अभिषेक से टकराव, 2020 का वॉट्सऐप मैसेज और इस्तीफा, Suvendu Adhikari ने कैसे लिखी ममता सरकार के अंत की स्क्रिप्ट?

पश्चिम बंगाल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तहत, शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत हो गया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर मजबूत जनादेश दिया, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। जीत के बाद, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हुई एक बैठक में अधिकारी को सर्वसम्मति से भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया।इसे भी पढ़ें: 12 घंटे में देश से भागेंगे बांग्लादेशी? तूफानी आईडिया सुन झूमे भारतीयनंदीग्राम आंदोलन से बंगाल के सर्वोच्च पद तकसुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर बंगाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। पूर्वी मिदनापुर के एक सक्रिय राजनीतिक परिवार में जन्मे सुवेंदु ने कम उम्र में ही सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और 1995 में पहली बार पार्षद चुने गए। तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनकी प्रगति में तेजी आई, जहां वे वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ 2007 में हुए ऐतिहासिक नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के प्रमुख आयोजक बने। यह आंदोलन बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और राज्य में दशकों से चले आ रहे वामपंथी शासन को समाप्त करने में अहम भूमिका निभाई। बाद में वे 2009 और फिर 2014 में सांसद बने, राज्य की राजनीति में आने से पहले उन्होंने 2016 में नंदीग्राम विधानसभा सीट जीती, जहां उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य किया।इसे भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन है वैचारिक बदलाव का संकेतजब ममता के 'सिपाही' ने चुनी अपनी अलग राहअक्टूबर 2020 का वह समय बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट दे रहा था। विधानसभा चुनावों की दहलीज पर खड़ी तृणमूल कांग्रेस ऊपर से शांत दिख रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली तूफान आकार ले रहा था। पूर्वी मेदिनीपुर के बेताज बादशाह और टीएमसी के सबसे कद्दावर चेहरों में से एक, शुभेंदु अधिकारी अब ममता बनर्जी के खेमे में घुटन महसूस कर रहे थे। शुभेंदु वही नेता थे जिन्होंने 2007 के ऐतिहासिक नंदीग्राम आंदोलन की कमान संभाली थी, जिसके दम पर ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी किले को ढहाकर सत्ता हासिल की थी। शुभेंदु केवल एक मंत्री नहीं थे, बल्कि ममता बनर्जी उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानती थीं। उनके पास परिवहन, सिंचाई और जलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के साथ-साथ हुगली नदी पुल आयोग की जिम्मेदारी भी थी। सत्ता के समीकरण तब बिगड़े जब पार्टी संगठन में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ने लगा। शुभेंदु को अभिषेक का नेतृत्व स्वीकार नहीं था, जिसके कारण दोनों के बीच दरार गहरी होती गई। अक्टूबर 2020 तक यह आंतरिक कलह सड़कों और अखबारों की सुर्खियों तक पहुँच गई। 'शुभेंदु बनाम अभिषेक' की इस जंग ने साफ़ कर दिया था कि बंगाल की राजनीति का सबसे भरोसेमंद साथी अब अपनी नई जमीन तलाश रहा है।मनाने की कोशिश हुई नाकामशुभेंदु अधिकारी की नाराजगी दूर करने के लिए ममता बनर्जी ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत लगा दी थी, जिसके तहत उन्होंने सौगत राय और रणनीतिकार प्रशांत किशोर जैसे अपने सबसे खास दूतों को उन्हें मनाने के लिए भेजा। हालांकि, मान-मनौव्वल की ये तमाम कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि शुभेंदु अपने फैसले पर अडिग थे। सौगत राय के अनुसार, 1 दिसंबर को हुई सकारात्मक चर्चा के बाद ऐसा लगा था कि सुलह की गुंजाइश है, लेकिन अगले ही दिन 2 दिसंबर को शुभेंदु ने एक व्हाट्सएप संदेश के जरिए साफ कर दिया कि अब साथ काम करना संभव नहीं है। इसके बाद पार्टी ने आधिकारिक तौर पर उनसे बातचीत के सभी रास्ते बंद करने की घोषणा कर दी।टीएमसी से राजनीतिक अलगाव और भाजपा में उदयदिसंबर 2020 में, 2021 के विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले, अधिकारी ने टीएमसी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। उनके इस कदम ने बंगाल में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर पैदा कर दिया। हालांकि भाजपा 2021 में सरकार नहीं बना पाई, लेकिन अधिकारी विपक्ष के नेता के रूप में उभरे और राज्य में पार्टी की सबसे सशक्त आवाज बन गए। इस दौरान टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता और भी तीव्र हो गई, जिसने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को काफी हद तक प्रभावित किया। 2021 में नंदीग्राम के हाई-प्रोफाइल चुनाव में ममता बनर्जी पर उनकी नाटकीय जीत के बाद अधिकारी का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। वर्षों बाद, उन्होंने भाबनीपुर में एक और बड़ी चुनावी जीत के साथ अपनी स्थिति को और मजबूत किया। इन जीतों ने बंगाल में भाजपा के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उनकी छवि को मजबूत किया और पार्टी की भारी जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए स्वाभाविक पसंद बना दिया। विपक्ष के नेता से मुख्यमंत्री तकअब, वर्षों के राजनीतिक संघर्ष, बदलते गठबंधनों और भीषण चुनावी लड़ाइयों के बाद, सुवेंदु अधिकारी बंगाल की राजनीति के केंद्र में खड़े हैं। एक युवा जमीनी नेता से लेकर वाम-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख व्यक्ति और बाद में ममता बनर्जी के वर्चस्व को चुनौती देने वाले के रूप में उनका सफर राज्य के सबसे नाटकीय राजनीतिक परिवर्तनों में से एक को दर्शाता है।

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May 9, 2026 - 16:20
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अभिषेक से टकराव, 2020 का वॉट्सऐप मैसेज और इस्तीफा, Suvendu Adhikari ने कैसे लिखी ममता सरकार के अंत की स्क्रिप्ट?
पश्चिम बंगाल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तहत, शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत हो गया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर मजबूत जनादेश दिया, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। जीत के बाद, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हुई एक बैठक में अधिकारी को सर्वसम्मति से भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया।

इसे भी पढ़ें: 12 घंटे में देश से भागेंगे बांग्लादेशी? तूफानी आईडिया सुन झूमे भारतीय

नंदीग्राम आंदोलन से बंगाल के सर्वोच्च पद तक

सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर बंगाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। पूर्वी मिदनापुर के एक सक्रिय राजनीतिक परिवार में जन्मे सुवेंदु ने कम उम्र में ही सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और 1995 में पहली बार पार्षद चुने गए। तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनकी प्रगति में तेजी आई, जहां वे वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ 2007 में हुए ऐतिहासिक नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के प्रमुख आयोजक बने। यह आंदोलन बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और राज्य में दशकों से चले आ रहे वामपंथी शासन को समाप्त करने में अहम भूमिका निभाई। बाद में वे 2009 और फिर 2014 में सांसद बने, राज्य की राजनीति में आने से पहले उन्होंने 2016 में नंदीग्राम विधानसभा सीट जीती, जहां उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य किया।

इसे भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन है वैचारिक बदलाव का संकेत

जब ममता के 'सिपाही' ने चुनी अपनी अलग राह

अक्टूबर 2020 का वह समय बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट दे रहा था। विधानसभा चुनावों की दहलीज पर खड़ी तृणमूल कांग्रेस ऊपर से शांत दिख रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली तूफान आकार ले रहा था। पूर्वी मेदिनीपुर के बेताज बादशाह और टीएमसी के सबसे कद्दावर चेहरों में से एक, शुभेंदु अधिकारी अब ममता बनर्जी के खेमे में घुटन महसूस कर रहे थे। शुभेंदु वही नेता थे जिन्होंने 2007 के ऐतिहासिक नंदीग्राम आंदोलन की कमान संभाली थी, जिसके दम पर ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी किले को ढहाकर सत्ता हासिल की थी। शुभेंदु केवल एक मंत्री नहीं थे, बल्कि ममता बनर्जी उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानती थीं। उनके पास परिवहन, सिंचाई और जलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के साथ-साथ हुगली नदी पुल आयोग की जिम्मेदारी भी थी। सत्ता के समीकरण तब बिगड़े जब पार्टी संगठन में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ने लगा। शुभेंदु को अभिषेक का नेतृत्व स्वीकार नहीं था, जिसके कारण दोनों के बीच दरार गहरी होती गई। अक्टूबर 2020 तक यह आंतरिक कलह सड़कों और अखबारों की सुर्खियों तक पहुँच गई। 'शुभेंदु बनाम अभिषेक' की इस जंग ने साफ़ कर दिया था कि बंगाल की राजनीति का सबसे भरोसेमंद साथी अब अपनी नई जमीन तलाश रहा है।

मनाने की कोशिश हुई नाकाम

शुभेंदु अधिकारी की नाराजगी दूर करने के लिए ममता बनर्जी ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत लगा दी थी, जिसके तहत उन्होंने सौगत राय और रणनीतिकार प्रशांत किशोर जैसे अपने सबसे खास दूतों को उन्हें मनाने के लिए भेजा। हालांकि, मान-मनौव्वल की ये तमाम कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि शुभेंदु अपने फैसले पर अडिग थे। सौगत राय के अनुसार, 1 दिसंबर को हुई सकारात्मक चर्चा के बाद ऐसा लगा था कि सुलह की गुंजाइश है, लेकिन अगले ही दिन 2 दिसंबर को शुभेंदु ने एक व्हाट्सएप संदेश के जरिए साफ कर दिया कि अब साथ काम करना संभव नहीं है। इसके बाद पार्टी ने आधिकारिक तौर पर उनसे बातचीत के सभी रास्ते बंद करने की घोषणा कर दी।

टीएमसी से राजनीतिक अलगाव और भाजपा में उदय

दिसंबर 2020 में, 2021 के विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले, अधिकारी ने टीएमसी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। उनके इस कदम ने बंगाल में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर पैदा कर दिया। हालांकि भाजपा 2021 में सरकार नहीं बना पाई, लेकिन अधिकारी विपक्ष के नेता के रूप में उभरे और राज्य में पार्टी की सबसे सशक्त आवाज बन गए। इस दौरान टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता और भी तीव्र हो गई, जिसने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को काफी हद तक प्रभावित किया। 2021 में नंदीग्राम के हाई-प्रोफाइल चुनाव में ममता बनर्जी पर उनकी नाटकीय जीत के बाद अधिकारी का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। वर्षों बाद, उन्होंने भाबनीपुर में एक और बड़ी चुनावी जीत के साथ अपनी स्थिति को और मजबूत किया। इन जीतों ने बंगाल में भाजपा के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उनकी छवि को मजबूत किया और पार्टी की भारी जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए स्वाभाविक पसंद बना दिया। 

विपक्ष के नेता से मुख्यमंत्री तक

अब, वर्षों के राजनीतिक संघर्ष, बदलते गठबंधनों और भीषण चुनावी लड़ाइयों के बाद, सुवेंदु अधिकारी बंगाल की राजनीति के केंद्र में खड़े हैं। एक युवा जमीनी नेता से लेकर वाम-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख व्यक्ति और बाद में ममता बनर्जी के वर्चस्व को चुनौती देने वाले के रूप में उनका सफर राज्य के सबसे नाटकीय राजनीतिक परिवर्तनों में से एक को दर्शाता है।

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