आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) और डेनमार्क के नेशनल म्यूज़ियम ने ऐतिहासिक डेनिश जहाज़ 'ओरेसंड' की संयुक्त रूप से पानी के नीचे पुरातात्विक जांच करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह जहाज़ 1619 में आज के पुडुचेरी में कराइकल के पास समुद्र तट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह समझौता सोमवार को किया गया। यह पानी के नीचे सांस्कृतिक विरासत पर रिसर्च को आगे बढ़ाने और भारत-डेनमार्क के बीच एकेडमिक सहयोग को मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम है। इसका मकसद वैज्ञानिक और बिना नुकसान पहुँचाने वाले (non-invasive) पानी के नीचे पुरातात्विक सर्वे के ज़रिए जहाज़ के अवशेषों का पता लगाना, उनका दस्तावेज़ीकरण करना और उनका अध्ययन करना है। यह प्रोजेक्ट ASI की अंडरवाटर आर्कियोलॉजी विंग और डेनमार्क के नेशनल म्यूज़ियम के 'न्योर्ड – सेंटर फॉर मैरीटाइम एंड अंडरवाटर कल्चरल हेरिटेज' के समुद्री विरासत विशेषज्ञों द्वारा मिलकर चलाया जाएगा।
इंडो-डैनिश विरासत वाला ऐतिहासिक डूबा हुआ जहाज़
समुद्री इतिहास में 'ओरेसंड' (Oresund) जहाज़ का एक खास स्थान है, क्योंकि यह भारत पहुँचने वाला पहला डैनिश जहाज़ माना जाता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि भारतीय जलक्षेत्र में पहुँचने के कुछ ही समय बाद, यह जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कोरोमंडल तट पर कराइकल के पास डूब गया। पुरातत्वविद् और इतिहासकार इस डूबे हुए जहाज़ को एक बहुमूल्य सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं। इससे सत्रहवीं सदी की शुरुआत के समुद्री व्यापार, नौवहन, जहाज़ बनाने के तरीकों और डेनमार्क व भारत के बीच पहले सीधे समुद्री संपर्कों के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जाँच से उन व्यापक व्यापारिक नेटवर्कों के बारे में पता चल सकता है जिन्होंने यूरोप को हिंद महासागर क्षेत्र से जोड़ा था। यह वह दौर था जब वैश्विक व्यापार का विस्तार हो रहा था और औपनिवेशिक समुद्री अभियान चलाए जा रहे थे।
MoU की शर्तों के तहत, यह प्रोजेक्ट एडवांस्ड साइंटिफिक तरीकों और रिमोट-सेंसिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके एक व्यापक नॉन-इनवेसिव (बिना खुदाई वाला) आर्कियोलॉजिकल सर्वे करने पर फोकस करेगा। संस्कृति मंत्रालय ने कहा कि रिसर्चर समुद्र के तल और उससे जुड़ी सांस्कृतिक चीज़ों को कम से कम नुकसान पहुँचाते हुए, डूबे हुए जहाज़ के संभावित अवशेषों की पहचान करने के लिए अत्याधुनिक अंडरवाटर सर्वे तकनीकों का इस्तेमाल करेंगे।
ASI की अंडरवाटर विंग के लिए पहला ग्लोबल सहयोग
यह प्रोजेक्ट ASI की अंडरवाटर आर्कियोलॉजी विंग के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि यह किसी अंतरराष्ट्रीय संस्थान के साथ उसका पहला सहयोगी आर्कियोलॉजिकल प्रोजेक्ट है। अधिकारियों ने कहा कि इस पार्टनरशिप से समुद्री पुरातत्व के क्षेत्र में रिसर्च की क्षमताएँ बढ़ने, ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलने और संस्थागत सहयोग मजबूत होने की उम्मीद है। इस मौके पर बोलते हुए, ASI के डायरेक्टर जनरल श्री यदुबीर सिंह रावत ने इस समझौते को भारत और डेनमार्क के बीच एकेडमिक और संस्थागत संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।