Evil Dead Full Movie Review | ज्यादा खून-खराबा, डर कम... फिल्म ने 'Gore' को ही समझ लिया हॉरर

अगर सिनेमाई पर्दे पर इंसानों को बेरहमी से काटने-छांटने और तड़पाने के नए व अजीबोगरीब तरीके खोजने की कोई प्रतियोगिता होती, तो 'इविल डेड बर्न' (Evil Dead Burn) उसमें निश्चित रूप से गोल्ड मेडल जीतती। फिल्म शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर शरीर के अंग हवा में उड़ने लगते हैं, हड्डियां चटकती हैं, मांस उधड़ता है और स्क्रीन पर इतना खून बहता है कि कोई पूरा ब्लड बैंक भी कम पड़ जाए। लेकिन दिक्कत यही है—एक घंटे तक लगातार ऐसा भयावह कत्लेआम देखने के बाद आप डरना या सिहरना बंद कर देते हैं। दिमाग सुन्न हो जाता है और आप बस इस तबाही के खत्म होने का इंतज़ार करने लगते हैं। इसे भी पढ़ें: Rashmika Mandanna ने Ranabaali में Vijay Deverakonda के लुक को बताया 'बेहद डरावना', तो पति विजय ने सुधारा- बोले 'डरावना नहीं, दिव्य'भूल गई फ्रैंचाइज़ी का असली मिजाज'इविल डेड' फ्रैंचाइज़ी की फिल्में कभी भी बहुत सलीके वाली या छुपी हुई नहीं रही हैं। सैम राइमी की कल्ट क्लासिक फिल्मों की यूएसपी ही यही थी—अति का खून-खराबा, भद्दी जुबान बोलने वाली बुरी आत्माएं और सबसे बढ़कर, एक कमाल का डार्क ह्यूमर (अजीबोगरीब कॉमेडी)। पहले की फिल्मों में जब किसी को चेनसा (आरी) से दो हिस्सों में काटा भी जाता था, तो उस पागलपन में एक एंटरटेनमेंट और मज़ा होता था। मेकर और दर्शक दोनों जानते थे कि यह एक मजेदार हॉरर राइड है। अफ़सोस, सेबेस्टियन वैनिएक के निर्देशन में बनी 'इविल डेड बर्न' वह मज़ाक और मिजाज ही भूल गई है। इसे भी पढ़ें: Hema Malini की बायोपिक में 'ड्रीम गर्ल' बनेंगी Deepika Padukone? आलिया-करीना के बजाय सीनियर एक्ट्रेस ने जताई अपनी पसंदकमजोर माइथोलॉजी और बिखरी कहानीफिल्म की कहानी एलिस (सोहेला याकूब) के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक दुखी विधवा है, जो न चाहते हुए भी अपने दिवंगत पति के परिवार से मिलने उनके एक सुनसान पुश्तैनी घर पहुंचती है। हॉरर फिल्मों के घिसे-पिटे फॉर्मूले के तहत, यहाँ एक रहस्यमयी अटारी (Attic) है, घर का एक डरावना अतीत है, किरदारों के अपने-अपने राज़ हैं और फिर उम्मीद के मुताबिक, सब लोग बेहद घिनौने तरीके से मरने लगते हैं।इस फ्रैंचाइज़ी की सबसे बड़ी ताकत इसकी अपनी एक अनूठी 'माइथोलॉजी' (भूत-प्रेतों और बुराई का इतिहास) रही है, जिसे यहाँ पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है, जो दर्शकों को झुंझलाता है। फिल्म यह बताने में नाकाम रहती है कि आखिर इन राक्षसी ताकतों या 'डेडाइट्स' को वापस क्यों और कैसे बुलाया गया। मेकर्स मानकर चल रहे हैं कि दर्शक बिना वजह जाने बस इस अफरातफरी को स्वीकार कर लें।कत्लेआम की अति, पर हॉरर गायबतकनीकी तौर पर फिल्म में किसी भी चीज़ की कसर नहीं छोड़ी गई है। हर अगला सीन पिछले से ज़्यादा खूंखार बनाने की कोशिश की गई है। अगर एक डेडाइट किसी का चेहरा कुचल रहा है, तो दूसरा किसी के शरीर को ऐसे फाड़ रहा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। घर के रोजमर्रा के सामान हत्या के हथियार बन जाते हैं। जो लोग शुद्ध रूप से 'स्लैशर' या 'गोर' (Gore) सिनेमा के दीवाने हैं, उनके लिए यह शायद किसी स्वर्ग जैसा हो, लेकिन आम दर्शकों के लिए यह सिरदर्द और थका देने वाला अनुभव बन जाता है।समस्या फिल्म की हिंसा नहीं, बल्कि यह है कि हिंसा ही इस फिल्म की पूरी पहचान बन गई है। जब भी स्क्रीनप्ले दुख, अपराध-बोध या टूटे पारिवारिक रिश्तों जैसे इमोशनल पहलुओं को छूने की कोशिश करता है, उससे पहले ही कोई न कोई किरदार बुरी आत्मा के वश में (Possessed) हो जाता है और मार-काट शुरू हो जाती है।परफॉर्मेंस और डेडाइट्स में फीकापनमुख्य अभिनेत्री सोहेला याकूब ने इस खूनी खेल के बीच अपने किरदार में थोड़ी इंसानियत और भावनाएं लाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन वह ज्यादातर समय अपने आस-पास हो रहे नरसंहार को देखकर सिर्फ सदमे में ही नजर आती हैं। जब स्क्रिप्ट किरदारों को विकसित करने के बजाय स्क्रीन पर आँखें फोड़ने जैसे दृश्यों में ज्यादा दिलचस्पी रखे, तो कोई भी कलाकार भला क्या ही कर सकता है।इस बार फिल्म के विलेन यानी 'डेडाइट्स' भी अधूरे लगते हैं। इस फ्रैंचाइज़ी के राक्षस हमेशा से डरावने होने के साथ-साथ थोड़े व्यंग्यात्मक, नाटकीय और मजे लेकर क्रूरता करने वाले रहे हैं। लेकिन 'इविल डेड बर्न' में वे सिर्फ चीखने-चिल्लाने वाली हत्यारी मशीनें बनकर रह गए हैं। उनमें वह यादगार विलेनिक व्यक्तित्व गायब है। नतीजा यह होता है कि कुछ समय बाद हर हत्या एक जैसी लगने लगती है, शॉक वैल्यू खत्म हो जाती है और कोई इमोशनल जुड़ाव नहीं बन पाता।विजुअल्स और प्रैक्टिकल इफेक्ट्स हैं लाजवाबऐसा नहीं है कि फिल्म पूरी तरह खराब है। फिल्म तब सबसे शानदार लगती है जब यह जबरदस्ती डराने की कोशिश छोड़कर थोड़ा थ्रिल पैदा करती है। कार वाला एक एक्शन सीक्वेंस कहानी में गजब का तनाव और रफ्तार लाता है। निर्देशक वैनिएक ने कुछ बेहतरीन 'लॉन्ग टेक्स' (बिना कट के लंबे सीन) फिल्माए हैं, जो उनके विजुअल हुनर को दिखाते हैं। कैमरा खून से सने गलियारों में बेहद आत्मविश्वास के साथ घूमता है, जो इशारा करता है कि इस मार-काट के पीछे एक बेहतरीन हॉरर फिल्म छिपी थी, जिसे स्क्रिप्ट ने दबा दिया।इसके अलावा, आज के दौर में जहां हर जगह कंप्यूटर ग्राफिक्स (CGI) का इस्तेमाल होता है, इस फिल्म में पुराने ज़माने के 'प्रैक्टिकल इफेक्ट्स' और मेकअप का जो अद्भुत व घिनौना तालमेल दिखाया गया है, वह तारीफ के काबिल है।'इविल डेड बर्न' आपको रोजमर्रा की घरेलू चीजों से जुड़े कम से कम तीन-चार नए डर जरूर दे देगी। लेकिन नकली खून की बहती नदियों और अंतहीन बॉडी हॉरर के नीचे दबी यह फिल्म फ्रैंचाइज़ी का सबसे बुनियादी सबक भूल गई—सिर्फ घिनौना होना ही मनोरंजक होना नहीं होता।रेटिंग: 2/5 स्टार

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Jul 13, 2026 - 20:36
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Evil Dead Full Movie Review | ज्यादा खून-खराबा, डर कम... फिल्म ने 'Gore' को ही समझ लिया हॉरर
अगर सिनेमाई पर्दे पर इंसानों को बेरहमी से काटने-छांटने और तड़पाने के नए व अजीबोगरीब तरीके खोजने की कोई प्रतियोगिता होती, तो 'इविल डेड बर्न' (Evil Dead Burn) उसमें निश्चित रूप से गोल्ड मेडल जीतती। फिल्म शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर शरीर के अंग हवा में उड़ने लगते हैं, हड्डियां चटकती हैं, मांस उधड़ता है और स्क्रीन पर इतना खून बहता है कि कोई पूरा ब्लड बैंक भी कम पड़ जाए। लेकिन दिक्कत यही है—एक घंटे तक लगातार ऐसा भयावह कत्लेआम देखने के बाद आप डरना या सिहरना बंद कर देते हैं। दिमाग सुन्न हो जाता है और आप बस इस तबाही के खत्म होने का इंतज़ार करने लगते हैं।
 

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भूल गई फ्रैंचाइज़ी का असली मिजाज
'इविल डेड' फ्रैंचाइज़ी की फिल्में कभी भी बहुत सलीके वाली या छुपी हुई नहीं रही हैं। सैम राइमी की कल्ट क्लासिक फिल्मों की यूएसपी ही यही थी—अति का खून-खराबा, भद्दी जुबान बोलने वाली बुरी आत्माएं और सबसे बढ़कर, एक कमाल का डार्क ह्यूमर (अजीबोगरीब कॉमेडी)। पहले की फिल्मों में जब किसी को चेनसा (आरी) से दो हिस्सों में काटा भी जाता था, तो उस पागलपन में एक एंटरटेनमेंट और मज़ा होता था। मेकर और दर्शक दोनों जानते थे कि यह एक मजेदार हॉरर राइड है। अफ़सोस, सेबेस्टियन वैनिएक के निर्देशन में बनी 'इविल डेड बर्न' वह मज़ाक और मिजाज ही भूल गई है।
 

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कमजोर माइथोलॉजी और बिखरी कहानी
फिल्म की कहानी एलिस (सोहेला याकूब) के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक दुखी विधवा है, जो न चाहते हुए भी अपने दिवंगत पति के परिवार से मिलने उनके एक सुनसान पुश्तैनी घर पहुंचती है। हॉरर फिल्मों के घिसे-पिटे फॉर्मूले के तहत, यहाँ एक रहस्यमयी अटारी (Attic) है, घर का एक डरावना अतीत है, किरदारों के अपने-अपने राज़ हैं और फिर उम्मीद के मुताबिक, सब लोग बेहद घिनौने तरीके से मरने लगते हैं।

इस फ्रैंचाइज़ी की सबसे बड़ी ताकत इसकी अपनी एक अनूठी 'माइथोलॉजी' (भूत-प्रेतों और बुराई का इतिहास) रही है, जिसे यहाँ पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है, जो दर्शकों को झुंझलाता है। फिल्म यह बताने में नाकाम रहती है कि आखिर इन राक्षसी ताकतों या 'डेडाइट्स' को वापस क्यों और कैसे बुलाया गया। मेकर्स मानकर चल रहे हैं कि दर्शक बिना वजह जाने बस इस अफरातफरी को स्वीकार कर लें।

कत्लेआम की अति, पर हॉरर गायब
तकनीकी तौर पर फिल्म में किसी भी चीज़ की कसर नहीं छोड़ी गई है। हर अगला सीन पिछले से ज़्यादा खूंखार बनाने की कोशिश की गई है। अगर एक डेडाइट किसी का चेहरा कुचल रहा है, तो दूसरा किसी के शरीर को ऐसे फाड़ रहा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। घर के रोजमर्रा के सामान हत्या के हथियार बन जाते हैं। जो लोग शुद्ध रूप से 'स्लैशर' या 'गोर' (Gore) सिनेमा के दीवाने हैं, उनके लिए यह शायद किसी स्वर्ग जैसा हो, लेकिन आम दर्शकों के लिए यह सिरदर्द और थका देने वाला अनुभव बन जाता है।

समस्या फिल्म की हिंसा नहीं, बल्कि यह है कि हिंसा ही इस फिल्म की पूरी पहचान बन गई है। जब भी स्क्रीनप्ले दुख, अपराध-बोध या टूटे पारिवारिक रिश्तों जैसे इमोशनल पहलुओं को छूने की कोशिश करता है, उससे पहले ही कोई न कोई किरदार बुरी आत्मा के वश में (Possessed) हो जाता है और मार-काट शुरू हो जाती है।

परफॉर्मेंस और डेडाइट्स में फीकापन
मुख्य अभिनेत्री सोहेला याकूब ने इस खूनी खेल के बीच अपने किरदार में थोड़ी इंसानियत और भावनाएं लाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन वह ज्यादातर समय अपने आस-पास हो रहे नरसंहार को देखकर सिर्फ सदमे में ही नजर आती हैं। जब स्क्रिप्ट किरदारों को विकसित करने के बजाय स्क्रीन पर आँखें फोड़ने जैसे दृश्यों में ज्यादा दिलचस्पी रखे, तो कोई भी कलाकार भला क्या ही कर सकता है।

इस बार फिल्म के विलेन यानी 'डेडाइट्स' भी अधूरे लगते हैं। इस फ्रैंचाइज़ी के राक्षस हमेशा से डरावने होने के साथ-साथ थोड़े व्यंग्यात्मक, नाटकीय और मजे लेकर क्रूरता करने वाले रहे हैं। लेकिन 'इविल डेड बर्न' में वे सिर्फ चीखने-चिल्लाने वाली हत्यारी मशीनें बनकर रह गए हैं। उनमें वह यादगार विलेनिक व्यक्तित्व गायब है। नतीजा यह होता है कि कुछ समय बाद हर हत्या एक जैसी लगने लगती है, शॉक वैल्यू खत्म हो जाती है और कोई इमोशनल जुड़ाव नहीं बन पाता।

विजुअल्स और प्रैक्टिकल इफेक्ट्स हैं लाजवाब
ऐसा नहीं है कि फिल्म पूरी तरह खराब है। फिल्म तब सबसे शानदार लगती है जब यह जबरदस्ती डराने की कोशिश छोड़कर थोड़ा थ्रिल पैदा करती है। कार वाला एक एक्शन सीक्वेंस कहानी में गजब का तनाव और रफ्तार लाता है। निर्देशक वैनिएक ने कुछ बेहतरीन 'लॉन्ग टेक्स' (बिना कट के लंबे सीन) फिल्माए हैं, जो उनके विजुअल हुनर को दिखाते हैं। कैमरा खून से सने गलियारों में बेहद आत्मविश्वास के साथ घूमता है, जो इशारा करता है कि इस मार-काट के पीछे एक बेहतरीन हॉरर फिल्म छिपी थी, जिसे स्क्रिप्ट ने दबा दिया।

इसके अलावा, आज के दौर में जहां हर जगह कंप्यूटर ग्राफिक्स (CGI) का इस्तेमाल होता है, इस फिल्म में पुराने ज़माने के 'प्रैक्टिकल इफेक्ट्स' और मेकअप का जो अद्भुत व घिनौना तालमेल दिखाया गया है, वह तारीफ के काबिल है।

'इविल डेड बर्न' आपको रोजमर्रा की घरेलू चीजों से जुड़े कम से कम तीन-चार नए डर जरूर दे देगी। लेकिन नकली खून की बहती नदियों और अंतहीन बॉडी हॉरर के नीचे दबी यह फिल्म फ्रैंचाइज़ी का सबसे बुनियादी सबक भूल गई—सिर्फ घिनौना होना ही मनोरंजक होना नहीं होता।

रेटिंग: 2/5 स्टार

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