महामारी के दौर में बने श्रम कानूनों की मार

कोरोना के समय मोदी सरकार ने जिस तरह से लाॅकडाउन की घोषणा की, उससे देश की अर्थव्यवस्था मुंह के बल गिरी। उसी दौरान सरकार की ओर से ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ चलाया गया और ये तमाम कोड तैयार किए गए जिन्हें श्रम सुधार का नाम दिया गया।

PNSPNS
Nov 22, 2025 - 21:11
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महामारी के दौर में बने श्रम कानूनों की मार

जिन चार श्रम संहिताओं के लिए शुक्रवार को अधिसूचना जारी हुई उनकी पृष्ठभूमि पांच साल पुरानी है। इनमें से मजदूरी संहिता 2019 में संसद ने पास की थी। लेकिन बाद की तीनों संहिताएं सामाजिक सुरक्षा संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता और व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशाएं संहिता 2020 में संसद में पास की गईं। जब ये पास की गईं उस समय के संदर्भ को समझना जरूरी है।

उस साल देश में कोविड महामारी का जितना प्रकोप था उससे कहीं ज्यादा दहशत थी। रातोरात जिस तरह से लाॅकडाउन की घोषणा हुई और सरकार ने कर्फ्यू जैसी सख्ती बरतने की जो कोशिश की उससे देश की अर्थव्यवस्था मुंह के बल गिरी। जिस देश की गिनती कभी दुनिया की सबसे तेज तरक्की करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में होती थी उसकी ग्रोथ रेट सबसे तेजी से नीचे गिरी और निगेटिव में पहुंच गई।

बाकी दुनिया की तरह ही पूरे देश में उस समय उलझन और अनिश्चितता का माहौल था। कृषि के अलावा सभी तरह का उत्पादन थम गया था। यह भी साफ था कि नया निवेश अब नहीं आएगा। नरेंद्र मोदी सरकार ने इन हालात का इस्तेमाल दो तरह से किया। एक तो प्रधानमंत्री की छवि चमकाने के लिए बड़े स्तर पर जनसंपर्क अभियान चलाए गए और दूसरे महामारी का हवाला देते हुए कई कल्याण कार्यक्रमों को खत्म कर दिया गया। इसी दौरान ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ चलाया गया और ये तमाम कोड तैयार किए गए जिन्हें श्रम सुधार का नाम दिया गया।शनिवार के अखबारों में चार श्रम संहिताओं की अधिसूचना जारी होने के बाद जो विज्ञापन छपा है उसका स्लोगन अभी भी वही पुराना है- ‘आत्मनिर्भर भारत के लिए लेबर रिफाॅर्म्स।’

तमाम श्रम संगठनों ने उस समय भी इसका विरोध किया था। हड़ताल और बंद का भी आयोजन किया। लेकिन कोविड के उस दौर में उनका असर ज्यादा नहीं दिखाई दिया। कुछ ट्रेड यूनियन ने इसे लेकर अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन में अपील भी की थी। बहुत सारे विशेषज्ञों ने भी माना था कि ये कानून मजदूर विरोधी हैं।

दिल्ली के श्री अरबिंदों काॅलेज से एसोशिएट प्रोफेसर डाॅ. सुशांत कुमार बग ने इस पर एक शोधपत्र भी लिखा था- ‘कोविड-19 एंड लेबर रिफाॅर्म्स इन इंडिया‘। उसमें वे इसी नतीजे पर पहुंचे कि इन बदलावों की फितरत तानाशाही वाली है। उन्होंने अपने अध्ययन में यह भी नोट किया कि इसके बाद बहुत से राज्यों ने भी अपने श्रम कानूनों में बड़े बदलाव किए। इनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें श्रमिक विरोधी कहा जा सकता है। 

संसद में पास हो जाने के बाद नोटीफिकेशन नहीं जारी हुआ तो पिछले पांच साल में इन पर चर्चा भी बंद हो गई। राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों और बहुत सारे संगठनों ने मान लिया कि इन्हें कोल्ड स्टोरेज में भेजा जा चुका है। लेकिन शुक्रवार को जब अचानक ही इन्हें लागू करने की घोषणा हुई तो बहुत से लोगों की नींद खुली। जिस जिन्न को सोया हुआ मान लिया गया था अब वह बोतल से बाहर आ चुका है।

श्रमिक संगठनों का शुरू से ही यह कहना रहा है कि इन कोड में ज्यादातर चीजें मजदूर विरोधी और उद्योगों की हिमायत करने वाली हैं। लेकिन अगर इसे लेकर जारी केंद्र सरकार के विज्ञापन को देखें तो इसमें उन कुछ गिनी-चुनी बातों का ही जिक्र है जिन्हें श्रमिकों के लिए अच्छा कहा जा सकता है। यह कानून श्रमिकों के संगठित होने, विरोध करने और हड़ताल करने के अधिकार में जिस तरह कटौती करता है उनका जिक्र तो इस कानून में होना भी नहीं था। साथ ही इस विज्ञापन में ईज ऑफ डूईंग बिजनेस जैसे वे नारे भी हटा दिए गए हैं, जिसके नाम पर यह पूरा खेल किया गया है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे बताते हैं, ‘जब इन संहिताओं को संसद में पेश किया गया तो हम सबने इसका विरोध किया और बाद में सदन का बहिष्कार किया। ये ऐसा फैसला था जिसमें विपक्ष की न तो बात ही सुनी गई और न ही उसकी कोई भूमिका ही रही’। इंटक के अध्यक्ष जी. संजीवा रेड्डी का कहना है कि मजदूर अपना जीवन स्तर सुधारने के लिए अधिक वेतन की जो मांग करता है, उसके लिए बातचीत करता है, आंदोलन करता है उसके ये सारे अधिकार इन कोड में खत्म कर दिए गए हैं।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश की इस पर की गई टिप्पणी भी ध्यान देने लायक है। वे कहते हैं, ‘मौजूदा 29 श्रम कानूनों की चार कोड में रीपैकेजिंग कर दी गई है। इसे क्रांतिकारी सुधार के रूप में पेश किया जा रहा है जबकि इसके नियम अभी तक नोटीफाई नहीं हुए हैं।’

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन का बयान इसके एक दूसरे पक्ष को सामने रखता है। पार्टी की सेंट्रल कमेटी की प्रेस रिलीज़ कहती है, ‘हालांकि इन्हें श्रम सुधार के नाम पर पेश किया गया है लेकिन वास्तव में ये आधुनिक गुलामी के औजार हैं, और ये बड़े उद्योगों के मुनाफे के लिए हैं, ये सारा काम किया जा रहा है ईज ऑफ डूईंग बिजनेस के नाम पर।‘

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