Shehar Me Shor Hai। EVM और Ballot Papers के बीच क्या है अंतर? जानें इसके नफा-नुकसान

संसद में चुनाव सुधार को लेकर चर्चा हो रही है। चुनाव सुधार की चर्चा की मांग निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू की गई एसआईआर के बाद तेज हो गई थी। इसके बाद सरकार ने भी इसको लेकर अपनी रणनीति में बदलाव किया और विपक्ष की मांग के मुताबिक चुनाव सुधार पर संसद में चर्चा हुई। दरअसल, बिहार चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियां के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू की थी। बिहार चुनाव संपन्न हो गया। लेकिन विपक्ष के विरोध के बाद भी इसे अब 12 राज्यों में किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को जारी रखने की इजाजत दे दी। वहीं, चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए विपक्ष कई बार वोट चोरी और मतपत्र से फिर से चुनाव कराने की मांग कर चुका है। इतना ही नहीं, वह ईवीएम को लेकर भी कई बार हैक करने का आरोप लगा चुका है। राहुल गांधी भी हाल फिलहाल में कई बड़े आरोप लगा चुके हैं।  इसे भी पढ़ें: SIR को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का बड़ा दावा, दलितों और मुसलमानों के वोटों में हो रही कटौतीवोट देने का अधिकारमतदान किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आधारशिला है, और वर्षों से मतदान के तरीकों में काफी विकास हुआ है। परंपरागत रूप से, चुनावों में मतपत्र ही वोट दर्ज करने का मुख्य साधन रहे हैं। हालांकि, प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ, कई देशों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) एक वैकल्पिक विधि के रूप में उभरी हैं। दोनों विधियों के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं, और लोकतांत्रिक चुनावों के लिए उनकी उपयुक्तता का मूल्यांकन करने के लिए उनके बीच के अंतर को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।मतपत्र: पारंपरिक विधिमतपत्रों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है और ये दुनिया भर के मतदान केंद्रों में एक आम दृश्य हैं। जब मतदाता मतदान केंद्र पर पहुंचते हैं, तो उन्हें एक मतपत्र दिया जाता है जिसमें चुनाव के लिए उम्मीदवारों या विकल्पों की सूची होती है। फिर वे अपने पसंदीदा उम्मीदवार या विकल्प के आगे क्रॉस या टिक लगाकर अपनी पसंद का निशान लगाते हैं। निशान लगाने के बाद, मतपत्र को मोड़कर एक सुरक्षित मतपेटी में डाल दिया जाता है। मतपत्रों के लाभ:- भौतिक मतपत्रों के उपयोग से मतदाता अपने चुने हुए मतों को सीधे देख और सत्यापित कर सकते हैं। वे मतदान करने से पहले यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनका वोट सही ढंग से दर्ज किया गया है।- मतपत्र सरल होते हैं और सभी उम्र और पृष्ठभूमि के मतदाताओं के लिए परिचित हैं। इन्हें उपयोग करने के लिए किसी विशेष ज्ञान या तकनीक की आवश्यकता नहीं होती है।- मतपत्र डाले गए वोटों का भौतिक रिकॉर्ड प्रदान करते हैं, जिसकी गिनती विवाद या पुनर्गणना की स्थिति में की जा सकती है।- कागजी मतपत्र की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे हैक नहीं किया जा सकता और ना इस तरह के आरोप लग सकते हैं।मतपत्रों के नुकसान:- कागज़ी मतपत्रों की गिनती एक समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसमें अक्सर बड़ी संख्या में कर्मचारियों और संसाधनों की आवश्यकता होती है। इससे चुनाव परिणामों की घोषणा में देरी हो सकती है।- मैन्युअल प्रक्रिया में वोटों की गिनती और रिकॉर्डिंग में मानवीय त्रुटि अंतर्निहित होती है, जिससे अशुद्धियाँ और विवाद उत्पन्न होते हैं।- लाखों कागज़ी मतपत्रों की छपाई, वितरण और संग्रह करना रसद की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण और महंगा हो सकता है।- बूथ कैप्चरिंग और मतपत्रों में वोट के हेरफेर की गुंजाइस हमेशा बना रहता है। ईवीएमकेरल के एक विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव के लिए पहली बार 1982 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का प्रयोग शुरू किया गया था, लेकिन सीमित मतदान केंद्रों पर ही इनका उपयोग हुआ। 1989 में, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके इलेक्ट्रॉनिक मतदान की अनुमति दी गई। 1998 में, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के विधानसभा चुनावों के दौरान 25 राज्य विधानसभा क्षेत्रों में प्रायोगिक तौर पर ईवीएम का उपयोग किया गया था। मई 2001 में, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल के राज्य विधानसभा चुनावों के लिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम का उपयोग किया गया। 2004 में, आम चुनाव में, पहली बार सभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम का उपयोग किया गया। तब से, सभी राज्य विधानसभा और संसदीय चुनाव ईवीएम के माध्यम से ही आयोजित किए जाते हैं।ईवीएम के लाभ:- ईवीएम मतदान और मतगणना में लगने वाले समय को काफी हद तक कम करती है। वोटों की गिनती इलेक्ट्रॉनिक रूप से की जा सकती है, जिससे परिणाम तेजी से मिलते हैं।- ईवीएम मतगणना और मतगणना में मानवीय त्रुटियों की संभावना को कम करती हैं। ये मतदाताओं को तत्काल प्रतिक्रिया प्रदान करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि उनके विकल्प सटीक रूप से दर्ज किए गए हैं।- हालांकि ईवीएम में प्रारंभिक निवेश अधिक हो सकता है, लेकिन मुद्रित सामग्री और श्रम की आवश्यकता को कम करके यह दीर्घकालिक रूप से लागत बचत का कारण बन सकती है।- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें बैटरी या पावर पैक से चलती हैं और इन्हें किसी बाहरी आपूर्ति की आवश्यकता नहीं होती है।- कागज़ के मतपत्रों वाली प्रणाली के विपरीत, इसमें वोट केवल एक बटन दबाकर डाला जाता है, जिससे अमान्य वोट की संभावना समाप्त हो जाती है।- ईवीएम एक मिनट में चार से अधिक वोट डालने की अनुमति नहीं देती है। इससे बूथ कैप्चरिंग की संभावना समाप्त हो जाती है।- एक बार नियंत्रण इकाई पर "बंद करें" बटन दबाने के बाद, दोबारा वोट डालने की कोई संभावना नहीं रहती है।- मतदाता बीप की आवाज़ से अपने वोट की रिकॉर्डिंग की पुष्टि कर सकते हैं। मतदाता अपने वोट के सात सेकंड के डिस्प्ले में डाले गए वोट की पुष्टि कर सकते हैं।वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से ईवीएम में वीवीपीएटी (VVPAT) प्रणाली शुरू की गई थी। यह मूल रूप से मतदाता द्वारा डाले गए वोट का प्रिंटआउट होता है। इस प्रणाली को यह सुनिश्चित करने के लिए विकसित किया गया था कि मतदाता इस बात से संतुष्ट ह

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Dec 11, 2025 - 09:42
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Shehar Me Shor Hai। EVM और Ballot Papers के बीच क्या है अंतर? जानें इसके नफा-नुकसान
संसद में चुनाव सुधार को लेकर चर्चा हो रही है। चुनाव सुधार की चर्चा की मांग निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू की गई एसआईआर के बाद तेज हो गई थी। इसके बाद सरकार ने भी इसको लेकर अपनी रणनीति में बदलाव किया और विपक्ष की मांग के मुताबिक चुनाव सुधार पर संसद में चर्चा हुई। दरअसल, बिहार चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियां के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू की थी। बिहार चुनाव संपन्न हो गया। लेकिन विपक्ष के विरोध के बाद भी इसे अब 12 राज्यों में किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को जारी रखने की इजाजत दे दी। वहीं, चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए विपक्ष कई बार वोट चोरी और मतपत्र से फिर से चुनाव कराने की मांग कर चुका है। इतना ही नहीं, वह ईवीएम को लेकर भी कई बार हैक करने का आरोप लगा चुका है। राहुल गांधी भी हाल फिलहाल में कई बड़े आरोप लगा चुके हैं। 
 

इसे भी पढ़ें: SIR को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का बड़ा दावा, दलितों और मुसलमानों के वोटों में हो रही कटौती


वोट देने का अधिकार

मतदान किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आधारशिला है, और वर्षों से मतदान के तरीकों में काफी विकास हुआ है। परंपरागत रूप से, चुनावों में मतपत्र ही वोट दर्ज करने का मुख्य साधन रहे हैं। हालांकि, प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ, कई देशों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) एक वैकल्पिक विधि के रूप में उभरी हैं। दोनों विधियों के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं, और लोकतांत्रिक चुनावों के लिए उनकी उपयुक्तता का मूल्यांकन करने के लिए उनके बीच के अंतर को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मतपत्र: पारंपरिक विधि

मतपत्रों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है और ये दुनिया भर के मतदान केंद्रों में एक आम दृश्य हैं। जब मतदाता मतदान केंद्र पर पहुंचते हैं, तो उन्हें एक मतपत्र दिया जाता है जिसमें चुनाव के लिए उम्मीदवारों या विकल्पों की सूची होती है। फिर वे अपने पसंदीदा उम्मीदवार या विकल्प के आगे क्रॉस या टिक लगाकर अपनी पसंद का निशान लगाते हैं। निशान लगाने के बाद, मतपत्र को मोड़कर एक सुरक्षित मतपेटी में डाल दिया जाता है। 

मतपत्रों के लाभ:

- भौतिक मतपत्रों के उपयोग से मतदाता अपने चुने हुए मतों को सीधे देख और सत्यापित कर सकते हैं। वे मतदान करने से पहले यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनका वोट सही ढंग से दर्ज किया गया है।
- मतपत्र सरल होते हैं और सभी उम्र और पृष्ठभूमि के मतदाताओं के लिए परिचित हैं। इन्हें उपयोग करने के लिए किसी विशेष ज्ञान या तकनीक की आवश्यकता नहीं होती है।
- मतपत्र डाले गए वोटों का भौतिक रिकॉर्ड प्रदान करते हैं, जिसकी गिनती विवाद या पुनर्गणना की स्थिति में की जा सकती है।
- कागजी मतपत्र की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे हैक नहीं किया जा सकता और ना इस तरह के आरोप लग सकते हैं।

मतपत्रों के नुकसान:

- कागज़ी मतपत्रों की गिनती एक समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसमें अक्सर बड़ी संख्या में कर्मचारियों और संसाधनों की आवश्यकता होती है। इससे चुनाव परिणामों की घोषणा में देरी हो सकती है।
- मैन्युअल प्रक्रिया में वोटों की गिनती और रिकॉर्डिंग में मानवीय त्रुटि अंतर्निहित होती है, जिससे अशुद्धियाँ और विवाद उत्पन्न होते हैं।
- लाखों कागज़ी मतपत्रों की छपाई, वितरण और संग्रह करना रसद की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण और महंगा हो सकता है।
- बूथ कैप्चरिंग और मतपत्रों में वोट के हेरफेर की गुंजाइस हमेशा बना रहता है। 

ईवीएम

केरल के एक विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव के लिए पहली बार 1982 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का प्रयोग शुरू किया गया था, लेकिन सीमित मतदान केंद्रों पर ही इनका उपयोग हुआ। 1989 में, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके इलेक्ट्रॉनिक मतदान की अनुमति दी गई। 1998 में, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के विधानसभा चुनावों के दौरान 25 राज्य विधानसभा क्षेत्रों में प्रायोगिक तौर पर ईवीएम का उपयोग किया गया था। मई 2001 में, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल के राज्य विधानसभा चुनावों के लिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम का उपयोग किया गया। 2004 में, आम चुनाव में, पहली बार सभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम का उपयोग किया गया। तब से, सभी राज्य विधानसभा और संसदीय चुनाव ईवीएम के माध्यम से ही आयोजित किए जाते हैं।

ईवीएम के लाभ:

- ईवीएम मतदान और मतगणना में लगने वाले समय को काफी हद तक कम करती है। वोटों की गिनती इलेक्ट्रॉनिक रूप से की जा सकती है, जिससे परिणाम तेजी से मिलते हैं।
- ईवीएम मतगणना और मतगणना में मानवीय त्रुटियों की संभावना को कम करती हैं। ये मतदाताओं को तत्काल प्रतिक्रिया प्रदान करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि उनके विकल्प सटीक रूप से दर्ज किए गए हैं।
- हालांकि ईवीएम में प्रारंभिक निवेश अधिक हो सकता है, लेकिन मुद्रित सामग्री और श्रम की आवश्यकता को कम करके यह दीर्घकालिक रूप से लागत बचत का कारण बन सकती है।
- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें बैटरी या पावर पैक से चलती हैं और इन्हें किसी बाहरी आपूर्ति की आवश्यकता नहीं होती है।
- कागज़ के मतपत्रों वाली प्रणाली के विपरीत, इसमें वोट केवल एक बटन दबाकर डाला जाता है, जिससे अमान्य वोट की संभावना समाप्त हो जाती है।
- ईवीएम एक मिनट में चार से अधिक वोट डालने की अनुमति नहीं देती है। इससे बूथ कैप्चरिंग की संभावना समाप्त हो जाती है।
- एक बार नियंत्रण इकाई पर "बंद करें" बटन दबाने के बाद, दोबारा वोट डालने की कोई संभावना नहीं रहती है।
- मतदाता बीप की आवाज़ से अपने वोट की रिकॉर्डिंग की पुष्टि कर सकते हैं। मतदाता अपने वोट के सात सेकंड के डिस्प्ले में डाले गए वोट की पुष्टि कर सकते हैं।

वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से ईवीएम में वीवीपीएटी (VVPAT) प्रणाली शुरू की गई थी। यह मूल रूप से मतदाता द्वारा डाले गए वोट का प्रिंटआउट होता है। इस प्रणाली को यह सुनिश्चित करने के लिए विकसित किया गया था कि मतदाता इस बात से संतुष्ट हों कि उनका वोट उनके द्वारा चुने गए उम्मीदवारों को ही दिया जा रहा है, न कि किसी अन्य पार्टी या उम्मीदवार को। वीवीपीएटी मुख्य ईवीएम इकाई से जुड़ा एक अलग उपकरण है जो मतदाता द्वारा डाले गए वोट का प्रिंटआउट प्रदान करता है।
 

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क्यों उठते है EVM पर सवाल

हैकिंग एक चुनौती
- चुनाव आयोग EVM को लेकर किसी भी प्रकार के हैकिंग से इनकार करता है। जून 2017 में चुनाव आयोग ने ईवीएम में छेड़छाड़ का दावा करने वालों के लिए खुली हैकिंग चुनौती जारी की थी। यह चुनौती साइबर विशेषज्ञों के उन दावों के बीच आई थी कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है और पहले से प्रोग्राम किया जा सकता है। सबसे प्रमुख मामलों में से एक साइबर विशेषज्ञ ने दावा किया था कि वे मशीन के डेवलपर्स में से एक थे और ईवीएम को हैक कर सकते हैं। हालांकि, मशीन को हैक न कर पाने के कारण उनका दावा गलत साबित हुआ। लेकिन आज भी इसको लेकर विपक्ष सवाल खड़े करता है। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में ईवीएम को हैक किया जा सकता है? भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेट यूनिट और एक वीवीपीएटी होता है। प्रत्येक ईवीएम यूनिट अलग होती है और किसी अन्य उपकरण से जुड़ी नहीं होती। इसलिए, अगर छेड़छाड़ संभव भी हो, तो प्रत्येक ईवीएम के साथ अलग-अलग छेड़छाड़ करनी होगी, जिसके लिए हैकर को व्यापक तैयारी और साइबर विशेषज्ञों के पूरे नेटवर्क के साथ-साथ चुनाव आयोग की मदद की भी आवश्यकता होगी। यह एक बहुत ही दूर की कौड़ी वाली थ्योरी है।

वहीं, ईवीएम में छेड़छाड़ जानबूझकर की जाती है और अभी तक इसके संभव होने का कोई सबूत नहीं मिला है। छेड़छाड़ तब होती है जब कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह मशीन को हैक करके उस विशेष ईवीएम पर सभी वोटों को किसी पसंदीदा पार्टी के नाम दर्ज करा देता है। हालांकि, अब तक ऐसा मामला सामने नहीं आया है। विपक्ष आरोप तो लगाता है पर सबूत पेश नहीं कर पाता। 

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