युद्ध में फंसे नेतन्याहू, ईरानी मिसाइलों की बारिश से दहल उठा इजरायल

मिडिल ईस्ट में इस वक्त आग लगी हुई है और इसी बीच यूएन के मंच पर जो भी हुआ वो सुनकर दुनिया के समीकरण बदल जाएंगे। भारत और ईरान साथ-साथ यूएन में एक ही खेमे में नजर आए। एक तरफ ईरान है, दूसरी तरफ अमेरिका और इजराइल है। मिसाइलें चल रही हैं। बयानबाजी अपने चरम पर है और दुनिया को लग रहा है कि मामला और बिगड़ सकता है। लेकिन इसी जंग के बीच एक ऐसा फैसला हुआ है जिसने पूरी दुनिया की राजनीति का रुख बदल दिया है। कहते हैं सच चाहे जितना भी दबाव एक दिन मंच पर आ ही जाता है। इस बार वो मंच था यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली। जहां इतिहास का हिसाब मांगा गया। मामला था गुलामी और अटलांटिक दास व्यापार का। एक ऐसा कालाध्याय जिसने लाखों अफ्रीकियों को इंसान से संपत्ति बना दिया। करीब 60 देशों ने मिलकर प्रस्ताव रखा कि गुलामी सिर्फ इतिहास नहीं मानवता के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध है। 123 देशों ने समर्थन किया। सिर्फ तीन ने विरोध किया और बता दें कि 52 देश चुप रहे जिनमें विरोध पर थे यूनाइटेड स्टेट्स, इजराइल और अर्जेंटीना। यानी दुनिया एक तरफ और ये तीन देश दूसरी तरफ। इसे भी पढ़ें: वैश्विक संकट के बीच मानवता की अंतिम सुरक्षा-रेखा है ऊर्जा संरक्षणअब सवाल यहां यह उठता है क्या इस सब में इंडिया का रोल क्या था? तो बता दें कि भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया यानी कि भारत ने इतिहास के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और एक मजबूत स्वतंत्र स्टैंड लिया। लेकिन असली कहानी यहीं पलट जाती है क्योंकि यह वोटिंग ऐसे वक्त में हुई है जब जंग अपने चरम पर है। एक तरफ ईरान और दूसरी तरफ अमेरिका और इजराइल। यूएन में भारत और ईरान एक ही तरफ खड़े हुए। दोनों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। यानी आसान भाषा में कहें तो वैश्विक मंच पर भारत और ईरान कई मुद्दों पर एक ही विचार रख रहे हैं। तो वहीं उधर रशिया और चीन भी इस समय भारत ईरान के साथ खड़े हुए नजर आए। अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका इस प्रस्ताव के विरोध में क्यों था? तो दरअसल इसकी तीन बड़ी वजह हैं। पहला मुआवजे का डर, कानूनी असर और नैरेटिव पर कंट्रोल और यही अमेरिका जानता है कि अगर वो यह प्रस्ताव मान लेता है तो इतिहास का हिसाब अमेरिका को देना पड़ेगा।इसे भी पढ़ें: Iran Missile Attack: सऊदी अरब में US बेस पर भीषण हमला, 10 अमेरिकी सैनिक घायल, कई विमान तबाहवहीं बता दें कि यूएन प्रमुख अटोनियो गटरेस ने साफ कह दिया है कि लाखों लोगों को उनके घरों से छीन लिया गया और हर सात में से एक रास्ते में ही मर गया। अब यहां भारत की चाल अगर हम समझते हैं तो बता दें भारत ईरान के साथ कुछ मुद्दों पर खड़ा हुआ है। पश्चिम से रिश्ते भ बरकरार रख रहा है भारत और अपने हित भी सबसे ऊपर इस समय भारत में रखे हुए हैं। यानी सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे यह आज भारत ने दिखा दिया है। आज यूएन में जो भी हुआ वो सिर्फ एक वोट नहीं था। यह था बदलती दुनिया का संकेत। जहां यूनाइटेड स्टेट्स कुछ हद तक अलग दिखा, इंडिया संतुलित दिखा लेकिन मजबूत दिखा। और ईरान ने जंग के बीच भी कूटनीतिक मौके का फायदा उठाया।

PNSPNS
Mar 29, 2026 - 12:02
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युद्ध में फंसे नेतन्याहू, ईरानी मिसाइलों की बारिश से दहल उठा इजरायल
मिडिल ईस्ट में इस वक्त आग लगी हुई है और इसी बीच यूएन के मंच पर जो भी हुआ वो सुनकर दुनिया के समीकरण बदल जाएंगे। भारत और ईरान साथ-साथ यूएन में एक ही खेमे में नजर आए। एक तरफ ईरान है, दूसरी तरफ अमेरिका और इजराइल है। मिसाइलें चल रही हैं। बयानबाजी अपने चरम पर है और दुनिया को लग रहा है कि मामला और बिगड़ सकता है। लेकिन इसी जंग के बीच एक ऐसा फैसला हुआ है जिसने पूरी दुनिया की राजनीति का रुख बदल दिया है। कहते हैं सच चाहे जितना भी दबाव एक दिन मंच पर आ ही जाता है। इस बार वो मंच था यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली। जहां इतिहास का हिसाब मांगा गया। मामला था गुलामी और अटलांटिक दास व्यापार का। एक ऐसा कालाध्याय जिसने लाखों अफ्रीकियों को इंसान से संपत्ति बना दिया। करीब 60 देशों ने मिलकर प्रस्ताव रखा कि गुलामी सिर्फ इतिहास नहीं मानवता के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध है। 123 देशों ने समर्थन किया। सिर्फ तीन ने विरोध किया और बता दें कि 52 देश चुप रहे जिनमें विरोध पर थे यूनाइटेड स्टेट्स, इजराइल और अर्जेंटीना। यानी दुनिया एक तरफ और ये तीन देश दूसरी तरफ। 

इसे भी पढ़ें: वैश्विक संकट के बीच मानवता की अंतिम सुरक्षा-रेखा है ऊर्जा संरक्षण

अब सवाल यहां यह उठता है क्या इस सब में इंडिया का रोल क्या था? तो बता दें कि भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया यानी कि भारत ने इतिहास के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और एक मजबूत स्वतंत्र स्टैंड लिया। लेकिन असली कहानी यहीं पलट जाती है क्योंकि यह वोटिंग ऐसे वक्त में हुई है जब जंग अपने चरम पर है। एक तरफ ईरान और दूसरी तरफ अमेरिका और इजराइल। यूएन में भारत और ईरान एक ही तरफ खड़े हुए। दोनों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। यानी आसान भाषा में कहें तो वैश्विक मंच पर भारत और ईरान कई मुद्दों पर एक ही विचार रख रहे हैं। तो वहीं उधर रशिया और चीन भी इस समय भारत ईरान के साथ खड़े हुए नजर आए। अब सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका इस प्रस्ताव के विरोध में क्यों था? तो दरअसल इसकी तीन बड़ी वजह हैं। पहला मुआवजे का डर, कानूनी असर और नैरेटिव पर कंट्रोल और यही अमेरिका जानता है कि अगर वो यह प्रस्ताव मान लेता है तो इतिहास का हिसाब अमेरिका को देना पड़ेगा।

इसे भी पढ़ें: Iran Missile Attack: सऊदी अरब में US बेस पर भीषण हमला, 10 अमेरिकी सैनिक घायल, कई विमान तबाह

वहीं बता दें कि यूएन प्रमुख अटोनियो गटरेस ने साफ कह दिया है कि लाखों लोगों को उनके घरों से छीन लिया गया और हर सात में से एक रास्ते में ही मर गया। अब यहां भारत की चाल अगर हम समझते हैं तो बता दें भारत ईरान के साथ कुछ मुद्दों पर खड़ा हुआ है। पश्चिम से रिश्ते भ बरकरार रख रहा है भारत और अपने हित भी सबसे ऊपर इस समय भारत में रखे हुए हैं। यानी सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे यह आज भारत ने दिखा दिया है। आज यूएन में जो भी हुआ वो सिर्फ एक वोट नहीं था। यह था बदलती दुनिया का संकेत। जहां यूनाइटेड स्टेट्स कुछ हद तक अलग दिखा, इंडिया संतुलित दिखा लेकिन मजबूत दिखा। और ईरान ने जंग के बीच भी कूटनीतिक मौके का फायदा उठाया।

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