बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना पुलिस का किसी महिला के बेडरूम में जबरन घुसना और उसका मोबाइल फ़ोन ज़ब्त करना, उसकी प्राइवेसी और गरिमा का उल्लंघन है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को 26 साल की याचिकाकर्ता को मुआवज़े के तौर पर 10,000 रुपये देने का निर्देश दिया। नागपुर बेंच के जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के और निवेदिता मेहता ने कहा कि प्राइवेसी का अधिकार, संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार का एक अहम और अटूट हिस्सा है, और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। पिछले हफ़्ते दिए गए आदेश की कॉपी सोमवार को उपलब्ध कराई गई। बेंच ने कहा कि कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना किसी नागरिक के घर में, खासकर किसी महिला के बेडरूम में घुसना और ज़बरदस्ती उसका मोबाइल फ़ोन ज़ब्त करना, निजता और सम्मान का गंभीर उल्लंघन है।
कोर्ट ने पुलिस के उस दावे को खारिज कर दिया कि तलाशी किसी अपराध की जांच के तहत ली गई थी। कोर्ट ने कहा कि इससे विधायिका द्वारा तय किए गए ज़रूरी सुरक्षा उपायों को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी से कानून के दायरे में रहकर काम करने की उम्मीद की जाती है, और जांच का मकसद किसी ऐसी तलाशी या ज़ब्ती को सही नहीं ठहरा सकता जो असल में गैर-कानूनी हो। कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारी द्वारा की गई तलाशी और याचिकाकर्ता का मोबाइल फ़ोन ज़ब्त करना ग़ैर-क़ानूनी था और इससे उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। कोर्ट ने कहा कि इसलिए वह मुआवज़े की हक़दार है। बेंच ने यह भी साफ़ किया कि राज्य सरकार दोषी पुलिस अधिकारी से यह रक़म सीधे वसूल सकती है और निर्देश दिया कि भुगतान दो महीने के अंदर किया जाए।
नागपुर के सावनेर की रहने वाली याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने एक मामले की जांच के बहाने गैर-कानूनी तरीके से उनके घर और बेडरूम में घुसकर, बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए उनका मोबाइल फोन ज़ब्त कर लिया। पुलिस का कहना था कि वे कार दुर्घटना के सिलसिले में उनसे पूछताछ करने के लिए उनके घर गए थे। महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पुलिस ने बिना कोई नोटिस दिए बार-बार उनके घर आकर पूछताछ के नाम पर उन्हें और उनके पति को परेशान किया। उन्होंने यह भी कहा कि 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' के तहत तय प्रक्रिया का पालन किए बिना उनका मोबाइल फोन ज़ब्त करके दो दिन तक अपने पास रखा गया, जबकि इस मामले में न तो उन्हें और न ही उनके पति को आरोपी बनाया गया था।