मुस्लिम नाटो में अगर ईरान अब शामिल होता है तो वह उसके लिए कितना फायदेमंद होगा। यह दुनिया की नजरों में कुछ भी हो मगर ईरान का रुख इस पर बिल्कुल अलग है। ईरान में सुप्रीम लीडर के वरिष्ठ सलाहकार ने अब इस पर खुलकर अपनी राय रखी है। सवाल यह है क्या मुस्लिम नाटो अमेरिका के खिलाफ या इसराइल के खिलाफ बना है? अमेरिका के नजरिए से देखें तो इसमें शामिल सदस्य सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान सभी उसके बेहद करीबी मित्र मुल्क हैं। व इसराइल के नजरिए से पाकिस्तान को छोड़कर यह पर्दे के पीछे के बेहद करीबी देश हैं। फिर यह समझौता किसके खिलाफ हुआ? यही वजह है कि तेहरान इसे बहुत बारीकी से समझ रहा है और उसने इस गठजोड़ को लेकर अपनी शर्तें साफ कर दी हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह मुस्तफा खामनेई के वरिष्ठ सलाहकार और शीर्ष सुरक्षा रणनीतिज्ञ मोहसिन रिजाई ने हाल ही में ईरान के सरकारी मीडिया को दिए इंटरव्यू में तेहरान की कूटनीतिक चालों का खुलासा कर दिया।
रिजाई ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान मक्का समझौते का हिस्सा केवल एक सामान्य सदस्य के रूप में कभी नहीं बनेगा। ईरान इसमें तभी शामिल होगा जब उसे इस पूरे सुरक्षा ढांचे का कोफाउंडर माना जाए और इसके बुनियादी दस्तावेजों या फिर पॉलिसी ड्राफ्ट को तैयार करने में उसकी सोच शामिल की जाए। रिजाई ने कहा कि ईरान और मिस्र जैसे महाद्वीपीय देशों को ऐसे क्षेत्रीय सुरक्षा समझौतों से बाहर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान जैसे मित्र देशों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह बिल्कुल नामंजूर है कि वे पहले आपस में कोई ड्राफ्ट बना लें और बाद में ईरान के पास उनका समर्थन मांगने आए। ईरान इस पूरे गठजोड़ को अमेरिका की घटती सैन्य ताकत और पश्चिम एशिया में बनते पावर वैक्यूम के रूप में देख रहा है। मोसिन देसाई के मुताबिक अमेरिका ने एक क्षेत्रीय सुरक्षा का जिम्मा उठाने से हाथ खींच लिए हैं और अपने साथी देशों से कह दिया अलविदा हम जा रहे हैं।
वाशिंगटन के पीछे हटने से जो खालीपन आया है उसी की वजह से रियाद, अंकारा और इस्लामाबाद को अपनी सुरक्षा के लिए नया मोर्चा तैयार करना पड़ा है। हालांकि ईरानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला है। लेकिन सुरक्षा मसलों पर इन पड़ोसी देशों से बातचीत के रास्ते खुले रखे गए हैं। ईरान के सख्त रूप से एक बात शीशे की तरह साफ है। तेहरान किसी भी ऐसे एक क्षेत्रीय संगठन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है जिसकी पटकथा उसकी मर्जी के बिना लिखी गई हो।