Ustaad Bhagat Singh Review: मनोरंजन के नाम पर पुराना फॉर्मूला और घिसी-पिटी कहानी, क्या सिर्फ 'स्वैग' काफी है?

सिनेमा जगत में अब यह एक अघोषित नियम बन चुका है—"तर्क (Logic) की उम्मीद मत करो, बस मनोरंजन देखो।" कमर्शियल सिनेमा ने धीरे-धीरे दर्शकों को कम में संतोष करना सिखा दिया है। पहले फिल्मों से तर्क गायब हुआ, फिर कहानी, और अब तो बुनियादी फिल्म निर्माण की सुसंगतता (Coherence) भी वैकल्पिक लगने लगी है। जब थिएटर के बाहर सब कुछ छोड़ देने की सलाह दी जाती है, तो सवाल उठता है कि अंदर बचता क्या है? जवाब साफ है: केवल वफादार प्रशंसक, जो अपने पसंदीदा स्टार की एक झलक और पुरानी यादों के सहारे पूरी फिल्म झेल जाते हैं। पवन कल्याण स्टारर और हरीश शंकर निर्देशित 'उस्ताद भगत सिंह' भी इसी श्रेणी की फिल्म है, जो उम्मीदों पर खरी उतरने के बजाय उन्हीं डर को सच साबित करती है जो एक घिसे-पिटे कमर्शियल प्रोडक्ट से होते हैं।इसे भी पढ़ें: Dhurandhar 2 Box Office Report Sunday | रणवीर सिंह की फिल्म ने चौथे दिन पठान और जवान को पछाड़ा, जानें कितनी की कमाई? कहानी (The Plot)फिल्म की कहानी 'भगत सिंह' (पवन कल्याण) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक दबंग और ईमानदार पुलिस अधिकारी है। उसकी पोस्टिंग एक ऐसे पुराने शहर के पुलिस स्टेशन में होती है जो अपराध और स्थानीय गुंडों का गढ़ है। भगत सिंह का अपना एक अलग अंदाज है- वह कानून को अपने तरीके से लागू करता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब उसका सामना एक शक्तिशाली राजनीतिक रसूख वाले विलेन से होता है। यह सिर्फ एक पुलिस-चोर की लड़ाई नहीं है, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक 'उस्ताद' की जंग है। इसे भी पढ़ें: Shilpa Shetty ने समोसे को बताया 'त्रिमुखी फल', फायदे गिनाकर पूछा- 'एक और खालू?' Funny Video वायरलकमजोर लेखन और बेमेल संवादफिल्म का लेखन काफी पुराना (Dated) महसूस होता है। दृश्य एक-दूसरे में प्रवाहित नहीं होते, बल्कि वे बस 'मौजूद' हैं। बातचीत में कोई स्वाभाविक जुड़ाव नहीं है; संवाद अक्सर सार्थक बातचीत के बजाय केवल पंचलाइनों या 'लेक्चर' के लिए सेटअप की तरह लगते हैं। निर्देशक ने 'गब्बर सिंह' वाली 'थिक्का-लेक्का' लय को पकड़ने की कोशिश की है, लेकिन उस मौलिकता और टाइमिंग की कमी खली जो उस फिल्म को खास बनाती थी। एक दृश्य में तो कोई अचानक पूछता है कि "जय श्री राम" का अर्थ क्या है-जिज्ञासावश नहीं, बल्कि इसलिए ताकि नायक को पौराणिक कथाओं से लदा एक लंबा मोनोलॉग (भाषण) देने का मौका मिल सके।पवन कल्याण: फिल्म की एकमात्र ढालईमानदारी से कहें तो, पवन कल्याण यहाँ अपने पुराने फॉर्म में हैं। पिछले कुछ गंभीर किरदारों के बाद, वे यहाँ अधिक सहज और चंचल नजर आते हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म के कई सुस्त हिस्सों को झेलने लायक बनाता है। उनकी कॉमेडी टाइमिंग और सहजता ही फिल्म को कुछ हिस्सों में डूबने से बचाती है। हालाँकि, उनके किरदार में कुछ अजीब और दोहराव वाले गुण भी हैं, जैसे हर कुछ मिनटों में जमीन पर गोलियां चलाना, जो एक समय के बाद किरदार की खूबी के बजाय एक परेशान करने वाली आदत लगने लगती है।निर्देशन और सहयोगी कलाकारनिर्देशक हरीश शंकर ने इसे 'गब्बर सिंह' के आध्यात्मिक विस्तार (Spiritual Extension) के रूप में पेश करने की कोशिश की है, लेकिन वे पुराने उपकरणों को अपडेट करना भूल गए। परिणाम स्वरूप, फिल्म अतीत में फंसी हुई महसूस होती है।श्री लीला: उनके पास वही परिचित 'बबली' रोल है जिसके बारे में पहले से अंदाजा लगाया जा सकता है।राशी खन्ना: वे एक संक्षिप्त भूमिका में आती हैं और बिना किसी प्रभाव के गायब हो जाती हैं।आर. पार्थिबन: खलनायक के रूप में उनकी मौजूदगी तो है, लेकिन किरदार में गहराई की कमी के कारण संघर्ष (Conflict) कमजोर लगता है।तकनीकी पक्ष और संगीतदेवी श्री प्रसाद (DSP) का संगीत उस स्तर का नहीं है जिसकी उम्मीद इस सुपरहिट जोड़ी से की जाती है। बैकग्राउंड स्कोर भी शोर से भरा और पुराना लगता है। सिनेमैटोग्राफी कुछ हिस्सों में ठीक है, लेकिन फिल्म की ओवरऑल प्रेजेंटेशन आधुनिक सिनेमा के मानकों से काफी पीछे है।अंतिम फैसला'उस्ताद भगत सिंह' उन प्रशंसकों के लिए तो एक उत्सव हो सकती है जो सिर्फ पवन कल्याण को पर्दे पर एक्शन करते देखना चाहते हैं, लेकिन एक सिनेमा प्रेमी के तौर पर यह निराश करती है। यह फिल्म इस बात का सबूत है कि केवल स्टार पावर और पुराने फॉर्मूले के सहारे एक अच्छी फिल्म नहीं बनाई जा सकती।रेटिंग: 2.5/5 स्टार

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Mar 23, 2026 - 21:49
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Ustaad Bhagat Singh Review: मनोरंजन के नाम पर पुराना फॉर्मूला और घिसी-पिटी कहानी, क्या सिर्फ 'स्वैग' काफी है?
सिनेमा जगत में अब यह एक अघोषित नियम बन चुका है—"तर्क (Logic) की उम्मीद मत करो, बस मनोरंजन देखो।" कमर्शियल सिनेमा ने धीरे-धीरे दर्शकों को कम में संतोष करना सिखा दिया है। पहले फिल्मों से तर्क गायब हुआ, फिर कहानी, और अब तो बुनियादी फिल्म निर्माण की सुसंगतता (Coherence) भी वैकल्पिक लगने लगी है। जब थिएटर के बाहर सब कुछ छोड़ देने की सलाह दी जाती है, तो सवाल उठता है कि अंदर बचता क्या है? जवाब साफ है: केवल वफादार प्रशंसक, जो अपने पसंदीदा स्टार की एक झलक और पुरानी यादों के सहारे पूरी फिल्म झेल जाते हैं। पवन कल्याण स्टारर और हरीश शंकर निर्देशित 'उस्ताद भगत सिंह' भी इसी श्रेणी की फिल्म है, जो उम्मीदों पर खरी उतरने के बजाय उन्हीं डर को सच साबित करती है जो एक घिसे-पिटे कमर्शियल प्रोडक्ट से होते हैं।

इसे भी पढ़ें: Dhurandhar 2 Box Office Report Sunday | रणवीर सिंह की फिल्म ने चौथे दिन पठान और जवान को पछाड़ा, जानें कितनी की कमाई?

 

कहानी (The Plot)

फिल्म की कहानी 'भगत सिंह' (पवन कल्याण) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक दबंग और ईमानदार पुलिस अधिकारी है। उसकी पोस्टिंग एक ऐसे पुराने शहर के पुलिस स्टेशन में होती है जो अपराध और स्थानीय गुंडों का गढ़ है। भगत सिंह का अपना एक अलग अंदाज है- वह कानून को अपने तरीके से लागू करता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब उसका सामना एक शक्तिशाली राजनीतिक रसूख वाले विलेन से होता है। यह सिर्फ एक पुलिस-चोर की लड़ाई नहीं है, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक 'उस्ताद' की जंग है।

 

इसे भी पढ़ें: Shilpa Shetty ने समोसे को बताया 'त्रिमुखी फल', फायदे गिनाकर पूछा- 'एक और खालू?' Funny Video वायरल


कमजोर लेखन और बेमेल संवाद

फिल्म का लेखन काफी पुराना (Dated) महसूस होता है। दृश्य एक-दूसरे में प्रवाहित नहीं होते, बल्कि वे बस 'मौजूद' हैं। बातचीत में कोई स्वाभाविक जुड़ाव नहीं है; संवाद अक्सर सार्थक बातचीत के बजाय केवल पंचलाइनों या 'लेक्चर' के लिए सेटअप की तरह लगते हैं। निर्देशक ने 'गब्बर सिंह' वाली 'थिक्का-लेक्का' लय को पकड़ने की कोशिश की है, लेकिन उस मौलिकता और टाइमिंग की कमी खली जो उस फिल्म को खास बनाती थी। एक दृश्य में तो कोई अचानक पूछता है कि "जय श्री राम" का अर्थ क्या है-जिज्ञासावश नहीं, बल्कि इसलिए ताकि नायक को पौराणिक कथाओं से लदा एक लंबा मोनोलॉग (भाषण) देने का मौका मिल सके।

पवन कल्याण: फिल्म की एकमात्र ढाल

ईमानदारी से कहें तो, पवन कल्याण यहाँ अपने पुराने फॉर्म में हैं। पिछले कुछ गंभीर किरदारों के बाद, वे यहाँ अधिक सहज और चंचल नजर आते हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म के कई सुस्त हिस्सों को झेलने लायक बनाता है। उनकी कॉमेडी टाइमिंग और सहजता ही फिल्म को कुछ हिस्सों में डूबने से बचाती है। हालाँकि, उनके किरदार में कुछ अजीब और दोहराव वाले गुण भी हैं, जैसे हर कुछ मिनटों में जमीन पर गोलियां चलाना, जो एक समय के बाद किरदार की खूबी के बजाय एक परेशान करने वाली आदत लगने लगती है।


निर्देशन और सहयोगी कलाकार

निर्देशक हरीश शंकर ने इसे 'गब्बर सिंह' के आध्यात्मिक विस्तार (Spiritual Extension) के रूप में पेश करने की कोशिश की है, लेकिन वे पुराने उपकरणों को अपडेट करना भूल गए। परिणाम स्वरूप, फिल्म अतीत में फंसी हुई महसूस होती है।
श्री लीला: उनके पास वही परिचित 'बबली' रोल है जिसके बारे में पहले से अंदाजा लगाया जा सकता है।
राशी खन्ना: वे एक संक्षिप्त भूमिका में आती हैं और बिना किसी प्रभाव के गायब हो जाती हैं।
आर. पार्थिबन: खलनायक के रूप में उनकी मौजूदगी तो है, लेकिन किरदार में गहराई की कमी के कारण संघर्ष (Conflict) कमजोर लगता है।

तकनीकी पक्ष और संगीत

देवी श्री प्रसाद (DSP) का संगीत उस स्तर का नहीं है जिसकी उम्मीद इस सुपरहिट जोड़ी से की जाती है। बैकग्राउंड स्कोर भी शोर से भरा और पुराना लगता है। सिनेमैटोग्राफी कुछ हिस्सों में ठीक है, लेकिन फिल्म की ओवरऑल प्रेजेंटेशन आधुनिक सिनेमा के मानकों से काफी पीछे है।

अंतिम फैसला

'उस्ताद भगत सिंह' उन प्रशंसकों के लिए तो एक उत्सव हो सकती है जो सिर्फ पवन कल्याण को पर्दे पर एक्शन करते देखना चाहते हैं, लेकिन एक सिनेमा प्रेमी के तौर पर यह निराश करती है। यह फिल्म इस बात का सबूत है कि केवल स्टार पावर और पुराने फॉर्मूले के सहारे एक अच्छी फिल्म नहीं बनाई जा सकती।

रेटिंग: 2.5/5 स्टार

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