विष्णु नागर का व्यंग्यः यह समय जालिमों और हत्यारों का, हत्या ही उनका भोजन, साहित्य और संगीतप्रेम है!
हत्यारे दुख प्रकट करने में सबसे आगे रहते हैं, खासकर वहां, जहां ऊंगली उन पर उठ सकती है! वे शोकाकुल परिवार से इतनी 'गहरी सहानुभूति' प्रकट करते हैं कि वह परिवार सोच भी नहीं सकता कि असली हत्यारा तो यही है। अगले दिन उसके शोक संदेश से अखबार पटे होते हैं।
हमारा समय जालिमों और हत्यारों का समय है। ये बहुत सी शक्लों में पाए जाते हैं। इनके अलग- अलग ब्रांड और ब्रांड एंबेसडर हैं। हर सिंहासन पर अलग-अलग नामों और भिन्न-भिन्न चेहरों के साथ ये ही बैठे हैं। कहीं नेतावेश में, कहीं साधुवेश में, कहीं बहुरूपिया बन कर। कहीं श्वेत-पीत वस्त्रों में, तो कहीं सूट-टाई में। कभी साकार तो कभी निराकार रूप में।
उन्होंने अपनी असंख्य प्रतिमाएं, अनगिनत रूपों-रंगों में देश के कोने-कोने में लगवा रखी हैं, जिनकी आरती भी वे खुद करते हैं और प्रसाद भी वे स्वयं चट करते हैं। मठ उनके हैं, मंदिर उनके हैं। नदियां, तालाब और समुद्र उनके हैं। हवा उनकी है, पानी उनका है। बरसात उनकी है, जंगल उनके हैं, पहाड़ और खदानें उनकी हैं। जहां तक उनकी नजर जाए, सब उनका है। जितना भी जिधर भी हरा है, नीला है, पीला है, सफेद और वासंती है, सब उनका है।
विश्वविद्यालय और कला-साहित्य केंद्र उनके हैं। प्रकाशन गृह और स्वयंसेवी संगठन उनके हैं। सरकार उनकी है, डंडा और गोली उनकी है। वकील उनके हैं, जज उनके हैं, फैसले उनके हैं।उनके चतुर्मुखी योगदान की प्राइम टाइम में हर चैनल पर हर दिन चर्चा उनकी है। वे अपनी छवि, अपने कपड़ों की तरह अत्यंत उज्ज्वल रखते हैं। उस पर सिलवट तक पड़ने नहीं देते।
वे इतने ताकतवर और जरूरत पड़ने पर इतने विनम्र भी हैं कि कानून उन पर फंदा कस नहीं सकता और कभी कानून ऐसी गलती कर बैठता है तो वे इतनी सफाई से, रात के अंधेरे में नहीं, दिनदहाड़े उसकी हत्या करवा देते हैं कि किसी को पता ही नहीं चलता और पता चल जाए तो भी डर कैसा? वे ही कानून हैं, वे ही रक्षक हैं!
सफल हत्यारे अनेक बार दिखने में फूलों से कोमल, मृदुभाषी और धार्मिक जैसे लगने का अभ्यास करते हैं। उनसे किसी बात पर अगर ठन न जाए, उनके अहम को चोट न पहुंचाई जाए तो वे उदार हृदय होते हैं। स्वागत-सत्कार में अत्यंत प्रवीण, विनम्रता में एंटायर सब्जैक्ट्स में एम ए ही नहीं पीएचडी होते हैं। सामने वाले को अहसानों के बोझ से इतना लाद देते हैं कि लाभार्थी उनके हत्यारे इरादों को जितना ज्यादा भांपने लग जाता है, उतना ही उसका उनसे डर बढ़ता जाता है और वह उनके और अधिक नजदीक आने लगता है, उनकी छत्रछाया में अपने को महफूज समझता है।
लाभार्थी कभी हत्यारे के चंद बुरे क्षणों में उनसे छिटकने की कोशिश करता है, दूर दिखना चाहता है तो हत्यारे इसे भांप कर प्यार से उसे अपने पास सटाते हैं, उसके गले में अपना हाथ डालकर उसकी और अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर खिंचवाते हैं, ताकि वक्त-जरूरत काम आए। हत्यारे हत्या के अलावा अपने हर काम का आडियो-वीडियो और लिखित रिकार्ड रखते हैं और लाभार्थी को इसकी याद दिलाते रहते हैं कि हमारे पास तुम्हारा काला पीला चिट्ठा है!
हत्यारे मंदिर जाते हैं। किसी दिन सोमनाथ तो किसी दिन मंगलनाथ। किसी दिन केदारनाथ तो किसी दिन रामेश्वरम। यही उनकी ईश्वरभक्ति और देशभक्ति का ठोस प्रमाण है। हत्यारे सब भूल सकते हैं मगर मंदिर जाना कभी नहीं भूल सकते। उन्हें डर रहता है कि वे चार दिन मंदिर-मठ नहीं गए तो उनका असली रूप खुल जाएगा। कभी वे भगवान से आशीर्वाद लेते हैं तो कभी भगवान को आशीर्वाद भी देते हैं!
उनकी नजर उठते-बैठते, खाते-पीते, बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने का अभिनय करते हुए, झालमुड़ी या सत्तू खाते हुए कैमरे पर रहती है। कैमरे से न वे अपनी कोमलता छिपाते हैं, न मृदुता, न ईश्वर के प्रति अपना 'अगाध और अटूट प्रेम', न घंटी बजाना, न ढोल बजाना, न त्रिशूल उठाना। वे छिपाते हैं हत्याओं की अनगिनत दास्तानें।
उनकी कोमलता, उनकी मृदुभाषिता, उनकी ईश्वर भक्ति, उनका कला-साहित्य प्रेम बिकाऊ है, जिसकी आड़ में वे अगली हत्याओं के इरादे और पिछली हत्याओं का इतिहास छुपाते हैं। वे बार-बार उन करोड़ों लोगों की बात करते हैं, जिनका इस्तेमाल वे नाक पोंछने वाले रूमाल की तरह, पसीना पोंछने वाले गमछे की तरह और टायलेट पेपर की मानिंद करते हैं।
सफल हत्यारे खुद हत्या करना छोड़ देते हैं। वे इतने पहुंचे हुए हो चुके होते हैं कि किसी से कहते नहीं कि तुम हत्या करो। वे ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं कि वे जिनकी हत्या करवाना चाहते हैं, अपने आप हो जाती है और उनके हाथ खून से नहीं सनते! हत्या के बाद उनके हाथ, हाथ नहीं रहते, करकमल हो जाते हैं और रिबन काटने के काम आते हैं।
हत्यारे दुख प्रकट करने में सबसे आगे रहते हैं, खासकर वहां, जहां ऊंगली उन पर उठ सकती है! वे शोकाकुल परिवार से इतनी 'गहरी सहानुभूति' प्रकट करते हैं कि वह परिवार सोच भी नहीं सकता कि असली हत्यारा तो यही है। अगले दिन हत्यारे के चित्र के साथ उसके शोक संदेश से अखबार पटे होते हैं और टीवी पर उसका विडियो संदेश सबसे ज्यादा बार प्रसारित होता है।
हत्यारे हर आपदा में अवसर ढूंढते हैं, चाहे वह कोरोना हो! हत्या की उच्च स्तरीय जांच के आदेश वे देते हैं और पांच साल बाद हत्या के पक्के सबूत न मिलने के आधार पर अपने सहयोगी हत्यारों को छुड़वाते भी वही हैं। इस तरह हत्या के हर मोर्चे पर वे सक्रिय रहते हैं।
उनसे आप आदमी या लोगों के समूह की ही नहीं, सिद्धांतों की, न्याय की, संविधान की, धर्मनिरपेक्षता की यानी किसी भी किस्म की हत्या करवा सकते हैं, बशर्ते उससे उन्हें फायदा हो। हत्या ही उनका भोजन है, मिठाई है, पान, सिगरेट और दारू है। हत्या ही उनका साहित्य और संगीतप्रेम है। हत्या ही उनका रंगमंच है, जिसकी साधना में वे रत रहते हैं।
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