ग़ाज़ा में रमदान: तंगी, बेतहाशा क़ीमतें और बेघर होने की मुश्किलें

एक फ़लस्तीनी बुज़ुर्ग वालिद अल-असी अपनी नन्ही सी पोती को दुलार करते हुए और उसके साथ खेलते हुए नज़र आते हैं. उन्होंने वादा किया था कि वो अपनी पोती को रमदान का पवित्र महीना आने पर, ग़ाज़ा शहर के बाज़ार में घुमाने के लिए ले जाएंगे, जैसा कि उनका परिवार अतीत में करता रहा था, मगर इसराइल-हमास युद्ध के बाद अब हालात बहुत बदल चुके हैं.

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Feb 20, 2026 - 14:47
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ग़ाज़ा में रमदान: तंगी, बेतहाशा क़ीमतें और बेघर होने की मुश्किलें
एक फ़लस्तीनी बुज़ुर्ग वालिद अल-असी अपनी नन्ही सी पोती को दुलार करते हुए और उसके साथ खेलते हुए नज़र आते हैं. उन्होंने वादा किया था कि वो अपनी पोती को रमदान का पवित्र महीना आने पर, ग़ाज़ा शहर के बाज़ार में घुमाने के लिए ले जाएंगे, जैसा कि उनका परिवार अतीत में करता रहा था, मगर इसराइल-हमास युद्ध के बाद अब हालात बहुत बदल चुके हैं.

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