प्रभासाक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने संसद सत्र को लेकर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। नीरज कुमार दुबे से हमने पहला सवाल तो यही पूछा कि जो कुछ भी महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक के साथ लोकसभा में हुआ उसको लेकर आप क्या कहेंगे क्योंकि भाजपा जबरदस्त तरीके से विपक्ष को महिला विरोधी बताने में जुटी हुई है। नीरज दुबे ने कहा कि 12 साल हो गए लेकिन यह पहला मौका है जब संसद में मोदी सरकार का कोई बिल पास नहीं हो पाया है। इससे यह साफ हो गया है कि महिला आरक्षण को लेकर पक्ष में कौन है और कौन नहीं है। एक तस्वीर इसको लेकर साफ हो गई है।
नीरज दुबे ने कहा कि संसद में बिल के गिरने के बाद से महिला सड़कों पर हैं। महिलाओं में आक्रोश है और यही कारण है कि विपक्ष के कुछ नेताओं के बीच भी इस बात की चिंता शुरू हो गई है कि क्या हमने कोई सही कदम उठाया या नहीं। दावा किया जा रहा है सूत्रों के हवाले से की कई नेताओं ने बीजेपी को यह बताया है कि हम तो इसके लिए तैयार थे। लेकिन पार्टी का लाइन कुछ अलग था। साथ ही साथ नीरज कुमार दुबे ने दावा किया कि कांग्रेस के भी कई ऐसे नेता थे जो इस बिल के पक्ष में थे। नीरज दुबे ने यह भी दावा किया कि प्रियंका गांधी खुद इस बिल का समर्थन करना चाहती थीं लेकिन ऐसा नहीं हो सका। नीरज दुबे ने यह भी कहा कि इस विधेयक को लेकर विपक्षी खेमे में कई गुट सामने आ चुके हैं।
इसके साथ ही नीरज दुबे ने कहा कि सरकार 2029 चुनाव में ही महिलाओं को आरक्षण देने के लिए संकल्पित है और इसको लेकर सरकार विधि विकल्प देख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ तौर पर हर हाल में इस विधेयक को लेकर काफी प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं और उन्होंने कैबिनेट की बैठक में इसके पास नहीं होने पर चिंता भी जताई है। लेकिन मोदी सरकार की ओर से साफ तौर पर कहा जा रहा है कि महिलाओं को यह हक मिलकर रहेगा और यह सरकार महिलाओं को उनका हक देकर भी रहेगी। सरकार पर जो विपक्ष आरोप लगा रहा है कि एकतरफा और मनमाना फैसला लिया गया। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों को पत्र लिखा था।
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की यह हार मोदी सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक असहजता के रूप में देखी जा रही है। साथ ही यह घटना न केवल एकजुट विपक्ष की ताकत का संकेत देती है, बल्कि संविधान जैसे गंभीर विषयों पर व्यापक और गंभीर संवाद की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। इस पराजय ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद में केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
हम आपको बता दें कि विधेयक की प्रस्तुति और उसकी संरचना ने भी कई सवाल खड़े किए। सबसे अधिक विवाद इस बात को लेकर हुआ कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे दो अलग विषयों को एक साथ क्यों जोड़ा गया। विपक्ष ने इसे एक रणनीतिक चाल बताया, जिसका उद्देश्य एक मुद्दे की आड़ में दूसरे को आगे बढ़ाना था। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव समेत कई नेताओं ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कदम पारदर्शिता के विपरीत है।