क्या पीओके अब पाकिस्तान के हाथ से निकल रहा है? यह सवाल हम इसलिए पूछ रहे हैं क्योंकि पीओके की स्थानीय जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ खुला विद्रोह छेड़ दिया है और भारत से मदद की माँग की है? यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भारत के लिए अब पीओके के लोगों की मदद करने का समय आ गया है? देखा जाये तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जिस तरह हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं, उसने पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को झकझोर दिया है। वहां सड़कों पर हजारों लोग उतर चुके हैं, पाकिस्तान विरोधी नारे गूंज रहे हैं और अब पहली बार वहां के आंदोलनकारी नेताओं ने खुलकर भारत से मदद की गुहार लगाई है। यह विरोध प्रदर्शन अब पाकिस्तान के कब्जे के खिलाफ उभरती हुई व्यापक जन असंतोष की तस्वीर बन चुका है।
हम आपको बता दें कि पीओके में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई कर रही जम्मू-कश्मीर संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी यानी जेएएसी ने भारत से मानवीय सहायता मांगी है। संगठन के नेता सरदार अमन खान ने खुलकर कहा है कि पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई और आर्थिक नाकेबंदी ने लोगों को भुखमरी और दवाइयों की कमी की कगार पर पहुंचा दिया है। उन्होंने नई दिल्ली से राहत सामग्री भेजने और नियंत्रण रेखा को मानवीय आधार पर खोलने की अपील की है। उनका कहना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो लोगों को भारत आने का विकल्प मिलना चाहिए।
देखा जाये तो सरदार अमन खान का यह बयान साधारण नहीं है। उन्होंने रावलाकोट के ईदगाह मैदान में हजारों लोगों की भीड़ के सामने पूछा कि क्या लोगों को नियंत्रण रेखा की तरफ बढ़ना चाहिए। भीड़ ने जोरदार आवाज में समर्थन दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान जनता की मांगों का जवाब गोलियों से देगा तो लोगों के पास दूसरे रास्ते भी मौजूद हैं। यह साफ संकेत है कि पीओके में अब पाकिस्तान से आजादी की आवाज खुलकर उठने लगी है।
हम आपको बता दें कि पिछले कुछ हफ्तों में मुजफ्फराबाद, रावलाकोट, मीरपुर, डडयाल और कई दूसरे इलाकों में भारी प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने संचार सेवाएं बहाल करने, भोजन और दवाइयों की आपूर्ति शुरू करने, गिरफ्तार नेताओं की रिहाई और प्रशासन के साथ हुए 38 सूत्रीय समझौते को लागू करने की मांग की है। आरोप है कि पाकिस्तान ने जेएएसी पर आतंकवाद विरोधी कानून लगाकर उसे प्रतिबंधित कर दिया और छह सौ से ज्यादा कार्यकर्ताओं तथा नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इनमें शौकत नवाज मीर जैसे प्रमुख नाम भी शामिल हैं।
स्थिति तब और विस्फोटक हो गई जब अनब इलाके में पुलिस और रेंजर्स पर प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और गोलीबारी करने का आरोप लगा। मोहम्मद याकूब नाम के एक व्यक्ति की मौत की खबर सामने आई जबकि कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। डडयाल में तो प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यह घटनाएं बताती हैं कि पीओके में पाकिस्तान की पकड़ कमजोर होती जा रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि जेएएसी का कहना है कि पाकिस्तान वहां की जनता के संसाधनों का शोषण कर रहा है और स्थानीय लोगों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया है। संगठन ने 38 सूत्रीय मांगपत्र में आर्थिक सुधार, स्थानीय संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा और अर्धसैनिक बलों की तैनाती घटाने की मांग की है। साथ ही उन 12 विधानसभा सीटों को खत्म करने की मांग की गई है जो पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि इन्हीं सीटों के जरिए इस्लामाबाद पीओके की राजनीति को नियंत्रित करता है।
अब सवाल यह है कि भारत को क्या करना चाहिए? अगर भारत मानवीय आधार पर पीओके की मदद करता है तो इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत हो सकती है। भारत खुद को लोकतांत्रिक और मानवीय शक्ति के रूप में पेश कर सकता है। इससे पीओके के लोगों के बीच भारत के प्रति भरोसा और समर्थन भी बढ़ सकता है। साथ ही पाकिस्तान के उस दावे को भी गहरी चोट पहुंचेगी कि पीओके के लोग उसके साथ खुश हैं।
लेकिन इसके खतरे भी कम नहीं हैं। पाकिस्तान भारत पर हस्तक्षेप का आरोप लगाकर सीमा पर तनाव बढ़ा सकता है। नियंत्रण रेखा पर संघर्ष तेज हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा। साथ ही यह भी संभव है कि चीन जैसे देश पाकिस्तान के समर्थन में खुलकर सामने आ जाएं। फिर भी एक सच अब दुनिया के सामने खुल चुका है। पीओके में जनता सड़कों पर है, पाकिस्तान विरोधी नारे लग रहे हैं और वहां के आंदोलनकारी भारत की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। सवाल केवल इतना नहीं कि पीओके में क्या हो रहा है। असली सवाल यह है कि क्या इतिहास एक बार फिर करवट लेने जा रहा है?