आज ही के दिन यानी की 30 जून को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था। वह ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में चुने जाने वाले पहले भारतीय थे। भारतीय स्वतंत्रता में दादाभाई नौरोजी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। दादाभाई नौरोजी न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन के कई नेताओं के आदर्श रहे, बल्कि उनको ब्रिटेन तक में सम्मान मिला। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दादाभाई नौरोजी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
जन्म और परिवार
मुंबई में एक पारसी परिवार में 04 सितंबर 1825 को दादा भाई नौरोजी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम नौरोजी पलांजी डोरडी था और मां का नाम मनेखबाई था। जब दादाभाई सिर्फ 4 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में दादाभाई का पालन पोषण उनकी मां ने किया था। अनपढ़ होने के बाद भी उनकी मां ने उनकी पढ़ाई का विशेष ध्यान रखा। पढ़ाई पूरी करने के बाद दादा भाई नौरोजी 27 साल की उम्र में गणित और भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक बन गए थे।
इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष
साल 1851 में दादा भाई नौरोजी ने गुजराती भाषा में रस्त गफ्तार साप्ताहिक शुरू किया। साल 1885 में बंबई विधान परिषद के सदस्य बने और साल 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए थे। दादाभाई लंदन के विश्वविद्यालय में गुजराती के प्रोफेसर भी बने और फिर साल 1869 में वह भारत वापस आ गए। जिसके बाद साल 1886 और 1906 में दादाभाई नौरोजी इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस दौरान कांग्रेस में विचारधारा के आधार को दो गुट बन गए। जिनको 'नरम दल' और 'गरम दल' कहा जाता था। दोनों दलों की कार्यशैली उनके नाम के अनुरूप थी। साल 1906 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन की तैयारियां जोरों पर चल रही थीं। दोनों दल अध्यक्ष पद को हथियाने के लिए रणनीति बना रहे थे, जिससे कि पार्टी में उनके पक्ष का दबदबा बढ़ सके। इस वजह से यह पूरी आशंका बन गई कि इस बार का अधिवेशन बिना झगड़े के खत्म नहीं होगा।
इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए दो बार कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके दादाभाई को चुना गया। स्थितियों को देखते हुए वह तैयार हो गए और 71 साल की उम्र में वह तीसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इस दौरान उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी दोनों दलों को एक साथ रखने की थी। वहीं दादाभाई नौरोजी दोनों दलों को समझाने में सफल रहे और दोनों दल दादाभाई का सम्मान करते थे, इसलिए दोनों दलों ने उनकी बात को सुना और समझा।
दोनों ही दलों को एक-दूसरे की विचारधारा को समझने की जरूरत महसूस हुई। इस तरह से टूटने की कगार पर पहुंची कांग्रेस में दादाभाई नौरोजी ने एकता स्थापित की। उनको 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' भी कहा जाता था। साल 1906 में दादाभाई नौरोजी ने स्व-शासन की मांग सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। उन्होंने देश को सबसे पहले 'स्वराज' का नारा दिया था।
मृत्यु
वहीं 30 जून 1917 को दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था।