बांग्लादेश: रोज़मर्रा के वजूद की जंग लड़तीं, सुनामगंज की महिलाएँ
बांग्लादेश के पूर्वोत्तर इलाक़े - हाओर (haor) जलक्षेत्रों में जब बाढ़ का पानी धीरे-धीरे चढ़ता है, तो उससे केवल दिनचर्या में बाधा ही नहीं पड़ती - बल्कि वह जीवन की परिभाषा ही बदल देता है. यहाँ की महिलाओं के लिए सहनसक्षमता कोई नारा या आदर्श नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अस्तित्व की ज़रूरत बन चुकी है. दो बच्चों की माँ 24 वर्षीय शकीला अख़्तर, इसी जिजीविषा की एक जीवन्त मिसाल हैं, जिनके लिए यह संघर्ष अब जीने का एकमात्र रास्ता बन गया है.
बांग्लादेश के पूर्वोत्तर इलाक़े - हाओर (haor) जलक्षेत्रों में जब बाढ़ का पानी धीरे-धीरे चढ़ता है, तो उससे केवल दिनचर्या में बाधा ही नहीं पड़ती - बल्कि वह जीवन की परिभाषा ही बदल देता है. यहाँ की महिलाओं के लिए सहनसक्षमता कोई नारा या आदर्श नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अस्तित्व की ज़रूरत बन चुकी है. दो बच्चों की माँ 24 वर्षीय शकीला अख़्तर, इसी जिजीविषा की एक जीवन्त मिसाल हैं, जिनके लिए यह संघर्ष अब जीने का एकमात्र रास्ता बन गया है.