पहले चुनावी मुकाबले का किस्सा आज याद रखने लायक है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow