सत्याग्रह से आता है सच्चा प्रतिरोध

असहज करते सवालों का सामना करना ही सत्याग्रह है। तभी लड़ी जा सकती है चहुंमुखी लड़ाई

PNSPNS
Jul 19, 2026 - 20:13
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सत्याग्रह से आता है सच्चा प्रतिरोध

विगत दिनों राज्यसभा का नामांकन खारिज होने के बाद आत्मचिंतन का अवसर मिला। कोई भी प्रतिरोध केवल बाह्य तो नहीं हो सकता। वह बहुत से आंतरिक सवाल पूछता है। प्रतिरोध सत्यान्वेषी नहीं हुआ, तो वह या तो मात्र सनसनीखेज मंचन बनकर रह जाता है या फिर प्रतिक्रिया। बिना सत्यान्वेषण की गरज से उपजी प्रतिक्रिया कोरी हिंसा है। यह हिंसा हक की आवाज नहीं उठा सकती।

भले ही चुनाव की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर अब कोई संदेह नहीं रहा, वह यकीनी तौर पर सत्ता के कदम चूमती दिखाई पड़ती है। सत्तासीन की गुलामी करने के लिए मजबूर हैं।

पर इन सबसे इतर कुछ सवाल मेरे भीतर शुरू हुए। उन सवालों को खारिज नहीं कर सकते। उनका संज्ञान लिए बिना किसी प्रतिरोध का आगाज़ नहीं हो सकता। राज्यसभा का पर्चा खारिज होने से सब सकते में आए। लोकतंत्र पर हावी हो रही तानाशाही और एकाधिपत्य का पर्दाफाश हुआ। लेकिन यह पहली बार तो नहीं हुआ।

आखिर दबे पांव पिछले दो दशक से कब्जा वर्चस्व और एकाधिपत्य लोकतंत्र के हर स्थान पर पैर पसार ही रहा था। तब किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे राजनीतिक स्मार्टनेस के रूप में मनाया गया। उस प्रक्रिया में छूटे लोग 'बौड़म' करार किए गए।

मध्यप्रदेश की ही बात करें तो कृषि उपज मंडी के चुनाव कब से बंद हो गए। हमने कुछ ज्यादा नहीं कहा —और इस "हम" में मैं खुद को भी शामिल करती हूं, क्योंकि पूरी व्यवस्था मुझसे अलग कैसे हो सकती है? यह "हम" असल में "मैं" और ऐसे ही अन्य लोगों की सामूहिक चेतना है।

मंडी कोई कमतर स्थान नहीं। राज्य सभा के मुकाबले कोई गौण व्यवस्था नहीं। वही वह स्थान है जहां किसान की उपज का फैसला होता है। देश की राजधानी के वाणिज्य मंत्रालय में तो उसकी आवाज पहुंचती ही नहीं। कम-से-कम मंडी तक तो पहुंचा करती थी। आज भी सामाजिक सत्ता व्यवस्था में व्यापारी, आढ़तियों की तुलना में किसान की आवाज बहुत क्षीण है। मंडी में प्रतिनिधित्व उसको बुलन्दी देती थी।

इधर चुनाव बंद हुए, उधर समर्थन मूल्य की खरीद में और गिरावट आई। किसान को हक के स्थान पर कुछ राहत राशि का इनाम देकर खामोश किया जाने लगा। किसान अनुकम्पा राशि, कृषि क्रेडिट योजना, कर्ज माफी, भावन्तर मेहरबानी के कई नाम। इनमें हक गुम हो गया। किसी ने प्रतिनिधित्व के हक को 'मिस' नहीं किया। मेहरबानी की सुनहरी कैद के बाबत लोकतंत्र दब गया। किसान पर गोली भी चली तब भी उपज मंडी के चुनाव मांग की कथानक में शामिल नहीं हो सका। आज जब अमेरिका से डील होगी, तब किसान की कहीं आवाज नहीं बचेगी।

यही स्थिति सहकारी समितियों की हुई। इसकी चुनाव प्रक्रिया में कोई सहकारिता शेष ही नहीं रही। मतदाता, प्रत्याशी सबकी सूची सरकार तय करती। जाहिर है कि सत्तारूढ़ दल के हिसाब से तय करती। ख्याल रहे कि यह चुनाव कितने जरूरी हैं। समाज के सबसे निचले पायदान पर बसे लोगों का राशन, बीज, खाद की उपलब्धता इन समितियों से तय होती हैं।

ऐसे में जब ताकतवर वर्ग इस पर अपना कब्जा जमाते हैं, तो शोषण की नई इबारत गढ़ते हैं। कई बार उस सबसे कमजोर को ही खाद-बीज नहीं मिलता। गांव के प्रभुत्व सम्पन्न के बंटवारे बाद कुछ बचे तो वे पाते हैं। तिस पर अब वो कहां आवाज उठाएं? कोई व्यवस्था नहीं जहां वे निर्धारक बन सकें। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कालाबाजारी, शोषण-दोहन लूट को चुनौती दे सके।

इन समितियों में समाज के सबसे ज्यादा दमित वर्ग के लिए आरक्षित स्थान होने पर भी असल आवाज नही मिली। केवल ताकतवर के मोहरे काबिज होते गए। हमारी राजनीतिक चेतना को इससे ठेस नहीं पहुंची। हमें नहीं लगा कि यह फर्जी प्रकिया लोकतंत्र को खोखला कर रही है, बल्कि हमने इसे सहकारिता का दोष मान लिया। आखिर मनुष्य का तो स्वभाव ही सहकारी नहीं। यह पूंजीवाद ने जंचा दिया। इस बीच चुनी हुई नहर समितिया भंग हो गईं। वहां भूमि स्वामी हावी हो गए। हम को अच्छा नहीं लगा, लेकिन खास विरोध भी नही किया।

फिर पंचायत चुनाव की यही दशा हो गई। ग्राम सभा के हक जाते रहे। हमको लगा कि अनुकूल सरकार बनने पर कुछ करेंगे। चुनाव के प्रत्याशी की योग्यता तय होने लगी, हमें यह लोकतंत्र विरोध नहीं लगा। ज्यादातर राज्य मनमुताबिक चुनाव कराते हैं या नहीं कराते। तब बहुत फर्क नहीं पड़ा।

आज राज्यसभा का चुनाव सहकारी समिति के चुनाव जैसा हो गया। तो क्या आश्चर्य! एसआईआर ने पूरे देश को सहकारी चुनाव-सा बना दिया तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए। राज्यसभा तो विधायकों की प्रतिनिधि सभा है। उनसे कई गुना ज्यादा कमजोर, दमित वर्ग की चुनी और गैर चुनी सभाएं मौजूद हैं। सहकारी समिति, ग्राम सभा, पंचायत, मंडी, नहर समिति में उनकी आवाज का होना, देश की आत्मा को आवाज देना है। वह दबाई गई। अनुचित जरूर महसूस हुआ, पर क्या वह अन्याय-सा लगा? यह सवाल मन में है।

एक पहलू और है। जो तीसरे प्रत्याशी निर्वाचित घोषित हो गए, वह जिस समुदाय से आते हैं, हजारों साल तक व्यवस्था के अधिपतियों ने मात्र जन्म के आधार पर खारिज किया है। मंदिर, विद्यालय, साथ बैठकर भोजन करने की पंगत, श्मशान तक खारिज ही खारिज हुए है। उस मान से मेरा जन्म तो खारिज करने वाले समुदाय में हुआ। हालांकि स्त्री जनेऊ धारण नहीं करती, न ही द्विज होती है। पर तब भी मेरे पास जितने विशेषाधिकार के जनेऊ हैं, वह समाज की विषमता का ही प्रतीक हैं। तो प्रसंगवश मेरे सामुदायिक व्यक्तिगत कर्म कटे।

संविधान इसी विषमता को नेस्तनाबूद करने का माध्यम है, मानचित्र है। वही मुझे और निर्विरोध निर्वाचित को यह हक देता है कि बराबरी से लड़ सके। मैदान समतल हो। पर जैसा बाबा साहब ने कहा कि आर्थिक-सामाजिक विषमता राजनीतिक समतलता को लील जाएगी। चुनाव में बढ़ते खर्च, गैरपारदर्शिता उसी की परिणति है। यह ध्यान रहे कि ताकतवर का नुमाइंदा होने से न्याय, सशक्तिकरण नहीं होता। ताकतवर को चुनौती देने से होता है।

प्रतिरोध का अभ्यास जब करने लगे, तो वह अंदरूनी असहज करते सवाल पूछती है। उनका सामना करना ही सत्याग्रह है। तब चहुंमुखी लड़ाई लड़ी जा सकती है।

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