Mahavir Jayanti 2025: सदैव प्रासंगिक रहेगी भगवान महावीर की अमृतवाणी

‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उद्घोष करने वाले भगवान महावीर का अहिंसा दर्शन आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और आवश्यक बन गया है। आधुनिक युग में जब मानव अपने स्वार्थ और लोभ के वशीभूत होकर किसी भी अनुचित कार्य को करने में संकोच नहीं करता, यहां तक कि अपने लाभ के लिए हिंसा तक को जायज ठहराने लगा है, तब महावीर स्वामी के सिद्धांत हमें नैतिकता, सहिष्णुता और करुणा की ओर लौटने का आह्वान करते हैं। वर्तमान सामाजिक, मानसिक, नैतिक और पर्यावरणीय संकटों से घिरे मानव समाज के लिए भगवान महावीर के विचार और दर्शन समाधान का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने जीवन भर मानवता को ऐसे अनेक उपदेश और अमृत वचन दिए, जो न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी शांति, संयम और संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं। उनके सिद्धांतों को यदि हम अपने आचरण और व्यवहार में उतार लें तो न केवल व्यक्तिगत जीवन को सार्थकता मिलती है, बल्कि समाज में भी सद्भाव, अहिंसा और करुणा की भावना को बढ़ावा मिलता है। महावीर स्वामी का दर्शन इस बात की शिक्षा देता है कि हर जीव मात्र के प्रति सम्मान और समता की भावना रखी जाए क्योंकि सभी प्राणी एक समान पीड़ा का अनुभव करते हैं और मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं। आज के हिंसा और तनाव से भरे समय में भगवान महावीर का यह जीवन दर्शन मानवता को स्थायी शांति, आत्मशुद्धि और परस्पर सौहार्द की राह दिखाता है। डालते हैं भगवान महावीर के ऐसे ही अमृत वचनों पर नजर:-- संसार के सभी प्राणी बराबर हैं, अतः हिंसा को त्यागिए और ‘जीओ व जीने दो’ का सिद्धांत अपनाइए।- जिस प्रकार अणु से छोटी कोई वस्तु नहीं और आकाश से बड़ा कोई पदार्थ नहीं, उसी प्रकार अहिंसा के समान संसार में कोई महान् व्रत नहीं।- जो मनुष्य स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है या दूसरों से हिंसा करवाता है अथवा हिंसा करने वालों का समर्थन करता है, वह जगत में अपने लिए वैर बढ़ाता है।- धर्म उत्कृष्ट मंगल है और अहिंसा, तप व संयम उसके प्रमुख लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों का मन सदैव धर्म में रहता है, उन्हें देव भी नमस्कार करते हैं।इसे भी पढ़ें: Mahavir Jayanti 2025: भारतीय संस्कृति का सूरज हैं भगवान महावीर- मानव व पशुओं के समान पेड़-पौधों, अग्नि, वायु में भी आत्मा वास करती है और पेड़ पौधों में भी मनुष्य के समान दुख अनुभव करने की शक्ति होती है।- संसार में प्रत्येक जीव अवध्य है, इसलिए आवश्यक बताकर की जाने वाली हिंसा भी हिंसा ही है और वह जीवन की कमजोरी है, वह अहिंसा कभी नहीं हो सकती।- जिस जन्म में कोई भी जीव जैसा कर्म करेगा, भविष्य में उसे वैसा ही फल मिलेगा। वह कर्मानुसार ही देव, मनुष्य, नारक व पशु-पक्षी की योनि में भ्रमण करेगा।- कर्म स्वयं प्रेरित होकर आत्मा को नहीं लगते बल्कि आत्मा कर्मों को आकृष्ट करती है।- जिस मनुष्य का मन सदैव अहिंसा, संयम, तप और धर्म में लगा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।- धर्म का स्थान आत्मा की आंतरिक पवित्रता से है, बाह्य साधन धर्म के एकान्त साधक व बाधक नहीं हो सकते।- संसार का प्रत्येक प्राणी धर्म का अधिकारी है।- क्रोध प्रेम का नाश करता है, मान विषय का, माया मित्रता का नाश करती है और लालच सभी गुणों का। जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे पाप बढ़ाने वाले चार दोषों क्रोध, मान, माया और लालच का त्याग कर देना चाहिए।- रूग्णजनों की सेवा-सुश्रुषा करने का कार्य प्रभु की परिचर्या से भी बढ़कर है।- वासना, विकार व कर्मजाल को काटकर नारी व पुरूष दोनों समान रूप से मुक्ति पाने के अधिकारी हैं।- जब तक कर्म बंधन है, तब तक संसार मिट नहीं सकता। गति भ्रमण ही संसार है।- छोटे-बड़े किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, बिना दी गई वस्तु स्वयं न लेना, विश्वासघाती असत्य न बोलना, यह आत्मा निग्रह सद्पुरूषों का धर्म है।- ज्ञानी होने का यही एक सार है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। यही अहिंसा का विज्ञान है।- जो लोग कष्ट में अपने धैर्य को स्थिर नहीं रख पाते, वे अहिंसा की साधना नहीं कर सकते। अहिंसक व्यक्ति तो अपने से शत्रुता रखने वालों को भी अपना प्रिय मानता है।- संसार में रहने वाले चल और स्थावर जीवों पर मन, वचन एवं शरीर से किसी भी तरह के दंड का प्रयोग नहीं करना चाहिए।- ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बाद यदि कर्म श्रेष्ठ हैं, वही व्यक्ति ब्राह्मण है किन्तु ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी यदि वह हिंसाजन्य कार्य करता है तो वह ब्राह्मण नहीं है जबकि नीच कुल में पैदा होने वाला व्यक्ति अगर सुआचरण, सुविचार एवं सुकृत्य करता है तो वह बाह्मण है।- प्रत्येक प्राणी एक जैसी पीड़ा का अनुभव करता है और हर प्राणी का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति ही है।- आत्मा शरीर से भिन्न है, आत्मा चेतन है, आत्मा नित्य है, आत्मा अविनाशी है। आत्मा शाश्वत है। वह कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेती है।- योगेश कुमार गोयल(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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Apr 14, 2025 - 15:54
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Mahavir Jayanti 2025: सदैव प्रासंगिक रहेगी भगवान महावीर की अमृतवाणी
‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उद्घोष करने वाले भगवान महावीर का अहिंसा दर्शन आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और आवश्यक बन गया है। आधुनिक युग में जब मानव अपने स्वार्थ और लोभ के वशीभूत होकर किसी भी अनुचित कार्य को करने में संकोच नहीं करता, यहां तक कि अपने लाभ के लिए हिंसा तक को जायज ठहराने लगा है, तब महावीर स्वामी के सिद्धांत हमें नैतिकता, सहिष्णुता और करुणा की ओर लौटने का आह्वान करते हैं। वर्तमान सामाजिक, मानसिक, नैतिक और पर्यावरणीय संकटों से घिरे मानव समाज के लिए भगवान महावीर के विचार और दर्शन समाधान का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने जीवन भर मानवता को ऐसे अनेक उपदेश और अमृत वचन दिए, जो न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी शांति, संयम और संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं। उनके सिद्धांतों को यदि हम अपने आचरण और व्यवहार में उतार लें तो न केवल व्यक्तिगत जीवन को सार्थकता मिलती है, बल्कि समाज में भी सद्भाव, अहिंसा और करुणा की भावना को बढ़ावा मिलता है। महावीर स्वामी का दर्शन इस बात की शिक्षा देता है कि हर जीव मात्र के प्रति सम्मान और समता की भावना रखी जाए क्योंकि सभी प्राणी एक समान पीड़ा का अनुभव करते हैं और मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं। आज के हिंसा और तनाव से भरे समय में भगवान महावीर का यह जीवन दर्शन मानवता को स्थायी शांति, आत्मशुद्धि और परस्पर सौहार्द की राह दिखाता है। डालते हैं भगवान महावीर के ऐसे ही अमृत वचनों पर नजर:-

- संसार के सभी प्राणी बराबर हैं, अतः हिंसा को त्यागिए और ‘जीओ व जीने दो’ का सिद्धांत अपनाइए।

- जिस प्रकार अणु से छोटी कोई वस्तु नहीं और आकाश से बड़ा कोई पदार्थ नहीं, उसी प्रकार अहिंसा के समान संसार में कोई महान् व्रत नहीं।

- जो मनुष्य स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है या दूसरों से हिंसा करवाता है अथवा हिंसा करने वालों का समर्थन करता है, वह जगत में अपने लिए वैर बढ़ाता है।

- धर्म उत्कृष्ट मंगल है और अहिंसा, तप व संयम उसके प्रमुख लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों का मन सदैव धर्म में रहता है, उन्हें देव भी नमस्कार करते हैं।

इसे भी पढ़ें: Mahavir Jayanti 2025: भारतीय संस्कृति का सूरज हैं भगवान महावीर

- मानव व पशुओं के समान पेड़-पौधों, अग्नि, वायु में भी आत्मा वास करती है और पेड़ पौधों में भी मनुष्य के समान दुख अनुभव करने की शक्ति होती है।

- संसार में प्रत्येक जीव अवध्य है, इसलिए आवश्यक बताकर की जाने वाली हिंसा भी हिंसा ही है और वह जीवन की कमजोरी है, वह अहिंसा कभी नहीं हो सकती।

- जिस जन्म में कोई भी जीव जैसा कर्म करेगा, भविष्य में उसे वैसा ही फल मिलेगा। वह कर्मानुसार ही देव, मनुष्य, नारक व पशु-पक्षी की योनि में भ्रमण करेगा।

- कर्म स्वयं प्रेरित होकर आत्मा को नहीं लगते बल्कि आत्मा कर्मों को आकृष्ट करती है।

- जिस मनुष्य का मन सदैव अहिंसा, संयम, तप और धर्म में लगा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

- धर्म का स्थान आत्मा की आंतरिक पवित्रता से है, बाह्य साधन धर्म के एकान्त साधक व बाधक नहीं हो सकते।

- संसार का प्रत्येक प्राणी धर्म का अधिकारी है।

- क्रोध प्रेम का नाश करता है, मान विषय का, माया मित्रता का नाश करती है और लालच सभी गुणों का। जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे पाप बढ़ाने वाले चार दोषों क्रोध, मान, माया और लालच का त्याग कर देना चाहिए।

- रूग्णजनों की सेवा-सुश्रुषा करने का कार्य प्रभु की परिचर्या से भी बढ़कर है।

- वासना, विकार व कर्मजाल को काटकर नारी व पुरूष दोनों समान रूप से मुक्ति पाने के अधिकारी हैं।

- जब तक कर्म बंधन है, तब तक संसार मिट नहीं सकता। गति भ्रमण ही संसार है।

- छोटे-बड़े किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, बिना दी गई वस्तु स्वयं न लेना, विश्वासघाती असत्य न बोलना, यह आत्मा निग्रह सद्पुरूषों का धर्म है।

- ज्ञानी होने का यही एक सार है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। यही अहिंसा का विज्ञान है।

- जो लोग कष्ट में अपने धैर्य को स्थिर नहीं रख पाते, वे अहिंसा की साधना नहीं कर सकते। अहिंसक व्यक्ति तो अपने से शत्रुता रखने वालों को भी अपना प्रिय मानता है।

- संसार में रहने वाले चल और स्थावर जीवों पर मन, वचन एवं शरीर से किसी भी तरह के दंड का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

- ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बाद यदि कर्म श्रेष्ठ हैं, वही व्यक्ति ब्राह्मण है किन्तु ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी यदि वह हिंसाजन्य कार्य करता है तो वह ब्राह्मण नहीं है जबकि नीच कुल में पैदा होने वाला व्यक्ति अगर सुआचरण, सुविचार एवं सुकृत्य करता है तो वह बाह्मण है।

- प्रत्येक प्राणी एक जैसी पीड़ा का अनुभव करता है और हर प्राणी का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति ही है।

- आत्मा शरीर से भिन्न है, आत्मा चेतन है, आत्मा नित्य है, आत्मा अविनाशी है। आत्मा शाश्वत है। वह कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेती है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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