भागवत का अमेरिका दौरा: यह किसी हीरो का स्वागत तो कतई नहीं

न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के कार्यक्रम को वैश्विक सद्भाव के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन अमेरिकी आयोग की प्रतिबंधों की सिफारिश और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के कड़े विरोध ने संघ के अंतरराष्ट्रीय विस्तार और उसकी राजनीतिक वैधता पर सवाल खड़े कर दिए हैं

PNSPNS
Aug 29, 2026 - 17:10
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भागवत का अमेरिका दौरा: यह किसी हीरो का स्वागत तो कतई नहीं

25 अगस्त को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत न्यूयॉर्क पहुंचे। उसी हफ्ते बाद में (29 अगस्तो को), मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ (वैश्विक एकात्मता उत्सव) के नाम से प्रचारित कार्यक्रम में उनका मुख्य भाषण होना तय था। हालांकि, तमाम लोगों के गले से यह बात उतर नहीं पा रही। 

अभी चंद दिन पहले ही 20 अगस्त को, अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने आरएसएस के इसके नेताओं को राजनयिक शिष्टाचार और उच्च स्तरीय मुलाकातों से वंचित रखा जाए। आयोग की इस मांग का समय कोई संयोग नहीं था।

दिल्ली में मीडिया को संबोधित करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यूएससीआईआरएफ को ‘पूर्वाग्रह से ग्रस्त संस्था’ बताकर खारिज कर दिया। प्रवक्ता का कहना था, ‘हमें ऐसी संस्थाओं को नजरअंदाज करना चाहिए क्योंकि उनके अपने एजेंडे होते हैं और उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है।’

यूएससीआईआरएफ एक स्वतंत्र, द्विदलीय संघीय एजेंसी है जो वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करती है। यह अमेरिकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और अमेरिकी कांग्रेस को नीतिगत सिफारिशें भेजती है।

मार्च 2026 में प्रकाशित सालाना रिपोर्ट में, यूएससीआईआरएफ ने अमेरिकी सरकार से सिफारिश की थी कि वह, ‘धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों और उन्हें बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ-भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठनों और उनसे जुड़े लोगों पर लक्षित प्रतिबंध लगाए; इनकी संपत्तियों को जब्त किया जाए और/या अमेरिका में उनके प्रवेश पर रोक लगाई जाए।’

रॉ का संदर्भ उसके एक कथित कर्मचारी, विकास यादव, की न्यूयॉर्क में भारत विरोधी सिख चरमपंथी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की असफल साजिश में कथित संलिप्तता से जुड़ा था।

रिपोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को यह भी सिफारिश की कि वह ‘अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (आईआरएफए) के तहत परिभाषित व्यवस्थित, निरंतर और घोर धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों में शामिल होने या उन्हें बढ़ावा देने के आधार पर भारत को ‘विशेष चिंता वाले देश’ के रूप में नामित करे।’ यूएससीआईआरएफ इस श्रेणी में पाकिस्तान, चीन, उत्तर कोरिया और ईरान को भी रखता है।

इस तरह, आरएसएस पिछले कुछ समय से यूएससीआईआरएफ के निशाने पर रहा है। इसका सबसे हालिया बयान ऐसे समय आया, जब भागवत अमेरिका की यात्रा पर हैं। वास्तव में, आयोग ने ‘अमेरिकी नागरिकों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ धमकी और उत्पीड़न की लगातार कार्रवाइयों के आधार पर भारत को हथियारों की बिक्री रोकने के लिए शस्त्र निर्यात नियंत्रण अधिनियम की धारा 6 को लागू करने की सलाह भी दी है।

1925 में स्थापित आरएसएस अपने शुरुआती दिनों में हिन्दुओं के बीच बहुत अधिक पैठ नहीं बना सका था। इसने पूर्वी अफ्रीका में बसे भारतीयों के बीच अपनी किस्मत आजमाने के लिए विदेश का रुख किया।

एडवर्ड एंडरसन ‘हिन्दू नेशनलिज्म इन द इंडियन डायस्पोरा’ में लिखते हैं: ‘(भारतीय) स्वतंत्रता से एक वर्ष पहले और एक हिन्दू चरमपंथी द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंध से दो वर्ष पहले, (अमृतसर के एक आर्य समाज स्कूल के शिक्षक, जगदीश) शास्त्री अपने नए पद को संभालने के लिए बॉम्बे से मोम्बासा के लिए रवाना हुए। हिन्द महासागर के बीच एक तूफानी शाम को 'एसएस वासना' के डेक पर उनका अप्रत्याशित रूप से मणिकलाल रुघानी नामक एक गुजराती यात्री से परिचय हुआ। शास्त्री द्वारा अपनी पुस्तक ‘मेमॉयर्स ऑफ अ ग्लोबल हिन्दू’ में दर्ज यह मुलाकात, भारत के बाहर पहली शाखा की स्थापना का आधार बनी।’

पूर्वी अफ्रीका में, आरएसएस ने ‘हिन्दू स्वयंसेवक संघ’ (एचएसएस) नामक एक सहयोगी संगठन के रूप में काम शुरू किया। 1970 के दशक के शुरू में, जब युगांडा, केन्या और तंजानिया में भारतीय मूल के लोगों को बड़े पैमाने पर निष्कासन झेलना पड़ा और वे ब्रिटेन व अमेरिका चले गए, तो वे ये देश भी एचएसएस के लिए एक उपजाऊ जमीन साबित हुए। आज, ब्रिटेन में एचएसएस की सौ से अधिक शाखाएं/गतिविधि केन्द्र हैं और अमेरिका में लगभग 270 शाखाएं सक्रिय हैं।

1984 में, लोकसभा की 543 सीटों में से बीजेपी के पास महज दो सीटें थीं। यहां तक कि भारत में पार्टी के सबसे कट्टर समर्थक भी उसे आगे वित्तीय सहारा देने को तैयार नहीं थे। राजनीतिक वनवास के इस दौर में, भाजपा ने आरएसएस के माध्यम से एचएसएस का रुख किया, ताकि पश्चिम में पूरी तरह बस चुके और समृद्ध हो रहे पूर्व पूर्वी अफ्रीकी हिन्दुओं से संपर्क साधा जा सके। इन पूर्वी अफ्रीकी भारतीयों-जिनमें मुख्य रूप से गुजराती थे-ने उदारतापूर्वक बीजेपी के खजाने को भरकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

आज तक, आरएसएस भारत में एक गैर-पंजीकृत संस्था है; यह खुद को ‘व्यक्तियों का एक समूह’ कहता है। हालांकि, एचएसएस (अमेरिकी आंतरिक राजस्व सेवा के लिए हिन्दू स्वयंसेवक संघ यूएसए, इंक.) एक गैर-लाभकारी संस्था (नॉन-प्रॉफिट) के रूप में पंजीकृत है। अमेरिकी प्रशासन के समक्ष घोषित इसका उद्देश्य ‘हिन्दू मूल्यों और सेवा के मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक गतिविधियां संचालित करना’ है। इस दिखावे से इतर, इसे व्यापक रूप से आरएसएस की विदेशी शाखा माना जाता है, जिसे आम तौर पर एक दक्षिणपंथी हिन्दू राष्ट्रवादी अर्धसैनिक संगठन के रूप में वर्णित किया जाता है।

'यूरोपियन कंसोर्टियम फॉर पॉलिटिकल रिसर्च' के एक ब्लॉग ने आरएसएस को ‘इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे अमीर और सबसे सफल धुर-दक्षिणपंथी नेटवर्क’ बताया। इसने इस बात का भी जिक्र किया कि आरएसएस ने पिछले साल अपने शताब्दी वर्ष के मौके पर अमेरिकी सांसदों के बीच संपर्क अभियान चलाने के लिए गुप्त रूप से लॉबिंग फर्म ‘स्क्वॉयर पैटन बॉग्स’ को नियुक्त किया था, जिसके लिए उसे 3,30,000 डॉलर का भुगतान किया गया था।

एक अमेरिकी समाचार आउटलेट ‘प्रिज्म’ ने रिपोर्ट दी कि पीआर कंपनी ने इस सौदे के उजागर होते ही अभियान को खत्म कर दिया। हालांकि आरएसएस ने आधिकारिक तौर पर इस फर्म की सेवाएं लेने से इनकार किया है।

‘हिन्दूज फॉर अमेरिका फर्स्ट’ ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान में भारतीय मूल की डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कमला हैरिस के मुकाबले डॉनल्ड ट्रंप का समर्थन किया था। ‘रिपब्लिकन हिन्दू गठबंधन’ ने ट्रंप के धन जुटाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संबंधों का मतलब यह था कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की यूएससीआईआरएफ की सिफारिश व्हाइट हाउस में अनसुनी कर दी गई।

इस सिफारिश के बारे में पूछे जाने पर, अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा: ‘यूएससीआईआरएफ एक स्वतंत्र अमेरिकी आयोग है ... यह विदेश मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता कार्यालय (ओआईआरएफ) से पूरी तरह अलग है।’ हालांकि, उन्होंने आरएसएस पर ओआईआरएफ के रुख को स्पष्ट नहीं किया।

तीन अमेरिकी सिख संगठनों ने भी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को पत्र लिखकर भागवत को अमेरिका में प्रवेश देने से इनकार करने की मांग की। जाहिर है, इसका कोई असर नहीं हुआ।

25 अगस्त को, ‘हिन्दूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ और अन्य हिन्दू, मुस्लिम, अंतर-धार्मिक और नागरिक अधिकार संगठनों ने इस महानगर में भागवत की उपस्थिति का विरोध करने के लिए न्यूयॉर्क सिटी हॉल की सीढ़ियों पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की।

न्यूयॉर्क शहर के लोकप्रिय मेयर जोहरान ममदानी ने कहा, “मैं (मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन) रैली का समर्थन नहीं करता, लेकिन मुझे नहीं पता कि शहर के प्रशासन के पास किसी निजी कार्यक्रम को रद्द करने का कानूनी अधिकार है या नहीं।” उन्होंने यह भी कहा: ‘एक ऐसे आंदोलन को आकार लेते देखना बेहद परेशान करने वाला है जो बहिष्कारवादी सोच पर आधारित है।’

2002 के गुजरात दंगों के बाद, विदेश मंत्रालय द्वारा मोदी के अमेरिका प्रवेश पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। वास्तव में, जैसा कि कुछ साल पहले विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने स्पष्ट किया था, मोदी पर से प्रतिबंध हटाना केवल अस्थायी था और यह तब तक ही प्रभावी रहेगा जब तक वह भारत सरकार में अपने वर्तमान पद पर आसीन हैं। आरएसएस को भी यह मौजूदा सुरक्षा कवच तभी तक मिल सकता है जब तक ट्रंप सत्ता में हैं।

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