Param Sundari Movie Review: जब दिल ने कहा – कोई एल्गोरिद्म प्यार नहीं समझ सकता

आज की दुनिया में हर चीज़ टेक्नॉलजी पर निर्भर हो चुकी है फिर चाहे वह काम हो, दोस्ती हो या फिर प्यार। लेकिन परम् सुंदरी याद दिलाती है कि चाहे ऐप कितना भी एडवांस क्यों न हो, दिल की सच्ची धड़कनों को कोई एल्गोरिद्म नहीं समझ सकता। यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त है।कहानीदिल्ली का महत्वाकांक्षी परम् (सिद्धार्थ मल्होत्रा) नए-नए स्टार्टअप्स में निवेश करने का शौक़ रखता है। उसका नया प्रोजेक्ट है एक डेटिंग ऐप, जो दावा करता है कि सही सोलमेट सिर्फ़ प्रोफ़ाइल बिहेवियर से खोजा जा सकता है। पिता (संजय कपूर) शर्त रखते हैं कि पहले परम् खुद इसे आज़माए।ऐप उसे मिलाता है सुंदरी (जान्हवी कपूर) से केरल की एक सादगी से भरी लेकिन बेहद मज़बूत लड़की से। दोनों बिल्कुल अलग दुनियाओं से आते हैं, लेकिन जब परम् उसे सच में मिलने के लिए केरल पहुंचता है, तो कहानी टेक्नॉलजी की नहीं रहती, बल्कि दिलों की हो जाती है।निर्देशन और अभिनयतुषार जलोटा कहानी को इतनी सहजता से कहते हैं कि यह उपदेश नहीं, बल्कि एहसास लगती है। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने प्यार को डिजिटल “मैचिंग” से निकालकर इंसानी भावनाओं तक पहुंचाया। सिद्धार्थ मल्होत्रा परम् के रूप में मनमोहक हैं कभी जिज्ञासु, कभी भावुक। वहीं जान्हवी कपूर का किरदार फ़िल्म का दिल है। सुंदरी के रूप में वह बेहद स्वाभाविक और असरदार दिखती हैं। दोनों की केमिस्ट्री धीरे-धीरे परवान चढ़ती है और यही धीमी गहराई फ़िल्म को खूबसूरत बनाती है।सहायक कलाकारसंजय कपूर हल्के-फुल्के मज़ाक के बीच गंभीरता का रंग भी भरते हैं। मंजोत सिंह अपनी कॉमिक टाइमिंग से हंसी लाते हैं, और इनायत वर्मा मासूमियत से फ़िल्म में मिठास घोल देती हैं। सुंदरी का परिवार (रंजी पनिकर और सिद्धार्थ शंकर) कहानी को जड़ देता है, जिससे यह सिर्फ़ रोमांस न होकर रिश्तों की गहराई भी दिखती है।संगीत और लोकेशन्सदिल्ली की चमक और केरल की हरियाली का कॉन्ट्रास्ट देखने लायक है। हर लोकेशन अपने आप में एक किरदार बन जाती है।संगीत फ़िल्म की आत्मा है “चांद कागज़ का” आपको भीतर तक छू लेता है, “भीगी साड़ी” में जुनून है और “सुंदरी के प्यार में” दिलकश रोमांस का प्रतीक बन चुका है।निष्कर्षपरम् सुंदरी अंत में यही कहती है कि प्यार कोई डेटा एनालिसिस नहीं है।यह दिल की धड़कनों में छुपा एहसास है, जिसे न कोई ऐप माप सकता है और न कोई टेक्नॉलजी समझ सकती है।फ़िल्म एक फील-गुड रोमांस है जो आपको थियेटर से मुस्कुराते हुए, हल्के मन और गीली आंखों के साथ बाहर भेजेगी।कुल मिलाकर, परम् सुंदरी सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला खूबसूरत सफ़र है कि सच्चा प्यार हमेशा दिल से जन्म लेता है और दिल के कोड को कोई मशीन कभी डिकोड नहीं कर सकती।निर्देशक: तुषार जलोटाकलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा, जान्हवी कपूर, रंजी पनिकर, सिद्धार्थ शंकर, मंजोत सिंह, संजय कपूर, इनायत वर्माअवधि: 136 मिनटरेटिंग: (4/5)

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Aug 30, 2025 - 04:31
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Param Sundari Movie Review: जब दिल ने कहा – कोई एल्गोरिद्म प्यार नहीं समझ सकता
आज की दुनिया में हर चीज़ टेक्नॉलजी पर निर्भर हो चुकी है फिर चाहे वह काम हो, दोस्ती हो या फिर प्यार। लेकिन परम् सुंदरी याद दिलाती है कि चाहे ऐप कितना भी एडवांस क्यों न हो, दिल की सच्ची धड़कनों को कोई एल्गोरिद्म नहीं समझ सकता। यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त है।

कहानी
दिल्ली का महत्वाकांक्षी परम् (सिद्धार्थ मल्होत्रा) नए-नए स्टार्टअप्स में निवेश करने का शौक़ रखता है। उसका नया प्रोजेक्ट है एक डेटिंग ऐप, जो दावा करता है कि सही सोलमेट सिर्फ़ प्रोफ़ाइल बिहेवियर से खोजा जा सकता है। पिता (संजय कपूर) शर्त रखते हैं कि पहले परम् खुद इसे आज़माए।
ऐप उसे मिलाता है सुंदरी (जान्हवी कपूर) से केरल की एक सादगी से भरी लेकिन बेहद मज़बूत लड़की से। दोनों बिल्कुल अलग दुनियाओं से आते हैं, लेकिन जब परम् उसे सच में मिलने के लिए केरल पहुंचता है, तो कहानी टेक्नॉलजी की नहीं रहती, बल्कि दिलों की हो जाती है।

निर्देशन और अभिनय
तुषार जलोटा कहानी को इतनी सहजता से कहते हैं कि यह उपदेश नहीं, बल्कि एहसास लगती है। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने प्यार को डिजिटल “मैचिंग” से निकालकर इंसानी भावनाओं तक पहुंचाया। सिद्धार्थ मल्होत्रा परम् के रूप में मनमोहक हैं कभी जिज्ञासु, कभी भावुक। वहीं जान्हवी कपूर का किरदार फ़िल्म का दिल है। सुंदरी के रूप में वह बेहद स्वाभाविक और असरदार दिखती हैं। दोनों की केमिस्ट्री धीरे-धीरे परवान चढ़ती है और यही धीमी गहराई फ़िल्म को खूबसूरत बनाती है।

सहायक कलाकार
संजय कपूर हल्के-फुल्के मज़ाक के बीच गंभीरता का रंग भी भरते हैं। मंजोत सिंह अपनी कॉमिक टाइमिंग से हंसी लाते हैं, और इनायत वर्मा मासूमियत से फ़िल्म में मिठास घोल देती हैं। सुंदरी का परिवार (रंजी पनिकर और सिद्धार्थ शंकर) कहानी को जड़ देता है, जिससे यह सिर्फ़ रोमांस न होकर रिश्तों की गहराई भी दिखती है।

संगीत और लोकेशन्स
दिल्ली की चमक और केरल की हरियाली का कॉन्ट्रास्ट देखने लायक है। हर लोकेशन अपने आप में एक किरदार बन जाती है।
संगीत फ़िल्म की आत्मा है “चांद कागज़ का” आपको भीतर तक छू लेता है, “भीगी साड़ी” में जुनून है और “सुंदरी के प्यार में” दिलकश रोमांस का प्रतीक बन चुका है।

निष्कर्ष
परम् सुंदरी अंत में यही कहती है कि प्यार कोई डेटा एनालिसिस नहीं है।यह दिल की धड़कनों में छुपा एहसास है, जिसे न कोई ऐप माप सकता है और न कोई टेक्नॉलजी समझ सकती है।

फ़िल्म एक फील-गुड रोमांस है जो आपको थियेटर से मुस्कुराते हुए, हल्के मन और गीली आंखों के साथ बाहर भेजेगी।

कुल मिलाकर, परम् सुंदरी सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला खूबसूरत सफ़र है कि सच्चा प्यार हमेशा दिल से जन्म लेता है और दिल के कोड को कोई मशीन कभी डिकोड नहीं कर सकती।

निर्देशक: तुषार जलोटा
कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा, जान्हवी कपूर, रंजी पनिकर, सिद्धार्थ शंकर, मंजोत सिंह, संजय कपूर, इनायत वर्मा
अवधि: 136 मिनट
रेटिंग: (4/5)

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