संसार में अपमान किसी को नहीं भाता। सम्मान की प्राप्ति न हो, तो एक बार के लिए चल भी जाता है, किंतु उसी सम्मान जगह, अपमान मिल जाए, यह किसी को गवारा नहीं होता। सोच कर देखिए, एक साधारण व्यक्ति को जब यह स्वीकार नहीं, तो यह व्यवहार हम ईश्वर के लिए कैसे सोच सकते हैं? निश्चित ही हमें नहीं सोचना चाहिए। किंतु जब भगवान शंकर अपनी बारात लेकर हिमाचल के महलों में पहुँचे, तो क्या हिमवासियों ने उनका सम्मान किया? भगवान शंकर, जो कि इस सृष्टि के प्रथम योगी हैं। महान तपस्वी व करुणा के सागर हैं। जिनका सम्मान स्वयं विष्णु व ब्रह्मा जी करते हैं। उनका सम्मान हिमाचल के साधारण वासी भी करने को तैयार नहीं। मैना, जो कि भगवान शंकर की सासु जी के नाते उनका स्वागत करने आई हैं, वे आरती की थाली लेकर उनके समक्ष तो जाती हैं, किंतु भोलेनाथ को देखते ही भय से काँपने लगती हैं। गोस्वामी जी कहते हैं-
‘कंचन थार सोह बर पानी।
परिछन चली हरहि हरषानी।।
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा।
अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।
भागि भवन पैठीं अति त्रसा।
गए महेसु जहाँ जनवासा।।
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी।
लीन्ही बोली गिरीसकुमारी।।’
भगवान शंकर के भयंकर वेष को देखते ही मैना घबरा गई। आरती वाली थाली वहीं उलट पुलट गई। उसकी आँखें पलट गई। माथा पसीने से भीग गया। उसके रोम-रोम में भय की लहर दौड़ गई। कहाँ तो मैना का हृदय हर्ष से ओत प्रोत होना था, कहाँ वह महान शोक में डूब गईं। उन्होंने दूल्हे के स्वागत में जो भी रीति संस्कारों का निर्वाह करना था, वे सब भूल गईं। उन्हें भान ही न रहा, कि वे अपने जमाई राजा का शुभाग्मन करने आई हैं। वे ऐसी भयभीत हुई, कि हाथ से आरती का थाल ही गिर गया। व उल्टे पैर वापिस दौड़ पड़ी। इस आयु में भी मैना ऐसी दौड़ी, मानों वे कोई धावक हों। पता ही न चला, कि रास्ते में कोई ईंट रोड़ा भी है या नहीं। बस यही था, कि किसी न किसी प्रकार से प्राणों की रक्षा की जाये।
इधर भगवान शंकर, आज की तिथि में केवल भगवान ही नहीं हैं, अपितु मैना के जमाई भी हैं। किसी दूल्हे के साथ ऐसा अनुचित व्यवहार हो जाये, तो निश्चित ही दूल्हा उस चौखट से वापिस मुड़ खड़ा होता है। किंतु भगवान शंकर को देखिए, तो वे रत्ती भर भी क्रोधित नहीं होते। वे स्वयं ही उस दिशा में बढ़ जाते हैं, जहाँ जनवासे में उनके ठहरने का प्रबंध हुआ था। उन्हें तो महसूस ही नहीं हुआ, कि मेरा अपमान हुआ है। क्योंकि शंभू नाथ तो मान अपमान से हैं ही कोसों दूर।
वैसे भी भगवान शंकर, मैना के द्वारा पाये जाने वाले सम्मान के लिए तो यहाँ आये ही नहीं थे। उन्हें तो भगवान श्रीराम जी की आज्ञा थी, कि उन्हें देवी पार्वती जी से विवाह करना है। दूसरी बात, वे स्वयं पार्वती जी के तप व प्रेम में बँध कर यहाँ आये थे। हिमाचल में उन्हें अभी तक, कोई एक जन भी तो ऐसा नहीं दिखा था, जो उन्हें हृदय से प्रेम भर कर मिला हो। सभी तो उनसे डर कर दूर भाग रहे थे। भाग रहे थे, तो भागने दो, भोलेनाथ को इससे कोई वास्ता ही नहीं था। वे तो उन्हें अपने परिणय सूत्र में बाँधने आये थे, जो उनकी प्रतीक्षा में उनसे भी कठिन तप करे बैठी थी। सो मान अपमान से कोसों दूर अपने जनवासे में जाकर भोलनाथ, भोले से बन कर बैठ गए।
इधर मैना की अलग ही रागनी बज रही थी। कहाँ तो उनकी वाणी से मंगल गीत गाये जाने थे, कहाँ वे विलाप करने बैठ गई। रोती बिलखती मैना ने पार्वती जी को अपने पास बुलाया-
‘अधिक सनेहँ गोद बैठारी।
स्याम सरोज नयन भरे बारी।।
जेहिं बिधि तुम्हहि रुपु अस दीन्हा।
तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।’
मैना ने देवी पार्वती को अत्यंत प्रेम से अपनी गोद में बिठाकर अपने नीलकमल के समान नेत्रें में आँसु भरकर कहा-जिस विधाता ने तुमको ऐसा सुंदर रुप दिया, उस मूर्ख ने तुम्हारे दूल्हे को बावला कैसे बनाया?
मैना कैसे-कैसे विधि को दोष देती है, और देवी पार्वती कैसे अपनी माँ को समझाती है, जानेंगे अगले अंक में।
क्रमशः
- सुखी भारती