Iran-US War में चीन को मिल गया मौका, ताइवान की घेराबंदी? ट्रंप हैरान!

मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध ने दुनिया की राजनीति को हिला कर रख दिया है। लेकिन इस युद्ध के बीच एक और बड़ा सवाल तेजी से उठ रहा है। क्या चीन इस मौके का फायदा उठाकर ताइवान पर हमला कर सकता है?  जब भी अमेरिका किसी बड़े युद्ध में उलझा है, चीन ने कई बार रणनीतिक मौके तलाशने की कोशिश की। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग दिखाई दे रही है। दरअसल अमेरिका का ध्यान भले ही मध्य पूर्व की ओर चला गया हो, लेकिन चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाने की बजाय उल्टा कम कर दिया।इसे भी पढ़ें: अब आएगा पेट्रो रुपया? ईरान ने अमेरिका के Petro Dollar की बजाई बैंडदरअसल, सोशल मीडिया पर स्ट्रेटेजिक एक्सपर्ट्स के बीच इन दिनों एक बड़ी बहस चल रही है। बहुत से लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में लगा देता है तो क्या चीन ताइवान के खिलाफ कोई भी बड़ा कदम उठा सकता है? इस सवाल के पीछे इतिहास का एक उदाहरण भी मौजूद है। दरअसल 1958 में चीन के नेता माओ ने किनमेन और मार्क्सू द्वीपों पर गोलाबारी की थी। यह द्वीप चीन के तट के बेहद करीब है। लेकिन आज भी ताइवान के नियंत्रण में है। उस समय अमेरिका लेबनान में सैन्य अभियान चला रहा था। माओ ने उस समय ताइवान और लेबनान को दो फंदे बताए थे। यानी ऐसे मोर्चे जो अमेरिका को अलग-अलग दिशाओं में उलझा सकते थे।इसे भी पढ़ें: इजरायल ने लड़ाकू विमान से क्यों गिराएं हजारों कागज? भारत भी रह गया हैरान!बता दें इसके बावजूद 2026 की स्थिति 1958 से काफी अलग दिखाई दे रही है। लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल के बढ़ते टकराव के बावजूद चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियों को तेज करने की बजाय और भी ज्यादा कम कर दिया है। ताइवान के एयर डिफेंस ज़ोन में मार्च महीने में अब तक सिर्फ दो चीनी लड़ाकू विमान देखे गए हैं। हाल ही के सालों में यह सबसे कम घुसपैठ का रिकॉर्ड माना जा रहा है। अब यह सवाल उठ रहा है कि चीन अचानक इतना शांत क्यों दिखाई दे रहा है? कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे एक बड़ा कूटनीतिक कारण हो सकता है। इसे भी पढ़ें: Indo Pacific में भारत कैसे बनता जा रहा है सबसे बड़ी रणनीतिक शक्ति?दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा प्रस्तावित बताई जा रही है और बीजिंग इस दौरे से पहले तनाव कम करने की रणनीति अपना सकता है। चीन शायद यह संदेश देना चाहता है कि फिलहाल वो ताइवान के मुद्दे को सैन्य ताकत से नहीं बल्कि बातचीत के जरिए संभालना चाहता है। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। एक बड़ा कारण ऊर्जा सुरक्षा भी हो सकता है। अमेरिका ने हाल के समय में वेनेजुला और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों पर दबाव बढ़ाया था और इसका सीधा-सीधा असर चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। आंकड़ों के मुताबिक 2025 में चीन ने वेनेजुला से रोज करीब 4.63 लाख बैरल तेल आयात किया था जो उसके कुल आयात का लगभग 7% था। वहीं ईरान से चीन को और भी ज्यादा बड़ा तेल सपोर्ट मिलता है। अभी के लिए चीन जरूर हमें शांत दिखाई दे रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शांति अक्सर तूफान से पहले की खामोशी भूख सकती है। 

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Mar 17, 2026 - 10:41
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Iran-US War में चीन को मिल गया मौका, ताइवान की घेराबंदी? ट्रंप हैरान!
मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध ने दुनिया की राजनीति को हिला कर रख दिया है। लेकिन इस युद्ध के बीच एक और बड़ा सवाल तेजी से उठ रहा है। क्या चीन इस मौके का फायदा उठाकर ताइवान पर हमला कर सकता है?  जब भी अमेरिका किसी बड़े युद्ध में उलझा है, चीन ने कई बार रणनीतिक मौके तलाशने की कोशिश की। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग दिखाई दे रही है। दरअसल अमेरिका का ध्यान भले ही मध्य पूर्व की ओर चला गया हो, लेकिन चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाने की बजाय उल्टा कम कर दिया।

इसे भी पढ़ें: अब आएगा पेट्रो रुपया? ईरान ने अमेरिका के Petro Dollar की बजाई बैंड

दरअसल, सोशल मीडिया पर स्ट्रेटेजिक एक्सपर्ट्स के बीच इन दिनों एक बड़ी बहस चल रही है। बहुत से लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में लगा देता है तो क्या चीन ताइवान के खिलाफ कोई भी बड़ा कदम उठा सकता है? इस सवाल के पीछे इतिहास का एक उदाहरण भी मौजूद है। दरअसल 1958 में चीन के नेता माओ ने किनमेन और मार्क्सू द्वीपों पर गोलाबारी की थी। यह द्वीप चीन के तट के बेहद करीब है। लेकिन आज भी ताइवान के नियंत्रण में है। उस समय अमेरिका लेबनान में सैन्य अभियान चला रहा था। माओ ने उस समय ताइवान और लेबनान को दो फंदे बताए थे। यानी ऐसे मोर्चे जो अमेरिका को अलग-अलग दिशाओं में उलझा सकते थे।

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बता दें इसके बावजूद 2026 की स्थिति 1958 से काफी अलग दिखाई दे रही है। लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल के बढ़ते टकराव के बावजूद चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियों को तेज करने की बजाय और भी ज्यादा कम कर दिया है। ताइवान के एयर डिफेंस ज़ोन में मार्च महीने में अब तक सिर्फ दो चीनी लड़ाकू विमान देखे गए हैं। हाल ही के सालों में यह सबसे कम घुसपैठ का रिकॉर्ड माना जा रहा है। अब यह सवाल उठ रहा है कि चीन अचानक इतना शांत क्यों दिखाई दे रहा है? कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे एक बड़ा कूटनीतिक कारण हो सकता है। 

इसे भी पढ़ें: Indo Pacific में भारत कैसे बनता जा रहा है सबसे बड़ी रणनीतिक शक्ति?

दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा प्रस्तावित बताई जा रही है और बीजिंग इस दौरे से पहले तनाव कम करने की रणनीति अपना सकता है। चीन शायद यह संदेश देना चाहता है कि फिलहाल वो ताइवान के मुद्दे को सैन्य ताकत से नहीं बल्कि बातचीत के जरिए संभालना चाहता है। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। एक बड़ा कारण ऊर्जा सुरक्षा भी हो सकता है। अमेरिका ने हाल के समय में वेनेजुला और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों पर दबाव बढ़ाया था और इसका सीधा-सीधा असर चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। आंकड़ों के मुताबिक 2025 में चीन ने वेनेजुला से रोज करीब 4.63 लाख बैरल तेल आयात किया था जो उसके कुल आयात का लगभग 7% था। वहीं ईरान से चीन को और भी ज्यादा बड़ा तेल सपोर्ट मिलता है। अभी के लिए चीन जरूर हमें शांत दिखाई दे रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शांति अक्सर तूफान से पहले की खामोशी भूख सकती है। 

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