National Conference में बगावत खुलकर सामने आई, सांसद Aga Ruhullah Mehdi ने Omar Abdullah सरकार को घेरा

नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने अपनी ही पार्टी की जम्मू-कश्मीर सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने चुनावी वादे पूरे नहीं किए और “सिर्फ राजनीतिक नारेबाज़ी वाली भाजपा की राह” पर चलने लगी है। लगभग एक वर्ष से पार्टी नेतृत्व के आलोचक रहे मेहदी ने यह नया हमला मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के विधानसभा क्षेत्र गांदरबल से बोला, जहाँ एनसी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और पार्टी उपाध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मौजूदगी में दो दिवसीय कार्यसमिति बैठक हो रही है।मेहदी ने कहा, “हमने अनुच्छेद 370 की संवैधानिक गारंटी बहाल कराने के लिए वोट मांगे थे। अक्टूबर 2024 के विधानसभा चुनावों में हमें भारी जनादेश मिलने का यही मुख्य कारण था। हमने राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए प्रयास करने का वादा किया था। हमें अपने सभी वादे पूरे करने होंगे। हम सत्ता में आने के बाद भाजपा की भाषा नहीं अपना सकते।” सांसद के अनुसार, पिछले साल चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु अनुच्छेद 370 था, लेकिन सरकार बनने के बाद पार्टी ने राज्य का दर्जा बहाल करवाने पर जोर देना शुरू कर दिया है। मेहदी के शब्दों में, “अगर हम 370 से हटकर केवल राज्य का दर्जा मांगने लगें, तो हम भाजपा की ही लाइन पर चल रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस कार्यसमिति बैठक की कोई सूचना ही नहीं दी गई। मेहदी ने नाराजगी जताते हुए कहा, “मैं 2002 से स्थायी सदस्य हूँ। पहली बार ऐसा हुआ है कि मुझे आमंत्रित नहीं किया गया।”इसे भी पढ़ें: Jammu and Kashmir के उधमपुर में संदिग्ध गतिविधि के बाद तलाश अभियान शुरूमेहदी का कहना है कि पार्टी से उनका विवाद इसी बात को लेकर है कि जिस मुद्दे पर वोट मांगे गए, पार्टी को उसी पर काम करना चाहिए था। “एक साल बीत गया, लेकिन हमने अपने राजनीतिक और प्रशासनिक एजेंडे पर काम नहीं किया। आरक्षणों का युक्तिकरण नहीं हुआ। जो ओपन मेरिट उम्मीदवार आयु सीमा पार कर रहे हैं, उन्हें हम यह नहीं कह सकते कि हमारे पास अभी पाँच साल और हैं। 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा भी अधूरा है।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह विरोध नहीं, बल्कि पार्टी को उसके वादे याद दिलाने का प्रयास है, क्योंकि पिछले वर्ष जनता ने लंबे समय बाद मुख्यधारा की पार्टियों पर भरोसा जताया और एनसी को बड़ा जनादेश दिया।उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी के इस बयान पर भी मेहदी ने पलटवार किया कि उन्हें मुद्दे संसद में उठाने चाहिए, “लाइमलाइट में रहने के लिए नहीं।” मेहदी ने कहा, “उनकी राजनीति में कोई सिद्धांत या दिशा नहीं, पहले भाजपा, फिर पीडीपी, और अब एनसी।” सांसद ने घाटी में चल रहे अतिक्रमण-विरोधी अभियान की भी आलोचना की और कहा कि लोगों ने एनसी को इसलिए चुना था कि “कश्मीर में वह न हो जो उत्तर प्रदेश में हो रहा है।”देखा जाये तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी की यह तीखी टिप्पणी न केवल पार्टी के भीतर असहमति की गंभीर परतों को उजागर करती है, बल्कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है। कश्मीर की राजनीति में चुनावी वादों का हमेशा से गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव रहा है। यदि मेहदी के आरोपों में तथ्य हैं, तो यह निश्चय ही एनसी सरकार के लिए चिंताजनक संकेत है कि सत्ता में आते ही चुनावी वादों की प्राथमिकताएँ बदलने लगी हैं। राजनीतिक बंदियों की रिहाई, आरक्षण संरचना का पुनरावलोकन तथा सार्वजनिक कल्याण से जुड़े वादे, ये मुद्दे सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं हैं।कार्यसमिति की बैठक से सांसद को बाहर रखना भी प्रश्न उठाता है। यदि एक स्थायी सदस्य को 22 वर्षों में पहली बार आमंत्रित न किया जाए, तो यह केवल संगठनात्मक चूक नहीं, बल्कि सक्रिय असहमति को दबाने की प्रवृत्ति का संकेत हो सकता है। देखा जाये तो लोकतांत्रिक राजनीति में आलोचना पार्टी-विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही का महत्वपूर्ण स्तंभ होती है।

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Nov 28, 2025 - 22:54
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National Conference में बगावत खुलकर सामने आई, सांसद Aga Ruhullah Mehdi ने Omar Abdullah सरकार को घेरा
नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने अपनी ही पार्टी की जम्मू-कश्मीर सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने चुनावी वादे पूरे नहीं किए और “सिर्फ राजनीतिक नारेबाज़ी वाली भाजपा की राह” पर चलने लगी है। लगभग एक वर्ष से पार्टी नेतृत्व के आलोचक रहे मेहदी ने यह नया हमला मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के विधानसभा क्षेत्र गांदरबल से बोला, जहाँ एनसी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और पार्टी उपाध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की मौजूदगी में दो दिवसीय कार्यसमिति बैठक हो रही है।

मेहदी ने कहा, “हमने अनुच्छेद 370 की संवैधानिक गारंटी बहाल कराने के लिए वोट मांगे थे। अक्टूबर 2024 के विधानसभा चुनावों में हमें भारी जनादेश मिलने का यही मुख्य कारण था। हमने राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए प्रयास करने का वादा किया था। हमें अपने सभी वादे पूरे करने होंगे। हम सत्ता में आने के बाद भाजपा की भाषा नहीं अपना सकते।” सांसद के अनुसार, पिछले साल चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु अनुच्छेद 370 था, लेकिन सरकार बनने के बाद पार्टी ने राज्य का दर्जा बहाल करवाने पर जोर देना शुरू कर दिया है। मेहदी के शब्दों में, “अगर हम 370 से हटकर केवल राज्य का दर्जा मांगने लगें, तो हम भाजपा की ही लाइन पर चल रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस कार्यसमिति बैठक की कोई सूचना ही नहीं दी गई। मेहदी ने नाराजगी जताते हुए कहा, “मैं 2002 से स्थायी सदस्य हूँ। पहली बार ऐसा हुआ है कि मुझे आमंत्रित नहीं किया गया।”

इसे भी पढ़ें: Jammu and Kashmir के उधमपुर में संदिग्ध गतिविधि के बाद तलाश अभियान शुरू

मेहदी का कहना है कि पार्टी से उनका विवाद इसी बात को लेकर है कि जिस मुद्दे पर वोट मांगे गए, पार्टी को उसी पर काम करना चाहिए था। “एक साल बीत गया, लेकिन हमने अपने राजनीतिक और प्रशासनिक एजेंडे पर काम नहीं किया। आरक्षणों का युक्तिकरण नहीं हुआ। जो ओपन मेरिट उम्मीदवार आयु सीमा पार कर रहे हैं, उन्हें हम यह नहीं कह सकते कि हमारे पास अभी पाँच साल और हैं। 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा भी अधूरा है।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह विरोध नहीं, बल्कि पार्टी को उसके वादे याद दिलाने का प्रयास है, क्योंकि पिछले वर्ष जनता ने लंबे समय बाद मुख्यधारा की पार्टियों पर भरोसा जताया और एनसी को बड़ा जनादेश दिया।

उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी के इस बयान पर भी मेहदी ने पलटवार किया कि उन्हें मुद्दे संसद में उठाने चाहिए, “लाइमलाइट में रहने के लिए नहीं।” मेहदी ने कहा, “उनकी राजनीति में कोई सिद्धांत या दिशा नहीं, पहले भाजपा, फिर पीडीपी, और अब एनसी।” सांसद ने घाटी में चल रहे अतिक्रमण-विरोधी अभियान की भी आलोचना की और कहा कि लोगों ने एनसी को इसलिए चुना था कि “कश्मीर में वह न हो जो उत्तर प्रदेश में हो रहा है।”

देखा जाये तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी की यह तीखी टिप्पणी न केवल पार्टी के भीतर असहमति की गंभीर परतों को उजागर करती है, बल्कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है। कश्मीर की राजनीति में चुनावी वादों का हमेशा से गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव रहा है। यदि मेहदी के आरोपों में तथ्य हैं, तो यह निश्चय ही एनसी सरकार के लिए चिंताजनक संकेत है कि सत्ता में आते ही चुनावी वादों की प्राथमिकताएँ बदलने लगी हैं। राजनीतिक बंदियों की रिहाई, आरक्षण संरचना का पुनरावलोकन तथा सार्वजनिक कल्याण से जुड़े वादे, ये मुद्दे सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं हैं।

कार्यसमिति की बैठक से सांसद को बाहर रखना भी प्रश्न उठाता है। यदि एक स्थायी सदस्य को 22 वर्षों में पहली बार आमंत्रित न किया जाए, तो यह केवल संगठनात्मक चूक नहीं, बल्कि सक्रिय असहमति को दबाने की प्रवृत्ति का संकेत हो सकता है। देखा जाये तो लोकतांत्रिक राजनीति में आलोचना पार्टी-विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही का महत्वपूर्ण स्तंभ होती है।

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