जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने 1931 के जन-आंदोलन में मारे गए लोगों को दी श्रद्धांजलि

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन ने साल 1931 में डोगरा महाराजा हरि सिंह के शासन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले लोगों को याद किया और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी।नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता के मुताबिक, पार्टी नेताओं ने इन शहीदों के बलिदान को जम्मू-कश्मीर में गरिमा, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चले संघर्ष का एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय करार दिया है। प्रवक्ता ने कहा कि 13 जुलाई का दिन इतिहास का वह अहम मोड़ है जिसने तत्कालीन रियासत में तानाशाही, दमन और अन्याय के खिलाफ एक बड़े जन-आंदोलन की शुरुआत की थी।इस अवसर पर फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि प्रदर्शनकारियों का यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा सच्चाई, न्याय और शांति की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि आत्मसम्मान की कभी न खत्म होने वाली इच्छा को किसी भी तरह के अन्याय से दबाया नहीं जा सकता है। 13 जुलाई के शहीदों ने यह साबित कर दिखाया कि दृढ़ संकल्प और शांतिपूर्ण विरोध के बल पर आखिरकार दमनकारी ताकतों पर जीत पाई जा सकती है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने साझा संघर्ष के इतिहास से हमेशा जुड़े रहें।मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने संदेश में कहा कि 13 जुलाई को दी गई कुर्बानियां हमेशा सम्मान, न्याय और मौलिक अधिकारों के लिए इंसानियत के अटूट प्रयासों का प्रतीक बनी रहेंगी। उन्होंने तानाशाही शासन को चुनौती देने वाले महान शहीदों को नमन करते हुए कहा कि उनके बलिदान ने एक ऐसा मोड़ लाया जिसने पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। यह ऐतिहासिक तारीख हमेशा दमन के खिलाफ एकता और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की शक्ति की याद दिलाती रहेगी।दूसरी ओर, सज्जाद गनी लोन ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सरकार पर इतिहास की गरिमा को कम करने और असल काम के बजाय सिर्फ राजनीतिक नाटक करने का आरोप लगाया। लोन ने कहा कि इस सरकार ने हमारे स्थानीय नायकों के सम्मान में सार्वजनिक अवकाश को दोबारा शुरू करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है। उन्होंने संकल्प के स्थान पर सिर्फ बयानबाजी का रास्ता चुना है। लोन ने यह भी साफ किया कि लोगों की सामूहिक यादों को किसी भी प्रशासनिक आदेश के जरिए मिटाया नहीं जा सकता।

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Jul 13, 2026 - 14:52
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जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने 1931 के जन-आंदोलन में मारे गए लोगों को दी श्रद्धांजलि

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन ने साल 1931 में डोगरा महाराजा हरि सिंह के शासन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले लोगों को याद किया और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता के मुताबिक, पार्टी नेताओं ने इन शहीदों के बलिदान को जम्मू-कश्मीर में गरिमा, न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चले संघर्ष का एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय करार दिया है। प्रवक्ता ने कहा कि 13 जुलाई का दिन इतिहास का वह अहम मोड़ है जिसने तत्कालीन रियासत में तानाशाही, दमन और अन्याय के खिलाफ एक बड़े जन-आंदोलन की शुरुआत की थी।

इस अवसर पर फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि प्रदर्शनकारियों का यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा सच्चाई, न्याय और शांति की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि आत्मसम्मान की कभी न खत्म होने वाली इच्छा को किसी भी तरह के अन्याय से दबाया नहीं जा सकता है। 13 जुलाई के शहीदों ने यह साबित कर दिखाया कि दृढ़ संकल्प और शांतिपूर्ण विरोध के बल पर आखिरकार दमनकारी ताकतों पर जीत पाई जा सकती है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने साझा संघर्ष के इतिहास से हमेशा जुड़े रहें।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने संदेश में कहा कि 13 जुलाई को दी गई कुर्बानियां हमेशा सम्मान, न्याय और मौलिक अधिकारों के लिए इंसानियत के अटूट प्रयासों का प्रतीक बनी रहेंगी। उन्होंने तानाशाही शासन को चुनौती देने वाले महान शहीदों को नमन करते हुए कहा कि उनके बलिदान ने एक ऐसा मोड़ लाया जिसने पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। यह ऐतिहासिक तारीख हमेशा दमन के खिलाफ एकता और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की शक्ति की याद दिलाती रहेगी।

दूसरी ओर, सज्जाद गनी लोन ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सरकार पर इतिहास की गरिमा को कम करने और असल काम के बजाय सिर्फ राजनीतिक नाटक करने का आरोप लगाया। लोन ने कहा कि इस सरकार ने हमारे स्थानीय नायकों के सम्मान में सार्वजनिक अवकाश को दोबारा शुरू करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है। उन्होंने संकल्प के स्थान पर सिर्फ बयानबाजी का रास्ता चुना है। लोन ने यह भी साफ किया कि लोगों की सामूहिक यादों को किसी भी प्रशासनिक आदेश के जरिए मिटाया नहीं जा सकता।

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