Gama Pehalwan Death Anniversary: 52 साल का Career, एक भी हार नहीं... जानें 'रुस्तम-ए-हिंद' की अनसुनी कहानी

आज ही के दिन यानी की 23 मई को गामा पहलवान की मृत्यु हो गई थी। गामा पहलवान को पहलवानी का गुर अपने पिता से मिला था। गामा पहलवान जैसा रुतबा और मुकाम कम ही रेसलर को मिला था। वह अपने जीवन में एक भी कुश्ती नहीं हारे थे। उनको रुस्तम-ए-हिंद का खिताब मिला था। बता दें कि गामा पहलवान इतने बड़े पहलवान थे कि मार्शल आर्ट किंग के नाम से फेमस ब्रूसली भी उनको अपना गुरु मानते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गामा पहलवान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअमृतसर में 22 मई 1878 को गामा पहलवान का जन्म हुआ था। उनका असली नाम गुलाम मोहम्मद बख्स भट्ट था। गामा को पहलवानी का गुर उनके पिता मोहम्मद अजीज बख्श से मिला था। पिता को पहलवानी करते देश गामा ने भी पहलवान बनने का मन बना लिया था। लिहाजा उनके पिता ने गामा को पहलवानी के दांव-पेंच सिखाए थे।इसे भी पढ़ें: Ram Mohan Roy Birth Anniversary: Brahmo Samaj के संस्थापक Raja Ram Mohan Roy, जिन्होंने सती प्रथा के साथ Education System को भी बदलारुस्तम-ए-हिंद का नाम मिलासाल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो गामा पहलवान भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के हो गए थे। साल 1947 से पहले तक गामा पहलवान ने भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया था। गामा पहलवान ने अपने 52 साल के पहलवानी करियर में एक भी मुकाबला नहीं हारे थे। उनको पहलवानी की उपलब्धियों की वजह से गामा को 'द ग्रेट गामा' और 'रुस्तम-ए-हिंद' के नाम से भी जाना गया। ताकत और कुश्ती लड़ने के खास अंदाज की वजह से गामा पहलवान चर्चा में रहे थे।लंदन में किसी ने नहीं स्वीकार की चुनौतीकम उम्र में ही गामा पहलवान ने देश के जाने-माने पहलवानों को धूल चटा दी थी। जिस कारण उनका नाम देश के कोने-कोने में फैलने लगा। भारत में अपनी पहलवानी की पहचान बनाने के बाद साल 1910 में उन्होंने लंदन का रुख किया था। लेकिन यहां पर उनकी हाइट की वजह से उनको लंदन इंटरनेशनल चैंपियनशिप में एंट्री नहीं मिली। इस बात पर खफा गामा ने वहां के किसी भी पहलवान को सिर्फ 30 मिनट के अंदर हराने की चुनौती दी। जिसको किसी ने स्वीकार नहीं किया था।टाइगर की उपाधिसाल 1910 में वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियनशिप और 1927 में वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। इस जीत के बाद गामा पहलवान को टाइगर की उपाधि से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 23 मई 1960 को पाकिस्तान के लाहौर में गामा पहलवान की मृत्यु हुई थी। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

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May 24, 2026 - 15:11
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Gama Pehalwan Death Anniversary: 52 साल का Career, एक भी हार नहीं... जानें 'रुस्तम-ए-हिंद' की अनसुनी कहानी
आज ही के दिन यानी की 23 मई को गामा पहलवान की मृत्यु हो गई थी। गामा पहलवान को पहलवानी का गुर अपने पिता से मिला था। गामा पहलवान जैसा रुतबा और मुकाम कम ही रेसलर को मिला था। वह अपने जीवन में एक भी कुश्ती नहीं हारे थे। उनको रुस्तम-ए-हिंद का खिताब मिला था। बता दें कि गामा पहलवान इतने बड़े पहलवान थे कि मार्शल आर्ट किंग के नाम से फेमस ब्रूसली भी उनको अपना गुरु मानते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गामा पहलवान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और परिवार

अमृतसर में 22 मई 1878 को गामा पहलवान का जन्म हुआ था। उनका असली नाम गुलाम मोहम्मद बख्स भट्ट था। गामा को पहलवानी का गुर उनके पिता मोहम्मद अजीज बख्श से मिला था। पिता को पहलवानी करते देश गामा ने भी पहलवान बनने का मन बना लिया था। लिहाजा उनके पिता ने गामा को पहलवानी के दांव-पेंच सिखाए थे।

इसे भी पढ़ें: Ram Mohan Roy Birth Anniversary: Brahmo Samaj के संस्थापक Raja Ram Mohan Roy, जिन्होंने सती प्रथा के साथ Education System को भी बदला

रुस्तम-ए-हिंद का नाम मिला

साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो गामा पहलवान भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के हो गए थे। साल 1947 से पहले तक गामा पहलवान ने भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया था। गामा पहलवान ने अपने 52 साल के पहलवानी करियर में एक भी मुकाबला नहीं हारे थे। उनको पहलवानी की उपलब्धियों की वजह से गामा को 'द ग्रेट गामा' और 'रुस्तम-ए-हिंद' के नाम से भी जाना गया। ताकत और कुश्ती लड़ने के खास अंदाज की वजह से गामा पहलवान चर्चा में रहे थे।

लंदन में किसी ने नहीं स्वीकार की चुनौती

कम उम्र में ही गामा पहलवान ने देश के जाने-माने पहलवानों को धूल चटा दी थी। जिस कारण उनका नाम देश के कोने-कोने में फैलने लगा। भारत में अपनी पहलवानी की पहचान बनाने के बाद साल 1910 में उन्होंने लंदन का रुख किया था। लेकिन यहां पर उनकी हाइट की वजह से उनको लंदन इंटरनेशनल चैंपियनशिप में एंट्री नहीं मिली। इस बात पर खफा गामा ने वहां के किसी भी पहलवान को सिर्फ 30 मिनट के अंदर हराने की चुनौती दी। जिसको किसी ने स्वीकार नहीं किया था।

टाइगर की उपाधि

साल 1910 में वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियनशिप और 1927 में वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। इस जीत के बाद गामा पहलवान को टाइगर की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

मृत्यु

वहीं 23 मई 1960 को पाकिस्तान के लाहौर में गामा पहलवान की मृत्यु हुई थी। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

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