Ravidas Jayanti 2026: 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का संदेश देने वाले Sant Ravidas क्यों आज भी प्रासंगिक हैं?

रविदास जयंती महान संत, समाज सुधारक और भक्त कवि संत रविदास की स्मृति में मनाई जाती है। यह जयंती माघ मास की पूर्णिमा को आती है और विशेष रूप से उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े श्रद्धा भाव से मनाई जाती है। संत रविदास केवल एक संत ही नहीं थे, बल्कि वे उस सामाजिक चेतना के प्रतीक थे जिसने भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया और जाति-भेद, ऊँच-नीच जैसी कुरीतियों को चुनौती दी।संत रविदास का जीवन परिचयसंत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) में माना जाता है। वे एक चर्मकार परिवार में जन्मे थे, जिसे उस समय समाज में निम्न समझा जाता था। किंतु अपनी आध्यात्मिक साधना, ज्ञान और करुणा से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति और मानवता किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं होती। बचपन से ही उनमें ईश्वर भक्ति की गहरी भावना थी। वह अपने कार्य को ईमानदारी से करते हुए भी राम नाम का स्मरण करते रहते थे। रविदास जी निर्गुण भक्ति के उपासक थे। वह मानते थे कि ईश्वर निराकार है और सच्ची भक्ति प्रेम, सत्य और करुणा से होती है, न कि बाहरी आडंबर से।इसे भी पढ़ें: Paramahansa Yogananda Birth Anniversary: भारतीय योगी और आध्यात्मिक गुरु थे परमहंस योगानंद, छोटी उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभवभक्ति आंदोलन में संत रविदास का योगदानसंत रविदास भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उन्होंने सरल भाषा में ऐसे पदों की रचना की जो आम जनमानस को सहज ही समझ में आ जाते थे। उनके भजन और दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनका प्रसिद्ध कथन— “मन चंगा तो कठौती में गंगा”, यह संदेश देता है कि मन की पवित्रता ही सबसे बड़ा तीर्थ है।गुरु ग्रंथ साहिब में भी संत रविदास के अनेक पद संकलित हैं, जो उनकी महानता और व्यापक प्रभाव को दर्शाते हैं। वे केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके विचारों ने सभी धर्मों और वर्गों के लोगों को प्रभावित किया।सामाजिक समानता और मानवता का संदेशसंत रविदास का सबसे बड़ा योगदान सामाजिक समानता का संदेश है। उन्होंने खुलकर जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया। उनके अनुसार सभी मनुष्य समान हैं और ईश्वर की दृष्टि में कोई ऊँच-नीच नहीं है। उन्होंने ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ प्रेम, समानता और न्याय हो। उनका “बेगमपुरा” का विचार एक आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, ऐसा नगर जहाँ कोई दुख, भय या भेदभाव न हो। आज के समय में, जब समाज में फिर से असमानता और वैमनस्य की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, संत रविदास के विचार हमें सही दिशा दिखाते हैं।रविदास जयंती का आयोजनरविदास जयंती के अवसर पर देशभर में प्रभात फेरियाँ, भजन-कीर्तन, सत्संग और शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। श्रद्धालु संत रविदास के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। उनके जीवन और उपदेशों पर प्रवचन होते हैं तथा लंगर और सेवा कार्यों का आयोजन किया जाता है। इस दिन लोग आपसी भाईचारे और सेवा भावना को विशेष रूप से अपनाने का संकल्प लेते हैं। वाराणसी स्थित श्री गुरु रविदास जन्मस्थली मंदिर में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं, जहाँ देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं।आज के संदर्भ में रविदास जयंती का महत्वरविदास जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना का उत्सव है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति वही है जो मानव को मानव से जोड़ती है। संत रविदास का जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यदि विचार ऊँचे हों तो व्यक्ति समाज को नई दिशा दे सकता है। संत रविदास ने अपने विचारों, भक्ति और आचरण से समाज में प्रेम, समरसता और समानता की अलख जगाई। रविदास जयंती हमें उनके दिखाए मार्ग पर चलने, भेदभाव त्यागने और मानवता को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देती है। 

PNSPNS
Feb 1, 2026 - 21:58
 0
Ravidas Jayanti 2026: 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का संदेश देने वाले Sant Ravidas क्यों आज भी प्रासंगिक हैं?
रविदास जयंती महान संत, समाज सुधारक और भक्त कवि संत रविदास की स्मृति में मनाई जाती है। यह जयंती माघ मास की पूर्णिमा को आती है और विशेष रूप से उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े श्रद्धा भाव से मनाई जाती है। संत रविदास केवल एक संत ही नहीं थे, बल्कि वे उस सामाजिक चेतना के प्रतीक थे जिसने भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया और जाति-भेद, ऊँच-नीच जैसी कुरीतियों को चुनौती दी।

संत रविदास का जीवन परिचय


संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) में माना जाता है। वे एक चर्मकार परिवार में जन्मे थे, जिसे उस समय समाज में निम्न समझा जाता था। किंतु अपनी आध्यात्मिक साधना, ज्ञान और करुणा से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति और मानवता किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं होती। बचपन से ही उनमें ईश्वर भक्ति की गहरी भावना थी। वह अपने कार्य को ईमानदारी से करते हुए भी राम नाम का स्मरण करते रहते थे। रविदास जी निर्गुण भक्ति के उपासक थे। वह मानते थे कि ईश्वर निराकार है और सच्ची भक्ति प्रेम, सत्य और करुणा से होती है, न कि बाहरी आडंबर से।

इसे भी पढ़ें: Paramahansa Yogananda Birth Anniversary: भारतीय योगी और आध्यात्मिक गुरु थे परमहंस योगानंद, छोटी उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभव

भक्ति आंदोलन में संत रविदास का योगदान


संत रविदास भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उन्होंने सरल भाषा में ऐसे पदों की रचना की जो आम जनमानस को सहज ही समझ में आ जाते थे। उनके भजन और दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनका प्रसिद्ध कथन— “मन चंगा तो कठौती में गंगा”, यह संदेश देता है कि मन की पवित्रता ही सबसे बड़ा तीर्थ है।

गुरु ग्रंथ साहिब में भी संत रविदास के अनेक पद संकलित हैं, जो उनकी महानता और व्यापक प्रभाव को दर्शाते हैं। वे केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके विचारों ने सभी धर्मों और वर्गों के लोगों को प्रभावित किया।

सामाजिक समानता और मानवता का संदेश


संत रविदास का सबसे बड़ा योगदान सामाजिक समानता का संदेश है। उन्होंने खुलकर जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया। उनके अनुसार सभी मनुष्य समान हैं और ईश्वर की दृष्टि में कोई ऊँच-नीच नहीं है। उन्होंने ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ प्रेम, समानता और न्याय हो। उनका “बेगमपुरा” का विचार एक आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, ऐसा नगर जहाँ कोई दुख, भय या भेदभाव न हो। आज के समय में, जब समाज में फिर से असमानता और वैमनस्य की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, संत रविदास के विचार हमें सही दिशा दिखाते हैं।

रविदास जयंती का आयोजन


रविदास जयंती के अवसर पर देशभर में प्रभात फेरियाँ, भजन-कीर्तन, सत्संग और शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। श्रद्धालु संत रविदास के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। उनके जीवन और उपदेशों पर प्रवचन होते हैं तथा लंगर और सेवा कार्यों का आयोजन किया जाता है। इस दिन लोग आपसी भाईचारे और सेवा भावना को विशेष रूप से अपनाने का संकल्प लेते हैं। वाराणसी स्थित श्री गुरु रविदास जन्मस्थली मंदिर में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं, जहाँ देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं।

आज के संदर्भ में रविदास जयंती का महत्व


रविदास जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना का उत्सव है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति वही है जो मानव को मानव से जोड़ती है। संत रविदास का जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यदि विचार ऊँचे हों तो व्यक्ति समाज को नई दिशा दे सकता है। संत रविदास ने अपने विचारों, भक्ति और आचरण से समाज में प्रेम, समरसता और समानता की अलख जगाई। रविदास जयंती हमें उनके दिखाए मार्ग पर चलने, भेदभाव त्यागने और मानवता को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देती है। 

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow