Supreme Court ने बिहार में मतदाता सूची के SIR के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा
उच्चतम न्यायालय ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से दायर याचिका भी शामिल है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल, अभिषेक सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायण सहित कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पूरी की। इस मामले में निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह उपस्थित हुए। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाली दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में अंतिम बहस शुरू की थी, जिसमें उसने कहा था कि मतदाता सूची में नामों को शामिल करना या हटाना भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। निर्वाचन आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि आधार और मतदाता पहचान पत्रों को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता है।
उच्चतम न्यायालय ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से दायर याचिका भी शामिल है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल, अभिषेक सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायण सहित कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पूरी की।
इस मामले में निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह उपस्थित हुए। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाली दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
अदालत ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में अंतिम बहस शुरू की थी, जिसमें उसने कहा था कि मतदाता सूची में नामों को शामिल करना या हटाना भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
निर्वाचन आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि आधार और मतदाता पहचान पत्रों को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता है।
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