EU में भारतीय हथियारों की एंट्री का ऐतिहासिक मौका, हिल जाएगा अमेरिका!

गणतंत्र दिवस परेड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व के सामने भारत के स्वदेशी हथियारों, मिसाइल सिस्टम, तोपखाने और रक्षा तकनीक का प्रदर्शन किया तो यह सिर्फ एक परेड नहीं थी। यह एक रणनीतिक संदेश था। यह संदेश था कि भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं है। भारत अब हथियार बनाने वाला, तकनीक विकसित करने वाला और भरोसेमंद रक्षा साजदार बन चुका है। इसी बैकग्राउंड में एक बहुत बड़ी खबर सामने आई। यूरोपी संघ अपनी रक्षा नीति को रिसेट कर रहा है और इस रिसेट का सबसे बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है। दरअसल भारत और यूरोपी संघ इस समय दो बड़े समझौतों की तैयारी में है। पहला भारत यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता दूसरा सुरक्षा और रक्षा रणनीति साझेदारी। इस एफटीए को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है और रक्षा समझौता इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है।इसे भी पढ़ें: India-EU की 'Mega Deal' से बदलेगा वैश्विक समीकरण? इन 13 समझौतों पर लगी मुहरपिछले कई दशकों में भारत यूरोपीय संघ संबंधों में इतना बड़ा मौका कभी नहीं आया। पहली बार यूरोपीय संघ किसी देश के लिए अपनी रक्षा रणनीति में बदलाव कर रहा है और वो देश है भारत। अगर हम इतिहास देखें तो भारत और यूरोपीय संघ के रिश्ते ज्यादातर व्यापार और राजनीतिक संवाद तक सीमित थे। यूरोप से हथियार खरीदे जाते फ्रांस जैसे देशों से रक्षा उपकरण आते थे लेकिन तकनीक का हस्तांतरण नहीं होता था। संयुक्त उत्पादन नहीं होता था। रक्षा उद्योगों का एकीकरण नहीं था। मतलब रिश्ता तो था लेकिन खरीददार और विक्रेता का अब यह रिश्ता बदल चुका है। अब भारत और यूरोप बन रहे संयुक्त निर्माता संयुक्त विकासकर्ता और यह बदलाव बहुत दुर्लभ है क्योंकि यूरोपीय संघ अपनी रक्षा कूटनीति में बहुत कम देशों को इतना भरोसा देता है। इसे भी पढ़ें: एंटोनियो कोस्टा ने जेब से निकाल कर दिखाया अपना भारतीय कार्ड, ठहाके मार हंसने लगे मोदी दरअसल कोई भी देश सिर्फ दोस्ती के लिए अपनी रणनीति नहीं बदलता। इसके पीछे राष्ट्रीय हित होते हैं। जैसे कि यूरोप को अब यह एहसास हो चुका है कि वह अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो चुका है। नाटो सदस्य होने का मतलब पूरी सुरक्षा नहीं है। अमेरिका कभी भी पीछे हट जाता है। हथियार, चिप्स और गोला बारूद की सप्लाई चेन कमजोर है। यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी राजनीति की अनिश्चितता ने यूरोप को सोचने पर मजबूर कर दिया। यूरोप ने देखा कि अमेरिका अपने फैसले अचानक बदल सकता है। सहयोगियों को अकेला छोड़ सकता है। चीन और रूस का बढ़ता सामरिक गठजोड़ यूरोप के लिए खतरे की घंटी है।

PNSPNS
Jan 28, 2026 - 10:30
 0
EU में भारतीय हथियारों की एंट्री का ऐतिहासिक मौका, हिल जाएगा अमेरिका!
गणतंत्र दिवस परेड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व के सामने भारत के स्वदेशी हथियारों, मिसाइल सिस्टम, तोपखाने और रक्षा तकनीक का प्रदर्शन किया तो यह सिर्फ एक परेड नहीं थी। यह एक रणनीतिक संदेश था। यह संदेश था कि भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं है। भारत अब हथियार बनाने वाला, तकनीक विकसित करने वाला और भरोसेमंद रक्षा साजदार बन चुका है। इसी बैकग्राउंड में एक बहुत बड़ी खबर सामने आई। यूरोपी संघ अपनी रक्षा नीति को रिसेट कर रहा है और इस रिसेट का सबसे बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है। दरअसल भारत और यूरोपी संघ इस समय दो बड़े समझौतों की तैयारी में है। पहला भारत यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता दूसरा सुरक्षा और रक्षा रणनीति साझेदारी। इस एफटीए को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है और रक्षा समझौता इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है।

इसे भी पढ़ें: India-EU की 'Mega Deal' से बदलेगा वैश्विक समीकरण? इन 13 समझौतों पर लगी मुहर

पिछले कई दशकों में भारत यूरोपीय संघ संबंधों में इतना बड़ा मौका कभी नहीं आया। पहली बार यूरोपीय संघ किसी देश के लिए अपनी रक्षा रणनीति में बदलाव कर रहा है और वो देश है भारत। अगर हम इतिहास देखें तो भारत और यूरोपीय संघ के रिश्ते ज्यादातर व्यापार और राजनीतिक संवाद तक सीमित थे। यूरोप से हथियार खरीदे जाते फ्रांस जैसे देशों से रक्षा उपकरण आते थे लेकिन तकनीक का हस्तांतरण नहीं होता था। संयुक्त उत्पादन नहीं होता था। रक्षा उद्योगों का एकीकरण नहीं था। मतलब रिश्ता तो था लेकिन खरीददार और विक्रेता का अब यह रिश्ता बदल चुका है। अब भारत और यूरोप बन रहे संयुक्त निर्माता संयुक्त विकासकर्ता और यह बदलाव बहुत दुर्लभ है क्योंकि यूरोपीय संघ अपनी रक्षा कूटनीति में बहुत कम देशों को इतना भरोसा देता है। 

इसे भी पढ़ें: एंटोनियो कोस्टा ने जेब से निकाल कर दिखाया अपना भारतीय कार्ड, ठहाके मार हंसने लगे मोदी

 दरअसल कोई भी देश सिर्फ दोस्ती के लिए अपनी रणनीति नहीं बदलता। इसके पीछे राष्ट्रीय हित होते हैं। जैसे कि यूरोप को अब यह एहसास हो चुका है कि वह अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो चुका है। नाटो सदस्य होने का मतलब पूरी सुरक्षा नहीं है। अमेरिका कभी भी पीछे हट जाता है। हथियार, चिप्स और गोला बारूद की सप्लाई चेन कमजोर है। यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी राजनीति की अनिश्चितता ने यूरोप को सोचने पर मजबूर कर दिया। यूरोप ने देखा कि अमेरिका अपने फैसले अचानक बदल सकता है। सहयोगियों को अकेला छोड़ सकता है। चीन और रूस का बढ़ता सामरिक गठजोड़ यूरोप के लिए खतरे की घंटी है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow