सभ्यता, संस्कृति और युद्ध के बीच ईरान
ईरान का भविष्य इससे जुड़ा है कि उसकी सभ्यतागत आत्मचेतना आधुनिक नागरिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्थिरता और विश्व के साथ सामान्य संबंधों के लिए कितनी जगह बनाती है और बाहरी शक्तियां उसके विरुद्ध सैन्य दबाव की जगह कितनी दूर तक कूटनीति को स्वीकार करती हैं।
ईरान को समझना केवल आधुनिक राष्ट्र-राज्य को समझना नहीं है। यह उस सभ्यता को समझने की कोशिश है जिसने हजारों वर्षों तक पश्चिम और मध्य एशिया के बीच विशिष्ट सांस्कृतिक संसार निर्मित किया। आज ईरान जिस राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संकट से गुजर रहा है, उसकी जड़ें केवल 1979 की इस्लामी क्रांति या अमेरिका-इसराइल के साथ उसके वर्तमान संघर्ष में नहीं हैं। उसके पीछे प्राचीन साम्राज्यों की स्मृति, फारसी भाषा और साहित्य की निरंतरता, इस्लामी और शिया परंपरा, औपनिवेशिक हस्तक्षेप का अनुभव, आधुनिक राष्ट्रवाद और पश्चिमी प्रभुत्व के प्रति गहरे अविश्वास की लंबी ऐतिहासिक परतें हैं।
प्राचीन ईरान का सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक रूप आकेमेनिड साम्राज्य था, जिसकी स्थापना छठी शताब्दी ईसा पूर्व में साइरस महान ने की। डेरियस के समय यह साम्राज्य अत्यंत विस्तृत हो गया। पर्सेपोलिस उसके वैभव और प्रशासनिक क्षमता का प्रतीक बना। इसके बाद सिकंदर के आक्रमण, पार्थियन सत्ता और फिर सासानी साम्राज्य ने ईरानी इतिहास को नई दिशाएं दीं। सासानी काल में जरथुस्त्र धर्म, राजसत्ता और सांस्कृतिक पहचान का गहरा संबंध बना। सातवीं शताब्दी में अरब मुस्लिम विजय के बाद सासानी साम्राज्य समाप्त हुआ, लेकिन ईरानी सभ्यता समाप्त नहीं हुई।
इस बिंदु पर ईरान के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता सामने आती है। वह बाहरी प्रभावों को आत्मसात करता रहा, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को पूरी तरह विसर्जित नहीं होने देता। इस्लाम के आगमन के बाद अरबी धार्मिक और प्रशासनिक भाषा बनी, पर फारसी ने स्वयं को पुनर्गठित किया और शीघ्र ही इस्लामी दुनिया की सबसे शक्तिशाली साहित्यिक भाषाओं में शामिल हो गई। अबुल कासिम फिरदौसी का शाहनामा इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महान उदाहरण है। प्राचीन ईरानी मिथकों, राजाओं और वीरगाथाओं को फारसी में पुनर्सृजित करके उन्होंने इतिहास को सांस्कृतिक स्मृति में बदल दिया।
फारसी साहित्य की शक्ति केवल फिरदौसी तक सीमित नहीं है। उमर खय्याम, निजामी, सादी, हाफिज और रूमी ने फारसी साहित्य को विश्व साहित्य की महान परंपरा बनाया। सादी की मानवीय दृष्टि, हाफिज की सूक्ष्म प्रेम और आध्यात्मिकता, तथा रूमी की सूफी चेतना आज भी ईरानी सांस्कृतिक जीवन में सक्रिय हैं। फारसी कविता में प्रेम और अध्यात्म के साथ सत्ता की आलोचना, मानवीय स्वतंत्रता और जीवन की क्षणभंगुरता भी दिखाई देती है। इसीलिए ईरान की संस्कृति को केवल धार्मिक रूढ़िवाद के माध्यम से समझना उसके मूल स्वभाव को सीमित कर देना होगा। आधुनिक ईरान की पहचान इसी बहुस्तरीय विरासत से बनती है। नौरोज़ उत्सव का बने रहना उदाहरण है कि राजनीतिक सत्ता और धार्मिक व्यवस्था के ऊपर भी सांस्कृतिक स्मृति की अपनी शक्ति होती है।
उन्नीसवीं शताब्दी का ईरान रूसी और ब्रिटिश प्रभाव से दबाव में था। विदेशी हस्तक्षेप और राजसत्ता की निरंकुशता के विरुद्ध 1905-11 की संवैधानिक क्रांति हुई। यह आधुनिक ईरानी लोकतांत्रिक चेतना का महत्वपूर्ण पड़ाव था। बाद में रज़ा शाह पहलवी ने केन्द्रीकृत आधुनिक राष्ट्र-राज्य का निर्माण किया।हुआ देश है।
ईरान का भविष्य अंततः इस प्रश्न से जुड़ा है कि उसकी सभ्यतागत आत्मचेतना आधुनिक नागरिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्थिरता और विश्व के साथ सामान्य संबंधों के लिए कितनी जगह बनाती है और बाहरी शक्तियां उसके विरुद्ध सैन्य दबाव की जगह कितनी दूर तक कूटनीति को स्वीकार करती हैं। यदि युद्ध, प्रतिबंध और प्रभुत्व की राजनीति जारी रहती है तो ईरान के साथ पूरा पश्चिम एशिया अस्थिर होता रहेगा। यदि संवाद और कूटनीति को स्थान मिलता है, तो वही ईरान—जो हजारों वर्षों से आक्रमणों, साम्राज्यों और सत्ता-परिवर्तनों के बीच अपनी भाषा और संस्कृति बचाए रहा है—एक बार फिर संघर्ष की राजनीति से बाहर निकलकर अपनी सभ्यतागत ऊर्जा को नए रूप में व्यक्त कर सकता है। ईरान की कहानी इसलिए केवल अतीत की कहानी नहीं है। वह आज भी सभ्यता और सत्ता, स्वतंत्रता और नियंत्रण, प्रतिरोध और युद्ध, तथा स्मृति और भविष्य के बीच लिखी जा रही है।
उनके पुत्र मोहम्मद रज़ा शाह के समय ईरान अमेरिका के और निकट आया। 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक की सरकार का तख्तापलट आधुनिक ईरानी राजनीतिक स्मृति की निर्णायक घटना है। मोसद्देक ने तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की नीति अपनाई थी। उनके हटाए जाने और शाह की सत्ता के सुदृढ़ होने ने ईरानी समाज के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत की कि पश्चिमी शक्तियां ईरान की राजनीतिक संप्रभुता में हस्तक्षेप करती हैं। यही स्मृति आगे चलकर अमेरिकी-विरोधी राजनीतिक चेतना की महत्वपूर्ण आधारभूमि बनी।
1979 की इस्लामी क्रांति ने शाह को सत्ता से हटाकर अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी गणराज्य स्थापित किया। क्रांति के बाद धार्मिक नेतृत्व ने सत्ता-संरचना पर निर्णायक नियंत्रण स्थापित किया। निर्वाचित राष्ट्रपति और संसद के साथ सर्वोच्च नेता, गार्जियन काउंसिल और अन्य धार्मिक संस्थाएं ऐसी व्यवस्था बनाती हैं जिसमें चुनाव होते हैं, लेकिन राजनीतिक सत्ता की सीमाएं भी पूर्वनिर्धारित हैं।
ईरानी समाज और राज्य के बीच यही तनाव पिछले दशकों की राजनीति का प्रमुख प्रश्न रहा है। विशेषतः महिलाएं और युवा पीढ़ी आधुनिक शिक्षा, इंटरनेट और वैश्विक संस्कृति से प्रभावित हैं। 2022 में महसा अमीनी की हिरासत में मृत्यु के बाद उभरा ‘वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ आंदोलन इसका व्यापक रूप था। उसके भीतर स्त्री की स्वायत्तता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के दमन के विरुद्ध व्यापक असहमति थी।
ईरान की आधुनिक साहित्यिक और कलात्मक दुनिया ने भी इन अंतर्विरोधों को अभिव्यक्ति दी है। सादेक हेदायत के साहित्य में आधुनिक मनुष्य का अकेलापन और अस्तित्वगत संकट दिखाई देता है। फोरोग़ फ़र्रुख़ज़ाद ने कविता में स्त्री-अनुभव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नई भाषा निर्मित की। आधुनिक ईरानी साहित्य और सिनेमा ने राजनीतिक सेंसरशिप के बीच भी समाज की गहरी बेचैनी को व्यक्त किया है। अब्बास कियारोस्तामी, असगर फरहादी और जाफर पनाही जैसे फिल्मकारों ने सामान्य जीवन की छोटी घटनाओं में सामाजिक और राजनीतिक तनावों को विश्व सिनेमा तक पहुंचाया।
ईरान की विदेश नीति को समझने के लिए उसके अमेरिका और इसराइल के साथ संबंधों को देखना आवश्यक है। 1979 के बाद अमेरिका और ईरान के संबंध शत्रुतापूर्ण हो गए। आर्थिक प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय राजनीति ने इस टकराव को लगातार गहरा किया। 2015 के परमाणु समझौते ने कुछ समय के लिए समाधान की संभावना पैदा की, लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने के बाद संकट फिर बढ़ गया।
इजसराइल के साथ ईरान का संघर्ष इससे भी अधिक जटिल है। ईरान इजसराइल को मान्यता नहीं देता और फिलिस्तीनी प्रश्न को अपनी विदेश नीति में केन्द्रीय स्थान देता है। दूसरी ओर इसराइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानता है। वर्षों तक दोनों देशों का संघर्ष विभिन्नन माध्यमों से चलता रहा। गाज़ा युद्ध के बाद यह संघर्ष और तीखा हुआ और 2024 में दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष मिसाइल और ड्रोन हमलों ने स्पष्ट कर दिया कि छाया युद्ध किसी भी समय खुले युद्ध में बदल सकता है।
लेकिन 2026 ने इसे नए स्तर पर पहुंचा दिया। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर व्यापक सैन्य हमले शुरू किए। परमाणु और सैन्य प्रतिष्ठानों के साथ ईरान के राजनीतिक नेतृत्व को भी निशाना बनाया गया। इस हमले में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु हुई। इसके बाद ईरान ने इसराइल और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। जून में एक अंतरिम समझौते के माध्यम से व्यापक लड़ाई रोकने की कोशिश हुई, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर समझौता टिक नहीं सका।
18 अगस्त 2026 तक स्थिति फिर अत्यंत अस्थिर है। जून का 60-दिवसीय समझौता समाप्त हो चुका है। अमेरिका तथा ईरान के बीच प्रत्यक्ष वार्ता की स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है। ईरान का कहना है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य तब तक बंद रहेगा जब तक अमेरिका प्रतिबंधों, बंदरगाहों की नाकाबंदी और जमे हुए ईरानी संसाधनों से संबंधित उसकी मांगों को पूरा नहीं करता। दूसरी ओर अमेरिकी पक्ष समझौते के विफल होने के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहरा रहा है।
होर्मुज़ का प्रश्न केवल ईरान और अमेरिका का नहीं है। विश्व के ऊर्जा व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा इस मार्ग से होकर गुजरता है। इसके लंबे समय तक बाधित रहने का प्रभाव तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। युद्ध और शांति की अनिश्चितता के बीच तेल की कीमतों में फिर वृद्धि दर्ज की गई। युद्ध ने ईरानी समाज पर भारी आर्थिक दबाव भी डाला है। प्रतिबंधों से पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर सैन्य संघर्ष, व्यापारिक व्यवधान और बुनियादी ढांचे की क्षति ने अतिरिक्त बोझ डाला है। इस प्रकार युद्ध का वास्तविक भार नागरिक जीवन पर पड़ता है।
अमेरिका के क्षेत्रीय सैन्य और आर्थिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, लेकिन ईरान की अपनी क्षेत्रीय शक्ति-राजनीति, परमाणु महत्वाकांक्षा और सशस्त्र सहयोगी संगठनों के माध्यम से प्रभाव विस्तार की नीति भी वास्तविकता है। इसराइल की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को समझना आवश्यक है, लेकिन उसके सैन्य अभियानों और फिलिस्तीन में नागरिकों की व्यापक पीड़ा को उससे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
इसलिए ईरान को केवल ‘कट्टर इस्लामी राष्ट्र’, ‘अमेरिका-विरोधी शक्ति’ या ‘इसराइल का दुश्मन’ कह देना उसके जटिल चरित्र को समझने से बच निकलना है। वह एक प्राचीन सभ्यता, समृद्ध साहित्यिक संस्कृति, आधुनिक राष्ट्रवादी चेतना, धार्मिक राज्य, असंतुष्ट समाज और महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय शक्ति-इन सबका एक साथ बना
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