Jyoti Basu Death Anniversary: बंगाल की सियासत का 'लौह पुरुष', Jyoti Basu ने क्यों ठुकरा दिया था देश के PM बनने का Golden Offer

भारत के वामपंथी सुपरस्टार और बंगाल के लौह पुरुष कहे जाने वाले ज्योति बसु का 17 जनवरी को निधन हो गया था। हालांकि उनकी एकतरफा शैली के लिए हमेशा आलोचना की जाती थी। लेकिन उनकी राजनीतिक सूझबूझ और निर्णय क्षमता को भी समान रूप से स्वीकार किया गया। वह हमेशा कलफ लगे सफेद कपड़े पहनते थे। ज्योति बसु 23 साल से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। वह किसी भी भारतीय राज्य के सबसे लंबे समय तक सीएम रहने वाले व्यक्ति थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योति बसु के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता में 08 जुलाई 1914 को ज्योति बसु का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम निशिकांत बसु और मां का नाम हेमलता देवी था। इनके पिता एक होम्योपैथ चिकित्सक थे। उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज और इंटरमीडिएट पास किया। फिर साल 1935 में वह कानून की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन चले गए। ब्रिटेन में रहने के दौरान वह वामपंथी सिद्धांत और व्यवहार से प्रभावित हो गए थे। वहीं वीके कृष्ण मेनन के नेतृत्व में ज्योति बसु भारतीय छात्रों के एक निकाय इंडिया लीग के सदस्य बन गए।इसे भी पढ़ें: MG Ramachandran Birth Anniversary: एमजी रामचंद्रन ने Cinema और Politics दोनों पर किया राज, आज भी मिसाल है ये Legacyराजनीतिक सफरब्रिटिश शासन से भारत को आजादी मिलने के बाद साल 1952 में ज्योति बसु बारानगर से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। वहीं 1950-60 के दशक में बसु मूल रूप से प्रांतीय राजनीतिज्ञ बने। उनको अक्सर गिरफ्तार किया जाता और वह पुलिस से बचने के लिए भूमिगत हो जाए। जब सीपीआई (एम) में विभाजन हुआ, तो ज्योति बसु इसके पोलित ब्यूरो सदस्य बने। वह पहले पोलित ब्यूरो के नौ सदस्यों में से अंतिम जीवित सदस्य थे, जिनको 'नवरत्न' के रूप में जाना जाता था।देश में आपातकाल के बाद साल 1977 में वाम मोर्चे ने पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाई और ज्योति बसु को मुख्यमंत्री चुना गया। वहीं अगले 23 सालों में ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम ने राज्य में न सिर्फ मजबूत आधार बनाने का काम किया, बल्कि एक ऐसा आधार बनाया, जिसको अक्सर निर्दयी माना जाता था। ज्योति बसु की देखरेख में कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी, भूमि सुधार और त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था जैसी कई पहल शुरू की।वहीं ज्योति बसु ने साल 2000 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इसी साल 06 नवबंर को उन्होंने डिप्टी बुद्धदेव भट्टाचार्य को पदभार सौंप दिया। वहीं सेहत खराब होने की वजह से साल 2008 में उनको पोलित ब्यूरो से हटा दिया गया। हालांकि अपनी मृत्यु तक ज्योति बसु पार्टी की केंद्रीय समिति में विशेष आमंत्रित सदस्य बने रहे।पीएम पद का ऑफरसाल 1966 में ज्योति बसु भारत के पहले कम्युनिस्ट पीएम बनने के बहुत करीब पहुंच गए थे। उनको प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला था। लेकिन उन्होंने इसको ठुकरा दिया था। वह भारतीय राजनीति के इतिहास की अहम घटना है, जिसको बाद में ज्योति बसु ने ऐतिहासिक भूल बताया था। उनका मानना था कि यह भारत में वामपंथी आंदोलन के लिए एक बड़ा मौका था, जिसको पार्टी ने गंवा दिया था।मृत्युवहीं 17 जनवरी 2010 को ज्योति बसु का निधन हो गया था।

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Jan 18, 2026 - 17:10
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Jyoti Basu Death Anniversary: बंगाल की सियासत का 'लौह पुरुष', Jyoti Basu ने क्यों ठुकरा दिया था देश के PM बनने का Golden Offer
भारत के वामपंथी सुपरस्टार और बंगाल के लौह पुरुष कहे जाने वाले ज्योति बसु का 17 जनवरी को निधन हो गया था। हालांकि उनकी एकतरफा शैली के लिए हमेशा आलोचना की जाती थी। लेकिन उनकी राजनीतिक सूझबूझ और निर्णय क्षमता को भी समान रूप से स्वीकार किया गया। वह हमेशा कलफ लगे सफेद कपड़े पहनते थे। ज्योति बसु 23 साल से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। वह किसी भी भारतीय राज्य के सबसे लंबे समय तक सीएम रहने वाले व्यक्ति थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योति बसु के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और परिवार

कोलकाता में 08 जुलाई 1914 को ज्योति बसु का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम निशिकांत बसु और मां का नाम हेमलता देवी था। इनके पिता एक होम्योपैथ चिकित्सक थे। उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज और इंटरमीडिएट पास किया। फिर साल 1935 में वह कानून की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन चले गए। ब्रिटेन में रहने के दौरान वह वामपंथी सिद्धांत और व्यवहार से प्रभावित हो गए थे। वहीं वीके कृष्ण मेनन के नेतृत्व में ज्योति बसु भारतीय छात्रों के एक निकाय इंडिया लीग के सदस्य बन गए।

इसे भी पढ़ें: MG Ramachandran Birth Anniversary: एमजी रामचंद्रन ने Cinema और Politics दोनों पर किया राज, आज भी मिसाल है ये Legacy

राजनीतिक सफर

ब्रिटिश शासन से भारत को आजादी मिलने के बाद साल 1952 में ज्योति बसु बारानगर से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। वहीं 1950-60 के दशक में बसु मूल रूप से प्रांतीय राजनीतिज्ञ बने। उनको अक्सर गिरफ्तार किया जाता और वह पुलिस से बचने के लिए भूमिगत हो जाए। जब सीपीआई (एम) में विभाजन हुआ, तो ज्योति बसु इसके पोलित ब्यूरो सदस्य बने। वह पहले पोलित ब्यूरो के नौ सदस्यों में से अंतिम जीवित सदस्य थे, जिनको 'नवरत्न' के रूप में जाना जाता था।

देश में आपातकाल के बाद साल 1977 में वाम मोर्चे ने पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाई और ज्योति बसु को मुख्यमंत्री चुना गया। वहीं अगले 23 सालों में ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम ने राज्य में न सिर्फ मजबूत आधार बनाने का काम किया, बल्कि एक ऐसा आधार बनाया, जिसको अक्सर निर्दयी माना जाता था। ज्योति बसु की देखरेख में कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी, भूमि सुधार और त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था जैसी कई पहल शुरू की।

वहीं ज्योति बसु ने साल 2000 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इसी साल 06 नवबंर को उन्होंने डिप्टी बुद्धदेव भट्टाचार्य को पदभार सौंप दिया। वहीं सेहत खराब होने की वजह से साल 2008 में उनको पोलित ब्यूरो से हटा दिया गया। हालांकि अपनी मृत्यु तक ज्योति बसु पार्टी की केंद्रीय समिति में विशेष आमंत्रित सदस्य बने रहे।

पीएम पद का ऑफर

साल 1966 में ज्योति बसु भारत के पहले कम्युनिस्ट पीएम बनने के बहुत करीब पहुंच गए थे। उनको प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला था। लेकिन उन्होंने इसको ठुकरा दिया था। वह भारतीय राजनीति के इतिहास की अहम घटना है, जिसको बाद में ज्योति बसु ने ऐतिहासिक भूल बताया था। उनका मानना था कि यह भारत में वामपंथी आंदोलन के लिए एक बड़ा मौका था, जिसको पार्टी ने गंवा दिया था।

मृत्यु

वहीं 17 जनवरी 2010 को ज्योति बसु का निधन हो गया था।

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