Pakistan के शिया कर्मचारियों को धक्के मारकर देश से बाहर निकाल रहा है UAE, दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़े

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के रिश्तों में गहरी दरार दिखाई देने लगी है। हाल के दिनों में संयुक्त अरब अमीरात द्वारा हजारों पाकिस्तानी शिया कामगारों को बाहर निकाले जाने की खबरों ने इस तनाव को और गंभीर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों की रिपोर्टों के अनुसार, अमीरात सरकार ने अप्रैल के मध्य से पाकिस्तानी शिया समुदाय के लोगों पर कार्रवाई तेज कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम को पाकिस्तान की विदेश नीति, ईरान और सऊदी अरब के साथ उसके रिश्तों तथा खाड़ी क्षेत्र की बदलती राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।एक प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान से इस बात से नाराज है कि उसने ईरान के हमलों की खुलकर निंदा नहीं की। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दौरान ईरान ने अमीरात पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे। अमीरात चाहता था कि पाकिस्तान खुलकर उसका समर्थन करे, लेकिन इस्लामाबाद ने खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत कराने का प्रयास किया, जिसे अबू धाबी ने अपने हितों के खिलाफ माना।इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: हाँ Operation Sindoor के दौरान दी थी Pakistan को मदद, China ने पहली बार खुलकर स्वीकाराविशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यही संतुलनकारी नीति अब उसके लिए परेशानी बन गई है। पाकिस्तान एक ओर सऊदी अरब के साथ अपने पुराने और घनिष्ठ रिश्ते बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भी संबंध खराब नहीं करना चाहता। लेकिन अमीरात को लगने लगा है कि पाकिस्तान ईरान के प्रति नरम रुख अपना रहा है। इसी वजह से अबू धाबी और इस्लामाबाद के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है।रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमीरात में काम कर रहे कई पाकिस्तानी शिया कर्मचारियों को बिना स्पष्ट कारण हिरासत में लिया गया और बाद में उन्हें देश से बाहर भेज दिया गया। पाकिस्तान के भीतर शिया संगठनों का कहना है कि अब तक हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। उत्तर पश्चिम पाकिस्तान के शिया बहुल गांवों में भी सैकड़ों लोगों के वापस लौटने की जानकारी सामने आई है। कई कामगारों ने आरोप लगाया कि उन्हें कुछ दिनों तक हिरासत में रखने के बाद आपात यात्रा दस्तावेज देकर पाकिस्तान भेज दिया गया।कुछ निर्वासित कामगारों ने कहा कि उन्हें कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया। उनका कहना था कि केवल शिया होने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया। वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों से इंकार किया है। मंत्रालय का कहना है कि जिन लोगों को बाहर निकाला गया, वे आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे। पाकिस्तान सरकार ने इस मुद्दे पर अमीरात के खिलाफ खुलकर कोई कड़ा बयान नहीं दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की आर्थिक मजबूरी मानी जा रही है।संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है। करीब बीस लाख पाकिस्तानी वहां रहकर काम करते हैं और हर साल अरबों डॉलर की रकम अपने देश भेजते हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान को अमीरात से लगभग आठ अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई थी। ऐसे में यदि अमीरात ने वीजा प्रतिबंध, निर्वासन और रोजगार में कटौती जैसे कदम आगे भी जारी रखे, तो पाकिस्तान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ सकता है।देखा जाये तो हाल के महीनों में अमीरात का रुख लगातार सख्त होता दिखाई दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, हजारों पाकिस्तानी नागरिकों को वापस भेजा गया है और कई लोगों के वीजा नवीनीकरण रोके गए हैं। कुछ विमानन और दूरसंचार कंपनियों ने भी पाकिस्तानी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की है। अमीरात की प्रमुख दूरसंचार कंपनी द्वारा पाकिस्तान से कारोबार समेटने की संभावना की खबरों ने भी चिंता बढ़ा दी है।हम आपको यह भी याद दिला दें कि हाल ही में अमीरात ने पाकिस्तान से अपने साढ़े तीन अरब डॉलर के कर्ज की वापसी की मांग कर दी थी। यह रकम पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग पांचवें हिस्से के बराबर है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह झटका बेहद गंभीर माना गया। इसी बीच, सऊदी अरब ने पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर की सहायता दी और पहले से दिए गए पांच अरब डॉलर के कर्ज की अवधि बढ़ाकर इस्लामाबाद को राहत पहुंचाई। इससे यह भी संकेत मिला कि खाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तान अब दो प्रमुख शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कठिन चुनौती का सामना कर रहा है।दूसरी ओर, विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद केवल सांप्रदायिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक भू राजनीतिक कारण भी हैं। पाकिस्तान की शिया आबादी के ईरान के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, जिससे खाड़ी देशों में संदेह का माहौल पैदा होता है। उधर, सऊदी अरब और अमीरात के रिश्तों में आई दूरी ने भी पाकिस्तान की स्थिति को कठिन बना दिया है। अमीरात को यह भी चिंता है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब की बढ़ती नजदीकी उसके हितों को प्रभावित कर सकती है।बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान की विदेश नीति के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ उसे अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए खाड़ी देशों की मदद चाहिए, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संघर्षों में तटस्थ बने रहना भी उसके लिए जरूरी है। लेकिन मौजूदा हालात में पाकिस्तान का यह संतुलनकारी प्रयास उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले महीनों में यदि अमीरात और पाकिस्तान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

PNSPNS
May 9, 2026 - 16:20
 0
Pakistan के शिया कर्मचारियों को धक्के मारकर देश से बाहर निकाल रहा है UAE, दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़े
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के रिश्तों में गहरी दरार दिखाई देने लगी है। हाल के दिनों में संयुक्त अरब अमीरात द्वारा हजारों पाकिस्तानी शिया कामगारों को बाहर निकाले जाने की खबरों ने इस तनाव को और गंभीर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों की रिपोर्टों के अनुसार, अमीरात सरकार ने अप्रैल के मध्य से पाकिस्तानी शिया समुदाय के लोगों पर कार्रवाई तेज कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम को पाकिस्तान की विदेश नीति, ईरान और सऊदी अरब के साथ उसके रिश्तों तथा खाड़ी क्षेत्र की बदलती राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

एक प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान से इस बात से नाराज है कि उसने ईरान के हमलों की खुलकर निंदा नहीं की। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दौरान ईरान ने अमीरात पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे। अमीरात चाहता था कि पाकिस्तान खुलकर उसका समर्थन करे, लेकिन इस्लामाबाद ने खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत कराने का प्रयास किया, जिसे अबू धाबी ने अपने हितों के खिलाफ माना।

इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: हाँ Operation Sindoor के दौरान दी थी Pakistan को मदद, China ने पहली बार खुलकर स्वीकारा

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यही संतुलनकारी नीति अब उसके लिए परेशानी बन गई है। पाकिस्तान एक ओर सऊदी अरब के साथ अपने पुराने और घनिष्ठ रिश्ते बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भी संबंध खराब नहीं करना चाहता। लेकिन अमीरात को लगने लगा है कि पाकिस्तान ईरान के प्रति नरम रुख अपना रहा है। इसी वजह से अबू धाबी और इस्लामाबाद के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है।

रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमीरात में काम कर रहे कई पाकिस्तानी शिया कर्मचारियों को बिना स्पष्ट कारण हिरासत में लिया गया और बाद में उन्हें देश से बाहर भेज दिया गया। पाकिस्तान के भीतर शिया संगठनों का कहना है कि अब तक हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। उत्तर पश्चिम पाकिस्तान के शिया बहुल गांवों में भी सैकड़ों लोगों के वापस लौटने की जानकारी सामने आई है। कई कामगारों ने आरोप लगाया कि उन्हें कुछ दिनों तक हिरासत में रखने के बाद आपात यात्रा दस्तावेज देकर पाकिस्तान भेज दिया गया।

कुछ निर्वासित कामगारों ने कहा कि उन्हें कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया। उनका कहना था कि केवल शिया होने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया। वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों से इंकार किया है। मंत्रालय का कहना है कि जिन लोगों को बाहर निकाला गया, वे आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे। पाकिस्तान सरकार ने इस मुद्दे पर अमीरात के खिलाफ खुलकर कोई कड़ा बयान नहीं दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की आर्थिक मजबूरी मानी जा रही है।

संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है। करीब बीस लाख पाकिस्तानी वहां रहकर काम करते हैं और हर साल अरबों डॉलर की रकम अपने देश भेजते हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान को अमीरात से लगभग आठ अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई थी। ऐसे में यदि अमीरात ने वीजा प्रतिबंध, निर्वासन और रोजगार में कटौती जैसे कदम आगे भी जारी रखे, तो पाकिस्तान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ सकता है।

देखा जाये तो हाल के महीनों में अमीरात का रुख लगातार सख्त होता दिखाई दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, हजारों पाकिस्तानी नागरिकों को वापस भेजा गया है और कई लोगों के वीजा नवीनीकरण रोके गए हैं। कुछ विमानन और दूरसंचार कंपनियों ने भी पाकिस्तानी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की है। अमीरात की प्रमुख दूरसंचार कंपनी द्वारा पाकिस्तान से कारोबार समेटने की संभावना की खबरों ने भी चिंता बढ़ा दी है।

हम आपको यह भी याद दिला दें कि हाल ही में अमीरात ने पाकिस्तान से अपने साढ़े तीन अरब डॉलर के कर्ज की वापसी की मांग कर दी थी। यह रकम पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग पांचवें हिस्से के बराबर है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह झटका बेहद गंभीर माना गया। इसी बीच, सऊदी अरब ने पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर की सहायता दी और पहले से दिए गए पांच अरब डॉलर के कर्ज की अवधि बढ़ाकर इस्लामाबाद को राहत पहुंचाई। इससे यह भी संकेत मिला कि खाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तान अब दो प्रमुख शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कठिन चुनौती का सामना कर रहा है।

दूसरी ओर, विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद केवल सांप्रदायिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक भू राजनीतिक कारण भी हैं। पाकिस्तान की शिया आबादी के ईरान के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, जिससे खाड़ी देशों में संदेह का माहौल पैदा होता है। उधर, सऊदी अरब और अमीरात के रिश्तों में आई दूरी ने भी पाकिस्तान की स्थिति को कठिन बना दिया है। अमीरात को यह भी चिंता है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब की बढ़ती नजदीकी उसके हितों को प्रभावित कर सकती है।

बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान की विदेश नीति के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ उसे अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए खाड़ी देशों की मदद चाहिए, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संघर्षों में तटस्थ बने रहना भी उसके लिए जरूरी है। लेकिन मौजूदा हालात में पाकिस्तान का यह संतुलनकारी प्रयास उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले महीनों में यदि अमीरात और पाकिस्तान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow