कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चव्हाण ने एक बार फिर विवादित बयान देकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। वेनेजुएला के घटनाक्रम को लेकर उन्होंने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला और आरोप लगाया कि भारत सरकार अमेरिका के दबाव और डर के कारण स्पष्ट रुख अपनाने से बच रही है। चव्हाण ने कहा कि जिस तरह से अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति और वहां की सत्ता व्यवस्था के खिलाफ कदम उठाए हैं, वह अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता का उल्लंघन है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि भारत सरकार इसी तरह कमजोर और डरपोक रवैया अपनाती रही तो भविष्य में भारत के साथ भी ऐसी ही स्थिति पैदा हो सकती है। चव्हाण के अनुसार भारत को खुलकर इस मुद्दे पर बोलना चाहिए था, लेकिन सरकार चुप है क्योंकि वह अमेरिका से टकराव नहीं चाहती। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। सत्तापक्ष ने इसे गैर जिम्मेदाराना और देश की विदेश नीति को कमजोर करने वाला बताया है, जबकि कांग्रेस समर्थकों ने इसे साहसिक बयान करार दिया है।
हम आपको बता दें कि यह पहला मौका नहीं है जब पृथ्वी राज चव्हाण ने अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील विषयों पर इस तरह की तीखी और विवादित टिप्पणियां की हों। उनका यह बयान भी उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वह अक्सर तथ्यों से अधिक आशंकाओं और अतिशयोक्ति पर आधारित निष्कर्ष पेश करते नजर आते हैं।
देखा जाये तो पृथ्वी राज चव्हाण का यह कहना कि भारत में वेनेजुएला जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, न केवल अतिशयोक्तिपूर्ण है बल्कि यह भारत की राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत मजबूती का खुला अपमान भी है। यह बयान एक अनुभवी नेता की परिपक्वता से अधिक राजनीतिक हताशा को दर्शाता है। किसी भी जिम्मेदार राजनेता से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह देश की संप्रभुता और स्थिरता को लेकर इस तरह का भय पैदा करे।
भारत और वेनेजुएला की तुलना अपने आप में ही गलत और भ्रामक है। वेनेजुएला वर्षों से आर्थिक कुप्रबंधन, राजनीतिक अस्थिरता, संस्थागत पतन और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से जूझता रहा है। वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है, लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो चुकी हैं और सत्ता संघर्ष ने देश को अंदर से खोखला कर दिया है। इसके उलट भारत एक मजबूत लोकतंत्र है, जहां सत्ता परिवर्तन संविधान के दायरे में होता है, न्यायपालिका स्वतंत्र है, मीडिया सक्रिय है और सेना पूरी तरह पेशेवर तथा संवैधानिक नियंत्रण में है।
पृथ्वी राज चव्हाण की सबसे बड़ी समस्या उनकी सोच का वह ढांचा है जिसमें हर अंतरराष्ट्रीय संकट को भारत के लिए संभावित खतरे के रूप में पेश किया जाता है। यह डर की राजनीति है, तर्क की राजनीति नहीं। इस तरह के बयान आम जनता में भ्रम और असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कोसों दूर है। भारत न तो कूटनीतिक रूप से अलग थलग है और न ही उसकी विदेश नीति किसी एक देश के इशारों पर चलती है।
पृथ्वी राज चव्हाण यह भूल जाते हैं कि भारत की विदेश नीति बहु आयामी है। भारत अमेरिका से भी रिश्ते रखता है, रूस से भी, यूरोप से भी और एशिया व अफ्रीका से भी। किसी एक मुद्दे पर संतुलित और सोच समझकर प्रतिक्रिया देना कमजोरी नहीं बल्कि कूटनीतिक परिपक्वता का संकेत है। हर अंतरराष्ट्रीय विवाद में तुरंत बयानबाजी करना जरूरी नहीं होता। कई बार चुप्पी ही रणनीति होती है, न कि डर।
पृथ्वी राज चव्हाण का रिकॉर्ड यह भी दिखाता है कि वह अक्सर विवादित बयान देकर सुर्खियों में बने रहना पसंद करते हैं। चाहे सेना से जुड़े मुद्दे हों या विदेश नीति, उन्होंने कई बार ऐसे दावे किए हैं जिनका जमीनी हकीकत से कोई मेल नहीं बैठता। ऐसे बयान न तो देश की सुरक्षा को मजबूत करते हैं और न ही लोकतांत्रिक बहस को सार्थक बनाते हैं। उलटे ये बयान विपक्ष की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करते हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि भारत की तुलना किसी भी अस्थिर या विफल राष्ट्र से करना देश की छवि को नुकसान पहुंचाता है। भारत की आर्थिक क्षमता, जनतांत्रिक व्यवस्था, तकनीकी विकास और वैश्विक भूमिका उसे वेनेजुएला जैसे देशों से बिल्कुल अलग स्तर पर खड़ा करती है। यहां सत्ता किसी विदेशी ताकत के इशारे पर नहीं गिराई जा सकती और न ही भारत की संस्थाएं इतनी कमजोर हैं कि बाहरी दबाव में ढह जाएं।
बहरहाल, पृथ्वी राज चव्हाण जैसे नेताओं को यह समझना चाहिए कि आलोचना और गैर जिम्मेदार बयान में फर्क होता है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन देश को काल्पनिक खतरों से डराना और बेबुनियाद तुलना करना राजनीतिक अपरिपक्वता है। भारत में वेनेजुएला जैसी स्थिति नहीं हो सकती, क्योंकि भारत की जड़ें मजबूत हैं, उसकी संस्थाएं जीवित हैं और उसका लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति या विदेशी ताकत पर निर्भर नहीं है।