आज ही के दिन यानी की 05 मई को सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी का जन्म हुआ था। उन्होंने समाज से जाति-प्रथा, सती प्रथा और कन्या हत्या जैसी तमाम कुरीतियों को खत्म करने के लिए आवाज उठाई थी। गुरु अमरदास जी ने 73 साल की उम्र में गुरु गद्दी संभाली थी। इसके अलावा उन्होंने लंगर प्रथा को मजबूत करने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अमरदास जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...
जन्म और परिवार
सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास का जन्म 05 मई 1479 को अमृतसर के बासर गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम तेजभान और मां का नाम लखमीजी था। गुरु अमर दास बड़े आध्यात्मिक चिंतक थे। खेती और व्यापार के कार्यों में व्यस्त रहने के बाद भी वह हरि का नाम जपते थे। एक बार उन्होंने अपनी पुत्रवधु से गुरु अंगद देवजी द्वारा रचित एक 'शबद' सुना था। इसको सुनकर वह इतना ज्यादा प्रभावित हुए कि वह अपनी पुत्रवधु से गुरु अंगद देवजी का पता पूछकर फौरन उनके गुरु चरणों में पहुंच गए।
तीसरे सिख गुरु
बता दें कि 61 साल की उम्र में अपने से 25 साल छोटे और रिश्ते में लगने वाले समधी गुरु अंगद देवजी को उन्होंने गुरु बना लिया। वहीं 11 सालों तक एकनिष्ठ भाव से गुरु सेवा की। सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देवजी ने अमर दास की सेवा से प्रसन्न होकर उनको 'गुरु गद्दी' सौंप दी।
इस तरह से गुरु अमर दास तीसरे सिख गुरु बने। इस दौरान समाज तमाम बुराइयों से ग्रस्त था। उस समय ऊंच-नीच, जाति-प्रथा, कन्या हत्या और सती प्रथा जैसी अनेक बुराइयां समाज में फैली थीं। ऐसे में गुरु अमर दास ने इन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बड़ा और प्रभावशाली आंदोलन चलाया था। उन्होंने ऊंच-नीच और जाति प्रथा को खत्म करने के लिए लंगर प्रथा और अधिक सशक्त किया। उस दौर में भोजन करने के लिए जातियों के मुताबिक पंगते लगती थीं। लेकिन उन्होंने सभी के लिए एक पंगत में बैठकर लंगर करना अनिवार्य कर दिया था।
गुरु अमर दासजी ने सती प्रथा को समाप्त करने के लिए क्रांतिकारी कार्य किया था। उन्होंने इस घिनौनी रस्म को स्त्री के अस्तित्व का विरोधी मानकर इस प्रथा के खिलाफ जबरदस्त प्रचार किया था। जिससे कि महिलाएं इस कुप्रथा से मुक्ति पा सकें। वह सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले पहले समाज सुधारक थे।
मृत्यु
वहीं 01 सितंबर 1574 को गुरु अमर दास जी दिव्य ज्योति में विलीन हो गए थे।