भारत ने कर डाला नेपाल का इलाज, चकरा गया बालेन शाह का दिमाग!

नेपाल में त्योहारों की मिठास पर इस समय बड़ा संकट मंडराता नजर आ रहा है। क्योंकि वजह है भारत सरकार का वह फैसला जिसमें कच्ची, सफेद और रिफाइनरी, चीनी के निर्यात पर 30 दिसंबर तक रोक बढ़ा दी गई है। यह कदम घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने और सप्लाई को स्थिर बनाए रखने के लिए उठाया गया है। लेकिन इस फैसले का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका सबसे ज्यादा तेज और बड़ा प्रभाव पड़ोसी देश नेपाल में देखने को मिल रहा है। दरअसल काठमांडू समेत पूरे नेपाल के बाजारों में चीनी की उपलब्धता और कीमत को लेकर चिंता बढ़ गई है। व्यापारियों का कहना है कि जैसे-जैसे त्यौहारों का सीजन करीब आ रहा है, वैसे-वैसे मांग तेजी से बढ़ेगी। लेकिन सप्लाई पर दबाव पहले से ही दिखाई देने लगा है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर और त्यौहारों की तैयारियों पर पड़ सकता है। नेपाल के लिए यह समय इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले महीनों में दशहरा, त्यौहार और छठ जैसे बड़े और पारंपरिक त्यौहार मनाए जाने वाले हैं। इन त्यौहारों में मिठाइयों की खपत कई गुना बढ़ जाती है और चीनी की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है। इसे भी पढ़ें: Kathmandu Airport पर लैंडिंग के वक्त Turkish Airlines के विमान में लगी भीषण आग, 277 यात्री बाल-बाल बचेऐसे में अगर बाजार में कमी या कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो इसका असर सीधे त्योहारों की खुशियों पर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीनी की कमी से सिर्फ कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी बल्कि कई जरूरी खाद वस्तुओं की सप्लाई चैन पर भी दबाव पड़ सकता है। व्यापारी पहले से ही चेतावनी दे रहे हैं कि अगर स्थिति ऐसी ही रही जमाखोरी और कालाबाजारी का खतरा भी बढ़ सकता है। जिससे बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है। इस पूरे संकट के पीछे केवल व्यापारिक नीति ही नहीं बल्कि मौसम से जुड़ा एक बड़ा कारण भी सामने आ रहा है। मौसम विशेषज्ञों ने अलनो का लेकर चेतावनी दी है। इसके चलते दक्षिण एशिया में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है। जिसका सीधा असर गन्ने की फसल पर पड़ सकता है। अगर उत्पादन घटता है तो आने वाले समय में चीनी की उपलब्धता और भी सीमित हो सकती है। नेपाल की स्थिति इसलिए और भी अधिक संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि वे अपनी लगभग 90% चीनी जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर है। ऐसे में भारत के किसी भी व्यापारिक फैसले का सीधा प्रभाव नेपाल की अर्थव्यवस्था और बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि इस बार भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया है। नेपाल के उद्योग और कमर्शियल मंत्रालय के अधिकारी नेत्र प्रसाद मुसवेदी ने भी स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि सरकार पहले से ही भारत के साथ व्यापारिक समझौते पर बातचीत कर रही थी।  इसे भी पढ़ें: India MEA Briefing: भारत-पाक सैन्य संघर्ष के दौरान Pakistan की मदद करने China से India ने पूछ लिया बड़ा तीखा सवालचीनी निर्यात पर लगे प्रतिबंध ने हालत को और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अब नेपाल सरकार से सरकार यानी जी टूजी समझौते के जरिए भारत से विशेष कोटे की मांग करने पर विचार कर रही है। ताकि त्योहारों के समय सीमित मात्रा में चीनी की आपूर्ति जारी रह सके। इससे बाजार में अचानक होने वाली कमी को कुछ हद तक रोका जा सकता है। हालांकि बड़ा सवाल यही है कि क्या यह समाधान पर्याप्त होगा? क्या केवल कोटा व्यवस्था से त्योहारों की मांग पूरी हो जाएगी या फिर कीमतों में और उछाल देखने को मिलेगा। इससे पहले भी 2023 में जब भारत ने चीनी निर्यात पर रोक लगाई थी तब नेपाल में कीमतें 30 से 40% तक बढ़ गई थी और सरकार को तत्काल बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ा था। 

PNSPNS
May 19, 2026 - 09:01
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भारत ने कर डाला नेपाल का इलाज, चकरा गया बालेन शाह का दिमाग!
नेपाल में त्योहारों की मिठास पर इस समय बड़ा संकट मंडराता नजर आ रहा है। क्योंकि वजह है भारत सरकार का वह फैसला जिसमें कच्ची, सफेद और रिफाइनरी, चीनी के निर्यात पर 30 दिसंबर तक रोक बढ़ा दी गई है। यह कदम घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने और सप्लाई को स्थिर बनाए रखने के लिए उठाया गया है। लेकिन इस फैसले का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका सबसे ज्यादा तेज और बड़ा प्रभाव पड़ोसी देश नेपाल में देखने को मिल रहा है। दरअसल काठमांडू समेत पूरे नेपाल के बाजारों में चीनी की उपलब्धता और कीमत को लेकर चिंता बढ़ गई है। व्यापारियों का कहना है कि जैसे-जैसे त्यौहारों का सीजन करीब आ रहा है, वैसे-वैसे मांग तेजी से बढ़ेगी। लेकिन सप्लाई पर दबाव पहले से ही दिखाई देने लगा है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर और त्यौहारों की तैयारियों पर पड़ सकता है। नेपाल के लिए यह समय इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले महीनों में दशहरा, त्यौहार और छठ जैसे बड़े और पारंपरिक त्यौहार मनाए जाने वाले हैं। इन त्यौहारों में मिठाइयों की खपत कई गुना बढ़ जाती है और चीनी की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है। 

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ऐसे में अगर बाजार में कमी या कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो इसका असर सीधे त्योहारों की खुशियों पर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीनी की कमी से सिर्फ कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी बल्कि कई जरूरी खाद वस्तुओं की सप्लाई चैन पर भी दबाव पड़ सकता है। व्यापारी पहले से ही चेतावनी दे रहे हैं कि अगर स्थिति ऐसी ही रही जमाखोरी और कालाबाजारी का खतरा भी बढ़ सकता है। जिससे बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है। इस पूरे संकट के पीछे केवल व्यापारिक नीति ही नहीं बल्कि मौसम से जुड़ा एक बड़ा कारण भी सामने आ रहा है। मौसम विशेषज्ञों ने अलनो का लेकर चेतावनी दी है। इसके चलते दक्षिण एशिया में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है। जिसका सीधा असर गन्ने की फसल पर पड़ सकता है। अगर उत्पादन घटता है तो आने वाले समय में चीनी की उपलब्धता और भी सीमित हो सकती है। नेपाल की स्थिति इसलिए और भी अधिक संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि वे अपनी लगभग 90% चीनी जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर है। ऐसे में भारत के किसी भी व्यापारिक फैसले का सीधा प्रभाव नेपाल की अर्थव्यवस्था और बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि इस बार भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया है। नेपाल के उद्योग और कमर्शियल मंत्रालय के अधिकारी नेत्र प्रसाद मुसवेदी ने भी स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि सरकार पहले से ही भारत के साथ व्यापारिक समझौते पर बातचीत कर रही थी।  

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चीनी निर्यात पर लगे प्रतिबंध ने हालत को और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अब नेपाल सरकार से सरकार यानी जी टूजी समझौते के जरिए भारत से विशेष कोटे की मांग करने पर विचार कर रही है। ताकि त्योहारों के समय सीमित मात्रा में चीनी की आपूर्ति जारी रह सके। इससे बाजार में अचानक होने वाली कमी को कुछ हद तक रोका जा सकता है। हालांकि बड़ा सवाल यही है कि क्या यह समाधान पर्याप्त होगा? क्या केवल कोटा व्यवस्था से त्योहारों की मांग पूरी हो जाएगी या फिर कीमतों में और उछाल देखने को मिलेगा। इससे पहले भी 2023 में जब भारत ने चीनी निर्यात पर रोक लगाई थी तब नेपाल में कीमतें 30 से 40% तक बढ़ गई थी और सरकार को तत्काल बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ा था। 

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