Raja Ravi Varma Birth Anniversary: Indian Art के Legend राजा रवि वर्मा, अंग्रेजों ने दिया था 'Kaisar-i-Hind' का सम्मान

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार राजा रवि वर्मा का 28 अप्रैल को जन्म हुआ था। उन्होंने भारतीय हिंदुओं के देवी-देवताओं को चेहरा और स्वरूप दिया था। राजा रवि वर्मा ने इन चित्रों को बनाने से पहले वेद पुराणों को अच्छे से अध्ययन किया था। वह देश भर में घूमे और फिर देवी-देवताओं के चित्र बनाए। राजा रवि वर्मा को भारतीय कला के इतिहास में सबसे महान चित्रकारों में से एक माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजा रवि वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकेरल में 29 अप्रैल 1848 को राजा रवि वर्मा का जन्म हुआ था। उनके चाचा चित्रकार थे और राजा रवि वर्मा को हमेशा अपने साथ रखते थे। ऐसे में छोटे बच्चे कम उम्र में आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने लगा था। एक बार राजा रवि वर्मा के चाचा किसी राजभवन की दीवारों को चित्रकारी से सजा रहे थे। किसी वजह से उनको वहां से हटना पड़ा। जिसके बाद 7 साल के राजा रवि वर्मा ने दीवार के चित्र को पूरा रंग से भर दिया। चाचा देखकर दंग रह गए। राजा रविवर्मा की चित्रकारी की पहली शिक्षा उनके चाचा से शुरू हुई थी।इसे भी पढ़ें: Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से क्रांति की आग, जानिए 'राष्ट्रकवि' के Freedom Fighter बनने की कहानीऐसे बनाई पहली तस्वीरएक बार जो राजा रवि वर्मा ने रंगों को हाथ लगाया, तो प्रकृति के हर रूप को वह कागज पर उकेरते चले गए। एक दिन उन्होंने उन्होंने पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का फैसला लिया। इसके बाद उन्होंने एक युवती को तैयार किया। वह युवती पिछले कई घंटों से मौन एक ही मुद्रा में बैठी रही। वह एक कोने को लगातार देख रही थी कि उसकी आंखों की पुतलियां भी नहीं घूम रही थी। जोकि किसी सामान्य स्त्री के लिए मुश्किलों भरा हो सकता है। लेकिन वह सामान्य नहीं थी। राजा ने उसमें ऐसा रंग और आत्मविश्वास भरा कि वह दैवीय़ हो गई और इसी का प्रभाव रहा कि उसकी आंखों में दया के भाव थे।मां सरस्वती के स्वरूप को उकेराचेहरे पर तेज था और हथेलियां खुद ही वरद हस्त में बदल गई थीं। दोनों ही अपने काम में दृढ़ थे। इसका प्रभाव ऐसा पड़ा की करीब सवा सौ साल पहले बनी कागज पर कृति हममें ज्ञान का प्रकाश भर रही है। वह दृढ़ स्त्री सुगंधा थी, और जो चित्र बनकर तैयार हुआ था, वह मां सरस्वती का वरद चित्र था।सम्मानब्रिटिश सरकार ने साल 1904 में राजा रवि वर्मा को 'केसर-ए-हिंद' का खिताब दिया था। जोकि उस समय का भारतीय नागरिकों के लिए सबसे बड़ा सम्मान था। राजा रवि वर्मा ने अभिज्ञानशाकुंतलम की शकुंतला का चित्र बनाया था, जोकि उनके सबसे प्रसिद्ध चित्रों में से एक था।मृत्युवहीं 02 अक्तूबर 1906 को चित्रकारी के इस राजा ने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

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Apr 30, 2026 - 10:55
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Raja Ravi Varma Birth Anniversary: Indian Art के Legend राजा रवि वर्मा, अंग्रेजों ने दिया था 'Kaisar-i-Hind' का सम्मान
प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार राजा रवि वर्मा का 28 अप्रैल को जन्म हुआ था। उन्होंने भारतीय हिंदुओं के देवी-देवताओं को चेहरा और स्वरूप दिया था। राजा रवि वर्मा ने इन चित्रों को बनाने से पहले वेद पुराणों को अच्छे से अध्ययन किया था। वह देश भर में घूमे और फिर देवी-देवताओं के चित्र बनाए। राजा रवि वर्मा को भारतीय कला के इतिहास में सबसे महान चित्रकारों में से एक माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजा रवि वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और परिवार

केरल में 29 अप्रैल 1848 को राजा रवि वर्मा का जन्म हुआ था। उनके चाचा चित्रकार थे और राजा रवि वर्मा को हमेशा अपने साथ रखते थे। ऐसे में छोटे बच्चे कम उम्र में आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने लगा था। एक बार राजा रवि वर्मा के चाचा किसी राजभवन की दीवारों को चित्रकारी से सजा रहे थे। किसी वजह से उनको वहां से हटना पड़ा। जिसके बाद 7 साल के राजा रवि वर्मा ने दीवार के चित्र को पूरा रंग से भर दिया। चाचा देखकर दंग रह गए। राजा रविवर्मा की चित्रकारी की पहली शिक्षा उनके चाचा से शुरू हुई थी।

इसे भी पढ़ें: Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से क्रांति की आग, जानिए 'राष्ट्रकवि' के Freedom Fighter बनने की कहानी

ऐसे बनाई पहली तस्वीर

एक बार जो राजा रवि वर्मा ने रंगों को हाथ लगाया, तो प्रकृति के हर रूप को वह कागज पर उकेरते चले गए। एक दिन उन्होंने उन्होंने पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का फैसला लिया। इसके बाद उन्होंने एक युवती को तैयार किया। वह युवती पिछले कई घंटों से मौन एक ही मुद्रा में बैठी रही। वह एक कोने को लगातार देख रही थी कि उसकी आंखों की पुतलियां भी नहीं घूम रही थी। जोकि किसी सामान्य स्त्री के लिए मुश्किलों भरा हो सकता है। लेकिन वह सामान्य नहीं थी। राजा ने उसमें ऐसा रंग और आत्मविश्वास भरा कि वह दैवीय़ हो गई और इसी का प्रभाव रहा कि उसकी आंखों में दया के भाव थे।

मां सरस्वती के स्वरूप को उकेरा

चेहरे पर तेज था और हथेलियां खुद ही वरद हस्त में बदल गई थीं। दोनों ही अपने काम में दृढ़ थे। इसका प्रभाव ऐसा पड़ा की करीब सवा सौ साल पहले बनी कागज पर कृति हममें ज्ञान का प्रकाश भर रही है। वह दृढ़ स्त्री सुगंधा थी, और जो चित्र बनकर तैयार हुआ था, वह मां सरस्वती का वरद चित्र था।

सम्मान

ब्रिटिश सरकार ने साल 1904 में राजा रवि वर्मा को 'केसर-ए-हिंद' का खिताब दिया था। जोकि उस समय का भारतीय नागरिकों के लिए सबसे बड़ा सम्मान था। राजा रवि वर्मा ने अभिज्ञानशाकुंतलम की शकुंतला का चित्र बनाया था, जोकि उनके सबसे प्रसिद्ध चित्रों में से एक था।

मृत्यु

वहीं 02 अक्तूबर 1906 को चित्रकारी के इस राजा ने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

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