राम पुनियानी का लेखः RSS सांस्कृतिक के भेष में एक राजनैतिक संगठन, देश की जनता के प्रति जवाबदेही से बच नहीं सकता
आरएसएस सांस्कृतिक संगठन की भेष में एक राजनैतिक संगठन है। उसने पहले एबीवीपी की स्थापना की और फिर बीजेपी के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका नया अवतार बीजेपी वर्तमान में केन्द्र और कई राज्यों की सरकार चला रही है।
आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित प्रचारक नाथूराम गोडसे ने सिर्फ इस वजह से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की छाती को तीन गोलियों से छलनी कर दिया था कि गांधी मानते थे कि देश सभी धर्मों के लोगों का है, जबकि गोडसे और उसके पितृ संगठनों आरएसएस-हिन्दू महासभा का मानना था कि देश केवल हिन्दुओं का है। गांधीजी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के खिलाफ नफरत फैलाई गई, जिसके नतीजे में बिल्कुल नजदीक से गोलियां चलाकर गांधीजी की हत्या कर दी गई।
इस गुनाह के कारण भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार पटेल ने 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया और उसके बाद लिखा कि "उनके सभी भाषण नफरत भरे होते थे। इस जहर का अंतिम परिणाम यह हुआ कि देश को गांधीजी के बहुमूल्य जीवन की कुर्बानी देनी पड़ी।‘‘ यह प्रतिबंध संघ द्वारा यह वायदा करने के बाद हटाया गया कि उसका एक लिखित संविधान होगा और वह सिर्फ एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करेगा।
हकीकत यह है कि आरएसएस सांस्कृतिक संगठन की भेष में एक राजनैतिक संगठन है। उसने पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की स्थापना की और बाद में बीजेपी के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका नया अवतार बीजेपी वर्तमान में केन्द्र और कई राज्यों की सरकार चला रही है।
संघ का दावा है कि उसका खर्चा दशहरे के दिन मिलने वाली गुरू दक्षिणा की रकम से चलता है। आयकर अधिकरण ने पता नहीं क्यों आय के इस स्त्रोत को कर मुक्त घोषित कर दिया। वह अपने कार्यक्रमों और शाखाओं के संचालन पर (जो शासकीय भूमि पर भी किया जाता है) अंधाधुध पैसा खर्च कर रही है। उसके पथ संचलनों में कितनी राशी व्यय होती है, इसे गोपनीय रखा जाता है। कहा जाता है कि आरएसएस के दिल्ली कार्यालय के निर्माण पर 100 करोड़ से अधिक का व्यय हुआ है। ये सारे भारी-भरकम खर्चे सरकारी जांच-पड़ताल की पहुंच से कोसों दूर हैं।
सांस्कृतिक संगठन होने के इस दावे को सरकार और ज्यादातर लोगों द्वारा मान लिया गया और अब तक संघ तेजी से विस्तार करते हुए लाखों शाखाओं की स्थापना कर चुका है और कई लाख स्वयंसेवक उससे जुड़ चुके हैं। नेहरू को संघ की प्रकृति का अहसास बहुत जल्दी हो गया था। लेकिन कुछ साल पहले तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित किसी भी राजनैतिक दल ने इन मुद्दों से जुड़े सवाल नहीं उठाए जिसके चलते यह संगठन कानूनी प्रावधानों और नैतिक मूल्यों को ताक पर रखते हुए मनमानी कर रहा है।
कांग्रेस ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी यह गलती सुधारी है और विशेषकर राहुल गांधी आरएसएस के संबंध में तर्कपूर्ण और विधिसम्मत सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि आरएसएस से जुड़े लोग गांधीजी की हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, जिसे लेकर उन पर मुकदमा चला। आरएसएस से दो-दो हाथ करने की इसी नीति के अंतर्गत अब कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने आरएसएस से कहा है कि वह अपना पंजीयन करवाए और भारतीय राज्य के प्रति जवाबदेह बने।
उन्होंने दिनांक 13 जून को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को लिखे एक पत्र में उनसे संगठन की वैधानिक स्थिति, वित्तीय व्यवस्था, पदाधिकारियो और कर संबंधी नियमों के अनुपालन और उसकी गतिविधियों के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी। आरएसएस आधिकारिक रूप से यह दावा करता है कि देश और देश के बाहर उसकी 60 हजार शाखाएं हैं और करोड़ों स्वयंसेवक हैं। खड़गे ने सार्वजनिक रूप से जारी अपने वक्तव्य में कहा कि यह मात्र एक वैधानिक आवश्यकता नहीं है बल्कि इसका नैतिक पक्ष भी है। उन्होंने लिखा, "उसकी गतिविधियां जिस बड़े पैमाने पर संचालित होती हैं, और उसके व्यापक प्रभाव और पहुंच के मद्देनजर आरएसएस से उच्चतम स्तर की पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक प्रावधानों का अनुपालन करवाया ही जाना चाहिए।‘‘
इस पत्र को सार्वजनिक तौर पर जारी किया गया है। अपनी प्रतिक्रिया में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि वे इस पत्र को नजरअंदाज कर रहे हैं और इसका जवाब नहीं देंगें। इस प्रतिक्रिया से ऐसा महसूस होता है कि भागवत मानते हैं कि वे और उनका संगठन कानून और भारतीय संविधान के ऊपर हैं।
वैसे भी आरएसएस भारतीय संविधान में आस्था नहीं रखता। भारतीय संविधान के लागू होने के तीन दिन बाद आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने संपादकीय में कहा था कि यह संविधान, जिसका मसौदा डॉ अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया है और भारतीय संविधान सभा द्वारा अनुमोदित किया गया है, हमारे देश के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि इसमें हमारे पवित्र ग्रंथों के यशस्वी मूल्यों को शामिल नहीं किया गया है।"
आरएसएस के एक पूर्व प्रमुख राजेन्द्र सिंह ने कहा था कि संविधान को खारिज कर दिया जाना चाहिए। एक अन्य प्रमुख के सुदर्शन ने तो यह तक कहा कि संविधान पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है, अतः इसे ऐसे संविधान द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए जो पवित्र भारतीय ग्रंथों पर आधारित हो। सन् 2024 में लगाए गए 400 पार के नारे का एक उद्देश्य लोकसभा में संविधान बदलने के लिए जरूरी संख्या हासिल करना भी था।
भागवत द्वारा अपने संगठन को संविधान के ऊपर मानने का कारण यह तथ्य भी हो सकता है कि हालांकि उनके पास भारत सरकार का कोई आधिकारिक पद नहीं है, फिर भी उन्हें प्रधानमंत्री के स्तर की सुरक्षा हासिल है। प्रियंक खड़गे द्वारा कही गई बातों की प्रतिक्रिया में भागवत ने कहा ‘‘हम गोपनीयता नहीं बरतते। हमारा कामकाज खुले मैदानों में चलता है। हम लोगों को आमंत्रित कर उन्हें अपने बारे में बता रहे हैं। ये सारे आक्षेप सिर्फ सियासती हैं और तरह-तरह के हथकंडे आजमाए जा रहे हैं... हिन्दू धर्म पंजीकृत नहीं है, और बहुत सी अन्य संस्थाएं भी पंजीकृत नहीं हैं‘‘। सवाल यह है कि क्या इन लोगों ने बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की योजना पर सार्वजनिक रूप से चर्चा की थी?
यहां यह स्मरणीय है कि अमेरिका के कमीशन ओन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने हाल में यह अनुशंसा की थी कि अमरीकी सरकार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लक्षित प्रतिबंध लगाने चाहिए। प्रस्तावित कदमों में संगठन की संपत्तियों को फ्रीज करना और उसके सदस्यों को वीजा न देना शामिल हैं।
भागवत द्वारा संघ का पंजीयन न कराने के पक्ष में एक तर्क यह दिया कि हिन्दू धर्म भी तो पंजीकृत नहीं है! हिन्दू धर्म और आरएसएस को बराबरी का दर्जा देने वाला यह वक्तव्य एक तरह से हिन्दू धर्म का अपमान है। हिन्दू धर्म के कई सम्प्रदाय हैं जैसे नाथ, तंत्र, शैव, सिद्धांत और भक्ति। आरएसएस जिस हिन्दुत्व का प्रचार करता है वह ब्राम्हणवाद है जो जातिगत और लैंगिक ऊंच-नीच पर आधारित है। कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि यह तर्क किसी भी तरह से कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
यह आश्चर्यजनक नहीं है कि आरएसएस के पंजीयन की मांग उठाई जा रही है। आश्चर्य इस बात का है कि यह मांग पहले क्यों नहीं उठी। आरएसएस के विचारों के प्रति सहानुभूति रखने वाले कई सरकारी अधिकारी उसके हितों की रक्षा करने में जुटे हुए हैं। दान और खर्चों से संबंधित नियम ही पंजीयन की अनिवार्यता की सबसे बड़ी वजह होने चाहिए। इसी तरह सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करते हुए आरएसएस द्वारा राजनैतिक गतिविधियां करने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
साथ ही प्रतिबंध हटाने का अनुरोध करते समय किए गए वायदों पर अमल न किए जाने के मसले को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। वक्त आ गया है कि भारतीय संविधान और भारतीय राष्ट्रवाद को महत्व दिया जाए और न सिर्फ आरएसएस वरना ऐसे सभी अन्य ऐसे संगठनों से पंजीयन करवाने को कहा जाए, जिनके लिए ऐसा करना अपेक्षित हो।
(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)
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