इतिहास में कई ऐसी बहादुर शख्सियते हुईं, जिन्होंने मुगलों के सामने झुकने के बजाय उनका बहादुरी से सामना किया। ऐसी ही एक शख्सियत बंदा सिंह बहादुर की रही। कम उम्र में ही संत बनने वाले बंदा सिंह बहादुर एक कुशल और बहादुर योद्धा होने के साथ काबिल लीडर भी थे। आज ही के दिन यानी की 27 अक्तूबर को बंदा सिंह बहादुर का जन्म हुआ था। उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह से मुलाकात होने के बाद सैनिक प्रशिक्षण लिया था और बिना सेना व हथियार के करीब 2500 किमी की दूरी तय की थी। बंदा सिंह बहादुर ने डेढ़ साल के अंदर सरहिंद पर कब्जा किया और खालसा राज की नींव रखने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बंदा सिंह बहादुर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
जन्म और परिवार
राजौरी में 27 अक्तूबर 1670 को बंदा सिंह बहादुर का जन्म हुआ था। बताया जाता है कि वह बहुत कम उम्र में घर छोड़कर बैरागी हो गए थे। इसलिए उनको माधोदास बैरागी के नाम से जाना जाने लगा था। भ्रमण करते हुए बंदा सिंह बहादुर महाराष्ट्र पहुंचे, जहां पर उनकी मुलाकात सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह से हुई। गुरु गोबिंद सिंह ने बंदा सिंह को अपनी तपस्वी जीवनशैली को त्यागने और पंजाब के लोगों को मुगलों से छुटकारा दिलाने का काम सौंपा।
मुगलों से छुटकारा दिलाने की जिम्मेदारी
इसके बाद बंदा सिंह को एक तलवार, पांच तीर और 3 साथी दिए और एक फरमान दिया गया। इस फरमान में लिखा था कि बंदा सिंह को मुगलों के जुल्म से लोगों को छुटकारा दिलाने के लिए सिखों का नेतृत्व करें। साथ ही यह भी कहा गया कि वह पंजाब कूच करें और वजीर खां को मौत की सजा दें।
वहीं साल 1709 में मुगल साम्राज्य की कमान बहादुर शाह के पास थी। वह सल्तनत का दायरा बढ़ाने के लिए दक्षिण में जंग कर रहे थे। जब बंदा सिंह पंजाब पहुंचे तो उन्होंने सतलज नदी के पहले रहने वाले सिख किसानों को एकजुट करना शुरू किया। फिर उन्होंने कैथल और सोनीपत में मुगलों के खजाने पर कब्जा कर लिया। जिन बंदा सिंह की सेना में 3 साथी थे, उनका दायरा तेजी से बढ़ा। उनकी सेना में 8 हजार सैनिक हो गए। उनकी सेना में 5 हजार घोड़े थे, जोकि बढ़कर 19 हजार हो गए थे।
सरहिंद पर हमला
साल 1709 में बंदा सिंह और उनके सैनिकों ने सरहिंद के समाना पर हमला किया। इस हमले का कारण यह था कि वजीर खां वहां पर रहता था। यह वही वजीर खां था, जिसने गुरु गोबिंद सिंह का सिर कलम किया था और उनके बेटों को मौत के घाट उतार दिया था। बंदा सिंह ने 1710 में हमला किया और दो दर्जन तोपों के साथ फतह हासिल की। आमने-सामने की लड़ाई में बंदा सिंह के भाई फतह सिंह ने सीधे वजीर खां के सिर पर हमला कर उसको चित कर दिया।
बंदा सिंह बहादुर की इस जीत के बाद उन्होंने नई मुहर और सिक्के जारी किए। जिस पर गुरुनानक की तस्वीर थी। हालांकि 1710 में मुगल बादशाह बहादुर शाह ने बदला लेने और बंदा सिंह बहादुर को पकड़ने की तमाम रणनीति बनाई, लेकिन मुगल शासक को सफलता नहीं मिली। बता दें कि 1712 में बहादुर शाह की मौत के बाद उनके भतीजे ने सल्तनत संभाली थी। जिसके बाद बंदा सिंह को पकड़ने की जिम्मेदारी अब्दुल समद खां को सौंपी गई।
मृत्यु
अब्दुल समद खां ने सेना के साथ उस किले को घेरा, जहां पर बंदा सिंह बहादुर थे। मुगल सैनिकों ने अंदर राशन पानी भेजने पर रोक लगा दी और यह पहरा लगातार 8 महीनों तक रहा। जिसका नतीजा यह निकला कि बंदा सिंह और उनके साथियों को घोड़ों का मांस खाकर जिंदा रहना पड़ा। समद खां आखिरकार बंदा सिंह का किला भेदने में सफल रहा। बंदा सिंह को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया और तमाम तरह की यातनाएं दी गईं। लेकिन बंदा सिंह ने मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाया। फिर 09 जून 1716 को जल्लाद ने बंदा सिंह बहादुर का धड़ सिर से अलग कर दिया।