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<title>Prime News Studio &#45; : शख्सियत</title>
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<description>Prime News Studio &#45; : शख्सियत</description>
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<title>Bob Marley Death Anniversary: &amp;apos;Exodus&amp;apos; Album से बने थे Global Star, जानिए Reggae किंग के संघर्ष की अनसुनी कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 11 मई को जमैका के मशहूर गायक और संगीतकार बॉब मार्ले का निधन हो गया था। उनकी लोकप्रियता भारत में भी काफी देखने को मिलती है। बॉब मार्ले को लंबे संघर्ष के बाद सफलता मिली थी। उन्होंने अपने शांति संदेश से भरे गानों से पूरी दुनिया में नाम कमाया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर बॉब मार्ले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारजमैका में 06 फरवरी 1945 को बॉब मार्ले का जन्म हुआ था। इनके माता-पिता ने बॉब मार्ले का नाम नेस्टा रॉबर्ट मार्ले रखा था, लेकिन पासपोर्ट में एक गलती के कारण उनका नाम रॉबर्ट नेस्टा मार्ले हो गया था।इसे भी पढ़ें: Napoleon Bonaparte Death Anniversary: France का सम्राट जिसने दिया Civil Code, Waterloo की हार के बाद हुई थी दर्दनाक मौतसिंगिंग करियरबता दें कि बॉब मार्ले ने साल 1963 में अपने करियर की शुरूआत &#039;द वेलर्स&#039; ग्रुप के साथ की थी। वहीं काफी लंबे संघर्ष के बाद साल 1977 में मार्ले का सोलो एल्बम &#039;एक्सोडस&#039; रिलीज हुआ। इस एल्बम ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। इसकी कुल 7.5 करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं।बॉब मार्ले ने अपने गानों के जरिए दुनिया की समस्याओं को उजागर किया। उनके गाने सुनने वाले लोग मार्ले के रहन-सहन और बातों से जुड़ाव महसूस करते थे। फैंस का मानना था कि सिंगर के म्यूजिक में जादू है और चाह कर भी इससे दूर नहीं जाया जा सकता है।सिंगर बॉब और उनके बैंड &#039;Wailers&#039; के आने के बाद Reggae म्यूजिक को दुनियाभर में सुना जाने लगा। पहले सिर्फ जमैका में Reggae म्यूजिक पसंद किया जाता था। वहीं किंग्सटन में बॉब को व्हाइट बॉय के नाम से जाना जाता था।मृत्युबॉब मार्ले एक धार्मिक व्यक्ति थे और साल 1977 में उनको फुटबॉल खेलने के दौरान चोट लग गई थी। जिसके बाद डॉक्टर ने उनको पैर कटवा लेने की सलाह दी थी। लेकिन धॉर्मिक चीजों के बारे में सोचते हुए बॉब ने ऐसा कराने से मना कर दिया। जिसके बाद ट्यूमर इतना ज्यादा फैल गया कि 11 मई 1981 को बॉब मार्ले की जान चली गई। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 12 May 2026 09:29:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Talat Mahmood Death Anniversary: Rafi&#45;Kishore के दौर में बनाई अलग पहचान, Talat Mahmood की &amp;apos;Silky Voice&amp;apos; का था जादू</title>
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<description><![CDATA[ गजलों के शहंशाह कहे जाने वाले तलत महमूद का 09 मई को निधन हो गया था। भावुक कर देने वाली अपनी थरथराती, कांपती और मखमली आवाज से उन्होंने सबका दिल जीत लिया था। वह अपने दौर के बेहद सम्मानित सिंगर रहे हैं। दिलों को छू लेने वाली गायकी की दम पर तलत महमूद ने अपने समकालीन सिंगरों मोहम्मद रफी, मुकेश, मन्ना डे, किशोर कुमार और हेमंत कुमार के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर तलत महमूद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के लखनऊ में 24 फरवरी 1924 को तलत महमूद का जन्म हुआ था। उनको बचपन से ही संगीत में दिलचस्पी थी। वहीं 16 साल की उम्र में तलत महमूद ने गजलें गाना शुरूकर दिया था। तब वह ऑल इंडिया रेडियो के लिए गाना गाते थे। इसके बाद तलत महमूद लखनऊ के दि मैरिस संगीत कॉलेज से संगीत की शिक्षा ली थी।इसे भी पढ़ें: Satyajit Ray Birth Anniversary: भारतीय सिनेमा के वो &#039;Master Director&#039;, जिन्हें मिला भारत रत्न और Oscarऐसे मिली ख्यातिइसके बाद एच.एम.वी द्वारा उनकी गज़लों का एक रिकॉर्ड जारी होने के बाद संगीतकारों का ध्यान उनकी ओर गया। यह रिकॉर्ड उन्होंने तपन कुमार के नाम से गाया था। लेकिन फिल्मों में तलत को पहला ब्रेक &#039;शिकस्त&#039; के गीत &#039;सपनों की सुहानी दुनिया को&#039; से मिला था। लेकिन तलत महमूद को साल 1944 में गाए उनके गीत &#039;तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी मन&#039; से मिली थी। इस कामयाबी के बाद तलत ने अभिनय की दुनिया में किस्मत आजमाने का मौका मिला। वह खूबसूरत थे और उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया। इस दौरान उन्होंने माला सिन्हा, नूतन और सुरैया जैसी दिग्गज अभिनेत्रियों के साथ काम किया। जब उनको अभिनय में बड़ी कामयाबी नहीं मिली, तो उन्होंने अपना पूरा ध्यान संगीत पर केंद्रित कर दिया था।बता दें कि तलत महमूद पहले ऐसे इंडियन सिंगर थे, जो व्यावसायिक कंसर्ट के लिए देश से बाहर विदेश गए थे। इसके बाद दुनिया भर में तमाम सिंगर्स ने कंसर्ट करने शुरूकर दिए थे। तलत महमूद ने &#039;मेरी याद में तुम न आंसू बहाना&#039;, &#039;जायें तो जायें कहां&#039;, &#039;जलते हैं जिसके लिए&#039;, &#039;फिर वही शाम वही गम&#039; और &#039;ऐ मेरे दिल कहीं और चल&#039; आदि गाने गाए हैं। भारत सरकार द्वारा उनको साल 1992 में &#039;पद्मभूषण&#039; से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 09 मई 1998 में तलत महमूद ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 09 May 2026 16:21:24 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Gopal Krishna Gokhale Birth Anniversary: Gandhi के गुरु, Congress अध्यक्ष... जानें इस Freedom Fighter की अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ महान समाज सुधारक, शिक्षाविद और नरम दल के नेता गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 09 मई को हुआ था। उनका भारत की आजादी में अहम योगदान था। गोपाल कृष्ण गोखले ने महात्मा गांधी को इंग्लैंड से भारत वापस लाने का काम किया था। वहीं उन्होंने ही लोगों में देशभक्ति की अलख जगाने का काम किया था। गोखले ने न सिर्फ शिक्षा के महत्व को समझा बल्कि उस समय देश की आजादी चल रही थी, तो जगह-जगह लाइब्रेरी बनाई और लोगों को पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गोपाल कृष्ण गोखले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवाररत्नागिरी में 09 मई को गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम कृष्ण राव गोखले और मां का नाम वलूबाई गोखले था। गोखले का मन हमेशा से राष्ट्रभक्ति में लगता था। साल 1881 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने राजाराम कॉलेज में एडमिशन लिया। लेकिन उनको एलफिस्टंन कॉलेज जाना पड़ा। उनको हर महीने स्कॉलरशिप मिला करती थी।इसे भी पढ़ें: Rabindranath Tagore Birth Anniversary: जब Gitanjali के लिए मिला Nobel Prize, दुनिया ने माना भारतीय साहित्य का लोहाकांग्रेस अध्यक्षकानून की पढ़ाई करने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले नरम दल के नेता के तौर पर काम करते रहे। वहीं साल 1905 में वह कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। साल 1907 आते-आते पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई, वैचारिक मतभेद होने के बाद गोखले गरम दल के नेता लाला लाजपत राय की रिहाई के लिए भी अभियान चलाया था। क्रांतिकारी परिवर्तनगोपाल कृष्ण गोखले ने अपने जीवन में कई क्रांतिकारी परिवर्तन किए थे। साल 1905 में भारतीय शिक्षा के विस्तार के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की। गोखले का मानना था कि वह भारतीयों को वह शिक्षा प्राप्त हो सके, जो लोगों के मन में नागरिक कर्तव्य और देशभक्ति की अलख को जगाए।गोपाल कृष्ण गोखले ने मोबाइल पुस्तकालयों और स्कूलों की भी स्थापना की थी। वहीं रात के समय गोखले औद्योगिक श्रमिकों को पढ़ाने का काम किया करते थे।मृत्युगोपाल कृष्ण गोखले का निधन 19 फरवरी 1915 को मुंबई में हुआ था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 09 May 2026 16:21:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Maharana Pratap Birth Anniversary: जब Maharana Pratap ने मुगलों की नाक में किया दम, अकबर भी नहीं तोड़ सका था गुरूर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 मई को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उन्होंने राजस्थान में राजपूतों की शान को ऐसी ऊंचाई दी, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलती है। मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप ने कभी भी गुलामी स्वीकार नहीं की थी। महाराणा प्रताप ने अपने समकालीन मुगल शासक अकबर से लोहा लेकर पूरी दुनिया को दिखा दिया था कि वह महाराणा क्यों कहे जाते हैं। उन्होंने कभी भी मुगलों के किसी भी तरह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमेवाड़ के कुंभलगढ़ में 09 मई 1540 को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम उदय सिंह द्वितीय और मां का नाम महारानी जयवंता बाई था। महाराणा प्रताप एक महावीर और युद्ध रणनीति में दक्ष थे।इसे भी पढ़ें: Guru Amardas Birth Anniversary: 73 की उम्र में बने Guru, Sati प्रथा-जातिवाद पर किया था सबसे बड़ा प्रहारगद्दी के लिए विरोधमहाराणा प्रताप ने मुगलों के बार बार हुए हमलों से मेवाड़ की रक्षा की और अपने आन बान के लिए कभी मुगलों से समझौता नहीं किया। उनको अपने पिता की गद्दी पाने के लिए अपनी सौतेली मां रानी धीरबाई के विरोध का सामना करना पड़ा था। रानी धीरबाई चाहती थीं कि उनके बेटे कुंवर जगमाल को मिले, लेकिन राज्य के मंत्री और दरबारी चाहते थे कि राणा प्रताप उनके राजा बनें। ऐसे में कुंवर जगमाल ने मेवाड़ छोड़ दिया और अकबर के संपर्क में आए। अकबर ने जगमाल को जहाजपुर की जागीर उपहार स्वरूप दे दी।ताकतवर योद्धा थे महाराणा प्रतापमहाराणा प्रताप भारत के सबसे ताकतवर योद्धा थे। उनका कद 7 फुट 5 इंच था और वह अपने साथ 80 किलो का भाला और दो तलवारें रखते थे। जिनका वजन करीब 208 किलो होता था। महाराणा का कवच 72 किलो का था। बताया जाता है कि राणा प्रताप की तलवार के एक वार से घोड़े के दो टुकड़े हो जाते थे।अकबर के छह प्रस्तावप्रताप की ताकत का अंदाजा लोगों और राजपूतों को 18 जून 1576 में हल्की घाटी के युद्ध में हुआ था। इससे पहले मुगल शासक अकबर ने प्रताप के पास 6 प्रस्ताव भेजे, लेकिन प्रताप ने अकबर की अधीनता में मेवाड़ के शासन को स्वीकार नहीं किया। जिसके बाद अकबर ने मानसिंह और असफ खान को प्रताप से युद्ध के लिए भेजा और साथ में एक विशाल सेना भेजी। प्रताप और अकबर की सेनाएं उदयपुर से करीब 40 किमी दूर हल्दीघाटी में मिलीं। भले ही इस युद्ध में मुगलों की जीत हुई, लेकिन वास्तव में वह जीत किसी की नहीं मानी गई। वहीं राणा प्रताप ने मुगलों की नाक में दम कर दिया था। मुगल इस युद्ध में प्रताप और उनके परिवार को नुकसान नहीं पहुंचा सके थे। महाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक की मौत और खुद भी घायल होने के बाद मैदान से बचकर निकलने में सफल रहे।हालांकि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप का जीवन संघर्षमय रहा। उन्होंने सेना एकत्र कर छापामार रणनीति अपनाई और दुश्मनों को चैन नहीं रहने दिया। उनकी यह रणनीति सफल रही और इस दौरान उनको भामाशाह की मदद मिली। देवगढ़ के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ का अधिकतर हिस्सा हासिल कर लिया, लेकिन वह चित्तौड़ नहीं हासिल कर सके। वहीं इसके बाद बादशाह अकबर ने भी मेवाड़ अभियान छोड़ दिया।मृत्युवहीं महाराणा प्रताप की मृत्यु 19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में चावंड में हुई थी। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 09 May 2026 16:21:22 +0530</pubDate>
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<title>Rabindranath Tagore Birth Anniversary: भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं टैगोर</title>
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<description><![CDATA[ कोलकाता में साहित्यिक माहौल वाले कुलीन धनाढ्य परिवार में 7 मई 1861 को जन्मे रवीन्द्रनाथ टैगोर एक कवि, उच्च कोटि के साहित्यकार, उपन्यासकार और नाटककार के अलावा संगीतप्रेमी, अच्छे चित्रकार तथा दार्शनिक भी थे। टैगोर एशिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें वर्ष 1913 में विश्वविख्यात महाकाव्य ‘गीतांजली’ की रचना के लिए साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। हालांकि उन्होंने यह पुरस्कार स्वयं समारोह में उपस्थित होकर ग्रहण नहीं किया था बल्कि ब्रिटेन के एक राजदूत ने यह पुरस्कार लेकर उन तक पहुंचाया था। नोबेल पुरस्कार में मिले करीब एक लाख आठ हजार रुपये की राशि टैगोर ने किसानों की बेहतरी के लिए कृषि बैंक तथा सहकारी समिति की स्थापना और भूमिहीन किसानों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल बनाने में इस्तेमाल की। टैगोर की महान रचना ‘गीतांजली’ का प्रकाशन वर्ष 1910 में हुआ था, जो उनकी 157 कविताओं का संग्रह है। इसी काव्य संग्रह को बाद में दुनिया की कई भाषाओं में प्रकाशित किया गया। मार्च 1913 में लंदन की मैकमिलन एंड कंपनी ने इसे प्रकाशित किया और 13 नवम्बर 1913 को नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले इसके दस संस्करण छापे गए।टैगोर की कुछ कविताएं तो बांग्लादेश के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भी हैं। जहां तक भारत के राष्ट्रीय गीत ‘जन गण मन’ की बात है कि इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले 27 दिसम्बर 1911 को पहली बार गाया गया था। हालांकि उस दौरान इस बात को लेकर भी कुछ विवाद चला कि कहीं उन्होंने यह गीत अंग्रेजों की प्रशंसा में तो नहीं लिखा लेकिन इसके रचयिता टैगोर ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि इस गीत में वर्णित ‘भारत भाग्य विधाता’ के केवल दो ही अर्थ हो सकते हैं, देश की जनता या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला, फिर चाहे उसे भगवान कहें या देव। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा रवीन्द्र नाथ टैगोर राष्ट्रीयता, देशभक्ति, तर्कशक्ति इत्यादि विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग राय रखते थे लेकिन दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान भी किया करते थे। साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद टैगोर को गांधीजी ने ही सर्वप्रथम ‘गुरूदेव’ कहा था जबकि गांधीजी को महात्मा की उपाधि टैगोर ने दी थी। उन्होंने 12 अप्रैल 1919 को गांधीजी को ‘महात्मा’ का सम्बोधन करते हुए एक पत्र लिखा था, उसके बाद ही गांधीजी को महात्मा कहा जाने लगा।इसे भी पढ़ें: Motilal Nehru Birth Anniversary: देश के सबसे महंगे वकील, Gandhi से एक मुलाकात और बदल गई पूरी जिंदगीमात्र आठ वर्ष की आयु में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी पहली कविता लिखी थी और 16 वर्ष की आयु में कहानियां तथा नाटक लिखना शुरू कर दिया था। बैरिस्टर बनने के सपने के साथ वह 1878 में इंग्लैंड चले गए थे लेकिन दो ही वर्ष बाद डिग्री लिए बिना ही भारत लौट आए। 1901 में सियालदह छोड़कर पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित शांतिनिकेतन में आने के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वहां प्रकृति की गोद में खुले प्राकृतिक वातावरण में वृक्षों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ केवल पांच छात्रों के साथ छोटे से ‘शांतिनिकेतन स्कूल’ की स्थापना की, जो 1921 में ‘विश्वभारती’ नाम से एक समृद्ध विश्वविद्यालय बना।। 1919 में उन्होंने शांतिनिकेतन कला के एक स्कूल ‘कला भवन’ की भी नींव रखी, जो दो साल बाद विश्वभारती विश्वविद्यालय का हिस्सा बन गया। शांतिनिकेतन में ही गुरूदेव ने अपनी कई साहित्यिक कृतियां लिखी और यहां मौजूद उनका घर आज भी ऐतिहासिक महत्व का है। उनका ज्यादातर साहित्य काव्यमय रहा और अनेक रचनाएं गीतों के रूप में प्रसिद्ध हैं। 1880 के दशक में उन्होंने कविताओं की कई पुस्तकें प्रकाशित की और 1890 में ‘मानसी’ की रचना की।कविता, गान, उपन्यास, कथा, नाटक, प्रबंध, शिल्पकला इत्यादि साहित्य की शायद ही ऐसी कोई विधा है, जिसमें उनकी रचना न हो। उनकी प्रमुख रचनाओं में गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया हैमांति, क्षुदिता, मुसलमानिर गोल्पो आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई किताबों का अनुवाद अंग्रेजी में किया, जिसके बाद उनकी रचनाएं पूरी दुनिया में पढ़ी और सराही गई। उपन्यास में गोरा, चतुरंगा, नौकादुबी, जोगजोग, घारे बायर, मुन्ने की वापसी, अंतिम प्यार, अनाथ इत्यादि गुरूदेव के कुछ प्रमुख उपन्यास हैं। इनके अलावा काबुलीवाला, मास्टर साहब, पोस्टमास्टर इत्यादि उनकी कई कहानियों को भी बेहद पसंद किया गया। अपने जीवनकाल में गुरूदेव ने करीब 2230 गीतों की रचना की और बांग्ला साहित्य के जरिये भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान डाली। अपनी अधिकांश रचनाओं में उन्होंने इंसान और भगवान के बीच के संबंधों तथा भावनाओं को उजागर किया। सही मायनों में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर मानवता के मुखर पैरोकार थे। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की। स्वामी विवेकानंद के बाद वे दूसरे ऐसे भारतीय थे, जिन्होंने विश्व धर्म संसद को दो बार सम्बोधित किया। बहुआयामी प्रतिभा के धनी गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रोस्टेट कैंसर के कारण 7 अगस्त 1941 को कोलकाता में अंतिम सांस ली।- योगेश कुमार गोयल(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं) ]]></description>
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<pubDate>Thu, 07 May 2026 14:00:21 +0530</pubDate>
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<title>Rabindranath Tagore Birth Anniversary: जब Gitanjali के लिए मिला Nobel Prize, दुनिया ने माना भारतीय साहित्य का लोहा</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 07 मई को महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। रवींद्रनाथ टैगोर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इस वजह से उनको पॉलीमैथ यानी की सभी विद्या और कलाओं में निपुण कहा जाता था। टैगोर ने गांधीजी को &#039;महात्मा&#039; का नाम दिया था। बता दें कि टैगोर दूसरे ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने विश्व धर्म संसद को दो बार संबोधित किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 07 मई 1861 को रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। टैगोर ने अपनी पहली कविता महज 8 साल की उम्र में लिखा था। इनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और मां का नाम शारदा देवी था। टैगोर को बचपन से ही साहित्यिक माहौल मिला था। जिस कारण उनको साहित्य से काफी लगाव रहा।इसे भी पढ़ें: Rabindranath Tagore Birth Anniversary: भारत की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं टैगोरबैरिस्टर बनना चाहते थे टैगोररवींद्रनाथ टैगोर अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद बैरिस्टर बनना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजस्टोन पब्लिक स्कूल में एडमिशन लिया। बाद में टैगोर ने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई पूरी है। लेकिन 1880 में रवींद्रनाथ टैगोर को बिना कानून की डिग्री लिए भारत वापस लौट आए।पहली कवितारवींद्रनाथ टैगोर को बचपन से कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था। उन्होंने सिर्फ 8 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी थी। फिर 16 की उम्र में टैगोर की पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी।तीन देशों के राष्ट्रगानबता दें कि रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत का राष्ट्रगान &#039;जन-गण-मन&#039; लिखा था। इसके अलावा उन्होंने बांग्लादेश का राष्ट्रगान &#039;आमार सोनार बांग्ला&#039; भी लिखा है। साथ ही श्रीलंका के राष्ट्रगान &#039;श्रीलंका मठ&#039; की भी रचना की थी।नोबेल पुरस्कारसाल 1882 में टैगोर ने अपनी पहली बंगाली लघुकथा &#039;भिखारिणी&#039; लिखी थी। साल 1913 में उनको साहित्य में महान योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनके द्वारा लिखी गई &#039;गीतांजलि&#039; के लिए मिला था। गीतांजलि बंगाली गीतों का संग्रह है। रवींद्रनाथ ने नोबेल पुरस्कार सीधे तौर पर स्वीकार नहीं किया था, बल्कि ब्रिटेन के एक राजदूत ने पुरस्कार लिया था। साल 1915 में टैगोर को ब्रिटिश सरकार से &#039;सर&#039; की उपाधि मिली थी। लेकिन जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद टैगोर ने यह उपाधि वापस कर दी थी।मृत्युवहीं प्रोस्टेट कैंसर होने के बाद 07 अगस्त 1941 को रवींद्रनाथ टैगोर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 07 May 2026 14:00:20 +0530</pubDate>
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<title>Motilal Nehru Birth Anniversary: देश के सबसे महंगे वकील, Gandhi से एक मुलाकात और बदल गई पूरी जिंदगी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 06 मई को मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ था। वह भारतीय इतिहास में एक अहम शख्सियत हैं। मोतीलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पिता हैं। वह भारत के सबसे अमीर वकील हुआ करते थे। वह देश की आजादी की लड़ाई के प्रमुख नेताओं में से एक रहे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मोतीलाल नेहरू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 06 मई 1861 को मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर नेहरू और मां का नाम इंद्राणी नेहरू था। मोतीलाल नेहरू के पैदा होने के 3 महीने पहले इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। ऐसे में मोतीलाल नेहरू का पालन पोषण उनके बड़े भाई नंदलाल नेहरू ने किया था, जोकि राजस्थान के खेतड़ी में दीवान थे।इसे भी पढ़ें: Giani Zail Singh Birth Anniversary: एक चिट्ठी से कैसे इम्प्रेस हुए थे PM Nehru, पढ़ें देश के 7वें राष्ट्रपति का सियासी सफरवकालत की शुरूआतमोतीलाल नेहरू ने कानपुर में वकालत की प्रैक्टिस की, फिर वह इलाहाबाद हाइकोर्ट में प्रैक्टिस के लिए इलाहाबाद चले आए। उन्होंने दीवानी मुकदमों में खूब नाम और पैस कमाया। मोतीलाल नेहरू के क्लाइंट बड़े रईस परिवार से हुआ करते थे, जिनसे वह मोटी फीस वसूलते थे। धीरे-धीरे वह देश के सबसे अमीर वकीलों में गिने जाने लगे थे।गांधीजी से मुलाकातसाल 1918 में मोतीलाल नेहरू और महात्मा गांधी की मुलाकात हुई। इससे पहले वह कांग्रेस में आ चुके थे और एक अखबार भी शुरूकर चुके थे। महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद मोतीलाल नेहरू भव्यता को छोड़ने में सबसे आगे रहे और उन्होंने पूरी तरह से स्वदेशी कपड़े अपना लिए। लेकिन परिवार के खर्चों को उठाने के लिए उन्होंने वकालत जारी रखी।आजादी के लिए सक्रियतासाल 1919 और 1928 में मोतीलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। वहीं 1922 में मोतीलाल नेहरू असहयोग आंदोलन के समय गिरफ्तार भी हुए। उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ मिलकर स्वराज पार्टी का भी निर्माण किया। इसके अलावा वह यूनाइटेड प्रोविंसेस लेजिस्लेटिव काउंसिल के विपक्ष नेता भी बने।मृत्युवहीं मोतीलाल नेहरू का निधन 6 फरवरी 1931 को लखनऊ में हुआ था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 07 May 2026 10:51:15 +0530</pubDate>
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<title>Napoleon Bonaparte Death Anniversary: France का सम्राट जिसने दिया Civil Code, Waterloo की हार के बाद हुई थी दर्दनाक मौत</title>
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<description><![CDATA[ फ्रांस के सैन्‍य शासक नेपोलियन बोनापार्ट का 05 मई को निधन हो गया था। नेपोलियन बोनापार्ट को दुनिया के महान सैन्‍य शासकों में शुमार किया जाता है। नेपोलियन ने अपने दो दशक के लंबे करियर में करीब 61 से ज्यादा लड़ाइयां लड़ी थीं। नेपोलियन के विरोधी उससे नफरत करते थे, वहीं उसके सहयोगी और सैनिक उससे प्यार करते थे। तो आइए जानते हैं उसकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नेपोलियन बोनापार्ट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफ्रांस के अजाचियो शहर में 15 अगस्त 1769 को नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म हुआ था। वह एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था। बचपन में नेपोलियन को सेना में जाने की प्रेरणा परिवार से मिली। परिवार ने उनको सैन्य अफसर बनाने के लिए फ्रांस की सैन्य अकादमी में भेजा। सैनिक स्कूल में शिक्षा पूरी करने के बाद नेपोलियन ने 1784 में पेरिस के एक कॉलेज में एडमिशन लिया। वहीं नेपोलियन की प्रतिभा को देखते हुए उनको फ्रांस के राजकीय तोपखाने में सब-लेफ्टिनेंट की नौकरी मिल गई।फ्रांस का सम्राटनेपोलियन की पहली पत्नी जोसेफिन के कोई संतान न होने पर उन्होंने ऑस्ट्रिया के सम्राट की पुत्री &#039;मैरी लुईस&#039; से दूसरा विवाह किया। नेपोलियन ने अपने युद्ध कौशल से फ्रांस को विदेशी दुश्मनों से मुक्ति दिलाने का काम किया। वहीं 15 दिसंबर 1799 को फ्रांस की जनता ने नेपोलियन बोनापार्ट को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया।इसे भी पढ़ें: Tipu Sultan Death Anniversary: भारत के पहले &#039;Rocket Man&#039; थे टीपू सुल्तान, जिनके फौलादी रॉकेट से कांपती थी British सेनासाल 1803 से लेकर 1815 तक नेपोलियन युद्धों में लगा रहा। जोकि यूरोपीय देशों के विभिन्न गठबंधनों के साथ प्रमुख संघर्षों की एक शृंखला है। वहीं भविष्य के युद्धों के लिये धन जुटाने के साधन के रूप में नेपोलियन ने 1803 में आंशिक रूप से उत्तरी अमेरिका में फ्रांस के लुइसियाना क्षेत्र को नए स्वतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका को 15 मिलियन में बेच दिया। इस लेन-देन को बाद में &#039;लुइसियाना&#039; खरीद के रूप में जाना गया।इसी साल दिसंबर में नेपोलियन की सेना ने ऑस्ट्रियायी और रूसियों को हराया। उसकी जीत के परिणामस्वरूप रोमन साम्राज्य का विघटन हुआ और राइन परिसंघ का निर्माण हुआ। वहीं 21 मार्च 1804 को नेपोलियन ने &#039;नेपोलियन संहिता&#039; की स्थापना की। जिसको फ्रांसीसी नागरिक संहिता के रूप में जाना जाता है।नेपोलियन का पतनइंग्लैंड को चोट पहुंचाने की कोशिश में नेपोलियन ने कॉन्टिनेंटल सिस्टम की शुरूआत की। वहीं 1813 में मित्र देशों ने लेपज़िग की लड़ाई में नेपोलियन की सेना को हराया। इसके बाद नेपोलियम को छोटे द्वीप में एल्बा में निर्वासित कर दिया गया। वहीं 1815 में वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन के शासन का विरोध करने के लिए यूरोपीय शक्तियां एक साथ हो गईं। 18 जून 1815 को ब्रिटिश और प्रशियाई सेनाओं ने नेपोलियन को हराया और फिर 03 जुलाई 1815 में नेपोलियम ने ब्रिटिशों को आत्मसमर्पण कर लिया। जिसके बाद नेपोलियन को सेंट हेलेना द्वीप पर निर्वासन में भेज दिया गया।मृत्युवहीं 05 मई 1821 को नेपोलियन बोनापार्ट का कैंसर के कारण निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 06 May 2026 10:01:54 +0530</pubDate>
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<title>Tyagaraja Birth Anniversary: कर्नाटक संगीत के पितामह, जानें उनकी Ram Bhakti के अनसुने किस्से</title>
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<description><![CDATA[ संगीतकार संत त्यागराज का जन्म आज ही के दिन यानी की 04 मई को हुआ था। वह भक्तिमार्गी कवि एवं कर्णाटक संगीत के महान संगीतज्ञ थे। उन्होंने समाज एवं साहित्य के साथ-साथ कला को भी समृद्ध करने का काम किया था। संगीतज्ञ त्यागराज भगवान श्रीराम के भक्त थे और उन्होंने श्रीराम की स्तुति में हजारों कृतियां रची थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर संगीतज्ञ त्यागराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु में 04 मई 1767 को त्यागराज का जन्म हुआ था। वहीं महज 13 साल की उम्र में त्यागराज ने अपने गुरु सोंटी वेंकट रामय्या के मार्गदर्शन में संगीत की यात्रा की शुरूआत की थी। त्यागराज की पहली रचना &#039;नमो नमो राघवाय&#039; था। अपने पूरे जीवन में त्यागराज ने कर्नाटक संगीत में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में अहम भूमिका निभाई थी।त्यागराज की रचनाएंत्यागराज की ज्यादातर रचनाएं तेलुगू भाषा में हैं, जो उनकी मातृभाषा थी और उनकी कुछ कृतियां संस्कृत में भी हैं। उन्होंने भगवान श्रीराम की स्तुति में 24,000 कृतियों की रचनाएं की थी। इनमें से करीब 700 कृतियां त्यागराज के संगीत शिष्यों की पीढ़ियों के माध्यम से युगों तक जीवित रहीं।इसे भी पढ़ें: Satyajit Ray Birth Anniversary: भारतीय सिनेमा के वो &#039;Master Director&#039;, जिन्हें मिला भारत रत्न और Oscarसंगीत के प्रति प्रेमसंत त्यागराज की रचनाएं ताल और राग की सुंदरता से परिपूर्ण होने के साथ भावों से भी भरपूर थीं। त्यागराज न सिर्फ एक प्रतिभावान कलाकार थे, बल्कि संगीज का सहज ज्ञान भी था। इसके अलावा उनको शास्त्रों का भी गहरा ज्ञान था। त्यागराज ने धन या प्रसिद्धि के लिए गायन नहीं किया था, बल्कि संगीत को भी अपने प्रिय देवता श्रीराम के प्रति अपनी अटूट भक्ति को अभिव्यक्ति के रूप में चुना था।श्रीराम की भक्तिभगवान राम के प्रति संत त्यागराज का पूरा परिवार समर्पित है। उनके पिता और नाना ने उनके अंदर बचपन से राम भक्ति के बीज बो दिए थे। उनके लिए संगीत सिर्फ कला नहीं बल्कि यह ईश्वर की पूजा थी। श्रीराम से उनका प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने सभी सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया था। त्यागराज की सभी कृतियां उनके प्रिय श्रीराम के गुणों का गुणगान किया गया है। उनकी उत्कृष्ट रचना &#039;जगदानंदकारक&#039; में भगवान के 108 नामों का वर्णन है। जिनमें से प्रत्येक राम के अद्वितीय गुणों का वर्ण करता है।मृत्युवहीं 06 जनवरी 1847 में 79 वर्ष की आयु में संत और संगीतकार त्यागराज निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 06 May 2026 10:01:54 +0530</pubDate>
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<title>Giani Zail Singh Birth Anniversary: एक चिट्ठी से कैसे इम्प्रेस हुए थे PM Nehru, पढ़ें देश के 7वें राष्ट्रपति का सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 मई को देश के 7वें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का जन्म हुआ था। पंजाब से सिर्फ ज्ञानी जैल सिंह सर्वोच्च पद पर सुशोभित हुए हैं। ज्ञानी जैल सिंह का जीवन और राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प और विवादों से भरा रहा था। ज्ञानी जैल सिंह के राष्ट्रपति कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ज्ञानी जैल सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफरीदकोट-कोटकपूरा हाइवे के किनारे स्थित गांव संधवा में 05 मई 1916 को ज्ञानी जैल सिंह का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम भाई किशन सिंह और मां का नाम इंदकौर था। इनके पिता कारपेंटरी का काम करते थे। वहीं छोटी उम्र में जैल सिंह की मां का निधन हो गया था। जिसके बाद जैल सिंह का पालन-पोषण उनकी मौसी ने किया था। वहीं महज 15 साल की उम्र में वह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अकाली दल से जुड़ गए थे। वह बचपन से अपने पिता के साथ खेतों में जाते थे। पढ़ाई में खास दिलचस्पी न होने के कारण बीच में पढ़ाई छूट गई।इसे भी पढ़ें: Tyagaraja Birth Anniversary: कर्नाटक संगीत के पितामह, जानें उनकी Ram Bhakti के अनसुने किस्सेसियासी सफरबचपन से ही ज्ञानी जैल सिंह का स्वभाव क्रांतिकारियों की तरह था। वह देश को स्वराज दिलाने और अंग्रेजों को भगाने के लिए आंदोलनों में शामिल होने लगे। वहीं साल 1938 में &#039;प्रजा मंडल&#039; पार्टी का गठन किया था। इस दौरान अंग्रेजों ने जैल सिंह को जेल भेज दिया और उनको 5 साल की सजा सुनाई। जैल सिंह ने पंजाब में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में नौकरी की, लेकिन उनका मन वहां पर भी नहीं लगा।जब ज्ञानी जैल सिंह जवान थे, तो उन्होंने फरीदकोट में तिरंगा फहराने की सोचा। लेकिन वहां के स्थानीय अफसरों ने ऐसा करने से मना कर दिया। जिसके बाद जैल सिंह ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिया। उनकी इस बात से पंडित नेहरू इंप्रेस हो गए। वहीं ज्ञानी जैल सिंह ने पार्टी प्रजा मंडल को छोड़ दिया। वह पंडित नेहरू के साथ जुड़कर पंजाब में राजनीति करने लगे।देश की आजादी के बाद ज्ञानी जैल सिंह को पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्यों के संघ का राजस्व मंत्री बनाया गया था। वहीं साल 1951 में जैल सिंह को कृषि मंत्री बनाया गया था। वह साल 1956 से 1962 तक राज्यसभा के भी सदस्य रहे थे। साल 1962 में वह पंजाब के सीएम बनें। इसके बाद साल 1982 में ज्ञानी जैल सिंह ने भारत के 7वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी।पहले सिख राष्ट्रपतिबता दें कि ज्ञानी जैल सिंह देश के पहले सिख राष्ट्रपति थे। इनके राष्ट्रपति कार्यकाल में देश को हिलाकर रख देने का ऑपरेशन ब्लू स्टार, तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की हत्या और साल 1984 में सिख विरोधी दंगे हुए थे।मृत्युवहीं 25 दिसंबर 1994 को ज्ञानी जैल सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 06 May 2026 10:01:53 +0530</pubDate>
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<title>Guru Amardas Birth Anniversary: 73 की उम्र में बने Guru, Sati प्रथा&#45;जातिवाद पर किया था सबसे बड़ा प्रहार</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 मई को सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी का जन्म हुआ था। उन्होंने समाज से जाति-प्रथा, सती प्रथा और कन्या हत्या जैसी तमाम कुरीतियों को खत्म करने के लिए आवाज उठाई थी। गुरु अमरदास जी ने 73 साल की उम्र में गुरु गद्दी संभाली थी। इसके अलावा उन्होंने लंगर प्रथा को मजबूत करने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अमरदास जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारसिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास का जन्म 05 मई 1479 को अमृतसर के बासर गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम तेजभान और मां का नाम लखमीजी था। गुरु अमर दास बड़े आध्यात्मिक चिंतक थे। खेती और व्यापार के कार्यों में व्यस्त रहने के बाद भी वह हरि का नाम जपते थे। एक बार उन्होंने अपनी पुत्रवधु से गुरु अंगद देवजी द्वारा रचित एक &#039;शबद&#039; सुना था। इसको सुनकर वह इतना ज्यादा प्रभावित हुए कि वह अपनी पुत्रवधु से गुरु अंगद देवजी का पता पूछकर फौरन उनके गुरु चरणों में पहुंच गए।इसे भी पढ़ें: Tyagaraja Birth Anniversary: कर्नाटक संगीत के पितामह, जानें उनकी Ram Bhakti के अनसुने किस्सेतीसरे सिख गुरुबता दें कि 61 साल की उम्र में अपने से 25 साल छोटे और रिश्ते में लगने वाले समधी गुरु अंगद देवजी को उन्होंने गुरु बना लिया। वहीं 11 सालों तक एकनिष्ठ भाव से गुरु सेवा की। सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देवजी ने अमर दास की सेवा से प्रसन्न होकर उनको &#039;गुरु गद्दी&#039; सौंप दी।इस तरह से गुरु अमर दास तीसरे सिख गुरु बने। इस दौरान समाज तमाम बुराइयों से ग्रस्त था। उस समय ऊंच-नीच, जाति-प्रथा, कन्या हत्या और सती प्रथा जैसी अनेक बुराइयां समाज में फैली थीं। ऐसे में गुरु अमर दास ने इन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बड़ा और प्रभावशाली आंदोलन चलाया था। उन्होंने ऊंच-नीच और जाति प्रथा को खत्म करने के लिए लंगर प्रथा और अधिक सशक्त किया। उस दौर में भोजन करने के लिए जातियों के मुताबिक पंगते लगती थीं। लेकिन उन्होंने सभी के लिए एक पंगत में बैठकर लंगर करना अनिवार्य कर दिया था।गुरु अमर दासजी ने सती प्रथा को समाप्त करने के लिए क्रांतिकारी कार्य किया था। उन्होंने इस घिनौनी रस्म को स्त्री के अस्तित्व का विरोधी मानकर इस प्रथा के खिलाफ जबरदस्त प्रचार किया था। जिससे कि महिलाएं इस कुप्रथा से मुक्ति पा सकें। वह सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले पहले समाज सुधारक थे।मृत्युवहीं 01 सितंबर 1574 को गुरु अमर दास जी दिव्य ज्योति में विलीन हो गए थे। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 06 May 2026 10:01:52 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Guru, Amardas, Birth, Anniversary:, की, उम्र, में, बने, Guru, Sati, प्रथा-जातिवाद, पर, किया, था, सबसे, बड़ा, प्रहार</media:keywords>
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<title>Tipu Sultan Death Anniversary: भारत के पहले &amp;apos;Rocket Man&amp;apos; थे टीपू सुल्तान, जिनके फौलादी रॉकेट से कांपती थी British सेना</title>
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<description><![CDATA[ सुल्तान फतेह अली खान साहब यानी कि टीपू सुल्तान का 04 मई को निधन हो गया था। उनको भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना जाता है। टीपू सुल्तान हमेशा अपने निडरता और बहादुरी के लिए जाने जाते थे। इसके अलावा उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का पुरजोर विरोध किया था। वह मैसूर के राजा थे, इस कारण टीपू सुल्तान को &#039;मैसूर का टाइगर&#039; कहा जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर टीपू सुल्तान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकर्नाटक के देवनहल्ली शहर में 20 नवंबर 1750 को टीपू सुल्तान का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम हैदर अली और मां का नाम फातिमा फखरू निशा था। टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली दक्षिण भारत में मैसूर के साम्राज्य के एक सैन्य अफसर थे।इसे भी पढ़ें: Tyagaraja Birth Anniversary: कर्नाटक संगीत के पितामह, जानें उनकी Ram Bhakti के अनसुने किस्सेरॉकेट का आविष्कारटीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में सबसे पहले बांस से बने रॉकेट का आविष्कार किया था। बांस से बने यह रॉकेट हवा में करीब 200 मीटर की दूरी तय कर सकते हैं। वहीं इन रॉकेट को उड़ाने के लिए 250 ग्राम बारूद का इस्तेमाल किया जाता था। बांस के रॉकेट के बाद उन्होंने लोहे का इस्तेमाल करके रॉकेट बनाना शुरूकर दिया। बांस के मुकाबले यह रॉकेट ज्यादा दूरी तय करते थे। लेकिन इनमें बारूद का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता था। यह रॉकेट विरोधियों को ज्यादा नुकसान पहुंचाते थे।रॉकेट का इस्तेमालअपने शासनकाल में टीपू सुल्तान ने कई तरह के प्रयोग किए थे। इस बदलाव की वजह से उनको एक अलग राजा की उपाधि प्राप्त है। टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली के पास भी 50 से ज्यादा रॉकेटमैन थे। जिसका वह अपने सेना में बखूबी इस्तेमाल करते थे। इनको रॉकेटमैन इसलिए भी कहा जाता था, क्योंकि वह रॉकेट चलाने में माहिर थे। टीपू सुल्तान युद्ध के दौरान विरोधियों पर ऐसे निशाने लगाते थे, जिससे विरोधियों को काफी ज्यादा नुकसान होता था। पहली बार टीपू सुल्तान के शासनकाल में लोहे के केस वाली मिसाइल रॉकेट बनाई गई थी।टीपू सुल्तान की मौतचौथे एंग्लो-मैसूर युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शाही बलों को हैदराबाद और मराठों के निजामों ने अपना समर्थन दिया था। इसके बाद वह टीपू सुल्तान को हरा सके थे। वहीं 04 मई 1799 को श्रीरंगापटना में टीपू सुल्तान की हत्या कर दी गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 05 May 2026 09:27:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Satyajit Ray Birth Anniversary: भारतीय सिनेमा के वो &amp;apos;Master Director&amp;apos;, जिन्हें मिला भारत रत्न और Oscar</title>
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<description><![CDATA[ फिल्मी दुनिया के दिग्गज डायरेक्टर रहे सत्यजीत रे का 02 मई को जन्म हुआ था। सत्यजीत रे के लहू में कला और कलम में लेखन की अद्भुत शक्ति थी। देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में उनकी गहरी छाप रही है। सिनेमा और कला के क्षेत्र में सत्यजीत रे के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। सत्यजीत रे को फ़िल्मों में विशेष योगदान के लिए उनको ऑस्कर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सत्यजीत रे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता में 02 मई 1921 को सत्यजीत रे का जन्म हुआ था। इनके पिता एक जाने-माने राइटर थे। उनका बचपन कोलकाता जैसे खूबसूरत शहर में बीता था। उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था। इसके बाद विश्व भारती विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी। इसके बाद सत्यजीत रे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चले गए थे।इसे भी पढ़ें: Leonardo da Vinci Death Anniversary: Mona Lisa की एक मुस्कान ने दुनिया को भुला दिए Leonardo da Vinci के ये महान आविष्कारविज्ञापन एजेंसी में किया कामफिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले सत्यजीत रे ने एक ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसी में काम किया था। साल 1950 में इस एजेंसी के साथ लंदन में बिताए 6 महीने में सत्यजीत रे के मन में फिल्म मेकिंग को लेकर दिलचस्पी बनाई। इस दौरान सत्यजीत रे ने बाइसिकल थीफ नाम की फिल्म देखी। जिसने उनकी जिंदगी पर गहरा असर डाला था।पहली फिल्मइसके बाद साल 1955 में सत्यजीत रे ने फिल्म &#039;पाथेर पांचाली&#039; नामक फिल्म बनाई। इस फिल्म ने न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में नाम कमाया था। इस फिल्म को भारतीय सिनेमा के लिए ऐतिहासिक माना जाता है। बता दें कि सत्यजीत रे ने अपने फिल्मी करियर में 36 फिल्मों का डायरेक्शन किया है। इनमें से अप्पू ट्रॉयलॉजी की कहानियां आज भी लोगों को याद है। उनकी फिल्मों को भारतीय सिनेमा का आईना कहा जाता है।बता दें कि आज भी सत्यजीत रे की फिल्में ऐज भी सिनेमाई दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। यह भारत के उन चंद डायरेक्टर्स में से हैं, जिनमें दुनिया के दिग्गज फिल्म मेकर्स सलाम ठोका करते थे।मिला था ऑस्करसत्यजीत रे को कई खिताबों से सम्मानित किया जा चुका है। भारत रत्न से लेकर फ्रांस के ऑनर तक से सत्यजीत रे को सम्मानित किया जा चुका है। उनको ऑस्कर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 23 अप्रैल 1992 को सत्यजीत रे का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 03 May 2026 18:32:05 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Leonardo da Vinci Death Anniversary: Mona Lisa की एक मुस्कान ने दुनिया को भुला दिए Leonardo da Vinci के ये महान आविष्कार</title>
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<description><![CDATA[ इटली के महान चित्रकार लियोनार्डो दा विंची का आज ही के दिन यानी की 02 मई को निधन हो गया था। कुछ लोग लियोनार्डो दा विंची को उनकी पेंटिंग &#039;मोनालिसा&#039; की वजह से जानते हैं। तो वहीं कुछ लोग उनको उनकी पेंटिंग &#039;द वैप्टिस्‍म ऑफ क्राइस्‍ट&#039;, &#039;द एनंसिएशन&#039;, &#039;द अडोरेशन ऑफ द मागी&#039;, &#039;मडोना ऑफ द कारनेशन&#039; द मागी की वजह से भी जानते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो दुनिया के अधिकतर लोग लियोनार्डो को उनकी पेंटिंग्स के लिए जानते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर चित्रकार लियोनार्डो दा विंची के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारइटली के विंची में 15 अप्रैल 1452 को लियोनार्डो दा विंची का जन्म हुआ था। लियानोर्डो दा विंची कभी स्कूल नहीं गए थे। लेकिन उन्होंने जीव विज्ञान और शरीर की रचना के विज्ञान पर खूब जानकारी जमा की थी।इसे भी पढ़ें: Dadasaheb Phalke Birth Anniversary: एक विदेशी Film देख जागा था जुनून, ऐसे रखी भारतीय सिनेमा की नींवइन चीजों का अविष्कारलियोनार्डो दा विंची ने उड़ने वाली मशीन, हथियारबंद वाहन, आकाश के रंग और सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को लेकर अवधारणा देने का श्रेय जाता है। उन्होंने कैंची का भी अविष्कार किया है। लियोनार्डो ने हॉस्पिटल में मौजूद शवों के माध्यम से शरीर की संरचना का अध्ययन किया। लियोनार्डो ने उनके करीब 240 चित्र बनाए। वहीं 13,000 शब्दों में मानव शरीर की संरचना पर आधारित दस्तावेज लिए। जिसके जरिए मानव शरीर की संरचना के बारे में काफी कुछ जानकारी हासिल की जा सकती है।इस पेंटिंग से मिली पहचानलियोनार्डो दा विंची को उनकी मशहूर पेंटिंग मोनालिया के कारण ज्यादा पहचाना गया। यह एक लड़की का पोट्रेट था, जिसके बारे में तमाम व्याख्याएं हुईं। आज भी इस पर बहस होती है कि पेंटिंग में लड़की मुस्कुरा रही है या फिर दुखी है। इस पेंटिंग की लड़की के चेहरे के भावों को पढ़ना शोध का विषय रहा है।मोनालिसा की पेंटिंग के अलावा लियोनार्डो की अन्य बहुत सी कृतियां फेमस हुईं। जिनमें से द लास्ट सपर ऐसी पेंटिंग थी, जिसके दुनिया भर में सबसे ज्यादा अनुकृतियां बनीं। विट्रयूवियन मैन भी लियोनार्डो की महान धरोहर मानी जाती है। इसके साथ ही &#039;द वैप्टिस्‍म ऑफ क्राइस्‍ट&#039;, &#039;द अडोरेशन ऑफ द मागी&#039;, &#039;द एनंसिएशन&#039; और &#039;मडोना ऑफ द कारनेशन&#039; भी उनकी रोचक कृतियों में शामिल है।मृत्युवहीं 02 मई 1519 को फ्रांस में लियोनार्डो दा विंची का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 03 May 2026 18:29:40 +0530</pubDate>
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<title>Adolf Hitler Death Anniversary: कभी था Time &amp;apos;Man of the Year&amp;apos;, फिर बना सबसे बड़ा तानाशाह, जानें Adolf Hitler की पूरी कहानी</title>
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<description><![CDATA[ द्वितीय विश्व युद्ध के तानाशाह अडोल्फ हिटलर की आज ही के दिन यानी की 30 अप्रैल को मृत्यु हो गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार से निराश होकर हिटलर ने खुद को गोली मार ली थी। एडोल्फ हिटलर के खाते में दुनिया जर्मनी का चांसलर हिटलर, तानाशाह हिटलर, सेना का मामूली कर्मचारी हिटलर, लाखों मौतों का जिम्मेदार आदि तमाम उपाधियां दर्ज करती है। हिटलर न कोई चुनाव जीता और न कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर एडोल्फ हिटलर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारऑस्ट्रिया में 20 अप्रैल 1889 को एडोल्फ हिटलर का जन्म हुआ था। बचपन में वह कलाकार बनना चाहता था, उसको चित्र बनाना पसंद था। ऐसे में उसने वियना की कला अकादमी में एडमिशन लेने की कोशिश भी की और दो बार असफल रहा। यही असफलता हिटलर के जीवन का बड़ा मोड़ थी। वियना में रहने के दौरान हिटलर की जिंदगी काफी कठिन थी। वह गरीब हो गई थी और उसको कई बार रात सड़कों पर बितानी पड़ी। इस दौरान उसके विचार कठोर होते चले गए और उसने राजनीति और समाज को लेकर अपने नजरिए बनाए।इसे भी पढ़ें: Raja Ravi Varma Birth Anniversary: Indian Art के Legend राजा रवि वर्मा, अंग्रेजों ने दिया था &#039;Kaisar-i-Hind&#039; का सम्मानजॉइन की नाजी पार्टीफर्स्ट वर्ल्ड वॉर हिटलर के जीवन में एक नया मोड़ लेकर आया। इस दौरान वह जर्मन सेना में भर्ती हो गया और एक संदेशवाहक के रूप में काम करने लगा। युद्ध के दौरान हिटलर को बहादुरी के लिए सम्मान मिला। लेकिन जर्मनी की हार ने उसको अंदर तक झझकोर दिया था। वह इस हार को स्वीकार नहीं कर सका। युद्ध के बाद जर्मनी में आर्थिक संकट बढ़ने लगा और इसी दौरान हिटलर राजनीति में आया और उसने नाजी पार्टी जॉइन की। हिटलर की बोलने की शैली काफी प्रभावशाली थी और वह भाषण देता और लोग उसकी बातों से धीरे-धीरे प्रभावित होने लगे।असफल विद्रोह और जेलसाल 1923 में हिटलर ने बीयर हॉल पुट्श नाम से विद्रोह करने की कोशिश की। लेकिन यह प्रयास असफल रहा और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। जेल से बाहर आने के बाद हिटलर ने अपनी रणनीति बदली और उसने यह समझा की सत्ता हासिल करने के लिए उसको चुनाव और कानून का रास्ता पकड़ना होगा। उसकी नाजी पार्टी धीरे-धीरे मजबूत होती गई। साल 1933 में हिटलर जर्मनी का चांसलर बन गया। फिर हिटलर ने तेजी से सत्ता अपने हाथ में ली। इस दौरान उसने विपक्ष को खत्म कर दिया, मीडिया पर कंट्रोल कर लिया और देश में एक तानाशाही स्थापित हो गई।चांसलर बनने के कुछ समय बाद ही जर्मनी की संसद में आग लग गई थी। इसका फायदा उठाते हुए हिटलर ने आपालकालीन शक्तियां हासिल कर ली थी। इसके बाद हिटलर ने इनेबलिंग एक्ट पारित करवाया। जिसने उसको संसद की मंजूरी के बिना कानून बनाने की ताकत दे दी। इस कानून को बदलकर हिटलर ने लोकतंत्र को खत्म किया और खुद को सर्वोच्च नेता घोषित किया।मैन ऑफ द ईयरअपनी छवि को मजबूत करने के लिए हिटलर ने मीडिया का खूब उपयोग किया। जोकि उसकी रणनीति का हिस्सा था। साल 1938 को ऑस्ट्रिया को जर्मनी में मिला लिया। फिर उसने चेकोस्लोवाकिया के हिस्सों पर कब्जा किया। इन घटनाओं ने हिटलर को दुनिया की नजर में एक शक्तिशाली नेता बना दिया। इन्हीं वजहों से हिटलर को &#039;मैन ऑफ द ईयर&#039; चुना गया। इस दौरान तक हिटलर की पहचान एक क्रूर तानाशाह की बन चुकी थी। हिटलर के शासन के परिणाम बहुत भयानक थे। फिर सेकेंड वर्ल्ड वॉर शुरू हुई और लाखों लोगों की जान गई। जोकि इतिहास का एक काला अध्याय है।मृत्युवहीं जब जर्मनी हार के करीब था, तो हिटलर से यह बर्दाश्त नहीं हुई। इस कारण 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने बर्लिन में अपने बंकर में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। इस दौरान उसकी पत्नी ईवा ब्राउन भी थी। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 01 May 2026 10:23:26 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dadasaheb Phalke Birth Anniversary: एक विदेशी Film देख जागा था जुनून, ऐसे रखी भारतीय सिनेमा की नींव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 30 अप्रैल को हिंदी सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले दादासाहेब फाल्के का जन्म हुआ था। फिल्मों के प्रति दादासाहेब फाल्के का जनून इतना जबरदस्त रहा कि उन्होंने फिल्म बनाने की तकनीक सीखने के लिए बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर दादासाहेब फाल्के के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र में 30 अप्रैल 1870 को दादासाहेब फाल्के का जन्म हुआ था। इनके पिता संस्कृत के बड़े विद्वान थे। दादासाहेब फाल्के बचपन से कला प्रेमी थे। उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से पढ़ाई की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फोटोग्राफर के रूप में काम करना शुरू किया और बाद में प्रिंटिंग प्रेस भी चलाया। हालांकि उनकी जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। उनको कारोबार में नुकसान हुआ और अन्य कई परेशानियों का सामना करना पड़ा।इसे भी पढ़ें: Satyajit Ray Death Anniversary: वो निर्देशक जिसने Indian Cinema को दिलाई पहचान, ऑस्कर तक पहुंचा जिसका नामफिल्म मेकिंग का विचारदादासाहेब फाल्के की जिंदगी तब बदली, जब उन्होंने विदेशी फिल्म &#039;द लाइफ ऑफ क्राइस्ट&#039; देखी थी। फिल्म देखते समय उनके मन में यह विचार आया कि अगर विदेशी लोग धार्मिक किरदारों पर फिल्म बना सकते हैं। तो फिर भारत में धार्मिक विषयों और किरदारों पर फिल्म क्यों नहीं बन सकती है। बस यहीं से उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रखने का फैसला कर लिया था।पढ़ाई के लिए गए लंदनहालांकि उस दौरान भारत में फिल्म बनाना असंभव काम माना जाता था। क्योंकि न किसी को कैमरे की जानकारी थी और न ही फिल्म बनाने की तकनीक का अनुभव था। ऐसे में दादासाहेब फाल्के ने तय किया कि वह इस कला को सीखेंगे। जिसके लिए उन्होंने बीमा पॉलिसी गिरवी रखी और लंदन जाकर फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखा। इसके अलावा वह लंदन से जरूरी उपकरण खरीदकर भारत लाए।पहली फिल्मभारत लौटने के बाद दादासाहेब फाल्के ने अपनी पहली फिल्म &#039;राजा हरिश्चंद्र&#039; बनाना शुरू की। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी पैसों की थी। ऐसे मुश्किल समय में फाल्के की पत्नी सरस्वती फाल्के ने अपने पूरे गहने गिरवी रख दिए, जिससे कि फिल्म पूरी हो सके। फाल्के की पत्नी सरस्वती फिल्म की पूरी टीम के लिए खाना बनाती थीं। कलाकारों के कपड़ें संभालती थीं। वहीं वह शूटिंग के हर छोटे-बड़े कामों में मदद करती थीं।साल 1913 में फिल्म &#039;राजा हरिश्चंद्र&#039; रिलीज हुई और यह भारत की पहली फीचर फिल्म बनी। इस फिल्म को लोगों का खूब प्यार मिला। इसके बाद दादासाहेब फाल्के ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने &#039;सत्यवान सावित्री&#039;, &#039;श्रीकृष्ण जन्म&#039;, &#039;मोहिनी भस्मासुर&#039;, &#039;लंका दहन&#039; और &#039;कालिया मर्दन&#039; जैसी कई सफल फिल्में बनाईं। फाल्के ने करीब 19 साल के करियर में करीब 95 फीचर फिल्में और 26 शॉर्ट फिल्में बनाई थीं।आखिरी फिल्मवहीं समय के साथ सिनेमा बदला और मूक फिल्मों की जगह बोलती फिल्मों ने ली। लेकिन फाल्के इस बदलाव के साथ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके। दादासाहेब की आखिरी फिल्म &#039;गंगावतरण&#039; थी, जोकि साल 1937 में रिलीज हुई थी। इसके बाद उन्होंने फिल्मों से पूरी तरह से दूरी बना ली।मृत्युवहीं 16 फरवरी 1944 को दादासाहेब फाल्के का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 01 May 2026 10:23:25 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Raja Ravi Varma Birth Anniversary: Indian Art के Legend राजा रवि वर्मा, अंग्रेजों ने दिया था &amp;apos;Kaisar&#45;i&#45;Hind&amp;apos; का सम्मान</title>
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<description><![CDATA[ प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार राजा रवि वर्मा का 28 अप्रैल को जन्म हुआ था। उन्होंने भारतीय हिंदुओं के देवी-देवताओं को चेहरा और स्वरूप दिया था। राजा रवि वर्मा ने इन चित्रों को बनाने से पहले वेद पुराणों को अच्छे से अध्ययन किया था। वह देश भर में घूमे और फिर देवी-देवताओं के चित्र बनाए। राजा रवि वर्मा को भारतीय कला के इतिहास में सबसे महान चित्रकारों में से एक माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजा रवि वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकेरल में 29 अप्रैल 1848 को राजा रवि वर्मा का जन्म हुआ था। उनके चाचा चित्रकार थे और राजा रवि वर्मा को हमेशा अपने साथ रखते थे। ऐसे में छोटे बच्चे कम उम्र में आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने लगा था। एक बार राजा रवि वर्मा के चाचा किसी राजभवन की दीवारों को चित्रकारी से सजा रहे थे। किसी वजह से उनको वहां से हटना पड़ा। जिसके बाद 7 साल के राजा रवि वर्मा ने दीवार के चित्र को पूरा रंग से भर दिया। चाचा देखकर दंग रह गए। राजा रविवर्मा की चित्रकारी की पहली शिक्षा उनके चाचा से शुरू हुई थी।इसे भी पढ़ें: Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से क्रांति की आग, जानिए &#039;राष्ट्रकवि&#039; के Freedom Fighter बनने की कहानीऐसे बनाई पहली तस्वीरएक बार जो राजा रवि वर्मा ने रंगों को हाथ लगाया, तो प्रकृति के हर रूप को वह कागज पर उकेरते चले गए। एक दिन उन्होंने उन्होंने पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का फैसला लिया। इसके बाद उन्होंने एक युवती को तैयार किया। वह युवती पिछले कई घंटों से मौन एक ही मुद्रा में बैठी रही। वह एक कोने को लगातार देख रही थी कि उसकी आंखों की पुतलियां भी नहीं घूम रही थी। जोकि किसी सामान्य स्त्री के लिए मुश्किलों भरा हो सकता है। लेकिन वह सामान्य नहीं थी। राजा ने उसमें ऐसा रंग और आत्मविश्वास भरा कि वह दैवीय़ हो गई और इसी का प्रभाव रहा कि उसकी आंखों में दया के भाव थे।मां सरस्वती के स्वरूप को उकेराचेहरे पर तेज था और हथेलियां खुद ही वरद हस्त में बदल गई थीं। दोनों ही अपने काम में दृढ़ थे। इसका प्रभाव ऐसा पड़ा की करीब सवा सौ साल पहले बनी कागज पर कृति हममें ज्ञान का प्रकाश भर रही है। वह दृढ़ स्त्री सुगंधा थी, और जो चित्र बनकर तैयार हुआ था, वह मां सरस्वती का वरद चित्र था।सम्मानब्रिटिश सरकार ने साल 1904 में राजा रवि वर्मा को &#039;केसर-ए-हिंद&#039; का खिताब दिया था। जोकि उस समय का भारतीय नागरिकों के लिए सबसे बड़ा सम्मान था। राजा रवि वर्मा ने अभिज्ञानशाकुंतलम की शकुंतला का चित्र बनाया था, जोकि उनके सबसे प्रसिद्ध चित्रों में से एक था।मृत्युवहीं 02 अक्तूबर 1906 को चित्रकारी के इस राजा ने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 10:55:16 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से क्रांति की आग, जानिए &amp;apos;राष्ट्रकवि&amp;apos; के Freedom Fighter बनने की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 24 अप्रैल को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की मृत्यु हो गई थी। रामधारी सिंह दिनकर ने हिंदी साहित्य में न सिर्फ वीर रस के काव्य को नई ऊंचाई दी, बल्कि उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए राष्ट्रीय चेतना का भी सृजन करने का काम किया था। उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए आजादी की लड़ाई से लेकर आजादी मिलने तक के सफर को व्यक्त किया। उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबिहार के बेगुसराय में 23 सितंबर 1908 को रामधारी सिंह का जन्म हुआ था। वह छात्र जीवन में राजनीतिक शास्त्र, इतिहास और दर्शन शास्त्र जैसे विषयों को पसंद करते थे। बाद में रामधारी का झुकाव साहित्य की ओर हुआ था। दिनकर रवींद्रनाथ टैगोर और अल्लामा इकबाल को अपनी प्रेरणा मानते थे।इसे भी पढ़ें: Satyajit Ray Death Anniversary: वो निर्देशक जिसने Indian Cinema को दिलाई पहचान, ऑस्कर तक पहुंचा जिसका नामपहला काव्यसंग्रहबता दें कि रामधारी सिंह दिनकर का पहला काव्य संग्रह साल 1928 में &#039;विजय संदेश&#039; प्रकाशित हुआ था। इसके बाद दिनकर ने कई रचनाएं की थीं। दिनकर की कुछ प्रमुख रचनाओं में &#039;हुंकार&#039;, &#039;परशुराम की प्रतीक्षा&#039; और &#039;उर्वशी&#039; है। फिर साल 1959 को रामधारी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।राज्यसभा के सदस्यदिनकर राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वहीं साल 1972 में उनको ज्ञानपीठ सम्मान दिया गया है। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अधिकतर रचनाएं &#039;वीर रस&#039; में की थी। वह एक ऐसी कवि रहे, जिन्होंने खूब वीर रस का इस्तेमाल किया था। वह एक ऐसा दौर था, जब लोगों के अंदर राष्ट्रभक्ति की भावना जोरों पर थीं। उसी भावना को दिनकर ने अपनी कविता के जरिए आगे बढ़ाया। दिनकर जनकवि थे, इसलिए उनको राष्ट्रकवि भी कहा गया था।देश की आजादी की लड़ाई में रामधारी सिंह दिनकर ने भी अपना योगदान दिया था। दिनकर महात्मा गांधी के बड़े मुरीद थे। इसके अलावा वह संस्कृत, मैथिली, उर्दू और अंग्रेजी भाषा के भी जानकार थे। वहीं साल 1999 में भारत सरकार ने दिनकर के नाम से डाक टिकट भी जारी किया था।मृत्युवहीं 24 अप्रैल 1974 को रामधारी सिंह दिनकर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 25 Apr 2026 09:58:54 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Satyajit Ray Death Anniversary: वो निर्देशक जिसने Indian Cinema को दिलाई पहचान, ऑस्कर तक पहुंचा जिसका नाम</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 अप्रैल को सत्यजीत रे ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। सत्यजीत रे द्वारा किए गए काम आज भी फिल्ममेकर्स के लिए मिसाल हैं। उन्होंने अपने करियर में कई हिट फिल्में दी थीं। बता दें कि सत्यजीत रे को उनके काम के लिए ऑस्कर से भी नवाजा गया था। वहीं यह सत्यजीत रे की फिल्मों का जादू है, जो आज सिनेमा इतना आगे पहुंच गया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सत्यजीत रे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 02 मई 1921 को सत्यजीत रे का जन्म हुआ था। उनका बचपन गरीबी में बीता, क्योंकि उनके पिता का निधन हो चुका था। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां के कंधों पर आ गई थी। सत्य़जीत ने ग्राफिक्स डिजाइनर की नौकरी करनी शुरू की। लेकिन फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से सत्यजीत रे की मुलाकात ने सब बदल दिया था।इसे भी पढ़ें: BR Chopra Birth Anniversary: Film Critic से बने Bollywood के &#039;शोमैन&#039;, &#039;Bhootnath&#039; थी आखिरी हिट फिल्मफिल्म बनाने का आइडियाइस मुलाकात के बाद सत्यजीत रे के मन में फिल्म बनाने का विचार आया। वहीं साल 1950 में वह अपने ऑफिस के काम से लंदन गए और इस दौरान उन्होंने वहां कई फिल्में देखीं। लेकिन फिल्म &#039;बाइसिकल थीव्स&#039; को देखकर सत्यजीत रे का आइडिया पक्का हो गया।पहली फिल्मभारत लौटने के बाद सत्यजीत रे ने पहली फिल्म बनाने पर काम शुरू किया। साल 1952 में सत्यजीत ने नौसिखिया टीम के साथ अपनी पहली फिल्म &#039;पाथेर पंचोली&#039; की शूटिंग शुरूकर दी थी। लेकिन कोई फाइनेंसर नहीं होने के कारण फिल्म की शूटिंग बीच में ही रुक गई थी। तब बंगाल सरकार उनकी मदद के लिए आगे आई और फिल्म की शूटिंग पूरी हुई। यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई और इस फिल्म के लिए उनको कई अवॉर्ड भी मिले। इसके बाद सत्यजीत रे ने फिल्म &#039;महापुरुष&#039;, &#039;चारूलता&#039; और &#039;कंजनजंघा&#039; जैसी कई हिट फिल्में बनाईं।पुरस्कारसत्यजीत रे को भारत सरकार की ओर से 32 राष्ट्रीय पुरस्कार दिए गए थे। वहीं साल 1985 में उनको दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था। इसके बाद साल 1992 में सत्यजीत रे को &#039;भारत रत्न&#039; और ऑस्कर &#039;ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट&#039; भी दिया गया था। लेकिन तबियत ठीक न होने की वजह से सत्यजीत रे ऑस्कर लेने नहीं जा सके। ऐसे में पदाधिकारी खुद उनको सम्मान देने के लिए कोलकाता आए थे।मृत्युवहीं 23 अप्रैल 1992 को सत्यजीत रे का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 24 Apr 2026 09:12:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>William Shakespeare Death Anniversary: &amp;apos;Hamlet&amp;apos; से &amp;apos;Romeo&#45;Juliet&amp;apos; तक, 400 साल बाद भी अमर हैं विलियम शेक्सपियर के ये Masterpiece</title>
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<description><![CDATA[ अंग्रेजी कवि, नाटककार और लेखक रहे विलियम शेक्सपियर का 23 अप्रैल को निधन हो गया था। विलियम ने अपनी रचनाओं से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना लिया था। उनके काम का अंदाज सबसे अलग था। विलियम शेक्सपियर हमेशा अपने काम में प्रयोग करते रहते थे। शेक्सपियर के नाटकों में आपको कॉमेडी और रोमांस मिलेगा। जिस कारण उनकी रचनाएं हमेशा लोगों को पसंद आती थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विलियम शेक्सपियर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारइंग्लैंड के स्ट्रैटफोर्ड के आन एवन में 23 अप्रैल 1564 को विलियम शेक्सपियर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जॉन शेक्सपियर था, जोकि चमड़े से संबंधित कारोबार करते थे। वहीं उनकी मां मैरी अर्डन एक घरेलू महिला थीं।इसे भी पढ़ें: BR Chopra Birth Anniversary: Film Critic से बने Bollywood के &#039;शोमैन&#039;, &#039;Bhootnath&#039; थी आखिरी हिट फिल्मनाटक और कविताएंबता दें कि 1590 में शेक्सपियर की कविताएं और नाटकों की प्रथम रचनाएं हुई थीं। उन्होंने कई प्रसिद्ध नाटक लिखे, जैसे- &#039;हैमलेट&#039;, &#039;ओथेलो&#039;, &#039;रोमियो और जूलिएट&#039;, &#039;मैकबेथ&#039; और &#039;विंटर्स टेल&#039; आदि शामिल हैं। शेक्सपियर के नाटकों का विषय संगीत, लोगों की लाइफस्टाइल, प्रेम और विवाह आदि पर आधारित था। शेक्सपियर ने &#039;वीनस एंड एडोनिस&#039; और &#039;द रैप ऑफ ल्यूक्रेस&#039; इन दो कविताओं को हेनरी व्रियोथस्ले को समर्पित किया था। यह दोनों की कविताएं काफी लोकप्रिय हुई थीं।विलियम शेक्सपियर ने अपने शुरूआती करियर के करीब 7 साल बाद तक 15 से ज्यादा नाटक लिखे और उनको प्रकाशित करवाया। फिर 1599 में उन्होंने अपना एक खुद का थिएटर बनाया, जिसका नाम उन्होंने &#039;ग्लोब&#039; रखा था। शेक्सपियर ने इस थिएटर को दोस्तों की मदद से बनाया था।शेक्सपियर की रचनाएंसाल 1590 से लेकर 1613 से विलियम शेक्सपियर ने करीब 37 नाटक लिखे थे। शेक्सपियर के ज्यादातर नाटक हास्य, त्रासदी और इतिहास जैसे विषयों पर आधारित हैं। उन्होंने एक फेमस नाटक &#039;जूलियस सीजर&#039; लिखा, जोकि राजनीति पर आधारित था। इस नाटक में शेक्सपियर ने बताया था कि कैसे अहंकार के घातक परिणाम हो सकते हैं।मृत्युसन 1613 तक विलियम शेक्सपियर स्ट्रेटफोर्ड से रिटायर हो गए चुके थे। वहीं 23 अप्रैल 1616 को विलियम शेक्सपियर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 23 Apr 2026 19:33:32 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>BR Chopra Birth Anniversary: Film Critic से बने Bollywood के &amp;apos;शोमैन&amp;apos;, &amp;apos;Bhootnath&amp;apos; थी आखिरी हिट फिल्म</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 22 अप्रैल को बलदेव राज चोपड़ा का जन्म हुआ था। बलदेव राज चोपड़ा को बी.आर चोपड़ा के नाम से भी जाना जाता है। बी.आर चोपड़ा बॉलीवुड फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माता और निर्देशक थे। उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक फिल्में दी थीं। बलदेव राज चोपड़ा ने फिल्म क्रिटिक के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बी. आर चोपड़ा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारपंजाब के शहीद भगत सिंह नगर जिले के राहोन में 22 अप्रैल 1914 को बलदेव राज चोपड़ा का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम विलायती राज चोपड़ा था। उन्होंने लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की और अंग्रेजी साहित्य में एम.ए की डिग्री हासिल की। बी.आर चोपड़ा की पहली नौकरी साल 1944 में लाहौर से निकलने वाली फिल्म-मासिक पत्रिका सिने हेराल्ड के लिए फिल्म पत्रकार के रूप में थी।इसे भी पढ़ें: Legendary Bollywood singer Asha Bhosle: पार्श्व गायन के एक स्वर्णिम युग का अंतफिल्मी दुनियासाल 1947 में बी.आर चोपड़ा ने अपनी पहली फिल्म &#039;चांदनी चौक&#039; रिलीज हुई थी। जिसको आई.एस जौहर ने लिखा था। इस फिल्म में एरिका रुख्शी और नईम हाशमी ने अभिनय किया था। बी.आर ने सिनेमा जगत में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए। ब्लैक एंड व्हाइट के इस जमाने में उन्होंने लोगों को धार्मिक और पारिवारिक मूल्यों वाली फिल्में दीं। जिनको ऐतिहासिक फिल्मों के अलावा महाभारत के लिए भी याद किया जाता है।&#039;महाभारत&#039; की कहानी को बी आर चोपड़ा ने छोटे पर्दे पर कुछ इस तरह दिखाया कि कभी ऐसी पौराणिक कहानियां देखने को नहीं मिलीं। जब कोरोना लॉकडाउन लगा तो टीवी चैनल पर रामायण और महाभारत सीरियल का प्रसारण फिर से शुरू हुआ। दोनों सीरियल ने इस दौरान टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।आखिरी फिल्मबी आर चोपड़ा के साथ उनके भाई यश चोपड़ा सहायक निर्देशक के तौर पर काम करते थे। वहीं बी.आर चोपड़ा की आखिरी फिल्म &#039;भूतनाथ&#039; थी। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन थे, यह फिल्म सुपरहिट थी।मृत्युवहीं 05 नवंबर 2008 को 94 साल की उम्र में बी.आर चोपड़ा का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 22 Apr 2026 11:47:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Albert Einstein Death Anniversary: राष्ट्रपति का पद ठुकराया, दिमाग पर हुई Research, जानें रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 18 अप्रैल को महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का निधन हो गया था। पूरी दुनिया अल्बर्ट आइंस्टीन के दिमाग का लोहा मानती थी। लेकिन आइंस्टीन का बचपन उनकी बाद की छवि से मेल नहीं खाता था। उनको बहुत बुद्धिमान वैज्ञानिक माना जाता था। बताया जाता है कि आइंस्टीन का मस्तिष्क सामान्य इंसानों से हटकर था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारजर्मनी में एक यहूदी इंजीनियर के घर में 14 मार्च 1879 में अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म हुआ था। बताया जाता है कि जन्म के करीब 4 सालों तक उन्होंने एक भी शब्द नहीं कहा था। तब परिवार ने आइंस्टीन की खूब जांच कराई। सबने एक ही बात कही कि बच्चा बिल्कुल ठीक है। एक रात डिनर के समय गर्म सूप पीते हुए अल्बर्ट का मुंह जल गया। तब परिवार ने बच्चे के मुंह से एक पूरा वाक्य सुना- सूप कितना गर्म है।इसे भी पढ़ें: Benjamin Franklin Death Anniversary: 10 साल में स्कूल छोड़ा, America के बने Founding Father, जानें Benjamin Franklin की कहानीप्रसिद्ध समीकरणआइंस्टीन ने सबसे प्रसिद्ध और शानदार समीकरण &#039;ई ईक्वल्स एमसी स्क्वैयर&#039; दिया था। उन्होंने साल 1905 में इस समीकरण को दुनिया के सामने ऱखा। साथ ही यह भी समझाया कि तारों और परमाणु विस्फोट में किस तरह से ऊर्जा बाहर निकलती है। इस समीकरण के जरिए ही एटम बम बना था। लेकिन हर सिक्के के दो पहलु होते हैं। एटम बम से इंसानियत को तबाह भी किया जा सकता है और बिजली का उत्पादन भी हो सकता है। आइंस्टीन शांत स्वभाव के थे और उनको हिंसा नहीं पसंद थी। इस कारण उन्होंने जर्मनी युद्ध के दौरान शांति का प्रस्ताव रखा था। आइंस्टीन को जर्मनी कभी भी रास नहीं आया। इस कारण 1880 में उन्होंने म्यूनिख जाने का फैसला किया। ऐसे में उनका पूरा परिवार भी म्यूनिख शिफ्ट हो गया।नोबेल पुरस्कारवहीं 09 नवंबर 1922 को &#039;सैद्धांतिक भौतिकी&#039; में आइंस्टीन को उनकी सेवाओं के लिए खासकर फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्‍ट की खोज के लिए &#039;फिजिक्‍स में 1921 का &#039;नोबेल पुरस्कार&#039; दिया गया था। वहीं आइंस्टीन को उनके 70वें जन्मदिन पर उनके सम्मान में &#039;सैद्धांतिक भौतिकी में एक पुरस्कार&#039; का वितरण शुरू किया गया था।ठुकराया था राष्ट्रपति का पदअपनी शर्तों पर जिंदगी जीने वाले आइंस्टीन को इजरायल का राष्ट्रपति बनने का निमंत्रण मिला था। क्योंकि यहूदी चाहते थे कि अल्बर्ट आइंस्टीन इस जिम्मेदारी को संभालें। लेकिन उन्होंने यह कहकर राष्ट्रपति पद को ठुकरा दिया कि उनके अंदर राजनीति और देश संभालने का क्षमता नहीं है।मृत्युवहीं 18 अप्रैल 1955 को अल्बर्ट आइंस्टीन का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 19 Apr 2026 06:22:16 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Chandrashekhar Birth Anniversary: वो PM जिसने Padyatra से नापी Politics की राह, जानें &amp;apos;युवा तुर्क&amp;apos; Chandrashekhar की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और &#039;युवा तुर्क&#039; के नाम से प्रसिद्ध चंद्रशेखर का 17 अप्रैल को जन्म हुआ था। चंद्रशेखर भारत के 8वें प्रधानमंत्री थे और उन्होंने अपनी सादगी, समाजवादी विचारधारा और निर्भीक भाषण के लिए जाने जाते थे। उन्होंने देश में &#039;पदयात्रा&#039; के जरिए लोगों की समस्याओं को समझा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गाँव में 17 अप्रैल 1927 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। अपने कॉलेज टाइम से ही चंद्रशेखर सामाजिक आंदोलनों में शामिल होते थे। वहीं बाद में साल 1951 में वह सोशलिस्ट पार्टी के फुल टाइम वर्कर बन गए थे।इसे भी पढ़ें: Bankim Chandra Chattopadhyay Death Anniversary: वो &#039;साहित्य सम्राट&#039; जिसने कलम से जगाई थी Freedom की ज्वालासियासी सफरजब सोशलिस्ट पार्टी टूटी तो वह कांग्रेस में चले गए। फिर साल 1977 में जब आपातकाल लगा, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। फिर उनकी पहचान इंदिरा गांधी के &#039;मुखर विरोधी&#039; के रूप में बनी। राजनीति में चंद्रशेखर की पारी सोशलिस्ट पार्टी से शुरू हुई थी। जोकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के जरिए कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, समाजवादी जनता दल और फिर समाजवादी जनता पार्टी तक पहुंची।फिर साल 1962 में वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। वहीं सला 1984 से लेकर 1989 तक का समय छोड़कर वह अपनी आखिरी सांस तक लोकसभा के सदस्य रहे। साल 1989 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर अपने गृहक्षेत्र बलिया के अलावा बिहार के महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र से चुने गए। बाद में चंद्रशेखर ने महाराजगंज सीट से इस्तीफा दे दिया।भारत के प्रधानमंत्रीतत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा में 400 से ज्यादा सीटें जीती थीं। लेकिन साल 1989 के चुनावों में राजीव गांधी सरकार पर लगे बोफोर्स घोटाले के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। जिसके बाद जनता दल की सरकार बनी। लेकिन एक साल के अंतराल में ही बीजेपी द्वारा समर्थन वापस लेने की वजह से वीपी सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। वहीं उनकी पार्टी के 64 सांसद अलग हो गए।कांग्रेस के समर्थन पर चंद्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री रहे। लकिन 3 महीने बाद ही कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी की जासूसी कराने के आरोप में चंद्रशेखर की पार्टी से अपना समर्थन वापस ले लिया। ऐसे में आदर्शवादी नेता के रूप में पहचाने जाने वाले चंद्रशेखर को 21 जून 1991 को इस्तीफा देना पड़ा।मृत्युवहीं 08 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 09:00:08 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sarvepalli Radhakrishnan Death Anniversary: Nehru ने Radhakrishnan को क्यों भेजा था Soviet Union? जानें President बनने तक का पूरा सफर</title>
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<description><![CDATA[ महान दार्शनिक और शिक्षक सर्वपल्ली राधाकृष्णन का 17 अप्रैल को निधन हो गया था। डॉ राधाकृष्णन ने पूरी दुनिया को भारत के दर्शन शास्त्र से परिचय कराया था। वह देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। वह 10 सालों तक बतौर उपराष्ट्रपति जिम्मेदारी निभाने के बाद 13 मई 1962 को डॉ राधाकृष्णन को देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के चित्तूर जिले के तिरुत्तनी गांव में 05 सितंबर 1888 को राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। राधाकृष्णन के पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और मां का नाम सीताम्मा था। शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1918 में उनको मैसूर महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र का सहायक प्रध्यापक नियुक्त किया गया। फिर बाद में वह उसी कॉलेज में प्राध्यापक भी बने।राजनीति में आएसाल 1947 में देश की आजादी के बाद पंडित नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। तब पंडित नेहरू ने डॉ. राधाकृष्णन से सोवियत संघ में राजदूत के रूप में काम करने का आग्रह किया। उन्होंने नेहरू की बात मानी और साल 1947 से 1949 तक संविधान सभा के सदस्य के रूप में काम किया। फिर साल 1952 तक वह रूस में भारत के राजदूत बनकर रहे। वहीं 13 मई 1952 को डॉ राधाकृष्णन को देश का पहला उपराष्ट्रपति बने थे। साल 1952 से लेकर 1962 तक दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति रहे।लेखनभारतीय दर्शनशास्त्र और धर्म पर डॉ. राधाकृष्णन ने कई किताबें लिखी। जिनमें &#039;धर्म और समाज&#039;, &#039;गौतम बुद्ध : जीवन और दर्शन&#039;, और &#039;भारत और विश्व&#039; प्रमुख है। वह एक आदर्श शिक्षक और दार्शनिक के रूप में आज भी डॉ राधाकृष्णन सभी के लिए प्रेरणादायक हैं। मरणोपरांत साल 1975 में अमेरिकी सरकार ने उनको &#039;टेम्पल्टन पुरस्कार&#039; से सम्मानित किया गया। इसे भी पढ़ें: Chandrashekhar Birth Anniversary: वो PM जिसने Padyatra से नापी Politics की राह, जानें &#039;युवा तुर्क&#039; Chandrashekhar की कहानीपुरस्कारसाल 1954 में डॉ राधाकृष्णन को &#039;भारत रत्न&#039; पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा उनको पीस प्राइज आफ द जर्मन बुक ट्रेड से भी सम्मानित किया गया। ब्रिटिश शासनकाल में राधाकृष्णन को &#039;सर&#039; की उपाधि दी गई थी। वहीं इंग्लैंड सरकार ने उनको &#039;ऑर्डर ऑफ मेरिट&#039; सम्मान से भी सम्मानित किया था। जर्मनी के पुस्तक प्रकाशन के द्वारा साल 1961 में उनको &#039;विश्व शांति पुरस्कार&#039; से सम्मानित किया गया था।मृत्युडॉ राधाकृष्णन का 17 अप्रैल 1975 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 09:00:06 +0530</pubDate>
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<title>Benjamin Franklin Death Anniversary: 10 साल में स्कूल छोड़ा, America के बने Founding Father, जानें Benjamin Franklin की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ अमेरिकी राजनेता, प्रिंटर, वैज्ञानिक और लेखक बैंजामिन फ्रैंकलिन का आज ही के दिन यानी की 17 जनवरी को निधन हो गया था। उन्होंने अपनी पतंगबाजी के प्रयोग के जरिए ऐसी जानकारी दी, जिससे आज हम करंट और उससे बचाव की सावधानी के बारे में जानते हैं। बैंजामिन फ्रैंकलिन ने तमाम खोज और आविष्कार किए, लेकिन उन्होंने मानवता की सेवा के लिहाज से कभी उनका पेटेंट नहीं कराया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बैंजामिन फ्रैंकलिन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअमेरिका में मेसाचुसेट्स राज्य के बोस्टन शहर में 17 जनवरी 1706 को बैंजामिन फ्रैंकलिन का जन्म हुआ था। इनके पिता मोमबत्ती बनाते थे और वह अपने पिता की 15वीं संतान थे। वहीं फ्रैंकलिन ने 10 साल की उम्र से स्कूल जाना छोड़ दिया था। वह अपने बड़े भाई के साथ प्रिंटिंग प्रेस में काम करने लगे और खुद पढ़ाई करके शिक्षा हासिल की थी।इसे भी पढ़ें: Abraham Lincoln Death Anniversary: जिसने खत्म की Slavery, उसी US President की गोली मारकर हत्या, जानें Abraham Lincoln का आखिरी दिनआविष्कारवहीं 1748 में 41 साल की आयु में फ्रैंकलिन इतने ज्यादा धनी हो गए थे कि वह व्यवसाय से सेवानिवृत्त होकर एक सज्जन व्यक्ति की तरह अपना जीवन बिता सकते हैं। लेकिन वह वैज्ञानिक प्रयोग और आविष्कार पर केंद्रित करना और उसमें महारत हासिल करना चाहते थे। विशेष रूप से बिजली गिरने की विद्युतीय प्रकृति को सिद्ध करने वाले अपने पतंग प्रयोग के लिए उन्होंने यूरोप में अपार ख्याति प्राप्त की थी। वह अमेरिका के अग्रणी विचारकों में से एक बन गए थे। वहीं साल 1753 में रॉयल सोसाइटी ने उनको अपना सर्वोच्च सम्मान &#039;कॉपले मेडल&#039; दिया था।अमेरिका वापसीसाल 1785 में युद्धग्रस्त और उबर रहे संयुक्त राज्य अमेरिका में लौटने पर बैंजामिन फ्रैंकलिन एक नायक के रूप में स्वागत किया गया। कांग्रेस फ्रांस की भूमिका को कम करके आंकना चाहती थी। इसलिए गठबंधन को सुरक्षित करने के बैंजामिन के प्रयासों के लिए उनको कोई ठोस पुरस्कार नहीं दिया गया। लेकिन इसके बाद तीन वर्षों तक उन्होंने पेंसिल्वेनिया के वास्तविक गवर्नर के रूप में कार्य किया। वहीं 1787 में संवैधानिक सम्मेलन में बैंजामिन सबसे उम्रदराज प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए थे।मृत्युवॉशिंगटन के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के एक साल बाद यानी की 17 अप्रैल 1790 को 84 साल की उम्र में बैंजामिन फ्रैंकलिन का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:31:34 +0530</pubDate>
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<title>Abraham Lincoln Death Anniversary: जिसने खत्म की Slavery, उसी US President की गोली मारकर हत्या, जानें Abraham Lincoln का आखिरी दिन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 अप्रैल को अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अमेरिका के इतिहास में आज का दिन काफी अहम है। अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने देश को गृहयुद्ध से बाहर निकाला था और दास प्रथा खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन उनकी हत्या आज भी रहस्यों से घिरी है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अब्राहम लिंकन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारएक गरीब परिवार में 12 फरवरी 1809 को अब्राहम लिंकन का जन्म हुआ था। शुरूआती जीवन से ही कई उतार-चढ़ाव भरा रहा है। इनके पिता का नाम थॉमस लिंकन था और मां का नाम नैन्सी हैंक्स था। जब लिंकन 10 साल के थे, तो उनकी मां की मौत हो गई थी।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Birth Anniversary: World War II में 7 गोलियां खाकर भी नहीं मानी हार, ऐसे थे भारत के पहले Field Marshal सैम मानेकशॉराष्ट्रपति बने लिंकनशुरूआती संघर्षों के बाद अब्राहम लिंकन ने एक वकील के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। साल 1858 में लिंकन सीनेटर के लिए स्टीफन ए डगलस के खिलाफ चुनाव लड़ा था। लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इस चुनाव के कारण अब्राहम लिंकन पूरे देश में मशहूर हो गए। इसी के चलते लिंकन ने साल 1860 में राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन नामांकन जीता था।साल 1860 में अब्राहम लिंकन वह पहले रिपब्लिकन थे, जो अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में रिपब्लिकन पार्टी को एक मजबूत राष्ट्रीय संगठन बनाया। वहीं 01 जनवरी 1863 को राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने मुक्ति की उद्घोषणा जारी की। जिसने गुलामों को हमेशा के लिए आजाद कराने का ऐलान किया था। वहीं 04 मार्च 1864 को अब्राहम लिंकन को दोबारा से अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया था।लिंकन की हत्यावहीं 14 अप्रैल 1865 को गृह युद्ध खत्म होने पर गुड फ्राइडे को एक समारोह रखा गया था। इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन वाशिंगटन डीसी के फोर्ड थिएटर में पहुंचे थे। इस दौरान अभिनेता जॉन विल्कीस बूथ ने अब्राहम लिंकन को गोली मार दी। वहीं गोली लगने के अगले दिन 15 अप्रैल 1865 को अब्राहम लिंकन का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 09:35:10 +0530</pubDate>
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<title>Guru Arjun Dev Birth Anniversary: Golden Temple की रखी नींव, Guru Granth Sahib का किया था संपादन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 अप्रैल को सिखों के 5वें गुरु, गुरु अर्जुन देव जी का जन्म हुआ था। उनका पूरा जीवन मानव सेवा को समर्पित रहा। गुरु अर्जुन देव दया और करुणा के सागर थे। वह समाज के हर वर्ग और समुदाय को समान भाव से देखते थे। वह मानवता के सच्चे सेवक, धर्म के रक्षक, शांत और गंभीर स्वभाव के मालिक थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अर्जुन देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर में 15 अप्रैल 1563 को गुरु अर्जुन देव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गुरु रामदासजी था, जोकि सिख धर्म के चौथे गुरु थे और इनकी मां का नाम भानीजी था। अर्जुन देव जी को हिंदी, फारसी और संस्कृत भाषाओं की शिक्षा दी गई थी।इसे भी पढ़ें: Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें &#039;हिंद की चादर&#039; बनने का पूरा सफरगुरु ग्रंथ साहिब का संपादनसंपादन कला के गुणी गुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन किया था। उन्होंने रागों के आधार पर श्रीगुरु ग्रंथ साहिब जी में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल दुर्लभ है। श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में कुल 5894 शब्द हैं, जिनमें से 2216 शब्द गुरु अर्जुन देव जी के हैं।पांचवे गुरुवहीं 1582 में गुरु अर्जुन देव जी सिखों के पांचवे गुरु बने थे। उन्होंने अमृतसर में श्रीहरमंदिर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखी थी। जिसको आज हम स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि इस गुरुद्वारे का नक्शा स्वयं अर्जुन देव जी ने बनाया था।बलिदान1605 में जब जहांगीर मुगल साम्राज्य का बादशाह बना, तो शहजादा खुसरों ने जहांगीर के खिलाफ बगावत कर दी। फिर खुसरो भागकर पंजाब चला गया और गुरु अर्जुन देव ने उसको पनाह दी। जब इसकी जानकारी जहांगीर को हुई, तो वह अर्जुन देव पर भड़क गया। जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। वहीं अर्जुन देव स्वयं लाहौर पहुंच गए और जहांगीर ने उनको जान से मारने का आदेश दिया।जिसके बाद गुरु अर्जुन देव को 5 दिनों तक भीषण यातनाएं दी गईं। फिर 30 मई 1606 को लाहौर की भीषण गर्मी में गुरु अर्जुन देव को गर्म तवे पर बिठाया गया। उनके ऊपर गर्म रेत और तेल डाला गया। यातना की वजह से वह मूर्छित हो गए और उनके शरीर को रावी नदी में बहा दिया गया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 09:35:10 +0530</pubDate>
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<title>आशा जी की मधुर और सुरमयी आवाज सदा दिलों में अमर रहेगी</title>
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<description><![CDATA[ आशा भोंसले जी का नाम भारतीय संगीत इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने करियर में आठ दशकों से भी अधिक समय तक संगीत जगत में अमूल्य योगदान दिया है और लगभग 12 हजार से अधिक गीतों को अपनी मधुर आवाज से सजाया है। आशा भोंसले जी, जो भारत की महानतम और दिग्गज गायिकाओं में से एक थीं। आशा जी का नाम संगीत जगत में सदैव एक सिरमौर के रूप में लिया जाएगा। दिनांक 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 साल की उम्र में उनका दुखद निधन हो गया। उनके दुखद निधन का समाचार पूरे विश्व के संगीत प्रेमियों के लिए अत्यंत पीड़ादायक है। यह क्षति न केवल भारतीय संगीत जगत के लिए, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के लिए भी अपूरणीय है। आशा भोंसले जी के जीवन के बारे में बात की जाये तो उनका जन्म 8 सितम्बर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में एक समृद्ध संगीत परंपरा वाले परिवार में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक एवं रंगमंच कलाकार थे, जिनसे उन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा मिली। बचपन से ही संगीत के वातावरण में पली-बढ़ीं आशा जी ने बहुत कम उम्र में ही गायन प्रारंभ कर दिया। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्होंने किशोरावस्था में ही फिल्मों में गाना शुरू कर दिया और कठिन परिस्थितियों और संघर्षों के बावजूद अपने करियर की मजबूत नींव रखी। उनकी बड़ी बहन सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर विश्वप्रसिद्ध गायिका रहीं, जबकि उनकी अन्य बहनें मीना मंगेशकर और उषा मंगेशकर ने भी संगीत जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। इस प्रकार मंगेशकर परिवार ने सामूहिक रूप से भारतीय संगीत को समृद्ध किया और एक अमूल्य सांगीतिक विरासत स्थापित की, जिसका प्रभाव आज भी भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।अपने शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे संगीत जगत में एक विशिष्ट स्थान बना लिया। उन्होंने ओ. पी. नैयर, आर. डी. बर्मन और खय्याम जैसे महान संगीतकारों के साथ काम करते हुए अनेक अमर गीतों को जन्म दिया। विशेष रूप से आर. डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और कई सदाबहार गीत दिए। आशा जी ने अपने दीर्घ और गौरवशाली संगीत जीवन में भारतीय शास्त्रीय संगीत से लेकर फिल्मी गीतों, गजलों, भजनों और लोकगीतों तक हर शैली में अपनी अद्वितीय छाप छोड़ी। उनकी आवाज की मधुरता, लचीलापन और भावनात्मक अभिव्यक्ति ने उन्हें अन्य गायिकाओं से अलग पहचान दिलाई। उन्होंने हिंदी, मराठी, बांग्ला, तमिल, गुजराती सहित अनेक भाषाओं में हजारों गीत गाकर विश्वभर में भारतीय संगीत का परचम लहराया। आशा भोंसले जी की असाधारण उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म विभूषण, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, तथा कई बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त, उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया, जहाँ उन्हें विश्व की सर्वाधिक रिकॉर्डिंग करने वाली गायिकाओं में शामिल किया गया, जो उनके अद्वितीय और विशाल संगीत योगदान का प्रमाण है।इसे भी पढ़ें: Bankim Chandra Chattopadhyay Death Anniversary: वो &#039;साहित्य सम्राट&#039; जिसने कलम से जगाई थी Freedom की ज्वालाआशा जी और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर जी का संबंध भारतीय संगीत इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक रहा है। दोनों बहनों ने अपने-अपने विशिष्ट अंदाज और आवाज के माध्यम से संगीत जगत में अलग-अलग पहचान बनाई, फिर भी उनके बीच गहरा पारिवारिक और सांगीतिक जुड़ाव बना रहा। जहाँ लता जी को उनकी मधुर और शुद्ध आवाज के लिए जाना जाता था, वहीं आशा जी अपनी बहुआयामी और प्रयोगधर्मी शैली के लिए प्रसिद्ध रहीं। इन दोनों बहनों ने मिलकर भारतीय फिल्म संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत छोड़ी। आशा जी के व्यक्तिगत जीवन की बात करें, तो उनका जीवन भी अनेक उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 16 साल की उम्र में उन्होंने गणपतराव भोसले से विवाह किया, जो अधिक समय तक सफल नहीं रहा। इसके बाद उन्होंने अपने साहस और आत्मविश्वास के बल पर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। बाद में उनका विवाह महान संगीतकार आर. डी. बर्मन से हुआ, जिनके साथ उनका संबंध न केवल वैवाहिक बल्कि सांगीतिक रूप से भी अत्यंत सफल और प्रेरणादायक रहा। उनके परिवार में उनके बच्चे और पोते-पोतियाँ शामिल हैं, जिनके साथ उनका गहरा स्नेहपूर्ण संबंध रहा।उनकी आवाज केवल गीत नहीं थी, बल्कि भावनाओं का अथाह सागर थी- खुशी, दर्द, प्रेम और जीवन के हर रंग को उन्होंने अपने सुरों में अद्भुत संवेदनशीलता के साथ पिरोया। दशकों तक उन्होंने संगीत जगत पर अपनी अमिट छाप बनाए रखी और हमें अनगिनत यादगार गीतों की अमूल्य धरोहर दी, जो सदैव हमारे दिलों में गूंजती रहेगी। उन्होंने अपनी मधुर और भावपूर्ण आवाज से कई पीढ़ियों के हृदय को स्पर्श किया तथा भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके गीत न केवल मनोरंजन का माध्यम रहे, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त स्वर भी बने, जो उन्हें सदैव हमारे बीच जीवित रखेंगे। आज का दिन हर भारतीय, विशेषकर संगीत प्रेमियों के लिए अत्यंत दुखद है। आशा जी ने न केवल अपनी सुरमयी आवाज से एक विशिष्ट पहचान बनाई, बल्कि अपने सुरों के माध्यम से भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। हर तरह के संगीत में ढल जाने की उनकी अनोखी प्रतिभा ने उन्हें युगों-युगों तक अमर बना दिया है। उनके गाए हुए गीत आज भी हर दिल में जीवित हैं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेंगे। आशा जी भले ही आज हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनका संगीत सदैव अमर रहेगा और उनके सुर हमेशा हमारे दिलों में गूंजते रहेंगे।- डॉ. ]]></description>
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<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 09:36:33 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Legendary Bollywood singer Asha Bhosle: पार्श्व गायन के एक स्वर्णिम युग का अंत</title>
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<description><![CDATA[ देश की महान पार्श्व गायिका आशा भोंसले जी का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मी, स्वर साधिका आशा भोंसले जी अपनी आवाज़ के जादू से संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करती थीं। पिता दीनानाथ मंगेशकर ने ही अपनी पुत्री आशा को संगीत की आरंभिक शिक्षा दी किन्तु जब आशा की आयु मात्र 9 वर्ष की थी तभी दीनानाथ जी का निधन हो गया और पूरा परिवार मुंबई आ गया। परिवार की आर्थिक सहायता के लिए आशा और इनकी बड़़ी बहन लता मंगेशकर जी ने फिल्मों में गीत गाना और अभिनय करना आरम्भ किया।आशा जी ने प्रथम गीत 1943 में मराठी फिल्म माझा बाल में गाया था। 1948 में हिंदी फिल्म चुनरिया का गीत “सावन आया“ हंसराज बहल के लिए गाया। आशा भोंसले ने 20 भाषाओं में 12 हजार से अधिक गीत गाए हैं। आशा जी ने मराठी, असमिया, हिंदी, तेलुगू, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, और मलयालम भाषा में गीत तो गाये ही वहीं विदेशी अंग्रेजी, रशियन, नेपाली, मलय आदि भाषाओं में भी गीत गाकर इतिहास रचा। इसे भी पढ़ें: आशा जी की मधुर और सुरमयी आवाज सदा दिलों में अमर रहेगीएक समय ऐसा था जब आशा जी को नायिकाओं पर फिल्माए जाने वाले प्रमुख गीत नहीं मिलते थे। 1950 के दशक में आशा जी ने दूसरी-तीसरी श्रेणी की फिल्मों या फिर खलनायिकाओं वाले गीत गाए।आशा जी की लोकप्रियता फिल्म बूट पॉलिश के गीत “नन्हें मुन्ने बच्चों“ के साथ हुई। आशा जी को सबसे बड़ा अवसर 1956 में ओ.पी. नैयर की फिल्म सीआईडी में मिला, इस फिल्म के गीत बेहद लोकप्रिय हुए। 1957 मे बी. आर. चोपड़ा की फिल्म नया दौर के गीतों  से कमाल हो गया और इन फिल्म के गीत जनमानस में छा गये थे।1966 में संगीतकार आर.डी. बर्मन की सबसे सफल फिल्म तीसरी मंजिल से आशा जी की आवाज़ का जादू श्रोताओं के सर चढ़कर बोलने लगा। 1970 तक आशा जी एक प्रमुख आवाज़ बन गयीं। उस समय के गीत आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। 1981से 1987 तक आशा जी ने अपने गीतों का लोहा मनवा लिया।  आशा जी ने कई संगीत निर्देशकों के साथ काम किया, जिनमें संगीतकार ओ. पी, नैयर, खैय्याम, रवि, सचिन देव बर्मन के साथ उनकी साझीदारी बहुत प्रभावशाली रही। संगीत निर्देशक जयदेव ने आशा जी के साथ कई फिल्मों के लिए गीत रिकॉर्ड किए। 1987 में जयदेव जी के निधन के बाद उनके कम प्रसिद्ध गीतों का संकलन जो जयदेव के द्वारा संगीतबद्ध था सुरांजलि नाम से निकाला गया इसमें आशा जी की प्रमुख भूमिका थी। संगीतकार शंकर जयकिशन के साथ आशा जी ने जो गीत गाए वे काफी लोकप्रिय हुए। आशा जी ने ही 1970 में मेरा नाम जोकर प्रसिद्ध फिल्म के गीत गाए और लोकप्रियता बटोरी।आशा जी ने इलैया राजा से लेकर इस पीढ़ी के ए आर रहमान तक के साथ किया। फिल्मी दुनिया में शायद ही ऐसा कोई संगीताकर हो जिसके लिए आशा जी ने गीत न गाया हो। आशा जी ने कई निजी एलबम भी निकाले इनमें  “कभी तो नजर मिलाओ“ और “बरसे बादल“ काफी लोकप्रिय हुए। गायन की विविधता से आशा जी ने अपनी गायकी में अभूतपूर्व ऊंचाई प्राप्त कीआशा भोंसले जी को सात बार फिल्म फेयर पुरस्कार, 1995 में फिल्म रंगीला के लिए विशेष पुरस्कार, 2001 में फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट, 1981 में उमराव जान और 1986 में इजाजत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। 1997 में आशा जी को उस्ताद अली अकबर खान के साथ विशेष एलबम के लिए ग्रैमी अवार्ड हेतु नामांकित किया गया । वर्ष 2000 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2008 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। आशा जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी अंकित है। - मृत्युंजय दीक्षित ]]></description>
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<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 09:36:32 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Rana Sanga Birth Anniversary: वो Rajput योद्धा जिसने Babur को दी कड़ी टक्कर, जानें Khanwa युद्ध की पूरी Story</title>
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<description><![CDATA[ महान राजपूत शासक राणा सांगा का 12 अप्रैल को जन्म हुआ था। राणा सांगा अपने दुश्मनों पर काल बनकर टूटते थे और उनका नाम सुनकर दुश्मन भी डर के मारे कांपते थे। वह एक अत्यंत पराक्रमी राजा थे। राणा सांगा का एक हाथ, एक आंख और एक पैर कट जाने के बाद भी उन्होंने अपने राज्य की लड़ाई लड़ने का जज्बा नहीं छोड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राणा सांगा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमेवाड़ के चित्तौड़ वर्तमान राजस्थान में 12 अप्रैल 1482 को राणा सांगा का जन्म हुआ था। वह राजपूत वंश से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम राणा रायमल था और रानी रतन कुंवरी उनकी मां थीं। पिता की मृत्यु के बाद मेवाड़ के पुत्रों के बीच सिंहासन के लिए एक भयंकर संघर्ष का सामना करना पड़ा था।अपने भाइयों के साथ संघर्ष में पृथ्वीराज ने राणा सांगा की एक आंख फोड़ दी थी। ऐसे में उनको चित्तौड़ से भागकर अजमेर में शरण लेना पड़ा। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद 1508 में राणा सांगा मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे थे।सैन्य उपलब्धियांमेवाड़ के इतिहास में 1508 से 1528 तक का समय राणा सांगा के शासनकाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान राणा सांगा ने अपने सैन्य कमान, अदम्य साहस और कूटनीतिक रणनीतियों के जरिए मेवाड़ के वर्चस्व और समृद्धि को बहाल किया था।राणा सांगा ने करीब 18 भीषण लड़ाइयों में दिल्ली के लोदी वंश, मालवा और गुजरात के सुल्तानों सहित कई पड़ोसी मुस्लिम शासकों के खिलाफ जीत हासिल की थी। वहीं उन्होंने वर्तमान राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और सिंध के कुछ हिस्सों सहित मेवाड़ के क्षेत्र का काफी ज्यादा विस्तार किया था।मुगलों के साथ संघर्षबाबर के अधीन बढ़ते मुगल साम्राज्य के खिलाफ राणा सांगा अपने विरोध के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बाबर की सेना को चुनौती देने के लिए एक महान राजपूत परिसंघ का गठन किया था। वहीं 1527 में खानवा का युद्ध राणा सांगा के लिए एक निर्णायक लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध साबित हुआ। यहां पर राणा सांगा की सेना अपनी बहादुरी के बाद भी बाबर की बेहतर रणनीति और तोपखाने से हार गई। इस युद्ध में राणा सांगा भी बुरी तरह से जख्मी हो गए थे।मृत्युवहीं 30 जनवरी 1528 को राणा सांगा की कालपी में मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 23:22:26 +0530</pubDate>
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<title>Lalji Tandon Birth Anniversary: UP Politics के &amp;apos;चाणक्य&amp;apos; थे लालजी टंडन, Mayawati बांधती थीं राखी</title>
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<description><![CDATA[ मध्य प्रदेश के राज्यपाल और लखनऊ के पूर्व सांसद लालजी टंडन का जन्म 12 अप्रैल को हुआ था। वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद करीबी थे। यही कारण था कि जब बाजपेयी राजनीति से दूर हुए, तो उनकी विरासत लखनऊ लोकसभा सीट लालजी टंडन को दी गई थी। वह भाजपा-बसपा की गठबंधन सरकार में नगर विकास मंत्री रहे थे। उन्होंने बसपा सुप्रीमो मायावती को बहन माना था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर लालजी टंडन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 12 अप्रैल 1935 को लालजी टंडन का जन्म हुआ था। वहीं महज 12 साल की उम्र में वह संघ से जुड़ गए थे। वह संघ की शाखाओं में जाया करते थे, संघ से जुड़ाव के कारण ही लालजी टंडन की मुलाकाल अटल बिहारी वाजपेयी से हुई थी।यूपी की राजनीति में कई प्रयोगउत्तर प्रदेश की राजनीति में लालजी टंडन को अलग-अलग प्रयोगों के लिए जाना जाता है। 90 के दशक में यूपी में बनी भाजपा और बसपा की सरकार के गठजोड़ के पीछे लालजी टंडन की बड़ी भूमिका मानी जाती है। बसपा प्रमुख मायावती लालजी टंडन को राखी बांधती थीं।संभाली लखनऊ की कमानसाल 1996 से लेकर 2009 तक लालजी टंडन लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीते थे। वहीं साल 1997 में वह नगर विकास मंत्री भी रहे। पूर्व पीएम अटल बिहारी के राजनीति से दूर होने के बाद साल 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने लखनऊ लोकसभा सीट लालजी टंडन को सौंपी थी। उन्होंने यहां से चुनाव भी लड़ा था। इससे पहले साल 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 1996 तक वह दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। फिर साल 1991 में वह उत्तर प्रदेश के मंत्री पद पर भी रहे थे।मृत्युवहीं 21 जुलाई 2020 को 85 वर्ष की आयु में लखनऊ के मेदांता अस्पताल में लालजी टंडन का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 23:19:07 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Lalji, Tandon, Birth, Anniversary:, Politics, के, चाणक्य, थे, लालजी, टंडन, Mayawati, बांधती, थीं, राखी</media:keywords>
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<title>Morarji Desai Death Anniversary: पहले Non&#45;Congress PM जिन्हें मिला Bharat Ratna, जानें क्यों Pakistan ने भी दिया सर्वोच्च सम्मान</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय राजनीति में बहुत कम ऐसे राजनेता हुए, जिन्होंने पूरा जीवन अपने सिद्धांतों का पालन किया। ऐसे ही एक राजनेता मोरारजी देसाई थे। वह अपने सिद्धांतों के लिए किसी से भी लड़ जाते थे। मोरारजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री थे। आज ही के दिन यानी की 10 अप्रैल को मोरारजी देसाई का निधन हो गया था। वह प्रशासनिक नौकरी छोड़कर राजनीति में शामिल हुए थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोरारजी देसाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के भदेली गांव में 29 फरवरी 1896 को मोरारजी देसाई का जन्म हुआ था। देसाई के पिता एक स्कूल शिक्षक थे और बेहद अनुशासन प्रिय थे। बचपन से ही उन्होंने अपने पिता से सभी परिस्थितियों में कड़ी मेहनत करने और सच्चाई के मार्ग पर चलने की सीख ली थी।PM पद के सबसे मजबूत दावेदारमोरारजी देसाई बहुत काबिल नेता थे। साल 1964 में तत्कालीन पीएम नेहरू के निधन के बाद वह पीएम पद के सबसे मजदूर दावेदार थे। लेकिन कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी के कारण वह अपने साथ अधिक सदस्यों को नहीं जोड़ पाए। ऐसे में लाल बहादुर शास्त्री अगले पीएम बने। लेकिन साल 1966 में शास्त्री के निधन के बाद एक बार फिर पीएम पद खाली हो गया। मोरारजी और इंदिरा गांधी में प्रधानमंत्री बनने को लेकर टक्कर थी।मोरारजी देसाई खुद को कांग्रेस का बड़ा नेता समझते थे। वह इंदिरा को गूंगी गुड़िया कहते थे। वहीं अन्य कई नेता भी इंदिरा का विरोध कर रहे थे। लेकिन इसके बाद भी इंदिरा गांधी देश की अगली प्रधानमंत्री बनीं और मोरारजी का विरोध दरकिनार रह गए।जयप्रकाश के समर्थन से बने PMवहीं नवंबर 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ और इंदिरा ने नई कांग्रेस बनाई। तो मोरारजी देसाई इंदिरा के खिलाफ वाले खेमे कांग्रेस ओ में थे। साल 1975 में देसाई जनता पार्टी में शामिल हो गए। वहीं मार्च 1977 में जब लोकसभा चुनाव हुए, तो जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। लेकिन देसाई के लिए पीएम बनना इतना आसान नहीं था। क्योंकि चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम भी पीएम पद के दावेदार थे। ऐसे में जेपी नारायण का समर्थन काम आया और मोरारजी पीएम बने। बता दें कि साल 1977 से लेकर 1979 तक मोरारजी देसाई का कार्यकाल बतौर प्रधानमंत्री रहे। लेकिन चौधरी चरण सिंह के साथ हुए मतभेदों की वजह से उनको प्रधानमंत्री का पद छोड़ना पड़ा।सम्मानमोरारजी देसाई देश के इकलौते प्रधानमंत्री थे, जिनको भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है। उनको भारत रत्न और पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान &#039;निशान-ए-पाकिस्तान&#039; मिल चुका है।मृत्युवहीं 28 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई ने भारत के पीएम पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने 83 साल की उम्र में राजनीति से संन्यास ले लिया और वह दिल्ली छोड़कर मुंबई में रहने लगे। फिर 10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में मोरारजी देसाई का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 11:38:57 +0530</pubDate>
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<title>Jyotiba Phule Birth Anniversary: 19वीं सदी के वो नायक, जिनकी Social Justice की लड़ाई आज भी प्रासंगिक है</title>
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<description><![CDATA[ भारत के महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर आता है। आज ही के दिन यानी की 11 अप्रैल को ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ था। जब 19वीं सदी में समाज में ऊंच-नीच और जातिवाद का बोलबाला था। तब फुले के साहस ने दिखाया और हर व्यक्ति के लिए समान अधिकार के लिए आवाज उठाई थी। उनका मानना था कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिससे हम समाज में बदलाव ला सकते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योतिबा फुले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र में 11 अप्रैल 1827 को ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ था। वह नीची जाति के माली परिवार में पैदा हुए थे। उनको जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उनके अंदर समाज की जड़ें छुड़ाने का संकल्प जगाया। ज्योतिबा फुले का मानना था कि हर व्यक्ति चाहे किसी भी जाति या लिंग का हो, वह समान अवसर का हकदार है।शिक्षा को बनाया हथियारज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने दलित बच्चों और लड़कियों के लिए स्कूल खोले। उस दौर में जब महिलाओं का पढ़ना-लिखना असंभव था, तब उन्होंने विधवाओं के अधिकारों की रक्षा की और अनाथ बच्चों और विधवाओं के लिए आश्रम खोले। ज्योतिबा फुले का यह कदम साहसिक और विवादास्पद माना गया था।महात्मा की उपाधिशोषित वर्ग और दलितों को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। ज्योतिबा फुले की समाजसेवा देखकर साल 1888 में मुंबई में एक विशाल सभा में उनको महात्मा की उपाधि दी गई। ज्योतिबा ने ही पहली बार दलित शब्द का प्रयोग किया था।ज्योतिबा फुले बाल विवाह विरोधी और विधवा विवाह के समर्थक थे। उन्होंने साल 1863 में उच्च वर्ग गर्भवती विधवाओं के लिए एक घर शुरू किया था, जहां पर गर्भवती महिलाएं अपने बच्चे को सुरक्षित रूप से जन्म दे सकें। ज्योतिबा फुल ने भ्रूण हत्या और शिशु हत्या रोकने के लिए एक अभियान चलाया और अनाथालय खोला।मृत्युवहीं 28 नवंबर 1890 को ज्योतिबा फुले का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 11:38:56 +0530</pubDate>
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<title>Kasturba Gandhi Birth Anniversary: सिर्फ Mahatma Gandhi की पत्नी नहीं, एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी थीं &amp;apos;बा&amp;apos;, Freedom Struggle में कई बार गईं जेल</title>
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<description><![CDATA[ महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक कस्तूरबा गांधी का 11 अप्रैल को जन्म हुआ था। वह महात्मा गांधी की पत्नी थीं। लोग कस्तूरबा गांधी को &#039;बा&#039; भी कहते थे। कस्तूरबा गांधी ने ब्रिटिश भारत के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कस्तूरबा गांधी ने हर कदम पर महात्मा गांधी का साथ दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर कस्तूरबा गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के पोरबंदर में 11 अप्रैल 1869 को कस्तूरबा गांधी का जन्म हुआ था। वहीं महज 13 साल की उम्र में कस्तूरबा गांधी का विवाह महात्मा गांधी से कर दिया गया था। औपचारित रूप से कस्तूरबा गांधी पढ़ी-लिखी नहीं थी। शादी के बाद महात्मा गांधी ने अपनी पत्नी को पढ़ाने का काम किया था।शिक्षा के प्रति जागरुकताकस्तूरबा मोहनदास करमचंद गांधी को &#039;बा&#039; के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपने जीवन में कई सारी भूमिकाएं निभाईं। सीमित संसाधनों के बाद भी कस्तूरबा ने असाधारण साहस दिखाया। उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए यह साबित कर दिखाया था कि असली ताकत ज्ञान की डिग्री नहीं बल्कि इरादों और हिम्मत में होती है।आजादी में योगदानकस्तूरबा गांधी ने हमेशा अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाई। हालांकि वह गांधीजी की सभी बातों से सहमत नहीं रहती थीं। लेकिन जब महात्मा गांधी ने अपने सिद्धांतों को घर पर लागू करना शुरू किया तो कस्तूरबा ने इसका विरोध किया। कस्तूरबा गांधी ने हमेशा आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए आवाज उठाई। साल 1977 में उन्होंने साउथ अफ्रीका में चंपारण सत्याग्रह आंदोलनों में हिस्सा लिया। कस्तूरबा ने स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के कारण वह कई बार जेल भी गईं।मृत्युमहाराष्ट्र स्थित आगा खान महल में 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी की मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 11:38:55 +0530</pubDate>
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<title>Ravindra Kaushik Birth Anniversary: जानें RAW के जासूस रवींद्र कौशिक की कहानी, जिसे Pakistan में मिला था मेजर का पद</title>
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<description><![CDATA[ रवींद्र कौशिक एक जबांज देशभक्त थे। आज ही के दिन यानी की 11 अप्रैल को रवींद्र कौशिक का जन्म हुआ था। वह एक भारतीय अभिनेता थे, जिनको RAW ने जासूस बनाकर पाकिस्तान भेजा था। उन्होंने पाकिस्तान में रहकर वहां की सेना में मेजर के पद तक का सफर तय किया था। 8 सालों तक वह कई अहम जानकारियां भारत भेजते रहे थे। हालांकि एक ऑपरेशन के दौरान उनका भेद खुल गया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रवींद्र कौशिक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारराजस्थान के श्रीगंगानगर में 11 अप्रैल 1952 को रवींद्र कौशिक का जन्म हुआ था। वह एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार से आते थे। रवींद्र पढ़ाई में तेज और कला के प्रति जुनूनी थे। वह कॉलेज के दिनों में कई स्टेज नाटक में हिस्सा लेते थे। अभिनय की गहराई और संवाद की अदायगी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती थी। उनकी किस्मत ने यहीं से मोड़ लिया। एक नाटक में रवींद्र को भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग अधिकारियों ने देखा। यहां से तय हुआ कि यह कलाकार एक दिन जासूस बनेगा। ऐसे हुई ट्रेनिंगबता दें कि 23 साल की उम्र में रवींद्र कौशिक को RAW ने सीक्रेटली रिक्रूट किया। फिर उनको दो सालों तक ट्रेनिंग दी गई। जिसमें उनको इस्लामी रीति-रिवाज, उर्दू, पाकिस्तान की राजनीति और मिलिट्री स्ट्रक्चर आदि के बारे में जानकारी दी गई। रवींद्र का नाम, धर्म और पहचान सब बदल दी गई। अब वह रवींद्र से &#039;नबी अहमद शाकिर&#039; बन चुके थे। साल 1975 में उनको पाकिस्तान भेज दिया गया था। यहां पर उन्होंने लॉ की पढ़ाई की और सेना में कमीशन लिया और मेजर बन गए। रवींद्र ने RAW को कई अहम जानकारियां भेजीं, जोकि भारत की सुरक्षा के लिए अहम साबित हुईं।रॉ तक पहुंचाई कई जानकारीपाकिस्तान में रवींद्र पूरी तरह से अपनी नई पहचान में रह चुके थे। रवींद्र ने एक पाकिस्तानी महिला से शादी की और उनका एक बेटा भी था। वह पूरी तरह से पाकिस्तानी नागरिक की तरह जीते रहे। लेकिन अंदर से वह एक सच्चे भारतीय थे। पाकिस्तानी सेना में रहते हुए वह सामरिक दस्तावेज, गुप्त मिशन और सेना की गतिविधियों की जानकारी RAW तक पहुंचाते रहे। करीब 8 साल तक वह पाकिस्तान में देश के लिए काम करते रहे। लेकिन बिना किसी शक के उनकी जिंदगी हमेशा के लिए ऐसी नहीं चल सकी।पकड़े गए रवींद्रसाल 1983 में रवींद्र का नाम उजागर हो गया और इसके बाद उनको फौरन गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने उनको पकड़कर भारी यातनाएं दीं। रवींद्र कौशिक कई सालों तक जेल की काल कोठरी में अमानवीय परिस्थितियों में रहकर सब कुछ सहा। लेकिन उन्होंने देश के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। वहीं साल 1985 में रवींद्र को फांसी की सजा सुनाई थी, जोकि बाद में उम्र कैद में बदल गई।मृत्युपाकिस्तानी जेल में रवींद्र ने 16 साल बिताए थे। टीबी और दिल की बीमारे ने धीरे-धीरे रवींद्र की हालत बिगाड़ दी थी। वहीं 2001 में रवींद्र कौशिक का मुल्तान जेल में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 11:38:54 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Ravindra, Kaushik, Birth, Anniversary:, जानें, RAW, के, जासूस, रवींद्र, कौशिक, की, कहानी, जिसे, Pakistan, में, मिला, था, मेजर, का, पद</media:keywords>
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<title>Bankim Chandra Chattopadhyay Death Anniversary: वो &amp;apos;साहित्य सम्राट&amp;apos; जिसने कलम से जगाई थी Freedom की ज्वाला</title>
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<description><![CDATA[ भारत के प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार और कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का 08 अप्रैल को निधन हो गया था। उनको बंगाली भाषा का साहित्य का सम्राट कहा जाता है। वह भारतीय राष्ट्रवाद के शुरूआती समर्थकों में से एक थे। वहीं उनकी रचनाएं स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा देती थीं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की सबसे फेमस रचना &#039;वंदे मातरम्&#039; है, जो आजादी की लड़ाई का नारा बन गया। तो आइए जानते हैं उनके डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षापश्चिम बंगाल में 27 जून 1838 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म हुआ था। उन्होंने बंगाली और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में शिक्षा ली थी। बंकिम चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की थी। फिर उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान सरकारी नौकरी भी की। उन्होंने अपने साहित्य से लोगों को जागरुक किया और आदाजीस की भावना को मजबूत किया।इसे भी पढ़ें: Pandit Ravi Shankar Birth Anniversary: बनारस से America तक, सितार के सुरों से दुनिया जीतने वाले &#039;Maestro&#039; की कहानीबंगाली साहित्य के लेखकबंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को बंगाली साहित्य के सबसे महान लेखकों में एक माना जाता है। उनके उपन्यासों और कहानियों ने भारतीय साहित्य को नई दिशा दी है। अंग्रेजों के शासन में लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जगाई थी। उनका नाम आज भी राष्ट्र प्रेम और भारतीय प्रतीक की पहचान है।किसने लिखा &#039;वंदे मातरम्&#039;किम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ का एक गीत &#039;वंदे मातरम्&#039; है। बाद में यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय गौरव के परिदृश्यों के उपयोग के लिए एक राष्ट्रगान बन गया। साल 1870 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने &#039;वंदे मातरम&#039; लिखा था।मृत्युवहीं 08 अप्रैल 1894 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:58:12 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Pandit Ravi Shankar Birth Anniversary: बनारस से America तक, सितार के सुरों से दुनिया जीतने वाले &amp;apos;Maestro&amp;apos; की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय संगीत को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने वाले मशहूर सितार वादक पंडित रवि शंकर 07 अप्रैल को जन्म हुआ था। पंडित रविशंकर का संगीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच सुना जाता है। हालांकि शुरूआत में उनका झुकाव नृत्य की ओर था, लेकिन महज 18 साल की उम्र में उन्होंने सितार सीखना शुरू कर दिया था। फिर अपनी इस विधा में पंडित रविशंकर ने देश-विदेश में भारत का नाम रोशन किया था। वह संगीत की दुनिया के एक लीजेंड के रूप में जाने जाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पंडित रविशंकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबनारस में 07 अप्रैल 1920 को पंडित रविशंकर का जन्म हुआ था। वह 7 भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके भाई एक अच्छे डांसर हुआ करते थे। वहीं पंडित रविशंकर अपने भाई उदय शंकर के डांस ग्रुप के मेंबर थे। जिसके कारण वह अक्सर भारत से यूएस डांस मेंबर के रूप में जाने जाते थे। इस दौरान उन्होंने कई वाद्ययंत्रों को बजाना सीख लिया था। वहीं पंडित रविशंकर ने विदेशी संगीत जैसे जैज आदि की जानकारी भी हासिल की थी।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Birth Anniversary: World War II में 7 गोलियां खाकर भी नहीं मानी हार, ऐसे थे भारत के पहले Field Marshal सैम मानेकशॉसंगीत शिक्षासाल 1938 में पंडित रविशंकर ने डांस छोड़कर उस्ताद अलाउद्दीन खान से सितार वादन की शिक्षा लेनी शुरू की। उन्होंने मैहर घराने में 7 साल तक उस्ताद अलाउद्दीन खां से सितार की शिक्षा हासिल की। फिर वह सितार वादन में पारंगत हो गए।ऑल इंडिया रेडियो के म्यूजिक डायरेक्टरसाल 1944 में रविशंकर मुंबई चले गए। यहां वह इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन में शामिल हो गए। इसके लिए साल 1945 में बैलेट्स और 1946 में धरती के लाल के लिए संगीत तैयार किया। वहीं 25 साल की उम्र में पंडित रविशंकर उन्होंने &#039;सारे जहां से अच्छा&#039; की धुन को फिर से तैयार किया। इसके अलावा वह साल 1949 से 1956 तक ऑल इंडिया रेडियो के संगीत निर्देशक रहे। उन्होंने एआईआर में इंडियन नेशनल ऑर्केस्ट्रा की स्थापना की।विश्व में गूंजी सितार की धुनबता दें कि 1960 का दशक आते-आते वह विश्व विख्यात हो गए थे। उनके संगीत की पूरी दुनिया दीवानी होने लगी थी। भारत से लेकर विदेशों तक में पंडित रविशंकर के सितार की धुन गूंज रही थी। वह लगातार पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर अपने शो करने लगे। यहां तक उस दौर का फेमस बीटल्स बैंड भी उनके संगीत का दीवाना था।मृत्युवहीं 11 दिसंबर 2012 को 92 वर्ष की आयु में पंडित रविशंकर का अमेरिका के सैन डिएगो में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 10:15:43 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Anand Bakshi Death Anniversary: बंदूक छोड़ थामी कलम, Army का जवान ऐसे बना Bollywood का Legend</title>
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<description><![CDATA[ अपने सदाबहार गीतों से लोगों को अपना दीवाना बनाने वाले बॉलीवुड के फेमस गीतकार आनंद बख्शी का 30 मार्च को निधन हो गया था। उन्होंने करीब चार दशकों तक सभी के दिलों पर राज किया था। फिल्म गीतकार आनंद बख्शी का साल 2002 में 72 साल की उम्र में निधन हो गया था। शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने गीतकार आनंद बख्शी के लिखे मैजिकल गानों को नहीं सुना होगा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आनंद बख्शी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी में 21 जुलाई 1930 में आनंद बख्शी का जन्म हुआ था। इनके पिता रावलपिंडी में बैंक मैनेजर थे। किशोरावस्था में वह टेलीफोन ऑपरेटर बनकर सेना में शामिल हो गए। लेकिन बम्बई और सिनेमा दुनिया में आने की ख्वाहिश हमेशा जिंदा रही। देश का बंटवारा हुआ तो इनका परिवार हिंदुस्तान आ गया। जब मायानगरी में कुछ नहीं हुआ, तो आनंद बख्श ने फिर से सेना ज्वॉइन कर ली।इसे भी पढ़ें: Shashi Kapoor Birth Anniversary: बॉलीवुड ही नहीं Hollywood में भी था जलवा, जानें लेजेंड का सफरफिल्मी सफरतीन साल तक सेना में नौकरी करने के बाद आनंद बख्शी ने तय किया कि उनकी जिंदगी का मकसद बंदूक चलाना नहीं बल्कि गीत लिखना है। अपने फिल्मी करियर में आनंद बख्शी ने करीब 4000 से ज्यादा गीत लिखे थे। उनका साल 1957 में पहली बार गीत लिखने का मौका मिला। लेकिन सफलता उनसे दामन चुराती रही। साल 1963 में निर्देशक और अभिनेता राज कपूर ने आनंद बख्शी को अपनी फिल्म में गीत लिखने का मौका दिया। इसके बाद सफलता ने कभी आनंद बख्शी का साथ नहीं छोड़ा।उनके करियर का शुरूआती माइलस्टोन बनी &#039;आराधना&#039;, &#039;कटी पतंग&#039; और &#039;अमर प्रेम&#039; जैसी फिल्में बनीं। इन्हीं फिल्मों की बदौलत अभिनेता राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार बने थे। आनंद ने फिल्मकारों की कई पीढ़ियों के साथ काम किया था। आनंद बख्शी की सबसे बड़ी खासियत थी कि समय के साथ उनके गीतों का लहजा बदलता रहा था।गीतसाल 1965 में &#039;जब जब फूल खिले&#039; फिल्म आई, तो इसके गाने &#039;समां... समां है ये प्यार का&#039;, &#039;एक था गुल और एक थी बुलबुल&#039; और &#039;परदेसियों से न अंखियां मिलाना&#039; सुपरहिट साबित हुए। वहीं आनंद बख्शी की गीतकार के रूप में पहचान भी बन गई।मृत्युवहीं 30 मार्च 2002 को 71 साल की उम्र में गीतकार आनंद बख्शी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:37 +0530</pubDate>
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<title>Sheila Dikshit Birth Anniversary: क्यों कहलाती हैं &amp;apos;Modern Delhi&amp;apos; की शिल्पकार, जानें CM Sheila Dikshit के अनसुने किस्से</title>
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<description><![CDATA[ आज यानी की 31 मार्च को दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का जन्म हुआ था। शीला दीक्षित भारतीय राजनीति की एक ऐसी नेता थीं, जिन्होंने दिल्ली के विकास में अहम भूमिका निभाई थी। यहां तक कहा जाता है कि अगर दिल्ली ने विकास देखा है, तो वह शीला दीक्षित के कार्यकाल में देखा गया है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर शीला दीक्षित के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के कपूरथला में 31 मार्च 1938 को शीला दीक्षित का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। शीला दीक्षित ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से इतिहास में स्नातक और फिर मास्टर्स किया। पढ़ाई के दौरान शीला दीक्षित को राजनीति से जुड़े मामलों में गहरी दिलचस्पी पैदा होने लगी। उन्होंने अपनी पढ़ाई के अलावा राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करने लगीं और उनको अपनी राय व्यक्त करने में भी खूब आनंद आता था।इसे भी पढ़ें: Anand Bakshi Death Anniversary: बंदूक छोड़ थामी कलम, Army का जवान ऐसे बना Bollywood का Legendसियासी सफरबता दें कि शीला दीक्षित का सियासी सफर काफी लंबा और सफल रहा है। शीला दीक्षित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ी थीं। साल 1938 से 2019 तक वह कांग्रेस की कद्दावर नेता और दिल्ली की सबसे लंबे समय तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहने वाली महिला थीं। शीला दीक्षित ने 15 साल के कार्यकाल के समय CNG, दिल्ली मेट्रो और फ्लाईओवर जैसे बुनियादी ढांचे का विकास हुआ। साल 1998 में दिल्ली की जनता ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री चुना गया था। आज भी शीला दीक्षित की गिनती दिल्ली के सबसे सफल मुख्यमंत्रियों में होती है।विवादशीला दीक्षित पर राजनीति में रहते हुए कुछ विवादों का भी सामना करना पड़ा था। उन पर कुछ आरोप लगे, जिसके कारण उनको काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। वहीं साल 2013 के चुनाव के समय शीला दीक्षित के खिलाफ बिजली कंपनियों और सरकारी खर्चों को लेकर FIR दर्ज की गई थी। लेकिन बाद में कई मामलों में उनको राहत भी मिली थी। राज्यपाल की भूमिकासीएम पद छोड़ने के बाद साल 2014 में शीला दीक्षित को केरल का राज्यपाल बनाया गया था। लेकिन कुछ महीनों बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। शीला दीक्षित ऐसी नेता थीं, जिन्होंने दिल्ली को आधुनिक शहर बनाने में अहम योगदान दिया था।मृत्युवहीं कांग्रेस की अनुभवी और दूरदर्शी नेता रहीं शीला दीक्षित का 20 जुलाई 2019 को 81 साल की उम्र में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:36 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Sheila, Dikshit, Birth, Anniversary:, क्यों, कहलाती, हैं, Modern, Delhi, की, शिल्पकार, जानें, Sheila, Dikshit, के, अनसुने, किस्से</media:keywords>
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<title>Isaac Newton Death Anniversary: Isaac Newton सिर्फ वैज्ञानिक नहीं, एक रहस्यमयी Alchemist भी थे, जानें अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ दुनिया के महानतम वैज्ञानिक रहे आइजैक न्यूटक का 31 मार्च को निधन हो गया था। उनके दिए तमाम सिद्धांत आज भी विज्ञान और गणित के मूल सिद्धांतों के रूप में पढ़ाए जाते हैं। वह भौतिकविद, लेखक विचारक, खगोलविद और एक अल्केमिस्ट के रूप में मशहूर थे। हालांकि न्यूटन की मृत्यु के बारे में कई तरह की बातें होती हैं। उनका व्यक्तित्व और रुचियां उनको रहस्यमयी बनाती हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर वैज्ञानिक इसाक न्यूटन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारइंग्लैंड में वूल्सथोर्पे के मैनोर हाउस में 04 जनवरी 1643 को न्यूटन का जन्म हुआ था। उनके जन्म के तीन महीने पहले न्यूटन के पिता का निधन हो गया था। जब न्यूटन 3 साल के थे, तो उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली। वहीं न्यूटन अपनी नानी के पास रहे, क्योंकि वह अपने सौतेले पिता को पसंद नहीं करते थे।इसे भी पढ़ें: Kalpana Chawla Birth Anniversary: भारत की पहली महिला Astronaut, जिसने Space में जाकर दुनिया को चौंका दिया थाविज्ञान में योगदानन्यूटन ने सबसे बड़ा योगदान भौतिकी में दिया था। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण और गुरुत्व का सिद्धांत देते हुए भौतिकी के शास्त्रीय सिद्धांत की नींव रखी थी। खगोलशास्त्र में न्यूटन ने ग्रहों की चाल की बेहतर तरीके से व्याख्या की और पृथ्वी का सही आकार बताया। उन्होंने प्रतिबिम्ब आधारित पहला टेलीस्कोप बनाया। वहीं प्रिज्म के माध्यम से प्रकाशीय रंगों का अध्ययन किया। इसके अलावा न्यूटन ने कूलिंग का नियम, ध्वनि की गति की गणना और न्यूटन का द्रव्य की अवधारणा जैसे कई अहम योगदान दिए।विज्ञान के अलावा रुचिइतने ऊंचे कद के साथ न्यूटन अन्य कई विषयों से जुड़े थे। न्यूटन की थियोलॉजी यानी की ब्रह्मविज्ञान जिसको आध्यात्म या धर्म विज्ञान भी कहा जाता है, उसमें भी गहरी रुचि थी। लेकिन इसके बाद भी न्यूटन चर्च से पवित्र आदेश लेना पसंद नहीं करते थे। उन्होंने बाइबल का भी अध्ययन किया था। उनको अलमेकी में भी काफी दिलचस्पी थी। लेकिन इन दोनों ही विषयों में उनका अधिकतर कार्य मृ्त्यु के बाद ही प्रकाशित हो सका।मृत्युवहीं 31 मार्च 1727 को न्यूटन की मृत्यु हो गई थी। न्यूटन की मृत्यु सोते समय हुई थी और मृत्यु के बाद न्यूटन के शरीर में बहुत सारा पारा मिला था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:35 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Isaac, Newton, Death, Anniversary:, Isaac, Newton, सिर्फ, वैज्ञानिक, नहीं, एक, रहस्यमयी, Alchemist, भी, थे, जानें, अनसुनी, बातें</media:keywords>
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<title>Meena Kumari Death Anniversary: Bollywood में स्टारडम, असल जिंदगी में तन्हाई... Meena Kumari की वो कहानी जो &amp;apos;Tragedy Queen&amp;apos; बना गई</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री मीना कुमारी ने 31 मार्च को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। उन्होंने अपने शानदार अभिनय के कारण हिंदी सिनेमा में एक खास मुकाम हासिल किया। फिल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी को &#039;ट्रेजडी क्वीन&#039; कहा जाता था। अभिनेत्री मीना कुमारी का फिल्मी करियर जितना ज्यादा शानदार था, उनकी पर्सनल लाइफ उतनी ज्यादा दुख भरी रही थी। उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अपना सफर शुरू किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेत्री मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 01 अगस्त 1933 को मीना कुमारी का जन्म हुआ था। इनका असली नाम महजबीं बानों था। उन्होंने महज 4 साल की उम्र में फिल्म &#039;लेदरफेस&#039; में बतौर बाल कलाकार काम किया था। इस दौरान उनके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। ऐसे में मीना को कम उम्र से काम करना पड़ा था। एक्ट्रेस की मासूमियत और अभिनय की काबिलियत ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। फिर वह धीरे-धीरे बड़ी फिल्मों का हिस्सा बनने लगीं।इसे भी पढ़ें: Anand Bakshi Death Anniversary: बंदूक छोड़ थामी कलम, Army का जवान ऐसे बना Bollywood का Legendफिल्मफेयर अवॉर्डबता दें कि 50-60 के दशक में मीना कुमारी हिंदी सिनेमा को सबसे बड़ी एक्ट्रेस बन गई थीं। साल 1952 में फिल्म &#039;बैजू बावरा&#039; से मीना को पहली बड़ी कामयाबी मिली थी। इसके बाद अभिनेत्री ने फिल्म &#039;परिणीता&#039;, &#039;साहिब बीबी और गुलाम&#039;, &#039;काजल&#039; और &#039;दिल अपना और प्रीत पराई&#039; जैसी फिल्मों से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। मीना की आंखों और आवाज दर्द बयां करके की कला बेमिसाल थी। साल 1972 में आई फिल्म &#039;पाकीजा&#039; मीना कुमारी की सबसे यादगार फिल्म मानी जाती है। अपनी दमदार एक्टिंग के चलते मीना कुमारी ने तीन बार फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किया था।मृत्युमीना कुमारी की पर्सनल लाइफ ज्यादा सुखद नहीं थी। पति कमाल अमरोही से अलगाव और पर्सनल लाइफ की परेशानियों ने उनको शराब की लत की ओर धकेल दिया था। एक्ट्रेस की यह लत सेहत के लिए काफी खतरनाक साबित हुई। वहीं 31 मार्च 1972 को महज 38 साल की उम्र में मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें &amp;apos;हिंद की चादर&amp;apos; बनने का पूरा सफर</title>
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<description><![CDATA[ सिख धर्म में गुरु तेग बहादुर का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 01 अप्रैल को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। गुरु तेग बहादुर ने मुगलों के अत्याचार से पीड़ित हिंदू समाज को बचाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था। गुरु तेग बहादुर को &#039;हिंद की चादर&#039; भी कहा जाता था। उन्होंने अपना सिर कलम कराना मंजूर कर लिया, लेकिन इस्लाम स्वीकार नहीं किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु तेग बहादुर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर में 01 अप्रैल 1621 को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद साहिब और मां का नाम नानकी था। गुरु हरगोविंद सिंह सिखों के छठे गुरु थे। माना जाता है कि त्यागमल ने महज 13 साल की उम्र में मुगलों के खिलाफ लड़ने के लिए तलवार उठा ली थी। जिसके चलते उनके पिता ने इनका नाम बदलकर तेग बहादुर रख दिया था। लंबे समय तक गुरु तेग बहादुर ने बकाला में आध्यात्मिक साधना की और बाद में सिखों के 9वें गुरु बने।इसे भी पढ़ें: Avantibai Lodhi Death Anniversary: चूड़ियां भेजकर British Rule को दी चुनौती, जानें वीरांगना महारानी अवंतीबाई की शौर्यगाथाहिंद की चादरबता दें कि गुरु तेग बहादुर &#039;हिंद की चादर&#039; कहा जाता है। क्योंकि उन्होंने मुगलों के अत्याचार के आगे कभी घुटने नहीं टेके और अपने सिद्धांत पर अडिग रहते हुए भारत के आत्मसम्मान को बनाए रखने का काम किया। उन्होंने मुगलों से पीड़ित कश्मीरी पंडितों को यह भरोसा दिलाया था कि उनके बलिदान के बाद मुगल शासक औरंगजेब के सैनिकों का अत्याचार खत्म हो जाएगा। फिर उन्होंने कश्मीरी पंडितों के अधिकारों और विश्वास की रक्षा के लिए जो बलिदान किया, उसके सम्मान में गुरु तेग बहादुर को &#039;हिंद की चादर&#039; के सम्मान से नवाजा गया। दिल्ली के लाल किले के पास गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का विरोध किया था। जिसके बाद औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव करने लगा। जिस पर गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया। जिस पर मुगल शासक औरंगजेब ने उनका सिर काटने का आदेश दे दिया था। मृत्युमाना जाता है कि औरंगजेब की तमाम कठोर यातनाओं को गुरु तेग बहादुर सकते रहे, लेकिन उन्होंने झुकने से इंकार कर दिया। इस बात से बौखलाए औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर और उनके साथियों को कठोर मौत दी थी। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:34 +0530</pubDate>
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<title>KB Hedgewar Birth Anniversary: कांग्रेस के Freedom Fighter, फिर क्यों बनाई RSS? जानिए पूरी कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 01 अप्रैल को केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। के.बी हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी थी। वह संघ के पहले सरसंघचालक बने। उन्होंने शुरूआत से ही संघ को सक्रिय राजनीति से दूर सिर्फ धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों तक सीमित रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारनागपुर के एक संभ्रांत परिवार में 01 अप्रैल 1889 को केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। वहीं साल 1902 में प्लेग महामारी में उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। इस समय के बी हेडगेवार की उम्र 13 साल थी। जब वह हाई स्कूल में थे तो &#039;वंदे मातरम&#039; का नारा लगाने पर हेडगेवार को स्कूल से निकाल दिया गया था। 1910 में वह मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए। वह जब डॉक्टर बनकर नागपुर वापस आए, तो उन्होंने एक भी दिन प्रैक्टिस नहीं की।इसे भी पढ़ें: Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें &#039;हिंद की चादर&#039; बनने का पूरा सफरआजादी की लड़ाई से जुड़ेहेडगेवार कांग्रेस से जुड़ गए और साल 1921 के असहयोग आंदोलन में उग्र भाषण देने के आरोप में हेडगेवार को एक साल की सजा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद देश भर में भड़के भीषण सांप्रदायिक दंगों ने उनको झझकोर कर रख दिया। उनको समझ आ गया कि तत्कालिक राजनीतिक उत्तेजना नहीं बल्कि दीर्घकालिक &#039;चरित्र निर्माण&#039; की जरूरत महसूस हुई।आरएसएस की स्थापनाइस वैचारिक मंथन से ही 27 सितंबर 1925 को नागपुर के एक मैदान में कुछ बच्चों के साथ आरएसएस यानी की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई। उन्होंने शाखा को सिर्फ शारीरिक व्यायाम का अखाड़ा नहीं बल्कि सामाजिक समानता की माइक्रोलैब भी बनाई। उन्होंने संघ की रोजमर्रा की दलगत राजनीति से दूऱ रखी। लेकिन कभी स्वतंत्रता संग्राम से कभी पीठ नहीं दिखाई। साल 1930 महात्मा गांधी ने सविनय आंदोलन शुरू किया। तब हेडगेवार ने सरसंघचालक का पद छोड़ दिया और हजारों स्वयंसेवकों के साथ &#039;जंगल सत्याग्रह&#039; किया। इस दौरान उन्होंने 9 महीने की जेल की सजा काटी।मृत्युवहीं 21 जून 1940 को 51 साल की उम्र में केशव बलिराम हेडगेवार का निधन हो गया था।  ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:33 +0530</pubDate>
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<title>Shivaji Maharaj Death Anniversary: 15 साल की उम्र में Shivaji Maharaj ने कैसे रखी थी Hindu Swaraj की नींव</title>
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<description><![CDATA[ छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं, जो वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक माने जाते हैं। आज ही के दिन यानी की 03 अप्रैल को शिवाजी महाराज की मृत्यु हुई थी। उस दौरान उनकी उम्र सिर्फ 50 साल थी। माना जाता है कि शिवाजी महाराज की मृत्यु रहस्यमयी थी। शिवाजी की एक हुंकार से उनके समकालीन मुगल शासक औरंगजेब थर-थर कांपता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि 19 फरवरी 1630 को छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और मां का नाम जीजाबाई थी। इस दौरान न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि पूरा भारत मुगल आक्रमणकारियों के सामने बेबस था। मुगलों ने दिल्ली सहित पूरे भारत पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में छत्रपति शिवाजी महाराज ने महज 15 साल की उम्र में हिंदू हुकूमत को एक बार फिर से स्थापित करने की प्रतिज्ञा ली थी।इसे भी पढ़ें: Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें &#039;हिंद की चादर&#039; बनने का पूरा सफरसनातन धर्म की रक्षाशिवाजी महाराज ने न सिर्फ मराठा साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने 15 साल की उम्र में मुगल सल्तनत को धूल चटाने के लिए बीजापुर पर हमला कर दिया। शिवाजी जी ने गोरिल्ला युद्ध नीति के जरिए बीजापुर के शासक आदिलशाह को घुटने पर मजबूर कर दिया था। शिवाजी को बना लिया बंदीसाल 1966 में आदिलशाह को मौत के घाट उतारने के बाद शिवाजी ने बीजापुर के चार किलों पर कब्जा जमा लिया था। जिसके बाद शिवाजी को बंदी बनाने के लिए औरंगजेब ने संधि का हाथ आगे बढ़ाया। जब शिवाजी संधि प्रस्ताव के तहत आगरा पहुंचे, तो उनको बंदी बना लिया गया। लेकिन मुगलिया सल्तनत उनको अधिक समय तक बंदी नहीं बना सकी। शिवाजी एक फल की टोकरी में बैठकर जेल से फरार हो गए। इस घटना के बाद शिवाजी ने तय कर लिया कि वह मुगलिया सल्तनत को जड़ से खत्म कर देंगे।सभी धर्मों का करते थे सम्मानशिवाजी सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उन्होंने कभी किसी धार्मिक स्थल पर हमला नहीं किया। वह जबरन धर्म परिवर्तन के भी खिलाफ थे। शिवाजी महाराज ने अपने राजकाज में संस्कृत और फारसी को ज्यादा वरीयता दी थी।मृत्युवहीं 03 अप्रैल 1680 को छत्रपति शिवाजी महाराज का पहाड़ी दुर्ग राजगढ़ निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:32 +0530</pubDate>
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<title>Sam Manekshaw Birth Anniversary: World War II में 7 गोलियां खाकर भी नहीं मानी हार, ऐसे थे भारत के पहले Field Marshal सैम मानेकशॉ</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 03 अप्रैल को भारत के प्रथम फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उन्होंने साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ था। बता दें कि वह असाधारण साहस, तीक्ष्ण बुद्धि और अद्वितीय नेतृत्व क्षमता वाले सैनिक थे। सैम मानेकशॉ का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर में 03 अप्रैल 1914 को सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से की थी। फिर बाद में भारतीय सैन्य अकादमी देहरादूर से प्रशिक्षण लिया था। मानेकशॉ इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन पिता से अनुमति न मिलने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया।इसे भी पढ़ें: KB Hedgewar Birth Anniversary: कांग्रेस के Freedom Fighter, फिर क्यों बनाई RSS? जानिए पूरी कहानीब्रिटिश इंडियन आर्मी में हुए शामिलसाल 1934 में सैम मानेकशॉ ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए। सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान वह बर्मा मोर्चे पर तैनात थे। इस दौरान उनको लड़ते हुए जापानी सेना का सात गोलियां लगीं। मानेकशॉ की गंभीर हालत देखते हुए डॉक्टरों ने इलाज करने से इंकार कर दिया। लेकिन इलाज के बाद वह पूरी तरह से ठीक हो गए।फिर साल 1971 में देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से पाकिस्तान पर हमले की सलाह ली। लेकिन उन्होंने हमला करने से इंकार कर दिया और 6 महीने का समय मांगा। इस दौरान सैम मानेकशॉ ने भारतीय सेना को पूरी तरह से तैयार किया। जिसके परिणामस्वरूप दिसंबर 1971 में युद्ध हुआ और पाकिस्तान को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस जीत के साथ बांग्लादेश का गठन हुआ था।सम्मानसाल 1972 में सैम मानेकशॉ की बहादुरी और सैन्य नेतृत्व के लिए उनको फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई। जोकि भारतीय सेना की सर्वोच्च सैन्य रैंक है। इस पद को पाने वाले मानेकशॉ भारत के पहले सैन्य अधिकारी थे। फिर साल 1968 में उनको &#039;पद्म भूषण&#039; और 1972 में &#039;पद्म विभूषण&#039; से सम्मानित किया गया।मृत्युसाल 1973 में सेना प्रमुख के पद से रिटायर होने के बाद सैम मानेकशॉ ने तमिलनाडु के कन्नूर में जीवन बिताया। वहीं 27 जून 2008 को 94 साल की उम्र में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:24:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: देश के वो &amp;apos;Socialist&amp;apos; चिंतक, जिनकी Political ईमानदारी आज भी मिसाल है</title>
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<description><![CDATA[ डॉ राम मनोहर लोहिया एक ऐसे चिंतक और नेता थे, जिन्होंने अपने जन्मदिन को शहादत दिवस को समर्पित कर दिया था। आज ही के दिन यानी की 23 मार्च को राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। लोहिया भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। राम मनोहर लोहिया ने अपना अधिकांश जीवन भारतीय समाजवाद के विकास और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए समर्पित कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राम मनोहर लोहिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफैजाबाद में 23 मार्च 1910 को राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम हीरालाल था। जोकि यूपी के फैजाबाद में एक व्यापारी और सच्चे राष्ट्रभक्त थे। राम मनोहर लोहिया ने मुंबई के मारवाड़ी स्कूल से पढ़ाई की थी। फिर मैट्रिक की परीक्षा में फर्स्ट आकर इंटर की 2 सला की पढ़ाई बनारस के काशी विश्वविद्यालय में की थी। फिर वह उच्च शिक्षा के लिए लंदन की जगह बर्लिन गए। यहां पर उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।इसे भी पढ़ें: Khushwant Singh Death Anniversary: दिल्ली, लेखन और महिलाओं से था इश्क, जानिए &#039;Legend&#039; की अनसुनी बातेंस्वदेश वापसीजर्मनी से वापस लौटने के बाद राम मनोहर लोहिया ने अपना जीवन सुविधापूर्ण तरीके से बिताने की बजाय जंग-ए-आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। साल 1918 में वह अहमदाबाद अधिवेशन में पहली बार अपने पिता के साथ शामिल हुए थे। लोहिया ने देश की राजनीति में भावी बदलाव की बयार आजादी से पहले ला दी थी। लोहिया के पिता महात्मा गांधी के अनुयायी थे। जिस कारण गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का लोहिया पर गहरा असर हुआ था।समाजवादी के पक्षधरडॉ लोहिया मानवता की स्थापना के पक्षधर और समाजवादी थे। समाजवादी का अर्थ था, &#039;समाज ही उनका कार्यक्षेत्र था और वह अपने कार्यक्षेत्र को जनमंगल की अनुभूतियों से महकाना चाहते थे।&#039; लोहिया हमेशा ही विश्व-नागरिकता का सपना देखा था। लोहिया मानव मात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे। वहीं वह जनता को जनतंत्र का निर्णायक मानते थे।राजनीतिक सफरसाल 1935 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे पं. नेहरू ने लोहिया को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया था। अगस्त 1942 को गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में लोहिया ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और संघर्ष के नए शिखरों को छुआ था। साल 1946-47 लोहिया की जिंदगी के अत्यंत निर्णायक साल रहे। उन्होंने अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्वी समाजवादी विचारों की वजह से अपने समर्थकों के अलावा विरोधियों के मध्य भी अपार सम्मान हासिल किया।मृत्युवहीं 12 अक्तूबर 1967 को 57 साल की उम्र में राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 23 Mar 2026 21:39:17 +0530</pubDate>
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<title>Bhagat Singh Death Anniversary: सिर्फ 23 की उम्र में फांसी, जानिए इस Legendary Freedom Fighter की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ भगत सिंह भारत के उन महान सपूतों में से एक हैं। जिन्होंने सिर्फ 23 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया था। भगत सिंह का नाम सुनते ही युवाओं के दिल में जोश भर जाता है। भगत सिंह न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि लेखक, विचारक और समाज सुधारक भी थे। भले ही भगत सिंह का जीवन छोटा रहा, लेकिन उनका इतना गहरा प्रभाव रहा है कि आज भी लाखों लोग उनको याद करते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में 28 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ था। भगत सिंह का पैतृक गांव खटकर कलां है, जोकि भारत के पंजाब में है। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और मां का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह के जन्म के समय उनके पिता और चाचा जेल में थे, क्योंकि वह अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाते। भगत सिंह के जन्म पर उनके चाचा और पिता की रिहाई हुई थी। जिससे घर में खुशी दोगुनी हो गई थी।इसे भी पढ़ें: Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: देश के वो &#039;Socialist&#039; चिंतक, जिनकी Political ईमानदारी आज भी मिसाल हैजलियांवाला बाग हत्याकांडसाल 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने 12 साल के भगत सिंह को गहरा झटका दिया था। वह घटनास्थल गए और खून से सनी मिट्टी को घर लाकर पूजते थे। यह भगत सिंह के बलिदान का पहला अनुभव था। साल 1923 में उन्होंने लिखा कि वह शादी के बजाय भारत माताु और उसके 33 करोड़ बच्चों के लिए जीवन समर्पित करेंगे। वह राष्ट्र को मां मानते थे और सेवा को अपना उद्देश्य। साल 1930 में जब भगत सिंह के पिता ने दया याचिका दी, तो उन्होंने सख्ती के साथ मना कर दिया। क्योंकि वह अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहते थे।ऐसे बने क्रांतिकारीदरअसल, भगत सिंह स्कूल छोड़कर नेशनल कॉलेज, लाहौर में पढ़े थे। यहीं से लाला लाजपत राय ने स्वदेशी शिक्षा दी और वह नौजवान भारत सभा से जुड़े। साल 1926 में वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हुए। जहां पर उनको सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु जैसे साथी मिले।साल 1928 में लाला लाजपत राय की मौत पुलिस लाठीचार्ज से हुई। लाला लाजपत राय का बदला लेने के लिए भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स को गोली मारी और फिर दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। उन्होंने नारे लगाए - &#039;इंकलाब जिंदाबाद&#039;। इसके बाद वह पकड़े गए। मुकदमे के दौरान उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी और जेल में भूख हड़ताल की। जिससे कैदियों के अधिकार सुधरे।मृत्युवहीं 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को लाहौर जेल में फांसी दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 23 Mar 2026 21:39:16 +0530</pubDate>
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<title>Bismillah Khan Birth Anniversary: काशी की गलियों से Red Fort तक, जब गूंजी थी &amp;apos;भारत रत्न&amp;apos; की शहनाई</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 21 मार्च को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का जन्म हुआ था। उन्होंने अपने सुरों से पूरी दुनिया का मन मोह लिया था। उनके परिवार की पांच पीढ़ियां शहनाई वादक थीं। शहनाई को ग्लोबल स्टेज पर ले जाने में बिस्मिल्लाह खां का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने अपने जीवन में तमाम उल्लेखनीय उपलब्धियों के साथ सम्मानित बिस्मिल्लाह खां उन गीतकारों में से एक हैं, जिनको भारतीय संगीत में योगदान के लिए भारत रत्न मिला है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बिस्मिल्लाह खां के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबिहार के बकसर में 21 मार्च 1916 को बिस्मिल्लाह खां का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम पैगंबर बख्श खां था, जोकि डुमराव रियासत के दरबार में शहनाई बजाते थे। 6 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां अपने पिता के साथ बनारस चले आए। उन्होंने अपने मामा अली बख्श &#039;विलायती&#039; से शहनाई सीखी। बिस्मिल्लाह खां कजरी, छैती, ठुमरी और स्वानी जैसी विधाएं सीखीं। इसके अलावा उन्होंने ख्याल संगीत में भी निपुणता हासिल की। बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की धुन आज भी गंगा घाटों, बनारस की गलियों और काशी विश्वनाथ मंदिर में गूंजती है।इसे भी पढ़ें: Khushwant Singh Death Anniversary: दिल्ली, लेखन और महिलाओं से था इश्क, जानिए &#039;Legend&#039; की अनसुनी बातेंलाल किले पर बजाई शहनाईजब भारत ने ब्रिटिश राज से आजादी पाई थी, तो यह बिस्मिल्लाह खां की शहनाई थी, जो माहौल को सराह रही थी। जब पंडित नेहरू ने आजादी के बाद पहली बार लाल किले से तिरंगा फहरा रहे थे, जब आजादी की पूर्व संध्या और पहले गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर शहनाई बजाई थी। यहां तक कि आज भी गणतंत्र दिवस समारोह पर बिस्मिल्ला खां की शहनाई के धुनों के साथ होता है। भारत &#039;अनेकता में एकता&#039; के लिए जाना जाता है। वहीं बिस्मिल्लाह खां ने वास्तव में इसका संकेत दिया था। वह एक सादगी पसंद व्यक्ति थे। सम्मानशहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को कई सम्मान मिले थे। साल 1968 में &#039;पद्म श्री&#039;, साल 1975 में &#039;पद्म भूषण&#039;, साल 1980 में &#039;पद्म विभूषण&#039;, तानसेन पुरस्कार और साल 2001 में भारत रत्न से सम्मानित किए गए थे। लेकिन वह काशी की संस्कृति में रचे-बसे थे। उनको काशी से इतना ज्यादा प्यार था कि उन्होंने अमेरिका में बसने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।मृत्युवहीं 21 अगस्त 2006 को 90 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 12:23:58 +0530</pubDate>
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<title>Avantibai Lodhi Death Anniversary: चूड़ियां भेजकर British Rule को दी चुनौती, जानें वीरांगना महारानी अवंतीबाई की शौर्यगाथा</title>
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<description><![CDATA[ आज भी भारत की पवित्र भूमि ऐसे वीर-वीरांगनाओं की कहानियों से भरी पड़ी है जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश के आजाद होने तक भिन्न- भिन्न रूप में अपना अहम योगदान दिया। लेकिन भारतीय इतिहासकारों ने हमेशा से उन्हें नजरअंदाज किया है। देश में सरकारों या प्रमुख सामाजिक संगठनों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए लोगों के जो कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं वो सिर्फ और सिर्फ कुछ प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के होते हैं। लेकिन बहुत से ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं जिनके अहम योगदान को न तो सरकारें याद करती हैं न ही समाज याद करता है। लेकिन उनका योगदान भी देश के अग्रणी श्रेणी में गिने जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से कम नहीं है। जितना योगदान स्वतंत्रता संग्राम में देश के अग्रणी श्रेणी में गिने जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का था, उतना ही उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान है जिनको हमेशा से इतिहासकारों ने अपनी कलम से वंचित और अछूत रखा है। भारत की पूर्वाग्रही लेखनी ने देश के बहुत से त्यागी, बलिदानियों, शहीदों और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर-वीरांगनाओं को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की पुस्तकों में उचित सम्मानपूर्ण स्थान नहीं दिया है। परन्तु आज भी इन वीर-वीरांगनाओं की शौर्यपूर्ण गाथाएं भारत की पवित्र भूमि पर गूंजती हैं और उनका शौर्यपूर्ण जीवन प्रत्येक भारतीय के जीवन को मार्गदर्शित करता है।      ऐसी ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक वीरांगना हैं रानी अवंतीबाई लोधी जिनके योगदान को हमेशा से इतिहासकारों ने कोई अहम स्थान न देकर नाइंसाफी की है। आज देश में बहुत से लोग हैं जो इनके बारे में जानते भी नहीं है। लेकिन उनका योगदान भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम की अग्रणी नेता वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी से कम नहीं हैं। लेकिन इतिहासकारों की पिछड़ा और दलित विरोधी मानसिकता ने हमेशा से इनके बलिदान और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को नजरअंदाज किया है। परन्तु वीरांगना अवंतीबाई लोधी आज भी लोककाव्यों की नायिका के रूप में हमें राष्ट्र के निर्माण, शौर्य, बलिदान व देशभक्ति की प्रेरणा प्रदान कर रही हैं। लेकिन हमारे देश की सरकारों ने चाहे केंद्र की जितनी सरकारे रही हैं या राज्यों की जितनी सरकारें रही हैं उनके द्वारा हमेशा से वीरांगना अवंतीबाई लोधी की उपेक्षा होती रही है। वीरांगना अवंतीबाई जितने सम्मान की हकदार थीं वास्तव में उनको उतना सम्मान नहीं मिला। वीरांगना अवंतीबाई लोधी का अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष एवं बलिदान से सम्बन्धित ऐतिहासिक जानकारी समकालीन सरकारी पत्राचार, कागजातों व जिला गजेटियरों में बिखरी पड़ी है। इन ऐतिहासिक समकालीन सरकारी पत्राचार, कागजातों व जिला गजेटियरों का संकलन और ऐतिहासिक विवेचन समय की माँग है। देश की केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को इस ऐतिहासिक जानकारी और सामग्री का संकलन करना चाहिए और उसकी व्याख्या आज के इतिहासकारों से करानी चाहिए। इसे भी पढ़ें: Sayajirao Gaekwad Birth Anniversary: Bank of Baroda के संस्थापक, BHU के दानवीर, कौन थे महाराजा Sayajirao Gaekwad IIIवीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी का जन्म पिछड़े वर्ग के लोधी राजपूत समुदाय में 16 अगस्त 1831 को ग्राम मनकेहणी, जिला सिवनी के जमींदार राव जुझार सिंह के यहां हुआ था। वीरांगना अवंतीबाई लोधी की शिक्षा दीक्षा मनकेहणी ग्राम में ही हुई। अपने बचपन में ही इस कन्या ने तलवारबाजी और घुड़सवारी करना सीख लिया था। लोग इस बाल कन्या की तलवारबाजी और घुड़सवारी को देखकर आश्चर्यचकित होते थे। वीरांगना अवंतीबाई बाल्यकाल से ही बड़ी वीर और साहसी थी। जैसे-जैसे वीरांगना अवंतीबाई बड़ी होती गयीं वैसे-वैसे उनकी वीरता के किस्से आसपास के क्षेत्र में फैलने लगे। पिता जुझार सिंह ने अपनी कन्या अवंतीबाई लोधी का सजातीय लोधी राजपूतों की रामगढ़ रियासत, जिला मण्डला के राजकुमार से करने का निश्चय किया। जुझार सिंह की इस साहसी बेटी का रिश्ता रामगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह ने अपने पुत्र राजकुमार राजकुमार विक्रमादित्य सिंह के लिए स्वीकार कर लिया। इसके बाद जुझार सिंह की यह साहसी कन्या रामगढ़ रियासत की कुलवधू बनी। सन् 1850 में रामगढ़ रियासत के राजा और वीरांगना अवंतीबाई लोधी के ससुर लक्ष्मण सिंह की मृत्यु हो गई और राजकुमार विक्रमादित्य सिंह का रामगढ़ रियासत के राजा के रूप में राजतिलक किया गया। लेकिन कुछ सालों बाद राजा विक्रमादित्य सिंह अस्वस्थ्य रहने लगे। उनके दोनों पुत्र अमान सिंह और शेर सिंह अभी छोटे थे, अतः राज्य का सारा भार रानी अवंतीबाई लोधी के कन्धों पर आ गया। वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने वीरांगना झाँसी की रानी की तरह ही अपने पति विक्रमादित्य के अस्वस्थ होने पर ऐसी दशा में राज्य कार्य संभाल कर अपनी सुयोग्यता का परिचय दिया और अंग्रेजों की चूलें हिला कर रख दीं।  इस समय लॉर्ड डलहौजी भारत में ब्रिटिश राज का गवर्नर जनरल था, लॉर्ड डलहौजी का प्रशासन चलाने का तरीका साम्राज्यवाद से प्रेरित था। उसके काल मे राज्य विस्तार का काम अपने चरम पर था। भारत में लॉर्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी नीतियों और उसकी राज्य हड़प नीति की वजह से देश की रियासतों में हल्ला मचा हुआ था। लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत जिस रियासत का कोई स्वाभाविक बालिग उत्तराधिकारी नहीं होता था ब्रिटिश सरकार उसे अपने अधीन कर रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में उसका विलय कर लेती थी। इसके अलावा इस हड़प नीति के अंतर्गत डलहौजी ने यह निर्णय लिया कि जिन भारतीय शासकों ने कंपनी के साथ मित्रता की है अथवा जिन शासकों के राज्य ब्रिटिश सरकार के अधीन है और उन शासकों के यदि कोई पुत्र नहीं है तो वह बिना अंग्रेजी हुकूमत कि आज्ञा के किसी को गोद नहीं ले सकता। अपनी राज्य हड़प नीति के तहत डलहौजी कानपुर, झाँसी, नागपुर, सतारा, जैतपुर, सम्बलपुर, उदयपुर, करौली इत्यादि रियासतों को हड़प चुका थ ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 14:48:10 +0530</pubDate>
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<title>Khushwant Singh Death Anniversary: दिल्ली, लेखन और महिलाओं से था इश्क, जानिए &amp;apos;Legend&amp;apos; की अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 20 मार्च को खुशवंत सिंह का निधन हो गया था। उनका विवादों से नाता कभी छूटा नहीं। वह हमेशा अपनी शर्तों पर जिंदगी जीते हैं। खुशवंत सिंह अपने गंभीर लेखन और हाजिर जवाबी के लिए मशहूर थे। हालांकि उनको कम ही लोग लेखक मानते हैं। लेकिन खुशवंत सिंह ने कभी इसकी परवाह नहीं की। खुशवंत सिंह ने अपनी आखिरी सांस तक लिखना नहीं छोड़ा। वह 99 साल की उम्र तक सुबह 4 बजे उठकर लिखना पसंद करते थे। वह खुद को दिल्ली का सबसे बड़ा यारबाज और दिलफेंक बूढ़ा आशिक मानते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर खुशवंत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के हदाली 02 फरवरी 1915 में खुशवंत सिंह का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सर सोभा सिंह था, जोकि अपने समय के मशहूर ठेकेदार थे। बताया जाता है कि बचपन में खुशवंत सिंह भगत सिंह का ऑटोग्राफ लेने के लिए जेल गए थे। वहीं बाद में खुशवंत सिंह के पिता सर सोभा सिंह ने भगत सिंह के खिलाफ झूठी गवाही दी थी।इसे भी पढ़ें: Avantibai Lodhi Death Anniversary: चूड़ियां भेजकर British Rule को दी चुनौती, जानें वीरांगना महारानी अवंतीबाई की शौर्यगाथारचनाएं&#039;ट्रेन टू पाकिस्तान&#039; और &#039;कंपनी ऑफ वूमन&#039; जैसी बेस्टसेलर किताबें देने वाले खुशवंत सिंह ने 80 किताबें लिखी थीं। उन्होंने अपने कॉलम और किताबों में संता-बंता के कैरेक्टर से लोगों को गुदगुदाया था। आज भी खुशवंत सिंह को ऐसे शख्स के रूप में पहचाना जाता है, तो लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला देते थे।तीन चीजों से था प्यारखुशवंत सिंह तीन चीजों से प्यार करते थे। जिसमें पहला दिल्ली से लगाव, दूसरा प्यार लेखन औऱ तीसरा खूबसूरत महिलाएं थीं। उन्होंने अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक लिखना नहीं छोड़ा था। वह 99 साल की उम्र तक सुबह 4 बजे उठकर लिखना पसंद करते थे। खुशवंत सिंह की गिनती पीएम इंदिरा गांधी की करीबियों में की जाती थी। लेकिन अगर वह विरोध करने पर आ जाएं, तो इंदिरा गांधी का भी विरोध करने से नहीं चूकते थे।राजनीतिक सफरखुशवंत सिंह के चाचा सरदार उज्जवल सिंह तमिलनाडु औऱ पंजाब के राज्यपाल रहे। राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े रहने की वजह से वह भी राजनीति में उतरे। वहीं साल 1980 से लेकर 1986 तक खुशवंत सिंह राज्यसभा के सदस्य रहे। साल 2007 में खुशवंत सिंह को &#039;पद्म विभूषण&#039; से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं दिल्ली में 20 मार्च 2014 को 99 साल की उम्र में खुशवंत सिंह का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 14:48:09 +0530</pubDate>
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<title>Shashi Kapoor Birth Anniversary: बॉलीवुड ही नहीं Hollywood में भी था जलवा, जानें लेजेंड का सफर</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता रहे शशि कपूर का 18 मार्च को जन्म हुआ था। उन्होंने बॉलीवुड को कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दी थीं। एक समय पर शशि कपूर करोड़ों दिलों की धड़कन हुआ करते थे। उन्होंने करीब 100 फिल्मों में काम किया था, जिनमें से ज्यादातर फिल्में हिट साबित हुईं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता शशि कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता में 18 मार्च 1938 को शशि कपूर का जन्म हुआ था। इनका असली नाम बलबीर राज कपूर था। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर शशि रख लिया था। वहीं सिनेमा में भी वह इसी नाम से फेमस हुए।इसे भी पढ़ें: Zakir Hussain Birth Anniversary: जाकिर हुसैन को पिता से मिली विरासत, तबले की थाप से दुनिया को बनाया दीवानाचाइल्ड आर्टिस्टसाल 1950 में शशि कपूर ने फिल्म &#039;संग्राम&#039; में काम किया था। इस फिल्म में शशि ने अशोक कुमार के यंगर वर्जन का रोल किया था। बॉलीवुड में लीड स्टार बनने से पहले अभिनेता ने फिल्म &#039;आग&#039; और &#039;आवारा&#039; जैसी फिल्मों में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया था।अंग्रेजी फिल्मों में किया कामबता दें कि अभिनेता शशि कपूर उन चुनिंदा अभिनेताओं में से एक थे, जिन्होंने इंटरनेशनल सिनेमा में भी अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरा था। अभिनेता ने 12 इंग्लिश फिल्मों में काम किया था। शशि कपूर ने मर्चेंट-आइवरी प्रोडक्शंस की &#039;शेक्सपियर वाला&#039;, &#039;द हाउसहोल्डर&#039;, &#039;हीट एंड डस्ट&#039; और &#039;बॉम्बे टॉकी&#039; जैसी फिल्मों में उनके काम को काफी सराहा गया।प्रोडक्शन हाउस1970 के दशक के आखिरी में शशि कपूर ने अपना प्रोडक्शन हाउस फिल्म &#039;वालास&#039; शुरू किया था। इस बैनर के तहत शशि कपूर ने कई फिल्में बनाई थीं, जो बॉलीवुड मसाला फिल्मों के बजाय अर्थपूर्ण और अलग तरह के सिनेमा पर आधारित थीं। वालास के तहत बनी फिल्मों में &#039;विजेता&#039;, &#039;कलियुग&#039;, &#039;जुनून&#039;, &#039;36 चौरंगी लेन&#039; और &#039;उत्सव&#039; आदि शामिल हैं।मृत्युवहीं लंबी बीमारी के बाद 04 दिसंबर 2017 को मुंबई में शशि कपूर ने आखिरी सांस ली थी। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 09:53:17 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bipin Rawat Birth Anniversary: गोरखा राइफल्स से पहले CDS तक, पढ़ें Bipin Rawat की शौर्यगाथा और Unseen किस्से</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 16 मार्च को भारतीय सेना के जांबाज अधिकारी और देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत का जन्म हुआ था। साल 2019 में भारत सरकार द्वारा पहली बार सीडीएस के पद की घोषणा की गई। उस दौरान सेना प्रमुख बिपिन रावत ही सबसे उपयुक्त माने गए। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बिपिन रावत के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में 16 मार्च 1958 को बिपिन रावत का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम बिपिन लक्ष्मण सिंह रावत था। बिपिन रावत का पूरा परिवार कई दशकों से देश में सैन्य सेवाएं दे रहा था। उनके पिता का नाम किशन सिंह परमार थे, जोकि लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हुए थे। इसे भी पढ़ें: Karl Marx Death Anniversary: जानिए उस महान विचारक को, जिसकी Ideology ने दुनिया का नक्शा बदल दियासेना में करियरवहीं 16 दिसंबर 1978 को बिपिन रावत ने 11 गोरखा राइफल्स की 5वीं बटालियन से अपने सैन्य करियर की शुरूआत की थी। फिर जनवरी 1979 में उनकी पहली पोस्टिंग मिजोरम में हुई थी। नेफा इलाके में जब बिपिन रावत की तैनाती हुई, तो उन्होंने बटालियन की अगुवाई भी की थी। उन्होंने कांगो में यूएन की पीसकीपिंग फोर्स की भी अगुवाई की थी। साल 1987 में अरुणाचल प्रदेश स्थित सुमदोरोंग चू घाटी में हुई भारत-चीन झड़प के दौरान चीनी चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को हराने के लिए बिपिन रावत की बटालियन को तैनात किया गया था। साल 1962 में चीन के साथ  हुए युद्ध के बाद यह विवादित मैकमोहन बॉर्डर लाइन पर पहला सैन्य टकराव था।इन चीजों में थे एक्सपर्टबिपिन रावत ने सेना में 43 साल दिए थे। इस दौरान उनका नाम इसलिए भी चर्चित था, क्योंकि वह कई चीजों के एक्सपर्ट थे। वह ऊंचाई वाले इलाकों पर युद्ध लड़ने में माहिर थे। इसके अलावा वह काउंटर ऑपरेशन और कश्मीर मामले में भी एक्सपर्ट थे। चीन की सीमाओं और एलओसी पर कैसे सैन्य कार्रवाई की जाए, इसकी भी उनमें अच्छी समझ थी। इसी वजह से वह इन इलाकों में सबसे ज्यादा तैनात रहे।बिपिन रावत की सफलताएंबिपिन रावत ने कई बड़े अभियानों पर बड़ी सफलता हासिल की थी। साल 2020 से 2021 तक बिपिन रावत चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ रहे थे। उन्होंने पूर्वोत्तर में उग्रवाद को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साल 2015 में म्यांमार में क्रॉस बॉर्डर अभियान चलाकर कई आतंकवादियों को ढेर कर दिया था। इस दौरान सेना ने नागा आतंकी संगठन NSCN (K) आतंकवादी ठिकानों को भी नष्ट किया था। बिपिन रावत पाकिस्तान में की जाने वाली सर्जिकल स्ट्राइक के भी योजनाकार बताए जाते हैं।मौतवहीं 08 दिसंबर 2021 को एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में बिपिन रावत की मौत हो गई थी। इस दौरान उनकी पत्नी मधुलिका और निजी स्टाफ समेत कुल 10 यात्रियों और 4 सदस्यों वाले चालक दल हादसे का शिकार हो गए। इस दुर्घटना में सभी 14 लोगों की मौत हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 17 Mar 2026 10:42:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Kalpana Chawla Birth Anniversary: भारत की पहली महिला Astronaut, जिसने Space में जाकर दुनिया को चौंका दिया था</title>
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<description><![CDATA[ पहली भारतीय महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला का आज ही के दिन यानी की 17 मार्च को जन्म हुआ था। अपने घर में कल्पना सबसे छोटी थीं, लेकिन उनके काम इतने बड़े हैं कि सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि वह पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गईं। वह भारत की पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने स्पेस में जाकर इतिहास रच दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कल्पना चावला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाहरियाणा के करनाल में 17 मार्च 1962 को कल्पना चावला का जन्म हुआ था। उन्होंने करनाल के ही टैगोर बाल निकेतन से शुरूआती पढ़ाई की थी। इसके बाद उन्होंने चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक की पढ़ाई की थी। फिर वह एम.टेक की पढ़ाई के लिए अमेरिका गईं। बाद में कल्पना चावला ने वहीं शादी कर ली थी।इसे भी पढ़ें: Karl Marx Death Anniversary: जानिए उस महान विचारक को, जिसकी Ideology ने दुनिया का नक्शा बदल दियानासा में शामिल हुईं कल्पनासाल 1995 में कल्पना चावला नासा में बतौर अंतरिक्ष यात्री शामिल हुई थीं। फिर साल 1998 में कल्पना को पहली बार उड़ान के लिए चुना गया था। उनकी यह यात्रा सफल रही और भारत की इस बेटी ने पूरी दुनिया में अपना परचम लहराया।दूसरी बार उन्हें फिर चुना गया। सभी लोग बेसब्री से उनके लौटने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन खबर कुछ ऐसी आई कि सबके चेहरों पर खुशी की जगह आंसू छलक आए। वैज्ञानिकों के मुताबिक जैसे ही कोलंबिया ने पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया, वैसे ही उसकी उष्मारोधी परतें फट गईं और यान का तापमान बढ़ने से यह हादसा हुआ।   कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला थीं। 1 फरवरी 2013 में जिस अंतरिक्ष यान से वह लौट रही थीं उस यान में कल्पना चावला सहित 7 लोग सवार थे। इन में सभी 7 लोगों की मौत हो गई थी। यान कोलंबिया शटल STS-107 करीब दो लाख फीट की ऊंचाई पर था। इसकी रफ्तार करीब 20 हजार किलोमीटर प्रति घंटा थी। यह यान 16 मिनट बाद पृथ्वी पर उतरने ही वाला था लेकिन तभी यह हादसा हो गया जिसमें सभी की मौत हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 17 Mar 2026 10:42:48 +0530</pubDate>
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<title>Karl Marx Death Anniversary: जानिए उस महान विचारक को, जिसकी Ideology ने दुनिया का नक्शा बदल दिया</title>
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<description><![CDATA[ जर्मनी के महान अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार, समाजशास्त्री, पत्रकार और क्रांतिकारी कार्ल मार्क्स का 14 मार्च को निधन हो गया था। वह जर्मन के अर्थशास्त्री, दार्शनिक और राजनीतिक सिद्धांतवादी थे। उन्होंने आधुनिक इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला था। कार्ल मार्क्स ने कम्युनिज्म, समाजवाद और व्यापार के स्वभाव पर विचारों ने 20वीं शताब्दी की राजनीतिक दृष्टिकोण को आकार देने का काम किया था। आज भी कार्ल मार्क्स के सिद्धांत राजनीतिक और आर्थिक विवादों पर प्रभाव डालते हैं।जन्म और शिक्षाजर्मनी के राइनलैंड क्षेत्र के ट्रायर नामक शहर में 05 मार्च 1818 को कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ था। इनके पिता वकील और मां धनवान परिवार से थीं। मार्क्स को घर पर शिक्षा दी गई थी। जब वह 12 साल के थे, तो उन्होंने स्थानीय स्कूल में पढ़ना शुरू किया था। फिर बोन यूनिवर्सिटी और बर्लिन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। यहां पर उन्होंने इतिहास, दर्शन और अर्थशास्त्र पर ध्यान केंद्रित किया था। उन्होंने जेना यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी। मार्क्स ने वकालत की भी पढ़ाई की थी।इसे भी पढ़ें: Sayajirao Gaekwad Birth Anniversary: Bank of Baroda के संस्थापक, BHU के दानवीर, कौन थे महाराजा Sayajirao Gaekwad IIIराजनीतिक और आर्थिक विचारकार्ल मार्क्स को समाजवाद के प्रणेता के रूप में जाना जाता है। मार्क्स की विचारधारा आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक बदलाव को लेकर थी। वह समाजवाद के जरिए आर्थिक विकास को समझते थे। उन्होंने राजनीतिक विचारों के बारे में काफी कम लिखा है। कार्ल मार्क्स ने अपने समय के सामाजिक और धार्मिक दबावों को उखाड़ फेंकने के लिए समाजवादी विचारधारा विकसित की थी।कार्ल मार्क्स की विचारधारा का मूल तत्व था कि शक्ति न सिर्फ व्यक्तिगत या संस्थात्मक होती है। बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक होती है। मार्क्स इस बात को बताते थे कि समाज का आधार अपने काम करने वाले लोगों पर होता है, न कि उनके लोगों पर। इसलिए कार्ल मार्क्स ने समाज के सभी वर्गों की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करने की जरूरत को बताया था।सिद्धांतमार्क्स समाजवाद और साम्यवाद पर अपने सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं। उनका मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था स्वाभाविक रूप से त्रुटिपूर्ण थी। जोकि अंतत: अपने ही पतन की वजह बनेगी। उनका मानना था कि शासक वर्ग ने मजदूर वर्ग का शोषण किया और यह शोषण एक क्रांति की तरफ ले जाएगा। जहां पर मजदूर वर्ग पूंजीपति वर्ग को उखाड़ फेंकेगा। साथ ही एक समाजवादी समाज की स्थापना करेगा।मृत्युवहीं 14 मार्च 1883 को काल मार्क्स का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 15 Mar 2026 10:13:55 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sambhaji Death Anniversary: जब Mughal शासक औरंगजेब झुका न सका Sambhaji Maharaj का सिर, दीं थीं बर्बर यातनाएं</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 11 मार्च को छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज का निधन हो गया था। इस दिन ही क्रूर शासक औरंगजेब ने संभाजी की हत्याकर दी थी। औरंगजेब ने संभाजी से इस्लाम कुबूल करने के लिए कहा था, जिस पर संभाजी ने इंकार कर दिया था इसलिए औरंगजेब के आदेश पर उनकी जुबान खींच ली थी। संभाजी महाराज देश के महान मराठा योद्धा थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर संभाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुरंदर किले में 14 मई 1657 को संभाजी राजे का जन्म हुआ था। यह स्थान पुणे से करीब 50 किमी की दूरी पर है। संभाजी के पिता शिवाजी महाराज और मां सईबाई थीं। जब संभाजी दो साल के थे, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। जिसके चलते संभाजी की परवरिश दादी जिजाबाई ने की थी।इसे भी पढ़ें: Zakir Hussain Birth Anniversary: जाकिर हुसैन को पिता से मिली विरासत, तबले की थाप से दुनिया को बनाया दीवानाजब बंदी बनेसंभाजी सिर्फ 9 साल के थे, तब उनको एक समझौते के तहत राजपूत राजा जय सिंह के यहां बंदी के रूप में रहना पड़ा। जब शिवाजी महाराज ने मुगल शासक औरंगजेब को चकमा देकर आगरा से भागे थे, उस दौरान संभाजी भी अपने पिता के साथ थे। शिवाजी खतरा भांपकर संभाजी को एक रिश्तेदार के घर मथुरा छोड़ दिया और उनके मरने की अफवाह फैला दी। हालांकि कुछ समय बाद वह महाराष्ट्र सही-सलामत पहुंचे।बगावती थे संभाजीसंभाजी शुरूआत से ही बगावत करने वाले थे और गैर-जिम्मेदार भी थे। जिस कारण 1678 में शिवाजी ने उनको पन्हाला किले में कैद कर दिया। जहां से वह भाग निकले और मुगलों से मिल गए। लेकिन उनको जल्द ही मुगलों की साजिश समझ आई और वह वापस महाराष्ट्र लौट आए। लेकिन महाराष्ट्र लौटने के बाद उनको फिर से बंदी बना लिया गया।युवराज से बने राजाअप्रैल 1680 में शिवाजी महाराज की मृत्यु हो गई, इस दौरान संभाजी पन्हाला में कैद थे। इस दौरान शिवाजी के दूसरे बेटे राजाराम को सिंहासन पर बिठाया गया। लेकिन संभाजी अपने शुभचिंतकों की मदद से कैद से बाहर आ गए और 18 जून 1680 को रायगढ़ पर कब्जा ले लिया। वहीं 20 जुलाई 1680 को संभाजी की ताजपोशी हुई।मुगलों से जंगसत्ता में आने के बाद संभाजी महाराज ने मुगलों से कई युद्ध किए। उन्होंने बुरहानपुर शहर पर हमला किया और उसको बर्बाद कर दिया। जिसके बाद से मुगलों से उनकी दुश्मनी खुली रही। वहीं 1687 में मुगलों और मराठा फौज में जबरदस्त लड़ाई हुई। लेकिन जीत मराठाओं की हुई। हालांकि उनकी सेना काफी कमजोर हो गई थी। इस युद्ध में उनके सेनापति औऱ संभाजी के विश्वासपात्र हंबीरराव मोहिते की मृत्यु हो गई थी। इस दौरान संभाजी के खिलाफ षड्यंत्रों का बाजार गर्म होने लगा।संभाजी को किया गया कैदफरवरी 1689 में संभाजी को एक बैठक के लिए संगमेश्वर पहुंचे। यहां पर उन पर घात लगाकर हमला किया। इस हमले में संभाजी और उनके सलाहकार कविकलश को कैद करके बहादुरगढ़ ले जाया गया। इस दौरान संभाजी के सामने इस्लाम कुबूल करने की शर्त रखी। लेकिन संभाजी ने यह शर्त मानने से इंकार कर दिया। इंकार करने पर संभाजी और कविकलश को बुरी तरह से पीटा गया। उनकी जुबान खींच ली गई।मृत्युवहीं 11 मार्च 1689 को संभाजी के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके उनकी जान ले ली गई। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 12 Mar 2026 10:06:34 +0530</pubDate>
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<title>Sayajirao Gaekwad Birth Anniversary: Bank of Baroda के संस्थापक, BHU के दानवीर, कौन थे महाराजा Sayajirao Gaekwad III</title>
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<description><![CDATA[ बड़ौदा रियासत के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय का आज ही के दिन यानी 11 मार्च को जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी रियासत को मॉर्डन बनाने के लिए कई कदम उठाए थे। सयाजीराव ने बड़ौदा में लक्ष्मी विलास पैलेस बनवाया। जिसको आज भी दुनिया के सबसे लग्जरी और महंगे महलों में गिना जाता है। लक्ष्मी विलास पैलेस बकिंघम पैलेस से चार गुना बड़ा है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सयाजीराव गायकवाड़ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र राज्य के नासिक जिला स्थित कुल्वाने गांव में 11 मार्च 1863 को सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय का जन्म हुआ था। इनका मूल नाम गोपालराव था। इनके पिता का नाम काशीनाथ था, जोकि बड़ौदा राजपरिवार से दूर का संबंध था। वहीं 18 साल की उम्र में 28 नवंबर 1881 को सयाजीराव गायकवाड़ का राज्याभिषेक हुआ था।इसे भी पढ़ें: Sambhaji Death Anniversary: जब Mughal शासक औरंगजेब झुका न सका Sambhaji Maharaj का सिर, दीं थीं बर्बर यातनाएंज्योतिबा फुले से मुलाकातबडौदा नरेश महाराज सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय की पूना में 1885 में ज्योतिबा फुले से ऐतिहासिक मुलाकात की थी। वह ज्योतिबाराव फुले के &#039;सत्य शोधक समाज&#039; के कार्यों से बेहद प्रभावित हुए थे। सयाजीराव गायकवाड़ ने विदेश में उच्च शिक्षा लेने के लिए बाबा साहेब को 11.50 पाउंड प्रतिमाह 3 साल के लिए स्कॉलरशिप देने का महान कार्य किया था।इसके अलावा सयाजीराव गायकवाड़ के नाम पर बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में एक बड़ा पुस्तकालय है। जिसको केंद्रीय पुस्तकालय भी कहते हैं। जो एक मुख्य पुस्तकालय है और इसके लिए महाराज सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा काफी दान दिया गया था। वहीं इसी राज परिवार के सहयोग से साल 1908 में &#039;बैंक ऑफ बड़ौदा&#039; की नींव डाली गई थी। इसके अलावा बड़ौदा में सयाजीराव ने एक विश्वविद्यालय का भी निर्माण कराया था। जिसका नाम सयाजीराव गायकवाड़ यूनिवर्सिटी है। उन्होंने मानव हित के लिए कई अनगिनत कार्य किए हैं।मृत्युवहीं 06 फरवरी 1939 को 76 साल की उम्र में सयाजीराव गायकवाड़ का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 12 Mar 2026 10:06:32 +0530</pubDate>
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<title>Zakir Hussain Birth Anniversary: जाकिर हुसैन को पिता से मिली विरासत, तबले की थाप से दुनिया को बनाया दीवाना</title>
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<description><![CDATA[ तबला वादक जाकिर हुसैन का आज ही के दिन यानी की 09 मार्च को जन्म हुआ था। वह तबले पर अपनी उंगलियों और हाथ की थाप से जादू का संसार बना देते थे। इसलिए उनको उस्ताद जाकिर हुसैन कहा जाता था। उन्होंने बॉलीवुड की कई फिल्मों में भी संगीत का जादू बिखेरा है। बता दें कि उनको सिर्फ तबले पर ही महारत नहीं हासिल थी, बल्कि वह म्यूजिक भी कंपोज करते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जाकिर हुसैन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 09 मार्च 1951 को जाकिर हुसैन का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम अल्लारक्खा खान था। जाकिर को अपने पिता से यह हुनर विरासत में मिला था। जाकिर हुसैन के पिता अल्ला रक्खा खान खुद एक मशहूर तबला वादक थे।इसे भी पढ़ें: Sahir Ludhianvi Birth Anniversary: Bollywood के बागी शायर Sahir Ludhianvi, जिनकी कलम ने व्यवस्था के खिलाफ हमेशा आग उगलीपहला कंसर्टजाकिर हुसैन ने महज 11 साल की उम्र में अमेरिका में अपना पहला कंसर्ट किया था। शुरूआत में जाकिर ने पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय संगीत में रुचि दिखाई, लेकिन उन्होंने जल्द ही पश्चिमी संगीत को भी अपनी शैली में शामिल किया। सिर्फ 3 साल की उम्र से उन्होंने अपने पिता से पखावज सीखना शुरूकर दिया था। साल 1987 में उन्होंने अपना पहला सोलो म्यूजिक एल्बम रिलीज किया था। इस एल्बम का नाम &#039;मेकिंग म्यूजिक&#039; था।शानदार अभिनेताजाकिर एक महान तबलावादक होने के साथ शानदार अभिनेता भी थे। उनके संगीत ने सिनेमा पर गहरा असर डाला है। उन्होंने &#039;मिस बीटीज चिल्ड्रन&#039;, &#039;द परफेक्ट मर्डर&#039;, &#039;मंटो&#039; और &#039;साज&#039; जैसी फिल्मों के लिए काम किया था। साल 1983 में आई फिल्म &#039;हीट एंड डस्ट&#039; में पहली बार अभिनय किया था। इस फिल्म में अभिनेता शशि कपूर मुख्य भूमिका में थे।सम्मानतबला वादक जाकिर हुसैन को संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान ग्रेमी अवॉर्ड मिला था। यह सम्मान उनको दो बार मिला था। इतनी लोकप्रियता के बाद भी उन्होंने कभी खुद को बेस्ट तबला वादक नहीं माना। इसके अलावा उनको पद्मश्री, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी की ओर से भी सम्मान मिल चुका है।मृत्युप्रसिद्ध तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन की 73 साल की आयु में 15 दिसंबर 2024 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 10:21:19 +0530</pubDate>
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<title>Paramahansa Yogananda Death Anniversary: UP के मुकुंद कैसे बने पश्चिम में &amp;apos;Father of Yoga&amp;apos;, बड़ी&#45;बड़ी हस्तियां बनीं शिष्य</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 07 मार्च को योगगुरु परमहंस योगानंद का निधन हो गया था। परमहंस योगानंद ने ही भारत के क्रिया योग को विश्व पटल पर स्थापित करने का काम किया था। परमहंस 20वीं सदी के एक आध्यात्मिक गुरु, संत और योगी थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को क्रिया योग का उपदेश दिया और पूरे विश्व में इसका प्रचार-प्रसार किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर परमहंस योगानंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 05 जनवरी 1893 को मुकुंद लाल घोष का जन्म हुआ था। वह एक समृद्ध और धर्मपरायण बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम भगवती चरण घोष था, जोकि बंगाल रेलवे में वाइस प्रेसिडेंट थे।इसे भी पढ़ें: Jamsetji Tata Birth Anniversary: जानें कैसे 21 हजार से खड़ा हुआ Tata Group, ये है Father of Indian Industry की कहानीकई प्रमुख हस्तियां बनीं शिष्यसन् 1925 में योगानंद ने लॉस एंजेलिस में निवास किया। यहां पर उन्होंने अपने संगठन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय स्थापित किया। व्यवसाय, विज्ञान और कला क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां योगानंद के शिष्य बन गए। वहीं सन् 1917 में एक आदर्श-जीवन विद्यालय की स्थापना के साथ परमहंस योगानंद ने अपने कार्यकी शुरूआत की थी। इसमें उन्होंने आधुनिक शैक्षणिक तरीकों के साथ योग प्रशिक्षण और आध्यात्मिक आदर्श में निर्देशों को जोड़ा था।फादर ऑफ योगाबता दें कि परमहंस योगानंद को पश्चिमी देशों में &#039;फादर ऑफ योगा&#039; कहा जाता है। योगानंद के प्रयासों और कार्यों का परिणाम है कि आज &#039;क्रिया योग&#039; पूरी दुनिया में फैल चुका है और इसका लगातार विस्तार हो रहा है। भारत सरकार ने सबसे पहले साल 1977 और दूसरी बार 07 मार्च 2017 में योगानंदजी और उनकी संस्था के सम्मान में डाक टिकट जारी किए थे।मृत्युवहीं 07 मार्च 1952 में परमहंस योगानंद ने महासमाधि ले ली थी। लेकिन महासमाधि लेने के बाद अनेक दिनों तक उनके पार्थिव शरीर में कोई विकृति देखने को नहीं मिली थी। जिससे &#039;फारेस्ट लान मैमोरियल&#039; के अधिकारी हैरान रह गए थे। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 08 Mar 2026 20:11:02 +0530</pubDate>
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<title>Sahir Ludhianvi Birth Anniversary: Bollywood के बागी शायर Sahir Ludhianvi, जिनकी कलम ने व्यवस्था के खिलाफ हमेशा आग उगली</title>
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<description><![CDATA[ 20वीं सदी के सबसे बेहतरीन गीतकार और कवि में से एक रहे साहिर लुधियानवी का 08 मार्च को जन्म हुआ था। साहिर के गीतों और शायरी को आज भी लोग खूब पसंद करते हैं। उन्होंने अपने गीतों और शायरियों के जरिए जुल्मों और गैर-बराबरी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी। साहिर लुधियानवी शब्दों के सच्चे जादूगर थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर साहिर लुधियानवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के लुधियाना के करीमपुरा में 08 मार्च 1921 को साहिर लुधियानवी का जन्म हुआ था। वह एक पंजाबी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। साहिर का असली नाम अब्दुल हई है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा लुधियाना से पूरी की। कॉलेज टाइम से ही वह अपने शेर और शायरी के लिए फेमस हो गए थे। साहिर एक भारतीय कवि और संगीतकार थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए तमाम गाने भी लिखे।इसे भी पढ़ें: Paramahansa Yogananda Death Anniversary: UP के मुकुंद कैसे बने पश्चिम में &#039;Father of Yoga&#039;, बड़ी-बड़ी हस्तियां बनीं शिष्यकरियर की शुरूआतसाहिर लुधियानवी ने अपने काम से फिल्म जगह में अच्छी जगह बनाई थी। साल 1949 में आई फिल्म &#039;आजादी की राह&#039; से उन्होंने अपने करियर की शुरूआत की थी। इस फिल्म के लिए उन्होंने 4 गाने लिखे थे। फिर साल 1951 में आई फिल्म &#039;नौजवान&#039; के लिए साहिर ने गाने लिखे। उनको सबसे अधिक सफलता साल 1951 में आई फिल्म &#039;बाजी&#039; से मिली थी। इन गानों के संगीतकार एस डी बर्मन थे। उस दौरान साहिर को गुरुदत्त की टीम का हिस्सा माना जाता है। बर्मन के साथ साहिर की आखिरी फिल्म &#039;प्यासा&#039; थी। इसके बाद दोनों के बीच कुछ मतभेद हो गए। जिसका कारण बर्मन और साहिर की राहें अलग हो गईं।लिखे ये गानेसाहिर लुधियानवी की कविताएं और शायरी दत्ता नायक को काफी ज्यादा पसंद थीं। जिस कारण साहिर ने दत्ता नायक के साथ तमाम फिल्मों के लिए गाने लिखे थे। साहिर लुधियानवी ने फिल्म &#039;चंद्रकांता&#039;, &#039;दास्तान&#039;, &#039;मिलाप&#039;, &#039;इज्जत&#039; और &#039;दाग&#039; के लिए भी गाने लिखे थे। लता मंगेशकर के साथ विवादबताया जाता है कि साहिर लुधियानवी ने लता मंगेशकर से ज्यादा फीस की डिमांड की थी। साहिर का कहना था कि भले ही उनको लता से एक रुपए ही ज्यादा दिया जाए, लेकिन उनको लता से ज्यादा फीस दी जाए। जिसके कारण साहिर और लता के बीच मतभेद हो गए थे।मृत्युवहीं 25 अक्तूबर 1980 को 59 साल की उम्र में साहिर लुधियानवी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। जिसके बाद उनको मुस्लिम रीति-रिवाज के साथ जुहू में दफनाया गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 08 Mar 2026 20:11:01 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sarojini Naidu Death Anniversary: अपनी कविताओं से बनीं &amp;apos;Nightingale of India&amp;apos;, जानिए Freedom Fighter सरोजिनी नायडू की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 02 मार्च को राजनीतिक कार्यकर्ता, महिला अधिकारों की समर्थक, स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष सरोजिनी नायडू का निधन हो गया था। उनकी प्रभावी वाणी और ओजपूर्ण लेखनी की वजह से सरोजिनी नायडू को &#039;नाइटिंगल ऑफ इंडिया&#039; कहा गया था। वह आजादी के बाद यूनाइटेड प्राविंसेज वर्तमान में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनी थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सरोजिनी नाडयू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारहैदराबाद में 13 फरवरी 1879 को सरोजिनी नायडू का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम अघोरेनाथ चट्टोपाध्याय था, जोकि हैदराबाद के निजाम कॉलेज में प्रिंसिपल थे। अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद सरोजिनी ने यूनिवर्सिटी आफ मद्रास के अलावा लंदन के किंग्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। फिर उन्होंने कैंब्रिज के गिरटन कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की।इसे भी पढ़ें: Dr Rajendra Prasad Death Anniversary: 70 रुपये की Job से President तक का सफर, सादगी और त्याग की अद्भुत मिसाल थे राजेंद्र प्रसादलिखती थीं कविताएंपढ़ाई के दौरान ही सरोजनी नायडू कविताएं लिखने लगी थीं। सरोजिनी नायडू का पहला कविता संग्रह &#039;गोल्डन थ्रैशोल्ड&#039; था। उनकी शानदार कविताओं के कारण ही सरोजिनी नायडू को &#039;भारत की कोकिला&#039; की उपाधि मिली थी।आजादी की लड़ाई में कूदींमहिला अधिकारों के लिए सरोजिनी नायडू अपने कॉलेज के दिनों से ही सक्रिय थीं। वह कहती थीं कि महिलाएं किसी भी देश की नींव होती है। साल 1914 में महात्मा गांधी से मिलने के बाद सरोजिनी नायडू के जीवन की दिशा बदल गई। इसके बाद सरोजिनी नायडू कांग्रेस में शामिल हो गईं। उनके काम और समर्पण को देखते हुए साल 1925 में सरोजिनी नायडू को अध्यक्ष बनाया गया। वह पहली भारतीय महिला थीं, जो कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। सरोजिनी नायडू महात्मा गांधी को मिकी माउस कहकर बुलाती थीं।प्लेग महामारी20वीं सदी की शुरूआत में भारत में प्लेग महामारी की तरह फैला था। इस दौरान सरोजिनी नायडू ने बहुत काम किया। कांग्रेस नेता होने के बाद भी अंग्रेज सरकार ने सरोजिनी नायडू के काम को काफी सराहा था। अंग्रेज सरकार ने उनको साल 1928 में &#039;केसरे-हिंद&#039; का खिताब दिया था। लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत सरोजिनी नायडू पर बिगड़ गई। इस आंदोलन में उनकी सक्रियता से खफा होकर अंग्रेज सरकार ने सरोजिनी नायडू को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।यूपी की राज्यपालफिर साल 1947 में देश के आजाद होने के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सरोजिनी नायडू से उत्तर प्रदेश का राज्यपाल पद संभालने की गुजारिश की। जिसको सरोजिनी नायडू ने स्वीकार कर लिया। साथ ही उन्होंने देश की पहली महिला राज्यपाल होने का गौरव प्राप्त किया।मृत्युवहीं 02 मार्च 1949 को लखनऊ में हार्ट अटैक के कारण सरोजिनी नायडू का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 03 Mar 2026 13:03:02 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Jamsetji Tata Birth Anniversary: जानें कैसे 21 हजार से खड़ा हुआ Tata Group, ये है Father of Indian Industry की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज यानी की 03 मार्च को टाटा ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी टाटा का जन्म हुआ था। वह उस विशाल औद्योगिक साम्राज्य के संस्थापक थे, जो आज पूरी दुनिया में अपने झंडे गाड़ रहा है। जमशेदजी टाटा ने बहुत कम उम्र में अपने व्यवसाय की शुरूआत की थी। इसमें उनके समर्पण और जोश से व्यवसाय को सफलता की सीढ़ी चढ़ने और उसको ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद मिली थी। जमशेदजी टाटा एक भारतीय उद्यमी और उद्योगपति थे। इसके अलावा वह भारतीय उद्योग में अपने अग्रणी काम के लिए जाने जाते थे। तो आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर जमशेदजी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के छोटे कस्बे नवसारी में 03 मार्च 1839 को जमशेदजी टाटा का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा है। इनके पिता का नाम नौशेरवांजी और मां का नाम जीवनबाई टाटा था। नौशेरवांजी पारसी पादरियों के खानदान में पहले व्यवसायी थे, वह मुंबई आए और यहीं से उन्होंने कारोबार में कदम रखा। वहीं जमशेदजी टाटा भी 14 साल की उम्र से अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे थे।इसे भी पढ़ें: Sarojini Naidu Death Anniversary: अपनी कविताओं से बनीं &#039;Nightingale of India&#039;, जानिए Freedom Fighter सरोजिनी नायडू की कहानीट्रेडिंग कंपनी से की शुरुआतजमशेदजी टाटा ने सिर्फ 29 साल की उम्र में 21,000 रुपए के साथ ट्रेडिंग कंपनी से शुरूआत की थी। उस समय शुरू की गई यह कंपनी आज के समय में टाटा ग्रुप का इतिहास है। साल 1874 में उन्होंने बिजनेस की दुनिया में एक बड़ा कदम उठाया था। जमशेदजी टाटा ने टेक्सटाइल मिल की शुरूआत की थी। लेकिन यह मिल उन्होंने मिल इंडस्ट्री के हब माने जाने वाले मुंबई में नहीं बल्कि नागपुर में शुरू की थी।कर्मचारियों पर दिया ध्यानजमशेदजी टाटा ने ऐसा कदम उठाया था, जो आज भी टाटा ग्रुप की पहचान बना हुआ है। साल 1886 में उन्होंने अपनी एम्प्रेस मिल के कर्मचारियों को भत्ता देने की शुरूआत की थी। इसके जरिए जमशेदजी टाटा ने एम्प्लॉइ वेलफेयर की नींव रखने का काम किया था। ठीक उसी तरह आज भी टाटा ग्रुप अपने कर्मचारियों का ध्यान रखने के लिए जाना जाता है।शिक्षा से ले होटल बनाने तक में दिया योगदानबता दें कि जमशेदजी टाटा ने JN Tata Endowment Fund के माध्यम से स्टूडेंट्स की मदद की। जो स्टूडेंट उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहते थे, जमशेदजी टाटा ने उनके सपनों को पंख देने का काम दिया। वहीं उन्होंने साल 1903 में एक होटल भी खोला। इस होटल का नाम &#039;द ताज होटल&#039; है, जोकि देश के सबसे बड़े होटलों में से एक है। अपनी आखिरी सांस तक जमशेदजी टाटा ने &#039;टाटा ग्रुप&#039; को एक बड़ा नाम बना दिया था।वर्तमान समय में टाटा ग्रुप दुनियाभर में अपने प्रोडक्ट के जरिए धाक जमा रहा है। वहीं वेलफेयर के कामों में भी टाटा ग्रुप शामिल रहता है। टाटा मोटर्स, TCS, टाटा स्टील और टाटा कम्युनिकेशन जैसी कंपनियां दुनियाभर में भारत का नाम रोशन कर रही हैं।मृत्युवहीं 19 मई 1904 को जमशेदजी टाटा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 03 Mar 2026 13:02:55 +0530</pubDate>
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<title>Dr Rajendra Prasad Death Anniversary: 70 रुपये की Job से President तक का सफर, सादगी और त्याग की अद्भुत मिसाल थे राजेंद्र प्रसाद</title>
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<description><![CDATA[ भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का आज ही के दिन यानी की 28 फरवरी को निधन हो गया था। वह सादगी और विद्वता के संगम थे। उन्होंने अपनी सेवा से भारतीय लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने का काम किया था। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 70 रुपए की नौकरी से लेकर राष्ट्रपति भवन के शिखर तक का सफर तय किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ राजेंद्र प्रसाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाबिहार में 03 दिसंबर 1884 को राजेंद्र प्रसाद का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी थे। वह शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद छपरा और फिर पटना चले गए। पढ़ाई के दौरान उन्होंने कानून में मास्टर की डिग्री के साथ डॉक्टरेट की विशिष्टता हासिल की। इसे भी पढ़ें: Chandrashekhar Azad Death Anniversary: Alfred Park में Chandrashekhar Azad ने British पुलिस को दिया था चकमा, जिंदा नहीं आए हाथराजनीतिक सफरकानून की पढ़ाई के साथ ही वह राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। वह महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे। डॉ राजेंद्र प्रसाद उन भारतीय नेताओं में से एक थे, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अहम भूमिका निभाई थी।राष्ट्रपति पदबता दें कि पंडित नेहरू चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। लेकिन सहमति नहीं बनी। वहीं सरदार पटेल और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने राजेंद्र प्रसाद की योग्यता और सादगी पर भरोसा जताया। ऐसे में 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद को निर्विरोध रूप से स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया।सादगी की अनूठी मिसाल थेराष्ट्रपति भवन में रहते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद ने विलासिता को त्यागकर सिर्फ तीन कमरों का उपयोद किया। इस दौरान उनको 10,000 रुपए वेतन और 2,500 रुपए भत्ता मिलता था। तब उन्होंने इसको अधिक मानकर खुद अपना वेतन घटा लिया था। वह सिर्फ 2,500 रुपए लेते और साबरमती की तर्ज पर सदाकत आश्रम को अपनी कर्मभूमि मानते।खादी के प्रति समर्पणडॉ प्रसाद का खादी के प्रति समर्पण इतना गहरा था कि वह राष्ट्रपति भवन में रोजाना नियम से चरखा चलाना नहीं भूलते थे। उन्होंने अपनी पोती के कन्यादान के लिए अपने हाथों से सूत कातकर सुंदर खादी की साड़ी तैयार की थी। जनता के राष्ट्रपतिडॉ राजेंद्र प्रसाद देश के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे, जिन्होंने सुदूर राज्यों के गरीबों से मिलने के लिए बहुत लंबी रेल यात्राएं भी की थीं। पांच महीने की यात्रा के दौरान वह छोटे स्टेशनों पर रुकते और किसानों व गरीबों की समस्याओं को ध्यान से सुनते थे। डॉ प्रसाद की इस संवेदनशीलता ने उनको जनता का सच्चा प्रतिनिधि और &#039;देशरत्न&#039; की उपाधि का सच्चा हकदार बनाया।मृत्युडॉ राजेंद्र प्रसाद रिटायरमेंट के बाद पटना के सदाकत आश्रम में एक साधारण खपरैल के मकान में रहने लगे। वहीं 28 फरवरी 1963 को डॉ राजेंद्र प्रसाद का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 28 Feb 2026 10:29:10 +0530</pubDate>
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<title>Anandi Gopal Joshi Death Anniversary: 9 साल में शादी, 22 में मौत, पढ़ें देश की First Lady Doctor की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 26 फरवरी को देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदी गोपाल जोशी का निधन हो गया था। उस दौर में महिलाएं डॉक्टर बनने की सोच भी नहीं सकती थीं, लेकिन आनंदी गोपाल जोशी ने भारत की पहली महिला डॉक्टर बनकर इतिहास रच दिया था। आनंदी गोपाल ने डॉक्टर बनकर देश को गौरवान्वित किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आनंदी गोपाल जोशी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुणे जिले के एक रूढ़िवादी जमींदार परिवार में 31 मार्च 1865 को आनंदी गोपाल जोशी का जन्म हुआ था। कम उम्र 9 साल की उम्र में उनका विवाह गोपालराव जोशी से कर दिया गया था। वहीं महज 14 साल की उम्र में वह मां बन गई थीं। फिर 10 दिन बाद उन्होंने अपने बच्चे को खो दिया था। अपने बच्चे की मृत्यु से आनंदी को इतना अधिक दुख हुआ कि उन्होंने डॉक्टर बनने का लक्ष्य तय कर लिया।इसे भी पढ़ें: Jayalalitha Birth Anniversary: Film Industry से लेकर CM की कुर्सी तक, &#039;अम्मा&#039; ने ऐसे बनाई अपनी अलग पहचानMD करने अमेरिका गईंबता दें कि आनंदी गोपाल जोशी 14 साल की उम्र तक कभी स्कूल नहीं गई थीं। लेकिन जब उन्होंने यह ठाना कि उनको डॉक्टर बनना है, तो उनके पति ने आंनदी का एडमिशन मिशनरी स्कूल में कराया। साल 1880 में उन्होंने एक प्रसिद्ध अमेरिकी मिशनरी, रॉयल वाइल्डर को एक पत्र भेजा था। जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी की रुचि को देखते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका में चिकित्सा के पढ़ाई की जानकारी मांगी। जानकारी मिलने पर आनंदी गोपाल जोशी आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गईं।आनंदी गोपाल जोशी ने सिल्वेनिया स्थित महिला मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ले लिया। वहीं 21 साल की उम्र में आनंदी ने एमडी की डिग्री हासिल की। यह डिग्री पाने वाली वह पहली भारतीय महिला बनीं। पढ़ाई के बाद भारत आकर आनंदी गोपाल जोशी ने कोल्हापुर रियासत के अल्बर्ट एडवर्ड हॉस्पिटल के महिला वार्ड में प्रभारी चिकित्सक के रूप में काम किया।मृत्युवहीं डॉक्टरी की प्रैक्टिस शुरू करने से पहले आनंदी गोपाल जोशी बीमार पड़ गईं और वह टीबी की चपेट में आ गईं। वहीं महज 22 साल की उम्र में 26 फरवरी 1887 को आनंदी गोपाल जोशी का निधन हो गया था।सम्मानआनंदीबाई ने जिन कठिन परिस्थितियों में यह उपलब्धि हासिल की थी। उसके लिए उनको कई सम्मान और पुरस्कार मिले थे। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 27 Feb 2026 22:05:09 +0530</pubDate>
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<title>Vinayak Damodar Savarkar Death Anniversary: सिर्फ क्रांतिकारी नहीं, हिंदुओं की 7 बेड़ियां तोड़ने वाले Social Reformer भी थे वीर सावरकर</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में विनायक दामोदर सावरकर सबसे विवादित क्रांतकारियों में से एक रहे हैं। हालांकि वीर सावरकर की देश की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका रही है। उन्होंने देश की आजादी के संघर्ष के साथ हिंदू कुरीतियों के खिलाफ समाज को मुक्त कराने के लिए कार्य किए थे। एक लेखक के रूप में वीर सावरकर का लेखन विचारोत्तेजक और प्रभावी माना जाता था। आज ही के दिन यानी की 26 फरवरी को विनायक दामोदर सावरकर का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विनायक दामोदर सावरकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में 28 मई 1883 को विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों वाले थे। उन्होंने 12 साल की उम्र में मुस्लिमों से बदला लेने के लिए अपने स्कूली साथियों के साथ मिलकर मस्जिद पर हमला किया था। वहीं बीए की पढ़ाई करने के दौरान बाल गंगाधर तिलक की अपील पर वीर सावरकर ने अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार किया था।इसे भी पढ़ें: Anandi Gopal Joshi Death Anniversary: 9 साल में शादी, 22 में मौत, पढ़ें देश की First Lady Doctor की कहानीकाला पानी की सजासाल 1909 में मॉर्ले मिंटो सुधार के खिलाफ सशस्त्र विरोध की साजिश रचने के आरोप में वीर सावरकर को गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने पानी में कूदकर भागने की कोशिश की, लेकिन उनको फिर गिरफ्तार कर लिया गया। साल 1911 में उनको दो बार कालापानी यानी की आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बता दें कि सावरकर को इस कारण से गद्दार भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने रिहाई के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी थी।हालांकि सावरकर के समर्थकों का मानना है कि सावरकर द्वारा यह माफी अपने साथी राजनैतिक कैदियों के लिए मांगी गई थी। साल 1942 में सावरकर को इस शर्त के साथ रिहा किया गया था कि वह 5 साल तक राजनीति में सक्रिय नहीं होंगे। वीर सावरकर ने रत्नागिरी में अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए भी कार्य किया था। उन्होंने सभी जातियों के हिंदुओं के साथ खाना खाने की परंपरा शुरू की थी।लेखक थे सावरकरवीर सावरकर एक लेखक थे और उनके द्वारा लिखी गई बहुत सी किताबों पर अंग्रेजों ने पाबंदियां लगा दी थीं। इनमें से एक किताब &#039;द इंडिपेंडेंस वार ऑफ दे इंडिपेंडेंस ऑफ 1857&#039; थी। इस किताब को लाख प्रयासों के बाद भी अंग्रेज नीदरलैंड में प्रकाशिक होने से नहीं रोक सके थे। सावरकर ने कुल 38 किताबें लिखी थीं। जोकि प्रमुख रूप से अंग्रेजी और मराठी में थी।समाज सेवावीर सावरकर ने हिंदुओं के उत्थान के लिए लोगों से अपने धर्म की 7 बेड़ियों को तोड़ने की अपील की थी। इसमें व्यवसायबंदी, स्पर्शबंदी, वेदोत्कबंदी, समुद्रबंदी, रोटी बंदी, शुद्धिबंधी और बेटी बंदी आदि शामिल था।मृत्युअपने जीवन के अंतिम समय में वीर सावरकर ने समाधी लेने का फैसला किया और 01 फरवरी 1966 में खाना-पीना छोड़ दिया। वहीं 26 फरवरी 1966 को वीर सावरकर का निधन हो गया।  ]]></description>
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<pubDate>Fri, 27 Feb 2026 22:05:05 +0530</pubDate>
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<title>Chandrashekhar Azad Death Anniversary: Alfred Park में Chandrashekhar Azad ने British पुलिस को दिया था चकमा, जिंदा नहीं आए हाथ</title>
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<description><![CDATA[ देश के लिए बलिदान देने वाले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का 27 फरवरी को निधन हो गया था। चंद्रशेखर आजाद ने 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के चौक में आत्मघाती हमला किया था। ब्रिटिश सरकार के सैन्य पर अभियोग लगाने के चलते चंद्रशेखर आजाद ने अपनी ही गोलियों से आत्महत्या कर ली थी। उनको भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में से एक के रूप में याद किया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर आजाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर 23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर तिवारी का जन्म हुआ था। इन्होंने अपना पूरी जीवन देश की आजादी की लड़ाई के लिए कुर्बान कर दिया था। वह बेहद कम उम्र में ही देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े थे।इसे भी पढ़ें: Vinayak Damodar Savarkar Death Anniversary: सिर्फ क्रांतिकारी नहीं, हिंदुओं की 7 बेड़ियां तोड़ने वाले Social Reformer भी थे वीर सावरकरगांधीजी से मोहभंगअसहयोग आंदोलन के दौरान जब चौरीचौरा कांड की वजह से गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। तो आजाद का महात्मा गांधी से मोहभंग हो गया था। इस दौरान उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। यह मुलाकात आजाद के जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुई। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद &#039;हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन&#039; के सक्रिय सदस्य बन गए। वैसे तो पार्टी का नेतृत्व बिस्मिल के हाथों में था। लेकिन जल्द ही आजाद स्पष्ट और ओजस्वी विचारों से सभी साथियों की पसंद बन गए थे, जिसमें भगत सिंह भी शामिल थे।ऐसे मिला आजाद नामसाल 1921 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ने के बाद चंद्रशेखर की गिरफ्तारी हुई। इस दौरान जब उनको जज के सामने पेश किया गया, तो चंद्रशेखर के जवाब ने सबके होश उड़ा दिए थे। जब उनसे नाम पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता बताया। उनके इस जवाब से जज नाराज हो गया औऱ उसने चंद्रशेखर को 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई थी।काकोरी ट्रेन कांडहिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन दल के सदस्यों ने काकोरी ट्रेन लूट को अंजाम दिया था। इस दौरान सरकारी संपत्ति की लूट से क्रांतिकारी गतिविधियों के लिये अधिकांश धन संग्रह का काम किया जाता था। आजाद का मानना था कि वह लूटा गया धन भारतीयों का है। इस कांड को मुख्य रूप से बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और मनमथनाथ गुप्ता ने अंजाम दिया था। इस घटना के बाद रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई थी।दिल्ली असेंबली में फेंका बमसाल 1929 में भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली के अलीपुर रोड स्थित ब्रिटिश सरकार की असेंबली हॉल में बम फेंक दिया। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और खुद को गिरफ्तार करवा दिया। जिसके बाद भगत सिंह, सुखदेव और शिवराम को फांसी की सजा दी गई।आखिरी जंगइन घटनाओं के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने इन क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इस दल के सभी लोग गिरफ्तार हो चुके थे, लेकिन फिर भी काफी समय तक चंद्रशेखर आजाद ब्रिटिश सरकार को चकमा देते रहे। 27 फरवरी 1031 को आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्ट में अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ योजना बना रहे थे।अंग्रेजों को जानकारी मिली तो कई अंग्रेज सैनिकों ने मिलकर उन पर हमला कर दिया। लेकिन आजाद ने अपने साथियों को वहां से भगा दिया और वह अकेले ही अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। इस मुठभेड़ में आजाद बुरी तरह से घायल हो गए थे। उन्होंने प्रण लिया था कि वह कभी पकड़े नहीं जाएंगे और ब्रिटिश हुकूमत उनको फांसी नहीं दे सकेगी। अपने इस प्रण को पूरा करने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने आखिरी गोली खुद को मार ली और देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 27 Feb 2026 22:05:04 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Chandrashekhar, Azad, Death, Anniversary:, Alfred, Park, में, Chandrashekhar, Azad, ने, British, पुलिस, को, दिया, था, चकमा, जिंदा, नहीं, आए, हाथ</media:keywords>
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<title>Jayalalitha Birth Anniversary: Film Industry से लेकर CM की कुर्सी तक, &amp;apos;अम्मा&amp;apos; ने ऐसे बनाई अपनी अलग पहचान</title>
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<description><![CDATA[ दक्षिण भारतीय सिनेमा की दिग्गज अदाकारा जयललिता का 24 फरवरी को जन्म हुआ था। उन्होंने भारतीय सिनेमा के साथ राजनीति में भी अपनी साख बनाई थी। वह साउथ की एक दिग्गज अभिनेत्री के रूप में जानी जाती थीं। इसके बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और सालों तक राजनीति के अखाड़े में विरोधियों को चित करती रहीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जयललिता के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकर्नाटक के मेलकोट में 24 फरवरी 1948 को जयललिता का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम जयललिता जयराम था। उनको प्यार से लोग &#039;अम्मा&#039; भी कहते थे। वहीं इसके अलावा उनको &#039;थलाइवी&#039; भी कहा जाता था।फिल्मी सफरबता दें कि महज 13 साल की उम्र में जयललिता ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा था। उनकी पहली फिल्म &#039;श्रीशैला महात्मे&#039; थी। इसके बाद अभिनेत्री जयललिता ने तेलुगू, तमिल और हिंदी सिनेमा में भी काम किया। जयललिता ने अपने करीब 30 साल के एक्टिंग करियर में 140 से ज्यादा फिल्मों में काम किया था। एक्ट्रेस ने सबसे ज्यादा 28 फिल्में एमजी रामचंद्रन और 17 फिल्में शिवाजी गणेशन के साथ की थीं।6 बार रहीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्रीरुपहले पर्दे पर सालों तक राज करने वाली अभिनेत्री जयललिता ने राजनीति के जरिए भी लोगों का दिल जीता था। वह एक या दो बार नहीं बल्कि 6 बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी थीं। साल 1989 में जयललिता एआईएडीएमके पार्टी की सुप्रीमो बनी थीं। फिर साल 1991 में वह पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। साल 2001 में दूसरी बार, साल 2002 में तीसरी बार, साल 2011 में चौथी बार, साल 2015 में पांचवी बार और साल 2016 में उन्होंने छठी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला था।मृत्युवहीं 05 दिसंबर 2016 को चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में 68 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट की वजह से जयललिता का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 25 Feb 2026 22:55:04 +0530</pubDate>
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<title>Madhubala Death Anniversary: Madhubala की Tragic Life, बेपनाह खूबसूरती, टूटा दिल... 36 की उम्र में क्यों अकेली रह गईं</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 फरवरी को अभिनेत्री मधुबाला की मृत्यु हो गई थी। मधुबाला को &#039;वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा&#039; कै टैग मिला था। लेकिन उनका जीवन आसान नहीं था। मधुबाला उस दौर की ऐसी अभिनेत्री थीं, जिनकी खूबसूरती, अदाकारी और चेहरे की मासूमियत को हॉलीवुड वाले भी भुनाना चाहते थे। मधुबाला को ऑस्कर विनर डायरेक्टर से फिल्म ऑफर हुई थी, लेकिन एक्ट्रेस ने इस फिल्म को ठुकरा दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके मधुबाला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारदिल्ली में 14 फरवरी 1933 को मधुबाला का जन्म हुआ था। उनका असली नाम मुमताज जहां देहलवी था। इनके पिता का नाम अताउल्लाह खान था, जोकि पेशावर की एक तंबाकू फैक्ट्री के काम करते थे। लेकिन बाद में वह मुंबई आ गए। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। ऐसे में सिर्फ 9 साल की उम्र से ही मधुबाला को काम करना पड़ा।इसे भी पढ़ें: Kamal Amrohi Death Anniversary: एक थप्पड़ खाकर घर से भागे, Lahore से Mumbai आकर बने Bollywood के लीजेंड डायरेक्टरबाल कलाकार के रूप में किया काममधुबाला ने फिल्म &#039;बसंत&#039; में बाल कलाकार के रूप में काम किया था। इस दौरान उनको बेबी मुमताज के नाम से जाना जाता था। बेबी मुमताज की मासूमियत और अदाकारी ने दर्शकों का दिल जीत लिया था। बाल कलाकार के रूप में शुरू हुए मधुबाला के सफर ने आगे चलकर उनको बॉलीवुड का सितारा बना दिया था। मधुबाला ने महज 12 साल की उम्र में ड्राइविंग सीख ली थी। जो उस दौर में एक साहसिक कदम माना जाता था।हॉलीवुड का ऑफरमधुबाला की चर्चा न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी देखने को मिली थी। उस दौर में यह कम होता था कि किसी इंडियन एक्ट्रेस को विदेशों से फिल्मों के ऑफर मिलते हों। लेकिन ऑस्कर विनर डायरेक्टर फ्रैंक कैप्रा ने मधुबाला को अमेरिका में बड़े बजट की फिल्मों का ऑफर भेजा था। यह फिल्म एक्ट्रेस को हॉलीवुड में जबरदस्त पॉपुलैरिटी दिला सकता था। लेकिन मधुबाला ने इस ऑफर को ठुकरा दिया था।मधुबाला की फिल्मेंबता दें कि मधुबाला ने अपने 22 साल के करियर में करीब 70 फिल्मों में काम किया है। साल 1947 में आई फिल्म &#039;नील कमल&#039; में उनका नाम बदलकर मधुबाला कर दिया गया था। 1950 के दशक में एक्ट्रेस ने कई सफल फिल्में दीं। जिनमें से &#039;फागुन&#039;, &#039;महल&#039;, &#039;हावड़ा ब्रिज&#039;, &#039;काला पानी&#039; और &#039;चलती का नाम गाड़ी&#039; आदि शामिल है। उनको &#039;वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा&#039; कै टैग मिला था। लेकिन उनका जीवन आसान नहीं था।सबसे बड़ी पहचानअभिनेत्री की कामयाबी की सबसे बड़ी पहचान फिल्म &#039;मुगल-ए-आजम&#039; बनी थी। यह हिंदी सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला दिल की बीमारी से जूझ रही थीं। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने शूट पूरे किए, कई बार उनकी तबियत सेट पर बिगड़ जाती थी। लेकिन मधुबाला ने कभी अपना काम बीच में नहीं छोड़ा।दिलीप कुमार से हुईं अलगमधुबाला की पर्सनल लाउफ में काफी उठापटक मची रही। उनकी लव स्टोरी पहले अभिनेता दिलीप कुमार और बाद में किशोर कुमार के साथ चर्चिक रहीं। अभिनेता दिलीप कुमार से मधुबाला का रिश्ता गहरा था, लेकिन परिवार के कारण दोनों में अलगाव हो गया। बाद में मधुबाला ने किशोर कुमार से शादी की थी। लेकिन बताया जाता है कि आखिरी समय में मधुबाला एकदम अकेली रह गई थीं।मृत्यु1960 के दशक में मधुबाला की सेहत बिगड़ने लगीं। जांच कराने पर पता चला कि उनके दिल में छेद है। वहीं लंदन के डॉक्टरों ने सर्जरी करने से मना कर दिया। इस बीमारी के कारण धीरे-धीरे मधुबाला का करियर सीमित होने लगा था। वहीं 23 फरवरी 1969 को 36 साल की उम्र में मधुबाला ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Feb 2026 10:28:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Suryakant Tripathi Birth Anniversary: Hindi Literature के महाप्राण &amp;apos;निराला&amp;apos;, जिनके संघर्षों की गूंज आज भी कविताओं में है ज़िंदा</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी साहित्य और छायावाद के अमिट स्तंभ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फरवरी को हुआ था। उन्होंने उपन्यास, कहानियां और निबंध लिखे, लेकिन वह अपनी कविताओं की वजह से सबसे ज्यादा चर्चित रहे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन संघर्षों से भरा रहा और उनका यह संघर्ष उनकी कविताओं में भी झलकता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमिदनापुर में 21 फरवरी को सूर्यकांत त्रिपाठी का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बांग्ला में की थी। मेट्रिक के बाद उन्होंने घर में रहकर अग्रेंजी साहित्य और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की थी। उनकी मां का बचपन में ही निधन हो गया था। वहीं कम उम्र में सूर्यकांत त्रिपाठी की भी शादी हो गई थी। लेकिन जब वह 20 साल के हुए तो उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गई। पत्नी की मृत्यु के कुछ समय बाद ही उनकी बेटी की भी मौत हो गई थी।इसे भी पढ़ें: Ramakrishna Paramhansa Birth Anniversary: वो दिव्य अनुभव जब Maa Kali के दर्शन ने गदाधर को &#039;परमहंस&#039; बना दियाकाव्य संग्रहसूर्यकांत त्रिपाठी के प्रसिद्ध काव्य संग्रह- गीतिका, तुलसीदास, बेला, नये पत्ते, सांध्य काकली, अपरा, अनामिका, परिमल, कुकरमुत्ता, अणिमा, अर्चना, अराधना, गीत कुंज आदि हैं।उपन्यासवहीं उन्होंने &#039;अलका&#039;, &#039;कुल्ली भाट&#039;, &#039;प्रभावती&#039;, &#039;अलका&#039;, &#039;निरुपमा&#039; और &#039;अप्सरा&#039; जैसे उपन्यास लिखे हैं।इस कवियत्री को मानते थे बहननिराला ने हिंदी साहित्य को मजबूत बनाने का काम किया था। साथ ही उन्होंने पूरे मानव समाज को भी सार्थक बनाने का काम किया था। वह हिंदी के बड़े कवि और साहित्यकार थे। उनके पास रॉयलटी का पैसा भी नहीं रहता था। एक बाद कवियत्री महादेवी वर्मा ने निराला से कहा कि उनका सारा रुपया वह रखेंगी। जिससे कि कुछ रुपया बच सके और भविष्य में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काम आ सके। महादेवी उनके लिए छोटी बहन थीं। इसलिए वह अपना सारा पैसा महादेवी वर्मा को दे देते थे और जरूरत पड़ने पर उनसे मांगते थे।मृत्युअपने अंतिम समय में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला प्रयागराज के दारागंज मोहल्ले में रहते थे। वहीं स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनका 15 अक्तूबर 1961 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 21 Feb 2026 18:02:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ramakrishna Paramhansa Birth Anniversary: वो दिव्य अनुभव जब Maa Kali के दर्शन ने गदाधर को &amp;apos;परमहंस&amp;apos; बना दिया</title>
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<description><![CDATA[ भारत के महान संत, आध्यात्मिक गुरु और विचारक रामकृष्ण परमहंस का 18 फरवरी को जन्म हुआ था। रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों की एकता की पैरवी की थी। उन्होंने यह सिद्ध किया था कि अगर सच्ची निष्ठा और भक्ति है, तो ईश्वर के भी दर्शन किए जा सकते हैं। रामकृष्ण परमहंस ईश्वर के दर्शन के लिए आध्यात्मिक चेतना की तरक्की पर जोर देते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रामकृष्ण परमहंस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबंगाल के कामारपुकुर में 18 फरवरी को 1836 को गदाधर चट्टोपाध्‍याय का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम श्री खुदीराम चटोपाध्याय और मां का नाम चंद्रमणि देवी था। वह बचपन से ही मां काली के भक्त थे। वह दिन रात मां काली की पूजा में लीन रहते थे। वहीं 17 साल की उम्र में उन्होंने अपने घर का त्याग कर दिया था और अपना पूरा जीवन मां काली को सौंप दिया था।इसे भी पढ़ें: Ravidas Jayanti 2026: &#039;मन चंगा तो कठौती में गंगा&#039; का संदेश देने वाले Sant Ravidas क्यों आज भी प्रासंगिक हैं?परमहंस की उपाधिबता दें कि परमहंस की उपाधि सिर्फ उन लोगों को मिलती है, जो अपनी इंद्रियों को वश में कर लेते हों। जिन लोगों के पास असीम ज्ञान का भंडार हो। रामकृष्ण को यह उपाधि प्राप्त हुई, जिसके बाद वह रामकृष्ण परमहंस कहलाए। उन्होंने कई सिद्धियों को प्राप्त किया था और साथ ही अपनी इंद्रियों को वश में किया था। उन्होंने मूर्ति पूजा को व्यर्थ बताते हुए निराकार ईश्वर की आराधना की बात की थी।यह रामकृष्ण परमहंस के ज्ञान का प्रभाव था कि उन्होंने नरेंद्र नामक साधारण बालक को स्वामी विवेकानंद बना दिया था। रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई रामकुमार के साथ जब कोलकाता आए, तो उनको रामकुमार चटोपाध्याय को दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य पुजारी बना दिए गए थे। रामकृष्ण और उनके भांजे हृदय रामकुमार की सहायता करते थे। रामकृष्ण को देवी प्रतिमा को सजाने का दायित्व सौंपा गया था। लेकिन रामकुमार के निधन के बाद यह जिम्मेदारी रामकृष्ण को सौंपी गई थी। वह ज्यादातर मां काली की प्रतिमा को निहारा करते थे।रामकृष्ण परमहंस काली मां की मूर्ति को अपनी माता और संपूर्ण सृष्टि की माता के रूप में देखने लगे थे। माना जाता है कि रामकृष्ण परमहंस को मां काली के दर्शन ब्रह्मांड की मां के रूप में हुए थे। उन्होंने बताया था कि घर, द्वार, मंदिर और सबकुछ अदृश्य हो गया। जैसे कहीं पर कुछ नहीं था और उन्होंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा। यह चेतना का सागर था। उन्होंने बताया कि दूर-दूर तक बस उज्जवल लहरें दिख रही थीं, जो एक के बाद एक उनकी ओर आ रही थीं। इसके बाद ही संन्यास ग्रहण करने वह रामकृष्ण परमहंस कहलाए।मृत्युवहीं 16 अगस्‍त 1886 को कोलकाता में रामकृष्ण परमहंस ने अपना शरीर त्याग दिया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Feb 2026 14:49:29 +0530</pubDate>
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<title>Dadasaheb Phalke Death Anniversary: दादा साहब फाल्के ने रखी थी Indian Cinema की नींव, ऐसे बनी थी पहली फिल्म</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 16 फरवरी को भारतीय सिनेमा के पिता कहे जाने वाले फिल्ममेकर दादा साहब फाल्के का निधन हो गया था। उन्होंने भारतीय सिनेमा की पहली स्क्रिप्ट लिखी थी। उन्होंने फिल्म कंपनी की स्थापना करने के साथ भारत की पहली मूक फिल्म &#039;राजा हरिश्चंद्र&#039; बनाई थी। यह भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली फीचर फिल्म थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दादा साहब फाल्के के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबंबई प्रेसीडेंसी के त्रिंबक में एक मराठी परिवार में 30 अप्रैल 1870 को दादा साहब फाल्के का जन्म हुआ था। उनका असली नाम धुंडिराज फाल्के था। इनके पिता का नाम गोविंद सदाशिव फाल्के था, जोकि संस्कृत के विद्वान और हिंदू पुजारी थे। वहीं उनकी मां का नाम द्वारकाबाई था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद मैट्रिक की पढ़ाई बॉम्बे में पूरी की। फिर 1855 में उन्होंने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से ड्राइंग का कोर्स पूरा किया। साल 1890 में उन्होंने एक कैमरा खरीदा और मुद्रण व प्रसंस्करण के साथ प्रयोग करना शुरूकर दिया। इसे भी पढ़ें: Madhubala Birth Anniversary: &#039;Venus of Indian Cinema&#039; थीं मधुबाला, 9 साल की उम्र में शुरू किया था फिल्मी सफरफिल्मी सफरसाल 1913 में दादा साहब फाल्के ने फिल्म &#039;राजा हरिश्चंद्र&#039;  नामक पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म बनाई थी। वह एक निर्देशक नहीं बल्कि एक जाने-माने निर्माता और स्क्रीन राइटर भी थे। उन्होंने 19 साल के फिल्मी करियर में करीब 95 फिल्में और 27 शॉर्ट फिल्में बनाई थीं। &#039;द लाइफ ऑफ क्राइस्ट&#039; देखने के बाद दादा साहब फाल्के को फिल्म बनाने का ख्याल आया। इस फिल्म ने उन पर इतनी गहरी छाप छोड़ी थी कि उन्होंने फिल्म बनाने की ठान ली।हालांकि यह काम इतना भी आसान नहीं था। वह एक दिन में चार-पांच घंटे सिनेमा देखते, जिससे कि फिल्म मेकिंग की बारीकियां सीख सकें। बताया जाता है कि उनकी पहली फिल्म का बजट करीब 15 हजार रुपए था। इस फिल्म के लिए दादा साहब ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था।उस दौर में फिल्म बनाने के जरूर उपकरण सिर्फ इंग्लैंड में मिलते थे। इंग्लैंड जाने के लिए दादा साहब फाल्के ने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी थी। पहली फिल्म बनाने में उनको करीब 6 महीने का समय लग गया था। दादा साहब फाल्के की आखिरी मूक फिल्म &#039;सेतुबंधन&#039; थी।मृत्युवहीं 16 फरवरी 1944 को दादा साहब फाल्के ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 17 Feb 2026 12:03:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Madhubala Birth Anniversary: &amp;apos;Venus of Indian Cinema&amp;apos; थीं मधुबाला, 9 साल की उम्र में शुरू किया था फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे खूबसूरत एक्ट्रेस मधुबाला का 14 फरवरी को जन्म हुआ था। पर्दे पर मधुबाला प्यार और नजाकत की पहचान बनीं, लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ जिम्मेदारियों, संघर्ष और कठिन हालातों से भरी थी। हालांकि इन सबसे जूझते हुए एक्ट्रेस ने लंबा सफर तय किया और कामयाबी हासिल की। एक्ट्रेस की खूबसूरती पर बहुत लोग फिदा हुए। मधुबाला को &#039;वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा&#039; के रूप में भी याद किया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मधुबाला के जीवन से जुड़े कुछ रोचक किस्सों के बारे में...जन्म और परिवारदिल्ली के एक पश्तून परिवार में 14 फरवरी 1933 को मधुबाला का जन्म हुआ था। उनका असली नाम मुमताज जहां बेगम दहलवी था। मधुबाला के घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उनको बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। मधुबाला ने एक्टिंग की दुनिया शौक से नहीं बल्कि मजबूरी में चुनी थी।इसे भी पढ़ें: Kamal Amrohi Death Anniversary: एक थप्पड़ खाकर घर से भागे, Lahore से Mumbai आकर बने Bollywood के लीजेंड डायरेक्टरफिल्मों में काममधुबाला ने महज 9 साल की उम्र से फिल्मों में काम करना शुरूकर दिया था। जिससे कि घर का खर्च चल सके। उस समय बच्चों के लिए कैमरे का सामना करना आसान नहीं था। साल 1942 में आई फिल्म &#039;बसंत&#039; से उनके करियर को एक नई दिशा मिली। इस फिल्म के बाद उनका नाम मुमताज से बदलकर मधुबाला रखा गया। जिसके बाद एक्ट्रेस ने कई फिल्मों में काम किया और कम समय में अपनी पहचान बनाई। मधुबाला उस दौर में निर्माता की पहली पसंद बन गई और उनके बाद फिल्मों के ऑफर आने लगे।फिल्मेंसाल 1950 का दशक एक्ट्रेस मधुबाला के फिल्मी करियर का सुनहरा दौर माना जाता है। वहीं &#039;तराना&#039;, &#039;चलती का नाम गाड़ी&#039;, &#039;महल&#039;, &#039;हावड़ा ब्रिज&#039; और &#039;हाफ टिकट&#039; जैसी फिल्मों ने उनको स्टार बना दिया। कॉमेडी हो या रोमांटिक मधुबाला हर किरदार को खूबसूरती के साथ निभाती थीं। मधुबाला ने अपनी शर्तों पर काम किया और अपनी फीस भी खुद ही तय करती थी।अभिनेत्री को सबसे बड़ी पहचान फिल्म &#039;मुगल-ए-आजम&#039; से मिली थी। यह फिल्म हिंदी सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला गंभीर दिल की बीमारी से जूझ रही थीं। लेकिन इसके बाद भी अभिनेत्री ने शूट पूरे किए। इस दौरान उनकी सेट पर कई बार तबियत बिगड़ जाती थी और उनको खून की उल्टियां होती थीं, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा।कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के बाद भी अभिनेत्री की जिंदगी आसान नहीं थी। वहीं उनकी बीमारी ने अभिनेत्री के करियर की धीरे-धीरे सीमित कर दिया था। लेकिन मधुबाला ने कभी अपनी कमजोरी को आड़े नहीं आने दिया।मृ्त्युवहीं 23 फरवरी 1969 को महज 36 साल की उम्र में एक्ट्रेस मधुबाला ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 15 Feb 2026 19:34:43 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sushma Swaraj Birth Anniversary: Delhi की पहली महिला CM, सबसे युवा मंत्री... जानें Sushma Swaraj के दमदार Political Records</title>
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<description><![CDATA[ भारत की सबसे प्रसिद्ध राजनेताओं में शामिल सुषमा स्वराज का 14 फरवरी का जन्म हुआ था। उनका नाम आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। सुषमा स्वराज मोदी सरकार में मंत्री थीं। लेकिन उनकी पहचान पार्टी के नाम से नहीं बल्कि अपने काम से होती थी। सुषमा स्वराज को सबसे अच्छे विदेश मंत्री के रूप में जाना जाता है। वह एक ऐसी नेता थीं, जो अपनी सहानुभूति और दरियादिली के लिए जानी जाती थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सुषमा स्वराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारसुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 को हुआ था। उन्होंने चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई की थी। उनके पास राजनीति विज्ञान और संस्कृत में भी डिग्री थी। सुषमा स्वराज ने वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में अभ्यास किया था। फिर साल 1970 में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ीं और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई।इसे भी पढ़ें: Sarojini Naidu Birth Anniversary: देश की पहली महिला Governor थीं सरोजिनी नायडू, साड़ी फाड़कर बनाया था तिरंगाराजनीतिक सफरसाल 1977 में सुषमा स्वराज ने हरियाणा सरकार में बतौर शिक्षा मंत्री पद ग्रहण किया था। यह एक बड़ी उपलब्धि है कि वह महज 25 साल की उम्र में देश की सबसे कम उम्र की मंत्री बनी थीं। फिर दो साल बाद 1979 में उनको भाजपा नेतृत्व ने पार्टी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। वह सबसे कम उम्र की कैबिटेन मंत्री रहीं।पर्सनल लाइफसुषमा स्वराज शादी, पति और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने के साथ देश और अपने पद के प्रति भी गंभीर थीं। उन्होंने शादी के बाद अपने पति का सरनेम नहीं अपनाया था, बल्कि पति के नाम को ही सरनेम बना लिया था। सुषमा स्वराज के पति का नाम स्वराज कौशल है। सुषमा स्वराज की एक बेटी है, जिसका नाम बांसुरी स्वराज है।उपलब्धिआप सुषमा स्वराज की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह 7 बार संसद की सदस्य के रूप में चुनी गईं। इसके अलावा उनको उत्कृष्ट सांसद का भी पुरस्कार मिला था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में साल 1996 में सुषमा स्वराज सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में कैबिनेट में शामिल हुईं। फिर साल 1998 में केंद्रीय मंत्रिमंडल को छोड़कर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। उनको एक राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता होने का भी गौरव प्राप्त है। वहीं बोलने के कौशल की वजह से सुषमा स्वराज को लगातार 3 साल तक राज्य स्तरीय सर्वश्रेष्ठ हिंदी स्पीकर का पुरस्कार मिला था।विदेश मंत्रीसुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री के रूप में बड़ी उपलब्धियां हासिल की। जब भी कोई सुषमा को ट्वीट करके सहायता मांगता तो वह हमेशा मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाती थीं। उन्होंने यमन में फंसे साढ़े पांच हजार से अधिक लोगों को बचाया था। इस ऑपरेशन में भारतीयों के साथ ही 41 देशों के नागरिकों को सुरक्षित देश पहुंचाने में मदद की। वहीं 8 साल की बच्ची गीता 15 साल पहले भटककर सरहद पार पाकिस्तान पहुंच गई। वह सुषमा स्वराज ही थीं, जो गीता को 23 साल की उम्र में वापस लेकर आईं। इस तरह कोलकाता की जूडिथ को काबुल से अगवा कर लिया था। जिसके बाद सुषमा स्वराज से मदद की गुहार लगाई गई, तब उन्होंने अफगान के अधिकारियों से बात करके जूडिथ को रिहा कराया।मृत्युवहीं साल 2019 में दिल का दौरा पड़ने से सुषमा स्वराज की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 15 Feb 2026 19:34:42 +0530</pubDate>
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<title>Sarojini Naidu Birth Anniversary: देश की पहली महिला Governor थीं सरोजिनी नायडू, साड़ी फाड़कर बनाया था तिरंगा</title>
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<description><![CDATA[ कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष और देश की पहली महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू का 13 फरवरी को जन्म हुआ था। सरोजिनी नायडू ने अपनी आवाज और कलम के दम पर ब्रिटिश हुकूमत की नींद हराम कर दी थी। उनके नेतृत्व में भारतीय महिलाओं ने जो जज्बा दिखाया था, उसकी मिसाल आज भी पूरी दुनिया में दी जाती है। उन्होंने महिलाओं के समान अधिकार और उनके मताधिकार के बारे में आवाज उठाई थी। वहीं गांधीजी ने सरोजिनी नायडू को &#039;भारत कोकिला&#039; का खिताब दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सरोजिनी नायडू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारहैदराबाद में 13 फरवरी 1879 को सरोजिनी नायडू का जन्म हुआ था। इसका शरूआत में नाम सरोजिनी चट्टोपाध्याय था। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की थीं। उन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई मद्रास से पूरी की और फिर आगे की शिक्षा के लिए लंदन और फिर कैंब्रिज चली गईं। इंग्लैंड में रहने के दौरान सरोजिनी नायडू ने महिलाओं के वोटिंग अधिकार से जुड़े आंदोलनों को करीब से देखा था। इन अनुभवों से उनके मन में भारत की आजादी और महिलाओं की स्थिति को लेकर एक सोच पैदा हुई।इसे भी पढ़ें: Deendayal Upadhyay Death Anniversary: BJP के &#039;गांधी&#039; कहे जाते थे दीनदयाल उपाध्याय, उनकी Ideology पर आज भी चलती है पूरी पार्टीविवाहसाल 1898 में सरोजिनी नायडू हैदराबाद वापस लौट आईं। फिर साल 1898 में सरोजिनी चट्टोपाध्याय ने गोविंदराजुलु नायडू से विवाह किया और इस तरह से उनके नाम के साथ नायडू जुड़ गया। सरोजिनी नायडू का यह विवाह उस दौर के हिसाब से एक बड़ा क्रांतिकारी कदम था, क्योंकि उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया था।कविता से आजादी की जंग तकसरोजिनी नायडू की पहचान सिर्फ राजनेता तक नहीं बल्कि उच्च कोटि की कवियत्री थीं। उनका पहला काव्य संग्रह &#039;द गोल्डन थ्रेशोल्ड&#039; साल 1905 में प्रकाशित हुआ था। इसके अगले 12 सालों तक वह लगातार बहुत मनमोहक कविताएं लिखती रहीं। साल 1912 में सरोजिनी नायडू का दूसरा खंड &#039;द बर्ड ऑफ टाइम&#039; आया। साल 1917 में &#039;द ब्रोकन विंग्स&#039; के प्रकाशन के बाद सरोजिनी नायडू के काव्य जीवन में थोड़ा ठहराव आ गया। इसकी वजह यह थी कि सरोजिनी का पूरा ध्यान देश की आजादी की ओर मुड़ चुका था।महात्मा गांधी ने सरोजिनी नायडू की रचनाओं में लय, रंग और कल्पना का अनूठा संगम देखा। सरोजिनी की जादुई आवाज और शब्दों के चयन के कारण महात्मा गांधी ने उनको &#039;नाइटिंगल ऑफ इंडिया&#039; यानी &#039;भारत कोकिला&#039; का खिताब दिया था।महिलाओं का बलिदानसरोजिनी नायडू ने 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए एक घटना जिक्र किया था। नायडू ने बताया था कि एक बार बर्लिन में अतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जब ध्वज परेड होनी थी। इस दौरान भारत का कोई आधिकारिक झंडा नहीं था। यह देश के लिए पीड़ा और अपमान का क्षण था। उस दौरान सरोजिनी नायडू के सुझाव पर भारतीय महिला प्रतिनिधियों ने अपनी साड़ियों की पट्टियां फाड़ दीं। उन पट्टियों को जोड़कर एक तिरंगा तैयार किया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का अपमान न हो। यह घटना दिखाती है कि उस दौर की महिलाओं में देशप्रेम का जज्बा किस कदर भरा हुआ था।यूपी की पहली महिला गवर्नरस्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सरोजिनी नायडू कांग्रेस की ताकतवर नेता बनकर उभरी थीं। 01 अगस्त 1920 को गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। इसमें वह सरोजिनी नायडू पूरी ताकत से कूद पड़ीं। उन्होंने देशभर में सैकड़ों सभाओं को संबोधित किया। खासतौर पर वह महिलाओं की बुलंद आवाज बन चुकी थीं। सरोजिनी नायडू की सक्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि साल 1925 में वह कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।देश की आजादी के बाद सरोजिनी नायडू को संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) की पहली महिला राज्यपाल बनाया गया। उन्होंने अपने पूरे करियर में सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि महिलाओं की आजादी और शिक्षा के लिए जमीन पर काम किया।सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ाईसरोजिनी नायडू का मानना था कि सभ्यता के आगे बढ़ने के लिए समाज से लैंगिक भेदभाव खत्म होना जरूरी है। इसके लिए उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन के दौरान विधवाओं के पुनर्विवाह और शिक्षा के लिए प्रस्ताव पारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरोजिनी नायडू ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर &#039;महिला भारतीय संघ&#039; की स्थापना की।मृत्युवहीं 02 मार्च 1949 को सरोजिनी नायडू का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 13 Feb 2026 23:05:11 +0530</pubDate>
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<title>Rajesh Pilot Birth Anniversary: Air Force का जांबाज पायलट जो बना सियासत का &amp;apos;हवाई मंत्री&amp;apos;, जानें Rajesh Pilot की अनसुनी कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 10 फरवरी को राजेश पायलट का जन्म हुआ था। आपको जानकर हैरानी होगी कि राजेश पायलट कभी संसद की कैंटीन में दूध सप्लाई किया करते थे। लेकिन बुलंदियों को छूते हुए जल्द ही वह सियासत तक पहुंच गए। राजेश पायलट केंद्र सरकार में हाई प्रोफाइल मंत्री बन गए। राजेश पायलय को &#039;किसानों का मसीहा&#039; भी कहा जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजेश पायलट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक किसान परिवार में 10 फरवरी 1945 को राजेश पायलट का जन्म हुआ था। वह सेना में भर्ती होना चाहते थे। पढ़ाई के साथ-साथ वह अपने पिता के साथ दूध भी बांटा करते थे। राजेश पायलट मंत्रियों के घर दूध देने के बाद स्कूल जाते थे। वहीं 29 अक्तूबर 1966 को मिले कमीशन में राजेश पायलट का सेना में भर्ती का सपना पूरा हो गया। एयरफोर्स में रहने के दौरान राजेश पायलट को राजनीति का चस्का लगा।इसे भी पढ़ें: Satyendra Nath Bose Death Anniversary: Albert Einstein संग काम किया, फिर भी क्यों गुमनाम रह गए &#039;God Particle&#039; के जनकराजनीतिक सफरराजनीति में पकड़ बनाने के लिए राजेश पायलट ने इंदिरा गांधी का साथ थामा। वह साल 1980 में पहली बार भरतपुर से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीत हासिल करके सांसद बने। राजेश पायलट के राजनीति में आने के बाद क्षेत्र में हवा फैल गई कि इंदिरा किसी पायलट को भेज रही हैं। जब उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल किया, तो उसमें अपना असली नाम उसमें लिखा। तब एक समर्थन ने कहा कि आपको राजेश्वर प्रसाद के नाम से कोई नहीं जानता है, जहां सिर्फ पायलट की चर्चा है। उसी दिन से उनका नाम बदलकर राजेश पायलट हो गया।किसानों के नेताराजेश पायलट खुद को किसानों का रहनुमा कहते थे। वह अपना ज्यादा समय जनता के बीच बिताते थे। उस दौरान शायद ही कांग्रेस का कोई ऐसा नेता था, जो पायलट से ज्यादा जनसभाओं में गया हो। कांग्रेस के अभियान के दौरान पायलट ने करीब-करीब देश के हर राज्य का दौरा किया था। जिस कारण उनकी पहचान &#039;हवाई नेता&#039; के रूप में बन चुकी थी। देश भर के दौरे करके में पायलट इतना ज्यादा व्यस्त रहते थे कि विरोधी भी उनको &#039;हवाई मंत्री&#039; कहने लगे।पार्टी के संकटमोचनराजेश पायलट के राजनीतिक विरोधी उनको महज मौकापरस्त और अति महत्वकांक्षी मानते थे। यहां तक उनके खुद के मंत्री कहते थे कि वह जल्द ही बहुत कुछ पा लेना चाहते थे। राजेश पायलट कभी पार्टी में संकटमोचन की भूमिका निभाने वाले कहलाए। तो कभी-कभी खुद पीएम के लिए संकट पैदा करते थे। किसानों की बात हो या जम्मू-कश्मीर की समस्या या पार्टी का अंदरुनी संकट को हर मामले को सुलझाने के प्रयास में लगे रहते थे। राजेश पायलट अपने मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री या फिर सीनियर मंत्री से भिड़ जाते थे।मृत्युराजेश पायलट को जीप चलाने का काफी शौक था। वह अधिकतर खुद की जीप ड्राइव करते थे। वहीं 11 जून 2000 को अपने चुनावी क्षेत्र दौसा से एक सभा में लौटते समय जयपुर हाइवे पर उनकी जीप एक ट्रॉली से टकरा गई। इस दौरान राजेश पायलट गंभीर रूप से घायल हो गए थे। 11 जून 2000 को राजेश पायलट का सवाई मानसिंह हॉस्पिटल में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 11 Feb 2026 15:09:22 +0530</pubDate>
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<title>Kamal Amrohi Death Anniversary: एक थप्पड़ खाकर घर से भागे, Lahore से Mumbai आकर बने Bollywood के लीजेंड डायरेक्टर</title>
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<description><![CDATA[ आज यानी की 11 फरवरी को भारतीय सिनेमा के दिग्गज निर्देशक-स्क्रीनराइटर रहे कमाल अमरोही का निधन हो गया था। अपने नाम के अनुरूप ही उनकी प्रतिभा भी कमाल की थी। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को &#039;पकीजा&#039;, &#039;रजिया सुल्तान&#039; और &#039;महल&#039; जैसी एक से बढ़कर एक फिल्म दी हैं। वह हिंदी और उर्दू के बेहतरीन कवि भी थे। उनकी अपनी जिंदगी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी। कमाल अमरोही ने कम उम्र में ही अपना घर छोड़ दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर फिल्म निर्देशक-स्क्रीनराइटर कमाल अमरोही के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के अमरोहा में 17 जनवरी 1918 को कमाल अमरोही का जन्म हुआ था। इनका असली नाम सैयद आमिर हैदर कमाल था। वह बचपन में काफी ज्यादा शरारती हुआ करते थे। एक दिन कमाल की शरारत से तंग आकर उनके बड़े भाई ने उन्हें एक थप्पड़ रसीद दिया। गाल पर पड़ा थप्पड़ कमाल अमरोही के दिल पर जा लगा था और उन्होंने गुस्से में आकर घर छोड़ दिया। वह छोटी उम्र में लाहौर चले गए। यहीं से कमाल अमरोही के अंदर लेखन के प्रति दिलचस्पी शुरू हुई।इसे भी पढ़ें: Bhimsen Joshi Birth Anniversary: 19 की उम्र में पहली Performance, भीमसेन जोशी ने 7 दशकों तक किया संगीत पर राजमुंबई पहुंचे अमरोहीलाहौर में रहने के दौरान उन्होंने एक उर्दू अखबार में लिखना शुरूकर दिया। लेकिन उनका नौकरी में खास मन नहीं लगा। वह लाहौर से निकलकर मुंबई पहुंचे। यहां पर उनकी मुलाकात कुंदरलाल सहगल, सोहराब मोदी और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे दिग्गजों से हुई। कमाल अमरोही को पता चला कि सोहराब मोदी को एक कहानी की तलाश है। उनकी कहानी पर आधारित फिल्म &#039;पुकार&#039; सुपरहिट साबित हुई और इस तरह से कमाल साहब के लेखन का सिलसिला चल पड़ा।फिल्म निर्देशनसाल 1949 में कमाल अमरोही ने फिल्म &#039;महल&#039; का निर्देशन कर इस दुनिया में कदम रखा था। उन्होंने अपने करियर में कुल 4 फिल्मों का निर्देशन किया था। उनकी यह 4 फिल्में &#039;महल&#039;, &#039;पाकीजा&#039;, &#039;दायरा&#039; और &#039;रजिया सुल्तान&#039; थी। फिल्म &#039;पाकीजा&#039; अमरोही साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट था। यह फिल्म साल 1958 में बनना शुरू हुई और साल 1971 में बनकर तैयार हुई थी। इस फिल्म के शुरु होने के दौरान एक्ट्रेस मीना कुमारी उनकी पत्नी थीं, लेकिन दोनों के अलगाव के बाद यह फिल्म बीच में अटक गई थी।इसके बाद भी कमाल अमरोही ने हार नहीं मानी और उन्होंने फिल्म &#039;पीकाजा&#039; को पूरा करने के लिए मीना कुमारी को मना लिया था। यह भारतीय सिनेमाई इतिहास की शानदार क्लासिक फिल्मों में शुमार है। इसके अलावा अमरोही ने के. आसिफ के निर्देशन में बनी कालजयी फिल्म &#039;मुगल-ए-आजम&#039; के भी डायलॉग लिखे थे। इस फिल्म के लिए कमाल अमरोही को बेस्ट डायलॉग का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला था।मृत्युवहीं 11 फरवरी 1993 को कमाल अमरोही ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 11 Feb 2026 15:09:21 +0530</pubDate>
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<title>Deendayal Upadhyay Death Anniversary: BJP के &amp;apos;गांधी&amp;apos; कहे जाते थे दीनदयाल उपाध्याय, उनकी Ideology पर आज भी चलती है पूरी पार्टी</title>
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<description><![CDATA[ भारत के आधुनिक इतिहास में पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक बड़ा नाम हैं। आज ही के दिन यानी की 11 फरवरी को दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु हो गई थी। वह भारतीय जनसंध के सह-संस्थापक थे। कई लोग उनको भारतीय जनता पार्टी का &#039;गांधी&#039; भी कहते हैं। दीनदयाल उपाध्याय की मौत उस दौर में हुई थी, जब देश कई बड़े बदलाव और उथलपुथल के दौर से गुजर रहा था। दीनदयाल उपाध्याय की मौत रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई थी। माना जाता है कि यदि वह कुछ साल और जीवित रहते, तो देश की तस्वीर ही कुछ और होती। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातो के बारे में... जन्म और परिवारमथुरा के नागदा के ब्राह्मण परिवार में 25 सितंबर 1916 को दीनदयाल उपाध्याय का जन्म हुआ था। उनका लालन-पालन मामा-मामी ने सीकर में किया था। दीनदयाल उपाध्याय ने कानपुर से बीए और फिर आगरा से अंग्रेजी साहित्य में एमए की पढ़ाई की। फिर साल 1937 में वह राष्ट्रीय सेवक संघ से और फिर साल 1952 में जनसंघ के महामंत्री बनाए गए थे।इसे भी पढ़ें: Satyendra Nath Bose Death Anniversary: Albert Einstein संग काम किया, फिर भी क्यों गुमनाम रह गए &#039;God Particle&#039; के जनकजनसंघ का असरजनसंघ से जुड़ने के बाद उनके मार्गदर्शन में पार्टी का संगठन चलता रहा। दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी मृत्यु से करीब 43 दिन पहले जनसंघ का अध्यक्ष पद संभाला था। जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के बाद बने राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी पर उनकी विचारधारा का असर आज भी दिखाई देता है। कहा तो यहां तक जाता है कि जिस जनसंघ को सत्ता में आने में दशकों लग गए, वह काम सालों पहले हो जाता अगर दीनदयाल उपाध्याय कुछ साल और जीवित रहते।मौत से कुछ साल पहले के हालातमई 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की मौत हो गई। जिसके बाद देश के अगले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बनें। फिर अचानक पाकिस्तान के साथ युद्ध हो गया। युद्ध खत्म होने के समय ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया था। जब देश की अगली प्रधानमंत्री इंदिरा गांदी बनीं, तो पूरे देश में अस्थिरता का माहौल था। साल 1967 में चुनावों में कांग्रेस जीत कम अंतर से हुई।मृत्युवाराणसी के करीब मुगलसराय जंक्शन में 11 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शव लावारिस स्थिति में पाया गया था। उनकी मौत का रहस्य कभी सामने नहीं आया। बताया जाता है कि उनकी हत्या चोरी के इरादे से हुई थी। लेकिन उनकी मृत्यु को आज भी रहस्य ही माना जाता है। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 11 Feb 2026 15:09:20 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bhimsen Joshi Birth Anniversary: 19 की उम्र में पहली Performance, भीमसेन जोशी ने 7 दशकों तक किया संगीत पर राज</title>
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<description><![CDATA[ भारत समेत तमाम देशों में अपने संगीत को अमर बनाने वाले पंडित भीमसेन जोशी का 04 फरवरी को जन्म हुआ था। वह हिंदी फिल्म जगत का एक जाना-माना नाम हैं। पंडित भीमसेन जोशी किराना घराने के शास्त्रीय गायक थे और उन्होंने महज 19 साल की उम्र में अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। पंडित भीमसेन जोशी पूरे सात दशकों तक शास्त्रीय गायन करते रहे और उन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि पूरे हिंदुस्तान को अपने गायन कला से गौरान्वित किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित भीमसेन जोशी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकर्नाटक के गड़क में 04 फरवरी 1922 को पंडित भीमसेन जोशी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गुरुराज जोशी था, जोकि हाईस्कूल हेडमास्टर और अंग्रेजी, कन्नड़ और संस्कृत के विद्वान थे। पंडित भीमसेन जोशी के परिवार के लगभग सभी लोग म्यूजिक से जुड़े रहे हैं।पहली प्रस्तुतिबता दें कि पंडित भीमसेन जोशी ने 19 साल की उम्र में अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। वहीं 20 साल की उम्र में उनका पहला एल्बम आया था। इस एल्बम में कन्नड़ और हिंदी के कुछ धार्मिक गीत थे। भीमसेन जोशी ने शुरूआती दौर में रेडियो कलाकार के रूप में मुंबई में काम किया था।इसे भी पढ़ें: Khushwant Singh Birth Anniversary: विवादों से बेपरवाह, अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने वाले बेबाक Writer थे खुशवंत सिंहगुरु की खोजबचपन से ही पंडित भीमसेन जोशी को संगीत का बेहद शौक था। ऐसे में वह गुरु की तलाश के लिए घर से निकल पड़े और अब्दुल करीम खान के पास जा पहुंचे। जिसके बाद वह अगले दो सालों तक वह बीजापुर, ग्वालियर और पुणे में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से भी संगीत की शिक्षा ली। पंडित रामभाऊ कुंदगोलकर से शास्त्रीय संगीत की शुरूआती शिक्षा लेने के बाद भीमसेन जोशी अपने घर से पहले कलकत्ता और पंजाब गए।हर देशवासी को एक सूत्र में पिरोयापंडित भीमसेन जोशी ने &#039;मिले सुर मेरा तुम्हारा&#039; को अपनी आवाज देकर हर देशवाली को एक सूत्र में पिरोया। उन्होंने गायकी में अपने शास्त्रीय संगीत से जो इतिहास रचा, वह आज भी अमिट है। इसके साथ ही उन्होंने कई फिल्मों के लिए भी गाने गाए। इनमें तानसेन, बसंत बहार, सुर संगम और अनकही शामिल हैं।एक सुर में पिरोया&#039;मिले सुर मेरा तुम्हारा&#039; को अपनी आवाज देकर हर देशवासी को एक सूत्र में पिरोने का सुरीला संदेश देने वाले भीमसेन जोशी की गायकी ने अपने शास्त्रीय संगीत जो इतिहास रचा वह आज भी चमकदार और रोशन है। माफ कराई ट्रेन की टिकटजब पंडित भीमसेन अपने गुरु की तलाश में घर से निकले थे, तो उनके पास पैसे नहीं थे। ऐसे में वह बिना टिकट लिए ही ट्रेन में बैठ गए और बीजापुर तक सफर किया। ट्रेन में टी.टी को राग भैरव में &#039;कौन-कौन गुन गावे&#039; और &#039;जागो मोहन प्यारे&#039; सुनाकर अपना टिकट माफ करवाया था। इसके बाद ट्रेन में बैठे लोगों ने उनके सफर के दौरान खानेपीने का इंतजाम किया।सम्मानसंगीत में पंडित भीमसेन जोशी के योगदान के लिए उनको &#039;भारत रत्न&#039; से सम्मानित किया गया था। वहीं इसके अलावा उनको &#039;पद्म विभूषण&#039; और &#039;पद्म भूषण&#039; सहित कई अन्य प्रतिष्ठित पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं लंबी बीमारी के बाद 24 जनवरी 2011 को पंडित भीमसेन जोशी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:22:13 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Birju Maharaj Birth Anniversary: Kathak को Global Stage तक ले गए थे बिरजू महाराज, जानिए दिसचस्प किस्से</title>
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<description><![CDATA[ सुप्रसिद्ध कथक नर्तक बिरजू महाराज का 04 फरवरी को जन्म हुआ था। उनकी शख्सियत ऐसी थी, जो घुंघरू की झंकार से दर्शकों का मन मोह लेते थे। जब बिरजू महाराज नृत्य करते थे, तो उनके घुंघरू भी बात किया करते थे। उन्होंने कथक को भारत सहित पूरे विश्व में एक अलग मुकाम पर पहुंचाने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बिरजू महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 04 फरवरी 1938 को बिरजू महाराज का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम पंडित बृजमोहन मिश्र था। पहले उनका नाम &#039;दुखहरण&#039; रखा गया था, जोकि बाद में बदल दिया गया था। उनके पिता ने बिरजू महाराज में नृत्य क्षमता को देखते हुए महज 3 साल की उम्र से उनको दीक्षा देना शुरूकर दिया था। जब वह 9 साल के हुए तो उनके पिता की मृत्यु हो गई। फिर कुछ सालों बाद बिरजू महाराज दिल्ली आ गए और यहां पर संगीत भारती में कथक सिखाना शुरूकर दिया।इसे भी पढ़ें: Bhimsen Joshi Birth Anniversary: 19 की उम्र में पहली Performance, भीमसेन जोशी ने 7 दशकों तक किया संगीत पर राजवाद्य यंत्र में हासिल थी महारथबिरजू महाराज को कथक के अलावा पखावज नाल, तबला और सितार आदि वाद्य यंत्र में महारत हासिल थी। वह एक अच्छे गायक कवि और चित्रकार भी थे। उन्होंने कथक को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली में नृत्य स्कूल &#039;कलाश्रम&#039; शुरू किया। यहां पर कथक के अलावा इससे संबंधित विषयों पर शिक्षा की जाती। बिरजू महाराज ने कथक को एक अलग पहचान दी और उनका सफर लंबा रहा। उन्होंने कई हिंदी फिल्मों में नृत्य का निर्देशन किया।सम्मानबिरजू महाराज ने फिल्म &#039;दिल तो पागल है&#039;, &#039;गदर एक प्रेम कथा&#039; &#039;डेढ़ इश्किया&#039;, &#039;देवदास&#039; और &#039;बाजीराव मस्तानी&#039; आदि में नृत्य का निर्देशन किया। उन्होंने अपने इस लंबे सफर में कई प्रसिद्धियां बटोरी। उनको साल 1986 में &#039;पद्म विभूषण&#039;, &#039;संगीत नाटक अकादमी&#039; और &#039;कालिदास सम्मान&#039; से सम्मानित किया गया। फिर साल 2012 में बिरजू महाराज को &#039;लता मंगेशकर पुरस्कार&#039; से सम्मानित किया गया। वहीं साल 2012 में सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशन के लिए बिरजू महाराज को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार फिल्म विश्वरूपम से नवाजा गया। साल 2016 में उनको फिल्म &#039;बाजीराव मस्तानी&#039; के गाने &#039;मोहे रंग दो लाल&#039; के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला।मृत्युवहीं 17 जनवरी 2022 को बिरजू महाराज ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:22:12 +0530</pubDate>
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<title>Satyendra Nath Bose Death Anniversary: Albert Einstein संग काम किया, फिर भी क्यों गुमनाम रह गए &amp;apos;God Particle&amp;apos; के जनक</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 04 फरवरी को भारत के महान वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस का निधन हो गया था। सत्येंद्रनाथ बोस को अपने जीवन में वह पहचान व सम्मान नहीं मिली, जिसके वह असल में हकदार थे। उन्होंने महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के साथ मिलकर काम किया था और बोस-आइंस्टाइन सिद्धांत दिया था। उन्होंने एक सब एटॉमिक पार्टिकल की खोज की थी। जिसका नाम सत्येंद्र नाथ बोस को सम्मान देने के लिए &#039;बोसॉन&#039; रखा गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महान भौतिकी विज्ञानी सत्येंद्र नाथ बोस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 01 जनवरी 1894 को सत्येंद्र नाथ बोस का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सुरेंद्रनाथ बोस था, जोकि ईस्‍ट इंडियन रेलवे में काम करते थे। इन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा जुगलिया गांव से पूरी की थी। फिर कोलकाता के प्रेजिडेंसी कॉलेज से बीएससी की डिग्री हासिल की। फिर कोलकाता यूनिवर्सिटी से एमए किया था। उन्होंने बांग्ला भाषा में बहुत लेखन किया और आइंस्टीन के मूल जर्मन शोधकार्यों के आधार पर वह अंग्रेजी की एक किताब के सहलेखक भी बने थे।इसे भी पढ़ें: Birju Maharaj Birth Anniversary: Kathak को Global Stage तक ले गए थे बिरजू महाराज, जानिए दिसचस्प किस्सेशोधपत्रजब सत्येंद्र नाथ बोस ढाका यूनिवर्सिटी में थे, तब साल 1924 में उन्होंने एक शोधपत्र लिखा था। इनमें बोस ने प्लैंक का क्वांटम रेडिएशन सिद्धांत निकाला। इसके लिए बोस ने शास्त्रीय भौतिकी का संदर्भ नहीं लिया था। बोस ने इस शोध को जर्मनी &#039;अल्बर्ट आइंस्टीन&#039; को भेजा। अल्बर्ट आइंस्टीन ने इसके महत्व को पहचाना और उसका जर्मन में अनुवाद किया और वहां के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में बोस के नाम से इसको प्रकाशित कराया।बड़े वैज्ञानिकों के साथ कामइसके बाद सत्येंद्र नाथ बोस यूरोप गए और दो साल तक एक्स रे और क्रिस्टलोग्राफी प्रयोगशालाओं में काम किया। यहां पर उन्होंने आइंस्टीन और मैडम क्यूरी समेत कई वैज्ञानिको के साथ काम किया। वहीं खुद आइंस्टीन ने भी बोस के आइडिया को अपनाया और उसको परमाणुओं पर लागू करके ऐसे कणों के समूह की खोज की, जिसको &#039;बोसोन&#039; कहा जाता है।बोस-आइंस्टीन सांख्यिकीगैस के अणुओं की गति के गणित के लिए मैक्सवेल और बोल्ट्समैन द्वारा एक सांख्यिकी की खोज की थी। जो परमाणुओं के लेवल तक काम करती थी। परमाणु के अंदर उपपरमाणु कणों की जानकारी के बाद यह सांख्यिकी उस लेवल पर नाकाम साबित हुई। इनके लिए सत्येंद्र नाथ बोस द्वारा नई सांख्यिकी खोजी गई। इसको ही बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी कहा जाता है।गॉड पार्टिकलवहीं साल 2012 में जब गॉड पार्टिकल की खोज की गई, तब बोस के नाम पर वैज्ञानिकों ने उसको &#039;हिग्स-बोसोन कण&#039; नाम दिया। फिर जुलाई 2012 के न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में बोस को &#039;फादर ऑफ गॉड पार्टिकल&#039; बताया गया। यह भौतिकी का मूलभूत कण है, जोकि हिग्स क्षेत्र में क्वांटम उत्तेजन से पैदा होता है।मृत्युवहीं 04 फरवरी 1974 में सत्येंद्रनाथ बोस का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:22:11 +0530</pubDate>
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<title>Khushwant Singh Birth Anniversary: विवादों से बेपरवाह, अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने वाले बेबाक Writer थे खुशवंत सिंह</title>
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<description><![CDATA[ लेखक, इतिहासकार, संपादक रहे खुशवंत सिंह का 02 फरवरी को जन्म हुआ था। खुशवंत सिंह को असंख्य पाठकों का प्यार मिला। हालांकि उनका जीवन विवादों और आलोचनाओं से भी अछूता नहीं रहा। लेकिन उन्होंने इसकी कभी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह ने शराब-शबाब सहित अपने अन्य किसी शौक पर पर्दे की जरूरत नहीं महसूस की। वह अपनी बेबाक लेखनी, हास्य और व्यंग्य के लिए मशहूर थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर खुशवंत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षापंजाब के हदाली में 02 फरवरी 1915 को खुशवंत सिंह का जन्म हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से सेंट स्टीफिंस कॉलेज से पढ़ाई की। बाद में उन्होंने साल 1951 में ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी करना शुरूकर दिया।इसे भी पढ़ें: Kalpana Chawla Death Anniversary: करनाल से NASA तक, कैसे भारत की बेटी बनीं आसमान का सिताराकरियरखुशवंत सिंह ने अपनी पेशेवर जिंदगी में पत्रकार के रूप में बहुत प्रसिद्धि पाई। साल 1951 में वह आकाशवाणी से जुड़े। फिर साल 1951 से लेकर 1953 तक वह भारत सरकार के पत्र &#039;योजना&#039; का संपादन करते रहे। इसके अलावा वह साल 1980 तक मुंबई से प्रकाशित होने वाली प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक &#039;न्यू डेल्ही&#039; और &#039;इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया&#039; के संपादक रहे।खुशवंत सिंह के उपन्यासडेल्हीट्रेन टु पाकिस्तानदि कंपनी ऑफ़ वूमनखुशवंत सिंह का कहानी-संग्रहदस प्रतिनिधि कहानियाँविष्णु का प्रतीककर्म, रेपजाति व्यवस्था के खिलाफसाल 1983 तक खुशवंत सिंह ने दिल्ली के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक &#039;हिंदुस्तान टाइम्स&#039; का संपादन किया। हर सप्ताह आने वाले उनके कॉलम का पाठक बेसब्री से इंतजार किया करते थे। एक लेखक और एक व्यक्ति के तौर पर वह जाति व्यवस्था के खिलाफ थे। उनकी रचनाएं समकालीन व्यंग्य से लेकर राजनीतिक टिप्पणी, सिख धार्मिक ग्रंथों और उर्दू कविता के उत्कृष्ट अनुवाद तक हैं।तीनों चीजों से था बेहद प्यारखुशवंत सिंह ने अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव तक लिखना नहीं छोड़ा। 99 साल की उम्र में भी वह सुबह 4 बजे उठकर लिखना पसंद करते थे। वह लिखने के लिए अक्सर घंटों तक बगीचे में बैठे रहते थे। बताया जाता है कि खुशवंत सिंह को तीन चीजों से बहुत ज्यादा प्यार था। पहला दिल्ली, दूसरा लेखन और तीसरा खूबसूरत महिलाएं।मृत्युवहीं 20 मार्च 2014 को खुशवंत सिंह ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 03 Feb 2026 10:49:54 +0530</pubDate>
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<title>Kalpana Chawla Death Anniversary: करनाल से NASA तक, कैसे भारत की बेटी बनीं आसमान का सितारा</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 01 फरवरी को अंतरिक्ष तक का सफर तय करने वाली कल्पना चावला का निधन हो गया था। कोलंबिया स्पेस शटल उड़ान के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें कल्पना चावला समेत यान में सवार सभी अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई थी। भारत समेत पूरी दुनिया की लड़कियों और महिलाओं के लिए कल्पना चावला एक आइकन हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कल्पना चावला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाहरियाणा के करनाल में 17 मार्च 1962 को कल्पना चावला का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम बनारसी लाल चावला और मां का नाम संज्योती चावला था। कल्पना सबसे छोटी थीं और उनकी शुरूआती शिक्षा करनाल में ही टैगोर बाल निकेतन सीनियर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की थी। कल्पना बचपन में फ्लाइट इंजीनियर बनना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया था और एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। वहीं महज 20 साल की उम्र में कल्पना पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गई थीं।इसे भी पढ़ें: Mahatma Gandhi Death Anniversary: South Africa के एक वाकये ने मोहनदास को &#039;महात्मा&#039; बना दिया, जानिए खास बातेंकल्पना के सपनेकल्पना ने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में एडमिशन लिया और दो साल की पढ़ाई के बाद वह एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री ली। साल 1986 में दूसरी मास्टर्स डिग्री प्राप्त की। फिर साल 1988 में उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी किया। कल्पना ने यह तय कर लिया था कि उनको अंतरिक्ष पर जाना है। उनके पास कमर्शियल पायलट का लाइसेंस भी था। वह एक सर्टिफाइड फ्लाइट इंस्ट्रक्टर बन चुकी थीं।नासा ने किया था रिजेक्टसाल 1993 में पहली बार कल्पना चावला ने नासा के लिए अप्लाई किया था। लेकिन नासा ने उनको रिजक्ट कर दिया था। फिर साल 1995 में कल्पना का चयन नासा ने अंतरित्र यात्री के रूप में किया और उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई। फिर साल 1998 में कल्पना चावला को अंतरिक्ष की पहली उड़ान के लिए चुना गया। वहीं कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यात्रा के दौरान 372 घंटे बिताते हुए अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया।दूसरी उड़ान और मृत्युअंतरिक्ष पर जाने वाली पहली उड़ान सफल होने के बाद साल 2000 में कल्पना का चयन दूसरी स्पेस यात्रा के लिए किया गया। वहीं यह मिशन तीन वर्ष की देरी से हुई, जोकि साल 2003 में लांच किया गया। फिर 16 फरवरी 2003 को कोलंबिया फ्लाइट STS 107 से उड़ान भरी। लेकिन 01 फरवरी 2003 को कल्पना चावला का अंतरित्र यान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते टूट गया। इस दुर्घटना में मिशन में शामिल 7 लोगों की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 01 Feb 2026 21:58:22 +0530</pubDate>
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<title>Ravidas Jayanti 2026: &amp;apos;मन चंगा तो कठौती में गंगा&amp;apos; का संदेश देने वाले Sant Ravidas क्यों आज भी प्रासंगिक हैं?</title>
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<description><![CDATA[ रविदास जयंती महान संत, समाज सुधारक और भक्त कवि संत रविदास की स्मृति में मनाई जाती है। यह जयंती माघ मास की पूर्णिमा को आती है और विशेष रूप से उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े श्रद्धा भाव से मनाई जाती है। संत रविदास केवल एक संत ही नहीं थे, बल्कि वे उस सामाजिक चेतना के प्रतीक थे जिसने भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया और जाति-भेद, ऊँच-नीच जैसी कुरीतियों को चुनौती दी।संत रविदास का जीवन परिचयसंत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) में माना जाता है। वे एक चर्मकार परिवार में जन्मे थे, जिसे उस समय समाज में निम्न समझा जाता था। किंतु अपनी आध्यात्मिक साधना, ज्ञान और करुणा से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति और मानवता किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं होती। बचपन से ही उनमें ईश्वर भक्ति की गहरी भावना थी। वह अपने कार्य को ईमानदारी से करते हुए भी राम नाम का स्मरण करते रहते थे। रविदास जी निर्गुण भक्ति के उपासक थे। वह मानते थे कि ईश्वर निराकार है और सच्ची भक्ति प्रेम, सत्य और करुणा से होती है, न कि बाहरी आडंबर से।इसे भी पढ़ें: Paramahansa Yogananda Birth Anniversary: भारतीय योगी और आध्यात्मिक गुरु थे परमहंस योगानंद, छोटी उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभवभक्ति आंदोलन में संत रविदास का योगदानसंत रविदास भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उन्होंने सरल भाषा में ऐसे पदों की रचना की जो आम जनमानस को सहज ही समझ में आ जाते थे। उनके भजन और दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनका प्रसिद्ध कथन— “मन चंगा तो कठौती में गंगा”, यह संदेश देता है कि मन की पवित्रता ही सबसे बड़ा तीर्थ है।गुरु ग्रंथ साहिब में भी संत रविदास के अनेक पद संकलित हैं, जो उनकी महानता और व्यापक प्रभाव को दर्शाते हैं। वे केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके विचारों ने सभी धर्मों और वर्गों के लोगों को प्रभावित किया।सामाजिक समानता और मानवता का संदेशसंत रविदास का सबसे बड़ा योगदान सामाजिक समानता का संदेश है। उन्होंने खुलकर जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया। उनके अनुसार सभी मनुष्य समान हैं और ईश्वर की दृष्टि में कोई ऊँच-नीच नहीं है। उन्होंने ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ प्रेम, समानता और न्याय हो। उनका “बेगमपुरा” का विचार एक आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, ऐसा नगर जहाँ कोई दुख, भय या भेदभाव न हो। आज के समय में, जब समाज में फिर से असमानता और वैमनस्य की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, संत रविदास के विचार हमें सही दिशा दिखाते हैं।रविदास जयंती का आयोजनरविदास जयंती के अवसर पर देशभर में प्रभात फेरियाँ, भजन-कीर्तन, सत्संग और शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। श्रद्धालु संत रविदास के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। उनके जीवन और उपदेशों पर प्रवचन होते हैं तथा लंगर और सेवा कार्यों का आयोजन किया जाता है। इस दिन लोग आपसी भाईचारे और सेवा भावना को विशेष रूप से अपनाने का संकल्प लेते हैं। वाराणसी स्थित श्री गुरु रविदास जन्मस्थली मंदिर में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं, जहाँ देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं।आज के संदर्भ में रविदास जयंती का महत्वरविदास जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना का उत्सव है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति वही है जो मानव को मानव से जोड़ती है। संत रविदास का जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यदि विचार ऊँचे हों तो व्यक्ति समाज को नई दिशा दे सकता है। संत रविदास ने अपने विचारों, भक्ति और आचरण से समाज में प्रेम, समरसता और समानता की अलख जगाई। रविदास जयंती हमें उनके दिखाए मार्ग पर चलने, भेदभाव त्यागने और मानवता को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देती है।  ]]></description>
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<pubDate>Sun, 01 Feb 2026 21:58:21 +0530</pubDate>
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<title>Mahatma Gandhi Death Anniversary: South Africa के एक वाकये ने मोहनदास को &amp;apos;महात्मा&amp;apos; बना दिया, जानिए खास बातें</title>
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<description><![CDATA[ भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे दर्ज हैं, जोकि सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं करे। ऐसा ही एक नाम महात्मा गांधी है, जिनके विचार, आदर्श और आचरण का अनुसरण पूरी दुनिया के कई देशों के लोग करते हैं। महात्मा गांधी को भारत का राष्ट्रपति माना जाता है। लेकिन आम लोग महात्मा गांधी को बापू के नाम से पुकारते हैं। वहीं विदेशी भी उनको बापू ही कहकर याद करते हैं। महात्मा गांधी सही और गलत में फर्क करना सिखाते थे। महात्मा गांधी ने हमेशा अहिंसा का साथ दिया। आज ही के दिन यानी की 30 जनवरी को महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्याकर दी गई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के पोरबंदर में 02 अक्तूबर 1869 को महात्मा गांधी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी और मां का नाम पुतलीबाई था। उनकी शुरूआती शिक्षा पोरबंदर और राजकोट में हुई। फिर वह लंदन में जाकर वकालत की पढ़ाई करने लगे। साल 1891 में बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त करके भारत लौटे। कुछ समय उन्होंने भारत में वकालत की और फिर 1893 में एक कानूनी मामले के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए। यहां पर महात्मा गांधी ने नस्लीय भेदभाव का सामना किया, इस घटना ने उनको सामाजिक अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया।इसे भी पढ़ें: Lala Lajpat Rai Birth Anniversary: वो &#039;पंजाब केसरी&#039; जिसने Freedom Struggle में फूंकी थी नई जान, जानिए अनसुनी बातेंआजादी के आंदोलनबता दें कि महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता के लिए कई बड़े आंदोलन किए थे, जैसे- खिलाफत आंदोलन, सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह और डांडी यात्रा की थी। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा का सिद्धांत अपनाया था। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयास किए।स्वतंत्रता के बादमहात्मा गांधी के देश की आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक सुधार के लिए काम किया था। वह देश में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते थे। महात्मा गांधी ने लोगों को संयम, सच्चाई और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।क्यों कहा जाता है राष्ट्रपितामहात्मा गांधी को सबसे पहली बार नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने &#039;राष्ट्रपिता&#039; कहकर संबोधित किया था। बापू और राष्ट्रपिता का मतलब लगभग एक समान है और इसका विस्तार बड़ा है। महात्मा गांधी पूरे देश के पिता या बापू हैं। इसलिए उनको राष्ट्रपिता कहा जाता है।मृत्युआज ही के दिन यानी की 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्याकर दी गई थी। नाथूराम गोडसे ने शाम की प्रार्थना सभा के दौरान महात्मा गांधी पर गोलियां चलाईं। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 31 Jan 2026 11:46:13 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>OP Nayyar Death Anniversary: OP Nayyar थे Bollywood के असली &amp;apos;Rebel&amp;apos;, अपनी शर्तों पर संगीत बनाते और जिंदगी जीते थे</title>
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<description><![CDATA[ ओपी नैयर एक ऐसे संगीतकार रहे, जिनके गाने गाने आज भी करीब-करीब हर घर में सुने जाते हैं। आज ही के दिन यानी की 28 जनवरी को ओपी नैयर का निधन हो गया था। इनको सबसे अलहदा संगीतकारों में शुमार किया जाता है। उनके गानों का क्रेज सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी ज्यादा था। ओपी नैयर को बेजोड़ संगीतकार और बॉलीवुड का फ्यूजन किंग भी कहा जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ओपी नैयर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के लाहौर में 16 जनवरी 1926 को ओपी नैयर का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम ओंकार प्रसाद नैयर है। बताया जाता है कि ओपी नैयर विद्रोही स्वभाव के थे और वह संगीत और जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना पसंद करते थे।इसे भी पढ़ें: Bhimsen Joshi Death Anniversary: पंडित भीमसेन जोशी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को बनाया चमकदार, 11 साल की उम्र में छोड़ा घरकई हिट गाने दिएसाल 1952 में ओपी नैयर ने अपने करियर की शुरूआत की थी। इस दौरान उनको गाने के लिए 12 रुपए मिले थे। फिर उन्होंने एक से बढ़कर एक हिट गाने देने शुरू किए। ओपी नैयर के गाने इतने अच्छे होते थे कि लोग उनके गानों को काफी ज्यादा पसंद करते थे। यही कारण रहा कि ओपी ने फिल्म में म्यूजिक देने के लिए 1 लाख रुपए तक चार्ज करना शुरूकर दिया था।बता दें कि उस दौर में ओपी नैयर सबसे अधिक पैसे चार्ज करने वाले संगीतकार बन गए थे। इसी बीच ओपी नैयर की गुरुदत्त से दोस्ती हो गई थी। ओपी नैयर ने 50-60 के दशक में इतने कामयाब गाने बनाए कि उनको किसी एक चीज में बांधना मुमकिन नहीं है। उनके हिट गानों में &#039;ले के पहला पहला प्यार&#039;, &#039;उड़े जब-जब जुल्फें तेरी&#039;, &#039;बाबूजी धीरे चलना&#039; और &#039;ये देश है वीर जवानों का&#039; आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं।लता मंगेशकर से विवादओपी नैयर का विवादों से भी गहरा नाता रहा है। ओपी और लता मंगेशकर के विवाद के किस्से काफी मशहूर रहे। ओपी नैयर ने यह तय किया था कि वह लता मंगेशकर के साथ कभी काम नहीं करेंगे। वह हमेशा कहते थे कि लता मंगेशकर की आवाज में पाकीजगी थी और उनको शोखी की जरूरत थी और यह शोखी आशा भोंसले और शमशाद बेगम की आवाज में ज्यादा थी। ओपी नैयर की कई लोगों से दुश्मनी थी, जिनमें से एक मोहम्मद रफी भी हैं।मृत्युओपी ने सिनेमा को कई बेहतरीन गाने दिए, लेकिन उन पर विद्रोही और अपरंपरागत संगीतकार होने का तमगा भी लगा। लेकिन ओपी नैयर ने कभी इस बात का मलाल नहीं किया। लेकिन ओपी नैयर की जिंदगी का आखिरी सफर कुछ खास अच्छा नहीं रहा। बताया जाता है कि वह आखिरी समय में अकेले रह गए थे। वहीं 28 जनवरी 2007 को 81 साल की उम्र में ओपी नैयर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 30 Jan 2026 10:15:40 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Lala Lajpat Rai Birth Anniversary: वो &amp;apos;पंजाब केसरी&amp;apos; जिसने Freedom Struggle में फूंकी थी नई जान, जानिए अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय राजनीतिज्ञ, लेखक और शिक्षाविद रहे लाला लाजपत राय का 28 जनवरी को जन्म हुआ था। लाला लाजपत राय को पंजाब केसरी के नाम से भी जाना जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे साहसी, निडर और प्रेरणादायी नेताओं में से एक थे। उन्होंने देश में पहला स्वदेशी बैंक खोला था। लाल लाजपत राय ने साइमन कमीशन का विरोध किया था। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले क्रांतिकारियों की लिस्ट लाला लाजपत राय के बिना अधूरी है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर लाल लाजपत राय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के मोगा जिले में 28 जनवरी 1865 को लाला लाजपत राय का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम लाला राधाकृष्ण था, जोकि एक टीचर थे। वहीं उनकी मां का नाम गुलाब देवी था और वह एक धार्मिक महिला थीं। लाला लाजपत राय ने अपनी शुरूआती शिक्षा मोगा से पूरी की और फिर लाहौर के फॉरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से आगे की पढ़ाई की।इसे भी पढ़ें: Subhash Chandra Bose Birth Anniversary: Netaji Bose ने देश के लिए ठुकराई थी ICS की नौकरी, बनाई Azad Hind Faujराजनीतिक जीवन1880 के दशक में लाला लाजपत राय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए थे। फिर जल्द ही वह कांग्रेस के प्रमुख नेता बन गए और देश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से शामिल हुए। लाला लाजपत राय ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ होने वाले कई आंदोलनों में भाग लिया। इनमें से साल 1907 में होने वाला पंजाब का आंदोलन प्रमुख था। इस दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों और सत्याग्रहों का नेतृत्व किया।वहीं साल 1894 में लाला लाजपत राय ने देश में पहला स्वदेशी बैंक स्थापित करने का काम किया। इस बैंक का नाम &#039;पंजाब नेशनल बैंक&#039; है। इसके अलावा उन्होंने लक्ष्मी इंश्योरेंश नामक कंपनी भी स्थापित की। वहीं लाला लाजपत राय ने पंजाब में आर्य समाज की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी।साइमन कमीशन का विरोधसाल 1928 में भारत में संविधान सुधारों के लिए साइमन कमीशन भारत आया। जिसके खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। साइमन कमीशन का विरोध इसलिए शुरू हुआ, क्योंकि इसमें विधानसभा में कोई भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं था। वहीं 20 अक्तूबर 1928 को जब कमीशन लाहौर पहुंचा, तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में विरोध हुआ। इस विरोध को दबाने के लिए ब्रिटिश शासन ने लाठी चार्ज किया, जिसमें लाला लाजपत राय को बुरी तरह से चोटें आईं।मृत्युलाठी चार्ज में आई चोटों के कारण 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 30 Jan 2026 10:15:37 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Winston Churchill Death Anniversary: Nobel विजेता Winston Churchill का वो काला सच, जिसके कारण Bengal में 30 लाख लोगों ने तोड़ा दम</title>
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<description><![CDATA[ ब्रिटेन के पूर्व प्राइम मिनिस्टर विंस्टन चर्चिल का आज ही के दिन यानी की 24 जनवरी को निधन हो गया था। बता दें कि साल 1942 में बंगाल में आई भुखमरी का जिम्मेदार विंस्टन चर्चिल को माना जाता है। भुखमरी की वजह से बंगाल में 30 लाख से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। लेकिन मॉर्डन ब्रिटेन में चर्चिल को हीरो की तरह देखा जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विंस्टन चर्चिल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...ब्रिटेन के पीएमविंस्टन चर्चिल को राजनेता और लेखक के रूप में भी जाना जाता है। वह साल 1940 से लेकर 1945 तक ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर रहे थे। चर्चिल ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान देश की अगुवाई की थी। 20वीं सदी के चर्चित लोगों में से विंस्टन चर्चिल युद्ध और साहित्य के लिए मिलाजुला चरित्र था। ऐसा भी माना जाता है कि विंस्टन की नीतियों की वजह से ब्रिटिश काल में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था। इस दौरान करीब 30 लाख से ज्यादा लोग तड़प-तड़पकर मर गए थे।इसे भी पढ़ें: Subhash Chandra Bose Birth Anniversary: Netaji Bose ने देश के लिए ठुकराई थी ICS की नौकरी, बनाई Azad Hind Faujबंगाल में अकालउस दौर में बंगाल में अनाज का उत्पादन काफी अच्छा था। तभी विश्व युद्ध में बर्मा पर जापान ने कब्जा कर लिया था, जिस कारण वहां से चावल का आयात रुक गया था। यह देखते हुए ब्रिटिश आर्मी ने चर्चिल के आदेश पर अपने लिए चावल की जमाखोरी कर ली थी। इस दौरान जनता भरपेट एक वक्त पर खाने के बाद भी अनाज नहीं बचा पा रही है, ऐसे में ब्रिटिश हूकुमत ने जनता को अपना ही चावल महंगे दामों में खरीदने या फिर मरने पर मजबूर कर लिया था। इसके साथ ही देश के इस हिस्से में अनाज की आपूर्ति भी बंद कर दी गई। क्योंकि अंग्रेजों को डर था कि अनाज जापानियों के हाथ न लग जाए।बंगाल में अकाल पड़ने का एक कारण यह भी था कि ज्यादा धान उपजता देखकर ब्रिटिश शासकों ने अनाज उगाने पर रोक लगा दी। धान की जगह किसानों को अफीम और नील की खेती करने को कहा गया। इसको निर्यात करके अंग्रेज मोटी रकम पाते थे। इस कारण भी खाद्यान का उत्पादन एकदम से गिर गया। जबकि भंडार में रखा अनाज अंग्रेजों के पास जमा हो गया था। इसी के नतीजन साल 1943 में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा।चर्चिल की क्रूरताजब लोग भूख से मरने लगे तो वह घास खाने पर मजबूर हो गए। हालांकि कुछ अधिकारियों ने बंगाल में लोगों को मरते देखकर मदद की बात की। जिस पर चर्चिल ने क्रूरता से कहा- उनको भारतीयों से नफरत है, वह गंदे लोग हैं और उनका धर्म भी क्रूरता से भरा है। बंगाल में भुखमरी की खबर दुनिया में फैलने लगी, तो बहुत से देशों ने मदद की पेशकश की। इस दौरान कनाडा और अमेरिका जैसे देश वहां चावल की भरपूर मात्रा भेजना चाहते थे, लेकिन चर्चिल ने मदद लेने से इंकार कर दिया। लेकिन चर्चिल नहीं चाहते थे कि भारतीय जिंदा बचे।विंस्टन चर्चिल की खून की प्यास करीब 30 लाख से अधिक भारतीयों की मौत से भी शांत नहीं हुई। चर्चिल ने कहा था कि वह भारतीयों को गृहयुद्ध में मरता देखना चाहते हैं। भूतपूर्व ब्रिटिश पीएम चर्चिल को अश्वेत नस्लों से काफी नफरत थी। चर्चिल की अगुवाई में ही ब्रिटिश सेना ने एथेंस में नरसंहार किया था।मृत्युसेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का 24 जनवरी 1965 को 90 साल की उम्र में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 26 Jan 2026 22:15:19 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Winston, Churchill, Death, Anniversary:, Nobel, विजेता, Winston, Churchill, का, वो, काला, सच, जिसके, कारण, Bengal, में, लाख, लोगों, ने, तोड़ा, दम</media:keywords>
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<title>Homi J Bhabha Death Anniversary: वैज्ञानिक होमी भाभा, जिनके Nuclear Program से डरता था America, मौत आज भी एक पहेली</title>
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<description><![CDATA[ देश के महान वैज्ञानिक होमी जे भाभा का 24 जनवरी को एक विमान हादसे में निधन हो गया था। होमी जहांगीर भाभा एक भारतीय भौतिक वैज्ञानिक और मुंबई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के संस्थापक निदेशक थे। होमी जे भाभा को भारत के परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। होमी जे भाभा ने देश को परमाणु ऊर्जा से संपन्न राष्ट्र बनाने का काम किया था। भाभा ने आने वाले समय को पहचान लिया था कि देश को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनाने की जरूरत महसूस की थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर होमी जे भाभा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई के एक पारसी परिवार में 30 अक्तूबर 1909 को होमी जे भाभा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जहांगीर होर्मुसजी भाभा एक फेमस वकील थे। इनकी मां का नाम मेहरबाई टाटा था। भाभा ने अपनी उच्च शिक्षा इंग्लैंड से पूरी की थी। उन्होंने साल 1930 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की थी। इंजीनियरिंग के बाद होमी जे भाभा का रुझान भौतिकी में बढ़ गया था। उन्होंने साल 1935 में पीएचडी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से परमाणु भौतिकी से की थी।इसे भी पढ़ें: Winston Churchill Death Anniversary: Nobel विजेता Winston Churchill का वो काला सच, जिसके कारण Bengal में 30 लाख लोगों ने तोड़ा दमसाइंटिफिक रिसर्च में हुए शामिलसितंबर 1939 में सेकेंड वर्ल्ड वॉर शुरू होने से पहले होमी जे भाभा भारत लौट आए थे। युद्ध की वजह से उन्होंने भारत में रहने का फैसला किया और साइंटिफिक रिसर्च में शामिल हो गए। वह बेंगलुरु में भारतीय विज्ञान संस्थान में भौतिकी में पाठक का पद स्वीकार किया। इसकी अध्यक्षता नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमन कर रहे थे। इस दौरान भाभा ने महत्वाकांक्षी परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के लिए कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं विशेष रूप से जवाहर लाल नेहरू को समझाने में अहम भूमिका निभाई थी।टीआईएफआर की स्थापना कीफिर साल 1945 में मुंबई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की। जोकि भारत में अग्रणी रिसर्च संस्थानों में से एक बन गया था। होमी जे भाभा के नेतृत्व में टीआईएफआर ने भौतिकी, गणित, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान के क्षेत्र में अहम योगदान दिया था। उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। होमी जे भाभा का मानना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और देश की वैज्ञानिक क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिए देश का परमाणु संपन्न होना बेहद जरूरी है।भारत का पहला परमाणु रिएक्टरसाल 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना के लिए होमी जे भाभा ने भारत सरकार के साथ मिलकर काम किया था। इससे पहले उन्होंने अध्यक्ष के रूप में भी काम किया था। होमी जे भाभा के नेतृत्व में साल 1956 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग ने भारत का पहला परमाणु रिएक्टर अप्सरा विकसित किया था। होमी जे भाभा ने भारतीय मंत्रिमंडल की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में काम किया था।कई पुरस्कार और सम्मानहोमी जे भाभा ने मुंबई में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। साल 1954 में भारत के परमाणु कार्यक्रम का समर्थन करने और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अन्य क्षेत्रों में रिसर्च करने के लिए की गई थी। उनको कई सम्मान और पुरस्कार मिले थे। साल 1954 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान &#039;पद्म भूषण&#039; से सम्मानित किया गया था। फिर साल 1959 में उनको &#039;पद्म विभूषण&#039; से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 24 जनवरी 1966 को होमी जे भाभा की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। इस दौरान वह एयर इंडिया के विमान में सफर कर रहे थे। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 26 Jan 2026 22:15:18 +0530</pubDate>
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<title>Bhimsen Joshi Death Anniversary: पंडित भीमसेन जोशी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को बनाया चमकदार, 11 साल की उम्र में छोड़ा घर</title>
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<description><![CDATA[ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के जगत के फेमस गायक पंडित भीमसेन जोशी का 24 जनवरी को निधन हो गया था। पंडित भीमसेन जोशी को उनके चाहने वालों ने &#039;गाने के भगवान&#039; और &#039;संगीत के देवता&#039; जैसी कई उपाधियों से नवाजा था। उनकी गायकी ने किराना घराने की गायकी को एक नया मुकाम बख्शा था। पंडित जोशी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को इतना चमकदार बनाया, जिस पर आज हम सभी गर्व करते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित भीमसेन जोशी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातो के बारे में...जन्म और परिवारकर्नाटक के गडग गांव में 04 फरवरी 1922 को पंडित भीमनेस गुरुराज जोशी का जन्म हुआ था। उन्होंने छोटी उम्र में ही अपनी मां को खो दिया था। जिसके बाद उनकी सौतेली मां ने भीमसेन जोशी की परवरिश की थी। पंडित भीमसेन जोशी अपने परिवार में उनके 16 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे।इसे भी पढ़ें: Homi J Bhabha Death Anniversary: वैज्ञानिक होमी भाभा, जिनके Nuclear Program से डरता था America, मौत आज भी एक पहेलीसंगीत के लिए जूनूनबचपन में भीमसेन जोशी को जहां गाना-बजाना होता था, वह उसी जगह पर चले जाते थे। कभी-कभी वह उसी जगह पर गाना गाते हुए सो भी जाते थे। ऐसे समय पर भीमसेन जोशी का पता लगाने के लिए उनके माता-पिता को पुलिस की मदद लेनी पड़ती थी। गाने के प्रति जुनून के कारण ही भीमसेन जोशी महान गायक बन पाए थे।छोड़ दिया घरपंडित भीमसेन जोशी के पहले संगीत के शिक्षक थे। उन्होंने महान गायक इनायत खान के साथ संगीत का प्रशिक्षण लिया था। बता दें कि अब्दुल करीम खान के ठुमरी &#039;पिया बिन नहीं आवत है चैन&#039; ने पंडित जोशी को संगीतकार बनने के लिए प्रेरित किया था। भीमसेन जोशी ने साल 1933 में 11 साल की उम्र में संगीत के जुनून के कारण अपना घर छोड़ दिया था।सवाई गंधर्व बने गुरुसाल 1936 में सवाई गंधर्व पंडित भीमसेन जोशी के गुरु बने। वहीं 19 साल की उम्र में, उन्होंने साल 1941 में पंडित भीमसेन जोशी ने अपना पहला लाइव परफॉर्मेंस दिया था। साल 1942 में उनका पहला एल्बम रिलीज हुआ था। बताया जाता है कि एक बार उन्होंने जुकाम से छुटकारा पाने के लिए परफॉर्मेंस से करीब 16 हरी मिर्च खाई थी, जिससे कि उनका लाइव शो रद्द न हो और वह अपने जुकाम पर काबू पा लें।पुरस्कारभारत सरकार द्वारा पंडित भीमसेन जोशी को साल 1972 को &#039;पद्मश्री&#039; साल 1985 को &#039;पद्म भूषण&#039;, साल 1999 &#039;पद्म विभूषण&#039; और साल 2008 में &#039;भारत रत्न&#039; से सम्मानित किया गया था। मृत्युवहीं बीमारी के कारण 24 जनवरी 2011 को पंडित भीमसेन जोशी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 26 Jan 2026 22:15:16 +0530</pubDate>
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<title>Queen Victoria Death Anniversary: भारत पर 63 साल तक किया राज, ऐसी थी Britain की महारानी क्वीन विक्टोरिया की जिंदगी</title>
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<description><![CDATA[ भारत की साम्राज्ञी और ग्रेट ब्रिटेन व आयरलैंड, यूनाइटेड किंगडम की महारानी अलेक्जेंड्रिना विक्टोरिया का 22 जनवरी को निधन हो गया था। वह भारत पर ब्रिटिश शासन में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महारानी थीं। साल 1837 में सिर्फ 18 साल की उम्र क्वीन विक्टोरिया ने ब्रिटेन की गद्दी संभाली थी। वह दुनिया की पहली महारानी बनी थीं और उन्होंने 40 करोड़ से अधिक लोगों पर राज किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर क्वीन विक्टोरिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... पुरुषों से मिलने की नहीं थी इजाजतक्वीन विक्टोरिया के जन्म के करीब 8 महीने बाद उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में विक्टोरिया की पढ़ाई-लिखाई उनके मामा ने करवाई थी। बता दें कि विक्टोरिया को एकांत में किसी भी पुरुष से अकेले नहीं मिलने दिया जाता था। यहां तक की उम्र में बड़े नौकर-चाकर भी उनके पास नहीं सकते थे। जितनी देर विक्टोरिया को शिक्षक पढ़ाते थे, उतनी देर उनके पास मां या दाई मां बैठी रहती थीं।इसे भी पढ़ें: Parveen Babi Death Anniversary: Bollywood की पहली ग्लैमर क्वीन थीं Parveen Babi, हुआ था दर्दनाक अंतसंभाली ब्रिटेन की गद्दीसाल 1937 में क्वीन विक्टोरिया 18 साल की उम्र में ब्रिटेन की गद्दी पर बैठी थीं। बताया जाता था कि मंत्रियों की रोजाना इतनी रिपोर्ट्स आती और क्वीन विक्टोरिया को अधिक कागजों पर हस्ताक्षर करना पड़ता था। जिस कारण उनको काफी मेहनत करनी पड़ती थी। लेकिन क्वीन विक्टोरिया को अपना काम करने में सुख मिलता था। वहीं उनका कामों के प्रति यह भाव अंत तक बना रहा। क्वीन विक्टोरिया अपनी शक्ति और अधिकारों को लेकर काफी ज्यादा सख्त थीं। वहीं इसमें अपनी मां और मामा की भी दखल नहीं स्वीकार करती थीं। उनको कामकाज के मामले में किसी पर भी भरोसा नहीं था।पति की मृत्युक्वीन विक्टोरिया के जीवन में वह दुख की घड़ी थी, जब उनके पति की मृत्यु हो गई और वह 43 साल की उम्र में विधवा हो गई थीं। हालांकि जो भार क्वीन विक्टोरिया के कंधों पर रखा गया था, वह उसको अंत तक निभाती रहीं। क्वीन विक्टोरिया के कार्यकाल में ही रेल और तार जैसे उपयोगी आविष्कार हुए थे। कई बार हुआ जानलेवा हमलारिपोर्ट्स की मानें, तो महारानी विक्टोरिया पर उनके जीवन काल में करीब कुल 5 बार जानलेवा हमला हुआ था। लेकिन वह इन सभी हमलों से सही-सलामत बच निकलीं। वहीं साल 1883 में रानी विक्टोरिया विंडसर किले की सीढ़ियों से गिर गईं और इसके बाद वह इस चोट से उबर नहीं सकीं। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपनी गोल्डन जुबली और डायमंड जुबली सालगिरह मनाई। वहीं साल 1901 में क्वीन विक्टोरिया का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 24 Jan 2026 11:39:26 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bala Saheb Thackeray Birth Anniversary: न CM बने, न चुनाव लड़ा, फिर भी Maharashtra के &amp;apos;सुप्रीम कंट्रोल&amp;apos; थे बाला साहेब ठाकरे</title>
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<description><![CDATA[ महाराष्ट्र के फेमस राजनीतिज्ञ और शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे का 23 जनवरी को जन्म हुआ था। देश भर की राजनीति में आज भी बाला साहेब ठाकरे का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी की बाला साहेब जो महाराष्ट्र की राजनीति में अहम जगह रखते थे, उन्होंने कभी खुद चुनाव नहीं लड़ा था। लोग उनको लोक कल्याण और महाराष्ट्र के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए सम्मान देते हैं। बाला साहेब ठाकरे ने कभी मूल मान्यताओं से कभी समझौता नहीं किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बाला साहेब ठाकरे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुणे में 23 जनवरी 1926 को बाला साहेब ठाकरे का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम केशव सीताराम ठाकरे था, जोकि एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। उनके पिता &#039;प्रबोधन&#039; नामक मैगजीन चलाते थे। उन्होंने साल 1950 के दशक में महाराष्ट्र राज्य बनाने में मदद की थी।इसे भी पढ़ें: Queen Victoria Death Anniversary: भारत पर 63 साल तक किया राज, ऐसी थी Britain की महारानी क्वीन विक्टोरिया की जिंदगीकार्टूनिस्ट से राजनीति तक सफरबता दें कि बाला साहेब ठाकरे ने फेमस कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के साथ काम किया था। यह कार्टून जापान के डेली न्यूज पेपर &#039;द न्यूयॉर्क टाइम&#039; और &#039;द असाही शिंबुन&#039; के संडे एडिशन में छपा करते थे। साल 1960 में बाला साहेब ठाकरे पूरी से राजनीति में सक्रिय हो गए थे। वह अपने भाई के साथ मार्मिक नामक साप्ताहिक अखबार निकाला था। फिर साल 1966 में मराठी माणुस को हक दिलाने के लिए बाला साहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की। लेकिन बाला साहेब ठाकरे ने कभी खुद चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन उन्होंने कई बार किंगमेकर की भूमिका निभाई।हिंदूवादी नेतापूरे देश में बाला साहेब ठाकरे को हिंदूवादी नेता के रूप में जाने जाते थे। इसका उदाहरण बाबरी मस्जिद गिराने के मामले में भी देखा गया था। जब अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराया गया तो इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा था। तब बाल ठाकरे खुलकर सामने आए और कहा कि शिवसैनिकों ने ढांचे को गिराया है। वहीं साल 1995 में शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन की सरकार भी बनाई थी।मृत्युवहीं 17 नवंबर 2012 को 88 साल की उम्र में बाला साहेब ठाकरे ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 24 Jan 2026 11:39:25 +0530</pubDate>
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<title>Subhash Chandra Bose Birth Anniversary: Netaji Bose ने देश के लिए ठुकराई थी ICS की नौकरी, बनाई Azad Hind Fauj</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 जनवरी को भारतीय राष्ट्रवादी नेता रहे सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने देश के लिए ब्रिटिश हुकूमत की नौकरी को ठुकरा दिया था। भारत की आजादी के प्रति नेताजी का &#039;पराक्रम&#039; क्रांतिकारी विचारों और &#039;आजाद हिंद फौज&#039; से दिखा था। आजाद हिंद फौज के जरिए नेताजी ने अनुशासन, साहस और नेतृत्व दिखाया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाओडिशा के कटक में 23 जनवरी 1897 को सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई के बाद कलकत्ता यूनिवर्सिटी से डिग्री प्राप्त की थी। इसके बाद वह इंडियन सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए इंग्लैंड चले गए थे। साल 1919-1920 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास की, इसमें नेताजी को चौथा स्थान हासिल हुआ था। इस तरह से बोस ICS अधिकारी बन गए थे।इसे भी पढ़ें: Bala Saheb Thackeray Birth Anniversary: न CM बने, न चुनाव लड़ा, फिर भी Maharashtra के &#039;सुप्रीम कंट्रोल&#039; थे बाला साहेब ठाकरेठुकरा दी थी नौकरीनेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत की प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकरा दिया था। वह देश की आजादी के प्रति अपने जुनून के कारण इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वह INC में तेजी से आगे बढ़े और अपने क्रांतिकारी विचारों और ब्रिटिश शासन से देश की पूरी आदाजी की वकालत के लिए जाने गए। साल 1938 और 1939 में उनको इंडियन नेशनल कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया, लेकिन बाद में नेताजी ने इस पद से इस्तीफा दे दिया था।आजाद हिंद फौजभारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए नेताजी ने अपनी सेना &#039;आजाद हिंद फौज&#039; बनाने का फैसला किया। उन्होंने राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए बर्लिन में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना भी की। नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो की शुरूआत करके स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया और यूरोप में भारतीय सेना का गठन किया।निधनबता दें कि 18 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस की ताइवान में एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। हालांकि नेताजी की मृत्यु के बारे में आज भी कई सवाल बने हुए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वह मरे नहीं थे, बल्कि गुमनाम जिंदगी जी रहे थे। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 24 Jan 2026 11:39:24 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Parveen Babi Death Anniversary: Bollywood की पहली ग्लैमर क्वीन थीं Parveen Babi, हुआ था दर्दनाक अंत</title>
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<description><![CDATA[ 70 के दशक की सुपरहिट एक्ट्रेस में शुमार परवीन बाबी की 20 जनवरी को मृत्यु हो गई थी। एक्ट्रेस ने शशी कपूर और अमिताभ बच्चन जैसे कई दिग्गज स्टार के साथ काम किया था। उनकी जिंदगी में सब ठीक चल रहा था। लेकिन परवीन बाबी की मौत ने इंडस्ट्री को अंदर तक हिला दिया था। 1970 के दशक में परवीन बाबी को हिंदी सिनेमा का सबसे ग्लैमरस रोल करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने 1970 और 1980 में आई कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम किया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर परवीन बाबी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के जूनागढ़ में 04 अप्रैल 1954 को परवीन बाबी का जन्म हुआ था। उनके पिता वली मोहम्मद बॉबी जूनागढ़ के नवाब और जमाल बख्ते बॉबी के निकाय प्रशासक थे। परवीन बाबी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। परवीन ने 10 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था।इसे भी पढ़ें: MG Ramachandran Birth Anniversary: एमजी रामचंद्रन ने Cinema और Politics दोनों पर किया राज, आज भी मिसाल है ये Legacyफिल्मी करियरसाल 1971 में परवीन बाबी ने मॉडलिंग से अपने करियर की शुरूआत की थी। फिर साल 1973 में उन्होंने अभिनय जगत में कदम रखा। इसके बाद एक्ट्रेस ने फिल्म &#039;मजबूर&#039; में काम करके पहचान बनाई। लेकिन परवीन बाबी को असली सफलता फिल्म &#039;दीवार&#039; से मिली। इसके बाद एक्ट्रेस परवीन बाबी ने &#039;काला पत्थर&#039;, &#039;अमर अकबर एंथनी&#039;, &#039;शान&#039;, &#039;क्रांति&#039;, &#039;द बर्निंग ट्रेन&#039;, &#039;सुहाग&#039;, &#039;कालिया&#039; और &#039;नमक हलाल&#039; जैसी सफल फिल्मों में काम करके अपने अभिनय का लोहा मनवाया।मानसिक बीमारीबता दें कि महेश भट्ट के साथ रोमांस के दौरान ही एक्ट्रेस को मानसिक बीमारी शुरू हुई थी। जिसके बाद महेश भट्ट ने अपने इंटरव्यू में पैरानायड स्कित्जोफ्रेनिया बताया है। लेकिन परवीन बाबी ने ऐसा कुछ नहीं कहा। लेकिन उन्होंने यह जरूर माना कि उनको आनुवांशिक मानसिक बीमारी ने चपेट में ले लिया था। वहीं 1983 में परवीन बाबी ने बॉलीवुड छोड़ दिया और वह कुछ समय बैंगलोर में रहीं और फिर अमेरिका चली गईं। अमेरिका में भी उनकी बीमारी का इलाज नहीं मिला। इस बीमारी के दौरान ही एक्ट्रेस ने अमिताभ बच्चन सहित तमाम नामचीन लोगों से अपनी जान को खतरा बताया।मृत्युवहीं साल 1989 में एक्ट्रेस परवीन बाबी भारत लौट आईं और साल 2005 तक वह मुंबई में रही। लेकिन इस दौरान वह बॉलीवुड की चमक-दमक से दूर रहीं। वहीं 20 जनवरी 2005 को 50 साल की उम्र में परवीन बाबी अपने फ्लैट में मृत पाई गईं। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 22 Jan 2026 11:06:51 +0530</pubDate>
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<title>MG Ramachandran Birth Anniversary: एमजी रामचंद्रन ने Cinema और Politics दोनों पर किया राज, आज भी मिसाल है ये Legacy</title>
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<description><![CDATA[ तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज अभिनेता एम जी रामचंद्रन का 17 जनवरी को जन्म हुआ था। एमजीआर सिर्फ साउथ सिनेमा में ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति में भी सफल थे। उन्होंने अभिनय, राजनीति और जनसेवा तीनों ही क्षेत्रों में जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी मिसाल माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एम जी रामचंद्रन पर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारश्रीलंका के मलयाली परिवार में 17 जनवरी 1917 को एम जी रामचंद्रन का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम मारुथर गोपाल रामचंद्रन था। हालांकि उनका बचपन संघर्षों से भरा था। ढाईं साल की उम्र में एमजीआर के पिता का निधन हो गया। जिसके बाद उनकी मां उनको लेकर केरल आ गईं। स्कूल के दिनों से एमजीआर को नृत्य, अभिनय और तलवारबाजी का शौक था। वह स्कूल ग्रुप के साथ नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। यहीं से एमजीआर के अभिनय करियर की नींव पड़ी।इसे भी पढ़ें: Mahadev Govind Ranade Death Anniversary: कांग्रेस के &#039;पितामह&#039; थे महादेव गोविंद रानाडे, जानिए क्यों कहलाए Justice Ranadeफिल्मी करियरएमजीआर ने साल 1936 में फिल्म &#039;साथी लीलावती&#039; से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। शुरूआती संघर्ष के बाद साल 1950 में एमजीआर की लोकप्रियता काफी तेजी से बढ़ी। फिर साल 1954 में &#039;मलैक्कलन&#039; फिल्म से वह स्टार बन गए। उन्होंने तमिल सिनेमा की पहली रंगीन फिल्म &#039;अलीबाबावुम 40 थिरुडर्गलुम&#039; में भी काम किया था। साल 1972 में एमजीआर को फिल्म &#039;रिक्शावकरन&#039; के लिए उनको सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिला था। उन्होंने दशकों तक तमिल सिनेमा पर राज किया। वहीं साल 1987 में आई फिल्म &#039;उलगम सुथी पारु&#039; एमजीआर की आखिरी फिल्म साबित हुई।राजनीति करियरफिल्मों में सफलता पाने के बाद एमजीआर ने सियासत की ओर रुख किया। साल 1953 में डीएमके पार्टी ज्वॉइन की। वहीं साल 1962 में एमजीआर विधान परिषद के सदस्य बने। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उनको पार्टी से निकाल दिया गया था। फिर साल 1972 में उन्होंने एआईडीएमके की स्थापना की थी। फिर 1977 में वह तमिलनाडु के सीएम बने और लगातार जनता के बीच काफी लोकप्रिय रहे। साल 1988 में एमजीआर को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान &#039;भारत रत्न&#039; से नवाजा गया।जयललिता संग रिश्ताबता दें कि एमजीआर की पर्सनल लाइफ भी काफी चर्चा में रहा। उनका नाम एक्ट्रेस जयललिता के साथ जुड़ा था। जब जयललिता फिल्मों में आई थी, तब तक एमजीआर दक्षिण भारतीय फिल्मों के बहुत बड़े स्टार बन चुके थे। एमजीआर और जयललिता दोनों ने 28 फिल्मों में साथ काम किया था। हालांकि अभिनेत्री जयललिता ने हमेशा एमजीआर को अपना मेंटर बताया था।मृत्युवहीं एमजी रामचंद्रन का 24 दिसंबर 1987 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 18 Jan 2026 17:10:06 +0530</pubDate>
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<title>Jyoti Basu Death Anniversary: बंगाल की सियासत का &amp;apos;लौह पुरुष&amp;apos;, Jyoti Basu ने क्यों ठुकरा दिया था देश के PM बनने का Golden Offer</title>
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<description><![CDATA[ भारत के वामपंथी सुपरस्टार और बंगाल के लौह पुरुष कहे जाने वाले ज्योति बसु का 17 जनवरी को निधन हो गया था। हालांकि उनकी एकतरफा शैली के लिए हमेशा आलोचना की जाती थी। लेकिन उनकी राजनीतिक सूझबूझ और निर्णय क्षमता को भी समान रूप से स्वीकार किया गया। वह हमेशा कलफ लगे सफेद कपड़े पहनते थे। ज्योति बसु 23 साल से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। वह किसी भी भारतीय राज्य के सबसे लंबे समय तक सीएम रहने वाले व्यक्ति थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योति बसु के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता में 08 जुलाई 1914 को ज्योति बसु का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम निशिकांत बसु और मां का नाम हेमलता देवी था। इनके पिता एक होम्योपैथ चिकित्सक थे। उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज और इंटरमीडिएट पास किया। फिर साल 1935 में वह कानून की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन चले गए। ब्रिटेन में रहने के दौरान वह वामपंथी सिद्धांत और व्यवहार से प्रभावित हो गए थे। वहीं वीके कृष्ण मेनन के नेतृत्व में ज्योति बसु भारतीय छात्रों के एक निकाय इंडिया लीग के सदस्य बन गए।इसे भी पढ़ें: MG Ramachandran Birth Anniversary: एमजी रामचंद्रन ने Cinema और Politics दोनों पर किया राज, आज भी मिसाल है ये Legacyराजनीतिक सफरब्रिटिश शासन से भारत को आजादी मिलने के बाद साल 1952 में ज्योति बसु बारानगर से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। वहीं 1950-60 के दशक में बसु मूल रूप से प्रांतीय राजनीतिज्ञ बने। उनको अक्सर गिरफ्तार किया जाता और वह पुलिस से बचने के लिए भूमिगत हो जाए। जब सीपीआई (एम) में विभाजन हुआ, तो ज्योति बसु इसके पोलित ब्यूरो सदस्य बने। वह पहले पोलित ब्यूरो के नौ सदस्यों में से अंतिम जीवित सदस्य थे, जिनको &#039;नवरत्न&#039; के रूप में जाना जाता था।देश में आपातकाल के बाद साल 1977 में वाम मोर्चे ने पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाई और ज्योति बसु को मुख्यमंत्री चुना गया। वहीं अगले 23 सालों में ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीएम ने राज्य में न सिर्फ मजबूत आधार बनाने का काम किया, बल्कि एक ऐसा आधार बनाया, जिसको अक्सर निर्दयी माना जाता था। ज्योति बसु की देखरेख में कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी, भूमि सुधार और त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था जैसी कई पहल शुरू की।वहीं ज्योति बसु ने साल 2000 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इसी साल 06 नवबंर को उन्होंने डिप्टी बुद्धदेव भट्टाचार्य को पदभार सौंप दिया। वहीं सेहत खराब होने की वजह से साल 2008 में उनको पोलित ब्यूरो से हटा दिया गया। हालांकि अपनी मृत्यु तक ज्योति बसु पार्टी की केंद्रीय समिति में विशेष आमंत्रित सदस्य बने रहे।पीएम पद का ऑफरसाल 1966 में ज्योति बसु भारत के पहले कम्युनिस्ट पीएम बनने के बहुत करीब पहुंच गए थे। उनको प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला था। लेकिन उन्होंने इसको ठुकरा दिया था। वह भारतीय राजनीति के इतिहास की अहम घटना है, जिसको बाद में ज्योति बसु ने ऐतिहासिक भूल बताया था। उनका मानना था कि यह भारत में वामपंथी आंदोलन के लिए एक बड़ा मौका था, जिसको पार्टी ने गंवा दिया था।मृत्युवहीं 17 जनवरी 2010 को ज्योति बसु का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 18 Jan 2026 17:10:05 +0530</pubDate>
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<title>Mahadev Govind Ranade Death Anniversary: कांग्रेस के &amp;apos;पितामह&amp;apos; थे महादेव गोविंद रानाडे, जानिए क्यों कहलाए Justice Ranade</title>
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<description><![CDATA[ भारत की स्वतंत्रता के लिए न जाने कितने ही लोगों ने अपना बलिदान दिया है। ऐसे ही एक समाज सुधारकों में से एक महादेव गोविंद रानाडे का नाम भी शामिल है। आज ही के दिन यानी की 16 जनवरी को महादेव गोविंद रानाडे का निधन हो गया था। उन्होंने समाज सुधार के लिए कई काम किए हैं। महादेव गोविंद रानाडे को &#039;जस्टिस रानाडे&#039; के नाम से भी जाना जाता है। महादेव गोविंद रानाडे समाज सुधारक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महादेव गोविंद रानाडे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामहाराष्ट्र के नासिक जिले में 18 जनवरी 1842 को महादेव गोविंद रानाडे का जन्म हुआ था। उनका बचपन कोल्हापुर में बीता था। उनकी शुरूआती शिक्षा कोल्हापुर के मराठी स्कूल से की थी। वहीं 14 साल की उम्र में वह बंबई आ गए। यहां पर उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज से हायर एजुकेशन पूरा किया। वह गोविंद बंबई यूनिवर्सिटी के फर्स्ट बैच के छात्र थे। साल 1962 में महादेव गोविंद रानाडे ने बीए किया और फिर एलएलबी की डिग्री फर्स्ट डिवीजन में हासिल की।इसे भी पढ़ें: Swami Vivekananda Birth Anniversary: Swami Vivekananda ने Chicago में बजाया था भारत का डंका, जानिए रोचक बातेंबॉम्बे हाई कोर्ट के जजरानाडे ने भारतीय भाषाओं को बंबई यूनिवर्सिटी के सिलेबस में शामिल किया। उनकी योग्यता की वजह से उनको बॉम्बे स्मॉल कॉज कोर्ट में प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया था। फिर साल 1893 तक वह बॉम्बे हाईकोर्ट के जज नियुक्त किए गए थे।इतिहास के ट्रेनरवहीं एलफिंस्टन कॉलेज में गोविंद रानाडे को इतिहास के ट्रेनर के रूप में नियुक्त किया गया था। जिसकी वजह से उनमें भारतीय इतिहास विशेषरूप से मराठा इतिहास में विशेष रुचि विकसित हुई। इसी के चलते रानाडे ने साल 1900 में &#039;राइज ऑफ मराठा पावर&#039; नाम की पुस्तक लिखी थी। इतिहास में विशेषज्ञता के कारण रानाडे हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि भारतीयों में इतिहास के प्रति संवेदनशीलता की काफी कमी है।समाज सुधार के प्रयासमहादेव गोविंद रानाडे का झुकाव हिंदू धर्म के आध्यात्मिक पक्ष की तरफ ज्यादा था। वह मूर्ति पूजा और कर्म-कांडों में विश्वास नहीं रखते थे। रानाडे धर्म से लेकर शिक्षा तक भारतीयों में प्रगतिशील सुधार देखना चाहते थे। रानाडे ने बाल विवाह, ट्रांस-समुद्री यात्रा पर जाति प्रतिबंध, शादी धूमधाम से करने और विधवा मुंडन जैसी तमाम बुराइयों का जमकर विरोध किया था। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा पर विशेष कार्य करते हुए महाराष्ट्र कन्या शिक्षा समाज की स्थापना की थी।राजनीतिक गतिविधिबता दें कि रानाडे ने &#039;भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस&#039; की स्थापना का समर्थन किया था। साल 1885 में उन्होंने कांग्रेस के प्रथम मुंबई अधिवेशन में भाग लिया। राजनीतिक सम्मेलनों के साथ सामाजिक सम्मेलनों के आयोजन का श्रेय रानाडे को जाना है। वह सिर्फ सामाजिक सुधार के लिए पुरानी रुढ़ियों को तोड़ना काफी नहीं मानते थे। उनका कहना था कि रचनात्मक कार्य से ही यह संभव हो सकता है।मृत्युवहीं 16 जनवरी 1901 को महादेव गोविंद रानाडे का पुणे में निधन हो गया था।आज ही के दिन 16 जनवरी 1901 को समाज सुधारक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक महादेव गोविंद रानाडे का पुणे में निधन हो गया। वे एक समाज सुधारक थे, जिन्होंने बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई लड़ी, शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के माध्यम से महिलाओं के उत्थान पर काम किया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 17 Jan 2026 07:53:00 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Swami Vivekananda Birth Anniversary: Swami Vivekananda ने Chicago में बजाया था भारत का डंका, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली और आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद का 12 जनवरी को जन्म हुआ था। स्वामी विवेकानंद ने सिर्फ भारतीय आध्यात्म का पूरी दुनिया में डंका बजाया, बल्कि सोए हुए भारतीय समाज को जगाने का काम भी किया था। वह वेद, शास्त्र और भारतीय संस्कृति के प्रति बचपन से ही गहरी रुचि रखते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था और वह बचपन से ही जिज्ञासु और बुद्धिमान थे। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था, जोकि प्रसिद्ध वकील थे और मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था। नरेंद्रनाथ को बचपन से ही योग और ध्यान में रुचि रखते थे। नरेंद्रनाथ का मानसिक विकास बेहद तीव्र था।इसे भी पढ़ें: Bharatendu Harishchandra Death Anniversary: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह थे भारतेंदु हरिश्चंद्र, 7 साल की उम्र में लिखी थी पहली कविताईश्वर को लेकर जिज्ञासायुवा नरेंद्रनाथ के मन में ईश्वर को लेकर काफी जिज्ञासा थी। ऐसे में उन्होंने कई विद्वानों से पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है। लेकिन किसी ने भी उनको सटीक जवाब नहीं दिया। हालांकि रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्रनाथ से निडर होकर कहा, &#039;हां मैंने ईश्वर देखा है, ठीक वैसे ही जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं।&#039; इस प्रश्न का उत्तर पाने के बाद नरेंद्रनाथ उनके शिष्य बन गए। शिकागो धर्म संसदस्वामी विवेकानंद को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली, जब उन्होंने शिकागो की विश्व धर्म संसद में भाषण दिया था। स्वामी विवेकानंद के भाषण की शुरूआत, &#039;मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों&#039; से की थी। इस संबोधन को सुनकर पूरा हॉल 2 मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। स्वामी विवेकानंद ने बताया कि हिंदुत्व सभी धर्मों को समाहित करने की शक्ति रखता है।एकाग्रता और याददाश्तस्वामी विवेकानंद की एकाग्रता इतनी तेज थी कि वह किसी किताब को एक बार पढ़ लेते थे, तो उनको उस किताब के हर पन्ने का हर शब्द याद हो जाता था। बताया जाता है कि वह लाइब्रेरी से मोटी-मोटी किताबें लाते थे और फिर अगले दिन ही किताबें वापस कर देते थे। जब एक बार लाइब्रेरियन ने उनसे पूछा कि क्या आप सच में इन किताबों को पढ़ते हैं, तो उन्होंने किताब का कोई किस्सा सुनाकर लाइब्रेरियन को हैरान कर दिया था।मृत्युवहीं 1902 में 39 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 13 Jan 2026 10:32:15 +0530</pubDate>
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<title>Kalyan Singh Birth Anniversary: दो बार UP के CM बने थे कल्याण सिंह, राम मंदिर के लिए त्याग दी थी सत्ता</title>
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<description><![CDATA[ राममंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे और दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह का 05 जनवरी को जन्म हुआ था। कल्याण सिंह का पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा है। भले ही वह दो बार सूबे के सीएम बने, लेकिन देश की राजनीति में हिंदुत्व के नायक का खिताब कल्याण सिंह ने यूं ही नहीं पाया था। उन्होंने पद पर बने रहने के लिए कभी अपने उसूलों का समझौता नहीं किया और न कभी राजनीति का सौदा किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान व हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल तक का सफर संघर्ष और कांटों भरा रहा। कल्याण सिंह हिंदू हृदय सम्राट तक कहलाए गए। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर कल्याण सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के मढ़ौली गांव में 05 जनवरी 1932 को कल्याण सिंह का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और मां का नाम सीता देवी था। सियासत में आने से पहले कल्याण सिंह ने अपने करियर की शुरूआत एक अध्यापक के रूप में की थी।इसे भी पढ़ें: हिमालय-सा विराट व्यक्तित्व, रामभक्त नेता थे कल्याण सिंहसियासी सफरफिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़कर कल्याण सिंह ने समाजसेवा की राह पकड़ी। यहां से ही कल्याण सिंह की राजनीति शुरू हुई। उन्होंने जनसंघ के मंच से सक्रिय राजनीति में कदम रखा। फिर साल 1967 में वह अलीगढ़ की अतरौली सीट से विधायक बने। फिर 2002 तक वह 10 बार विधानसभा सदस्य हे। वहीं जब देश में आपातकाल लगा, तो कल्याण सिंह 20 महीने जेल में रहे। फिर साल 1977 में जब सीएम राम नरेश यादव की सरकार बनी, तो जनता पार्टी में कल्याण सिंह को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। यहां से उनकी राजनीतिक पकड़ और प्रशासनिक समझ मजबूत हुई।दो बार बने यूपी के CMजनसंघ से भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद कल्याण सिंह प्रदेश संगठन महामंत्री और प्रदेशाध्यक्ष बनाए गए। इस दौरान उन्होंने गांव-गांव घूमकर बीजेपी की जड़ों को मजबूत किया। भाजपा जोकि अब विशाल वट वृक्ष बन चुकी है, इस पार्टी को कल्याण सिंह और उनके सहयोगियों ने शुरूआती दिनों में सींचा था। जब साल 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनीं, तो कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।जब कल्याण सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने, तो नकल के मामले में उन्होंने बड़ा कदम उठाया। दरअसल, नकल के मामले में बदनाम अतरौली को ध्यान में रखते हुए सीएम कल्याण सिंह ने प्रदेश के तत्कालीन शिक्षामंत्री के सहयोग से नकल अध्यादेश लागू करवाया। यह दौर मॉडल के रूप में पेश हुआ। कल्याण सिंह के कार्यकाल में गुंडा-बदमाश या तो यूपी छोड़कर भाग गए या फिर जेल गए। वह कभी गलत लोगों की पैरवी पसंद नहीं करते थे।मृत्युवहीं 21 अगस्त 2021 को लखनऊ में 89 वर्ष की उम्र में कल्याण सिंह का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 15:01:16 +0530</pubDate>
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<title>Paramahansa Yogananda Birth Anniversary: भारतीय योगी और आध्यात्मिक गुरु थे परमहंस योगानंद, छोटी उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभव</title>
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<description><![CDATA[ भारत के पहले योगगुरु परमहंस योगानंद का 05 जनवरी को जन्म हुआ था। पश्चिमी देशों में योगानंद को योग के पिता के रूप में पहचान मिली। महज 17 साल की उम्र में परमहंस योगानंद ने ईश्वर की खोज के लिए अपनी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत की थी। योगानंद ने खुद को सभी जातियों, धर्मों और राष्ट्रीयताओं के बीच अधिक सद्भाव और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए समर्पित किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर योग गुरु परमहंस योगानंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक तथ्यों के बारे में...जन्म और शिक्षाउत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 05 जनवरी 1893 को परमहंस योगानंद का जन्म हुआ था। परमहंस योगानंद के बचपन का नाम मुकुंद नाथ घोष था। साल 1910 में मुकुंदनाथ घोष की मुलाकात स्वामी युक्तेश्वर गिरि से हुई। इसके बाद से ही मुकंद की आध्यात्मिक यात्रा शुरू हो गई। साल 1915 में स्कॉटिश चर्च इंटर कॉलेज से 12वीं पास किया। इसके बाद सीरमपुर कॉलेज से ग्रेजुएश किया और बाद में अपने गुरु से ध्यान और योग की बारीकियां सीखीं।इसे भी पढ़ें: Kalyan Singh Birth Anniversary: दो बार UP के CM बने थे कल्याण सिंह, राम मंदिर के लिए त्याग दी थी सत्तामां काली का ध्यान करते थे परमहंस योगानंदबचपन से ही मुकुंदघोष मां काली की गहन प्रार्थना और ध्यान किया करते थे। ऐसे में एक मौके पर मुकुंदघोष एक गहन दिवास्वप्न में डूब गए। उनकी अंतर्दृष्टि के सामने एक प्रखर प्रकाश कौंध गया। वह इस दिव्य प्रकाश को देखकर हैरान रह गए और उन्होंने पूछा कि क्या यह अद्भुत आलोक है। इस प्रश्न के उत्तर में उनको एक प्रत्युत्तर प्राप्त हुआ, &#039;मैं ईश्वर हूं.मैं प्रकाश हूं।&#039; उन्होंने अपनी पुस्तक &#039;योगी कथामृत&#039; में इस अलौकिक अनुभव का वर्णन किया है।फिर साल 1920 में बोस्टन में धर्म की अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में शामिल होने के लिए अमेरिका चले गए। फिर वह 5 साल माउंट वाशिंगटन, लॉस एंजिल्स में आत्मनुभूति अपने मुख्यालय के साथ फैलोशिप की स्थापना की। इसके बाद वह साल 1952 तक अमेरिका में रहे। लेकिन इस बीच वह भारत भी लौटे, लेकिन फिर वह अमेरिका चले गए। साल 1935 में परमहंस योगानंद एक साल के लिए भारत आए और यहां पर उन्होंने अपने इंस्टीट्यूट और गुरु के काम को आगे बढ़ाने का काम किया।पश्चिमी देशों में पहुंचाया योगपरमहंस योगानंद पहले थे, जिन्होंने पश्चिमी देशों में भारतीय योग को पहुंचाया। पश्चिमी देशों में योगानंद को योग के पिता के रूप में पहचान मिली। योगानंदजी ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा में भारत के महान योगी के साथ अपने आध्यात्मिक अनुभवों को बताया है। परमहंस योगानंद की किताब &#039;ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी&#039; दुनिया की सबसे बड़ी आध्यात्मिक किताब बन गई।मृत्युवहीं अमेरिका में 07 मार्च 1952 को परमहंस योगानंद भारत के राजदूत बिनय रंजन पत्नी के साथ लॉस एंजिल्स के होटल में खाने पर गए थे। इसके बाद उन्होंने दुनिया की एकता पर भाषण दिया। फिर इसी दिन यानी की 07 मार्च 1952 को परमहंस योगानंद ने अपनी देह त्याग दी। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 15:01:15 +0530</pubDate>
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<title>Bharatendu Harishchandra Death Anniversary: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह थे भारतेंदु हरिश्चंद्र, 7 साल की उम्र में लिखी थी पहली कविता</title>
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<description><![CDATA[ आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का 06 जनवरी को निधन हो गया था। वह सामाजिक सुधार, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र के काव्य में भारतवासियों की पीड़ा और राष्ट्रीय चेतना भी दिखती है। उन्होंने अपने काव्य में भारत दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के वाराणसी में 09 सितंबर 1850 को भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गोपालचंद्र था, जोकि एक कवि और संगीत प्रेमी थे। भारतेंदु ने अपने पिता से साहित्य और कला का शुरूआती ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने कम उम्र में ही हिंदी, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में महारत हासिल कर ली थी।इसे भी पढ़ें: Paramahansa Yogananda Birth Anniversary: भारतीय योगी और आध्यात्मिक गुरु थे परमहंस योगानंद, छोटी उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभवपहली कविताभारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने जीवन की पहली कविता महज 7 साल की उम्र में लिखी थी। लेकिन उनकी वास्तविक साहित्यिक यात्रा तब शुरू हुई, जब उन्होंने नाटक और साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा था। वह सामाजिक सुधार, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाओं में राजनीति, तत्कालीन समाज और संस्कृति के विविध पहलुओं की झलक देखने को मिलती है।उन्होंने अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को अपने नाटकों, कविताओं और लेखों के जरिए उठाया था। उस दौर में जब अंग्रेजी और उर्दू का प्रभुत्व था, तब हिंदी को उन्होंने प्रचलित भाषाओं में से एक बनाया था। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य के सभी प्रमुख विधाओं- नाटक, गद्य, पत्रिकाएं, काव्य और निबंध आदि में अहम योगदान दिया। उन्होंने भाषा और साहित्य के अलावा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया था।भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी लेखनी की धार को पत्रकारिता और हिंदी भाषा के उत्थान की तरफ मोड़ा। उन्होंने &#039;कविवचन सुधा&#039; नामक पत्र निकाला, इसमें उस दौर की सभी प्रतिष्ठित रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। फिर साल 1873 में उन्होंने &#039;हरिश्चंद्र मैगजीन&#039; नामक पत्रिका निकाली। हालांकि सिर्फ 8 अंकों के प्रकाशन के बाद इस पत्रिका का नाम बदलकर &#039;हरिश्चंद्र चंद्रिका&#039; रख दिया।काव्य में भारतवासियों की पीड़भारतेंदु हरिश्चंद्र के काव्य में भारतवासियों की पीड़ा और राष्ट्रीय चेतना भी दिखती है। उन्होंने अपने काव्य में भारत दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है। किस प्रकार से अंग्रेज शासक भारत का शोषण कर रहे हैं और किस तरह से भारत का धन अंग्रेजी शासन में विदेश जा रहा है, वह अपने काव्य में इस पर भी तंज सकते हैं।काव्य रचनाएंफूलों का गुच्छाप्रेम सरोवरप्रेम मालिकाप्रेम फुलवारी आदिमृत्युभारतेंदु हरिश्चंद्र बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने साहित्य के सभी क्षेत्रों में कार्य किया है। लेकिन महज 35 साल की अल्पायु में 06 जनवरी 1885 को भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन हो गया। भले ही भारतेंदु का जीवनकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने जिस भी विधा में साहित्य का सृजन किया, वह कालजयी हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 15:01:14 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Bharatendu, Harishchandra, Death, Anniversary:, आधुनिक, हिंदी, साहित्य, के, पितामह, थे, भारतेंदु, हरिश्चंद्र, साल, की, उम्र, में, लिखी, थी, पहली, कविता</media:keywords>
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<title>Satyendranath Bose Birth Anniversary: वैज्ञानिक सत्‍येंद्र नाथ बोस की प्रतिभा के आइंस्टाइन भी थे कायल, साथ मिलकर किया था काम</title>
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<description><![CDATA[ महान भौतिक विज्ञानी और पद्मविभूषण से सम्मानित सत्येंद्रनाथ बोस का 01 जनवरी को जन्म हुआ था। उन्होंने महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन के साथ मिलकर &#039;बोस-आइंस्टाइन&#039; सिद्धांत दिया था। सत्येंद्रनाथ बोस ने सब एटॉमिक पार्टिकल की खोज की थी। बोस को सम्मान देने के लिए उनका नाम बोसॉन रखा गया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर भौतिकी वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाकोलकाता में 01 जनवरी 1894 को सत्येंद्र नाथ बोस का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम सुरेंद्रनाथ बोस था, जोकि ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी के इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में काम करते थे। सत्येंद्रनाथ बोस ने अपनी शुरूआती पढ़ाई नदिया जिले के बाड़ा जगुलिया गांव से पूरी की। फिर कोलकाता के प्रेजिडेंसी कॉलेज से इंटर किया।इसे भी पढ़ें: Ramana Maharshi Birth Anniversary: रमण महर्षि को 17 की उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभव, जानिए रोचक बातेंएमएससी का रिकॉर्डसाल 1915 में सत्येंद्रनाथ बोस ने अप्‍लाइड मैथ्‍स से एमएससी पूरी की। बोस ने एमएससी में टॉप किया था। बताया जाता है कि वह रिकॉर्ड नंबरों से पास हुए थे, उनका यह रिकॉर्ड आज भी बरकरार है। फिर साल 1924 में सत्येंद्रनाथ बोस ने ढाका यूनिवर्सिटी में फिजिक्‍स डिपार्टमेंट में रीडर के रूप में क्‍वॉन्‍टम स्‍टेटिक्‍स पर एक पेपर लिखा। जिसको फेमस वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन को भेजा। आइंस्टाइन इस पेपर से इतना प्रभावित हुए कि इसका जर्मन में अनुवाद करके इसको एक जर्मन साइंस जर्नल में छपने के लिए भेजा। इसी पहचान के आधार पर बोस को यूरोप की साइंस लैब में काम करने का मौका मिला था। यूरोप में रहने के दौरान सत्येंद्रनाथ बोस ने अल्बर्ट आइंसटीन और मैडम क्यूरी सहित कई वैज्ञानिकों के साथ काम किया।सम्मानसाल 1937 में महान कवि रबिंद्रनाथ टैगोर ने साइंस पर एक किताब &#039;विश्व परिचय़&#039; लिखी थी। इस किताब को टैगोर ने सत्येंद्रनाथ बोस को समर्पित किया था। वहीं सत्येंद्रनाथ बोस को साल 1954 भारत सरकार द्वारा देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान &#039;पद्मविभूषण&#039; से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 04 फरवरी 1974 को कोलकाता में हृदय गति रुक जाने के कारण 80 साल की उम्र में सत्येंद्रनाथ बोस का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 01 Jan 2026 18:48:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dushyant Kumar Death Anniversary: हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमार</title>
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<description><![CDATA[ आज तीस दिसंबर है प्रसिद्ध हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि। बिजनौर के राजपुर नवादा गांव में एक सिंतबर 1933 में जन्मे दुष्यंत कुमार का मात्र 43 वर्ष की आयु में 30 दिसंबर 1975 को भोपाल में उनका निधन हुआ।हिंदी साहित्यकार−गजलकार दुष्यंत कुमार हिंदी गजल के लिए जाने जाते हैं। वे हिंदी गजल के लिए विख्यात है किंतु उन्हें यह ख्याति हिंदी गजलों के लिए नहीं , हिंदुस्तानी गजलों के लिए मिली। संसद से सड़क तब मशहूर हुए उनके शेर हिंदुस्तानी हिंदी में हैं। हिंदुस्तानी हिंदी में  उन्होंने सभी प्रचलित शब्दों को इस्तमाल किया। शब्दों को प्रचलित रूप में इस्तमाल किया।इसे भी पढ़ें: Sumitranandan Pant Death Anniversary: अभावों में भी स्वाभिमान से जिए पंत, जानिए &#039;प्रकृति के सुकुमार कवि&#039; के जीवन की अनसुनी बातेंवे अपनी पुस्तक साए में धूप की भूमिका में खुद कहते हैं ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन,एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू—दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है। उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ’वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।—कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ’शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ,किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है,जिस रूप में वे हिन्दी में घुल−मिल गये हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिन्दी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है ।ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘ॠतु’ ‘रुत’ हो गई है।—कि उर्दू और हिन्दी अपने—अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ।—कि ग़ज़ल की विधा बहुत पुरानी, किंतु विधा है,जिसमें बड़े—बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य—रचना की है। हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है।”ग़ज़ल पर्शियन और अरबी  से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब हैं औरतों से अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता हैं कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण अर्थ हैं माशूक से बातचीत का माध्यम। उर्दू के साहित्यकार स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी ने ग़ज़ल की  भावपूर्ण परिभाषा लिखी हैं। कहते हैं कि, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते−भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाता हैं जहां से वह निकल नहीं सकता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती हैं। उसी करूण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रगट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श हैं’।दुष्यंत की गजलों की खूबी है साधारण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग, हिंदी− उर्दू के घुले मिले शब्दों का प्रयोग। चुटीले व्यंग  उनकी गजल की खूबी है।वे व्यवस्था और समाज पर चोट करते हैं। ये ही उन्हें सीधे आम आदमी के दिल तक ले जाती है। उनकी ये शैली उन्हें अन्य कवियों से अलग और लोकप्रिय करती है।आम आदमी और व्यवस्था पर चोट करने वाले  दुष्यंत कुमार के शेर, व्यवस्था पर चोट करते उनके शेर  सड़कों से  संसद गूंजतें है। शायद दुष्यंत कुमार अकेले ऐसे साहित्यकार होंगे , जिसके शेर सबसे ज्यादा बार संसद में पढ़े गए हों। सभाओं में नेताओं ने उनके शेर सुनाकर व्यवस्था पर चोट की हो।सरकार को जगाने और जनचेतना का कार्य किया हो।उन्होंने हिंदी गजल भी लिखी, पर वह इतनी प्रसिद्धि  नही पा सकी, जितनी हिंदुस्तानी हिंदी में लिखी  गजल लोकप्रिस हुईं।उनके गुनगुनाए जाने वाले उनके कुछ हिंदुस्तानी हिंदी के शेर हैं−−वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है, माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है। −रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया, इस  बहकती  हुई दुनिया को सँभालो यारों।−कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता,एक पत्थर तो तबीअ&#039;त से उछालो यारों।− यहां तो  सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसतें है,खुदा  जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा, −गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में ,सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए।−पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं  ।आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है ,पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं। इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो, धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं ।−सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी ,इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है ।−मत कहो आकाश में कोहरा घना है,ये किसी की व्यक्तगत आलोचना है। −ये जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,मैं सज्दे में नही था, आपको धोखा  हुआ होगा।−तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए,छोटी—छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।−हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुततुमने बासी रोटियाँ नाहक उठा कर फेंक दीं। गजलहो गई है पीर पर्वत सी पिंघलनी चाहिए,अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। - अशोक मधुप(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ]]></description>
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<pubDate>Tue, 30 Dec 2025 16:46:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ramana Maharshi Birth Anniversary: रमण महर्षि को 17 की उम्र में हुआ था आध्यात्मिक अनुभव, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 30 दिसंबर को महान भारतीय संत और दार्शनिक महर्षि रमण का जन्म हुआ था। महर्षि रमण को महज 17 साल की उम्र में गहन आध्यात्मिक अनुभव हुआ। जिसके बाद उन्होंने अपना घर त्याग दिया और तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल पर्वत पर रहकर ज्ञान का प्रकाश फैलाया।20वीं सदी के एक महान भारतीय संत और दार्शनिक महर्षि रमण का 30 दिसंबर को जन्म हुआ था। उन्होंने &#039;आत्म विचार&#039; के मार्ग से आत्मज्ञान प्राप्त करने की शिक्षा दी थी। वहीं महर्षि रमण को महज 17 साल की उम्र में गहन आध्यात्मिक अनुभव हुआ। जिसके बाद उन्होंने अपना घर त्याग दिया और तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल पर्वत पर रहकर ज्ञान का प्रकाश फैलाया। बता दें कि महर्षि रमण ने &#039;अहम्&#039; को मिटाने और &#039;मैं कौन हूं&#039; प्रश्न पर ध्यान केंद्रित करने पर जोर दिया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महर्षि रमण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...इसे भी पढ़ें: Guru Gobind Singhji Jayanti 2025: हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षक थे गुरु गोविन्द सिंहजन्म और परिवारतमिलनाडु राज्य के तिरुचुझी नामक एक छोटे से गांव में 30 दिसंबर 1879 को महर्षि रमण का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम वेंकटरमन अय्यर था और उन्होंने जीवन की शुरूआत एक आम बालक के रूप में की थी। उन्होंने एक मिशनरी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की और थोड़ी-बहुत अंग्रेजी सीखी।आत्म ज्ञान का अनुभवबचपन से ही रमण को लगता था कि अरुनाचला में कुछ रहस्यमय है। जिसको समझना जरूरी है। रमण ने 63 शिव संतो से संबंधित एक धार्मिक पुस्तक पढ़ी। यह रमण का पहला धार्मिक साहित्य था। वहीं 17 साल की उम्र में उनको पहला आध्यात्मिक अनुभव हुआ था। एक दिन वह घर की पहली मंजिल पर बैठे थे। अचानक से उनको मृत्यु का अनुभव हुआ और उनको महसूस हुआ कि वह मरने जा रहे हैं। लेकिन वह शांतिपूर्वक सोचने लगे कि अब मृत्यु आ गई है।वह फौरन लेट गए और अपने हाथ-पैरों को सख्त कर लिया और सांस रोककर होठों को बंद कर लिया। इस दौरान महर्षि रमण का जैविक शरीर शव के समान था। उन्होंने सोचा कि शरीर के साथ क्या वह भी मन गए हैं। शरीर शांत है, लेकिन वह पूर्ण शक्ति और अपनी आवाज को महसूस कर पा रहे हैं। तब उनको समझ आया कि वह शरीर से परे एक आत्मा हैं, शरीर मर जाता है और आत्मा को मृत्यु छू भी नहीं पाती है। इस घटना के बाद मृत्यु का डर हमेशा से गायब हो गया।इस तरह से वेंकटरमण ने बिना किसी साधना के अपने आप को आध्यात्मिकता के शिखर पर पाया। जो लड़का वेंटकरमण के नाम से जाना जाता था, जो बाद में एक साधु-संत में बदल गया। अब वह पूर्ण आत्मज्ञान के साथ विकसित ज्ञानी बन गए। इसके बाद उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने पवित्र अरुनाचला पर्वत की यात्रा शुरूकर दी। मदुरई से तिरुवन्नामलाई करीब 400 किमी दूर है। यहां पहुंचकर वह अरुनाचलेश्वर मंदिर पहुंचे। वहां मंदिर के पुजारी नहीं थे और वह सीधे मंदिर के गर्भगृह में चले गए। इस दौरान उनको अकथनीय आनंद का अनुभव हुआ। पवित्र अरुनाचलेश्वर मंदिर ही तिरुवान्नालाई में उनका पहला घर था।मृत्युवहीं अंत समय में महर्षि रमण का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। वह जानते थे कि उनका आखिरी समय अब पास में है। उनकी आंखों में एक चमक रहती थी और इस दौरान भी उन्होंने अपने भक्तों से मिलना जारी रखा। वहीं 14 अप्रैल 1950 को शाम के समय उन्होंने अपने भक्तों को दर्शन दिए और फिर थोड़े समय के लिए उन्होंने अपनी आंखें खोली और उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी। फिर एक गहरी श्वांस लेते हुए महर्षि रमण ने अपना शरीर त्याग दिया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 30 Dec 2025 16:46:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Benazir Bhutto Death Anniversary: पाकिस्तान की पहली महिला PM थीं बेनजीर भुट्टो, दो बार संभाली थी देश की सत्ता</title>
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<description><![CDATA[ पाकिस्तान में पहली मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री बनी बेनजीर भुट्टो का 27 दिसंबर को निधन हो गया था। बेनजीर भुट्टों की मौत इतने सालों बाद भी राज बनी हुई है। बता दें कि 27 दिसंबर को एक ब्लास्ट में बेनजीर भुट्टो की मौत हो गई थी। वह दो बार देश का नेतृत्व करने वाली पहली नेता बनी थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बेनजीर भुट्टो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के कराची में 21 जून 1953 को बेनजीर भुट्टो का जन्म हुआ था। उनके बचपन का निकनेम पिंकी था। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे। वहीं उच्च शिक्षा के लिए बेनजीर ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया। फिर वह ऑक्सफोर्ड यूनियन अध्यक्ष चुनी जाने वाली पहली एशियाई महिला बनी थीं। साल 1977 में ग्रेजुएशन करने के बाद बेनजीर विदेश सेवा में जाना चाहती थीं।इसे भी पढ़ें: Tarak Mehta Birth Anniversary: गुजराती थिएटर के जाने-माने नाम थे तारक मेहता, अपनी लेखनी से दुनिया को पहनाया &#039;उल्टा चश्मा&#039;लेकिन साल 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने तख्तापलट करके जुल्फिकार को सत्ता से हटा दिया। फिर साल 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दी गई और भुट्टो परिवार को नजरबंद कर दिया गया। हालांकि बाद में उनके परिवार को ब्रिटेन में निर्वासन पर जाना पड़ा। जब साल 1986 में बेनजीर भुट्टो निर्वासन से वापस अपने देश लौटी, तो वह पीपीपी नेता के रूप में लोकप्रिय हो चुकी थीं। वहीं साल 1987 में उन्होंने बिजनेसमैन आसिफ अली जरदारी से शाादी की।पाकिस्तान की प्रधानमंत्रीसाल 1988 में चुनाव जीतकर 35 साल की उम्र में बेनजीर भुट्टो किसी मुस्लिम देश का शासन संभालने वाली पहली महिला नेता बनीं। लेकिन उनकी राह इतनी भी आसान नहीं थी। क्योंकि पाकिस्तान की कट्टरपंथी सोच ने बेनजीर की राह में मुश्किलें खड़ी कीं। वहीं साल 1993 में उनकी पार्टी ने फिर जीत हासिल की और बेनजीर भुट्टो ने दूसरी बार पीएम पद के लिए शपथ ली। हालांकि इस बार भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उनको पीएम पद छोड़ना पड़ा और उन्हें जेल में डाल दिया गया। वहीं जब वह जेल से बाहर आईं, तो बेनजीर भुट्टो को देश भी छोड़ना पड़ा।मौतवहीं 18 अक्तूबर 2007 को जब बेनजीर भुट्टो फिर पाकिस्तान लौटीं, तो वह फिर से देश में अपनी सरकार बनाना चाहती थीं। जिसके लिए वह चुनाव-प्रचार में जुट गईं। लेकिन 27 दिसंबर 2007 को रावलपिंडी की एक चुनावी रैली करने के बाद बेनजीर भुट्टो पर एक आत्मघाती हमला हुआ और इस बम ब्लास्ट में बेनजीर भुट्टो की मौत हो गयी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 29 Dec 2025 22:30:28 +0530</pubDate>
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<title>Guru Gobind Singhji Jayanti 2025: हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षक थे गुरु गोविन्द सिंह</title>
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<description><![CDATA[ भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में गुरु गोविंद सिंह जी का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी है। वे केवल सिख धर्म के दसवें गुरु ही नहीं थे, बल्कि एक महान योद्धा, दार्शनिक, समाज-सुधारक, हिन्दू धर्म-संस्कृति के रक्षक और राष्ट्र-चेतना के जाग्रत प्रतीक थे। उनकी महान् तपस्वी, महान् कवि, महान् योद्धा, महान् संत सिपाही साहिब आदि स्वरूपों में पहचान होती है। गुरु गोविंद सिंह की जयंती केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को साहस, न्याय, आत्मसम्मान और धर्मरक्षा का संदेश देने वाला पर्व है। उनकी जीवन-यात्रा अन्याय के प्रतिकार, सत्य की स्थापना और मानव गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित रही। वे संपूर्ण भारतीय समाज के आस्था के केंद्र हैं, उनके जीवन से हमें राष्ट्रप्रेम और मानवतावादी धर्म की प्रेरणा मिलती है। गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब (वर्तमान बिहार) में हुआ। उनके पिता गुरु तेग बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु थे, जिन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। पिता के इस अद्वितीय त्याग ने गुरु गोविंद सिंह जी के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। बहुत कम आयु में ही उन्होंने यह समझ लिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी है। उनका संपूर्ण जीवन संघर्ष, तपस्या और सेवा का अद्भुत संगम रहा। उन्होंने धर्म को कर्म से जोड़ा और आध्यात्मिकता को सामाजिक उत्तरदायित्व का रूप दिया। उनका स्पष्ट संदेश था कि सच्चा धर्म वह है जो निर्बलों की रक्षा करे, अत्याचार का विरोध करे और मानव को आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाए। वे कहते थे कि भय से मुक्त होकर सत्य के मार्ग पर चलना ही सच्ची भक्ति है।इसे भी पढ़ें: Udham Singh Birth Anniversary: जलियांवाला बाग का बदला लेने ब्रिटेन गए थे उधम सिंह, हिला दी थी अंग्रेजों की नींव1699 में बैसाखी के पावन अवसर पर गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर इतिहास की दिशा ही बदल दी। खालसा का अर्थ है-शुद्ध, निर्भीक और समर्पित जीवन। उन्होंने पाँच प्यारे बनाकर समानता, भाईचारे और त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। खालसा की दीक्षा के माध्यम से उन्होंने जाति, वर्ग और ऊँच-नीच के भेद को समाप्त कर दिया। उन्होंने खालसा पंथ के अनुयायियों को पंच ककार केश, कड़ा, कंघा, कृपाण, कच्छा धारण करने का निर्देश दिया। ये शौर्य, शुचिता तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प के प्रतीक हैं। गुरु ने सिखाया कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और सबका सम्मान समान है। गुरु गोविंद सिंह की शिक्षाओं का केंद्रबिंदु साहस और करुणा का संतुलन है। वे एक ओर शस्त्र धारण करने की प्रेरणा देते हैं, तो दूसरी ओर दया, प्रेम और सेवा को जीवन का आधार बताते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन-“जब सब उपाय विफल हो जाएँ, तब धर्म के लिए तलवार उठाना न्यायोचित है”-यह स्पष्ट करता है कि हिंसा उनका उद्देश्य नहीं थी, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध अंतिम विकल्प थी। गुरु गोविंद सिंह भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा और समाज को नए सिरे से संगठित एवं सशक्त करने वाले एक महापुरुष हैं, उनका व्यक्तित्व अलौकिक, साहसी एवं भारतीयता से ओतप्रोत था। उन्होंने आनंदपुर का सुख, माता पिता की छांव और बच्चों का मोह छोड़कर धर्म रक्षा का मार्ग चुना। उन्होंने दमन, अन्याय, अधर्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद 11 नवंबर 1675 को नौ साल की उम्र में गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु बने। दुनिया में देश व धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महापुरुष तो अनेक मिलेंगे किन्तु अपनी तीन पीढ़ियों, बल्कि यों कहें कि अपने पूरे वंश को इस पुनीत कार्य हेतु बलिदान करने वाले विश्व में शायद एकमेव महापुरुष गुरु गोविन्द सिंहजी ही है। जिन्होंने त्याग, बलिदान एवं कर्तृत्ववाद का संदेश दिया। भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित की। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। सभ्यता और संस्कृति के प्रतीकपुरुष के रूप में जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई। जिनको बहुत ही श्रद्धा व प्यार से कलगीयां, सरबंस दानी, नीले वाला, बाला प्रीतम, दशमेश पिता आदि नामों से पुकारा जाता है। भारत में फैली दहशत, डर और जनता का हारा हुआ मनोबल देखकर उन्होंने कहा ‘‘मैं एक ऐसे पंथ का सृजन करूँगा जो सारे विश्व में विलक्षण होगा। जिससे मेरे शिष्य संसार के असंख्य लोगों में पहली ही नजर में पहचाने जा सकेंगे। जैसे हिरनों के झुंड में शेर और बगुलों के झुंड में हंस। वह केवल बाहर से अलग न दिखे बल्कि आंतरिक रूप में भी ऊँचे, साहसी और सच्चे विचारों वाले हो।गुरु गोविंद सिंह एक महान कवि और विद्वान भी थे। उनकी रचनाएँ ‘दसम ग्रंथ’ में संकलित हैं, जिनमें वीर रस, भक्ति, नीति और दर्शन का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी कविताएँ आत्मबल जगाती हैं और जीवन में धर्म व मर्यादा का बोध कराती हैं। उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के माध्यम से समाज में जागरण का कार्य किया। उनका पारिवारिक जीवन भी त्याग और बलिदान की अनुपम गाथा है। उनके चारों पुत्र-साहिबजादे, धर्म और सत्य की रक्षा करते हुए शहीद हुए। छोटे साहिबजादों को दीवार में चुनवा दिया गया, फिर भी गुरु गोविंद सिंह जी विचलित नहीं हुए। उन्होंने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर मानवता को यह संदेश दिया कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत दुख भी स्वीकार्य है। यह जीवन-चरित्र मानव इतिहास में दुर्लभ उदाहरण है।गुरु गोविंद सिंह जी ने न केवल सिख समुदाय, बल्कि संपूर्ण मानवता को आत्मसम्मान और निर्भीकता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने स्त्रियों को समान सम्मान दिया और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनका जीवन बताता है कि आध्यात्मिक व्यक्ति समाज से पलायन नहीं करता, बल्कि समाज को न्यायपूर्ण बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है। उनका एक अत्यंत क्रांतिकारी निर्णय था-गुरुगद्दी को किसी व्यक्ति के स्थान पर गुरु ग्रंथ  ]]></description>
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<title>Sumitranandan Pant Death Anniversary: अभावों में भी स्वाभिमान से जिए पंत, जानिए &amp;apos;प्रकृति के सुकुमार कवि&amp;apos; के जीवन की अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ प्रकृति के सुकुमार कवि व छायावाद के चार स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत का 28 दिसंबर को निधन हो गया था। सुमित्रानंदन पंत अपनी कविताओं में प्रकृति की सुवास को चहुंओर बिखेर देते हैं। वह प्रकृति को अपनी मां मानते थे। कवि सुमित्रानंदन पंत ने कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया, हालांकि वह अभावपूर्ण जीवन से भयभीत रहे। बताया जाता है कि सुमित्रानंदन पंत ज्योतिष के अच्छे जानकार थे और उन्होंने अपनी मृत्यु की गणना स्वयं ही कर ली थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कवि सुमित्रानंदन पंत के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअल्मोड़ा के कौसानी गांव में 20 मई 1900 को सुमित्रानंदन पंत का जन्म हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद ही उनकी मां का निधन हो गया था। ऐसे में उन्होंने गांव की प्रकृति को अपनी मां मान लिया था। हारमोनियम और तबले की धुन पर गीत गाने के साथ ही महज 7 साल की उम्र में सुमित्रानंदन पंत ने अपनी सृजनशीलता का परिचय देते हुए काव्य करना शुरूकर दिया था।इसे भी पढ़ें: Pandit Ravi Shankar Death Anniversary: पंडित रविशंकर ने शास्त्रीय संगीत को दिलाई दुनियाभर में पहचान, विवादों से भरी रही जिंदगीशुरूआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने बड़े भाई देवीदत्त के साथ काशी आ गए। यहां पर उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए क्वींस कॉलेज में एडमिशन लिया। वहीं इस दौरान वह अपनी कविताओं से सबके चहेते बन गए थे।नारी स्वतंत्रता के पक्षधरबता दें कि 25 वर्ष तक सुमित्रानंदन पंत सिर्फ स्त्रीलिंग पर कविता लिखते रहे। वह नारी स्वतंत्रता के कटु पक्षधर थे। सुमित्रानंदन पंत का कहना था कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का पूर्ण उदय तभी संभव है, जब नारी स्वतंत्र वातावरण में जी रही हो।आर्थिक तंगहालीसुमित्रानंदन पंत, महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रहे। उनका मानना था कि जिन परिस्थितियों में महात्मा गांधी ने अहिंसा का प्रयोग किया, वह शायद ही अन्य कोई कर सकता है। सुमित्रानंदन पंत ने अपना रचना धर्म निभाते हुए गांधी जी के असहयोग आंदोलन में सहयोग दिया। हालांकि इस बीच उनको आर्थिक तंगहाली से गुजरना पड़ा। स्थिति इतनी खराब हुई कि उनको अल्मोड़ा स्थित अपनी जमीन-जायदाद बेचने के साथ अपना पुश्तैनी घर भी बेचना पड़ा था।कालजयी कृतियांवहीं जल्द ही साल 1931 में कालाकांकर जाकर अपने मकान में सुमित्रानंदन ने कई कालजयी कृतियों की रचना की थी। पंत ताउम्र अविवाहित रहे थे। उनकी प्रारंभिक कविताएं &#039;वीणा&#039; में संकलित हैं। पल्लव और उच्छवास उनकी छायावादी कविताओं का संग्रह है। युगांत, स्वर्ण किरण, ग्रंथी, ग्राम्या, स्वर्ण धूलि, कला और बूढ़ा चांद और सत्यकाम आदि सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख कृतियां हैं। उन्होंने न सिर्फ गेय बल्कि अगेय दोनों में ही अपनी लेखन कला का लोहा मनवाया है।पुरस्कारसाहित्य में उल्लेखनीय योगदान की वजह से सुमित्रानंद पंत को ज्ञानपीठ, पद्मभूषण और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से विभूषित किया गया था।मृत्युवहीं 28 दिसंबर 1977 को हृदयाघात की वजह से सुमित्रानंदन पंत का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 29 Dec 2025 22:30:27 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Sumitranandan, Pant, Death, Anniversary:, अभावों, में, भी, स्वाभिमान, से, जिए, पंत, जानिए, प्रकृति, के, सुकुमार, कवि, के, जीवन, की, अनसुनी, बातें</media:keywords>
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<title>Udham Singh Birth Anniversary: जलियांवाला बाग का बदला लेने ब्रिटेन गए थे उधम सिंह, हिला दी थी अंग्रेजों की नींव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 26 दिसंबर को क्रांतिकारी उधम सिंह का जन्म हुआ था। उधम सिंह का नाम उस सांप की तरह लिया जाता है, जो अपने दुश्मनों को कभी नहीं भूलता है। भारत के इस वीर सपूत ने अंग्रेजों के खिलाफ हुई क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने के लिए ब्रिटेन गए थे और अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। उधम सिंह देश की आजादी की लड़ाई में भगत सिंह से प्रेरित थे। जन्म और परिवारपंजाब के संगरूर में 26 दिसंबर 1899 को उधम सिंह का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम शेर सिंह था। उन्होंने छोटी उम्र में ही माता-पिता और अपने भाई को खो दिया था। जिसके बाद वह अमृतसर के खालसा अनाथालय में पले बढ़े। साल 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उधम सिंह को झझकोर दिया था। 13 अप्रैल को बैशाखी के दिन ब्रिगेडियर जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों पर गोलियां चली थीं। इस घटना ने उधम सिंह के दिल में बदले की आग जला दी थी।इसे भी पढ़ें: PV Narsimha Rao Death Anniversary: नरसिम्हा राव ने मुश्किल समय में संभाली थी देश की बागडोर, ऐसे बने आर्थिक उदारीकरण के जनकभगत सिंह से प्रेरितउधम सिंह ने भगत सिंह से प्रेरित होकर क्रांतिकारी आंदोलन में कदम रखा। साल 1927 में देशद्रोही साहित्य और हथियार के आरोप में वह जेल गए। जहां पर उनकी मुलाकात भगत सिंह हुई। इस मुलाकात से उनके इरादे और मजबूत हुए। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने लंदन की राह पकड़ी। यहां पर उधम सिंह ने जलियांवाला बाग के लिए जिम्मेदार जनरल ओ डायर को सबक सिखाने की ठानी। वहीं 13 मार्च 1940 को उधम सिंह ने लंदन के कैक्सटोन हॉल में जनरल ओ डायर को दो गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया।अंग्रेजों की नींव हिला दीजिसके बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्होंने मुकदमे में गर्व से कहा, &#039;उन्होंने ऐसा अपने देश के लिए किया।&#039; फिर 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दी गई। लेकिन उधम सिंह का नाम बलिदान स्वतंत्रता संग्राम में हमेशा के लिए अमर हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 27 Dec 2025 10:26:49 +0530</pubDate>
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<title>Tarak Mehta Birth Anniversary: गुजराती थिएटर के जाने&#45;माने नाम थे तारक मेहता, अपनी लेखनी से दुनिया को पहनाया &amp;apos;उल्टा चश्मा&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ टीवी की दुनिया के पॉपुलर शो &#039;तारक मेहता का उल्टा चश्मा&#039; ने हर वर्ग के दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है। हालांकि बहुत कम लोगों को पता है कि इस शो की शुरूआत कैसे हुई। बता दें कि इसका पूरा क्रेडिट गुजराती साहित्य के फेमस हास्यकार, नाटककार और कॉलमनिस्ट तारक जनुभाई मेहता को जाता है। आज ही के दिन यानी की 26 दिसंबर को तारक जनुभाई मेहता का जन्म हुआ था। तारक मेहता एक ऐसे साहित्यकार थे, जो दुनिया को सीधे नहीं बल्कि उल्टे चश्मे से देखते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर तारक मेहता के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के अहमदाबाद में 26 दिसंबर 1929 को तारक मेहता का जन्म हुआ था। तारक मेहता के बारे में बताया जाता है कि उनको बचपन से ही साहित्य को लेकर रुचि थी। वहीं तारक मेहता ने 21 साल की उम्र से ही कॉलम लिखना शुरूकर दिया था।इसे भी पढ़ें: Udham Singh Birth Anniversary: जलियांवाला बाग का बदला लेने ब्रिटेन गए थे उधम सिंह, हिला दी थी अंग्रेजों की नींवमशहूर साप्ताहिक कॉलमतारक मेहता मुख्य रूप से फेमस साप्ताहिक कॉलम &#039;दुनिया ने उंधा चश्मा&#039; के लिए जाने जाते हैं। मार्च 1971 में गुजराती साप्ताहिक पत्रिका &#039;चित्रलेखा&#039; में पहली बार प्रकाशित हुई थी। इस कॉलम में तारक मेहता समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को हास्य के उल्टे चश्मे से देखते थे। इससे पाठकों को हंसी-गुदगुदी के साथ गहरा संदेश मिलता था।80 से ज्यादा किताबेंतारक मेहता ने अपने करियर में 80 से ज्यादा किताबें लिखीं थी। इनमें से उनके कई कॉलम पर आधारित थीं, वहीं तीन किताबें कई अखबारों में छपे उनके लेखों का संकलन थीं। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी शैली के बारे बताया था कि समाज की कमियों को उन्होंने दुनिया में उंधा चश्मा कॉलम के जरिए हल्के-फुल्के व्यंग्य से उजागर किया था। वह बताते थे कि वह मुद्दों को उल्टे चश्मे से देखते हैं, जिससे कि लोग हंसते हुए सोचें।पुरस्कारतारक मेहता गुजराती थिएटर के प्रमुख व्यक्तित्व थे। उन्होंने कई हास्य नाटकों का अनुवाद किया था। तारक मेहता की लेखने में हल्का-फुल्का व्यंग्य था। वह समाज की कमियों पर चुटकी लेते थे। लेकिन हास्य कभी कटु नहीं होता। साल 2015 में भारत सरकार ने तारक मेहता को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया।तारक मेहता का उल्टा चश्मा सीरियरबता दें कि साल 2008 में निर्माता असित कुमार मोदी ने तारक मेहता के इसी कॉलम पर आधारित शो &#039;तारक मेहता का उल्टा चश्मा&#039; शुरू किया था। यह सीरियल सोनी सब चैनल पर प्रसारित होता है। इस सीरियल में गोकुलधाम सोसाइटी के किरदारों के जरिए रोजमर्रा की जिंदगी की हंसी-मजाक दिखाया जाता है। तारक मेहता ने अपनी लेखनी से न सिर्फ गुजराती साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि टीवी के माध्यम से पूरे देश में हंसी का संदेश फैलाया।मृत्युवहीं 01 मार्च 2017 को लंबी बीमारी के बाद 87 साल की उम्र में तारक मेहता का अहमदाबाद में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 27 Dec 2025 10:26:48 +0530</pubDate>
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<title>Chaudhary Charan Singh Birth Anniversary: किसानों के मसीहा कहे जाते थे पू्र्व PM चौधरी चरण सिंह, खत्म किया था पटवारी सिस्टम</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 दिसंबर को देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था। चौधरी चरण सिंह को किसानों का मसीहा कहा गया। एक काबिल राजनेता और किसान हितों के सशक्त पैरोकार थे। वह आजादी से पहले ही किसानों की आवाज बन चुके थे। किसानों के मुद्दों के लिए वह पंडित नेहरू तक से टकरा गए थे। चौधरी चरण सिंह एक ईमानदार और सख्त प्रचारक थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर चौधरी चरण सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के मेरठ के नूरपुर गांव में 23 दिसंबर 1902 को चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था। वह जीवन भर खेती-किसानी से जुड़े सवालों को लेकर मुखर रहे। हालांकि उन्होंने कभी खेती नहीं की, लेकिन इसके बाद भी उनको किसानों की समस्याओं, जरूरतों और आकांक्षाओं की गहरी और अच्छी समझ थी।इसे भी पढ़ें: Sardar Vallabhbhai Patel Death Anniversary: देश के पहले गृहमंत्री थे सरदार वल्लभभाई पटेल, क्यों कहा जाता था लौह पुरुषराजनीतिक सफरसाल 1929 में चौधरी चरण सिंह कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। आजादी की लड़ाई के दौरान उन्होंने अनेक जेल यात्राएं की। फिर साल 1937 में वह पहली बार छपरौली से विधायक चुने गए और अगले 30 साल यूपी विधानसभा में संसदीय सचिव से लेकर कैबिनेट के एक अहम मंत्री तक की भूमिकाओं को सफलतापूर्वक निभाया। हर राजनेता की तरह चौधरी चरण सिंह भी शिखर तक पहुंचना चाहते थे, यह मौका उनको साल 1967 में प्राप्त हुआ था।दो बार बने CMसाल 1967 को सदन की कार्यवाही के दौरान चरण सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फैसला सुना दिया। इस दौरान कांग्रेस के कुछ विधायकों ने उनका साथ दिया। जिसके दो दिन बार उन्होंने मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण की। इस सरकार को जनसंघ, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट, निर्दलीय सहित सभी गैरकांग्रेसी विधायकों का समर्थन प्राप्त था। इस अल्पजीवी सरकार की अगुवाई कर रहे चौधरी चरण सिंह के टकराव का मुद्दा अनाज की खरीद नीति को लेकर था।साल 1969 को राज्य विधानसभा के मध्याविद चुनाव में उनके नेतृ्त्व में भारतीय क्रांतिदल मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरा था। यह वह साल था, जब कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन हुआ। वहीं साल 1970 में चौधरी चरण सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बनें।जब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनी, तो देश में माहौल गड़बड़ हो चुका था। साल 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया। इस दौरान चौधरी चरण सिंह को जेल में डाल दिया गया। फिर साल 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए। इस दौरान इंदिरा गांधी बुरी तरह से हारी और देश में पहली बार गैर कांग्रेसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई थी। इस बार मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने और चौधरी चरण सिंह इस दौरान उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बनें।देश के प्रधानमंत्रीहालांकि चौधरी चरण सिंह को मोरारजी की नीति पसंद नहीं आईं। वित्त मंत्री रहते हुए ही चौधरी चरण सिंह ने खाद और डीजल के दामों को कंट्रोल किया। इसके अलावा कृषि जिंसो की अंतर्राज्यीय आवाजाही पर लगी रोक हटा दी। इस कारण जनता पार्टी में कलह हुई। मोरारजी की सरकार गिर गई। फिर 28 जुलाई 1979 में कांग्रेस के सपोर्ट पर चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का समय दिया गया। लेकिन 19 अगस्त को इंदिरा गांधी ने अपना समर्थन वापस लिया और सरकार गिर गई। संसद बगैर एक दिन सामना किए, चौधरी चरण सिंह को इस्तीफा देना पड़ा।मृत्युवहीं 29 मई 1987 को नई दिल्ली में हृदय गति रुक जाने के कारण चौधरी चरण सिंह का निधन हो गया।  ]]></description>
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<pubDate>Tue, 23 Dec 2025 17:21:01 +0530</pubDate>
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<title>PV Narsimha Rao Death Anniversary: नरसिम्हा राव ने मुश्किल समय में संभाली थी देश की बागडोर, ऐसे बने आर्थिक उदारीकरण के जनक</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का निधन हो गया था। देश में आर्थिक सुधारों का श्रेय पूर्व पीएम नरसिम्हा राव को दिया जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए, जिससे कि देश गरीबी से बाहर आ सके। एक दौर ऐसा था, जब देश को अपना सोना भी विदेशों में गिरवी रखना पड़ा था। जिसके बाद नरसिम्हा राव ने देसी बाजार खोल दिया था। हालांकि उस दौर में तो उनको इस कारण आलोचना का शिकार होना पड़ा था। लेकिन यह वही फैसला था, जिसकी बदौलत आज हम टॉप देशों में शामिल हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पीवी नरसिम्हा राव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारआंध्र प्रदेश के करीमनगर में 28 जून 1921 को पीवी नरसिम्हा राव का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम पामुलापार्ती वेंकट नरसिम्हा राव था। उन्होंने अपनी शिक्षा हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय और नागपुर विश्वविद्यालय से पूरी की थी। बता दें कि नरसिम्हा राव 10 भाषाओं में बात कर सकते थे और अनुवाद के भी उस्ताद थे।इसे भी पढ़ें: Chaudhary Charan Singh Birth Anniversary: किसानों के मसीहा कहे जाते थे पू्र्व PM चौधरी चरण सिंह, खत्म किया था पटवारी सिस्टमराजनीतिक सफरसाल 1957 से लेकर 1977 तक वह आंध्र प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। फिर 1977 से 84 तक वह लोकसभा के सदस्य रहे। दिसंबर 1984 में नरसिम्हा राव को रामटेक से 8वीं लोकसभा के लिए चुना गया। वह 14 जनवरी 1980 से 18 जुलाई 1984 तक विदेश मंत्री, फिर जुलाई 1984 से दिसंबर 1984 तक गृहमंत्री और दिसंबर 1984 से सितंबर 1985 तक रक्षामंत्री रहे। 25 सितंबर 1985 में नरसिम्हा राव ने राजीव गांधी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में पदभार संभाला।आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रीसाल 1971 से लेकर 1973 तक पीवी नरसिम्हा राव आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। फिर साल 1975 से लेकर 1976 तक अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव रहे। वहीं नरसिम्हा राव 1968 से 74 तक राज्य के तेलुगू अकादमी के अध्यक्ष और 1972 में मद्रास के दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उपाध्यक्ष रहे थे।आर्थिक उदारीकरण के जनकराजनीति के अलावा पीवी नरसिम्हा राव संगीत, कला और साहित्य आदि की अच्छी खासी समझ रखते थे। वे नेहरू-गांधी परिवार के बाहर के पहले प्रधानमंत्री थे और दक्षिण भारत से देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले पीवी नरसिम्हा राव पहले शख्स थे। जब नरसिम्हा राव ने पहली बार विदेश यात्रा की थी, तो उनकी उम्र 53 साल थी। उन्होंने मुश्किल समय में देश की कमान संभाली थी। क्योंकि उस दौर में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चिंताजनक स्तर तक कम हो गया था। जिस कारण देश का सोना तक गिरवी रखना पड़ा था। जब नरसिम्हा राव ने रिजर्व बैंक के अनुभवी गवर्नर डॉ मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाकर देश को इस आर्थिक भंवर से निकालने का काम किया था।मृत्युवहीं 23 दिसंबर 2004 को नई दिल्ली में 83 साल की उम्र में पीवी नरसिम्हा राव का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 23 Dec 2025 17:21:00 +0530</pubDate>
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<title>Teji Bachchan Death Anniversary: मनोविज्ञान प्रोफेसर और कुशल सामाजिक कार्यकर्ता थीं तेजी बच्चन, बनाई थी अलग पहचान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 21 दिसंबर को प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की पत्नी तेजी बच्चन का निधन हो गया था। तेजी बच्चन को थिएटर और प्ले का काफी शौक था। बताया जाता है कि एक बार तेजी बच्चन ने एक नाटक में &#039;लेडी मैकबेथ&#039; का किरदार भी निभाया था। इसके अलावा उनको एक समाज सेविका और मनोविज्ञान प्रोफेसर के रूप में भी जाना जाता है। वह एक सरल व्यवहार और कुशल सामाजिक कार्यकर्ता थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर तेजी बच्चन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारब्रिटिश भारत में 12 अगस्त 1914 को तेजी बच्चन का जन्म हुआ था। वह पंजाबी सिख परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद लाहौर से मनोविज्ञान की पढ़ाई की थी। इसी दौरान उनकी मुलाकात  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक अंग्रेजी के प्रोफेसर हरिवंश से हुए थी।इसे भी पढ़ें: Sardar Vallabhbhai Patel Death Anniversary: देश के पहले गृहमंत्री थे सरदार वल्लभभाई पटेल, क्यों कहा जाता था लौह पुरुषऐसे हुए हरिवंश से मुलाकातजब तेजी बच्चन की प्रोफेसर हरिवंश राय बच्चन से मुलाकात हुई, तो वह पहले से शादीशुदा थे। इस दौरान हरिवंश राय अपनी पत्नी के निधन के दुख से उबर रहे थे। दोनों के बीच मुलाकातें बढ़ीं और फिर साल 1941 में तेजी और हरिवंश ने इलाहाबाद में शादी कर ली। इनके दो बेटे हुए, जिनमें अमिताभ जो हिंदी फिल्मों में आए और दूसरे अजिताभ जोकि पेशे से बिजनेसमैन हैं।फिल्मों में कैमियोबता दें कि साल 1973 में तेजी बच्चन को फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन के निदेशकों के रूप में नियुक्त किया गया था। वहीं साल 1976 में उन्होंने यश चोपड़ा की फिल्म &#039;कभी-कभी&#039; में एक कैमियो भी किया था।तेजी बच्चन और इंदिरा गांधीनेहरू परिवार और बच्चन परिवार की दोस्ती जगजाहिर है। लेकिन इस दोस्ती में तेजी और इंदिरा गांधी का नाम भी शामिल है। तेजी और इंदिरा दोनों अच्छी दोस्त थीं। फिर उन दोनों की दोस्ती को राजीव और अमिताभ बच्चन ने आगे बढ़ाया था।मृत्युसाल 2007 के नवंबर महीने में स्वास्थ्य खराब होने के कारण तेजी बच्चन को आईसीयू में ट्रांसफर कर दिया गया था। वहीं 21 दिसंबर 2007 को तेजी बच्चन का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 21 Dec 2025 18:28:25 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Walt Disney Death Anniversary: मिकी माउस के जनक हैं वॉल्ट डिज्नी, डिज्नी को बनाया एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का बादशाह</title>
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<description><![CDATA[ आधुनिक एनिमेशन उद्योग के पिता कहे जाने वाले वॉल्टर एलियास डिज्नी का 15 दिसंबर का निधन हो गया था। वह सिर्फ मिकी माउस के जनक नहीं थे, बल्कि ऐसे सपनों के साम्राज्य निर्माता थे, जिन्होंने अरबों दिलों पर राज किया था। वॉल्ट डिज्नी एक ऐसा नाम हैं, जिनके बिना सिनेमा जगत अधूरा माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर वॉल्ट डिज्नी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारवॉल्ट डिज्नी का जन्म 05 दिसंबर 1991 को एक साधारण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम इलियास डिज्नी था, जोकि सख्त और अनुशासनित थे। उन्होंने वॉल्ट डिज्नी को बचपन से ही मेहनत की आदत डाल दी थी। कागज और पेंसिल वॉल्ट डिज्नी के सबसे अच्छे दोस्त थे। हालांकि उनका परिवार इसको बर्बादी का समय मानता था। लेकिन उन्होंने चित्रकारी और कहानी कहने के शौक को कभी नहीं छोड़ा।इसे भी पढ़ें: Arvind Singh Mewar Birth Anniversary: उदयपुर में डेस्टिनेशन वेडिंग के जनक कहे जाते हैं अरविंद सिंह मेवाड़, पर्यटन को दिलाई नई पहचानकॉमर्शियल आर्टिस्टफर्स्ट वर्ल्ड वॉर के दौरान रेड क्रॉस में ड्राइवर बनने और बाद में वॉल्ट डिज्नी ने कॉमर्शियल आर्टिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू किया था। फिर साल 1920 में उन्होंने &#039;लॉफ-ओ-ग्राम&#039; नाम से अपना पहला एनिमेशन स्टूडियो खोला।मिकी माउस का जन्मशुरूआती स्टूडियो दिवालिया हो गया, लेकिन उसके बाद भी वॉल्ट ने कभी हार नहीं मानी। लॉस एंजिल्स जाकर उन्होंने अपने भाई रॉय के साथ &#039;डिज्नी ब्रदर्स&#039; स्टूडियो की नींव रखी। साल 1928 में पहली सिंक्रोनाइज्ड साउंड वाली एनिमेडेट फिल्म &#039;स्टीमबोट विली&#039; के साथ  &#039;मिकी माउस&#039; ने दुनिया पर तूफान खड़ा कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि शुरूआत में खुद वॉल्ट डिज्नी मिकी माउस की आवाज देते थे। लेकिन बाद में यह कैरेक्टर उनकी जिद, जीवन के प्रति आशावाली दृष्टिकोण और रचनात्मकता का प्रतीक बन गया।रच डाला इतिहाससाल 1934 में वॉल्ट डिज्नी ने दुनिया की पहली पूर्ण लंबाई वाली एनिमेटेड फीचर फिल्म &#039;स्नो व्हाइट एंड द सेवन ड्वार्फ्स&#039; बनाने का निर्णय लिया। जिसके बाद उनको पूरा उद्योग मूर्ख कहने लगा। इसका कारण यह था कि लोगों को लगा कि यह प्रोजेक्ट वॉल्ट डिज्नी की कंपनी को तबाह कर देगा। लेकिन यह एनिमेशन के &#039;स्वर्णिम युग&#039; की शुरूआत थी।वॉल्ट डिज्नी की कल्पना सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं थी। साल 1955 में वॉल्ट डिज्नी ने एक ऐसी दुनिया बनाने का फैसला लिया। जहां पर बच्चों से लेकर बड़े तक सभी वास्तविकता से दूर एक जादुई दुनिया में खो सकें। बता दें कि कैलिफोर्निया में खुला यह &#039;डिज्नीलैंड&#039; दुनिया का पहला ऐसा आधुनिक थीम पार्क बना, जो आज वॉल्ट डिज्नी की विरासत का एक जीवित प्रतीक है।निधनफेफड़ों के कैंसर के कारण 15 दिसंबर 1966 को वॉल्ट डिज्नी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 15 Dec 2025 17:50:00 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sardar Vallabhbhai Patel Death Anniversary: देश के पहले गृहमंत्री थे सरदार वल्लभभाई पटेल, क्यों कहा जाता था लौह पुरुष</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 दिसंबर को भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री और &#039;लौहपुरुष&#039; सरदार वल्लभ भाई पटेल का निधन हो गया था। वह दृढ़ता, निर्णय क्षमता और अटूट देशभक्ति का प्रतीक थे। वह एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने न जंग और न तलवार से बल्कि अपनी अटल इच्छाशक्ति और राजनीतिक बुद्धिमत्ता से 562 रियासतों को एकजुट करके भारत को अखंड बनाया था। देश की आजादी के बाद भारत की जो तस्वीर हम सभी देखते हैं, वह सरदार पटेल के &#039;लौह संकल्प&#039; का परिणाम है। इसलिए उनको &#039;भारत का लौह पुरुष&#039; भी कहा जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के नडियाद में 31 अक्तूबर 1875 को सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ था। सरदार पटेल में बचपन से ही नेतृत्व और अनुशासन के गुण थे। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से कानून की पढ़ाई की और बाद में एक सफल वकील बने। वहीं गांधीजी के राष्ट्रवादी आह्वन ने सरदार पटेल के जीवन की दिशा बदली।इसे भी पढ़ें: Pranab Mukherjee Birth Anniversary: देश के 13वें राष्ट्रपति थे प्रणब मुखर्जी, कभी पत्रकार के रूप में शुरू किया था करियरकिसान आंदोलन से बने जननेताअहमदाबाद के किसान आंदोलन से सरदार पटेल की यात्रा शुरू की और फिर इस यात्रा ने उनको जल्द ही जननेता बना दिया। सरदार पटेल ने किसानों, मजदूरों और आम जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने देश को दिखाया कि राजनीति का असली मतलब सेवा है, न कि सत्ता।‘लौह पुरुष’ की उपाधिदेश की आजादी के बाद भारत के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती थी, वह 562 रियासतों को एक देश में जोड़ना था। जहां एक ओर कई रियासतें अलग देश बनने की जिद पर अड़ी थीं। लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल की रणनीतिक कुशलता और दृढ़ इच्छाशक्ति से &#039;एक भारत&#039; का सपना साकार किया। जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसी रियासतों को भारतीय संघ में मिलाना किसी युद्ध से कम नहीं था। लेकिन सरदार पटेल ने इस काम को बिना किसी बड़े संघर्ष के संभव कर दिखाया। इस लोहे जैसी इच्छाशक्ति और स्पष्ट निर्णय क्षमता ने सरदार पटेल को &#039;आयरन मैन ऑफ इंडिया&#039; की उपाधि दिलाई।सरदार पटेल की कार्यशैलीहालांकि सरदार पटेल का जीवन सरल था, लेकिन उनको विचार कठोर थे। सरदार पटेल न तो बड़े भाषणों में विश्वास रखते थे, न ही दिखावे में। उनका मानना था कि राष्ट्र निर्माण शब्दों से नहीं बल्कि कर्म से होता है। सरदार पटेल का प्रशासनिक कौशल इतना प्रभावी था कि महात्मा गांधी ने उनको &#039;भारत का बिस्मार्क&#039; कहा था।देश के पहले गृहमंत्रीदेश को आजादी मिलने के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद 562 रियासतों को देश को अखंड भारत बनाया था।मृत्युवहीं 15 दिसंबर 1950 को 75 साल की उम्र में सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 15 Dec 2025 17:49:59 +0530</pubDate>
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<title>Siddharth Shukla Birth Anniversary: एक्टर नहीं बिजनेसमैन बनना चाहते थे सिद्धार्थ शुक्ला, फिर ऐसे बने वर्ल्ड बेस्ट मॉडल</title>
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<description><![CDATA[ &#039;बिग बॉस 13&#039; के विनर रह चुके मशहूर अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला का 12 दिसंबर को जन्म हुआ था। सिद्धार्थ शुक्ला मनोरंजन जगत का एक चमचमाता चेहरा थे, जो अब सिर्फ एक याद बनकर रह गए हैं। सिद्धार्थ शुक्ला एक ऐसे अभिनेता थे, जो अपने एक्टिंग के साथ-साथ चार्म से लोगों के दिलों पर राज करते थे। लेकिन सिद्धार्थ का यूं अचानक चले जाना उनके फैंस के लिए एक गहरा झटका था। सिद्धार्थ शुक्ला सिर्फ टीवी का फेमस चेहरा नहीं थे, बल्कि उन्होंने फिल्म &#039;हम्पटी शर्मा की दुल्हनियां&#039; में भी काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र में 12 दिसंबर 1980 को सिद्धार्थ शुक्ला का जन्म हुआ था। वह एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता सिविल इंजीनियर थे जोकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी रैंक पर काम करते थे। वहीं सिद्धार्थ कभी भी एक्टिंग या मॉडलिंग की दुनिया में कदम नहीं रखना चाहते थे, बल्कि वह एक बिजनेसमैन बनना चाहते थे। लेकिन साल 2004 में मां रीता शुक्ला के कहने पर सिद्धार्थ ने एक मॉडलिंग कॉम्पटीशन में भाग लिया। यहां पर सिद्धार्थ के लुक्स पर जूरी ने उनको चुन लिया और इसके बाद अभिनेता के करियर ने एक अलग टर्न लिया। इसे भी पढ़ें: Pandit Ravi Shankar Death Anniversary: पंडित रविशंकर ने शास्त्रीय संगीत को दिलाई दुनियाभर में पहचान, विवादों से भरी रही जिंदगीएक्टिंग करियरसिद्धार्थ शुक्ला का लुक जूरी को इतना ज्यादा पसंद आया कि वह मॉडलिंग कॉम्पटीशन को जीत गए। इसके बाद अभिनेता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिर साल 2008 में उन्होंने तुर्की में होने वाले दुनिया के सबसे बड़े मॉडलिंग शो का हिस्सा बने और यहां पर भी जीतकर सिद्धार्थ ने देश का नाम रोशन किया।मॉडलिंग के बाद सिद्धार्थ ने पहला एड एक फेयरनेस क्रीम का किया। फिर उन्होंने टीवी शो &#039;बाबुल का आंगन छूटे ना&#039; में लीड रोल में काम किया। इस शो से उनको कुछ खास पहचान नहीं मिली। लेकिन फिर फेमस शो &#039;बालिका वधू&#039; में शिव का किरदार निभाकर सिद्धार्थ शुक्ला घर-घर में फेमस हो गए। इसके बाद अभिनेता &#039;दिल से दिल तक&#039; नाम के इस शो में रश्मि देसाई के साथ नजर आए। फिर वह &#039;खतरों के खिलाड़ी&#039; में नजर आए और इस ट्रॉफी को अपने नाम किया।इसके बाद दर्शकों को &#039;झलक दिखला जा 6&#039; में सिद्धार्थ की डांसिंग स्किल्स देखने को मिलीं। वहीं शो के 11वें हफ्ते में वह एलिमिनेट हो गए। फिर अभिनेता ने कॉमेडियन भारती सिंह के साथ फेमस रियलिटी शो &#039;इंडियाज गॉट टैलेंट&#039; के कुछ सीजन की मेजबानी की। फिर अभिनेता करण जौहर की फिल्म &#039;हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया&#039; में नजर आए। इस फिल्म में सिद्धार्थ शुक्ला ने एनआरआई अंगद बेदी का किरदार निभाया था।टीवी और ओटीटी पर छाएटीवी शो के बाद सिद्धार्थ शुक्ला सबसे फेमस रियलिटी शो &#039;बिग बॉस 13&#039; में नजर आए। एक ओर जहां यह सीजन सबसे ज्यादा फेमस हुआ, तो वहीं दूसरी ओर सिद्धार्थ ने इस शो की ट्रॉफी जीती और उनके करियर ने एक और रफ्तार पकड़ी। इसके बाद अभिनेता कई एल्बम गानों और वेब सीरीज में नजर आए। अभिनेता ने सोनिया राठी के साथ रोमांस वेब सीरीज़ &#039;ब्रोकन बट ब्यूटीफुल&#039; के तीसरे सीज़न में डिजिटल डेब्यू किया। वहीं सिद्धार्थ शुक्ला आखिरी बार पर्दे पर &#039;बिग बॉस ओटीटी&#039; और &#039;डांस दीवाने 3&#039; में एक्ट्रेस शहनाज गिल के साथ नजर आए थे।मृत्युवहीं 02 सितंबर 2021 को 40 साल की उम्र में मुंबई में हार्ट अटैक के कारण सिद्धार्थ शुक्ला का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 13 Dec 2025 13:44:00 +0530</pubDate>
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<title>Gopinath Munde Birth Anniversary: महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज नेता थे गोपीनाथ मुंडे, ऐसा रहा सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे का 12 दिसंबर को जन्म हुआ था। गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज नेता थे। बीड़ में पड़ने वाले सूखे और किसानों की समस्याओं ने गोपीनाथ मुंडे को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया था। गोपीनाथ मुंडे ने महाराष्ट्र में न सिर्फ बीजेपी को पुनर्जीवित किया था, बल्कि पार्टी को ओबीसी समुदाय का चेहरा भी दिया था। जब भी महाराष्ट्र की राजनीति की चर्चा होती है, तो वह गोपीनाथ मुंडे के बिना अधूरी है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में लाने का श्रेय गोपीनाथ पांडुरंग मुंडे को जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गोपीनाथ पांडुरंग मुंडे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के परली में 12 दिसंबर 1949 को गोपीनाथ मुंडे का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम पांडुरंग राव मुंडे था और मां का नाम लिंबाबाई मुंडे था। यह अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। गोपीनाथ मुंडे ने गांव के स्कूल से शुरूआती शिक्षा ली थी। फिर उन्होंने आईएलएस कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई की।इसे भी पढ़ें: Pranab Mukherjee Birth Anniversary: देश के 13वें राष्ट्रपति थे प्रणब मुखर्जी, कभी पत्रकार के रूप में शुरू किया था करियरसियासी सफरगोपीनाथ मुंडे ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत प्रमोद महाजन के साथ की थी। फिर साल 1980 से 1985 और 1990 से लेकर 2009 तक महाराष्ट्र विधानसभा के पांच सत्र के सदस्य थे। साल 2009 और 2014 में गोपीनाथ मुंडे को लोकसभा के लिए चुना गया। भारतीय इतिहास में गोपीनाथ पांडुरंग मुंडे सबसे कम समय के लिये कैबिनेट मंत्री थे। उनके परिवार में गोपीनाथ मुंडे की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान गोपीनाथ मुंडे को जेल में डाल दिया गया था।गोपीनाथ मुंडे वह 1995-1999 तक महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रहे। मुंडे 15वीं लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के उपनेता थे। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में गोपीनाथ मुंडे ने बीड सीट से जीत हासिल की थी। फिर वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के महासचिव भी रहे। इसके अलावा गोपीनाथ मुंडे 15वीं लोकसभा में रसायन और उर्वरक संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष थे। फिर 16वीं लोकसभा के लिए संपन्न हुए चुनाव में मुंडे ने फिर बीड सीट से जीत हासिल की। इसके बाद पीएम मोदी ने उनको अपनी कैबिनेट में ग्रामीण विकास मंत्री बनाकर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी।मृत्युवहीं 09 अक्तूबर 2018 को 65 साल की उम्र में एक सड़क हादसे में गोपीनाथ पांडुरंग मुंडे का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 13 Dec 2025 13:43:59 +0530</pubDate>
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<title>Manohar Parrikar Birth Anniversary: गोवा में BJP के संकटमोचन थे मनोहर पर्रिकर, 4 बार संभाली राज्य की कमान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 13 दिसंबर को गोवा के पूर्व सीएम मनोहर पर्रिकर का जन्म हुआ था। उनके हिस्से में कई ऐसे काम आए, जो उनसे पहले किसी ने नहीं किए होंगे। बता दें कि मनोहर पर्रिकर से पहले गोवा से केंद्र सरकार में कोई कैबिनेट मंत्री नहीं बना था। वह पहले ऐसे गोवानी नेता थे। जो मोदी सरकार की कैबिनेट में शामिल होकर रक्षा मंत्री के पद पर रहे। परिकर का बचपन से ही राजनिति में रुझान अधिक था। पर्रिकर को गोवा में भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा संकटमोचन कहा जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मनोहर पर्रिकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगोवा के पास मापुसा में 13 दिसंबर 1955 को मनोहर पर्रिकर का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर स्थानीय लॉयोला हाई स्कूल में पढ़ाई की। फिर उन्होंने आईआईटी मुंबई में बीटेक में एडमिशन लिया। वहीं साल 1978 में आईआईटी मुंबई से एमटेक किया। फिर वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए।इसे भी पढ़ें: Gopinath Munde Birth Anniversary: महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज नेता थे गोपीनाथ मुंडे, ऐसा रहा सियासी सफरउत्तरी गोवा के प्रमुख संगठनकर्ताआरएसएस से जुड़ने के बाद संघ ने पर्रिकर की प्रतिभा को सम्मान दिया और महज 26 साल की उम्र में संघ ने उनको बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। फिर रामजन्मभूमि आंदोलन के समय वह उत्तरी गोवा में प्रमुख संगठनकर्ता थे। इसके बाद 39 साल की उम्र में वह गोवा विधानसभा में पहली बार बतौर बीजेपी विधायक चुनकर पहुंचे। इसके बाद मनोहर पर्रिकर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।सियासी सफरपहली बार विधायक बनने के 5 साल बाद वह गोवा विधानसभा में नेता विपक्ष बन गए। फिर 5 साल बाद अक्तूबर 2000 में गोवा में बीजेपी की सरकार बनी तब मनोहर पर्रिकर 45 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने। मनोहर पर्रिकर के नाम देश का पहला ऐसा मुख्यमंत्री बनने का गौरव रहा, जो आईआईटी से बीटेक और एमटेक कर चुका हो।साल 2000 में गोवा विधानसभा चुनाव में पर्रिकर की अगुवाई में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और वह दूसरी बाद राज्य के सीएम बने। फिर साल 2005 में उनको राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके 4 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। इससे पर्रिकर की सरकार अल्पमत में आ गई और गिर गई। फिर 2012 में असेंबली चुनाव में पार्टी ने 40 में से 24 सीटों पर जीत हासिल की और तीसरी बार पर्रिकर राज्य के सीएम बने।वहीं साल 2014 में जब केंद्र में मोदी सरकार बनी, तो नवंबर 2014 में पर्रिकर को नई जिम्मेदारी सौंपी गई और वह रक्षा मंत्री बने। पर्रिकर के कार्यकाल में कई रक्षा सौदों को मंजूरी मिली। साल 2017 में गोवा विधानसभा चुनाव में मनोहर पर्रिकर ने फिर से गोवा की कमान संभाली।मृत्युवहीं कैंसर से लंबी लड़ाई लड़ते हुए मनोहर पर्रिकर ने 17 मार्च 2019 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 13 Dec 2025 13:43:56 +0530</pubDate>
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<title>Ramanand Sagar Death Anniversary: ट्रक क्लीनर और चपरासी की नौकरी करते थे रामानंद सागर, फिर बना डाला सबसे बड़ा मायथोलॉजिकल शो</title>
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<description><![CDATA[ मायथोलॉजिकल शो में रामानंद सागर के &#039;रामायण&#039; सीरियल को काफी पसंद किया गया था। आज भी लोग इस सीरियल को देखना पसंद करते हैं। वहीं रामानंद सागर डायरेक्टर होने के साथ स्क्रिप्ट राइटर, उम्दा लेखक, डायलॉग राइटर और प्रोड्यूसर भी थे। आज ही के दिन यानी की 12 दिसंबर को रामानंद सागर का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर रामानंद सागर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के लाहौर में 29 दिसंबर 1917 को रामानंद सागर का जन्म हुआ था। रामानंद सागर का असली नाम चंद्रमौली चोपड़ा था। देश के बंटवारे के बाद रामानंद का परिवार भारत आ गया और उस समय उनके परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी। परिवार की आर्थिक मदद के लिए रामानंद ने कम उम्र से काम करना शुरूकर दिया था। बताया जाता है कि वह ट्रक क्लीनर और चपरासी की नौकरी करते थे।इसे भी पढ़ें: Siddharth Shukla Birth Anniversary: एक्टर नहीं बिजनेसमैन बनना चाहते थे सिद्धार्थ शुक्ला, फिर ऐसे बने वर्ल्ड बेस्ट मॉडलमुंबई में चमकी किस्मतमुंबई आकर रामानंद सागर ने बतौर राइटर अपने करियर की शुरूआत की। वह कहानी और स्क्रीन प्ले लिखा करते थे। जल्द ही वह कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने लगे। साल 1950 में रामानंद सागर ने &#039;सागर आर्ट कॉरपोरेशन प्रोडक्शन&#039; कंपनी की शुरूआत की। वहीं 25 जनवरी 1987 को इस प्रोडक्शन कंपनी के बैनर तले &#039;रामायण&#039; शो शुरू हुआ। यह सीरियल साल 1988 तक चला। इस शो को दूरदर्शन पर 45 मिनट्स तक टेलीकास्ट किया जाता था। वहीं बाकी सीरियल्स को 30 मिनट का स्लॉट मिला था।माना जाता है कि रामानंद सागर की रामायण जब टेलीकास्ट होती थी, तो सड़कों पर कर्फ्यू जैसा माहौल हो जाता था। राम और सीता के रोल में अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया को आज भी उसी रूप में याद किया जाता है। माइथोलॉजिकल सीरियल के तौर पर रामानंद सागर की रामायण का नाम सबसे ज्यादा देखे जाने वाले लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल है।फिल्ममेकर बनकर कमाया नामरामानंद सागर ने अभिनेता राजकपूर की हिट फिल्म &#039;बरसात&#039; की कहानी लिखी थी। उन्होंने कई फिल्मों का डायरेक्शन किया था। रामानंद सागर की निर्देशित फिल्म में धर्मेंद्र और माला सिन्हा स्टारर &#039;आंखें&#039; है। यह एक ब्लॉकबस्टर फिल्म है। इसके लिए रामानंद सागर को बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था।मृत्युवहीं 12 दिसंबर 2005 को रामानंद सागर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 13 Dec 2025 13:43:56 +0530</pubDate>
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<title>Arvind Singh Mewar Birth Anniversary: उदयपुर में डेस्टिनेशन वेडिंग के जनक कहे जाते हैं अरविंद सिंह मेवाड़, पर्यटन को दिलाई नई पहचान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 13 दिसंबर को महाराणा प्रताप के वंशज अरविंद सिंह मेवाड़ का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी जीवन काल में उदयपुर के लिए कई ऐसे काम किए हैं, जिनमें से एक डेस्टिनेशन वेडिंग का ट्रेंड है। उदयपुर की जल संकट का समाधान करने में देवास द्वितीय परियोजना अहम भूमिका निभाई थी। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही उन्होंने मेवाड़ के पर्यटन को मजबूती देने में अहम योगदान दिया। अरविंद सिंह मेवाड़ कला-साहित्य, खेल और संगीत के भी कद्रदान थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अरविंद सिंह मेवाड़ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारराजस्थान के उदयपुर में 13 दिसंबर 1944 को अरविंद सिंह मेवाड़ का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम उदयपुर के पूर्व महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ और मां का नाम सुशीला कुमारी मेवाड़ था। अरविंद सिंह मेवाड़ ने मेवाड़ की संस्कृति और परंपरा को जिंदा रखने का काम किया। उन्होंने अजमेर के मेयो कॉलेज से अपनी शुरूआती पढ़ाई की। फिर उदयपुर में महाराणा भूपाल कॉलेज से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया। फिर UK के सेंट एल्बंस मेट्रोपॉलिटन कॉलेज से होटल मैनेजमेंट की डिग्री प्राप्त की।इसे भी पढ़ें: Manohar Parrikar Birth Anniversary: गोवा में BJP के संकटमोचन थे मनोहर पर्रिकर, 4 बार संभाली राज्य की कमानअचीवमेंट्सबता दें कि अरविंद सिंह मेवाड़ ने अमेरिका में कुछ समय तक नौकरी भी की। फिर वह एचआरएच ग्रुप ऑफ होटल्स के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक थे। इसके अलावा वह महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन ट्रस्ट, राजमाता गुलाब कुंवर चेरिटेबल ट्रस्ट और महाराणा मेवाड़ ऐतिहासिक प्रकाश ट्रस्ट के अध्यक्ष थे।डेस्टिनेशन वेडिंग के जनकआज जिस उदयपुर में डेस्टिनेशन वेडिंग हो रही है, उसके जनक अरविंद सिंह मेवाड़ माने जाते हैं। बताया जाता है कि उदयपुर में डेस्टिनेशन वेडिंग शुरू कराने के लिए काफी मेहनत की, तब जाकर आज देश-दुनिया के सेलेब्स यहां पर शादी करने के लिए आते हैं। इस वजह से आज उदयपुर का ट्रैवल मार्केट करोड़ों की कमाई करता है।शानदार कारइसके साथ ही अरविंद सिंह मेवाड़ के पास कई शानदार विंटेज कार थीं। साल 1946 में उनके पास लाल रंग की MG TC कार थी। वह हर दिन उस कार से सैर-सपाटा करने के लिए निकलते थे। उनको इस कार से बेहद लगाव था। माना जाता है कि वह इस कार के साथ काफी वक्त बिताते थे।मृत्युलंबी बीमारी के बाद 16 मार्च 2025 को 81 साल की उम्र में अरविंद सिंह मेवाड़ का सिटी पैलेस उदयपुर में निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 13 Dec 2025 13:43:54 +0530</pubDate>
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<title>Pandit Ravi Shankar Death Anniversary: पंडित रविशंकर ने शास्त्रीय संगीत को दिलाई दुनियाभर में पहचान, विवादों से भरी रही जिंदगी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 11 दिसंबर को सितार वादक पंडित रवि शंकर का निधन हो गया था। पंडित रवि शंकर ने भारतीय संगीत को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाया था। भले ही आज पंडित रवि शंकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संगीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच सुना जाता है। उन्होंने महज 18 साल की उम्र से सितार सीखना शुरूकर दिया था। फिर इस विधा में देश-विदेश में पंडित रविशंकर ने भारत का नाम रोशन किया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर रवि शंकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के वाराणसी में 07 अप्रैल 1920 को पंडित रवि शंकर का जन्म हुआ था। वह अपने 7 भाइयों में सबसे छोटे थे। शुरूआत में रवि शंकर का झुकाव नृत्य की ओर रहा। लेकिन 18 साल की उम्र में सितार सीखना शुरू किया था।इसे भी पढ़ें: Dev Anand Death Anniversary: बॉलीवुड के पहले फैशन आइकॉन थे देव आनंद, पेश किया था रोमांस का नया अंदाजभारत का पहला अंतरराष्ट्रीय संगीतज्ञपंडित रवि शंकर अपनी युवावस्था अपने भाई उदय की नृत्य मंडली के सदस्य के रूप में भारत और यूरोप में प्रदर्शन करते हुए बिताया। इस कारण से उनको भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय संगीतज्ञ कहा जाता है। पंडित रवि शंकर ने सितार को भारत से निकालकर विश्व मंच पर पहुंचाया और पहचान दिलाई। साल 1938 में प्रसिद्ध दरबारी संगीतकार उस्ताद अलाउद्दीन खान से सितार वादन सीखने के लिए पंडित रविशंकर ने नृत्य छोड़ दिया।फिल्मों में दिया संगीतसाल 1944 में पढ़ाई पूरी करने के बाद पंडित रविशंकर ने संगीतकार के रूप में सत्यजीत रे के &#039;अपू ट्रिलॉजी&#039; और रिचर्ड एटनबर्ग के &#039;गांधी&#039; के लिए संगीत दिया। सर्वश्रेष्ठ मौलिक स्वरलिपि के लिए साल 1983 में उनको जॉर्ज फेंटन के साथ ऑस्कर से नवाजा गया। फिर साल 1949 से लेकर 1956 के बीच उन्होंने नई दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो के संगीत निदेशक के तौर पर भी काम किया। फिर साल 1960 के दशक में वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन और जॉर्ज हैरीसन के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा और प्रस्तुति देकर इसको लोकप्रिय बनाया।सांसद रहे पंडित रविशंकरसाल 1986 से लेकर 1992 तक पंडित रविशंकर राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। साल 1999 में उनको देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उनको तीन ग्रैमी अवॉर्ड मिल चुके हैं। उनको साल 2013 के जर्मनी अवॉर्ड के लिए भी नामित किया गया था। साल 2000 तक पंडित रविशंकर लगातार प्रस्तुति देते रहे। पंडित रविशंकर ने कई बार अपनी बेटी अनुष्का शंकर के साथ प्रस्तुति दी।मृत्युवहीं अमेरिका के सैन डिएगो में 11 दिसंबर 2012 को 92 साल की उम्र में पंडित रविशंकर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 12 Dec 2025 00:07:57 +0530</pubDate>
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<title>Pranab Mukherjee Birth Anniversary: देश के 13वें राष्ट्रपति थे प्रणब मुखर्जी, कभी पत्रकार के रूप में शुरू किया था करियर</title>
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<description><![CDATA[ भारत के 13वें राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी का आज ही के दिन यानी की 11 दिसंबर को जन्म हुआ था। बता दें कि प्रणब मुखर्जी को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपना दाहिना हाथ मानती थीं। इंदिरा गांधी के न रहने पर वह बड़ी बैठकों की अध्यक्षता करते थे। भारतीय राजनीति में प्रणब मुखर्जी का अहम योगदान रहा था। उन्होंने सिर्फ राष्ट्रपति पद नहीं बल्कि विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर प्रणब मुखर्जी को जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मिराती गांव में 11 दिसंबर 1935 को प्रणब मुखर्जी का जन्म हुआ था। पूरा देश उनको प्रणब दा का नाम से पुकारता था। इनके बचपन का नाम पोल्टू था। इनके पिता का नाम कामदा किंकर मुखर्जी और मां का नाम राजलक्ष्मी मुखर्जी था। साल 1963 में वह विद्यानगर कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर बन गए। फिर उन्होंने पत्रकार के रूप में अपना करियर शुरू किया।इसे भी पढ़ें: Manohar Joshi Birth Anniversary: महाराष्ट्र की राजनीति का &#039;सभ्य चेहरा&#039; थे मनोहर जोशी, RSS से शुरू किया था सियासी सफरराजनीतिक सफरसाल 1969 का साल प्रणब मुखर्जी के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। प्रणब की काबिलियत को देखते हुए इंदिरा गांधी ने उनको राज्यसभा भेजा। प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी के सबसे खास सिपहसालारों में से एक हो गए। फिर साल 1973 में इंदिरा ने उनको अपनी कैबिनेट में शामिल किया और वह औद्योगिक विकास विभाक के उपमंत्री थे। पार्टी में उनका कद बढ़ता जा रहा था। वहीं एक समय ऐसा भी आया जब इंदिरा सरकार में प्रणब मुखर्जी नंबर दो हो गए थे। उनकी काबिलियित और बौद्धिक स्तर को देखते हुए इंदिरा ने लिखित आदेश तक जारी कर दिया था कि उनकी गैरमौजूदगी में प्रणब मुखर्जी कैबिनेट मीटिंग की अगुवाई करेंगे।वित्त मंत्रीसाल 1982 से लेकर 1984 तक प्रणब मुखर्जी ने कई कैबिनेट पद संभाले। फिर साल 1982 में वह भारत के वित्त मंत्री बने। इस दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ से 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर के लोन के लिए बात की। फिर लोन के एक तिहाई हिस्से को बिना इस्तेमाल के वापस किया। भारत के इस कदम से पूरी दुनिया हैरान रह गई। प्रणब के वित्तीय प्रबंधन की तारीफ अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के वित्त मंत्री डोनाल्ड रीगन ने भी की थी।13 नंबर से खास कनेक्शनप्रणब मुखर्जी के जीवन में 13 नंबर का एक अलग ही रोल रहा है। वह 15 जून, 2012 को देश के राष्ट्रपति बने थे और वह भारत के 13वें राष्ट्रपति बने। दिल्ली में उनका जो बंगला था, उसका नंबर भी 13 था। इसके अलावा प्रणब दा की शादी की सालगिरह भी 13 तारीख को होती थी।मृत्युवहीं 31 अगस्त 2020 को 84 साल की उम्र में प्रणब मुखर्जी का दिल्ली में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 12 Dec 2025 00:07:56 +0530</pubDate>
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<title>C Rajagopalachari Birth Anniversary: आजाद भारत के पहले गर्वनर जनरल थे सी राजगोपालाचारी, राजनीति में थी गहरी पैठ</title>
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<description><![CDATA[ आजाद भारत के पहले गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का आज ही के दिन यानी की 10 दिसंबर को जन्म हुआ था। जवाहर लाल नेहरू उनको पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। सी राजगोपालाचारी एक वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे। बता दें कि उनको राजनीति में लाने का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है। हालांकि सी राजगोपालाचारी पहले नेहरू के काफी करीबी थे, लेकिन बाद में दोनों में अनबन हो गई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सी राजगोपालाचारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के कृष्णागिरी जिले में 10 दिसंबर 1972 को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म हुआ था। इनको आमतौर पर राजाजी के नाम से जाना जाता था। वह पढ़ाई में जीनियस थे और लगातार फर्स्ट डिवीजन पास होते रहे। इनके पिता तमिलनाडु के सेलम के न्यायालय के न्यायाधीश थे।इसे भी पढ़ें: BR Ambedkar Death Anniversary: संविधान निर्माता थे डॉ भीमराव आंबेडकर, देशसेवा की छोड़ी अनूठी छापछोड़ दी थी वकालतसी राजगोपालाचारी की वकालत में यह स्थिति थी कि वह सेलम में कार खरीदने वाले पहले वकील थे। फिर महात्मा गांधी के छुआछूत आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम एकता कार्यक्रमों में सी राजगोपालाचारी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया था। साल 1937 में हुए चुनावों के बाद राजाजी मद्रास के प्रधानमंत्री बने। फिर जब वायसराय ने साल 1939 में एक तरफा निर्णय लेकर भारत को सेकेंड वर्ल्ड वॉर में धकेल दिया तो सी राजगोपालाचारी ने विरोध स्वरूप अपना इस्तीफा पेश कर दिया।गांधीजी और कांग्रेस से मतभेदकांग्रेस के साथ आने के बाद राजगोपालाचारी ने आंदोलनों में शिरकत लेना शुरूकर दिया था। जल्द ही वह देश की राजनीति और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शामिल हो गए थे। भले ही महात्मा गांधी उनसे राय लेते थे, लेकिन इसके बाद भी दोनों के बीच कई बार मतभेद की स्थितियां बनीं। वहीं कई बार सी राजगोपालाचारी खुले तौर पर कांग्रेस के विरोध में खड़े मिलते। लेकिन वह कोई भी काम अकारण नहीं करते थे।नेहरू और कांग्रेस की नीतियों से खुश नहीं थे राजगोपालाचारीसाल 1946 में देश की अंतरिम सरकार में सी राजगोपालाचारी को केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया। फिर देश के आजाद होने के बाद वह बंगाल के राज्यपाल बने। इसके बाद वह स्वतंत्र भारत के पहले &#039;गवर्नर जनरल&#039; बने। जब पंडित नेहरू उनको देश का पहला राष्ट्रपति नहीं बना सके, तो साल 1950 में सी राजगोपालाचारी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में लिया गया। साल 1952 के आम चुनावों में वह लोकसभा सदस्य बने और मद्रास के सीएम निर्वाचित हुए। हालांकि कुछ साल बाद सी राजगोपालाचारी ने नेहरू और कांग्रेस से नाखुश होकर मुख्यमंत्री पद और कांग्रेस दोनों को छोड़ दिया।सी राजगोपालाचारी को कांग्रेस और तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू के वामपंथी समाजवाद की ओर झुकाव को लेकर ऐतराज था। राजगोपालाचारी का मानना था कि इस झुकाव से कांग्रेस को नुकसान होगा। इसी मतभेद के कारण राजगोपालाचारी कांग्रेस से अलग होकर 04 जून 1959 को नई राष्ट्रवादी पार्टी स्वतंत्र पार्टी का गठन किया।तेजी से उभरी और तेजी से खत्म हुई पार्टीइस पार्टी का नाम स्वतंत्र पार्टी था। 61 साल पहले बनी इस पार्टी ने मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाई थी। लेकिन जिस तेजी और रफ्तार के साथ पार्टी उभरी थी, सिर्फ 15 सालों बाद उसी झटके के साथ यह पार्टी खत्म भी हो गई।पुरस्कारसाल 1952 में सी राजगोपालाचारी को &#039;भारत रत्न&#039; से सम्मानित किया गया था। वह विद्वान और अद्भुत लेखन प्रतिभा के धनी थे।मृत्युवहीं 28 दिसंबर 1972 को चेन्नई में सी राजगोपालाचारी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 11 Dec 2025 09:44:38 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Rajagopalachari, Birth, Anniversary:, आजाद, भारत, के, पहले, गर्वनर, जनरल, थे, सी, राजगोपालाचारी, राजनीति, में, थी, गहरी, पैठ</media:keywords>
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<title>BR Ambedkar Death Anniversary: संविधान निर्माता थे डॉ भीमराव आंबेडकर, देशसेवा की छोड़ी अनूठी छाप</title>
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<description><![CDATA[ अर्थशास्त्री, वकील, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक डॉ भीमराव आंबेडकर का आज ही के दिन यानी की 06 दिसंबर को निधन हो गया था। डॉ आंबेडकर ने जीवन भर समाज में अनुसूचित वर्ग को समानता दिलाने के लिए संघर्ष किया था। उनको बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के नाम से भी जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ भीमराव आंबेडकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमध्यप्रदेश के महू छावनी में 14 अप्रैल 1891 को डॉ भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम भिवा था। इनके पिता का नाम रामजी मलोजी सकपाल और मां का नाम भीमाबाई मुरबादकर था। आंबेडकर अपने माता-पिता की आखिरी और 14वीं संतान थे।इसे भी पढ़ें: Amrita Shergil Death Anniversary: देश की सबसे महंगी चित्रकार थीं अमृता शेरगिल, विवादों से था पुराना नाताशिक्षा
आंबेडकर की शुरूआत शिक्षा सतारा से हुई। फिर साल 1907 में उन्होंने 10वीं पास किया और स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए बॉम्बे के एल्फिन्स्टन कॉलेज जाने का मौका मिला। फिर साल 1912 में उन्होंने अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान की डिग्री प्राप्त की। फिर साल 1916 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी अमेरिका से उन्होंने पीएचडी की उपाधि मिली।दलित समाज के लिए किया संघर्षदलित समाज के लिए बाबासाहेब ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाए। आंबेडकर को बचपन में ही छुआछूत का सामना करना पड़ा था। उनको स्कूल में एक कोने में अकेले बैठना पड़ा। वह जिस बोरे पर बैठते थे, उस बोरे को स्कूल की सफाई करने वाला नौकर भी नहीं छूता था। क्योंकि आंबेडकर दलित समाज से आते थे और दलित लोग अछूत माने जाते थे।जब भीमराव आंबेडकर मुंबई में सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक में प्रोफेसर बनें। तो वहां पर भी उनको भेदभाव का सामना करना पड़ा। डॉ आंबेडकर ने समाज में फैली छुआछूत जैसे कुरीतियों को मिटाने के लिए अथक प्रयास किया।संविधान के मसौदा समिति के अध्यक्ष बनेअगस्त 1947 में डॉ भीमराव आंबेडकर को भारत के संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। संविधान को तैयार करने में उनको 2 साल 11 महीने और 17 दिन का समय लगा। साल 1952 में आंबेडकर को राज्यसभा के लिए नियुक्त किया गया। इसके अलावा उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। डॉ आंबेडकर द्वारा लिखी आखिरी किताब &#039;द बुद्ध एंड हिज धम्म&#039; थी।मृत्युवहीं 06 दिसंबर 1956 को डॉ भीमराव आंबेडकर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 08 Dec 2025 21:51:47 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>IK Gujral Birth Anniversary: संयोग से देश के 12वें PM बने थे इंद्र कुमार गुजराल, ऐसा था राजनीतिक सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 04 दिसंबर को दिग्गज राजनेता और पूर्व पीएम इंद्र कुमार गुजराल का जन्म हुआ था। इन्होंने स्वयं 12 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने लगे थे। फिर साल 1931 में ब्रिटिश पुलिस ने इंद्र कुमार गुजराल को गिरफ्तार कर लिया था। एच डी देवगौड़ा के बाद इंद्र कुमार गुजराल देश के अगले प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन गुजराल भी अधिक समय तक प्रधानमंत्री के पद को सुशोभित नहीं कर सके। वह करीब 1 साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम इंद्र कुमार गुजराल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 04 दिसंबर 1919 में इंद्र कुमार गुजराल का जन्म हुआ था। बाद में गुजराल का पूरा परिवार भारत आ गया था। इसके बाद उनके माता-पिता स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने पंजाब के संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। गुजराल ने बी.कॉम, एम.ए, पीएचडी और डी.लिट की उपाधियां प्राप्त कीं। वह धारा प्रवाह उर्दू बोलते हैं और उर्दू काव्य में भी योगदान रहा।इसे भी पढ़ें: Manohar Joshi Birth Anniversary: महाराष्ट्र की राजनीति का &#039;सभ्य चेहरा&#039; थे मनोहर जोशी, RSS से शुरू किया था सियासी सफरराजनीतिक सफरप्रधानमंत्री पद पर पहुंचने से पहले गुजराल को केंद्र में राज्यमंत्री के रूप में विभिन्न मंत्रालयों को संभालने का मौका मिला। उन्होंने संचार और संसदीय कार्य मंत्रालय, सड़क और भवन मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और योजना एवं विदेश मंत्रालय के कार्य भी सम्भाले थे। फिर बाद में इंद्र कुमार गुजराल ने राजनायिक के रूप में इंदिरा गांधी को अपनी सेवाएं प्रदान की थीं। इंद्र कुमार गुजराल कांग्रेस पार्टी के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे।वहीं इंद्र कुमार गुजराल की योग्यता के हिसाब से उनको कांग्रेस पार्टी में सम्मान प्राप्त हुआ था। लेकिन इंदिरा गांधी के जीवन रहते इनको पार्टी की उपेक्षा का भी शिकार होना पड़ा था। साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनें, तो स्थितियां इंद्र कुमार गुजराल के प्रतिकूल हो गईं। क्योंकि राजीव गांधी का झुकाव युवाओं की तरफ ज्यादा था। गुजराल को लगा कि पार्टी में उनके लिए कोई स्थान नहीं रह गया है, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़कर जनता दल का दामन थाम लिया।विभिन्न उपलब्धियांइंद्र कुमार गुजराल एक सक्षम, योग्य और अनुभवी राजनीतिज्ञ थे। वह मास्को में भी भारत के राजदूत रह चुके हैं। कांग्रेस पार्टी में गुजराल की छवि योग्य और ईमानदार व्यक्ति की थी। लेकिन राजनीतिज्ञों ने गुजराल के पीएम बनते ही यह कहना शुरूकर दिया था कि वह अधिक समय तक पीएम पद पर नहीं रहेंगे। क्योंकि कांग्रेस लंबे समय तक फील्डिंग नहीं करना चाहेगी। वहीं 21 अप्रैल 1997 से लेकर 19 मार्च 1998 तक इंद्र कुमार गुजराल भारत के पीएम पर रहे। क्योंकि कांग्रेस ने NDA से अपना समर्थन वापस ले लिया। विदेश नीति के विशेषज्ञइंद्र कुमार गुजराल विदेश नीति के विशेषज्ञ थे, इस वजह से उन्होंने पाकिस्तान से संबंधों को सुधारने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए। गुजराल के कार्यकाल में वित्तीय संकट था और आर्थिक विकास दर गिरावट की तरफ अग्रसर थी। ऐसे में इंद्र कुमार गुजराल ने आर्थिक विकास के लिए सकारात्मक योजनाएं बनाईं। लेकिन देश में पड़े अकाल ने अर्थव्यवस्था का गणित ज्यादा बिगाड़ दिया और फिर वह अधिक समय तक पीएम नहीं रहे। निधनवहीं 30 नवंबर 2012 को पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल का 92 साल की उम्र में निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 05 Dec 2025 16:38:03 +0530</pubDate>
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<title>Nelson Mandela Death Anniversary: दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे नेल्सन मंडेला, रंगभेद के खिलाफ लड़ी थी लंबी लड़ाई</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 दिसंबर को नेल्सन मंडेला का निधन हो गया था। उन्होंने रंगभेद के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। नेल्सन मंडेला ने करीब 27 साल जेल में बिताए थे। वहीं काले और गोरे के फर्क को मिटाया। वह एक ऐसे गैर भारतीय थे, जिनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। वहीं उनको शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की जगह लोकतांत्रिक सरकार बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया था। इसके अलावा वह दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके नेल्सन मंडेला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों में बारे में...जन्म और परिवारदक्षिण अफ्रीका में 18 जुलाई 1918 को नेल्सन मंडेला का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम नेल्सन रोलीह्वला मंडेला था। इनको मदीबा के नाम से भी जाना जाता है। इनके एक शिक्षक ने इनके नाम में मंडेला शब्द को शामिल किया गया। मंडेला के पिता की मृत्यु के उनकी उम्र काफी कम थी। इसलिए नेल्सन मंडेला के जीवन में संघर्ष का दौर कम उम्र से शुरू हो गया था।इसे भी पढ़ें: IK Gujral Birth Anniversary: संयोग से देश के 12वें PM बने थे इंद्र कुमार गुजराल, ऐसा था राजनीतिक सफरदेशद्रोह का मुकदमासाल 1944 में नेल्सन मंडेला अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गए। फिर उन्होंने देश में रंगभेद के खिलाफ अपने आंदोलन की शुरूआत की। इस आंदोलन में उन्होंने अपने कई दोस्तों के साथ मिलकर अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग का गठन किया। फिर साल 1947 में मंडेला इस लीग के सचिव चुने गए। लेकिन साल 1961 में मंडेला और उनके कुछ दोस्त के खिलाफ मुकदमा चलाया गया, लेकिन फैसला उनके पक्ष में आया और वह निर्दोष साबित हुए।इसके अलाव नेल्सन मंडेला पर मजदूरों को हड़ताल के लिए उकसाने और बिना अनुमति देश को छोड़ने का आरोप लगाया गया। रंगभेद के खिलाफ अपनी लड़ाई के सफर में उनको साल 1962 से 1990 तक जेल में बिताने पड़े। जेल में रहने और सजा काटने के दौरान मंडेला ने अपनी बायोग्राफी लिखी। जिसका नाम लॉन्ग वॉक टू फ्रीडम था। मंडेला की यह बायोग्राफी साल 1994 में प्रकाशित हुई थी।दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपतिनेल्सन मंडेला ने 27 साल जेल में बिताए। फिर 11 जुलाई 1990 में मंडेला रिहा कर दिए गए। इ सके बाद नेल्सन मंडेला ने नए दक्षिण अफ्रीका की नींव रखी। साल 1994 में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद रहित चुनाव हुए। अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ने 62% मत प्राप्त किए और बहुमत के साथ उसकी सरकार बनी। नेल्सन मंडेला 10 मई 1994 को अपने देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। यह इतिहास रचने के बाद मंडेला सिर्फ दक्षिण अफ्रीका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मंडेला पर रंगभेद का विरोध करने के एक प्रतीक के रूप में भी जाने गए।मृत्युवहीं 05 दिसंबर 2013 को 95 साल की उम्र में फेफड़ों के संक्रमण के कारण नेल्सन मंडेला का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 05 Dec 2025 16:38:02 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sri Aurobindo Death Anniversary: क्रांतिकारी से आध्यात्मिक सुधारक बने थे श्री अरबिंदो, ऐसा रहा उनका जीवन</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय राष्ट्रवादी, दार्शनिक, योगी और कवि श्री अरबिंदो का 05 दिसंबर को निधन हो गया था। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। श्री अरबिंदो पहले भारतीय आजादी की लड़ाई में कूद पड़े, लेकिन फिर बाद में वह पांडिचेरी जाकर योग में डूब गए। उन्होंने अपने आश्रम बनाए और दुनिया को भी योग सिखाया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर श्री अरबिंदों के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में,,,जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 15 अगस्त 1872 को श्री अरबिदों का जन्म हुआ था। वह एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता एक बेहद सफल डॉक्टर थे। ऐसे में उनके पिता ने श्री अरबिंदो को उच्च शिक्षा के लिए 7 साल की उम्र में उनको ब्रिटेन भेज दिया था। वहां पर उन्होंने देश-विदेश का साहित्य पढ़ा और वयस्क होते ही ICS की परीक्षा पास कर ली थी।स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ेबता दें कि युवावस्था में ही श्री अरबिंदो स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए थे। फिर बाद में इनको एक दार्शनिक और योगी के रूप में इनको जाना गया। इनके अनुयायी पूरी दुनिया में हैं। वह हमेशा सादगी पसंद जीवन जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अध्यापन का कार्य किया। श्री अरबिंदो फ्रेंच पढ़ाते थे और साथ में युवाओं को देशप्रेम की शिक्षा देते थे। महर्षि अरबिंदो ने वेद और उपनिषदों पर टीका लिखी।इसे भी पढ़ें: Nelson Mandela Death Anniversary: दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे नेल्सन मंडेला, रंगभेद के खिलाफ लड़ी थी लंबी लड़ाईइसके अलावा श्री अरबिंदो का योग और दर्शन पर अधिक जोर रहा। ब्रिटिश सरकार महर्षि अरबिंदो की लोगों तक पहुंच से इतना अधिक डरे हुए थे कि उनको एक मामले में फंसाकर अलीगढ़ जेल में बंद कर दिया गया था। वह करीब सालभर तक श्री अरबिंदो जेल में बंद रहे और वहीं पर उनका रुझान आध्यात्म की ओर हुआ।वहीं श्री अरबिंदो जेल से छूटने और देश की आजादी के बाद पूरी तरह से आध्यात्म की ओर मुड़ गए। इसके बाद वह पांडिचेरी में दर्शन और योग पढ़ाने लगे और इन्हीं विषयों पर बात करने लगे। माना जाता है कि इसी दौरान श्री अरबिंदो का ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था।जेल से छूटने और आजादी के बाद वे पूरी तरह से आध्यात्म की ओर मुड़ गए. वे पुदुच्चेरी (पांडिचेरी) में योग और दर्शन पढ़ा करते और इन्हीं विषयों पर बात करते. कहा जाता है कि इसी दौरान उनका ईश्वर से साक्षात्कार हुआ।मृत्युवहीं 05 दिसंबर 1950 को पांडिचेरी में श्री अरबिंदो का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 05 Dec 2025 16:38:01 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Amrita Shergil Death Anniversary: देश की सबसे महंगी चित्रकार थीं अमृता शेरगिल, विवादों से था पुराना नाता</title>
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<description><![CDATA[ मशहूर पेंटर रहीं अमृता शेरगिल का आज ही के दिन यानी की 05 दिसंबर को निधन हो गया था। उनकी गिनती 20वीं सदी की भारत की अग्रणी चित्रकारों में होती थी। अपने छोटे जीवनकाल में उन्होंने नायाब कलाकृतियां रची हैं। जिनको अमृता शेरगिल की मौत के बाद भी हाथों-हाथ लिया जाता है। अमृता बला की खूबसूरत थीं और उनका विवादों से भी गहरा नाता था। उनकी पेंटिंग्स की पूरी दुनिया में हजारों मुरीद हैं। जिसके कारण उनकी कलाकृतियों की कीमत करोड़ों रुपयों में आंकी जाती हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अमृता शेरगिल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारहंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में 30 जनवरी 1913 में अमृता शेरगिल का जन्म हुआ था। इनके पिता सिख थे, जबकि उनकी मां हंगेरियन मूल की थीं। अमृता में अच्छे कलाकार बनने के गुण बचपन से ही मौजूद थे। वह बचपन से ही कैनवाल पर हाथ आजमाने लगी थीं। शुरूआत में उनकी रुचि पेंटिंग में नहीं बल्कि संगीत में थी। अमृता को वायलिन और पियानों बजाने का शौक था। जब वह 8 साल की थीं, तो वह शिमला चली गई थीं।इसे भी पढ़ें: Sri Aurobindo Death Anniversary: क्रांतिकारी से आध्यात्मिक सुधारक बने थे श्री अरबिंदो, ऐसा रहा उनका जीवनफ्रांस में सीखी चित्रकारीवहीं 16 साल की उम्र में अमृता शेरगिल अपनी मां के साथ चित्रकारी सीखने के लिए पेरिस गईं। उन्होंने पेरिस में पिएरे वैलंट और लुसिए साइमन जैसे मशहूर कलाकारों और संस्थानों से चित्रकारी सीखी थी। उनकी शुरूआती पेंटिंग्स में यूरोपीय असर साफ दिखता था। साल 1934 में वह भारत लौटी और वतन लौटने के बाद अमृता का रुझान पहाड़ी और मुगल चित्रकारी के प्रति हुआ। अमृता शेरगिल अजंता की गुफाओं की चित्रकारी से काफी ज्यादा प्रभावित थीं।विवादों से रहा गहरा नातासाल 1938 में अमृता शेरगिल ने अपने ममेरे भाई डॉक्टर विक्टर एगन से विवाह किया था। शादी के बाद गोरखपुर के सराया स्थित अपने पैतृक स्थान पर रहने लगीं और पेंटिंग की। बला की खूबसूरत अमृता का विवादों से गहरा नाता रहा। माना जाता है कि उनका कई पुरुषों और महिलाओं से रिश्ता था। इनमें से बहुत सी महिलाओं की अमृता शेरगिल ने पेंटिंग्स भी बनाई थीं। उनकी एक फेमस पेंटिंग &#039;टू वीमेन&#039; अमृता और उनकी प्रेमिका मारी लौइसे की पेंटिंग है। बताया जाता है कि विक्टर और अमृता ने अपनी शादी से पहले कुछ अजीब समझौते किए थे। जिनमें से पहला समझौता यह था कि वह बच्चे नहीं पैदा करेंगे। वहीं दूसरा समझौता यह था कि विवाह के बाद भी अमृता को दूसरे पुरुषों से संबंध बनाने की आजादी होगी। अमृता शेरगिल को स्वभाव से मुंहफट और मिजाज से गुस्सैल कहा जाता था।मृत्युसाल 1941 में अमृता शेरगिल लाहौर चली गई थीं। वहां पर बीमार होने के बाद वह कोमा में चली गईं। वहीं 05 दिसंबर 1941 को कोमा में ही अमृता शेरगिल का निधन हो गया था। हालांकि उनकी मौत का सही कारण तो ज्ञात नहीं है, लेकिन माना जाता है कि उनके निधन का कारण असफल गर्भपात था। अमृता शेरगिल का सिर्फ 28 साल की उम्र में निधन हो गया था। इतने कम समय के बाद भी अमृता शेरगिल ने इतनी नायाब पेंटिंग्स दीं, जो अमृता को अपनी कला में महारत को दर्शाता है। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 05 Dec 2025 16:38:00 +0530</pubDate>
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<title>Khudiram Bose Birth Anniversary: साहस और वीरता के लिए जाने जाते थे खुदीराम बोस, मुस्कुराते हुए चढ़े थे फांसी</title>
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<description><![CDATA[ स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस का आज ही के दिन यानी की 03 दिसंबर को जन्म हुआ था। 18 साल के युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने देश की आजादी के आंदोलन में हंसते-हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी थी। खुदीराम भारत के सबसे युवा स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। खुदीराम बोस अपनी साहस और वीरता के लिए जाने जाते थे। देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए उन्होंने 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई करना छोड़ दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर खुदीराम बोस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के मिदनापुर में 03 दिसंबर 1889 को खुदीराम बोस का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ बोस था। जब खुदीराम बोस छोटे थे, तो उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। खुदीराम का शुरूआती जीवन कठिनाइयों से भरा था। उनका पालन-पोषण खुदीराम की बड़ी बहन ने किया था।इसे भी पढ़ें: Major Dhyan Chand Death Anniversary: मेजर ध्यानचंद ने ठुकरा दिया था हिटलर का ऑफर, ऐसे बने थे हॉकी के जादूगरराजनीतिक गतिविधिस्कूल के दिनों से ही खुदीराम अंग्रेजों के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। उनमें देश को आजाद कराने का ऐसा जज्बा था कि खुदीराम ने 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी। वह जुलूसों और जलसे में शामिल होकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। साल 1905 में बंगाल का विभाजन होने के बाद देश को आजादी दिलाने के लिए खुदीराम बोस स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। क्रांतिकारी जीवनखुदीराम बोस ने सत्येन बोस के नेतृत्व में अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरूआत की। वह रिवॉल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदे मातरम् पंफलेट वितरित करने में अहम भूमिका निभाई। वहीं साल 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलन में भी खुदीराम ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। साल 1906 में खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वह अंग्रेजों की कैद से भाग निकले और करीब 2 महीने बाद फिर से गिरफ्तार कर लिए गए। 16 मई 1906 को खुदीराम बोस को रिहाकर दिया गया।बता दें कि 06 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया। लेकिन गवर्नर बच गया। फिर साल 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया। लेकिन वह दोनों भी बच गए। वह मुजफ्फरपुर के सेशन जज पर काफी खफा थे, क्योंकि उस जज ने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी।ऐसे में खुदीराम ने अपने साथी प्रफुल्लचंद चाकी के साथ मिलकर सेशन जज किंग्सफोर्ड से बदला लेने की योजना बनाई। योजना के तहत दोनों मुजफ्फरपुर आए। वहीं 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया। लेकिन उस दौरान गाड़ी में जज की जगह दो यूरोपीय महिला थीं। किंग्सफोर्ड के धोखे में दोनों महिलाएं मारी गईं। जिसके बाद अंग्रेज सैनिक उनके पीछे लगे और वैनी रेलवे स्टेशन पर खुदीराम और प्रफुल्लचंद को घेर लिया।मृत्युपुलिस से खुद को घिरा देखकर प्रफुल्लचंद ने खुद को गोली मार ली। जबकि पुलिस ने खुदीराम को पकड़ लिया। फिर 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गई। उस समय खुदीराम की उम्र महज 19 साल थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 04 Dec 2025 10:16:01 +0530</pubDate>
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<title>Major Dhyan Chand Death Anniversary: मेजर ध्यानचंद ने ठुकरा दिया था हिटलर का ऑफर, ऐसे बने थे हॉकी के जादूगर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 03 दिसंबर को हॉकी के जादूगर कहलाने वाले ध्यानचंद का निधन हो गया था। मेजर ध्यानचंद ने भारत को तीन ओलंपिक स्वर्ण दिलाने में अहम योगदान दिया था। उनकी बॉल कंट्रोल और गोल करने की क्षमता ने दुनिया भर के खिलाड़ियों और दर्शकों को हैरान कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मेजर ध्यानचंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 29 अगस्त 1905 को ध्यानचंद का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम समेश्वर दत्त था। जोकि ब्रिटिश भारतीय सेना में कार्यरत थे। वहीं पिता की राह पर चलते हुए ध्यानचंद भी 16 साल की उम्र में सेना में शामिल हो गए थे। यहीं से उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया और जल्दी ही अपने शानदार प्रतिभा से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया।इसे भी पढ़ें: Manohar Joshi Birth Anniversary: महाराष्ट्र की राजनीति का &#039;सभ्य चेहरा&#039; थे मनोहर जोशी, RSS से शुरू किया था सियासी सफर34 वर्षों तक की भारत की सेवासाल 1922 से लेकर 1926 के बीच ध्यानचंद ने रेजिमेंटल मैचों में अपने खेल से लोगों को प्रभावित किया। इस दौरान उनको न्यूजीलैंड दौरे के लिए सेना की टीम में मौका मिला। इस दौरान ध्यानचंद के उत्कृष्ट खेल के कारण सेना ने 18 मैच जीते। जहां दो मुकाबले बराबरी के रहे और सिर्फ एक मैच में टीम को हार मिली। ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन से ब्रिटिश आर्मी काफी ज्यादा खुश हुई और पुरुस्कार के तौर पर उनको &#039;लांस नायक&#039; के पद पर पदोन्नति दी गई। करीब 34 सालों तक देश की सेवा करते हुए ध्यानचंद ने साल 1956 में &#039;लेफ्टिनेंट&#039; के पद से रिटायरमेंट ले लिया।तीन ओलंपिक में भारत को दिलाया स्वर्णसाल 1928 के ओलंपिक के लिए जब भारतीय हॉकी टीम में ध्यानचंद का चयन शुरू हुआ। ऐसे में उनको ट्रायल में बुलाया गया। ध्यानचंद को टीम में चुने गए और फिर 5 मैचों में 14 गोल दागे। भारत ने इस ओलंपिक में अपराजित रहते हुए स्वर्ण पदक जीता। साल 1932 और 1936 के ओलंपिक में ध्यानचंद ने भारत को स्वर्ण दिलाने में अहम भूमिका निभाई। फिर साल 1936 बर्लिन ओलंपिक में भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया। इस मैच में ध्यानचंद के प्रदर्शन से हिटलर काफी प्रभावित हुआ और हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मन सेना में उच्च पद का प्रस्ताव दिया। लेकिन ध्यानचंद ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और देश के प्रति अपने निष्ठा को व्यक्त किया।ओलंपिक से पहले लिया संन्याससेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद साल 1948 के ओलंपिक का समय आया। तब तक ध्यानचंद की उम्र 40 साल से ज्यादा हो चुकी थी। ऐसे में ध्यानचंद ने खुद टीम में शामिल होने से मना कर दिया और युवा खिलाड़ियों को मौका देने के लिए कहा। दो दशकों से अधिक समय तक भारत के लिए खेलते हुए ध्यानचंद ने करीब 400 से ज्यादा गोल किए।पुरस्कारखेल में ध्यानचंद के अद्वितीय योगदान के लिए उनको &#039;पद्म भूषण&#039; से सम्मानित किया गया। वहीं आज देश का सर्वोच्च खेल पुरस्कार &#039;मेजर ध्यानचंद खेल रत्न&#039; उनके नाम पर दिया जाता है।मृत्युवहीं 03 दिसंबर 1979 को लिवर कैंसर से जूझते हुए ध्यानचंद का निधन हो गया था। ध्यानचंद को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 04 Dec 2025 10:16:01 +0530</pubDate>
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<title>Dev Anand Death Anniversary: बॉलीवुड के पहले फैशन आइकॉन थे देव आनंद, पेश किया था रोमांस का नया अंदाज</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 03 दिसंबर को दिग्गज अभिनेता देव आनंद का निधन हो गया था। वह राजनीतिक विचारों को लेकर भी मुखर थे और राजनीति को बदलाव का एक हथियार बनाना चाहते थे। देव आनंद को बॉलीवुड का पहला सुपरस्टार भी माना जाता है। वह जैसे-जैसे फिल्में करने लगे, उनको दर्शकों का प्यार मिलने लगा। महिला दर्शक देव आनंद की खूबसूरती की दीवानी हो गईं। जब भी देव आनंद पर्दे पर नजर आते थे, तो दर्शक पर्दे से अपनी नजरें नहीं हटा पाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता देव आनंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के गुरदासपुर में 26 सितंबर 1923 को देव आनंद का जन्म हुआ था। इनके पिता एक वकील हुआ करते थे। जब देव आनंद लाहौर के एक गर्वमेंट स्कूल में अपनी एजुकेशन हासिल कर रहे थे, तो उनके घर की माली हालत सही नहीं थी, जिस कारण वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए औऱ उनको अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ना पड़ा।इसे भी पढ़ें: Khudiram Bose Birth Anniversary: साहस और वीरता के लिए जाने जाते थे खुदीराम बोस, मुस्कुराते हुए चढ़े थे फांसीमुंबई आए देव आनंददेव आनंद को एक्टिंग का शौक बचपन से था। जब उनकी पढ़ाई छूट गई तो वह फिल्मों में काम करने के सपने के साथ मुंबई आ गए। लेकिन जब वह मायानगरी में अपनी किस्मत चमकाने के लिए आए, तो देव आनंद की जेब में सिर्फ 30 रुपए थे। वहीं देव आनंद के पास रात गुजारने का कोई ठिकाना नहीं था और दो वक्त की रोटी के लिए भी सोचना पड़ता था।मिलिट्री सेंसर ऑफिस में जॉबमुश्किल दिनों से निपटने के लिए देव आनंद ने मिलिट्री सेंसर ऑफिस में नौकरी करनी शुरूकर दी थी। इसके बाद जब देव आनंद को फिल्मों में काम करने का मौका मिला, तो उन्होंने बॉलीवुड में अपनी सफलता की कहानी लिखने में कोई कमी नहीं छोड़ी।फिल्मी सफरदेव आनंद हिंदी सिनेमा के सदाबहार अभिनेता थे। जिनको अपने जमाने का रोमांटिक आइकन भी कहा जाता था। अभिनेता की डायलॉग डिलीवरी और रोमांटिक किरदारों ने देव आनंद को लाखों दिलों की धड़कन बनाया। देव आनंद अपने जमाने में रोमांस के पर्याय बन गए थे। साल 1940 से लेकर 2011 तक अपने एक्टिंग करियर में देव आनंद ने &#039;ज्वेल थीफ&#039;, &#039;गाइड&#039;, &#039;हरे रामा हरे कृष्णा&#039; और &#039;हम दोनों&#039; जैसी फिल्मों से सिनेमा को नई ऊंचाइयां दीं। खुद का प्रोडक्शन हाउसइसके बाद देव आनंद ने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस खोला। इस प्रोडक्शन हाउस का नाम नवकेतन फिल्म्स था। इस बैनर तले अभिनेता ने खूब हिट फिल्में बनाईं। इस प्रोडक्शन हाउस में देव आनंद ने बोल्ड कहानियों और नए टैलेंट को मौका दिया गया। बतौर निर्देशक उन्होंने हमेशा नए विषयों और कहानी कहने के तरीकों के साथ सिनेमा को समृद्ध किया।मृत्युवहीं 03 दिसंबर 2011 को देव आनंद ने 88 साल की उम्र में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 04 Dec 2025 10:15:59 +0530</pubDate>
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<title>Vijayalakshmi Pandit Death Anniversary: देश की पहली महिला कैबिनेट मिनिस्टर थीं विजयलक्ष्मी पंडित, दुनिया को पढ़ाया था कूटनीति का पाठ</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 01 दिसंबर भारतीय राजनीतिज्ञ रहीं विजयलक्ष्मी पंडित का निधन हो गया था। विजयलक्ष्मी पंडित ने पूरी दुनिया में भारत का डंका बजाया था। वह जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। विजयलक्ष्मी के सामने अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियां नतमस्तक होते थे। वह आजाद भारत की वो आवाज थीं, जिसको सुनने के लिए संयुक्त राष्ट्र में सन्नाटा छा जाता था। विजयलक्ष्मी पंडित ने उस दौर में परमाणु युद्ध जैसे खतरे को टाला था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विजयलक्ष्मी पंडित के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारप्रयागराज के इलाहाबाद में 18 अगस्त 1900 को विजयलक्ष्मी पंडित का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू था। उनके बचपन का नाम स्वरूप कुमारी था। वह जवाहर लाल नेहरू की लाडली बहन थीं। विजयलक्ष्मी पंडित ने किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी से डिग्री नहीं ली थी। उनकी शिक्षा घर से पूरी हुई थी और उन्होंने सिर्फ 12वीं तक पढ़ाई की थी। लेकिन उनकी अंग्रेजी, कूटनीति और जनरल नॉलेज कि समझ ऐसी थी कि बड़े से बड़े पीएचडी होल्डर्स भी उनके सामने टिक नहीं पाते थे।इसे भी पढ़ें: JRD Tata Death Anniversary: JRD टाटा ने भारतीय जगत उद्योग की बदल दी थी तकदीर, भारतीय विमानन के थे जनकस्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ींसाल 1921 में विजयलक्ष्मी पंडित की शादी रंजीत सीताराम पंडित से हुई। रंजीत एक बैरिस्टर थे और काठियावाड़ के विद्वान परिवार से ताल्लुक रखते थे। इस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। महात्मा गांधी के आह्वान पर विजयलक्ष्मी ने रेशमी कपड़े त्याग दिया और खादी अपना लिया। वह महलों का सुख छोड़कर सड़कों पर उतर आईं। साल 1932 में विजयालक्ष्मी ने सविनय अवज्ञा में हिस्सा लिया और जेल गईं।देश की पहली महिला कैबिनेट मिनिस्टरदेश को आजादी मिलने से पहले ही विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी काबिलियत साबित कर दी थी। जब साल 1937 में ब्रिटिश राज के तहत चुनाव हुए, तो वह संयुक्त प्रांत की विधानसभा के लिए चुनी गईं। उनको इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। विजयलक्ष्मी पंडित भारत की पहली महिला थीं, जोकि कैबिनेट मिनिस्टर बनी थीं। उस दौर में उन्होंने साबित कर दिया कि महिलाएं सिर्फ घर चलाने के लिए नहीं बल्कि सरकार को भी चला सकती हैं।डिप्लोमेटिक करियरदेश की आजादी के बाद भारत को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो देश का पक्ष वैश्विक मंच पर मजबूती के साथ रख सके। ऐसे में जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बहन की काबिलियत पर भरोसा किया और उनको सोवियत संघ में भारत के पहले राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया। बता दें कि यह वो दौर था, जब कोल्ड वॉर शुरू हो चुका था। अमेरिका और रूस दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे थे। ऐसे में मास्को जाकर महिला का काम करना आसान नहीं था। लेकिन विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी कूटनीति के जरिए स्टालिन जैसे सख्त नेता को प्रभावित किया।इसके बाद विजयलक्ष्मी पंडित अमेरिका में भारत की राजदूत बनीं। वाशिंगटन में उनकी वाकपटुता, साड़ी पहनने के अंदाज और सुंदरता ने सबको दीवाना बना दिया था। विजयलक्ष्मी पंडित जहां भी जाती थीं, लोग उनको देखने और सुनने के लिए जमा हो जाते थे। विजयलक्ष्मी ने अमेरिका को भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का मतलब समझाया।संयुक्त राष्ट्र में पहुंचीं विजयलक्ष्मीसाल 1953 भारत के लिए गर्व का साल था। उनको संयुक्त राष्ट्र महासभा का अध्यक्ष चुना गया। वह इस पद पर बैठने वाली दुनिया की पहली महिला थीं। बता दें कि यह एक ऐसा रिकॉर्ड था, जिसने पश्चिमी देशों की सोच को बदलकर रख दिया था। उस समय तक पश्चिम के लोग एशियाई महिलाओं को कमजोर समझते थे। लेकिन विजयलक्ष्मी पंडित ने उस कुर्सी पर बैठकर दुनिया के बड़े-बड़े नेताओं को नियम-कायदे समझा दिए थे।मृत्युविजयलक्ष्मी का आखिरी समय बेहद सादगी में गुजरा था। वह राजनीति से संन्यास लेकर देहरादून में रहने लगी थीं। वहीं 01 दिसंबर 1990 को 90 साल की उम्र में विजयलक्ष्मी पंडित का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 10:42:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sucheta Kripalani Death Anniversary: आजाद भारत की पहली महिला CM बनकर सुचेता कृपलानी ने संभाली थी सबसे बड़े राज्य की बागडोर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 01 दिसंबर को भारतीय राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम में असाधारण भूमिका निभाने वाली सुचेता कृपलानी का निधन हो गया था। वह आजाद भारत में किसी राज्य की पहली मुख्यमंत्री रहीं। जब भारत अंग्रेजी सत्ता के शिकंजे में था और महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश करना असंभव माना जाता था। उस समय सुचेता ने न सिर्फ उस दरवाजे को खोला, बल्कि महिला सशक्तीकरण की नींव रख दी। तो आइए जानते उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सुचेता कृपलानी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अंबाला में 25 जून 1908 को सुचेता कृपलानी का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से पूरी की। फिर कृपलानी ने साल 1939 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संवैधानिक इतिहास की शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसके बाद साल 1936 में उनका विवाह स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जेबी कृपलानी से विवाह किया। फिर साल 1938 में वह कांग्रेस पार्टी से जुड़ गईं और यहीं से उनका राजनीतिक जीवन शुरू किया। यहां से ही सुचेता कृपलानी के भीतर &#039;क्रांतिकारी महिला&#039; जाग उठीं।इसे भी पढ़ें: Vijayalakshmi Pandit Death Anniversary: देश की पहली महिला कैबिनेट मिनिस्टर थीं विजयलक्ष्मी पंडित, दुनिया को पढ़ाया था कूटनीति का पाठभारत छोड़ो आंदोलन में हुई शामिलसाल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सुचेता कृपलानी ने योगदान दिया। फिर साल 1944 में उनकी लंबी गिरफ्तारी ने कृपलानी के व्यक्तित्व को निखारा। कृपलानी ने इस आंदोलन की &#039;रीढ़&#039; बनकर दृढ़ता के साथ काम किया। फिर साल 1946 में वह संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के लिए चुनी गईं। वहीं ध्वज प्रस्तुति समिति की अहम सदस्य के रूप में कृपलानी ने तिरंगे को संसद के सामने प्रस्तुत करने वाली टीम में अहम भूमिका निभाई।वह साल 1950 से लेकर 1952 तक प्रांतीय संसद, फिर साल 1952 से 1956 तक प्रथम लोकसभा और साल 1957 से 1962 तक द्वितीय लोकसभा की सदस्य रहीं। उत्तर प्रदेश में सुचेता कृपलानी का राजनीतिक जीवन सफल रहा और वह साल 1943 से 1950 तक यूपी विधानसभा की सदस्य और श्रम और फिर साल 1960 से 1963 तक कई अहम पदों पर काम किया। फिर साल 1963 में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने भारत के किसी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का इतिहास रच दिया।सुचेता कृपलानी की कार्यशैली सख्त लेकिन न्यायप्रिय थीं। कृपलानी किसी को भी महिला होने का अवसरवादी लाभ नहीं देने दिया। साथ ही किसी यह भूलने भी नहीं दिया कि वह देश की रीति-नीति तय करने में सक्षम है। कृपलानी ने भारत का प्रतिनिधित्व संयुक्त राष्ट्र, तुर्की और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे वैश्विक मंचों पर किया।मृत्युसाल 1971 में सुचेता कृपलानी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। वहीं 01 दिसंबर 1974 में सुचेता कृपलानी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 10:42:30 +0530</pubDate>
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<title>Manohar Joshi Birth Anniversary: महाराष्ट्र की राजनीति का &amp;apos;सभ्य चेहरा&amp;apos; थे मनोहर जोशी, RSS से शुरू किया था सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ पूर्व लोकसभा स्पीकर और अविभाजित शिवसेना के पहले मुख्यमंत्री मनोहर जोशी का आज ही के दिन यानी की 02 दिसंबर को जन्म हुआ था। मनोहर जोशी शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के करीबी माने जाते थे। वहीं शिवसेना में भी मनोहर जोशी के गठन में अहम भूमिका थी और वह करीब 4 दशकों तक शिवसेना के साथ जुड़े रहे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मनोहर जोशी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामहाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के नंदवी गांव में 02 दिसंबर 1937 को मनोहर जोशी का जन्म हुआ था। वह पढ़ाई के लिए मुंबई चले आए, मुंबई के प्रतिष्ठित वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। मनोहर जोशी के परिवार में एक बेटा और दो बेटिया हैं।इसे भी पढ़ें: Sucheta Kripalani Death Anniversary: आजाद भारत की पहली महिला CM बनकर सुचेता कृपलानी ने संभाली थी सबसे बड़े राज्य की बागडोरराजनीतिक सफरमनोहर जोशी के सियासी सफर की शुरूआत आरएसएस के साथ हुई थी। हालांकि साल 1967 में उनके प्रोफेशनल कॅरियर की शुरूआत बतौर अध्यापिक की थी। फिर साल 1968-70 तक मुंबई नगर निगम के पार्षद रहे और बाद में मुंबई नगर निगम की स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष रहे। इसके बाद साल 1976-77 तक वह मुंबई के मेयर रहे। साल 1972 में मनोहर जोशी महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य चुने गए और तीन कार्यकाल तक वह इसके सदस्य रहे। साल 1990 में मनोहर जोशी महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य चुने गए और वह इस दौरान नेता विपक्ष भी रहे थे।लेकिन बाद में वह शिवसेना में शामिल हो गए थे। फिर वह करीब चार दशकों तक शिवसेना के साथ जुड़े रहे। साल 1980 के दशक में मनोहर जोशी शिवसेना के एक ताकतवर नेताओं में से एक बनकर निकले। मनोहर जोशी पार्टी संगठन पर अपनी पकड़ के लिए जाने जाते थे। फिर साल 1995 से लेकर 1999 तक वह अविभाजित शिवसेना के पहले मुख्यमंत्री रहे। साल 2002 से लेकर 2004 तक मनोहर जोशी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में लोकसभा स्पीकर रहे। साल 1999 में हुए आम चुनाव में मनोहर जोशी मुंबई की नॉर्थ-सेंट्रल लोकसभा सीट से चुनकर संसद पहुंचे। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय मंत्री के रूप में भी काम किया। बता दें कि नितिन गडकरी ने मनोहर जोशी की सरकार में बतौर मंत्री काम किया था। बता दें कि राष्ट्रीय राजनीति में मनोहर जोशी का आखिरी कार्यकाल साल 2006 में शुरू हुआ। इस दौरान वह राज्यसभा के लिए चुने गए थे और जोशी ने अपने 6 साल का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद मनोहर जोशी ने राजनीति से दूर बना ली।मृत्युवहीं 23 फरवरी 2024 को 86 वर्ष की आयु में मनोहर जोशी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 10:42:29 +0530</pubDate>
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<title>JRD Tata Death Anniversary: JRD टाटा ने भारतीय जगत उद्योग की बदल दी थी तकदीर, भारतीय विमानन के थे जनक</title>
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<description><![CDATA[ जेआरडी टाटा, भारतीय इंडस्ट्री के इतिहास का एक ऐसा नाम जिससे भले कोई परिचित न हो। यह भारत को तरक्की की राह पर लाने वाला नाम है। जेआरडी टाटा ने देश को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। उन्होंने टाटा ग्रुप को इतना आगे ले जाने का काम किया। आज ही के दिन यानी की 29 नवंबर को जेआरडी टाटा का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जेआरडी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफ्रांस में 29 जुलाई 1904 को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम रतनजी दादाभाई टाटा और मां का नाम सुजैन ब्रियर था। इनका पूरा नाम जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा था। जेआरडी टाटा अपने भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे।इसे भी पढ़ें: Sandeep Unnikrishnan Death Anniversary: बहादुर योद्धा थे संदीप उन्नीकृष्णन, देश के लिए कुर्बान कर दिया था जीवनराजनीति में आना चाहते थे जेआरडी टाटाएक समय पर जेआरडी टाटा राजनीति में आना चाहते थे। वह जवाहर लाल नेहरू से काफी ज्यादा प्रभावित थे। लेकिन फिर उनको एहसास हुआ कि वह इस विचार के साथ अधिक दूर तक नहीं जा पाएंगे। उनको इस बात का एहसास हुआ कि राजनीति में रहकर वह न तो देश के लिए और न ही पार्टी के लिए कुछ कर पाएंगे।फ्रांस से भारत आए जेआरडी टाटासाल 1925 में पिता के बुलाने पर जेआरडी टाटा फ्रांस से भारत आ गए। इसके बाद वह अनौपचारिक रूप से जेआरडी टाटा टिस्को में बतौर इंटर्न काम करने लगे। वहीं पिता के निधन के बाद 22 साल की उम्र में वह टाटा ग्रुप की प्रमुख कंपनी टाटा संस के बोर्ड में शामिल हो गए। अभी तक उनके पास फ्रांस की नागरिकता थी। लेकिन साल 1929 में उन्होंने फ्रांसीसी नागरिकता त्यागकर भारत की राजनीति अपनाई।कमर्शियल पायलट थे जेआरडी टाटाबता दें कि जेआरडी टाटा भारत के पहले कमर्शियल पायलट थे। उनको साल 1929 में लाइसेंस मिला था। वहीं साल 1932 में टाटा एविएशन सर्विस ने पहली उड़ान भरी। साल 1953 तक उन्होंने इस विमानन कंपनी को बुलंदियों पर पहुंचा दिया था। जिसके बाद जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण कर दिया। यह एक ऐसा फैसला था, जिसके खिलाफ जेआरडी ने पूरे दिल से लड़ाई लड़ी थी। फिर साल 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार ने जेआरडी टाटा को एयर इंडिया के अध्यक्ष पद से हटा दिया। लेकिन इंदिरा गांधी सरकार की वापसी पर वह फिर से एयर इंडिया के अध्यक्ष बन गए।टाटा ग्रुप के चेयरमैनसाल 1938 में जेआरडी टाटा ने सर नौरोजी से टाटा समूह के अध्यक्ष पद का कार्यभार लिया। वह टाटा संस बोर्ड के सबसे युवा सदस्य थे। साल 1938 से लेकर 1991 तक उन्होंने 50 सालों तक टाटा समूह को नेतृत्व किया। वह टाटा ग्रुप के सबसे लंबे समय तक चेयरमैन रहने वाले व्यक्ति बने।मृत्युवहीं 29 नवंबर 1993 को जेआरडी टाटा ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 30 Nov 2025 13:39:55 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Verghese Kurien Birth Anniversary: भारत में श्वेत क्रांति के जनक कहे जाते थे वर्गीज कुरियन, अमूल को बनाया था ब्रांड</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 26 नवंबर को भारत में श्वेत क्रांति के जनक कहे जाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन का जन्म हुआ था। वह &#039;मिल्क मैन ऑफ इंडिया&#039; के नाम से मशहूर थे। उन्होंने साल 1946 में गुजरात के आणंद में देश के सबसे पॉपुलर डेयरी ब्रांड अमूल की शुरूआत की थी। इसके अलावा वर्गीज कुरियन ने &#039;ऑपरेशन फ्लड&#039; के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के काम किया था। साथ ही लाखों किसानों को आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ वर्गीज कुरियन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकेरल के कोझिकोड में एक समृद्ध सिरियन ईसाई परिवार में 26 नवंबर 1921 को वर्गीज कुरियन का जन्म हुआ था। इनके पिता सरकारी सर्जन थे। कुरियन ने साल 1940 में चेन्नई के लोयोला कॉलेज से स्नातक और 1943 में गिंडी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। फिर साल 1948 में उन्होंने अमेरिका के मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया।इसे भी पढ़ें: CV Raman Death Anniversary: सीवी रमन ने भारत को दिलाई विज्ञान की दुनिया में एक अलग पहचान, देश का बढ़ाया था मानAmul की स्थापनासाल 1949 में भारत लौटने पर सरकार के साथ बांड की अवधि को पूरा करने के लिए वर्गीज कुरियन को गुजरात के आनंद में डेयरी डिवीजन में भेजा गया। यहां पर कुरियन की मुलाकात त्रिभुवनदास पटेल से हुई। त्रिभुवनदास पटेल किसानों को एकजुट कर दूध सहकारी समितियों की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे। ऐसे में वर्गीज कुरियन ने त्रिभुवनदास के साथ मिलकर साल 1946 में कैरा डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड की स्थापना की थी। जोकि बाद में &#039;अमूल&#039; बना।इसके बाद कुरियन के दोस्त एच एम दयाला ने भैंस के दूध से मिल्क पाउडर और कंडेंस्ड मिल्क बनाने की तकनीक विकसित किया। इस तकनीक ने भारतीय डेयरी इंडस्ट्री को क्रांतिकारी बदलाव दिया। पहले सिर्फ गाय के दूध से यह प्रोडक्ट बनाए जाते थे, इस इनोवेशन ने भारत को दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।ऑपरेशन फ्लडकुरियन के आनंद मॉडल को देखते हुए साल 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना की। वहीं इस बोर्ड का कुरियन को पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया। फिर साल 1970 में शुरू हुए &#039;ऑपरेशन फ्लड&#039; ने भारत के दूध प्रोडक्शन को साल 1968-69 में 23.3 मिलियन टन से साल 2006-07 में 100.9 मिलियन टन बढ़ाया। फिर 25 सालों में 1700 करोड़ रुपए के निवेश से यह दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम बना। साल 1998 में भारत ने अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बनने का गौरव हासिल किया।पुरस्कारडॉ वर्गीज कुरियन को साल 1963 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, साल 1989 में वर्ल्ड फूड प्राइज और फिर साल 1999 में पद्म विभूषण सहित कई सम्मान मिले।मृत्युवहीं 09 सितंबर 2012 को 90 वर्ष की आयु में गुजरात के नडियाद में डॉ वर्गीज कुरियन ने अंतिम सांस ली। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 28 Nov 2025 22:57:40 +0530</pubDate>
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<title>Harivansh Rai Bachchan Birth Anniversary: अमिताभ के पिता नहीं, हिंदी के &amp;apos;कवि&#45;सम्राट&amp;apos;, हरिवंश राय बच्चन के जीवन के अनछुए पहलू</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 27 नवंबर को हिंदी साहित्य जगत के महान कवि और साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन का जन्म हुआ था। हरिवंश राय बच्चन सिर्फ अमिताभ बच्चन के पिता नहीं बल्कि हिंदी कविता को नई दिशा देने वाले उन दिग्गजों में थे, जिन्होंने &#039;मधुशाला&#039; जैसी कालजयी कृति लिखकर साहित्य प्रेमियों के दिलों में अपने लिए एक खास स्थान बनाया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके हरिवंश राय बच्चन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के बाबू पट्टी गांव में 27 नवंबर 1907 को हरिवंश राय बच्चन का जन्म हुआ था। हरिवंश राय बच्चन ने अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना किया था। वह एक महान कवि बने और उनकी फेमस किताब मधुशाला है, जिसकी कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। इसे भी पढ़ें: Verghese Kurien Birth Anniversary: भारत में श्वेत क्रांति के जनक कहे जाते थे वर्गीज कुरियन, अमूल को बनाया था ब्रांडनिजी जीवनहरिवंश राय बच्चन ने दो शादियां की थीं। जब उनका विवाह हुआ था, तो पहली पत्नी श्यामा बच्चन 14 साल की थीं। लेकिन साल 1936 में टीबी की बीमारी से श्यामा बच्चन का निधन हो गया था। इसके बाद हरिवंश राय बच्चन ने 5 साल बाद तेजी सूरी से दूसरा विवाह किया। दूसरी पत्नी रंगमंच और संगीत से जुड़ी थीं। इस दौरान बच्चन जी ने &#039;नीड़ का निर्माण फिर&#039; जैसे अहम रचनाएं कीं।इन कविताओं से मिली पहचानहरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य में उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हरिवंश राय बच्चन ने &#039;मधुकलश&#039;, &#039;मधुशाला&#039;, &#039;दो चट्टानें&#039; और &#039;मिलन यामिनी&#039; जैसी प्रसिद्ध साहित्यिक कविताएं लिखी हैं।महत्वपूर्ण उपलब्धियांसाल 1941 से लेकर 1952 तक हरिवंश राय बच्चन ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में इंग्लिश लिटरेचर पढ़ाया। फिर साल 1968 में बच्चन जी को &#039;दो चट्टानें&#039; के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। साहित्य में योगदान के लिए उनको उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान, सरस्वती सम्मान और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। फिर साल 1976 में हरिवंश राय बच्चन को पद्म भूषण से नवाजा गया।मृत्युवहीं 18 जनवरी 2003 को 95 वर्ष की आयु में हरिवंश राय बच्चन का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 28 Nov 2025 22:57:39 +0530</pubDate>
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<title>Sandeep Unnikrishnan Death Anniversary: बहादुर योद्धा थे संदीप उन्नीकृष्णन, देश के लिए कुर्बान कर दिया था जीवन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 28 नवंबर को मुंबई हमले में आतंकियों से लोहा लेते समय संदीप उन्नीकृष्णन की मृत्यु हो गई थी। संदीप भारतीय सेना में एक मेजर थे, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स के कुलीन विशेष कार्य समूह में काम किया था। नवंबर 2008 में मुंबई के हमलों में आतंकवादियों से लड़ते हुए संदीप उन्नीकृष्णन शहीद हो गए थे। आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर संदीप उन्नीकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकेरल के कोझिकोड  में 15 मार्च 1977 को संदीप उन्नीकृष्णन का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम के. उन्नीकृष्णन थे, जोकि एक इसरो अधिकारी थे। वहीं उनकी मां का नाम धनलक्ष्मी उन्नीकृष्णन था। संदीप उन्नीकृष्णन ने छोटी उम्र में सशस्त्र बलों में शामिल होने का मन बना लिया था। ऐसे में उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1995 में विज्ञान विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। वह विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल रहे। संदीप को फिल्में देखने का बहुत शौक था।इसे भी पढ़ें: Harivansh Rai Bachchan Birth Anniversary: अमिताभ के पिता नहीं, हिंदी के &#039;कवि-सम्राट&#039;, हरिवंश राय बच्चन के जीवन के अनछुए पहलूसाल 1995 में संदीप ने एनडीए में एडमिशन लिया। फिर चार सालों बाद संदीप को वह करने का मौका मिला, जिसका सपना हर एक सैनिक देखता है। बता दें कि साल 1999 में कारगिल युद्ध में संदीप उन्नीकृष्णन को युद्ध करने का मौका मिला। वहीं साल 2007 में संदीप उन्नीकृष्णन को NSG के स्पेशल सेक्शन ग्रुप में शामिल किया। संदीप निडर होने के साथ ही बहादुर भी थे। वह कभी भी मुश्किल हालात में पीछे नहीं हटते थे।युद्धऑपरेशन विजयऑपरेशन पराक्रमऑपरेशन रक्षकविरोधी-बंडखोरीऑपरेशन ब्लॅक टॉर्नेडोऑपरेशन पराक्रम और 26/11 हमलासाल 1999 के बाद संदीप उन्नीकृष्णन भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरे बड़े सैन्य गतिरोध ऑपरेशन पराक्रम का भी हिस्सा थे। वहीं 26 नवंबर 2008 की रात को दक्षिण मुंबई की कई प्रतिष्ठित इमारतों पर पाकिस्तान के आतंकियों द्वारा हमला किया गया था। आतंकियों ने पुराना ताजमहल पैलेस होटल में बंधकों को रखा था। उन बंधकों को छुड़ाने के लिए संदीप उन्नीकृष्णन होटल में तैनात 51 स्पेशल एक्शन ग्रुप (51 SAG) के टीम कमांडर थे। संदीप 10 कमांडो के साथ ताज होटल पहुंचे और सीढ़ियों के सहारे छठी मंजिल पर पहुंचे।अगले 15 घंटों तक मेजर संदीर और उनकी टीम बंधकों को बाहर निकालने में लगी रही। वहीं 27 नवंबर की रात संदीप उन्नीकृष्णन और उनकी टीम ने ऊपर जाने का फैसला किया। जोकि काफी खतरनाक था। लेकिन संदीप यह जोखिम लेने को तैयार थे। क्योंकि अन्य बंधकों को आतंकवादियों से छुड़ाने का यही तरीका था। वहीं जैसे ही आतंकियों ने सेंट्रल सीढ़ियों से कमांडो को ऊपर आते देखा, तो उन्होंने एनएसजी टीम पर पहली मंजिल से हमला कर दिया।मृत्युइस हमले में कमांडो सुनील कुमार जोधा गंभीर रूप से घायल हो हुए। इस दौरान आतंकी अगली मंजिल पर भागने की कोशिश करने लगे। यह देखकर संदीप उन्नीकृष्णन ने आतंकवादियों का पीछा करने का फैसला किया। जिसके बाद आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में संदीप उन्नीकृष्णन बुरी तरह घायल हो गए। वहीं 28 नवंबर 2008 को संदीप उन्नीकृष्णन की मृत्यु हो गई।पुरस्कारअशोक चक्रऑपरेशन पराक्रम पदकविशेष सेवा पदकसैन्य सेवा पदकउच्च उंची सेवा पदक9 वर्षे दीर्घ सेवा पदक ]]></description>
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<pubDate>Fri, 28 Nov 2025 22:57:38 +0530</pubDate>
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<title>Guru Tegh Bahadur Death Anniversary: औरंगजेब ने बेरहमी से करवाई थी गुरु तेग बहादुर की हत्या, जानिए शहादत की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 24 नवंबर को मुगल बादशाह औरंगजेब ने सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर की बेरहमी से हत्या करवाई थी। गुरु तेग बहादुर अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखते थे और उन्होंने कश्मीरी पंडितों का जबरन धर्म परिवर्तन कराने का खुलकर विरोध किया था।आज ही के दिन यानी की 24 नवंबर को सिखों के 9वें श्री गुरु तेग बहादुर सिंह का निधन हो गया था। गुरु तेग बहादुर को &#039;हिंद की चादर&#039; भी कहा जाता है। उन्होंने अपने धर्म, संस्कृति, आदर्शों एवं मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी बलि दे दी थी। गुरु तेग बहादुर अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखते थे और उन्होंने कश्मीरी पंडितों का जबरन धर्म परिवर्तन कराने का खुलकर विरोध किया था। न सिर्फ सिख बल्कि हिंदु धर्म भी गुरु तेग बहादुर की शहादत को नमन करता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु तेग बहादुर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर में 21 अप्रैल 1621 को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। इनके पिता सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद थे। गुरु तेग बहादुर के बचपन का नाम त्यागमल था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने भाइयों से ली थी। इसे भी पढ़ें: Rani Laxmi Bai Birth Anniversary: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बहादुर नायिका थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों से जमकर लिया था लोहात्यागमल से बने तेग बहादुरबताया जा रहा है कि एक बार त्यागमल अपने पिता गुरु हरगोबिंद साहिब के साथ करतारपुर की लड़ाई के बाद किरतपुर जा रहे थे। इस दौरान त्यागमल की आयु 13 साल की थी। फगवाड़ा के पास पलाही गांव में मुगलों की फौज की एक टुकड़ी ने उनका पीछा किया और अचानक से उन पर हमला कर दिया। इस युद्ध में पिता गुरु हरगोबिंद साहिब के साथ त्यागमल ने भी मुगलों का मुकाबला किया। इस छोटी उम्र में तेग बहादुर का साहस और जज्बा देखकर उनको त्यागमल से तेग बहादुर कहा जाने लगा।9वें गुरु बने गुरु तेग बहादुरमार्च 1632 में जालंधर के नजदीक करतारपुर में गुरु तेग बहादुर की शादी बीबी गुजरी से हुई। जिसके बाद वह अमृतसर के पास बकाला में रहने लगे। सिखों के 8वें गुरु, गुरु हरकृष्ण साहिब के निधन के बाद मार्च 1665 में गुरु तेग बहादुर गुरु की गद्दी पर बैठे और सिखों के 9वें गुरु बने। गुरु तेग बहादर जी ने कई वर्ष बाबा बकाला नगर में घोर तपस्या की।धर्म का प्रचार-प्रसारधर्म के प्रचार-प्रसार व लोक कल्याणकारी कार्य के लिए गुरु तेग बहादुर ने कई स्थानों का भ्रमण किया। उन्होंने आनंदपुर से कीरतपुर, सैफाबाद और रोपड के लोगों को संयम और सहज मार्ग का पाठ पढ़ाया। इसके बाद वह खिआला पहुंचे, यहां से वह सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश देते हुए दमदमा साहिब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुंचे। कुरुक्षेत्र से वह कड़ामानकपुर पहुंचे और यहां साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया। इसके बाद गुरु तेग बहादुर प्रयागराज, बनारस, पटना और असम गए। इस दौरान गुरु तेग बहादुर ने सामाजिक, आध्यात्मिक, आर्थिक और उन्नयन के लिए कई रचनात्मक कार्य किए।मुगलों से किया विद्रोहगुरु तेग बहादुर के समकालीन मुगल बादशाह औरंगजेब था। भारत में औरंगजेब की छवि कट्टर बादशाह के तौर पर थी। बताया जाता है कि औरंगजेब के शासनकाल में हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा था। जिसके सबसे ज्यादा शिकार कश्मीरी पंडित हो रहे थे। ऐसे में कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल श्री आनंदपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर साहिब का शरण में मदद के लिए पहुंचा।औरगंजेब की कैद में रहे गुरु तेग बहादुरगुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों को उनके धर्म की रक्षा का वादा किया। उन्होंने हिन्दुओं को बलपूर्वक मुस्लिम बनाने का खुले स्वर में विरोध किया। वहीं कश्मीरी पंडियों की हिफाजत का जिम्मा अपने कंधों पर लिया। उनके इस कदम से औरंगजेब गुस्सा हुआ। औरंगजेब ने इसको खुली चुनौती माना। वहीं 1675 में गुरु तेग बहादुर अपने पांच सिखों के साथ आनंदपुर से दिल्ली के लिए चल पड़े। जहां पर उनको रास्ते से ही मुगल बादशाह औरंगजेब के सिपाहियों ने पकड़ लिया। गुरु तेग बहादुर को 3-4 महीने कैद में रखकर अत्याचार की सीमाएं लांघ दी।मृत्युकैद में रखकर गुरु तेग बहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। बताया जाता है कि गुरु तेग बहादुर को मारने से पहले औरंगजेब ने उनके सामने तीन शर्तें रखीं। यह शर्तें कलमा पढ़कर मुसलमान बनने, चमत्कार दिखाने या फिर मौत स्वीकार करना थी। गुरु तेग बहादुर ने धर्म छोड़ने और चमत्कार दिखाने से इंकार कर दिया। जिसके बाद 24 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में जल्लाद जलालदीन ने गुरु साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 25 Nov 2025 11:13:17 +0530</pubDate>
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<title>Geeta Dutt Birth Anniversary: गीता दत्त की आवाज में थी खास किस्म की कसक, कम उम्र में मिली थी शोहरत</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 22 नवंबर को हिंदी फिल्मों की मशहूर गायिका गीता दत्त का जन्म हुआ था। गीता दत्त को कम उम्र में शोहरत मिली। लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ काफी ट्रैजिक रही। उनकी आवाज में एक खास किस्म की कसक थी।हिंदी फिल्मों की मशहूर गायिका गीता दत्त का आज ही के दिन यानी की 23 नवंबर को जन्म हुआ था। गीता दत्त की आवाज में एक खास किस्म की कसक थी। जिसके कारण उनके द्वारा गाए गाए गाने आज भी दर्शकों को भी पसंद आते हैं। गीता दत्त को कम उम्र में शोहरत मिली। लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ काफी ट्रैजिक रही। गुरु दत्त की मौत ने गीता दत्त को अकेला कर दिया था। वहीं शराब की लत ने उनकी जान ले ली। गीता दत्त के गले में जादू था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गीता दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफरीदपुर में 23 नवंबर 1930 को गीता दत्त का जन्म हुआ था। बेहद खूबसूरत और सुरीली आवाज की धनी गीता दत्त फरीदपुर के जमींदार परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनका पूरा परिवार 40 के दशक में कोलकाता आकर रहने लगा था। फिर एक दिन सब मुंबई आ गए। संगीत से गीता दत्त का रिश्ता बचपन में जुड़ गया था। उनकी मां अमिय देवी एक कवियत्री थीं। वहीं गीता दत्त के पिता मुकुल रॉय संगीतकार थे। इस कारण गीता दत्त का भी संगीत से परिचय काफी कम उम्र में हो गया था।इसे भी पढ़ें: Sanjeev Kumar Death Anniversary: बॉलीवुड के दिलदार अभिनेता कहे जाते थे संजीव कुमार, ऐसा रहा फिल्मी सफरऐसे मिला गाने का ऑफरगीता दत्त को संगीत की तालीम म्यूजिक कंपोजर हनुमान प्रसाद ने दी थी। एसडी बर्मन ने स्टूडियो में गीता दत्त को सिर्फ 2 लाइनें गाते सुना था। एसडी बर्मन को गीता दत्त की आवाज इतनी पसंद आई कि उन्होंने गीता को ब्रेक देने का फैसला कर लिया। फिल्मों में गीता दत्त ने 16 साल की उम्र से गाने गाए थे। वह सिर्फ 42 साल की उम्र तक जिंदा रहीं। उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गाने जैसे- &#039;एक दिन याद करोगे, हमको जाने के बाद&#039;, &#039;क्या हसीं सितम&#039;, &#039;सुंदर सपना बीत गया&#039;, &#039;तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे&#039;, और &#039;ये लो मैं हारी पिया&#039; जैसे गाने गाए।प्यार और शराब ने ही ली जानएक बार जब गीता दत्त फिल्म &#039;बाजी&#039; में गाना गा रही थीं। इस दौरान स्टूडियो में उनकी मुलाकात प्रतिभाशाली अभिनेता गुरु दत्त से हुई। गुरु और गीता को एक-दूसरे से प्यार हो गया और गीता दत्त ने परिवार के खिलाफ जाकर गुरु दत्त से शादी कर ली। हालांकि बाद में दोनों की शादी में तनाव आने लगा। बताया जाता है कि गुरु दत्त के वहीदा रहमान से अफेयर की खबरों ने गीता दत्त को तोड़ दिया था। जिसके चलते दोनों की राहें अलग हो गईं। वहीं शराब की लत ने गुरु दत्त की जान ले ली। गुरु दत्त की मृत्यु के बाद गीता दत्त बुरी तरह टूट गई थीं।गाए यादगार गीतबता दें कि गीता दत्त ने फिल्मों में 72 गाने गाए, जिनमें से सिर्फ 43 गाने उन्होंने एसडी बर्मन के लिए गाए थे। एक बार कैफी आजमी ने कहा था कि गीता दत्त की आवाज में बंगाल का नमक और दर्द दोनों झलकते हैं। गीता दत्त के सबसे यादगार गीतों में से एक &#039;वक्त ने किया किया हसीन सितम&#039; को कैफी आजमी ने लिखा था। वहीं 42 साल की उम्र तक जीने वाली गायिका गीता दत्त ने अपनी जिंदगी में शोहरत, स्टारडम और अकेलापन सब देखा था।मृत्युवहीं 20 जुलाई 1972 को महज 42 साल की उम्र में गीता दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 23 Nov 2025 21:50:16 +0530</pubDate>
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<title>John F Kennedy Death Anniversary: अमेरिका के सबसे युवा राष्ट्रपति थे जॉन एफ कैनेडी, गोली मारकर की गई थी हत्या</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 22 नवंबर को अमेरिका के 35वें राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की खुली सड़क पर हत्या कर दी गई थी। राष्ट्रपति कैनेडी अपनी पत्नी के साथ एक खुली कार में सड़कों पर जनसमर्थन रैली के लिए जा रहे थे। तभी अचानक तीन गोलियां चली और उनकी मृत्यु हो गई। यह अमेरिकी इतिहास की एक ऐसी हत्या थी, जिसने पूरे देश को झझकोरकर रख दिया था। हालांकि उनकी हत्या के पीछे किसका हाथ था, यह आज तक रहस्य बना हुआ है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जॉन एफ. कैनेडी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबोस्टन से लगभग पांच मील दक्षिण-पश्चिम में ब्रुकलाइन, मैसाचुसेट्स में 29 मई 1917 को जॉन फिट्ज़गेराल्ड कैनेडी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जोसेफ पी. कैनेडी और मां का नाम रोज कैनेडी था। वह अपने भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे।इसे भी पढ़ें: CV Raman Death Anniversary: सीवी रमन ने भारत को दिलाई विज्ञान की दुनिया में एक अलग पहचान, देश का बढ़ाया था मानअमेरिका के 35वें राष्ट्रपतिजॉन एफ कैनेडी अमेरिका के अब तक के सबसे युवा राष्ट्रपति थे। उन्होंने 43 साल की उम्र में राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। कैनेडी के राष्ट्रपति कार्यकाल को इस बात के लिए भी याद किया जाता है, उन्होंने क्यूबा मिसाइल संकट और शीत युद्ध के शुरूआती दौर को साहस के साथ संभाला था। इसके अलावा उनकी घरेलू नीति नस्लीय भेदभाव से लड़ने और देश को आशा के एक साझा लक्ष्य के पीछे एकजुट करने पर केंद्रित किया था। जॉन एफ कैनेडी अमेरिका के एकमात्र कैथोलिक राष्ट्रपति थे।मृत्युजॉन एफ कैनेडी अमेरिका के 35वें राष्ट्रपति थे। कैनेडी ने साल 1961 से लेकर 1963 तक सत्ता संभाली थी। वहीं 22 नवंबर 1963 को टेक्सास के डलास शहर में अपने काफिले में यात्रा करते समय जॉन एफ कैनेडी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। गोली लगने के बाद कैनेडी को पार्कलैंड हॉस्पिटल लेकर जाया गया, लेकिन उनकी मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 22 Nov 2025 21:10:59 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Mulayam Singh Yadav Birth Anniversary: राजनीति में अपने दांव&#45;पेंच से विरोधियों को पस्त कर देते थे &amp;apos;धरती पुत्र&amp;apos; मुलायम सिंह यादव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 22 नवंबर को समाजवादी पार्टी के संस्थापक और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव का जन्म हुआ था। अखाड़े में दांव-पेंच आजमाने वाले मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक सफर में भी अपने प्रतिद्वंदियों को भी पटखनी दी थी। मुलायम सिंह यादव की गिनती सिर्फ प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के दिग्गज नेताओं में होती थी। उन्होंने 70 के दशक में राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी। नेताजी सत्ता के शिखर तक पहुंचे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुलायम सिंह यादव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई गांव में 22 नवंबर 1939 को मुलायम सिंह यादव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सुघर सिंह यादव और मां का नाम मूर्ति देवी था। वह किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे। वहीं मुलायम सिंह यादव छात्र जीवन से राजनीति में सक्रिय हो गए थे। इसे भी पढ़ें: Dara Singh Birth Anniversary: जीवन में एक भी कुश्ती नहीं हारे थे दारा सिंह, अभिनय और लेखन में भी आजमाया हाथराजनीतिक सफरछात्र राजनीति हो या फिर राष्ट्रीय राजनीति, मुलायम सिंह यादव ने अपने नाम का सिक्का जमाया था। उनकी कोई चाहकर भी अनदेखी नहीं कर सकता था। उन्होंने बहुत कम समय में मुख्यमंत्री के पद का सफर तय किया था। सीएम से लेकर वह देश के रक्षामंत्री बने। फिर एक समय ऐसा भी आया, जब मुलायम सिंह यादव का नाम प्रधानमंत्री पद की रेस में भी शामिल हुआ था। लेकिन उनका पीएम बनने का सपना अधूरा रह गया।पहली बार बने विधायकसाल 1962 में जब पहली बार छात्र संघ चुनाव की घोषणा हुई, तो मुलायम सिंह ने भी चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस दौरान वह छात्र संघ के अध्यक्ष बन गए। छात्र राजनीति के दौरान ही मुलायम सिंह यादव अपने सियासी गुरु चौधरी नत्थू सिंह के संपर्क में आए। उनकी मेहनत देख उन्हें अपने गुरु का आशीर्वाद मिला। मुलायम सिंह यादव महज 28 साल की उम्र में विधायक बन गए। फिर साल 1967 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव जसवंतनगर की सीट से पहली बार विधायक चुने गए।तीन बार बने UP के CMमुलायम सिंह यादव यूपी की राम नरेश यादव सरकार में मंत्री बने। फिर साल 1980 में वह लोकदल के अध्यक्ष बने और साल 1982 में यूपी विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चुने गए। उन्होंने कुछ ही साल में अपने नाम का सिक्का यूपी की राजनीति में जमा लिया। साल 1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार विधायक बनने वाले मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। फिर साल 1993 में कांशीराम और मायावती की पार्टी बसपा की सहायता से नेताजी दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। साल 2003 में तीसरी बार वह यूपी के सीएम बने।मुलायम सिंह यादव 9 बार विधायक बने। फिर साल 1996 से 2019 तक मुलायम सिंह यादव 7 बार जीतकर लोकसभा पहुंचे। 57 साल के राजनीतिक सफर में मुलायम सिंह यादव 9 बार विधायक और 7 बार सांसद बने और 3 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। अब तक यह कारनामा उनके सिवा कोई दूसरा नहीं कर पाया है।मृत्युसमाजवाद की राजनीति करने वाले &#039;धरती पुत्र&#039; मुलायम सिंह यादव ने 10 अक्तूबर 2022 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 22 Nov 2025 21:10:58 +0530</pubDate>
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<title>CV Raman Death Anniversary: सीवी रमन ने भारत को दिलाई विज्ञान की दुनिया में एक अलग पहचान, देश का बढ़ाया था मान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 21 नवंबर को देश के महान वैज्ञानिक सीवी रमन का निधन हो गया था। उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय योगदान दिए हैं। लेकिन रमन प्रभाव सबसे ज्यादा अहम है। डॉ सीवी रमन को नोबेल पुरस्कार उनके जीवन के आधे पड़ाव पर ही मिल गया था। सीवी रमन ने अपना पूरा जीवन देश में विज्ञान और उसकी शिक्षा के लिए लगा दिया। सीवी रमन एक कर्मठ, समर्पति वैज्ञानिक, शिक्षक और देशभक्त के रूप में कार्य करते रहे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ सीवी रमन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारब्रिटिश इंडिया की मद्रास प्रेसिडेंसी के तिरुचिरापल्ली में 07 नवंबर 1888 को चंद्रशेखर वेंकट रमन का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम चंद्रशेखर रामनाथन अय्यर था और मां का नाम पार्वती अम्मल था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। रमन पढ़ाई करने में काफी तेज थे। उन्होंने महज 11 साल की उम्र में 10वीं की परीक्षा दी और पहली पोजिशन पाया। वहीं साल 1903 में 14 साल की उम्र में सीवी रमन को हॉस्टल भेज दिया गया। उन्होंने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। उनको बचपन से ही भौतिकी में काफी रुचि थी। साल 1904 में उन्होंने डिग्री हासिल की और फिजिक्स और इंग्लिश में मेडल दिया गया था।इसे भी पढ़ें: Indira Gandhi Birth Anniversary: देश की सियासत पर छा गई इंदिरा गांधी, ऐसे शुरू हुआ था &#039;आयरन लेडी&#039; का सफरविज्ञान संस्थानों की स्थापनासीवी रमन उन वैज्ञानिकों में नहीं थे, जो सिर्फ अपने प्रयोगों में डूबे रहते थे। साल 1926 में उन्होंने इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स की शुरुआत की थी। इसके बाद साल 1933 में बेंगलुरू में भारतीय विज्ञान संस्थान के पहले निदेशक का पद संभाला। फिर इसी साल उन्होंने भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थापना भी की। साल 1948 में सीवी रमन के भारतीय विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत्त होने के एक साल बाद उन्होंने रमन अनुसंधान संस्थान की स्थापना की। फिर साल 1970 तक वह इसी संस्थान में सक्रिय रहे।विशेष पत्थरों की कलेक्शनबता दें कि रमन ने जीवनभर में कई खास खनिज, पत्थर और अन्य पदार्थ जमा किए। उन्होंने प्रकाश प्रकीर्णन गुणों के लिए एकत्र किया था। जिनमें से कुछ उन्होंने खुद तलाश किए थे। तो कुछ उनको उपहार के रूप में मिले थे। सीवी रमन अपने साथ हमेशा एक छोटा स्पैक्ट्रोस्कोप रखा करते थे। इसको आज भी आईआईएससी में देखा जा सकता है।मृत्युवहीं 21 नवंबर 1970 को 82 साल की उम्र में सीवी रमन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 21 Nov 2025 18:03:37 +0530</pubDate>
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<title>Rani Laxmi Bai Birth Anniversary: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बहादुर नायिका थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों से जमकर लिया था लोहा</title>
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<description><![CDATA[ भारत के इतिहास में झांसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने साहस, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की लौ को अमर कर दिया। आज ही के दिन यानी की 19 नवंबर को रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। रानी लक्ष्मीबाई की कहानी सिर्फ तलवार और घोड़े की नहीं बल्कि उस जज्बे की है, जो भारत के गौरव, अधिकारों की रक्षा और स्वाभिमान को बचाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत से भिड़ गई। लक्ष्मी बाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख और बहादुर नायिका हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के वाराणसी में 19 नवंबर 1828 को लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही घुड़सवारी, तीर-कमान और तलवारबाजी में निपुण हो गए थे। विवाह के बाद वह झांसी की रानी बनीं लेकिन जब अंग्रेजों ने उनकी झांसी को अन्यायपूर्ण तरीके से हड़पने का प्रयास किया, तो लक्ष्मीबाई ने साम्राज्य की नींव हिला देने वाला जवाब दिया कि &#039;मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी&#039;।इसे भी पढ़ें: Lala Lajpat Rai Death Anniversary: लाला लाजपत राय की एक दहाड़ से हिल गए थे अंग्रेज, मौत के बाद भी बने प्रेरणारानी लक्ष्मीबाई का संघर्षसाल 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी की कहानी उभरी। भारत के बहुत सारे हिस्सों पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कब्जा कर लिया था। वहीं राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद झांसी पर ब्रिटिशों का खतरा मंडराने लगा। तब रानी लक्ष्मीबाई ने अपने राज्य और प्रजा की रक्षा के लिए मोर्चा संभाला।युद्ध और विजय की कहानीसाल 1857 में स्वतंत्रता संग्राम भड़क उठा, तो रानी लक्ष्मीबाई ने इस संघर्ष में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इस दौरान लक्ष्मीबाई ने झांसी की सेना का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सेना से लड़ाई की। लक्ष्मीबाई की बहादुरी और नेतृत्व के चलते लोग उनको झांसी की महान नेता मानते थे। रानी लक्ष्मीबाई ने न सिर्फ अपने राज्य झांसी की रक्षा की, बल्कि पूरे देश को यह साबित कर दिखाया कि महिलाएं भी युद्ध के मैदान में डटकर दुश्मनों का सामना कर सकती हैं। मृ्त्युझांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का सबसे बड़ा उदाहरण उनका आखिरी युद्ध था। जब झांसी की तरफ से रानी को हार की संभावना दिखी, तो उन्होंने अपने बेटे को सुरक्षित जगह पर भेज किया और खुद वीरता के साथ युद्ध में भाग लिया। साल 1858 में ग्वालियर के पास कोटा की सराय में रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ आखिरी युद्ध लड़ा और 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हुईं। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 13:34:05 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Rani, Laxmi, Bai, Birth, Anniversary:, भारतीय, स्वतंत्रता, संग्राम, की, बहादुर, नायिका, थीं, रानी, लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों, से, जमकर, लिया, था, लोहा</media:keywords>
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<title>Dara Singh Birth Anniversary: जीवन में एक भी कुश्ती नहीं हारे थे दारा सिंह, अभिनय और लेखन में भी आजमाया हाथ</title>
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<description><![CDATA[ अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान दारा सिंह का 19 नवंबर को जन्म हुआ था। दारा सिंह अपने जमाने के बेहतरीन रेसलर ही नहीं बल्कि एक शानदार अभिनेता भी थे। हिंदी सिनेमा में एंट्री मारने के बाद दारा सिंह ने कई फिल्मों को प्रोड्यूस किया था। दारा सिंह ने 500 मुकाबले लड़े और हर किसी में जीत हासिल की। दारा सिंह एक भी जंग नहीं हारे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर दारा सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर स्थित धरमूचक गांव में 19 नवंबर 1928 को दारा सिंह का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सूरत सिंह रंधावा और मां का नाम बलवंत कौर था। दारा सिंह को बचपन से ही पहलवानी का शौक था। इसलिए जब भी उनको मौका मिला, वह अपने प्रतिद्वंद्वी को धूल चटा देते थे।इसे भी पढ़ें: Gemini Ganesan Birth Anniversary: साउथ इंडस्ट्री के रोमांस किंग कहे जाते थे जेमिनी गणेशन, दीदार के लिए तरसती थीं लड़कियांकुश्ती विजय यात्रासाल 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो दारा सिंह ने सिंगापुर पहुंचकर मलेशिया के पहलवान को चारों खाने चित्त कर दिया था। उन्होंने सिंगापुर में ही हरमान सिंह से कुश्ती की ट्रेनिंग ली थी। साल 1948-49 के आसपास दारा सिंह ने कुआलालंपुर में तरलोक सिंह को हराया था। दारा सिंह को इस जीत के साथ &#039;चैम्पियन ऑफ मलेशिया&#039; का खिताब दिया गया। फिर करीब 5 सालों बाद वह दुनियाभर के पहलवानों को धूल चटाते रहे। वहीं साल 1954 में वह कुश्ती चैम्पियन भारतीय कुश्ती के चैंपियन बने। उनका कुश्ती में इतना दबदबा था कि उनके सामने अखाड़े में विश्व चैंपियन किंग कॉन्ग भी नहीं टिक पाए थे।विश्व विजेता किंग कॉन्ग को शिकस्त देने के बाद दारा सिंह ने न्यूजीलैंड और कनाडा के पहलवानों ने खुली चुनौती दी। लेकिन दारा सिंह ने  न्यूजीलैंड के जॉन डिसिल्वा को और कनाडा के चैंपियन जॉर्ज गोडियां को भी पटखनी दे दी। दारा सिंह ने कहा था कि जब तक वह &#039;विश्व चैंपियनशिप&#039; न जीत लें, तब तक कुश्ती लड़ते रहेंगे। 29 मई 1968 को दारा सिंह ने अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को हराया और फ्रीस्टाइल कुश्ती के बादशाह बन गए।अपराजेय पहलवान थे दारा सिंहआपको ये जानकर हैरानी होगी कि दारा सिंह ने 500 मुकाबले लड़े और हर किसी में जीत हासिल की। दारा सिंह एक भी जंग नहीं हारे और साल 1983 में उन्होंने आखिरी मुकाबला लड़ा और फिर पेशेवर कुश्ती को अलविदा कह दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने दारा सिंह को अपराजेय पहलवान के खिताब से नवाजा था।फिल्म और लेखनपहलवानी करते हुए दारा सिंह ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। साल 1952 में उन्होंने फिल्म &#039;संगदिल&#039; से अभिनय की शुरूआत की थी। कुछ दिन दारा सिंह ने फिल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाए थे। साल 1962 में बाबूभाई मिस्त्री की फिल्म &#039;किंग कॉन्ग&#039; में दारा सिंह ने मुख्य अभिनेता के तौर पर काम किया था। इसके बाद दारा सिंह ने एक्ट्रेस मुमताज के साल 16 फिल्मों में काम किया था। दारा सिंह ने एक्टिंग के अलावा लेखन और निर्देशन में भी हाथ आजमाया था।बता दें कि दारा सिंह ने 7 फिल्मों की कहानी लिखी है। इसके अलावा वह रामानंद सागर की &#039;रामायण&#039; में हनुमान के रोल से अमर हो गए। दारा सिंह को आज भी इस किरदार के लिए याद किया जाता है। फिल्मों के साथ-साथ दारा सिंह ने राजनीति में भी कदम रखा। साल 1998 में दारा सिंह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की। फिर साल 2003 में दारा सिंह राज्यसभा सांसद बने।मृत्युवहीं 12 जुलाई 2012 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से दारा सिंह इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए थे। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 13:34:03 +0530</pubDate>
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<title>Indira Gandhi Birth Anniversary: देश की सियासत पर छा गई इंदिरा गांधी, ऐसे शुरू हुआ था &amp;apos;आयरन लेडी&amp;apos; का सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 19 नवंबर को भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्म हुआ था। इंदिरा गांधी भारत की राजनीति का एक ऐसा नाम हैं, जिनका व्यक्तित्व हमेशा चर्चा में बना रहा। पार्टी के अलावा विपक्ष के लोग भी इंदिरा गांधी का नाम सम्मान से लेते रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी ने कई ऐसे फैसले लिए, जिनके कारण इंदिरा गांधी को &#039;आयरन लेडी&#039; कहा गया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर इंदिरा गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को इंदिरा गांधी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जवाहर लाल नेहरू था, जोकि आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। वहीं मां का नाम कमला नेहरू था। उनके दादा मोतीलाल नेहरू ने उनका नाम इंदिरा रखा था। लेकिन पिता जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा के सलोने रूप की वजह से उनके नाम में प्रियदर्शनी भी जोड़ दिया था।इसे भी पढ़ें: Rani Laxmi Bai Birth Anniversary: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बहादुर नायिका थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों से जमकर लिया था लोहावानर सेना बनाईउस दौरान कमला नेहरू की तबीयत खराब रहती थी। उनके जब थोड़ी तबीयत सुधरी तब इंदिरा 11 साल की थीं। वह अपने पिता और दादाजी की तरह देश की सेवा करना चाहती थीं। लेकिन अबोध बालिका समझकर किसी ने उनका हौसला नहीं बढ़ाया। लेकिन वह हतोत्साहित नहीं हुई। उन्होंने आसपास के बच्चों को बुलाकर एक भाषण दिया। इंदिरा ने तय किया कि वह बच्चों की सहायता से एक संगठन तैयार करेंगी। जिसका नाम &#039;वानर सेना&#039; रखा गया।धीरे-धीरे करीब 6,000 बच्चों ने इसकी सदस्या ग्रहण की थी। फिर यह वानर कांग्रेस के लिए काम करने लगीं। बच्चे कांग्रेस के पर्चे बांटते और घायल लोगों की सेवा करते थे। यह अंग्रेजों का दौर था, यह सब देखकर जवाहर लाल नेहरू को लगा कि देश के हिसाब से इंदिरा गांधी स्वयं को तैयार कर रही हैं। जहां एक ओर इंदिरा का बचपन बीत रहा था, उधर राजनीतिक हलचल बढ़ती जा रही थी।पीएम कार्यकालसियासत में माहिर इंदिरा गांधी के कुछ फैसले विवादित रहे। वहीं प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी की सिफारिश पर देश में आपातकाल लगाया गया। जिस कारण उनको अपनी सत्ता से हाथ धोना पड़ा। वहीं एक अन्य फैसला साल 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई इंदिरा गांधी की मौत का कारण बना।मृत्युअमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई के बाद इंदिरा गांधी के अपने सिख अंगरक्षकों ने 31 अक्तूबर 1984 को उनकी गोली मारकर हत्याकर दी थी। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 13:34:02 +0530</pubDate>
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<title>Gemini Ganesan Birth Anniversary: साउथ इंडस्ट्री के रोमांस किंग कहे जाते थे जेमिनी गणेशन, दीदार के लिए तरसती थीं लड़कियां</title>
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<description><![CDATA[ साउथ इंडस्ट्री के सुपरस्टार जेमिनी गणेशन का आज ही के दिन यानी की 17 नवंबर को जन्म हुआ था। जेमिनी गणेशन ने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिल पर अलग ही छाप छोड़ी थी। रोमांटिक किरदार निभाने में जेमिनी को कोई टक्कर नहीं दे पाया। एक्टर हर किरदार को इतने अच्छे से निभाते थे कि लड़कियां पर्दे पर देखकर उन पर जान छिड़कती थीं। यही कारण है कि जेमिनी गणेशन को साउथ इंडस्ट्री के रोमांस किंग कहे जाने लगे थे। भले ही अभिनेता हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन फिर भी उनका रोमांटिक अंदाज आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जेमिनी गणेशन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के पुडुकोट्टई में 17 नवंबर 1920 को जेमिनी गणेशन का जन्म हुआ था। उनका असली नाम रामास्वामी गणेशन था। वह फिल्मों के अलावा अपनी निजी जिंदगी को लेकर भी काफी सुर्खियां बटोरते थे। अभिनेता ने 4 शादियां की थीं, लेकिन उन्होंने कभी भी पब्लिकली इस बात को स्वीकार नहीं किया। बताया जाता है कि अभिनेता ने बॉलीवुड एक्ट्रेस रेखा की मां पुष्पावल्ली से मंदिर में शादी की थी। लेकिन उन्होंने कभी रेखा की मां को सार्वजनिक रूप से पत्नी का दर्जा नहीं दिया। इस कारण से अभिनेत्री रेखा ने भी जेमिनी गणेशन को कभी अपना पिता नहीं माना।इसे भी पढ़ें: Pankaj Dheer Birth Anniversary: महाभारत के &#039;कर्ण&#039; बनकर पंकज धीर को मिली लोकप्रियता, ऐसा रहा फिल्मी सफरफिल्मी करियरअभिनेता के फिल्मी करियर की बात करें, तो फिल्मों में आने से पहले जेमिनी गणेशन मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज में केमिस्ट्री के लेक्चरर थे। फिर उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा। इसके बाद साल 1974 से उन्होंने अभिनय की शुरूआत फिल्म &#039;मिस मालिनी&#039; से की थी। फिर अभिनेता ने साउथ इंडस्ट्री से लेकर बॉलीवुड तक में अपना नाम कमाया। जेमिनी गणेशन ने अपने फिल्मी करियर में करीब 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। वहीं साल 1996 में जेमिनी गणेशन की आखिरी फिल्म &#039;अव्वई शनमुगी&#039; थी।रोमांस के बादशाहजेमिनी गणेशन को सिर्फ फिल्मों का ही नहीं बल्कि असल जिंदगी में भी रोमांस के बादशाह थे। अभिनेता ने 4 महिलाओं से अपना रिश्ता जोड़ा, लेकिन सिर्फ कानूनी तौर पर उन्होंने एक को ही अपनी पत्नी माना। साल 1940 में 19 साल की उम्र में जेमिनी ने अलामेलु से शादी की। जिसको उन्होंने पत्नी माना। इसके अलावा अभिनेत्री रेखा की मां पुष्पावल्ली, सावित्री और जूलियाना से जुड़ा। माना जाता है कि जेमिनी गणेशन का आखिरी रिश्ता जूलियाना के साथ रहा था। जेमिनी और जूलियाना के बीच 36 साल का अंतर था।पर्सनल लाइफबॉलीवुड अभिनेत्री रेखा की मां पुष्पावल्ली साउथ इंडस्ट्री की बेहतरीन अदाकाराओं में से एक थीं। जेमिनी और पुष्पावल्ली ने एक साथ फिल्मों में काम किया। इस बीच दोनों की दोस्ती हुई और जल्द ही यह दोस्ती प्यार में बदल गई। माना जाता है जेमिनी ने पुष्पावल्ली से गुपचुप शादी रचाई थी। लेकिन इस रिश्ते को उन्होंने कभी सार्वजनिक नाम नहीं दिया। जिस कारण रेखा ने भी अपने पिता का नाम कभी नहीं मिला। फिल्मों में सर्वश्रेष्ण योगदान के लिए जेमिनी गणेशन को भारत सरकार की तरफ से साल 1971 में &#039;पद्मश्री&#039; से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 22 मार्च 2005 को जेमिनी गणेशन ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 18 Nov 2025 10:01:20 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Gemini, Ganesan, Birth, Anniversary:, साउथ, इंडस्ट्री, के, रोमांस, किंग, कहे, जाते, थे, जेमिनी, गणेशन, दीदार, के, लिए, तरसती, थीं, लड़कियां</media:keywords>
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<title>Bal Thackeray Death Anniversary: महाराष्ट्र की सियासत के कंट्रोलर रहे बाल ठाकरे, इशारों पर घूमती थी राजनीति</title>
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<description><![CDATA[ महाराष्ट्र की राजनीति में एक ताकतवर नेता के रूप में प्रसिद्ध बाल ठाकरे का 17 नवंबर को निधन हुआ था। बाल ठाकरे की छवि एक कट्टर हिंदू नेता के रूप में थी। इस कारण बाल ठाकरे को हिंदू सम्राट भी कहा जाता है। एक दौर था, जब महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे की तूती बोलती थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चाहे कोई भी बैठा, लेकिन बाल ठाकरे अपना वर्चस्व हमेशा कायम रखते थे। वह अपनी मुखरता के लिए जाने जाते थे। बाल ठाकरे कुछ भी कहने से संकोच नहीं करते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाल ठाकरे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबाल ठाकरे का जन्म 12 जनवरी 1926 को हुआ था। इनके पिता का नाम केशव सीताराम ठाकरे था। बाल ठाकरे अपने पिता की विचारधारा से काफी ज्यादा प्रभावित थे। उन्होंने अपने करियर की शुरूआत एक पत्रकार और कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी। उन्होंने &#039;द फ्री प्रेस जर्नल&#039; से करियर की शुरुआत की। फिर उनके कार्टून &#039;टाइम्स ऑफ इंडिया&#039; में भी छपे। लेकिन जल्द ही उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और &#039;मार्मिक&#039; नाम से अपनी खुद की पॉलिटिकल मैगजीन शुरू की।इसे भी पढ़ें: Vinoba Bhave Death Anniversary: भूदान आंदोलन के नायक थे विनोबा भावे, राजनीति से रखा खुद को दूरराजनीतिक सफरसाल 1966 में बाल ठाकरे ने शिवसेना नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई। वामपंथी पार्टियों के खिलाफ खड़ी की गई शिवसेना ने मुंबई में मजदूर आंदोलनों को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह वो दौर था, जब बाल ठाकरे को दो झटके लगे। साल 1996 में बाल ठाकरे की पत्नी मीना ठाकरे और बेटे बिंदुमाधव की मौत हो गई। लेकिन बाल ठाकरे ने परिस्थितियों के सामने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया और मजबूती से खड़े रहे।उनका राजनीतिक कद बढ़ता गया और इस दौरान भारतीय राजनीति की दक्षिणपंथी धुरी भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना स्वाभाविक दोस्त बनकर उभरीं। वहीं शिवसेना भाजपा की सबसे पहली सहयोगी पार्टी भी बनी। बता दें कि बाल ठाकरे राजनीति का वह चेहरा रहे, जिनके इर्द-गिर्द महाराष्ट्र की राजनीति करीब चार दशक तक घूमती रही। किसी के लिए नायक तो किसी के लिए खलनायक रहे बाल ठाकरे जब तक जीवित रहे, हमेशा अपनी शर्तों पर जीते रहे।मृत्युवहीं 17 नवंबर 2012 को बाल ठाकरे ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 18 Nov 2025 10:01:19 +0530</pubDate>
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<title>Lala Lajpat Rai Death Anniversary: लाला लाजपत राय की एक दहाड़ से हिल गए थे अंग्रेज, मौत के बाद भी बने प्रेरणा</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता, समाज सुधारक और लेखक लाला लाजपत राय का 17 नवंबर को निधन हो गया था। लाला लाजपत राय को पंजाब केसरी के नाम से जाने जाते थे। उनका जीवन स्वतंत्रता के एक अहम अध्याय का हिस्सा बन चुका था। देश की आजादी के लिए लाला लाजपत राय ने हर भारतीय के दिल में एक लौ जलाई थी। दुनिया के सामने भारत को एक महान देश के तौर पर खड़ा करने में लाला लाजपत राय ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर लाला लाजपत राय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के जिला फरीदकोट के ढहिया गांव में 28 जनवरी 1865 को लाला लाजपत राय का जन्म हुआ था। उनका शैक्षणिक जीवन बेहद प्रेरणादायक था, क्योंकि लाला लाजपत राय समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं से हमेशा लड़ने के लिए तत्पर रहते थे। इसे भी पढ़ें: Bal Thackeray Death Anniversary: महाराष्ट्र की सियासत के कंट्रोलर रहे बाल ठाकरे, इशारों पर घूमती थी राजनीतिदेश की आजादी में भागीदारीलाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। उनका मानना था कि अंग्रेजों के खिलाफ सिर्फ राजनीतिक संघर्ष ही नहीं बल्कि आर्थिक सुधार और सामाजिक सुधार भी जरूरी है। लाला लाजपत राय ने पंजाब के विभिन्न हिस्सों में जागरुकता फैलाने के लिए जनसभाएं आयोजित की थीं।साइमन कमीशनसाल 1928 में लाला लाजपत राय ने साइमन कमीशन का नेतृत्व किया था। इस कमीशन में कोई भारतीय सदस्य नहीं था, जिसका विरोध करने के लिए लाला लाजपत राय ने लाहौर में बड़ा आंदोलन किया था। इस दौरान पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर लाठीचार्ज हुआ, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए थे।समाज सुधारकलाला लाजपत राय ने सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं बल्कि समाज सुधार के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए थे। उन्होंने भारतीय समाज में बाल विवाह, जातिवाद और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई थी। अमेरिका में भी लाला लाजपत राय ने भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया था। उनका मानना था कि विदेशों में बसे भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।मृत्युसाइमन कमीशन के विरोध में हुए आंदोलन में लाठी चार्ज होने पर लाला लाजपत राय को गंभीर चोट लगी थीं। जिस कारण 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 18 Nov 2025 10:01:18 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Lala, Lajpat, Rai, Death, Anniversary:, लाला, लाजपत, राय, की, एक, दहाड़, से, हिल, गए, थे, अंग्रेज, मौत, के, बाद, भी, बने, प्रेरणा</media:keywords>
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<title>Birsa Munda Birth Anniversary: 25 साल की उम्र में बिरसा मुंडा बने &amp;apos;धरती आबा&amp;apos;, अंग्रेजों के खिलाफ चलाया था आंदोलन</title>
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<description><![CDATA[ जिस समय भारत के राष्ट्रपति महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। उसी समय भारत में बिरसा मुंडा गुलामी के खिलाफ लड़ रहे थे। आज ही के दिन यानी की 15 नवंबर को बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। बिरसा मुंडा को सिर्फ झारखंड ही नहीं बल्कि देश-दुनिया में धरती आबा के नाम से जाना जाता है। बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज की पहचान बनाने के लिए काफी संघर्ष किया। उन्होंने ईसाई धर्म के खिलाफ बिरसाइत धर्म की शुरूआत की। वहीं सिर्फ 25 साल की उम्र में बिरसा मुंडा ने देश के लिए बड़ा इतिहास लिख दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बिरसा मुंडा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाझारखंड के खूंटी जिले के उलीहातू गांव में 15 नवंबर 1875 को बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम करमी और मां का नाम सुगना था। उनकी शुरूआती शिक्षा सलमा में हुई और फिर वह मिशन स्कूल में पढ़ने गए। साल 1890 में उन्होंने चाईबासा छोड़ा और साल 1895 में बिरसा मुंडा ने मुंडाओं को एकजुट करके उलगुलान शुरू किया। उनका प्रभाव इतना अधिक था कि सरकार आंदोलन के योद्धा भी उलगुलान से जुड़ गए। वहीं बिरसा मुंडा की बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेज काफी परेशान थे।इसे भी पढ़ें: Nathuram Godse Death Anniversary: कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे क्यों बना महात्मा गांधी का दुश्मन, जानिए अनसुने किस्सेबिरसा मुंडा से डरने लगे अंग्रेजबहुत कम समय में बिरसा मुंडा इतने अधिक लोकप्रिय हो गए कि अंग्रेज उनसे डरने लगे थे। ब्रिटिश सरकार ने बिरसा मुंडा पर 500 रुपए का इनाम घोषित किया। उन्होंने जनजातीय समाज को बचाने के लिए काफी काम किया। इसलिए लोग उनको धरती आबा कहते थे। बिरसा मुंडा ने कहा कि ईसाई धर्म जनजातीय संस्कृति को खत्म करने का प्रयास कर रहा है। इसलिए बिरसा मुंडा ने बिरसाइत धर्म को शुरू किया। जनजातीय लोगों को उनकी पहचान बनाए रखने में यह धर्म मदद करता है। उन्होंने समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। अंग्रेजों के साथ अंतिम लड़ाईखूंटी जिले में एक पहाड़ी का नाम डोंबारी बुरू है। यह पहाड़ी झारखंड की पहचान और संघर्ष का प्रतीक है। इस पहाड़ी पर बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम लड़ाई लड़ी थी। वहीं सइल रकब पहाड़ी पर बिरसा मुंडा के समर्थकों पर 09 जनवरी 1900 को पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। यह बिरसा मुंडा के समर्थकों की शहादत की भूमि है। यहां पर शहीदों की याद में 110 फीट ऊंचा विशाल स्तंभ बनाया गया है।मृत्युवहीं ब्रिटिश सरकार ने बिरसा मुंडा पर 500 रुपए का इनाम घोषित कर दिया। साल 1895 में पहली बार और 1900 में दूसरी बार बिरसा मुंडा को गिरफ्तार किया गया। वहीं 09 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा मुंडा की मौत हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 17 Nov 2025 10:03:34 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Vinoba Bhave Death Anniversary: भूदान आंदोलन के नायक थे विनोबा भावे, राजनीति से रखा खुद को दूर</title>
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<description><![CDATA[ समाज सेवा, अहिंसा और आत्म-ज्ञान की मिसाल रहे विनोबा भावे का 15 नवंबर को निधन हो गया था। विनोबा भावे के भारत के राष्ट्रीय शिक्षक के रूप में सम्मानित किया गया था। उनका असली नाम विनायक नरहरी भावे था। लेकिन वह विनोबा भावे के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हुए। विनोबा भावे भी महात्मा गांधी की तरह सत्य, अहिंसा और समानता के सिद्धांतों को मानने वाले थे। उनका मानना था कि सिर्फ बाहरी दुनिया में बदलाव महत्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि आपके अपने अंदर भी परिवर्तन होना चाहिए। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के कोंकण के गागोदा गांव में 11 सितंबर 1895 को विनायक नरहरि भावे का चितपाव ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। इनकी मां रुकमणी बाई धार्मिक महिला थीं, ऐसे में विनोबा को अपनी मां से धार्मिक शिक्षा मिली। मां से विनोबा भावे को संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, गुरू रामदास, नामदेव, और शंकराचार्य की कथाएं सुनने के अलावा रामायण, महाभारत और उपनिषदों के तत्वज्ञान मिले। उन्होंने हाईस्कूल में फ्रेंच सीखा और साहित्य के साथ संस्कृत और वेद उपनिषद भी पढ़े।इसे भी पढ़ें: Birsa Munda Birth Anniversary: बिरसा मुंडा ने हिला दिया था अंग्रेजों का सिंहासनशुरू किया भूदान आंदोलनबता दें कि विनोबा भावे का सबसे बड़ा योगदान भूदान आंदोलन के रूप में था, जोकि उन्होंने साल 1951 में शुरू किया था। इस आंदोलन को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य गरीबों को जमीन देने और उनके जीवन को बेहतर बनाना था। इस दौरान विनोबा भावे ने देशभर के कई गांवों में जाकर बड़े जमींदारों से जमीन प्राप्त की और उस जमीन को गरीबों में बांटा। विनोबा भावे का मानना था कि संपत्ति का बंटवारा ही समाज में न्याय और समानता ला सकता है।अंहिसा को मानते थे विनोबा भावेविनोबा भावे के इस आंदोलन ने भारतीय समाज में जमीन के मालिकाना हक को लेकर जागरुकता फैलाई। वहीं उनका यह कदम समाज में गरीबी कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। विनोबा भावे की सोच ने समाज में एक गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा अहिंसा के सिद्धांत को बनाए रखा और यह भी कहा कि हिंसा सिर्फ बाहरी रूप में नहीं बल्कि मन में भी हो सकती है। क्योंकि विनोबा भावे का मानना था कि हिंसक मन को शांत करना बेहद जरूरी है, क्योंकि सिर्फ बाहरी तौर पर अहिंसक बनने से कुछ नहीं होता है।निडरताविनोबा भावे का एक और अहम सिद्धांत था, &#039;निडरता से प्रगति और विनम्रता से सुरक्षा।&#039; विनोबा भावे का विश्वास था कि किसी भी काम करने के लिए आपका निडर होना बेहद जरूरी है, लेकिन उसके साथ ही विनम्रता हमें आंतरिक शांति और सुरक्षा देती है।मृत्युआजादी के बाद विनोबा भावे ने अपना बाकी का जीवन वर्धा में पवनार के ब्रह्म विद्या मंदिर आश्रम में गुजारा। अंतिम दिनों में विनोबा भावे ने अन्न-जल का त्याग कर दिया था और समाधी मरण को अपनाया था। जिसको जैन धर्म में संथारा भी कहा जाता है। वहीं 15 नवंबर 1982 को विनोबा भावे ने अंतिम सांस ली। मरणोपरांत विनोबा भावे को साल 1983 में &#039;भारत रत्न&#039; से नवाजा गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 11:38:03 +0530</pubDate>
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<title>Nathuram Godse Death Anniversary: कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे क्यों बना महात्मा गांधी का दुश्मन, जानिए अनसुने किस्से</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 नवंबर को नाथूराम गोडसे का निधन हुआ था। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी के सीने में गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। इस जुर्म में नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को फांसी की सजा दी गई थी। बताया जाता है कि वह हिंदू राष्ट्रवाद के कट्टर समर्थक थे, साथ ही नाथूराम कभी महात्मा गांधी के पक्के अनुयायी भी थे। लेकिन इसके बाद भी वह महात्मा गांधी के सबसे बड़े विरोधी बन गए और महात्मा गांधी की हत्याकर दी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नाथूराम गोडसे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुणे के बारामती में 19 मई 1910 को नाथूराम विनायकराव गोडसे का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम विनायक वामनराव गोडसे था, जोकि डाक विभाग में काम करते थे। वहीं मां गृहिणी थी। नाथूराम अपने परिवार के चौथे पुत्र थे और जन्म के समय इनका नाम रामचंद्र रखा गया था। नाथूराम से पहले पैदा हुए चार भाइयों की अकाल मृत्यु हो गई थी। ऐसे में परिवार वालों ने रामचंद्र का नाम बदलकर नाथूराम रख दिया और उनको 12 सालों तक लड़कियों की तरह पाला गया था। वहीं नाथूराम की नाक छिदवाई गई और फ्रॉक तक पहनाई जाती थी।इसे भी पढ़ें: Vinoba Bhave Death Anniversary: भूदान आंदोलन के नायक थे विनोबा भावे, राजनीति से रखा खुद को दूरRSS से जुड़ेएक समय में नाथूराम के पिता की पोस्टिंग महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुई थी। यहां पर गोडसे की मुलाकात कांग्रेस के नेताओं से हुई। इस दौरान नाथूराम गोडसे ने कांग्रेस की कई सभाओं में भाषण दिया और बताया जाता है कि रत्नागिरी में ही नाथूराम गोडसे की मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर से हुई। जिससे नाथूराम की विचारधारा बदली और वह RSS से जुड़ गए।नाथूराम गोडसे ने हैदराबाद निजाम के खिलाफ नागरिक अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। इस दौरान नाथूराम को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। वहीं जेल से छूटने के बाद नाथूराम गोडसे ने सावरकर के विचारों को फैलाने के उद्देश्य से एक अखबार शुरू किया। इस अखबार का नाम &#039;हिंदू राष्ट्र&#039; था, लेकिन कुछ ही समय बाद इस अखबार को बंद करने की नौबत आ गई।गांधी विरोधी बना गोडसेदेश की आजादी के बाद महात्मा गांधी जिस तरह से मुस्लिमों को बचाने के लिए अभियान में जुटे थे, यहीं से नाथूराम महात्मा गांधी का विरोधी बन गया। वहीं जब गोडसे ने सुना कि महात्मा गांधी चाहते हैं कि भारत, पाकिस्तान को करोड़ रुपए देंगे तो उसने तय कर लिया कि वह गांधीजी की हत्या कर देगा। लेकिन हत्या से पहले शायद ही कोई ऐसा मौका होगा, जब सार्वजनिक तौर पर गोडसे ने गांधीजी के खिलाफ कुछ बोला हो। हालांकि समय-समय पर गोडसे अपने अखबार में महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी के खिलाफ लिखा करते थे। नाथूराम गोडसे का मानना था कि गांधीजी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदी भाषा और हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए। गोडसे का मानना था कि महात्मा गांधी ने सारे प्रयोग हिंदुओं की कीमत पर किए थे।महात्मा गांधी की हत्यावहीं नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी को गोली मारी थी। जिस वक्त महात्मा गांधी की हत्या हुई, उस दौरान उनकी उम्र 78 साल थी। नाथूराम विनायक गोडसे ने गांधी जी की प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए तीन गोलियां मारकर हत्याकर दी थी।मृत्युमहात्मा गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन नाथूराम ने गांधीजी की हत्या के लिए खुद पर गर्व होने की बात कही। जिसके बाद कोर्ट के आदेशानुसार 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 11:38:01 +0530</pubDate>
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<title>K R Narayanan Death Anniversary: आसान नहीं था केआर नारायणन के राष्ट्रपति बनने का सफर, यहां जानें रोचक किस्सा</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 नवंबर को देश के 10वें राष्ट्रपति केआर नारायणन का निधन हो गया था। केआर नारायणन देश के पहले दलित राष्ट्रपति थे, लेकिन स्कूली शिक्षा से लेकर लंदन के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तक पढ़ाई में कहीं भी उनकी जाति का कोई योगदान नहीं रहा। भारतीय विदेश सेवा से रिटायर्ड होने के बाद केआर नारायणन ने राजनीति में प्रवेश किया। वह केरल से लगातार 3 बार सांसद रहे। वहीं राजीव गांधी की सरकार में नारायणन कैबिनेट मंत्री और फिर उपराष्ट्रपति बने। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर 10वें राष्ट्रपति केआर नारायणन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकेरल के त्रावणकोर जिले में उझानूर गांव में 27 अक्तूबर 1920 को के आर नारायणन का जन्म हुआ था। उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में शिक्षा ग्रहण की। उनके पिता का नाम कोचेरिल रमन थे, जोकि वैद्य आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। के आर नारायणन बेहद प्रतिभाशाली छात्र थे और पढ़ाई के प्रति उनके लगन को देखकर त्रावणकोर के शाही परिवार ने उन्हें कॉलेज जाने के लिए छात्रवृत्ति दी। उन्होंने कोट्टायम के सीएमएस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की थी। उन्होंने लंदन से हेरोल्ड लास्की के अधीन रह कर राजनीति विज्ञान का अध्ययन किया।इसे भी पढ़ें: CV Raman Birth Anniversary: महान वैज्ञानिक और शिक्षक थे सीवी रमन, भारतीय विज्ञान में दिया था अहम योगदानभारतीय विदेश सेवाउन्होंने भारतीय विदेश सेवा से अपने करियर की शुरूआत की। फिर साल 1948 में भारत लौटे। वहीं साल 1949 में उन्होंने भारतीय विदेश सेवा से अपने करियर की शुरुआत की। वह लंदन, रंगून, टोक्यो, कैनबरा और हनोई में दूतावासों में सेवा की। के आर नारायणन की कार्य कौशल की वजह से उनको चीन और तुर्की में भारत के राजदूत के तौर पर नियुक्त किया गया।अमेरिका में राजदूत एक राजनयिक के रूप में साल 1980 से लेकर 1984 तक केआर नारायणन का करियर शानदार रहा। उन्होंने तुर्की, चीन और थाईलैंड में भारतीय राजदूत के रूप में कार्य किया। उन्होंने विदेश मंत्रालय में सचिव के तौर पर भी काम किया। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में बतौर प्रोफेसर बच्चों को भी पढ़ाया।सियासी सफरसाल 1948 में लोकसभा से राजनीति में केआर नारायणन का राजनीति में प्रवेश हुआ। इस दौरान उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव में हिस्सा लिया। केरल के ओट्टपालम सीट से नारायणन ने जीत हासिल की। केआर नारायणन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की टिकट पर लगातार तीन बार आम चुनाव में हिस्सा लिया और जीत हासिल की। राजीव गांधी सरकार में वह राज्य मंत्री भी रहे। अपने सियासी सफर में केआर नारायणन ने पीएम इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के प्रशासन में विभिन्न मंत्री पद संभाले।भारत के 10वें राष्ट्रपतिफिर साल 1992 में केआर नारायणन को भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में चुना गया। इस दौरान देश के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा थे। फिर साल 1997 में केआर नारायणन को भारत के 10वें राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। केआर नारायणन इस प्रतिष्ठित पद को ग्रहण करने वाले केरल के पहले व्यक्ति और पहले दलित हैं। हालांकि इस बात में कोई दोराय नहीं कि वह एक कुशल राष्ट्रपति थे। उन्होंने एक कुशल राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति भवन की विज्ञप्तियों के जरिए राष्ट्र को अपने पद पर अपने कार्यों को समझाने की प्रथा की शुरुआत की।उन्होंने भारतीय राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर विभिन्न कार्यों का लेखन और सह-लेखन का कार्य किया। वह अपनी राजनीतिक उपलब्धियों से परे, अपने बौद्धिक कार्यों और निर्णयों के लिए जाने जाते थे। केआर नारायणन एक गहन विचारक होने के साथ सर्वज्ञानी वक्ता भी थे। वह भारतीय और वैश्विक दोनों मामलों की अच्छी और गहरी समझ रखते थे।मृत्युवहीं 09 नवंबर 2005 को केआर नारायणन का दिल्ली में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 09:06:53 +0530</pubDate>
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<title>Pankaj Dheer Birth Anniversary: महाभारत के &amp;apos;कर्ण&amp;apos; बनकर पंकज धीर को मिली लोकप्रियता, ऐसा रहा फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 नवंबर को भारतीय टेलीविजन और फिल्म जगत के फेमस अभिनेता पंकज धीर का निधन हो गया था। वह एक सफल अभिनेता ही नहीं बल्कि एक निर्देशक के रूप में भी जाने जाते थे। पंकज धीर की अभिनय क्षमता और गहराई आज भी नए कलाकारों के लिए प्रेरणा है।भारतीय टेलीविजन और फिल्म जगत के फेमस अभिनेता पंकज धीर का 09 नवंबर को जन्म हुआ था। उनको महाभारत के किरदार &#039;कर्ण&#039; के रूप में बहुत प्रसिद्धि मिली। उन्होंने &#039;कर्ण&#039; के रूप में जो अमिट छाप छोड़ी, वह आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है। वह एक सफल अभिनेता ही नहीं बल्कि एक निर्देशक के रूप में भी जाने जाते थे। पंकज धीर की अभिनय क्षमता और गहराई आज भी नए कलाकारों के लिए प्रेरणा है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता पंकज धीर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...इसे भी पढ़ें: सिनेमा के सुनहरे परदे और सुनहरे दौर का रोशन सितारा थीं सुलक्षणा पंडितजन्म और परिवारपंजाब में 09 नवंबर को 1956 को पंकज धीर का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम सीएल धीर था और वह फेमस डायरेक्टर थे। उन्होंने मुंबई से स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर पंकज धीर ने अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। कॉलेज के दिनों में पंकज की एक्टिंग में रुचि जागी और उन्होंने थिएटर और कॉलेज ड्रामों में हिस्सा लेना शुरूकर दिया।फिल्मी सफरग्रेजुएशन के बाद पंकज धीर ने फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कदम रखा। पंकज धीर का नाम सबसे पहले तब मशहूर हुआ, जब उन्होंने साल 1998 में बीआर चोपड़ा की &#039;महाभारत&#039; में कर्ण की भूमिका निभाई। उनका यह किरदार इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि आज भी दर्शक उनको इसी नाम से याद करते हैं। इसके बाद अभिनेता पंकज धीर ने &#039;युग&#039;, &#039;चंद्रकांता&#039; और &#039;ग्रेट मराठा&#039; जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में काम किया।फिल्मों में भी किया कामपंकज धीर सिर्फ एक्टर ही नहीं बल्कि वह एक निर्देशक के रूप में भी जाने जाते थे। उन्होंने &#039;माय फादर गॉडफादर&#039; नामक फिल्म का निर्देशन किया था। यह फिल्म दर्शकों को काफी पसंद आई थी। इसके अलावा उन्होंने &#039;बादशाह&#039;, &#039;सोल्जर&#039;, &#039;चंद्रकांता&#039; &#039;सनम बेवफा&#039;, और &#039;ससुराल सिमर का&#039; जैसे कई लोकप्रिय प्रोजेक्ट्स में भी काम किया है।मृत्युलंबे समय से अभिनेता पंकज धीर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और हॉस्पिटल में भर्ती थे। वहीं 15 अक्तूबर 2025 को 68 साल की उम्र में पंकज धीर का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 09:06:53 +0530</pubDate>
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<title>Abul Kalam Azad Birth Anniversary: देश के पहले शिक्षा मंत्री थे अबुल कलाम आजाद, शिक्षा के विकास में दिया अहम योगदान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 11 नवंबर को अबुल कलाम आजाद का जन्म हुआ था। कलाम आजाद देश के पहले शिक्षा मंत्री थे। वह एक शिक्षाविद्, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ के रूप में जाने जाते थे। अबुल कलाम आजाद ने भारत की शिक्षा संरचना को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने देश में शिक्षा के ढांचे में सुधार का सपना देखा था और इसको पूरा करने का प्रयास किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अबुल कलाम आजाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारसऊदी अरब के मक्का में 11 नवंबर 1888 को मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म हुआ था। उनकी मां एक अरब थीं और आजाद के पिता मौलाना खैरुद्दीन अफगान मूल के एक बंगाली मुस्लिम थे। जब अबुल कलाम दो साल के थे, तब साल 1890 में उनका परिवार वापस कलकत्ता आकर बस गया था।इसे भी पढ़ें: K R Narayanan Death Anniversary: आसान नहीं था केआर नारायणन के राष्ट्रपति बनने का सफर, यहां जानें रोचक किस्साकई भाषाओं का था ज्ञानअबुल कलाम आजाद ने पारंपरिक इस्लामी शिक्षा प्राप्त की थी। उनको घर में पढ़ाया जाता था और उनके पिता और बाद में नियुक्त शिक्षकों द्वारा शिक्षा दी गई, जोकि अपने-अपने क्षेत्रों में प्रतिष्ठित थे। उन्होंने पहले अरबी और फारसी सीखी और फिर ज्यामिति, दर्शन, गणित और बीजगणित सीखा। उन्होंने खुद से अंग्रेजी, विश्व इतिहास और राजनीति भी सीखी थी।दो साप्ताहिक पत्रिकाओं की शुरुआत कीसाल 1912 में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने मुस्लिमों के बीच क्रांतिकारी रंगरूटों को बढ़ाने के लिए उर्दू में एक साप्ताहिक पत्रिका की शुरूआत की। जिसका नाम &#039;अल-हिलाल&#039; था। इस पत्रिका ने मॉर्ले-मिंटो सुधारों के बाद दो समुदायों के बीच हिंदू-मुस्लिम एकता बनाने में अहम भूमिका निभाई। यह पत्रिका चरमपंथी विचारों को हवा देने वाला एक क्रांतिकारी मुखपत्र बन गया। वहीं साल 1914 में इसपर प्रतिबंध लगा दिया गया।फिर मौलाना आजाद ने भारतीय राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के समान मिशन के साथ &#039;अल-बालाग&#039; नामक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की। लेकिन साल 1916 में सरकार ने इस पर भी प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही मौलाना अबुल कलाम आजाद को कलकत्ता से निष्कासित कर दिया गया और उनको बाहर निर्वासित कर दिया। जहां पर उनको फर्स्ट वर्ल्ड व़र 1920 के बाद रिहा कर दिया गया।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्षमौलाना अबुल कलाम आजाद ने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन का समर्थन किया। फिर साल 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद साल 1923 में उनको दिल्ली में कांग्रेस के विशेष सत्र के अध्यक्ष के रूप में चुना गया। वहीं 35 साल की उम्र में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सेवा करने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति बन गए। फिर साल 1930 में उनको नमक सत्याग्रह के हिस्से के रूप में नमक कानूनों के उल्लंघन के लिए गिरफ्तार किया गया। इस दौरान उनको डेढ़ साल तक मेरठ जेल में रखा गया। फिर रिहाई के बाद साल 1940 में वह फिर से कांग्रेस के अध्यक्ष बने और साल 1946 तक इस पद पर बने रहे।भारत के पहले शिक्षामंत्रीदेश की आजादी के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद को स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया था। मौलाना आजाद के कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में कई सुधार हुए और उनको विश्वास था कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय विकास का एक साधन होना चाहिए। उन्होंने भारतीय शिक्षा में अतुलनीय योगदान दिया है। इसके अलावा मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, यूजीसी ग्रांट कमीशन और बैंगलोर स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस जैसे प्रमुख संस्थानों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।मृत्युवहीं 22 फरवरी 1958 को मौलाना अबुल कलाम आजाद का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 09:06:51 +0530</pubDate>
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<title>Jawahar Lal Nehru Birth Anniversary: आधुनिक भारत के शिल्पकार थे जवाहर लाल नेहरू, ऐसे बने देश के पहले PM</title>
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<description><![CDATA[ भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का 14 नवंबर को जन्म हुआ था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में पंडित नेहरू ने अहम योगदान दिया और वह आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री बने। उनका शुरूआती जीवन पढ़ाई, स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश की आजादी तक उनका सफर प्रेरणादायी है। उन्होंने 17 वर्षों तक देश के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। वहीं स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू ने देश की विदेश नीति, औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक विकास की नींव रखी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 14 नवंबर 1889 को पंडित जवाहर लाल नेहरू का एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू था, जोकि एक फेमस वकील थे। वहीं उनकी मां का नाम स्वरूप रानी था। वहीं पंडित नेहरू ने 14 साल की उम्र तक अपनी शुरूआती पढ़ाई की और फिर 15 साल की उम्र में वह इंग्लैंड के हैरो स्कूल गए। दो साल बाद वह कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए और वहां से नैचरल साइंस में ऑनर्स की डिग्री हासिल की।इसे भी पढ़ें: Abul Kalam Azad Birth Anniversary: देश के पहले शिक्षा मंत्री थे अबुल कलाम आजाद, शिक्षा के विकास में दिया अहम योगदानस्वतंत्रता संग्राम में योगदानपढ़ाई खत्म होने के बाद पंडित नेहरू भारत वापस लौट आए और राजनीति से जुड़ गए। उन्होंने महात्मा गांधी से प्रेरणा ली और किसान मार्च, असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। इसकी वजह से पंडित नेहरू को कई बार जेल जाना पड़ा। वहीं भारत की स्वतंत्रता को लेकर विदेशों का दौरा किया और आजादी से पहले और बाद में उन्होंने भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई।राजनीतिक सफरसाल 1916 में पंडित नेहरू महात्मा गांधी से मिले और उनसे काफी ज्यादा प्रभावित हुए। इसके बाद साल 1919 में पंडित नेहरू इलाहाबाद के होम रूल लीग के सेक्रेटरी बनें। फिर साल 1920 में वह यूपी के प्रतापगढ़ में पहले किसान मार्च का आयोजन किया और 1920-22 के असहयोग आंदोलन में पंडित जवाहर लाल नेहरू को दो बार जेल गए। सितंबर 1923 में पंडित नेहरू ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के जनरल सेक्रेटरी बने।साल 1926 में नेहरू स्विटजरलैंड, इटली, इंग्लैंड, बेल्जियम, जर्मनी और रूस का दौरा किया। फिर साल 1930 से 1935 तक उन्होंने नमक सत्याग्रह जैसे कई आंदोलन की शुरूआत की। इस दौरान पंडित नेहरू को कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने 14 फरवरी 1935 को पंडित नेहरू ने अल्मोड़ा जेल में रहते हुए अपनी ऑटोबायोग्राफी पूरी की। जेल से छूटने के बाद वह अपनी बीमार पत्नी को देखने स्विटजरलैंड गए। वहीं साल 1946 में वह चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने।देश के पहले पीएम बने पंडित नेहरूदेश के प्रधानमंत्री बनने के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश के विकास और आधुनिकता की दिशा में कई बड़े काम किए। पंडित नेहरू ने आधुनिक विचारों और मूल्यों अपनाने पर जोर दिया था। पंडित नेहरू ने भारत को सेक्युलर और लिबरल देश के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने भारत की एकता को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। पंडित नेहरू ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम कदम उठाए और वैज्ञानिक तकनीकी को प्रोत्साहित करने का काम किया।मृत्युवहीं 27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 09:06:51 +0530</pubDate>
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<title>Birsa Munda Birth Anniversary: बिरसा मुंडा ने हिला दिया था अंग्रेजों का सिंहासन</title>
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<description><![CDATA[ देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए ऐसे कई वीरों की गाथाएं हमें सुनने को नहीं मिलती, जो देश और समाज की रक्षा के लिए हमेशा अग्रसर रहे। देश के इतिहास में भी उनका जिक्र या तो बिलकुल नहीं है, या फिर जितना होना चाहिए उतना स्थान नहीं दिया गया। भारत का इतिहास लिखने वाले वे कौन से लोग थे, जिन्होंने आजादी के लिए किए गए संघर्ष में उन क्रांतिकारियों को भुला दिया, जो इसके वास्तविक हकदार थे। यह बात सही है कि अंगे्रजों के विरोध में देश के हर हिस्से में देश को आजाद कराने के लिए लड़ाई लड़ी गई। उनमें से कई लड़ाइयों का वर्णन भी इतिहास के पन्नों में देखने और पढ़ने को नहीं मिलता। वीर देश भक्तों के साथ ऐसा क्यों किया गया, इसका कारण यही था कि स्वतंत्रता के बाद भारत के शासकों ने प्रेरणा देने वाले नायकों के साथ पक्षपात करके उनका नाम सामने नहीं आने दिया। इसके पीछे यह भी बड़ा कारण हो सकता है कि अगर ऐसे नायकों को सामने लाते तो स्वाभाविक रूप से समाज उनके साथ जुड़ता, क्योंकि वे समाज से एक रूप हो चुके थे। इसलिए भावी पीढ़ी भी उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक रहती और इसी उत्सुकता के चलते देश के करोड़ों मनों में राष्ट्रीयता का प्रवाह पैदा होता। लेकिन राजनीतिक द्वेष के चलते राष्ट्रीयता को नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता रहा। जिसका परिणाम यह रहा कि भारत का समाज पश्चिम के विचार से प्रभावित हुआ। इसी कारण भारतीय भाव का विलोपन भी होता गया। लेकिन अब इतिहास के पन्ने कुरेदे जा रहे हैं। भारत का असली इतिहास खंगालने के प्रयास भी होने लगे हैं। देश को प्रेरणा देने वाले नायक भी सामने आने लगे हैं।ऐसे ही एक आदर्श नायक बिरसा मुंडा हैं, जिन्होंने अपने स्वत्व की चिंता नहीं की,  केवल राष्ट्र और समाज के हित के लिए कार्य किया, ऐसे नायक निश्चित रूप से समाज के लिए वंदनीय और पूजनीय हैं। समाज के हितों के लिए संघर्ष करने वाले बिरसा मुंडा ने भारत पर राज करने वाली ब्रिटिश सत्ता के विरोध में ऐसा जन आंदोलन खड़ा किया, जिसने जनजातीय समाज को एकत्रित कर जागरुक कर दिया और अंग्रेजों को भारत की भूमि छोड़कर जाना पड़ा। उनके द्वारा किए गए संघर्ष के कारण अंग्रेजों को सत्ता जाने का भय सताने लगा था। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो बिरसा मुंडा ने अंगे्रजों का सिंहासन हिलाकर रख दिया।इसे भी पढ़ें: Jawahar Lal Nehru Birth Anniversary: आधुनिक भारत के शिल्पकार थे जवाहर लाल नेहरू, ऐसे बने देश के पहले PMवर्तमान समय में इस बात पर गंभीर चिंतन और मनन करने की आवश्यकता है कि हमारे आदर्श कैसे होना चाहिए। बिरसा मुंडा का सम्पूर्ण जीवन ऐसा ही आदर्श है, जिससे राष्ट्रीय भाव का प्रस्फुटन होता है। जहां से समाज का नायक बनने का आदर्श दिशाबोध है। बिरसा मुंडा भारतीय समाज के ऐसे आदर्श रहे हैं, जिसे हम सर ऊंचा करके गौरव के साथ याद करते हैं। देश के लिए उनके द्वारा किए गए अप्रतिम योगदान के कारण ही उनका चित्र भारतीय संसद के संग्रहालय में लगा है। ऐसा सम्मान विरले नायकों को ही मिलता है। जनजातीय समाज की बात करें तो इस समाज से यह सम्मान अभी तक केवल बिरसा मुंडा को ही मिल सका है।बिरसा मुंडा का जन्म झारखंड के खूंटी जिले में हुआ था। उनके मन में बचपन से ही राष्ट्र भाव की उमंग दिखाई देती थी। उनके मन में अंग्रेजी सत्ता के प्रति नफरत हो गई थी। इसके पीछे का कारण भारतीय समाज, विशेषकर जनजातीय समाज के प्रति उनके मन में अपनेपन की पराकाष्ठा ही थी। अंग्रेज प्रारंभ से ही भारतीय समाज और उसकी संस्कृति की आलोचना करते थे, यह बात देश से अनन्य प्रेम करने वाले बिरसा मुंडा को अंदर तक चुभती थी। यही वजह थी कि मिशनरी स्कूल में पढ़ने के बाद भी वे अपने आदिवासी तौर तरीकों की ओर लौट आए, लेकिन इन सबके बीच के उनके जीवन में एक अहम मोड़ आया, जब 1894 में आदिवासियों की जमीन और वन संबंधी अधिकारों की मांग को लेकर वे आंदोलन में शामिल हुए। एक छोटी सी आवाज को नारा बनने में देर नहीं लगती, बस उस आवाज को उठाने वाले में दम होना चाहिए और इसकी जीती जागती मिसाल थे बिरसा मुंडा। बिरसा मुंडा ने बिहार और झारखंड के विकास और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम रोल निभाया। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुए अपने अनुयायियों को सरकार को लगान न देने का आदेश दिया था। 1894 में आए अकाल के दौरान बिरसा मुंडा ने अपने समुदाय और अन्य लोगों के लिए अंग्रेजों से लगान माफी की मांग के लिए आंदोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी, यही कारण रहा कि अपने जीवन काल में ही उन्हें एक महापुरुष का दर्जा मिला। बिरसा मुंडा ने 9 जून 1900 को रांची कारागार में अंतिम सांस ली।- डॉ. वन्दना सेन(लेखिका पीजीवी महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं) ]]></description>
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<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 09:06:49 +0530</pubDate>
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<title>सिनेमा के सुनहरे परदे और सुनहरे दौर का रोशन सितारा थीं सुलक्षणा पंडित</title>
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<description><![CDATA[ अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित का दाह संस्कार मुम्बई के उपनगर विलेपार्ले स्थित पवन हंस श्मशान में हुआ। विजेयता जी के बेटे अवितेश ने उन्हें मुखाग्नि दी। चिता पर लेटी उनकी शांत काया देखकर मुझे बहुत सी बातें फिल्म के फ़्लैश बैक तरह बीते हुए सालों में ले गयीं। मुझे उनसे न केवल एक लम्बी बातचीत करने का मौक़ा मिला था बल्कि, बाद में उनसे संगीतकार आदेश जी के घर पर भी मिलना हुआ जो सुलक्षणाजी के बहनोई थे और अभिनेत्री और गायिका विजेयता पंडित जी (श्रीवास्तव) के पति। सुलक्षणा जी को घर में सब मुन्नी बुलाया करते थे लेकिन वो अपने भाई बहनों के लिए माँ जैसी ही थीं और विजेयता जी भी पूरे समर्पण से उनकी देखभाल करती रहीं.....सच तो ये है कि अपनी आयु की सांध्य बेला में सुलक्षणा जी बच्चों जैसी ही हो गयीं थीं और छोटी बहन विजेयता ने माँ बनकर उनकी देखभाल की थी। कैसा सुन्दर मणि-कांचन संयोग रहा कि, दोनों प्रतिभाशाली बहनें हिंदी सिनेमा के उस दौर का भी प्रतिनिधित्व करती थीं जब कलाकार अभिनय के साथ-साथ गायन भी किया करते थे। बहन विजेयता जी की तरह सुलक्षणा जी भी न केवल एक बेहतरीन अभिनेत्री थीं बल्कि एक मंजी हुई गायिका भी, और संगीत के ये संस्कार उन्हें अपने पिता प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक संगीत आचार्य पंडित प्रताप नारायण पंडित और माँ कमला पंडित से मिले थे। हिंदी सिनेमा में अभिनय और संगीत के पंडित, पंडित परिवार का उल्लेखनीय और मूल्यवान योगदान है। सुलक्षणा जी के दादा मोतीराम जी और उनके भाई ज्योति राम जी सिद्ध गायक थे जिनका सम्बन्ध मेवाती घराने से था। पंडित प्रताप नारायण जी का जन्म हिसार (अब फतेहाबाद) ज़िले के पीलीमंदोरी में हुआ था। उनके 3 और भाई थे पंडित मणीराम जी, संगीत मार्तंड पंडित जसराज जी और राजाराम जी|राजाराम जी को संगीत में रूचि नहीं थी इसलिए वो गाँव में ही रहकर खेती-किसानी का काम करने लगे। पंडित प्रताप नारायण जी की कुल 9 संतानें हुईं जिनमें पहली दो संतानें जल्द ही चल बसीं, रह गयीं माया पंडित (माया एंडरसन), मंधीर पंडित, सुलक्षणा पंडित, संध्या पंडित, जतिन पंडित, विजेयता पंडित (अब विजेयता श्रीवास्तव) और ललित पंडित। इन सभी भाई-बहनों को आगे बढ़ाने में, इनकी परवरिश में सुलक्षणा जी का अमूल्य योगदान था। 12 जुलाई 1954 को छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में उनका जन्म हुआ था जहाँ स्वभाव से मलंग पिता पंडित प्रताप नारायण को एक कलाकार के रूप में रियासत का आर्थिक संबल मिला हुआ था। उनकी माता जी कमला पंडित का सम्बन्ध राजस्थान से था। पंडित प्रताप नारायण तबला बजाने में सिद्धहस्त थे लेकिन गायक भी उतने ही सुरीले और दक्ष वो शास्त्रीय नृत्य कत्थक के भी बहुत अच्छे विद्वान थे। बकौल संगीतकार जतिन पंडित जिन दिनों वो कोलकाता में थे वो अपने परिवार के एक संगीत स्कूल से भी जुड़े  हुए थे। कोलकाता में आमदनी का कोई स्थाई और बेहतर ज़रिया नहीं था। कोलकाता में ही पंडित प्रताप नारायण जी की भेंट हुई अभिनेता प्रेमनाथ जी से जिन्होंने प्रताप नारायण जी को कोलकाता छोड़कर मुम्बई आने की सलाह दी। मुंबई आने पर प्रेमनाथ जी ने उनकी यहाँ रहने में मदद भी की। बाद में कोलकाता का घर बेच कर माँ भी मुम्बई आ गयीं और परिवार ने वर्सोवा में तब के दरिया महल के पास वन रूम किचन का एक घर लिया। पिता प्रताप नारायण जी ने सुलक्षणा को गायन की अच्छी तालीम दी वही उनके संगीत गुरु थे। बेटे मंधीर को उन्होने तबला वादन में प्रवीण किया। मुम्बई में पंडित परिवार की मदद करने वाले दूसरे उदारमना कलाकार थे दिलीप कुमार। बकौल जतिन पंडित दिलीप साहब ने सुलक्षणा जी को प्रोत्साहित ही नहीं किया बल्कि, उस ज़माने में संगीतकारों और फिल्म जगत की एहम हस्तियों से से मिलने में भी मदद की। 9 बरस की उम्र से सुलक्षणा जी ने गाना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपने नाम को सार्थक किया था।  इसे भी पढ़ें: Sanjeev Kumar Death Anniversary: बॉलीवुड के दिलदार अभिनेता कहे जाते थे संजीव कुमार, ऐसा रहा फिल्मी सफरछोटी उम्र में ही उनके नन्हें कन्धों ने परिवार के आर्थिक बोझ को संभाल लिया था। संघर्ष जीवन का हिस्सा बन गया था। उन्होंने मंचों पर गाना शुरू किया। पार्श्व गायिका के रूप में पहली फिल्म मिली 13 बरस की उम्र में, 1967 में आयी तक़दीर में, गाना भारत रत्न लता जी के गीत के साथ गाया था। इस मासूम गीत के बोल थे सात समंदार पार से गुड़ियों के बाज़ार से अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना पर पप्पा जल्दी आ जाना और गुड़िया खेलने की उम्र में नन्ही गुड़िया सुलक्षणा, पप्पा के साथ अपनी और परिवार तक़दीर बदलने का संघर्ष कर रही थी। उन्होंने नामचीन गायक मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार के साथ फिल्म संगीत पर आधारित कई मंचीय कार्यक्रमों में भाग लिया। 1975 में उन्होंने नायिका के रूप में संजीव कुमार के साथ फिल्म उलझन में अभिनय किया और दर्शकों के दिलों पर अपनी बेमिसाल प्रतिभा के दस्तख़त कर दिए। इसके बाद उन्होंने इंडस्ट्री के लगभग हरेक नामचीन एक्टर के साथ काम किया उन्होंने जीतेंद्र के साथ संकोच और खंजर, संजीव कुमार के साथ बजरंग बली, राजेश खन्ना के साथ भोला भाला और बंधन कच्चे धागों का, विनोद खन्ना के साथ फिल्म हेरा फेरी और आरोप , शशि कपूर के साथ चंबल की कसम और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ अमीरी ग़रीबी में अभिनय  किया था...उनकी अन्य यादगार फ़िल्में हैं अपनापन,ख़ानदान,चेहरे पे चेहरा, धर्म कांटा और वक्त की दीवार।अभिनेता संजीव कुमार से उनके भावनात्मक लगाव के बारे में बहुत कुछ लिखा गया जो भी हो फ़िल्म कलाकार भी तो इंसान ही हैं, किसी को चाहना और उसकी चाहत में पूरी ज़िन्दगी अकेले गुज़ार देना भी आसान नहीं...सबने उनकी कामयाबी, उनके संघर्ष के बारे में बहुत कुछ लिखा लेकिन, कोई उनके मन के उदासी भरे अकेलेपन को नहीं जान पाया। फ़िल्मी सितारों के बारे में बहुत कुछ मसालेदार बना दिया जाता है और सच्चाई जाने बिना बहुत कुछ लिख दिया जाता है लेकिन बहित कम लोग उनकी भीगी पलकें, उदासियाँ अकेलापन देख पाते हैं। मैं जब उनसे मिला तो उनको मैंने एक निष्पाप शिशु ]]></description>
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<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 00:08:56 +0530</pubDate>
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<title>Baldev Raj Chopra Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के वो जादूगर, जिनके बिना &amp;apos;महाभारत&amp;apos; अधूरी, ऐसा रहा बीआर चोपड़ा का सफर</title>
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<description><![CDATA[ बलदेव राज चोपड़ा सिनेमा की एक ऐसी शख्सियत, जिन्होंने दुनिया को कई लोकप्रिय फिल्मों की सौगात दी। इसके साथ ही उन्होंने छोटे पर्दे की दुनिया में &#039;महाभारत&#039; जैसा धारावाहिक बना डाला। आज ही के दिन यानी की 05 नवंबर को बी आर चोपड़ा का निधन हो गया था। बता दें कि बीआर चोपड़ा ने अपने छह दशक के लंबे करियर में कई कामयाब फिल्में की और &#039;महाभारत&#039; जैसा धारावाहिक बनाया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बीआ चोपड़ा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षातत्कालीन पंजाब के लुधियाना में 22 अप्रैल 1914 को बी आर चोपड़ा का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद लाहौर यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद साल 1944 में बी आर चोपड़ा मासिक पत्रिका सिने हेराल्ड से जुड़ गए।इसे भी पढ़ें: Shakuntala Devi Birth Anniversary: गणित की पहेली को सेकेंड्स में हल कर देती थीं शकुंतला देवी, कहा जाता था ह्यूमन कंप्यूटरफिल्मी सफरबी आर चोपड़ा ने अपने फिल्मी सफर की शुरूआत फिल्म &#039;अफसाना&#039; से की। इसके बाद साल 1955 में उन्होंने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस बीआर फिल्म्स शुरू किया। इस प्रोडक्शन तले कई हिट और सफल फिल्में बनीं। बी आर चोपड़ा ने &#039;कानून&#039;, &#039;साधना&#039;, &#039;पति पत्नी और वो&#039;, &#039;गुमराह&#039;, &#039;एक ही रास्ता&#039;, &#039;निकाह&#039;, &#039;हमराज&#039;, &#039;कर्म&#039; और &#039;बाबुल&#039; जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी। लेकिन बाद में धीरे-धीरे यह प्रोडक्शन हाउस बर्बादी की कगार पर आ गया।मेकिंग से शुरू हुए उल्टे दिनप्रोडक्शन हॉउस बीआर फिल्म्स के बैनर तले कई फिल्में सफल हुईं। लेकिन फिल्म &#039;बिंदा ये बिंदास है&#039; की मेकिंग के दौरान इस प्रोडक्शन हाउस के उल्टे दिन शुरू हो गए थे। इस फिल्म के निर्माण के दौरान उन पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा। दरअसल, ऐसा इसलिए क्योंकि जिस समय बी आर चोपड़ा की फिल्में सिनेमा की दुनिया में सफलता की नई इबारत लिख रही थीं, लेकिन फिल्मों की सफलता कहीं न कहीं बी आर चोपड़ा में घमंड ला रही थीं।बताया जाता है कि फिल्म &#039;नया दौर&#039; के समय वह पूरी टीम के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट साइन करना चाहते थे। जिसके तहत वह सभी अन्य किसी प्रोडक्शन हाउस के साथ काम नहीं कर सकते थे। लेकिन बी आर चोपड़ा की यह बात मोहम्मद रफी को समझ नहीं आई और उन्होंने कहा कि वह जनता की आवाज हैं। इसलिए वह हर निर्माता-निर्देशक के साथ काम करेंगे। यह बात कहीं न कहीं बी आर चोपड़ा को अखर गई।महाभारत धारावाहिकसाल 1988 बीआर चोपड़ा का प्रसारित हुआ शो &#039;महाभारत&#039; से घर-घर में खास पहचान मिली थी। इस दौरान महाभारत की लागत में 9 करोड़ रुपए आई थी। बीआर चोपड़ा की आखिरी फिल्म &#039;भूतनाथ&#039; थी।मृत्युवहीं मुंबई में 05 नवंबर 2008 को बीआर चोपड़ा ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 07 Nov 2025 22:17:37 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Baldev, Raj, Chopra, Death, Anniversary:, हिंदी, सिनेमा, के, वो, जादूगर, जिनके, बिना, महाभारत, अधूरी, ऐसा, रहा, बीआर, चोपड़ा, का, सफर</media:keywords>
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<title>Shakuntala Devi Birth Anniversary: गणित की पहेली को सेकेंड्स में हल कर देती थीं शकुंतला देवी, कहा जाता था ह्यूमन कंप्यूटर</title>
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<description><![CDATA[ लाखों लोगों में कोई एक ऐसा होता है, जिसमें अनूठी प्रतिभा होती है। ऐसी ही एक अनूठी प्रतिभा संपन्न शख्सियत शकुंतला देवी थीं। जिनको ह्यूमन कंप्यूटर कहा जाता था। आज ही के दिन यानी की 04 नवंबर को शकुंतला देवी का जन्म हुआ था। शकुंतला देवी गणित की बड़ी से बड़ी पहेली को सेकेंड्स में हल कर देती थीं। शकुंतला देवी ने यह कारनामा उस दौर में करके दिखाया था, जब दुनिया में कंप्यूटर के बारे में कोई नहीं जानता था और न ही इस समय तक कैलकुलेटर तैयार किए गए थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर शकुंतला देवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारशकुंतला देवी की 04 नवंबर 1929 को शकुंतला देवी का जन्म हुआ था। वह एक कन्नड़ परिवार से ताल्लुक रखती थीं। शकुंतला देवी स्कूल नहीं गईं, लेकिन वह हिसाब-किताब की इतनी पक्की थीं कि 13 अंक वाले दो नंबरों का गुणनफल महज 28 सेकेंड में बताकर अपना नाम &#039;गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स&#039; में दर्ज करा लिया था। इसे भी पढ़ें: Indira Gandhi Death Anniversary: आयरन लेडी जिसने भारत को दी नई दिशा, राजनीति पर अमिट है इंदिरा गांधी की छापमानव कंप्यूटर की उपाधि मिलीबता दें कि शकुंतला देवी को ह्यूमन कंप्यूटर की उपाधि कभी पसंद नहीं थी। लेकिन यह उपाधि उनको तब मिली, जब शकुंतला देवी बीबीसी चैनल के साथ एक साक्षात्कार में शामिल हुई थीं। 05 अक्तूबर 1950 को यह साक्षात्कार हुआ था और इस दौरान शकुंतला देवी से एक बेहद कठिन सवाल पूछा, जिसका उन्होंने सही जवाब दिया। लेकिन चैनल के पास गलत जवाब था, इसलिए उन्होंने शकुंतला देवी द्वारा दिया गया जवाब गलत घोषित कर दिया गया। हालांकि बाद में जब इसकी जांच की गई, तो शकुंतला देवी द्वारा दिया गया जवाब सही निकला। इसके बाद शकुंतला देवी को ह्यूमन कंप्यूटर की उपाधि मिली और वह घर-घर में फेमस हो गईं।जब इंदिरा गांधी को दी चुनौतीसाल 1980 में शकुंतला देवी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ साउथ बॉम्बे और तेलंगाना की मेडकोव्स्की सीट से चुनाव लड़ा था। शकुंतला देवी का मानना था कि इंदिरा मेडक के लोग आमरण अनशन कर रहे हैं, वहीं शकुंतला देवी उनको चुनावी मैदान में धकेल रही हैं। इस चुनाव में शकुंतला देवी 9वें नंबर पर था।पुरस्कारसाल 1969 में शकुंतला को वुमन ऑफ द ईयर के सम्मान से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा शकुंतला देवी को रामानुजन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके नाम गिनीज वर्ल्ड ऑफ रिकॉर्ड भी शामिल है।मृत्युवहीं 21 अप्रैल 2013 में शकुंतला देवी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 07 Nov 2025 22:17:37 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sanjeev Kumar Death Anniversary: बॉलीवुड के दिलदार अभिनेता कहे जाते थे संजीव कुमार, ऐसा रहा फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार का आज ही के दिन यानी की 06 नवंबर को निधन हो गया था। उन्होंने अपनी कई फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी से दर्शकों का दिल जीता था। संजीव कुमार हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में से एक थे, जिनको अभिनय का मिसाल माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता संजीव कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के सूरत में 09 जुलाई 1938 को संजीव कुमार का जन्म हुआ था। उनका असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था। संजीव कुमार बचपन से ही रंगमंच की दुनिया में खो गए थे। साधारण परिवार से आने के बाद भी उनके सपने बड़े थे। उन्होंने मुंबई के इंडियन नेशनल थिएटर से जुड़कर अभिनय की बारीकियां सीखीं। थिएटर में संजीव कुमार को सब प्यार से &#039;हरिभाई&#039; कहा करते थे।इसे भी पढ़ें: Baldev Raj Chopra Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के वो जादूगर, जिनके बिना &#039;महाभारत&#039; अधूरी, ऐसा रहा बीआर चोपड़ा का सफरफिल्मी सफरसाल 1960 में संजीव कुमार ने फिल्म &#039;हम हिंदुस्तानी&#039; से बॉलीवुड में कदम रखा था। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने संजीव कुमार को हर किरदार निभाने में माहिर बनाया है। अभिनेता कॉमेडी, ड्रामा और गंभीर किरदारों को बखूबी निभाते थे। उन्होंने साल 1975 में फिल्म &#039;शोले&#039; में ठाकुर के किरदार से हर किसी के दिल में खास जगह बनाई। जिसको आज भी दर्शक देखना पसंद करते हैं। फिल्म &#039;आंधी&#039; में संजीव कुमार के संजीदा अभिनय दर्शकों को खूब भाया।वहीं कॉमेडी फिल्म &#039;अंगूर&#039; में संजीव कुमार ने डबल रोल निभाया था, जिसकी तारीफ आज भी होती है। इसके अलावा अभिनेता ने फिल्म &#039;नमकीन&#039; और &#039;कोशिश&#039; में संजीव कुमार के भावनात्मक अभिनय ने सबका दिल जीता। अभिनेता ने अपने फिल्मी करियर में 100 से अधिक फिल्मों में काम किया और कई पुरस्कार भी जीते, जिनमें दो राष्ट्रीय पुरस्कार भी शामिल है।लव लाइफहालांकि संजीव कुमार की पर्सनल लाइफ अधिक चर्चा में नहीं रही। लेकिन उनका नाम अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित के साथ जुड़ा था, लेकिन यह रिश्ता शादी तक नहीं पहुंच पाया था। संजीव कुमार अपनी पर्सनल लाइफ को निजी रखना पसंद करते थे और अपने काम पर ज्यादा ध्यान देते थे।निधनअभिनेता संजीव कुमार का निधन 06 नवंबर 1985 को मात्र 47 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 07 Nov 2025 22:17:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>CV Raman Birth Anniversary: महान वैज्ञानिक और शिक्षक थे सीवी रमन, भारतीय विज्ञान में दिया था अहम योगदान</title>
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<description><![CDATA[ महान वैज्ञानिक सीवी रमन का आज ही के दिन यानी की 07 नवंबर को जन्म हुआ था। सीवी रमन का योगदान आधुनिक विज्ञान में भी अहम स्थान रहता है। वैसे तो सीवी रमन को &#039;रमन प्रभाव&#039; के लिए जाना जाता है। जिसके लिए उनको नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया था। सीवी रमन के सिद्धांत ने स्पैक्ट्रोमैट्री के क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान दिया है, जो वर्तमान के अंतरिक्ष विज्ञान के शोध में काफी काम आता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सीवी रमन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में 07 नवंबर 1888 को सीवी रमन का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम चंद्रशेखर वेंकट रमन था। सीवी रमन के पिता गणित और भौतिकी के शिक्षक थे। इसी कारण उनके जीवन में शुरूआती स्तर पर विज्ञान के प्रति रुचि जगी। सीवी रमन ने अपनी शुरूआती शिक्षा घर पर पूरी की और फिर उच्च शिक्षा के लिए मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज में एडमिशन लिया। साल 1904 में भौतिकी में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और पूरे मद्रास यूनिवर्सिटी में फर्स्ट स्थान प्राप्त किया था। बाद में उन्होंने एम ए की पढ़ाई की और यहीं से सीवी रमन के वैज्ञानिक सफर की शुरूआत हुई।रमन प्रभाव की खोजबता दें कि डॉ सीवी रमन की सबसे बड़ी खोज &#039;रमन प्रभाव&#039; के रूप में जानी जाती है। जिसके लिए उनको साल 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। रमन प्रभाव वह घटना है, जिसमें प्रकाश की किरणें जब किसी पारदर्शी पदार्थ से होकर गुजरती है, तो उसकी तरंग दैर्ध्य में बदल जाता है। सीवी रमन की इस खोज ने वैज्ञानिकों को परमाणुओं और अणुओं की संचरना को समझने का नया तरीका दिया। सीवी रमन की यह खोज आधुनिक भौतिकी में क्रांति थी और इसको विज्ञान क्षेत्र में असाधारण योगदान माना जाता है। इसे भी पढ़ें: Shakuntala Devi Birth Anniversary: गणित की पहेली को सेकेंड्स में हल कर देती थीं शकुंतला देवी, कहा जाता था ह्यूमन कंप्यूटरअन्य उपलब्धियांडॉ सीवी रमन ने अपनी खोज के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कोलकाता के इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस में शोध किया और अपनी खोज को वहां के स्टूडेंट्स और वैज्ञानिकों के साथ साझा किया। फिर बाद में वह बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में भौतिकी विभाग के प्रमुख बने। वही साल 1948 में सीवी रमन ने &#039;रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट&#039; की स्थापना की।भारतीय विज्ञान में योगदानडॉ रमन का मानना था कि विज्ञान में शिक्षा और अनुसंधान दोनों का एक समान महत्व है। उन्होंने भारत में विज्ञान के प्रति लोगों की जागरुकता बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए। इसके अलावा डॉ रमन ने भारतीय स्टूडेंट्स और वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाने का अवसर प्रदान किया।मृत्युवहीं 21 नवंबर 1970 को 82 साल की उम्र में डॉ सीवी रमन ने अंतिम सांस ली। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 07 Nov 2025 22:17:31 +0530</pubDate>
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<title>Kanshi Ram Death Anniversary: कांशीराम ने सत्ता से दूर रहकर भी दलितों को दिलाई पहचान, BSP के शिल्पकार का योगदान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 अक्तूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की मृत्यु हो गई थी। कांशीराम बहुजन नायक, मान्यवर या साहेब नामों से भी जाने जाते हैं। वहीं 20वीं सदी के अंतिम दशक में वह भारतीय राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में चमकता हुआ सितारा बन गए थे। कांशीराम ने दलित राजनीति में एक विशिष्ठ स्थान बनाया था। कांशीराम राजनीति से अधिक दलितों के उत्थान के लिए जाने जाते थे। क्योंकि उन्होंने खुद अस्पृश्यता, जातिवाद और भेदभाव झेला था। ऐसे में दलितों को उनका हक दिलाने के लिए कांशीराम ने लड़ाई लड़ने का प्रण लिया और उसमें सफल भी रहे। उन्होंने राजनीति में खुद कभी कोई पद नहीं लिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कांशीराम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारब्रिटिश इंडिया के पंजाब के रूपनगर यानि आज के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 को कांशीराम का जन्म हुआ था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1956 में रोपड़ के शासकीय महाविद्यालय से बीएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह पुणे की गोला बारूद फैक्ट्री में प्रथम श्रेणी के वन अधिकारी के रूप में नियुक्त हो गए। लेकिन जल्द ही कांशीराम को प्रशासन में जातिगत आधार पर भेदभाव और अपमान झेलना पड़ा।इसे भी पढ़ें: Jai Prakash Narayan Death Anniversary: जेपी नारायण ने ठुकरा दिया था PM और राष्ट्रपति पद, दिया था संपूर्ण क्रांति का नारादलित सामाजिक कार्यकर्ताकांशीराम ने अपने सरकारी दफ्तर के ऑफिस में पाया कि जो कर्मचारी आंबेडकर का जन्मदिन मनाने के लिए छुट्टी लेते थे। उन कर्मचारियों के साथ जातिवादी भेदभाव किया जा रहा था। कांशीराम ने साल 1964 ने इस जातिवादी भेदभाव को खत्म करने के लिए एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे। माना जाता है कि कांशीराम ने यह फैसला आंबेडकर की किताब &#039;एनीहिलिएशन ऑफ कास्ट&#039; पढ़कर लिया था।नौकरी से निलंबनकांशीराम आंबेडकर और उनके दर्शन से काफी ज्यादा प्रभावित थे। आंबेडकर से प्रभावित होकर पहले कांशीराम ने कर्मचारियों के स्तर पर कार्यकर्ता के रूप में संघर्ष किया। लेकिन इसके कारण जल्द ही उनको नौकरी से सस्पेंड होना पड़ा। फिर उन्होंने उस अधिकारी की पिटाई की, जिसने कांशीराम को सस्पेंड किया था।राजनीति में प्रवेशसाल 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का स्थापना की थी। जोकि मूल रूप से सामाजिक संगठन था, लेकिन इसका राजनैतिक प्रभाव भी था। जल्द ही कांशीराम को समझ आ गया कि दलितों के उत्थान के लिए उनको राजनीति में आना ही पड़ेगा। ऐसे में उन्होंने 14 अप्रैल 1984 को बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती पर बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। साथ ही औपचारिक रूप से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।मायावती को आगे बढ़ायाकांशीराम ने अपना पहला चुनाव छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा से लड़ा था, वह अपनी पार्टी के प्रमुख बने रहे और उसके उत्थान के लिए अपना बाकी जीवन लगा दिया। कांशीराम ने मायावती को राजनीति में लाने के दौरान वादा किया था कि वह एक दिन उनको देश का प्रधानमंत्री बना देंगे। कांशीराम ने हमेशा मायावती को आगे बढ़ाने का काम किया। वहीं जब उत्तर प्रदेश में बीएसपी की सरकारी बनी तो मायावती ने राज्य की मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच दिया था।कांशीराम ने अपना पूरा जीवन दलितों के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने सादगी अपनाते हुए खुद को परिवार से पूरी तरह से अलग कर लिया था। हालांकि कांशीराम को हमेशा बसपा सुप्रीमो कहा जाता था। लेकिन वास्तव में वह जमीनी कार्यकर्ता थे और हमेशा लोगों को अपने आंदोलन में जोड़ने का प्रयास करते थे।निधनवहीं 09 अक्टूबर 2006 को कांशीराम का निधन हो गया। जिसके बाद उनकी जगह पार्टी में मायावती ने ली। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:15 +0530</pubDate>
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<title>Jai Prakash Narayan Death Anniversary: जेपी नारायण ने ठुकरा दिया था PM और राष्ट्रपति पद, दिया था संपूर्ण क्रांति का नारा</title>
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<description><![CDATA[ संपूर्ण क्रांति के नायक जयप्रकाश नारायण का 08 अक्तूबर को निधन हो गया था। एक ओर जहां नेता सत्ता पाने के लिए राजनीति करते हैं, लेकिन जयप्रकाश नारायण एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने कभी सत्ता को छुआ भी नहीं था। जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था, जिसने पूरे देश को झझकोर कर रख दिया था। हालांकि उनका जीवन काफी संघर्षमय रहा, लेकिन वह कभी किसी के सामने नहीं झुके थे। उन्होंने पढ़ाई के दौरान होटल में भी काम किया, लेकिन कभी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जेपी नारायण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबिहार के सिताब दियारा में 11 अक्तूबर 1902 को जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था। वह काफी गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम हरशु दयाला और माता का नाम फुल रानी देवी था। 9 साल की उम्र में जेपी नारायण पटना आ गए थे और यहीं से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। साल 1918 में उन्होंने बोर्ड परीक्षा पास की और अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त की।इसे भी पढ़ें: Lal Bahadur Shastri Birth Anniversary: लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों के लिए पीएम वेतन लेने से कर दिया था इंकार, जानिए रोचक बातेंशादीसाल 1920 में जेपी नारायण शादी के बंधन में बंध गए। इनका विवाह प्रभावती देवी के साथ हुआ। महात्मा गांधी के आमंत्रण पर प्रभावती देवी उनके आश्रम चले गए और इस दौरान जेपी नारायण पटना में कार्यरत थे।सियासी सफरसाल 1929 में जेपी नारायण उच्च शिक्षा प्राप्त कर अमेरिका से भारत वापस लौट आए। जेपी नारायण ने गांधी जी को अपना राजनीतिक गुरु बनाया औऱ लगातार उनसे सीखते रहे। फिर साल 1932 में ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेपी को जेल में डाल दिया। जेल में उनकी मुलाकात राम मनोहर लोहिया से हुई और इस समय कांग्रेस में वामपंथी दल का निर्माण हुआ था, जिसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी कहा गया। इसके अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव हुए और महासचिव जयप्रकाश नारायण बने।बता दें कि जेपी नारायण एक ऐसे शख्स के रूप में उभरे, जिन्होंने पूरे देश में आंदोलन चलाया। उनके विचार दर्शन और व्यक्तित्व ने पूरे जनमानस को प्रभावित किया। वहीं जेपी नारायण ने लोकनायक शब्द को चरितार्थ किया और संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। वहीं उन्होंने 05 जून 1974 को विशाल सभा में पहली बार जेपी नारायण ने &#039;सिंहासन खाली करो कि जनता आती है&#039; का नारा दिया था।संपूर्ण क्रांति के जनकभारतीय इतिहास में यह क्रांति एक महत्वपूर्ण मुकाम रखती है। राजनीतिक विचारक जेपी नारायण ने छात्रों के बीच तत्कालीन व्यवस्था और सरकार के खिलाफ आंदोलन की मशाल जलाने का काम किया। जिस कारण यह चिंगारी पूरे देश में फैल गई। जेपी ने संपूर्ण क्रांति की विचारधारा से छात्र आंदोलन को जन आंदोलन में बदल दिया था।मृत्युवहीं 08 अक्तूबर 1979 को जय प्रकाश नारायण का निधन हो गया था। फिर साल 1999 में जेपी नारायण को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। वहीं साल 1965 में जेपी को समाजसेवी के लिए मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:15 +0530</pubDate>
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<title>Guru Dutt Death Anniversary: बेजोड़ सफलता के बावजूद क्यों बेचैन थे गुरुदत्त, जानें उनकी दर्दनाक कहानी</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय सिनेमा को 50 से 60 के दशक में बेहतरीन फिल्मों के जरिए गुलजार करने वाले फिल्ममेकर गुरुदत्त का 10 अक्तूबर को निधन हो गया था। गुरुदत्त ने अपनी जिंदगी के में हर रंग देखे थे। उन्होंने शानदार फिल्मों के निर्माण के अलावा एक्टिंग में भी अपना लोहा मनवाया था। लेकिन इसके बाद भी गुरुदत्त ने महज 39 साल की उम्र में जीवनलीला को समाप्त कर लिया था। गुरुदत्त अभिनेता, प्रोड्यूसर, फिल्ममेकर और राइटर थे। सब कुछ होने के बाद भी गुरु दत्त ताउम्र बेचैन रहे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गुरुदत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...भारतीय सिनेमा के लिए मिसालभारतीय सिनेमा के लिए मिसाल बन चुके अभिनेता गुरुदत्त एक ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने अपने जीवन को सिनेमा का पर्दा समझा और अपना सब कुछ उसमें झोंक दिया। उनके अंदर एक अजीब सी बेचैनी रहती थी। यह बेचैनी पर्दे पर कुछ अद्वितीय और अद्भुत करने की थी। वह अपने आप में सिनेमा का महाविद्यालय थे। गुरुदत्त की तीन क्लासिक फिल्में &#039;प्यासा&#039;, &#039;कागज और फूल&#039; और &#039;साहिब बीवी और गुलाम&#039; को टेक्स्ट बुक का दर्जा प्राप्त है।इसे भी पढ़ें: Jagjit Singh Death Anniversary: बेटे के गम ने बना दिया &#039;गजल सम्राट&#039; को दर्द का बेताज बादशाह, ऐसी थी जगजीत सिंह की कहानीऐसे शुरू किया था फिल्मी सफरसाल 1946 में गुरुदत्त ने प्रभात स्टूडियो की एक फिल्म &#039;हम एक हैं&#039; से बतौर कोरियोग्राफर अपना फिल्मी करियर शुरू किया था। इसके बाद गुरुदत्त को फिल्म में अभिनय करने का मौका मिला और उनका करियर आगे बढ़ ही रहा था कि साल 1951 में देवानंद की फिल्म &#039;बाजी&#039; सक्सेस के बाद गुरुदत्त की मुलाकात गीता दत्त से हुई। फिल्म के दौरान गुरुदत्त और गीता एक-दूसरे के करीब आए औऱ साल 1953 में दोनों ने शादी कर ली।शादीशुदा जिंदगी में आया तूफानअपनी शादी शुदा जिंदगी से गुरुदत्त काफी खुश थे और करियर भी आगे बढ़ रहा था। इसी दौरान गुरुदत्त की मुलाकात वहीदा रहमान से हुई। बताया जाता है कि गुरु और वहीदा एक-दूसरे से बेहद प्यार करने लगे थे। लेकिन गुरुदत्त पहले से शादीशुदा थे। जिसके बाद गुरुदत्त और गीता दत्त में आए दिन वहीदा रहमान को लेकर झगड़े होते रहते थे। फिर साल 1957 में दोनों की शादीशुदा जिंदगी में दरार आ गई और दोनों अलग-अलग रहने लगे।हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक हिट फिल्में देने वाले गुरुदत्त उस समय दिवालिया हो गए, जब उनकी फिल्म &#039;कागज के फूल&#039; फ्लॉप हो गई। एक ओर उनकी निजी जिंदगी में परेशानियां चल रही थीं, तो दूसरी तरफ प्रोफेशनल लाइफ में होने वाले नुकसान के कारण गुरुदत्त बिल्कुल टूट चुके थे। उन्होंने दो बार आत्महत्या का प्रयास भी किया था।मृत्युवहीं 10 अक्तूबर 1964 को 39 साल की उम्र में गुरुदत्त अपने बेडरूम में मृत पाए गए थे। माना जाता है कि मौत से ठीक एक रात पहले गुरुदत्त ने खूब शराब पी थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:14 +0530</pubDate>
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<title>Jagjit Singh Death Anniversary: बेटे के गम ने बना दिया &amp;apos;गजल सम्राट&amp;apos; को दर्द का बेताज बादशाह, ऐसी थी जगजीत सिंह की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ गजल के बेताज बादशाह जगजीत सिंह ने संगीत की दुनिया में ऐसी छाप छोड़ी, जो समय की सीमाओं को पार करके आज भी उतनी ही ताजा हैं। आज ही के दिन यानी की 10 अक्तूबर को जगजीत सिंह की मृत्यु हो गई थी। जगजीत सिंह के लिए संगीत सिर्फ उनका शौक नहीं बल्कि आत्मा की आवाज थी। उन्होंने कम उम्र से ही शास्त्रीय संगीत की तालीम प्राप्त कर ली थी। 1970 के दशक में गजल को एक खास वर्ग का संगीत माना जाता था, तब जगजीत सिंह ने इसको आम जनमानस की जुबान बना दिया था। वह अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गजल किंग जगजीत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और संगीत शिक्षाराजस्थान में 08 फरवरी 1941 में जगजीत सिंह का जन्म हुआ था। उन्होंने पंडित छगन लाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से संगीत की शुरुआती शिक्षा ली थी। फिर साल 1965 में जगजीत सिंह परिवार को बिना बताए मुंबई आ गए थे।इसे भी पढ़ें: Vinod Khanna Birth Anniversary: विनोद खन्ना ने करियर के शिखर पर छोड़ दिया बॉलीवुड, ओशो संग अध्यात्म में रम गए थे अभिनेताऐसे मिला गाने का मौकाकाफी ज्यादा संघर्ष के बाद जगजीत सिंह को हिंदी सिनेमा में गाने का मौका मिला था। साल 1967 में जब जगजीत सिंह काम ढूंढ रहे थे। इस दौरान उनकी मुलाकात चित्रा दत्त से हुई। हालांकि उस दौरान चित्रा शादीशुदा थीं। लेकिन इसके बाद भी जगजीत और चित्रा एक-दूसरे को दिल दे बैठे और दिसंबर 1969 में चित्रा ने अपने पति को तलाक लेकर जगजीत सिंह से शादी कर ली।बता दें कि जगजीत सिंह और चित्रा सिंह एक साथ कॉन्सर्ट किया करते थे। इस समय तक वह &#039;गजल किंग&#039; बन चुके थे। जगजीत ने प्राइवेट एलबम के साथ फिल्मों में भी कई गजलें गाईं जिनमें &#039;अर्थ&#039;, &#039;जिस्म&#039;, &#039;प्रेम गीत&#039;, &#039;तुम बिन&#039;, &#039;जॉगर्स पार्क&#039; जैसी फिल्में शामिल हैं। जगजीत सिंह को साल 2003 में भारत सरकार की ओर से &#039;पद्म भूषण&#039; से नवाजा गया था।बेटे की मौत से टूट गए थे जगजीत सिंह चित्रा और जगजीत का एक बेटा विवेक था। वहीं 20 साल की उम्र में विवेक की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। इस घटना ने जगजीत सिंह और चित्रा सिंह को बुरी तरह से तोड़ दिया था। इस घटना के बाद जगजीत सिंह संगीत की दुनिया से दूर हो जाना चाहते थे। उन्होंने कई महीनों तक गाना नहीं गाया। लेकिन फिर उन्होंने संगीत की दुनिया में धीरे-धीरे वापसी की। लेकिन उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने रिटायरमेंट ले लिया। बेटे की मौत का सदमा सीने में दबाए बैठे जगजीत सिंह जब वापस गजल गायकी की दुनिया में लौटे, तो उनकी आवाज में किसी को खोने का दर्द कई गुना बढ़ा हुआ था।मृत्युसाल 2011 में यूके में जगजीत सिंह को गुलाम अली के साथ परफॉर्म करना था। लेकिनन इससे पहले उनको ब्रेन हैमरेज हो गया, 23 सितंबर 2011 को जगजीत सिंह को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। वह करीब दो सप्ताह तक कोमा में रहे और इस दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। वहीं 10 अक्तूबर 2011 को जगजीत सिंह ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:14 +0530</pubDate>
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<title>R K Narayan Birth Anniversary: भारतीय साहित्य के कालजयी लेखक थे आर के नारायण, आज भी जीवित हैं उनकी कहानियां</title>
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<description><![CDATA[ भारत के मशहूर लेखक आर के नारायण का 10 अक्तूबर को जन्म हुआ था। आर के नारायण ने हमें ऐसा टीवी सीरियल दिया था, जिसको देखने के लिए लोगों ने टीवी तक का जुगाड़ किया था। बता दें कि आर के नारायण ने 80-90 के दशक में जन्में बच्चों को टीवी सीरियल की सहायता से एक कमाल का बचपन दिया था। जिनको हम सभी कभी नहीं भूल पाएंगे। &#039;मालगुडी डेज&#039; आरके नारायण की किताब &#039;मालगुडी डेज&#039; पर आधारित था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर आर के नारायण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमद्रास में 10 अक्तूबर 1906 को आर के नारायण का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम रासीपुरम कृष्णास्वामी नारायणस्वामी था। उनके पिता एक अध्यापक थे। शिक्षक के घर में जन्म लेने के कारण उनके घर में हमेशा पढ़ाई-लिखाई का माहौल रहा था। आर के नारायण का अधिकतर समय मैसूर में पढ़ाई करते हुए बिताया। उन्होंने पत्रकारिता और लेखन को भी अधिक समय दिया था।इसे भी पढ़ें: Munshi Premchand Death Anniversary: उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं से हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमतलेखन कार्यआर के नारायण का जीवन एकांत और सरल रहा। उन्होंने अपने लेखन कार्य में अपना बहुत समय दिया था। मालगुडी डेज सीरियर की कहानी आर के नारायण ने लिखा था। वहीं इसके रेखाचित्र उनके भाई कार्टूनिस्ट आर के लक्षम्ण ने तैयार किया था। आर के नारायण और आर के लक्ष्मण दोनों भाइयों के पास सोच और लगन थी और पत्रकारिता में बड़ा नाम भी था।अंग्रेजी के प्रख्यात लेखर ग्राहम ग्रीन ने आर के नारायण की पहली चार किताबों के लिए प्रकाशक ढूंढे थे। उन्होंने &#039;स्वामी एंड फ्रेंड्स&#039; लिखने के बाद इसको अपने एक दोस्त के जरिए कई प्रकाशकों को भेजा, लेकिन यह किसी को पसंद नहीं आई। ऐसे में परेशान होकर नारायण ने अपने दोस्त से कहा कि वह &#039;स्वामी एंड फ्रेंड्स&#039; की पांडुलिपी को नदी में डुबो दें। लेकिन उनके दोस्त ने एक और चांस लिया और पांडुलिपी को ग्राहम ग्रीन तक पहुंचा दिया। जब ग्राहम ने इस उपन्यास को पढ़ा तो इसकी शैली पर वह मुग्ध हो गए।जिसके बाद &#039;स्वामी एंड फ्रेंड्स&#039; उपन्यास प्रकाशित हुआ और देश-विदेश में काफी ज्यादा लोकप्रिय भी हुआ। इसके बाद आर के नारायण ने मानवीय संबंधों पर एक से बढ़कर एक कई रचनाएं थीं। वहीं फेमस उपन्यास &#039;गाइड&#039; के लेखक थे। इसकी कहानी पर &#039;कालजयी&#039; नामक फिल्म बनी है। इस उपन्यास के लिए आर के नारायण को &#039;साहित्य अकादमी पुरस्कार&#039; से नवाजा गया था।पुरस्कारआर के नारायण के साहित्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उनको &#039;पद्मभूषण&#039; और &#039;पद्म विभूषण&#039; से सम्मानित किया था। फिर साल 1989 में आर के नारायण को राज्यसभा का मानद सदस्य बनाया गया। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय, मैसूर विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स से आर के नारायण को डॉक्टरेट की मानद उपाधियां प्रदान की गई थीं। वह कई बार साहित्य नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित हुए, हालांकि वह कभी इसे प्राप्त नहीं कर सके।प्रसिद्ध कृतियांआर के नारायण की प्रसिद्ध कृतियों में वेटिंग फॉर द महात्मा, द इंग्लिश टीचर, द मैन ईटर ऑफ मालगुडी, द गाइड, द वेंडर ऑफ स्वीट्स और अ टाइगर फॉर मालगुडी शामिल हैं। इसके अलावा अ हॉर्स एंड गोट्स एंड द अदर स्टोरीज, लॉली रोड, अंडर द बैनियन ट्री एंड अदर स्टोरीज शामिल हैं।मृत्युवहीं 13 मई 2001 को 94 साल की उम्र में आर के नारायण का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:14 +0530</pubDate>
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<title>Jayaprakash Narayan Birth Anniversary: न पद लिया न सत्ता में रहे फिर भी &amp;apos;लोकनायक&amp;apos; बने जेपी नारायण, ऐसा रहा लोकतंत्र में योगदान</title>
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<description><![CDATA[ युग परिवर्तनकारी विचारक जयप्रकाश नारायण का 11 अक्तूबर को जन्म हुआ था। उन्होंने आधुनिक भारत में अहिंसक आंदोलन से राजनीतिक परिवर्तन का एक नया इतिहास लिखा था। महात्मा गांधी के बाद आजाद भारत में पहली बार किसी नेता द्वारा यह चमत्कार किया गया था। हालांकि कई चुनौतियों को झेलने के बाद जेपी नारायण को अपने लक्ष्य में कामयाबी मिली थी। छात्र आंदोलन को अहिंसक और अनुशासित रखना जेपी की सबसे बड़ी कामयाबी थी। उन्होंने आपातकाल की घोर यातना के बाद भी शांति को शक्ति में बदलकर लोकतंत्र को नया जीवन देने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जेपी नारायण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाबिहार के सारण जिले के सिताबदियारा गांव में 11 अक्तूबर 1902 को जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था। बचपन से ही जेपी नारायण के अंदर देश के प्रति गजब की भक्ति थी। गरीबी और संघर्ष भरी जिंदगी के बाद भी जेपी नारायण ने हार नहीं मानी थी। शुरूआती पढ़ाई के बाद उन्होंने पटना कॉलेज में दाखिला लिया। यहां से ही जेपी के अंदर समाज के लिए कुछ करने की भावना पैदा हुई। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही जेपी ने गांधी जी और स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों से प्रभावित हुए।इसे भी पढ़ें: Nanaji Deshmukh Birth Anniversary: आधुनिक भारत के चाणक्य कहे जाते थे नानाजी देशमुख, समाजसेवा के लिए छोड़ दी थी सियासतसमाजवादी आंदोलन की रखी नींवअमेरिका से वापस लौटने के बाद जेपी नारायण ने भारत में समाजवादी आंदोलन की नींव रखी थी। वहीं पटना उनका कार्यस्थल बन गया और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेपी नारायण ने जेल में रहते हुए किताब लिखी थी। वहीं आजादी के बाद जब बाकी स्वतंत्रता सेनानी सत्ता के करीब पहुंचे, तो जेपी नारायण ने सियासय से दूरी बना ली थी। क्योंकि जेपी नारायण को सत्ता की नहीं बल्कि समाज की चिंता थी।बिहार के छात्रों ने साल 1974 में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, इस आंदोलन का नेतृत्व जेपी नारायण ने किया था। धीरे-धीरे यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और &#039;संपूर्ण क्रांति&#039; का नारा दिया। इस दौरान पटना के गांधी मैदान में लाखों लोगों की भीड़ ने जेपी नारायण को &#039;लोकनायक&#039; की उपाधि दी और उनके भाषण ने युवाओं में जोश भरने का काम किया।छात्र आंदोलन बना जेपी आंदोलनछात्र आंदोलन का नाम जेपी आंदोलन दिया गया और इस आंदोलन से स्व अरुण जेटली, स्वर्गीय सुषमा स्वराज, हुकुमदेव यादव, रविशंकर प्रसाद, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, विजय गोयल, आजम खान, रामविलास पासवान, रेवतीरमण सिह, केसी त्यागी और बीजू पटनायक जैसे कई नेता जुड़े। यह नेता बाद में भारत के शीर्ष राजनीतिक पदों पर आसानी हुए।निधनजीवन के आखिरी वर्षों में जेपी नारायण बीमार रहे, लेकिन फिर भी उनका आत्मबल अठिग रहा। वहीं 08 अक्तूबर 1979 को जयप्रकाश नारायण का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:13 +0530</pubDate>
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<title>Nanaji Deshmukh Birth Anniversary: आधुनिक भारत के चाणक्य कहे जाते थे नानाजी देशमुख, समाजसेवा के लिए छोड़ दी थी सियासत</title>
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<description><![CDATA[ आधुनिक भारत के चाणक्य कहे जाने वाले नानाजी देशमुख का आज ही के दिन यानी कि 11 अक्तूबर को जन्म हुआ था। नानाजी देशमुख ने संघ को कंधों पर उठाकर खड़ा किया और उन्होंने समाज सेवा के लिए सियासत को भी छोड़ दिया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 500 से अधिक गांवों की तस्वीर भी बदल डाली थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नानाजी देशमुख के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के हिंगोली में 11 अक्तूबर 1919 को नानाजी देशमुख का जन्म हुआ था। वह एक गरीब मराठी परिवार से ताल्लुक रखते थे। लेकिन वह विद्वता और जहीनियत में किसी अमीर से कम नहीं थे। बचपन में ही नानाजी देशमुख के सिर से माता-पिता का साया उठ गया था। ऐसे में उनको अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए भी मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा था।इसे भी पढ़ें: R K Narayan Birth Anniversary: भारतीय साहित्य के कालजयी लेखक थे आर के नारायण, आज भी जीवित हैं उनकी कहानियांआरएसएस को समर्पित कर दिया पूरा जीवनआरएसएस संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से नानाजी देशमुख के पारिवारिक जैसे संबध थे। हेडगेवार ने नानाजी की उभरती हुए सामाजित प्रतिभा को पहचान लिया था। जिसके कारण नानाजी को हेडगेवार ने संघ की शाखा में आने को कहा था। साल 1940 में हेडगेवार की मृत्यु के बाद संघ की स्थापना का दायित्व नानाजी के कंधों पर आ गया। नानाजी देशमुख ने इस संघर्ष को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया और पूरा जीवन संघ को समर्पित कर दिया।बलरामपुर की महारानी को दी थी शिकस्तचुनाव में बलरामपुर स्टेट की महारानी राजलक्ष्मी कुमारी देवी को नानाजी देशमुख ने हराया था। चुनाव जीतने के बाद देशमुख महारानी राजलक्ष्मी कुमारी देवी से मिलने के लिए उनके महल गए थे। नानाजी और महारानी की यह मुलाकात सहज और सौहार्दपूर्ण रही। महारानी से नानाजी देशमुख ने कहा कि आपकी प्रजा ने मुझे चुना है और वह क्षेत्र के विकास के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।महारानी से नानाजी देशमुख ने कहा था कि इस बार उनकी जनता ने मुझे आपके स्थान पर अपना प्रतिनिधि चुना है। नानाजी देशमुख ने कहा कि उनका कर्तव्य है कि वह आप जैसे लोगों के साथ रहें और उनके सुख-दुख में भागीदार बनें। नानाजी देशमुख ने महारानी से कहा कि उनको रहने के लिए घर दीजिए, तब महारानी राजलक्ष्मी कुमारी देवी ने नानाजी देशमुख को निराश नहीं किया और कहा कि आज से बलरामपुर एस्टेट के महाराजगंज की धरती आपकी हुई। नानाजी देशमुख ने बसाया गांवनानाजी देशमुख ने वहां पर एक नया गांव बसाया और उस गांव का नाम जयप्रभा रखा। जब तक नानाजी जीवित रहे, वह इस गांव को अपने आदर्शों के अनुरूप ढालते रहे। पहली बार चुनाव जीतने के बाद नानाजी ने साल 1980 के लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। नानाजी देशमुख ने राजनीति से संन्यास ले लिया। नानाजी के कार्यों के लिए उनको देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 27 फरवरी 2010 को नानाजी देशमुख का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:13 +0530</pubDate>
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<title>Vijayaraje Scindia Birth Anniversary: अपमान का बदला लेने कांग्रेस छोड़ जनसंघ में आईं थीं विजयाराजे सिंधिया, ऐसा था सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ ग्वालियर की राजमाता और भाजपा की दिग्गज नेता रहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया का 12 अक्तूबर को जन्म हुआ था। विजयाराजे सिंधिया का राजनीति में आना किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं था। उनकी पर्सनल लाइफ में भी कम उथल-पुथल नहीं थी, तो वहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया का अपने इकलौते बेटे माधवराव सिंधिया से विवाद भी किसी से छिपा नहीं था। हालांकि विजयाराजे सिंधिया ने अपने सियासी सफर की शुरूआत कांग्रेस के साथ की थी। लेकिन एक अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने जनसंघ का दामन थाम लिया। राजमाता विजया राजे सिंधिया मध्य प्रदेश की गुना लोकसभा सीट से 6 बार सांसद रही थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजमाता विजयाराजे सिंधिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमध्य प्रदेश के सागर में 12 अक्टूबर 1919 को राजमाता विजयाराजे सिंधिया का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम महेंद्र सिंह ठाकुर था, जोकि यूपी के जालौन जिले के डिप्टी कलेक्टर थे। उनकी मां का नाम विदेंश्वरी देवी था। वहीं 21 फरवरी 1941 को ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया से विजयाराजे सिंधिया से हुई।इसे भी पढ़ें: Jayaprakash Narayan Birth Anniversary: न पद लिया न सत्ता में रहे फिर भी &#039;लोकनायक&#039; बने जेपी नारायण, ऐसा रहा लोकतंत्र में योगदानराजनीतिक सफरपति के निधन के बाद राजमाता राजनीति में सक्रिय हुई और साल 1957 से 1991 तक 8 बार ग्वालियर के गुना से सांसद रही। कभी राजमाता विजयाराजे की देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की करीबी मानी जाती थीं। विजयाराजे ने साल 1957 से कांग्रेस से अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था। फिर 10 साल तक कांग्रेस में रहने के बाद साल 1967 में उन्होंने पार्टी का दामन छोड़ दिया।बेटे से रहा विवादराजमाता विजयाराजे सिंधिया अपने जीवनकाल में इकलौते बेटे कांग्रेस नेता रहे माधवराव सिंधिया से गहरा विवाद रहा था। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था कि उनका अंतिम संस्कार उनके बेटे माधवराव सिंधिया नहीं करेंगे। राजमाता विजयाराजे सिंधिया का सार्वजनिक जीवन जितना आकर्षक था, पारिवारिक जीवन उतना ही ज्यादा मुश्किलों भरा रहा था। राजमाता पहले कांग्रेस में थीं, फिर बाद में इंदिरा गांधी की नीतियों के विरोध में उनकी ठन गई और बाद में पूरी जिंदगी राजमाता ने जनसंघ और भाजपा में रहकर गुजारी। राजमाता विजयाराजे सिंधिया अपने बेटे माधवराव सिंधिया से कांग्रेस का दामन थामने के कारण नाराज थीं। विजयाराजे ने कहा था कि आपातकाल के दौरान उनके बेटे माधवराव सिंधिया के सामने पुलिस ने उनको अपमानित किया था। मां-बेटे में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही। इसके कारण ग्वालियर के जयविलास पैलेस में रहने के लिए विजयाराजे ने अपने ही बेटे माधवराव से किराया भी मांग लिया था। मृत्युवहीं 25 जनवरी 2001 राजमाता विजयाराजे सिंधिया का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:12 +0530</pubDate>
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<title>Bhupinder Singh Birth Anniversary: भूपिंदर सिंह ने महज 9 साल की उम्र में संभाली थी पटियाला की सत्ता, अय्याशी की बने थे मिशाल</title>
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<description><![CDATA[ देश की आजादी से पहले राजा-महाराजाओं का राज था। उस दौर में पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह सभी राजघरानों में सबसे ज्यादा शाहखर्च माने जाते थे। आज ही के दिन यानी की 12 अक्तूबर को महाराजा भूपिंदर सिंह का जन्म हुआ था। महाराजा भूपिंदर सिंह अपनी भव्य और अनूठी लाइफस्टाइल के लिए जाने जाते थे। वह फुलकियान राजवंश के जाट सिख थे, जोकि महज 9 साल की उम्र में राजा बने थे। इन रियासतों को प्रिंसली स्टेट कहा जाता था और राजा अपनी रियासतें खुद संभालते थे। लेकिन महाराजा पटियाला के मुकाबले कोई नहीं था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपटियाला के मोती बाग पैलेस में 12 अक्तूबर 1888 को महाराजा भूपिंदर सिंह का जन्म हुआ था। उन्होंने लाहौर पाकिस्तान के एचिसन कॉलेज पढ़ाई पूरी की। उनके पिता महाराजा राजिंदर सिंह के निधन के बाद 9 साल की उम्र में भूपिंदर सिंह ने पटियाला का राज संभाला था। वहीं 01 अक्तूबर 1909 को भूपिंदर सिंह के 18 साल के होने के बाद 3 नवंबर 1910 को तत्कालीन वायसराय ने उनको मान्यता दी थी। वह पहले ऐसे भारतीय थे, जिनके पास हवाई जहाज था और वह कारों के भी काफी शौकीन थे। महाराजा भूपिंदर सिंह के पास 20 रॉल्स रॉयस गाड़ियों का एक काफिला था।इसे भी पढ़ें: Guru Govind Singh Death Anniversary: गुरु गोबिंद सिंह ने मुगलों को कई बार चटाई थी धूल, धोखे से की गई थी हत्याभूपिंदर सिंह की थीं 365 रानियांभूपिंदर सिंह 6 फीट और 4 इंच लंबे थे। उनकी 365 रानियां थीं और उन्होंने हर रानी को अलग-अलग रुतबे से नवाजा था। महाराजा भूपिंदर सिंह की 365 रानियों में से 10 रानियां प्रमुख थीं। जिनको महारानी का दर्जा मिला था। इसके बाद कुछ खास रानियां थीं और बाकी महिलाएं रानी नहीं थीं, लेकिन उनको सुख-सुविधाएं रानियों जैसी मिलती थी। वहीं कुछ रानियां महाराजा के लिए सिर्फ शारीरिक संबंध बनाने के लिए थीं। महाराजा भूपिंदर सिंह अपनी सभी रानियों से अथाह प्रेम करते थे।फेमस थी भूपिंदर सिंह की नाइट पार्टीअक्सर महाराजा भूपिंदर सिंह का महल आलीशान दावतों का भी गवाह बनता था। रानी-महारानी और राजकुमारों के जन्मदिन पर भव्य जलसा होता था। छोटी दावतों में 300 खास मेहमान शामिल थे। मेहमानों के लिए सबसे अच्छा भोजन और शराब परोसी जाती थी। वहीं भारतीय वेटर्स के साथ इटालियन और अंग्रेज वेटर्स खाना परोसते थे। महाराजा भूपिंदर सिंह के मेहमानों के लिए दुनिया की सबसे महंगी शराब परोसी जाती थी।हालांकि भले ही नाइट पार्टीज का कल्चर अब अधिक पॉपुलर हुआ, लेकिन उस जमाने में महाराजा भूपिंदर सिंह की यह पार्टियां शाम से शुरू होकर अगली सुबह तक चलती थी। जब तक हर कोई शराब के नशे में चूर होकर सो नहीं जाता था। शराब पीने का प्रोटोकॉलबता दें कि महाराजा भूपिंदर सिंह शराब पीने के बड़े शौकीन थे। उनके पास जो शराब का कलेक्शन था, वह उस दौर का देश का सबसे बड़ा और शानदार कलेक्शन हुआ करता था। हालांकि वह व्हिस्की से ज्यादा वाइन पसंद करते थे। महाराजा भूपिंदर सिंह ने व्हिस्की पीने का भी प्रोटोकॉल सेट किया था, साथ ही पटियाला पेग का भी उन्होंने ईजाद किया था।मृत्युवहीं 23 मार्च 1938 को 47 साल की उम्र में महाराजा भूपिंदर सिंह की मौत हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:10 +0530</pubDate>
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<title>Ashok Kumar Birth Anniversary: वकालत की राह छोड़ पकड़ी अभिनय की दुनिया, ऐसे बने अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता अशोक कुमार का 13 अक्तूबर को जन्म हुआ था। अशोक कुमार न सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता, बल्कि एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को नई दिशा दी थी। हालांकि इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि अशोक कुमार कि फिल्मों में शुरूआत उनके सफर की शुरूआत किसी बड़े सपने या ग्लैमर से नहीं हुई थी। बल्कि अशोक कुमार ने पहली नौकरी बॉम्बे टॉकीज में लैब असिस्टेंट के रूप में की थी। इस नौकरी से अशोक कुमार फिल्मी हीरो बन गए और लाखों लोगों के दिलों पर छा गए। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अशोक कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबिहार के भागलपुर जिले में एक बंगाली परिवार में 13 अक्तूबर 1911 को अशोक कुमार का जन्म हुआ था। उनका असली नाम कुमुदलाल गांगुली था। इनके पिता कुंजीलाल गांगुली था, जोकि एक वकील थे। ऐसे में अशोक कुमार के मन में भी बचपन से वकील बनने का सपना था। लेकिन पहली बार वकालत की परीक्षा में फेल होने के बाद अशोक कुमार को लगा कि शायद यह उनके लिए नहीं है। ऐसे में अशोक कुमार खुद को साबित करने के लिए मुंबई आ गए और वहीं पर अपनी बहन के पति शशधर मुखर्जी बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे।इसे भी पढ़ें: Kishore Kumar Death Anniversary: किशोर दा की जादुई आवाज, जिसने बॉलीवुड को दिए अनमोल नगीने, आज भी हैं सदाबहारअशोक कुमार ने की लैब असिस्टेंट की नौकरीशशधर मुखर्जी से मदद मांगकर अशोक कुमार ने बॉम्बे टॉकीज में लैब असिस्टेंट की नौकरी पाई। इस नौकरी का मकसद रोजमर्रा की जिंदगी में गुजर-बसर करना था। अशोक कुमार कैमरे के पीछे काम करते थे और फिल्म बनाने की तकनीती प्रक्रियाओं को समझते थे। लेकिन उनकी किस्मत ने कुछ और ही सोचा था।फिल्मी करियरसाल 1936 में फिल्म &#039;जीवन नैया&#039; की शूटिंग चल रही थी, तो उस समय फिल्म के लीड हीरो नजमुल हसन ने अचानक से फिल्म छोड़ दिया। बॉम्बे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय ने फौरन फैसला किया कि अशोक कुमार को अभिनेता बनाया जाए। यह सुनकर फिल्म डायरेक्टर फ्रांज ऑस्टन को भी हैरानी हुई। क्योंकि डायरेक्टर फ्रांज ऑस्टन का मानना था कि अशोक कुमार का लुक हीरो के लिए फिट नहीं था। लेकिन फिर भी बॉम्बे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय ने अपना फैसला नहीं लिया। इस तरह से अशोक कुमार को पहली बार &#039;जीवन नैया&#039; फिल्म में अभिनय का मौका मिला।फिल्मेंइस फिल्म के दौरान उनका नाम कुमुदलाल गांगुली से बदलकर &#039;अशोक कुमार&#039; रख दिया। यहीं से अशोक कुमार की नई पहचान बनी और उनकी पहली फिल्म सफल रही। धीरे-धीरे अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बन गए। अशोक कुमार की सादगी और सहज अभिनय ने लोगों के दिलों को जीत लिया। अशोक कुमार &#039;किस्मत&#039;, &#039;चलती का नाम गाड़ी&#039;, &#039;बंदिनी&#039;, &#039;अछूत कन्या&#039;, &#039;हावड़ा ब्रिज’, &#039;बंधन&#039;, &#039;झूला&#039; और &#039;कंगन&#039; जैसी कई यादगार फिल्मों में काम किया।मृत्युवहीं 10 सितंबर 2001 को अभिनेता अशोक कुमार ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:09 +0530</pubDate>
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<title>Kishore Kumar Death Anniversary: किशोर दा की जादुई आवाज, जिसने बॉलीवुड को दिए अनमोल नगीने, आज भी हैं सदाबहार</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 13 अक्तूबर को सिंगर और अभिनेता किशोर कुमार का निधन हुआ था। किशोर कुमार न सिर्फ एक सिंगर थे, बल्कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे। जिनको प्यार से &#039;किशोर दा&#039; के नाम से भी जाना जाता था। किशोर दा की आवाज ने न सिर्फ लाखों दिलों को छुआ बल्कि संगीत की दुनिया में अमर हो गई। किशोर कुमार की मखमली आवाज और उसमें ठहराव की अनूठी शैली ने गायक को भारतीय संगीत को पर्याय बना दिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर किशोर कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमध्य प्रदेश के खंडवा में 04 अगस्त 1929 को किशोर कुमार का जन्म हुआ था। उनका असली नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार के बड़े भाई बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता थे, जिसके कारण किशोर कुमार का रुझान भी सिनेमा की तरफ हुआ। किशोर कुमार ने अपने गानों से दुनिया को अपना दीवाना बना दिया था।इसे भी पढ़ें: Guru Dutt Death Anniversary: बेजोड़ सफलता के बावजूद क्यों बेचैन थे गुरुदत्त, जानें उनकी दर्दनाक कहानीआत्मा में बसा था संगीतशुरुआत में किशोर कुमार को एक्टिंग के लिए प्रोत्साहित किया गया था। लेकिन उनकी आत्मा संगीत में बसी थी। साल 1946 में किशोर कुमार ने फिल्म &#039;शिकारी&#039; से अभिनय की शुरूआत की। लेकिन किशोर कुमार का अभिनय में मन नहीं लगता था, वह केएल सहगल की तरह गायक बनना चाहते थे। साल 1948 में  खेमचंद्र प्रकाश के संगीत निर्देशन में फिल्म &#039;जिद्दी&#039; में किशोर दा ने पहला गाना गाया। इसके बाद &#039;जीने की तमन्ना कौन करे&#039;, &#039;मरने की दुआएं क्यों मांगू&#039; जोकि देव आनंद के लिए था। फिर किशोर कुमार ने गायकी में शानदार सफलता हासिल की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।गाए सदाबहार गीतकिशोर दा एक ऐसी आवाज रहे, जिसने सिनेमा को अनगिनत सदाबहार गीत गाए। जैसे पल-पल दिल के पास, मेरे सपनों की रानी और जिंदगी एक सफर है सुहाना आदि गाए। किशोर दा की गायकी में जादू था, फिर चाहे वह रोमांटिक गीत हों, उदासी भरे या जोश भरे गाने हों। उन्होंने हर भाव को बखूबी पेश किया। किशोर कुमार की आवाज हर इमोशन को जिंदा कर देती थी।कालजयी गीत गाएकिशोर कुमार ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आरडी बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर कई कालजयी गीत गाए। किशोर कुमार का संगीतकार आरडी बर्मन के साथ खास रिश्ता था। दोनों ने &#039;अमर प्रेम&#039; और &#039;कटी पतंग&#039; जैसे अनगिनत हिट गीत दिए। बता दें कि किशोर कुमार सिर्फ गायक ही नहीं बल्कि अभिनेता, निर्माता, निर्देशक और संगीतकार भी थे। किशोर दा की फिल्म &#039;चलती का नाम गाड़ी&#039; और &#039;झुमरू&#039; आज भी दर्शकों के बीच पॉपुलर है।पर्सनल लाइफकिशोर कुमार का कॉमेडी अवतार और सहज अभिनय जितना दर्शकों का चहेता रहा, उनकी पर्सनल लाइफ उतनी ज्यादा मुश्किल रही थी। किशोर कुमार ने चार शादियां की थीं, जिनमें रुमा घोष, मधुबाला, योगिता बाली और लीना चंदावरकर शामिल थीं। किशोर दा की पर्सनल लाइफ काफी उतार-चढ़ाव भरी रही।मृत्युवहीं 13 अक्तूबर 1987 को दिल का दौरा पड़ने से किशोर कुमार की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:09 +0530</pubDate>
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<title>Suryakant Tripathi Nirala Death Anniversary: सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने संघर्षों से रचा था साहित्य का विराट संसार, आज भी अमर हैं रचनाएं</title>
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<description><![CDATA[ प्रसिद्ध हिंदी कवि, लेखक और निबंधकार रहे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का 15 अक्तूबर को निधन हो गया था। उन्होंने अपनी अंतहीन रचनाओं से हिंदी को समृद्ध करने के साथ ही कविताओं को बंधनमुक्त करते हुए उन्हें आजादी भी दी। वह छायावाद युग के चार स्तंभों में शामिल हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को जितना उनके साहित्य के लिए जाना जाता है, उससे कहीं ज्यादा विडंबनाओं से भरे जीवन के लिए भी जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1896 को सूर्यकांत त्रिपाठी का जन्म हुआ था। 20 साल की उम्र में उन्होंने हिंदी सीखना शुरू किया औऱ इसको अपनी लेखनी का माध्यम बनाया। महज 3 साल की उम्र में मां और फिर 20 साल की उम्र में सूर्यकांत के सिर से पिता का साया उठ गया। उनको बचपन से ही नौकरी न होने और उससे जुड़े सम्मान और अपमान का अनुभव करना पड़ा। इसे भी पढ़ें: Munshi Premchand Death Anniversary: उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं से हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमतदुख ही जीवन की कथा बनीप्रथम विश्व युद्ध के बाद एक फ्लू महामारी में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी पत्नी समेत आधे परिवार को खो दिया था। उनके साथ आर्थिक तंगी ऐसी थी कि उनका जीवन कल की चिंता के बिना नहीं बीता। प्रकृति और संस्कृति के अभिशापों को सहते हुए निराला ने अपना पूरा जीवन साहित्यिक गतिविधियों को समर्पित कर दिया था। उन्होंने न सिर्फ हिंदी में निपुणता प्राप्त की थी, बल्कि हिंदी साहित्य की नव-रोमांटिक धारा का भी बीड़ा उठाया।छायावाद के स्तंभ &#039;निराला&#039;महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत के साथ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला छायावाद युग के चार स्तंभों में से एक थे। वह एक छायावादी कवि थे, लेकिन निराला रूसी रोमांटिक कवि एलेक्जेंडर पुश्किन की तरह क्रांतिकारी यथार्थवादी भी थे। निराला की कलम ने शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ प्रभावशाली लेखन किया था।रचनाएंसूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने &#039;वो तोड़ती पत्थर&#039; में एक छोटी बच्चे की जीवन का चित्रण किया है, जोकि आजीविका के लिए पत्थर तोड़ने का काम करती है। इसके अलावा उनकी रचनाएं &#039;बंधु&#039; और &#039;जूही की कली&#039; भी करुणा और वीरता से भरपूर हैं। निराला की रचनाएं &#039;राम की शक्ति पूजा&#039;, &#039;सरोज स्मृति&#039; और &#039;वर दे वीणा वादिनी वर दे&#039; उनकी विरासत में नया आयाम जोड़ने का काम करती हैं। कवि के रूप में उनका सबसे बड़ा योगदान कविता को रिक्त छंद से मुक्त करना था। जिसके लिए निराला को तमाम लेखकों की आलोचना की भी सामना करना पड़ा था।साल 1936 में एक साहित्य उत्सव में गांधी जी ने पूछा कि &#039;हिंदी का टैगोर कहां है&#039;, तब सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने महात्मा गांधी से पूछा कि क्या उन्होंने पर्याप्त हिंदी साहित्य पढ़ा है। जिस पर गांधीजी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने अधिक हिंदी साहित्य का अध्ययन नहीं किया है। ऐसे में निराला ने कहा, &#039;फिर आपको मेरी मातृभाषा हिंदी में बात करने का अधिकार कौन देता है।&#039; उन्होंने आगे कहा कि वह गांधीजी को अपनी और रवींद्रनाथ टैगोर की कुछ रचनाएं भेजेंगे, जिससे कि वह हिंदी साहित्य को अधिक बेहतर तरीके से समझ सकें।मृत्युसाहित्यिक दौलत और शोहर से समृद्ध रहे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को अपने जीवन के आखिरी दिनों में घोर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। वहीं 15 अक्तूबर 1961 को सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:08 +0530</pubDate>
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<title>APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: अखबार बेचने से राष्ट्रपति भवन तक, डॉ. कलाम की संघर्षमय यात्रा, बने &amp;apos;मिसाइल मैन&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन कहे जाने वाले डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का 15 अक्तूबर को जन्म हुआ था। साल 2002 में वह एपीजे अब्दुल कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बने थे। डॉ कलाम भारत के प्रिय वैज्ञानिकों और नेताओं में से एक थे। हालांकि उनका जीवन संघर्ष भरा रहा था। उन्होंने अखबार बेचने से लेकर देश को मिसाइल और अंतरिक्ष तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु में एक मध्यमवर्ग मुस्लिम अंसार परिवार में 15 अक्तूबर 1931 को ए पी जे अब्दुल कलाम का जन्म हुआ था। उनका वास्तविक नाम अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम था। डॉ कलाम के पिता का नाम जैनुलाब्दीन और मां का नाम अशिअम्मा था। इनके पिता नाविक थे और वह मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। डॉ कलाम ने रामेश्वरम की पंचायत के प्राथमिक विद्यालय से अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी की। वहीं परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण डॉ कलाम ने छोटी उम्र से अख़बार वितरित करने का काम करना शुरूकर दिया था।इसे भी पढ़ें: Jayaprakash Narayan Birth Anniversary: न पद लिया न सत्ता में रहे फिर भी &#039;लोकनायक&#039; बने जेपी नारायण, ऐसा रहा लोकतंत्र में योगदानटीचर से मिली प्रेरणाडॉ कलाम से एक दिन उनके टीचर ने सवाल किया कि पक्षी कैसे उड़ते हैं। इस सवाल का कक्षा में कोई जवाब नहीं दे पाया, फिर अगले दिन टीचर छात्रों को लेकर समुद्र तट पर ले गए और पक्षियों के उड़ने का कारण भी समझाया। इन्हीं पक्षियों को देखकर एपीजे अब्दुल कलाम ने तय किया कि वह विमान विज्ञान में जाएंगे। इसके बाद उन्होंने फिजिक्स की पढ़ाई की और मद्रास इंजिनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई की।कहा जाता है &#039;मिसाइल मैन&#039;एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति और जाने-माने वैज्ञानिक और अभियंता के रूप में भी फेमस थे। उन्होंने करीब 4 दशकों तक मुख्य रूप से एक साइंटिस्ट और विज्ञान के व्यवस्थापक के तौर पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन को संभाला था। एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल के विकास के प्रयासों में भी शिरकत की थी। बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास कार्यों में योगदान के लिए एपीजे अब्दुल कलाम को &#039;मिसाइल मैन&#039; की उपाधि से नवाजा गया था।साल 1962 में एपीजे अब्दुल कलाम इसरो पहुंचे और यहां पर प्रोजेक्ट डायरेक्टर का पद संभाला। उनके अंडर में भारत का पहला स्वदेशी प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बना। फिर साल 1980 के दौरान पृथ्वी की कक्षा के निकट रोहिणी उपग्रह को स्थापित किया गया। इसके अलावा भारत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का मेंबर भी बन गया। फिर डॉ कलाम ने स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया और उन्होंने भारतीय टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें बनाईं।साल 1992 से 1999 तक डॉ कलाम रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार के तौर पर भी रहे। इस समय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर टेस्ट भी किए। साथ ही भारत परमाणु हथियार बनाने वाले देशों में शामिल हो गया। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार की भी भूमिका निभाई। वह साल 1982 में DRDL रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के डायरेक्टर बने।पुरस्कारसाल 1981 में भारत सरकार द्वारा एपीजे अब्दुल कलाम को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान &#039;पद्म भूषण&#039; से नवाजा गया। फिर साल 1990 में उनको &#039;पद्म विभूषण&#039; से सम्मानित किया गया। वहीं साल 1997 में उनको भारत रत्न से नवाजा गया था। साल 2002 में एपीजे अब्दुल कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बने थे। मृत्युवहीं 27 जुलाई 2015 को डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:07 +0530</pubDate>
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<title>Liaquat Ali Khan Death Anniversary: पाक PM बनने के कुछ समय बाद लियाकत अली खान की कर दी गई थी हत्या, जिन्ना के थे करीबी</title>
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<description><![CDATA[ भारत के वित्तमंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का 16 अक्तूबर को निधन हो गया था। अविभाजित भारत में जब जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी थी। जब पंडित नेहरू प्रधानमंत्री बने और इस सरकार में लियाकत अली को खान को वित्त मंत्री बनाया गया। हालांकि भारत-पाकिस्तान के बाद लियाकत अली खान पाकिस्तान चले गए। इसके बाद लियाकत अली खान बनाए गए। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री रहे लियाकत अली खान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकरनाल में 01 अक्तूबर 1895 को लियाकत अली खान का जन्म हुआ था। वह अपनी शुरूआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद मुस्लिम यूनिवर्सिटी से होते हुए ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी चले गए। फिर साल 1923 में देश वापस आने के बाद उन्होंने फौरन राजनीति में प्रवेश किया। इसके बाद लियाकत अली खान जिन्ना के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेता माने जाते थे।इसे भी पढ़ें: APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: अखबार बेचने से राष्ट्रपति भवन तक, डॉ. कलाम की संघर्षमय यात्रा, बने &#039;मिसाइल मैन&#039;लियाकत अली ने पेश किया था बजटबता दें कि ब्रितानी हुकूमत ने फरवरी 1860 में देश का पहला स्ट्रक्चर्ड बजट में पेश किया था। जिसको पेश करने वाले अंग्रेज वित्त विशेषज्ञ जेम्स विल्सन थे। वहीं आजादी के ऐलान के बाद लियाकत अली खान पहला बजट लेकर आए थे। वह मोहम्मद अली जिन्ना के बेहद खास माने जाते थे। जिन्ना की सिफारिश पर ही लियाकत अली खान को अंतरिम सरकार में वित्त मंत्रालय मिला था। यह देश के बंटवारे से पहले की बात है।कट्टरता के लगे थे आरोपइस दौरान लियाकत अली खान पर आरोप लगे थे कि वह वित्त पद पर होने का फायदा उठाते हैं। वहीं वह हिंदू मंत्रियों पर भी अपनी कट्टरता दिखाते हैं। कहा जाता था कि कथित तौर पर लियाकत अली खान गैर मुस्लिम मंत्रियों के लिए खर्चों पर आसानी से राजी नहीं होते थे।पाकिस्तानी प्रधानमंत्रीदेश के विभाजन के बाद लियाकत अली खान पाकिस्तान चले गए थे। जिसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। लियाकत अली खान 4 साल 2 महीने और 2 दिन पाकिस्तान के पीएम रहे थे। वहीं साल 1950 में लियाकत अली खान ने भारत और पाकिस्तान के बीच 08 अप्रैल 1950 को एक समझौता किया था, जिसका खास मकसद दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करना और भविष्य में होने वाली युद्ध की संभावनाओं को खत्म करना था।मृत्युवहीं 16 अक्तूबर 1951 को लियाकत अली खान की पाकिस्तान के रावलपिंडी में हत्या कर दी थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:07 +0530</pubDate>
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<title>Om Puri Birth Anniversary: कभी दुकान पर धोते थे बर्तन, फिर ओम पुरी ने हॉलीवुड तक जमाई अपनी धाक</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड से हॉलीवुड तक अपने दमदार अभिनय का लोहा मनवाने वाले अभिनेता ओम पुरी का 18 अक्तूबर को जन्म हुआ था। उनका असली नाम ओम राजेश पुरी था। उन्होंने अपनी शानदार एक्टिंग और दमदार आवाज से सभी का दिल जीता था। हालांकि ओमपुरी का बचपन काफी गरीबी में बीता था, लेकिन फिर किस्मत ने करवट ली और उन्होंने हिंदी सिनेमा में खूब नाम कमाया। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में करीब 300 से भी ज्यादा अलग-अलग भाषाओं में काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता ओम पुरी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के पटियाला में 18 अक्तूबर 1950 को अभिनेता ओमपुरी का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और संघर्ष के दम पर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि उन्होंने महज 6 साल की उम्र से चाय की दुकान पर बर्तन धोने का काम करना शुरूकर दिया था। उनके पिता को चोरी के झूठे आरोप में जेल तक जाना पड़ा था। लेकिन ओमपुरी ने मुश्किलों के सामने हार नहीं मानी और सभी परिस्थितियों का डटकर सामना किया।इसे भी पढ़ें: Ashok Kumar Birth Anniversary: वकालत की राह छोड़ पकड़ी अभिनय की दुनिया, ऐसे बने अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के सुपरस्टारअभिनय सफरआपको जानकर हैरानी होगी कि ओमपुरी का सपना ट्रेन ड्राइवर बनना था, लेकिन किस्मत ने उनको अभिनय की दुनिया में पहुचा दिया था। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय की बारीकियां सीखीं और यहीं से उनके अभिनय सफर की शुरूआत हुई थी। ओमपुरी की पहली मराठी फिल्म &#039;घासीराम कोतवाल&#039; थी। लेकिन अभिनेता को असली पहचान साल 1980 में आई फिल्म &#039;आक्रोश&#039; से मिली थी। इस फिल्म में ओमपुरी के गंभीर अभिनय ने दर्शकों के दिलों को झझकोर दिया था।ओम पुरी की फिल्मेंअभिनेता ओमपुरी ने अर्ध सत्य, जाने भी दो यारों, अरोहण, हेरा फेरी और मालामाल वीकली जैसी यादगार फिल्मों में अपने दमदार अभिनय का लोहा मनवाया था। उन्होंने सिर्फ बॉलीवुड में ही नहीं बल्कि हॉलीवुड में भी खूब नाम कमाया था। ओमपुरी ने वुल्फ, द घोस्ट एंड द डार्कनेस और सिटी ऑफ जॉय जैसी फिल्मों में काम किया था।निजी जिंदगीअभिनेता ओम पुरी की पर्सनल लाइफ काफी उतार-चढ़ाव भरी रही थी। लेकिन उन्होंने हमेशा अपने काम को पहले प्राथमिकता दी। उनको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे, जिसमें नेशनल अवॉर्ड भी शामिल था।मृत्युवहीं 06 अगस्त 2017 को 66 साल की उम्र में अभिनेता ओमपुरी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:04 +0530</pubDate>
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<title>Thomas Edison Death Anniversary: सिर्फ बल्ब ही नहीं, एडिसन ने दिए दुनिया को कई क्रांतिकारी आविष्कार, ऐसे थे दूरदर्शी वैज्ञानिक</title>
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<description><![CDATA[ अब तक के सबसे महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन का 18 अक्तूबर को निधन हो गया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में 1,093 अमेरिकी पेटेंट हासिल किए। थॉमस एडिसन ने दुनिया को बिजली के बल्ब के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक पेन, मूवी कैमरा और कार्बन माइक्रोफोन जैसी तमाम चीजें दे चुके थे। जो आज लोगों के काम आ रही हैं। वह वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक बिजनेसमैन भी थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर वैज्ञानिक थॉमस एडिसन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअमेरिका के ओहियो राज्य में मिलान शहर में 11 फरवरी 1847 को थॉमस एडिसन का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम सैमुअल ऑग्डेन एडिसन व मां का नाम नैंसी मैथ्यु इलियट था। वह अपने माता-पिता की 7वीं संतान थे। हालांकि एडिसन की यात्रा इतनी आसान नहीं रही थी। मंदबुद्धि होने की वजह से एडिसन को स्कूल से निकाल दिया गया था। लेकिन इस दौरान उनकी मां ने उनको घर पर पढ़ाया।इसे भी पढ़ें: APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: अखबार बेचने से राष्ट्रपति भवन तक, डॉ. कलाम की संघर्षमय यात्रा, बने &#039;मिसाइल मैन&#039;थॉमस एडिशन की मां के निधन के बाद उनको स्कूल के शिक्षक का एक पत्र मिला। जिसमें लिखा था कि एडिसन पढ़ने में काफी कमजोर हैं। यह पढ़कर एडिसन खूब रोए और हार नहीं मानी। उन्होंने शुरूआती दौर में ग्रांड ट्रंक रेल रोड लाइन से यात्रा करने वालों को अखबार बेचने का काम किया। फिर खुद का अखबार शुरू किया और उसका नाम ग्रैंड ट्रंक हेराल्ड रखा। यह उनका पहला व्यावसायिक उपक्रम था।पहला बड़ा आविष्कारसाल 1877 में थॉमस एडिसन ने टिनफॉइल फोनोग्राफ का आविष्कार किया था। जोकि उनका पहला और बड़ा आविष्कार था। एडिसन का यह आविष्कार किसी भी आवाज को रिकॉर्ड करने और बजाने में सक्षम पहली मशीन थी। एडिसन के मुताबिक इस मशीन का इस्तेमाल श्रुतलेख, पत्र लिखने और संगीत रिकॉर्ड करने के लिए भी किया जा सकता है। उनके फोनोग्राफ में एक सिलेंडर का इस्तेमाल होता था। इसमें दो सुइयां लगी थीं और एक सुई से रिकॉर्डिंग होती थी और दूसरी से साउंड प्लेबैक किया जाता था।बल्ब का आविष्कारबताया जाता है कि थॉमस एडिसन ने बल्ब का फिलामेंट बनाने के लिए 2 हजार से ज्यादा सामान आजमाए। इस दौरान वह हजारों बार फेल हुए और आखिरकार 27 जनवरी 1880 को बल्ब का पेटेंट हासिल किया। बताया जाता है कि उस दौर में इसको बनाने के लिए एडिसन ने 40 हजार डॉलर से ज्यादा खर्च किया था। इस आविष्कार में हाई रेजिस्टेंस कार्बन थ्रेड फिलामेंट का इस्तेमाल किया गया था, जोकि 40 घंटे से अधिक समय तक काम करता था।इलेक्ट्रिक कारों का सपनासाल 1899 में थॉमस एडिसन ने वाहनों को बैटरी से चलाने का सपना देख लिया था। इसी साल उन्होंने अल्कलाइन स्टोरेज बैटरी विकसित करना शुरूकर दी थी। वह एक ऐसी बैटरी बनाना चाहते थे, जिसको बिना रिचार्ज किए कार को करीब 100 मील तक चलाया जा सके। लेकिन उस दौर में पेट्रोलियम पदार्थों की प्रचुरता थी, इसलिए इलेक्ट्रिक कार दूर की कौड़ी लगने लगी। वहीं 10 साल तक इस पर काम करने के बाद थॉमस एडिसन ने इसे त्याग दिया।मृत्युवहीं 18 अक्तूबर 1931 को 84 साल की उम्र में थॉमस एडिसन की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:04 +0530</pubDate>
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<title>Shammi Kapoor Birth Anniversary: पर्दे पर मस्तमौला, ऑफ&#45;स्क्रीन गुस्सैल, &amp;apos;याहू बॉय&amp;apos; शम्मी कपूर के अनसुने किस्से</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे महान और सफल अभिनेताओं में शामिल अभिनेता शम्मी कपूर का आज ही के दिन यानी की 21 अक्तूबर को जन्म हुआ था। शम्मी कपूर के दिलकश अंदाज और पावरफुल अप्रोच को स्क्रीन पर टक्कर देना आज भी संभव नहीं है। अभिनेता शम्मी कपूर स्क्रीन पर जितने कूल और मस्तमौला नजर आते थे, वह ऑफ स्क्रीन उतने ही ज्यादा गुस्सैल नेचर के थे। उन्होंने अपने खास अंदाज और दमदार अभिनय से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता शम्मी कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...इसे भी पढ़ें: Om Puri Birth Anniversary: कभी दुकान पर धोते थे बर्तन, फिर ओम पुरी ने हॉलीवुड तक जमाई अपनी धाकजन्म और परिवारमुंबई में शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्तूबर 1931 को जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम शमशेर राज कपूर था। उनके पिता का नाम पृथ्वीराज कपूर और मां का नाम रामशेरनी मेहरा कपूर था। उनका बचपन कोलकाता में बीता था। शम्मी ने मोंटेसरी शिक्षा और किंडरगार्टन की पढ़ाई की थी। फिर उन्होंने ह्यूजेस रोड स्थित न्यू एरा स्कूल से अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद रामनारायण रुइया कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद पिता की ड्रामा कंपनी पृथ्वी थिएटर में शामिल हो गए थे और कई सालों तक काम किया।फिल्मी सफरसाल 1953 में आई फिल्म &#039;जीवन ज्योति&#039; से शम्मी कपूर ने हिंदी फिल्मों में शुरूआत की थी। इस फिल्म को महेश कौल ने निर्देशित किया था। अभिनेता के जीवन में असफलता से सफलता तक का रास्ता भी काफी लंबा था। शम्मी कपूर ने &#039;नकाब&#039;, &#039;हम सब चोर हैं&#039;, &#039;रेल का डिब्बा&#039;, &#039;कॉलेज गर्ल&#039;, &#039;प्रोफेसर&#039;, &#039;चाइना टाउन&#039;, &#039;प्यार किया तो डरना क्या&#039;, &#039;महबूबा शमां परवाना&#039;, &#039;कश्मीर की कली&#039;, &#039;जानवर&#039;, &#039;तीसरी मंजिल&#039;, &#039;अंदाज&#039;, &#039;मेम साहिब&#039; और &#039;चोर बाजार&#039; जैसी फिल्मों में काम किया था। वहीं अभिनेता को बड़ी सफलता फिल्म &#039;तुम सा नहीं देखा&#039; और &#039;दिल देकर देखो&#039; से मिली थी।इस फिल्म से बने स्टारसाल 1961 में फिल्म &#039;जंगली&#039; रिलीज हुई थी। जिसके बाद शम्मी कपूर इंडस्ट्री में &#039;याहू बॉय&#039; के रूप से छा गए। पर्दे पर गंभीर दिखने वाले अभिनेता वास्तव में मस्तमौला इंसान थे। उनकी एक्टिंग अन्य लोगों से अलग थी। साल 1955 में अभिनेता ने एक्ट्रेस गीता बाली से शादी कर ली थी। लेकिन गीता बाली का महज 55 साल की उम्र में निधन हो गया था। पहली पत्नी की मृत्यु के 4 साल बाद शम्मी कपूर ने गोहिल राजवंश की राजकुमारी नीला देवी गोहिल से शादी की।मृत्युअपने आखिरी समय में शम्मी कपूर क्रोनिक किडनी फेल्योर से पीड़ित थे। वहीं शम्मी कपूर का 14 अगस्त 2011 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:03 +0530</pubDate>
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<title>Kader Khan Birth Anniversary: फिल्म इंडस्ट्री के ऑलराउंडर स्टार थे कादर खान, ऐसे जमाए थे इंडस्ट्री में पैर</title>
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<description><![CDATA[ फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज अभिनेता कादर खान का 22 अक्तूबर को जन्म हुआ था। खलनायक बनकर जुल्म करना हो या रोते को हंसाना हो, बतौर अभिनेता कादर खान यह बखूबी कर लेते थे। वह जिस भी किरदार में पर्दे पर उतरते थे, उसी में रम जाते थे। कादर खान ने करीब 300 से ज्यादा फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जादू चलाया था। वहीं उन्होंने करीब 250 से भी ज्यादा फिल्मों के लिए डायलॉग भी लिखे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता कादर खान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअफगानिस्तान के काबुल में कादर खान का जन्म 22 अक्तूबर 1937 को हुआ था। बचपन में आर्थिक तंगी होने के बाद भी उनकी मां ने कादर खान को पढ़ाई का महत्व समझाया। शुरूआती पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और मुंबई के कॉलेज में प्रोफेसर बन गए। लेकिन कादर खान का दिल हमेशा से अभिनय और थिएटर की तरफ था।इसे भी पढ़ें: Yash Chopra Death Anniversary: रोमांस के जादूगर कहे जाते थे निर्देशक यश चोपड़ा, इंडस्ट्री पर किया सालों तक राजफिल्मी सफरबतौर अभिनेता कादर खाने ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत साल 1973 में फिल्म &#039;दाग&#039; से की थी। इसके बाद कादर खान ने दूल्हे राजा, हीरो नंबर 1, धर्म कांटा, फिफ्टी-फिफ्टी, मास्टरजी, राजा बाबू, जुदाई, बाप नंबरी बेटा 10 नंबरी, धरमवीर, नसीब, मिस्टर नटवरलाल, लावारिस, जस्टिस चौधरी, फर्ज और कानून, हिम्मतवाला, जानी दोस्त, सरफरोश, जिओ और जीने दो, तोहफा, कैदी और हैसियत जैसी फिल्मों में काम किया है। इसके अलावा उन्होंने कई फिल्मों के संवाद भी लिखे हैं।मृत्युअपने आखिरी समय में कादर खान की तबियत खराब रहने लगी थी और वह अधिकतर समय व्हीलचेयर पर ही रहते थे। वहीं समय के साथ उनकी याददाश्त भी धुंधली होने लगी थी। कादर खान सुपरान्यूक्लियर पाल्सी से पीड़ित थे। वहीं 31 दिसंबर 2018 को कादर खान की मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:02 +0530</pubDate>
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<title>Yash Chopra Death Anniversary: रोमांस के जादूगर कहे जाते थे निर्देशक यश चोपड़ा, इंडस्ट्री पर किया सालों तक राज</title>
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<description><![CDATA[ रोमांटिक फिल्मों के जरिए सिल्वर स्क्रीन के सहारे दिलों में उतरने का हुनर रखने वाले यश चोपड़ा का 21 अक्तूबर को निधन हो गया था। यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों के जरिए बॉलीवुड में रोमांस को परिभाषित किया। बड़े से बड़ा स्टार उनका नाम सुनकर उनकी फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हो जाते थे। दिग्गज निर्देशक यश चोपड़ा की फिल्मों का दर्शकों के बीच अपना एक क्रेज होता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर निर्देशक यश चोपड़ा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के लाहौर में 27 सितंबर 1932 को यश चोपड़ा का जन्म हुआ था। साल 1945 में उनका परिवार पंजाब के लुधियाना में बस गया था। यश चोपड़ा पढ़ाई के दौरान इंजीनियर बनना चाहते थे। इसके लिए वह लंदन भी जाना चाहते थे। लेकिन किस्मत ने यश चोपड़ा को फिल्मों की तरफ मोड़ दिया। उन्होंने मुंबई आकर अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा से फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखी थीं।इसे भी पढ़ें: Shammi Kapoor Birth Anniversary: पर्दे पर मस्तमौला, ऑफ-स्क्रीन गुस्सैल, &#039;याहू बॉय&#039; शम्मी कपूर के अनसुने किस्सेयादगार और कालजयी फिल्मेंसाल 1959 में यश चोपड़ा ने पहली फिल्म &#039;धूल का फूल&#039; बनाई थी। यह फिल्म अवैध सम्बन्धों के भावों को आगृत करने वाले नाटक पर आधारित थी। इसके बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को वह निर्देशक मिला, जिसने इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक यादगार और कालजयी फिल्में बनाईं। यश चोपड़ा ने अपने भाइयों के साथ मिलकर 60 के दशक में कई सफल फिल्में बनाईं। फिर साल 1973 में यश चोपड़ा ने फिल्म प्रोडक्शन कंपनी &#039;यश राज फिल्म्स&#039; की स्थापना की थी। इस प्रोडक्शन के तले यश चोपड़ा ने &#039;त्रिशूल&#039;, &#039;दीवार&#039;, दाग&#039;, &#039;डर&#039;, &#039;दिल तो पागल है&#039;, &#039;वीर जारा&#039;, &#039;जब तक है जान&#039; जैसी कई शानदार फिल्में बनाईं। पुरस्कारदिग्गज निर्देशक यश चोपड़ा के नाम कई पुरस्कार हैं। उनके नाम 8 फिल्म फेयर पुरस्कार और 6 राष्ट्रीय पुरस्कार हैं। इसके साथ ही यश चोपड़ा को दादासाहेब फाल्के और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है। यश चोपड़ा को स्विटजरलैंड से काफी लगाव था, उन्होंने अपनी कई फिल्मों में स्विटजरलैंड की खूबसूरती दिखाई है। जिस कारण वहां के टूरिज्म को बढ़ावा मिला था। इस कारण स्विटजरलैंड सरकार ने वहां पर यश चोपड़ा की कांस्य की 250 किलो वजनी मूर्ति लगवाई है और उनके नाम एक स्पेशल ट्रेन भी चलाई गई।निधनरोमांस के जादूगर कहे जाने वाले निर्देशक यश चोपड़ा ने 21 अक्तूबर 2012 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:02 +0530</pubDate>
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<title>Rani Chennamma Birth Anniversary: अंग्रेजों को घुटनों पर ले आई थीं रानी चेन्नम्मा, 19वीं सदी में किया था पहला सशस्त्र विद्रोह</title>
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<description><![CDATA[ कर्नाटक के बेलगाम जिले में स्थित कित्तूर रियासत अपनी शांति और समृद्धि के लिए जानी जाती थी। इसी के केंद्र में एक अटूट संकल्प की महिला थीं, जिनका नाम रानी चेन्नम्मा था। कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने दक्षिण भारत में स्वतंत्रता के पहले शोले को प्रज्वलित किया था। आज ही के दिन यानी की 23 अक्तूबर को रानी चेन्नम्मा का जन्म हुआ था। बता दें कि रानी चेन्नम्मा भारत की एक महान स्वतंत्रता सेनानी थीं। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ रानी चेन्नम्मा ने 19वीं सदी में पहला सशस्त्र विद्रोह किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबेलगावी के काकती गांव में 23 अक्तूबक 1778 को रानी चेन्नम्मा का जन्म हुआ था। उन्होंने बचपन से तलवारबाजी, घुड़सवारी और तीरंदाजी का गहन प्रशिक्षण लेना शुरूकर दिया था। फिर कित्तूर के राजा राजा मल्लसारजा के साथ उनका विवाह हो गया।इसे भी पढ़ें: Guru Govind Singh Death Anniversary: गुरु गोबिंद सिंह ने मुगलों को कई बार चटाई थी धूल, धोखे से की गई थी हत्यारानी चेन्नम्मा का पराक्रमबता दें कि रानी चेन्नम्मा का असली पराक्रम तब उजागर हुआ, जब कित्तूर रियासत पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की गिद्ध-दृष्टि पड़ी। उस समय तक अधिकतर भारतीय शासक ब्रिटिश सैनिकों के आगे घुटने टेक चुके थे। लेकिन इसके उलट रानी चेन्नम्मा ने स्वतंत्रता और सम्मान की राह चुनी। रानी चेन्नम्मा पर दुखों का पहाड़ तब टूटा, जब उनके पति राजा मल्लसारजा और इकलौते पुत्र की मृत्यु हो गई। कित्तूर का सिंहासन खाली हो गया और रियासत पर संकट के बादल मंडराने लगे।साल 1824 में अंग्रेजों ने &#039;राज्य हड़प नीति&#039; के तहत कित्तूर राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में का ऐलान किया। यह रानी चेन्नम्मा को मंजूर नहीं था। उन्होंने अंग्रेजी सेना से जमकर लोहा लिया और सशस्त्र संघर्ष किया। अपने अपूर्व शौर्य प्रदर्शन के बाद भी रानी चेन्नम्मा अंग्रेजी सेना का मुकाबला नहीं कर सकीं और अंग्रेजों द्वारा उनको कैद कर लिया गया।मृत्युअंग्रेजों की कैद में रहते हुए 21 फरवरी 1829 को रानी चेन्नम्मा का निधन हो गया। साल 1977 में रानी चेन्नम्मा द्वारा देश के लिए किए योगदान को याद करते हुए भारत सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था। आज भी कर्नाटक में रानी चेन्नम्मा का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:01 +0530</pubDate>
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<title>Ashfaqullah Khan Birth Anniversary: काकोरी कांड के नायक थे अशफाकउल्ला खान, मातृभूमि पर न्योछावर कर दी थी जान</title>
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<description><![CDATA[ भारत में क्रांतिकारियों ने 1920 के दशक में अपनी देशभक्ति के कारनामों से लोगों को रोमांचित कर दिया था। ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी और महान क्रांतिकारी अशफाकउल्ला खान थे। आज ही के दिन यानी की 22 अक्तूबर को अशफाकउल्ला खान का जन्म हुआ था। उन्होंने अंग्रेजों से आजादी के लिए अपने तरीके से काम किए और देश की युवा पीढ़ी के लिए मिसाल बने थे। अशफाक में देश की आजादी के लिए कुछ कर गुजरने का गजब का जज्बा था। अशफाकउल्ला खान ने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अशफाकउल्ला खान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में 22 अक्टूबर 1900 को अशफाकउल्ला खान का जन्म एक पठान परिवार में हुआ था। उनके परिवार में सभी लोग सरकारी नौकरी में थे। लेकिन अशफाक बचपन से ही देश के लिए कुछ करना था। उनके जीवन पर क्रांतिकारियों का बहुत प्रभाव था। उनको निशानेबाजी, घुड़सवारी और तैराकी का भी शौक था। हालांकि अशफाक को पढ़ाई-लिखाई में रुचि नहीं दिखाते थे, लेकिन देश की भलाई के लिए किए जाने वाले आंदोलनों की कहानियों को बड़ी रुचि के साथ पढ़ते थे।इसे भी पढ़ें: APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: अखबार बेचने से राष्ट्रपति भवन तक, डॉ. कलाम की संघर्षमय यात्रा, बने &#039;मिसाइल मैन&#039;लूटा था सरकारी खजानाअशफाक उल्ला खां के जीवन पर महात्मा गांदी का शुरू से प्रभाव था। जब गांधीजी ने &#039;असहयोग आंदोलन&#039; वापस ले लिया था, तो उनके मन को अत्यंत पीड़ा पहुंची थी। फिर 08 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की एक अहम बैठक हुई थी। जिसमें 09 अगस्त 1925 को सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजन ट्रेन काकोरी स्टेशन पर आने वाली ट्रेन लूटने की योजना बनाई गई, इस ट्रेन में सरकारी खजाना था।वहीं 09 अगस्त 1925 को अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, केशव चकवर्ती और अन्य क्रांतिकारियों ने गुप्त योजना को अंजाम देते हुए लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन से ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इस घटना के बाद से इसको काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है।इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने एक-एककर सभी क्रांतिकारियों को पकड़ लिया, लेकिन अशफाक उल्ला खां और चंद्रशेखर आजाद पुलिस के हाथ नहीं आए थे। वहीं 26 सितंबर 1925 को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कुल 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था। इन क्रांतिकारियों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ने, राजद्रोह करने, मुसाफिरों की हत्या करने और सरकारी खजाना लूटने का मुकदमा चलाया गया था।मृत्युवहीं 19 दिसबंर 1927 को महज 27 साल की उम्र में अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल में फांसी दे दी गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:01 +0530</pubDate>
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<title>RK Laxman Birth Anniversary: आम आदमी की आवाज को कार्टून के जरिए उठाते थे आर के लक्ष्मण, झेलनी पड़ी थी इंदिरा गांधी की नाराजगी</title>
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<description><![CDATA[ अपने कार्टून्स से लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले &#039;द कॉमन मैन&#039; के निर्माता आर के लक्ष्मण का 24 अक्तूबर को जन्म हुआ था। आर के लक्ष्मण ने अपने कार्टून्स से समाज के आम लोगों की आवाज को उठाने का काम किया था। वह अपने कार्टून्स के जरिए राजनीतिक खामियों, समाज की कमियों पर तीखा हमला करते थे। आर के लक्ष्मण का सबसे चर्चित कार्टून &#039;कॉमन मैन&#039; था। बता दें कि साल 1985 में लंदन में आर के लक्ष्मण के कार्टून की प्रदर्शनी लगाई गई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर आर के लक्ष्मण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमैसूर के तमिल अय्यर परिवार में 24 अक्तूबर 1921 को आर के लक्ष्मण का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही दीवारों पर पेंसिल चलाया करते थे। आर के लक्ष्मण छोटी उम्र से ही मैगजीन में कार्टून देखा करते थे और यहीं से उनकी दिलचस्पी कार्टून में हो गई। इसके बाद उन्होंने मुंबई के जे जे स्कूल ऑफ आर्ट में एडमिशन लेने के लिए आवेदन किया, जिस पर डीन ने उनको यह कहकर एडमिशन देने से मना कर दिया कि आर के लक्ष्मण में स्किल की कमी है। हालांकि कुछ साल बाद इसी संस्थान ने आर के लक्ष्मण को खास इनविटेशन देकर स्पीच देने के लिए बुलाया था।इसे भी पढ़ें: Thomas Edison Death Anniversary: सिर्फ बल्ब ही नहीं, एडिसन ने दिए दुनिया को कई क्रांतिकारी आविष्कार, ऐसे थे दूरदर्शी वैज्ञानिकमतभेद होने पर छोड़ी नौकरीआर के लक्ष्मण ने अखबारों के लिए पॉलिटिकल कार्टून बनाना शुरू किया। उन्होंने फिल्म &#039;नारद&#039; के लिए भी कार्टून बनाया, लेकिन उनको यहां पर परमानेंट नौकरी नहीं मिली। आजादी की लड़ाई के दौरान यह सिलसिला भी थम गया। ऐसे में वह कार्टून बनाकर &#039;स्वराज&#039; के ऑफिस पहुंचे। जहां पर वह 50 रुपए सैलरी पर काम करने लगे। इसके बाद वह मुंबई गए और वहां पर फुल टाइम फ्री प्रेस जर्नल में बतौर कार्टूनिस्ट काम करने लगे। लेकिन यहां के संपादक से मतभेद होने के बाद आर के लक्ष्मण ने यहां भी नौकरी छोड़ दी।फ्री प्रेस जर्नल की नौकरी छोड़ने के बाद वह अंग्रेजी अखबार &#039;टाइम्स ऑफ इंडिया&#039; पहुंचे। यहां पर उन्होंने करीब 50 साल से भी ज्यादा समय तक काम किया। यहां से ही आर के लक्ष्मण को आम लोगों से जुड़ने का मौका मिला। लोग उनको फोन या चिट्ठियों के जरिए अपनी रोजमर्रा की परेशानियां बताते थे। लोगों के लिए आर के लक्ष्मण के कार्टून उनकी आवाज थे और उनके कार्टूनों का सरकारों पर काफी प्रभाव भी पड़ता था।इंदिरा गांधी हुई थीं नाराजबता दें कि साल 1944 से लेकर 1964 तक आर के लक्ष्मण के कार्टून्स में नेहरु युग का भारत दिखाई देता था। इसके बाद इंदिरा गांधी के दौर में भी आर के लक्ष्मण का काम चलता रहा। इंमरजेंसी के दौरान प्रेस की आजादी पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, उस पर भी आरके लक्ष्मण ने कई कार्टून बनाए थे। आर के लक्ष्मण ने डी के बरुआ के वक्तव्य &#039;इंदिरा इस इंडिया, इंडिया इज इंदिरा&#039; पर भी कार्टून बनाया था, जिसको देखकर इंदिरा गांधी काफी ज्यादा नाराज हुई थीं।मृत्युवहीं 26 जनवरी 2015 को 93 साल की उम्र में आर के लक्ष्मण ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:00 +0530</pubDate>
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<title>Manna Dey Death Anniversary: मुश्किल गायिकी में मन्ना डे को हासिल थी महारत, 14 भाषाओं में गाए थे गाने</title>
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<description><![CDATA[ जब भी हिंदी फिल्मों के सदाबहार गीतों की बात की जाती है, तो कुशोर कुमार और मोहम्मद रफी के साथ मन्ना डे का नाम भी लिया जाता है। बता दें कि मन्ना डे की आवाज इतनी मधुर और पहचानने वाली थी कि एक समय को श्रोता फिल्मों के नाम भले ही भूल जाएं, लेकिन मन्ना डे के गाए गीत नहीं भूलते। आज ही के दिन यानी की 24 अक्तूबर को गायक मन्ना डे का निधन हो गया था। लेकिन उनके द्वारा गाए गए गीतों को आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मन्ना डे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...इंडस्ट्री में शुरूआतपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 01 मई 1919 को मन्ना डे का जन्म हुआ था। इनका असल नाम प्रबोध चंद्र डे था। मन्ना डे ने फिल्म इंडस्ट्री में अपन करियर की शुरूआत साल 1942 में आई फिल्म &#039;तमन्ना&#039; से की थी। इस फिल्म में उन्होंने फेमस गायिका सुरैया के साथ गाया था। इसके बाद साल 1943 में आई फिल्म &#039;राम राज्य&#039; में &#039;गई तू गई सीता सती&#039; गाया था, जिसको महात्मा गांधी ने भी सराहा था।इसे भी पढ़ें: Kader Khan Birth Anniversary: फिल्म इंडस्ट्री के ऑलराउंडर स्टार थे कादर खान, ऐसे जमाए थे इंडस्ट्री में पैरमन्ना डे की खासियतबता दें कि मन्ना डे की यह खासियत थी कि वह मुश्किल और चुनौतीपूर्ण गानों को सहजता से गा लेते थे। संगीतकारों ने उनकी गायकी क्षमता को देखते हुए हमेशा कठिन गीतों के लिए मन्ना डे का चयन किया था। वहीं राजकपूर ने भी कई फिल्मों में मन्ना डे को चुना। उन्होंने साल 1956 में आई फिल्म &#039;चोरी चोरी&#039; में गीत &#039;ये रात भीगी भीगी&#039; को मुकेश की जगह मन्ना डे और लता मंगेशकर से रिकॉर्ड कराया था। यह गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे रोमांटिक गीतों में से एक माना जाता है।मन्ना डे के गायन की तारीफ उनके समकालीन कलाकारों ने भी किया था। लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी भी मन्ना डे के गीतों के कायल थे। लता मंगेशकर ने मन्ना डे को उपकार फिल्म के &#039;कसमें वादे प्यार वफा&#039; के लिए बेहद सराहा था।14 भाषाओं में गाए गानेमन्ना डे ने हिंदी और बांग्ला के अलावा कुल 14 भाषाओं में गाने गाए हैं। उन्होंने 5 दशकों के अपने करियर में करीब 3,046 गाने रिकॉर्ड किए। उनके फेमस गीतों में &#039;जिंदगी कैसी ये पहली&#039;, &#039;यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी&#039;, &#039;कसमें वादे प्यार वफा&#039;, तू प्यार का सागर है&#039;, &#039;ये दोस्ती&#039;, &#039;जिंदगी कैसी है पहेली&#039;, &#039;आ जा सनम मधुर चांदनी&#039;, &#039;यशोमति मैया से&#039;, &#039;एक चतुर नार&#039; और &#039;प्यार हुआ इकरार हुआ&#039; शामिल हैं।मृत्युवहीं 24 अक्टूबर 2013 को मन्ना डे ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:42:00 +0530</pubDate>
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<title>Sahir Ludhianvi Death Anniversary: अधूरा प्यार, अमर नग़मे और बॉलीवुड के बेताज बादशाह थे साहिर लुधियानवी, अधूरी रह गई थी मोहब्बत</title>
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<description><![CDATA[ शायर और गीतकार रहे साहिर लुधियानवी का आज ही के दिन यानी की 25 अक्तूबर को निधन हो गया था। भले ही साहिर दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी और गीत आज भी लोगों द्वारा सुनी जाती हैं। साहिर लुधियानवी की शायरियों में अधूरी मोहब्बत का दर्द है, तो जिंदगी को जीने का जज्बा भी है। उन्होंने अपने गीतों और शायरियों के जरिए गैर-बराबरी और जुल्मों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। उन्होंने इश्क पर भी खूब लिखा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर साहिर लुधियानवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारलुधियाना के एक जागीरदार घराने में 08 मार्च 1921 को साहिर लुधियानवी का जन्म हुआ था। माता-पिता के अलगाव के बाद साहिर अपनी मां के साथ रहे। उन्होंने लुधियाना के खालसा हाई स्कूल से शिक्षा ली। फिर कॉलेज के दिनों में वह अमृता प्रीतम से प्यार कर बैठे, लेकिन अमृता के घरवालों को यह पसंद नहीं आया, क्योंकि साहिर एक मुस्लिम थे और दूसरी ओर गरीब भी थे। अमृता के पिता के कहने पर साहिर को कॉलेज से निकाल दिया गया। आज भी अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी के प्यार के किस्से बड़ी दिलचस्पी से सुने जाते हैं। हालांकि दोनों का प्यार मुकम्मल नहीं हो सका।इसे भी पढ़ें: Manna Dey Death Anniversary: मुश्किल गायिकी में मन्ना डे को हासिल थी महारत, 14 भाषाओं में गाए थे गानेपाकिस्तानी सरकार ने जारी किया वारंटसाहिर लुधियानवी के जीविका चलाने के लिए तरह-तरह की छोटी-मोटी नौकरियां कीं। साल 1942 में वह लाहौर आ गए और इसी साल उन्होंने अपनी पहली कविता संग्रह &#039;तल्खियां&#039; छपवाई। जिसके बाद उनको शोहरत मिलना शुरू हो गई। साल 1945 में साहिर लुधियानवी उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ और शाहकार के संपादक बने। इसके बाद वह एक पत्रिका &#039;सवेरा&#039; के भी संपादक बने। इस पत्रिका में साहिर की किसी रचना को सरकार के विरुद्ध समझा गया और इसके लिए पाकिस्तान सरकार ने साहिर लुधियानवी के खिलाफ वारंट जारी कर दिया।इंडस्ट्री में शुरूआतइसके बाद साहिर कुछ समय दिल्ली में रहे और फिर मुंबई आ गए। यहां पर उन्होंने बतौर लिरिसिस्ट फिल्म इंडस्ट्री में काम करना शुरू किया। बतौर कवि उनकी इतनी कमाई नहीं होती थी, जितनी कि इंडस्ट्री में गाने लिखने के बाद होने लगी थी। साल 1948 में उन्होंने &#039;आजादी की राह पर&#039; में चार गानों के साथ इंडस्ट्री में अपनी शुरूआत की। इसके बाद साहिर का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। साल 1951 में &#039;नौजवान&#039; से एसडी बर्मन के साथ साहिर लुधियानवी को पहचान मिली।&#039;बाजी&#039; से साहिर लुधियानवी को खूब सफलता मिली। इस दौरान साहिर को गुरुदत्त की टीम का हिस्सा माना जाता था। साहिर की एसडी बर्मन के साथ आखिरी फिल्म प्यासा थी। जोकि साल 1957 में आई थी। इस फिल्म में गुरुदत्त ने विजय नाम के कवि का किरदार निभाया था। इस फिल्म के बाद साहिर लुधियानवी और एसडी बर्मन में आर्टिस्टिक और कॉन्ट्रैक्ट को लेकर मतभेद हुआ और दोनों अलग हो गए।मृत्युवहीं 25 अक्तूबर 1980 को साहिर लुधियानवी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:59 +0530</pubDate>
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<title>K R Narayanan Birth Anniversary: के आर नारायणन ने दलित गौरव को दिया सर्वोच्च शिखर, ऐसे तय किया राष्ट्रपति भवन तक का सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 27 अक्तूबर को भारत के 10वें राष्‍ट्रपत‍ि रहे कोचरिल रामण नारायणन का जन्म हुआ था। वह अपने प्रतिद्वंद्वी पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषण को हराकर राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। इस सर्वोच्च पद को हासिल करने वाले के आर नारायणन देश के पहले दलित थे। इससे पहले इस वर्ग का कोई भी यहां तक नहीं पहुंचा था। के आर नारायणन अपनी राजनीतिक कार्यकुशलता के लिए भी जाने जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर के आर नारायणन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाकेरल के एक छोटे से गांव पेरुमथॉनम उझावूर, त्रावणकोर में 27 अक्तूबर 1920 को के आर नारायणन का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम कोचरिल रामण नारायणन था। उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर 1936-37 में मैट्रिक परीक्षा पास की। स्कॉलरशिप से उन्होंने 12वीं की परीक्षा पास की। फिर उन्होंने ऑर्ट फैकल्टी (ऑनर्स) में ग्रेजुएशन की। इसे भी पढ़ें: APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: अखबार बेचने से राष्ट्रपति भवन तक, डॉ. कलाम की संघर्षमय यात्रा, बने &#039;मिसाइल मैन&#039;लोकसभा सांसद साल 1984 में आर के नारायणन लोकसभा चुनाव में निर्वाचित हुए। यहीं से उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ था। आर के नारायणन ने पूर्व पीएम इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के मंत्रिमंडलों के तहत विभिन्न पदों पर काम किया था। इसके बाद ही वह उप राष्ट्रपति और राष्ट्रपति जैसे पदों तक पहुंचे। आर के नारायणन राष्ट्रपति पद को संवैधानिक मर्यादाओं के सावधानीपूर्वक पालन किया।राष्ट्रपति पदबता दें कि 25 जुलाई 1997 से लेकर 25 जुलाई 2002 तक वह राष्ट्रपति रहे। इससे पहले आर के नारायणन 21 अगस्त 1992 को डॉ शंकर दयाल शर्मा के राष्ट्रपति काल में उपराष्ट्रपति भी निर्वाचित हुए थे। हालांकि उनके कार्यकाल में भारत की राजनीति में गुजरने वाली तमाम अस्थिर परिस्थितियों की वजह से बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है।भारतीय विदेश सेवाआर के नारायणन में साल 1949 में भारतीय विदेश सेवा से अपने करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने टोक्यो, रंगून, लंदन, कैनबरा और हनोई समेत कई प्रमुख दूतावासों में कार्यभार संभाला था। आर के नारायणन की कूटनीतिक विशेषज्ञता का फायदा तुर्की, थाईलैंड और चीन में भारत के राजदूत के रूप में काम करने का मौका मिला। इसके बाद आर के नारायणन की राजनीति में एंट्री हुई।मृत्युवहीं 09 नवंबर 2005 को के आर नारायणन का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:57 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Banda Singh Bahadur Birth Anniversary: बंदा सिंह बहादुर ने मुगलों से जमकर लिया था लोहा, खासला राज की रखी थी नींव</title>
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<description><![CDATA[ इतिहास में कई ऐसी बहादुर शख्सियते हुईं, जिन्होंने मुगलों के सामने झुकने के बजाय उनका बहादुरी से सामना किया। ऐसी ही एक शख्सियत बंदा सिंह बहादुर की रही। कम उम्र में ही संत बनने वाले बंदा सिंह बहादुर एक कुशल और बहादुर योद्धा होने के साथ काबिल लीडर भी थे। आज ही के दिन यानी की 27 अक्तूबर को बंदा सिंह बहादुर का जन्म हुआ था। उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह से मुलाकात होने के बाद सैनिक प्रशिक्षण लिया था और बिना सेना व हथियार के करीब 2500 किमी की दूरी तय की थी। बंदा सिंह बहादुर ने डेढ़ साल के अंदर सरहिंद पर कब्जा किया और खालसा राज की नींव रखने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बंदा सिंह बहादुर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारराजौरी में 27 अक्तूबर 1670 को बंदा सिंह बहादुर का जन्म हुआ था। बताया जाता है कि वह बहुत कम उम्र में घर छोड़कर बैरागी हो गए थे। इसलिए उनको माधोदास बैरागी के नाम से जाना जाने लगा था। भ्रमण करते हुए बंदा सिंह बहादुर महाराष्ट्र पहुंचे, जहां पर उनकी मुलाकात सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह से हुई। गुरु गोबिंद सिंह ने बंदा सिंह को अपनी तपस्वी जीवनशैली को त्यागने और पंजाब के लोगों को मुगलों से छुटकारा दिलाने का काम सौंपा।इसे भी पढ़ें: Rani Chennamma Birth Anniversary: अंग्रेजों को घुटनों पर ले आई थीं रानी चेन्नम्मा, 19वीं सदी में किया था पहला सशस्त्र विद्रोहमुगलों से छुटकारा दिलाने की जिम्मेदारीइसके बाद बंदा सिंह को एक तलवार, पांच तीर और 3 साथी दिए और एक फरमान दिया गया। इस फरमान में लिखा था कि बंदा सिंह को मुगलों के जुल्म से लोगों को छुटकारा दिलाने के लिए सिखों का नेतृत्व करें। साथ ही यह भी कहा गया कि वह पंजाब कूच करें और वजीर खां को मौत की सजा दें।वहीं साल 1709 में मुगल साम्राज्य की कमान बहादुर शाह के पास थी। वह सल्तनत का दायरा बढ़ाने के लिए दक्षिण में जंग कर रहे थे। जब बंदा सिंह पंजाब पहुंचे तो उन्होंने सतलज नदी के पहले रहने वाले सिख किसानों को एकजुट करना शुरू किया। फिर उन्होंने कैथल और सोनीपत में मुगलों के खजाने पर कब्जा कर लिया। जिन बंदा सिंह की सेना में 3 साथी थे, उनका दायरा तेजी से बढ़ा। उनकी सेना में 8 हजार सैनिक हो गए।  उनकी सेना में 5 हजार घोड़े थे, जोकि बढ़कर 19 हजार हो गए थे।सरहिंद पर हमलासाल 1709 में बंदा सिंह और उनके सैनिकों ने सरहिंद के समाना पर हमला किया। इस हमले का कारण यह था कि वजीर खां वहां पर रहता था। यह वही वजीर खां था, जिसने गुरु गोबिंद सिंह का सिर कलम किया था और उनके बेटों को मौत के घाट उतार दिया था। बंदा सिंह ने 1710 में हमला किया और दो दर्जन तोपों के साथ फतह हासिल की। आमने-सामने की लड़ाई में बंदा सिंह के भाई फतह सिंह ने सीधे वजीर खां के सिर पर हमला कर उसको चित कर दिया।बंदा सिंह बहादुर की इस जीत के बाद उन्होंने नई मुहर और सिक्के जारी किए। जिस पर गुरुनानक की तस्वीर थी। हालांकि 1710 में मुगल बादशाह बहादुर शाह ने बदला लेने और बंदा सिंह बहादुर को पकड़ने की तमाम रणनीति बनाई, लेकिन मुगल शासक को सफलता नहीं मिली। बता दें कि 1712 में बहादुर शाह की मौत के बाद उनके भतीजे ने सल्तनत संभाली थी। जिसके बाद बंदा सिंह को पकड़ने की जिम्मेदारी अब्दुल समद खां को सौंपी गई।मृत्युअब्दुल समद खां ने सेना के साथ उस किले को घेरा, जहां पर बंदा सिंह बहादुर थे। मुगल सैनिकों ने अंदर राशन पानी भेजने पर रोक लगा दी और यह पहरा लगातार 8 महीनों तक रहा। जिसका नतीजा यह निकला कि बंदा सिंह और उनके साथियों को घोड़ों का मांस खाकर जिंदा रहना पड़ा। समद खां आखिरकार बंदा सिंह का किला भेदने में सफल रहा। बंदा सिंह को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया और तमाम तरह की यातनाएं दी गईं। लेकिन बंदा सिंह ने मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाया। फिर 09 जून 1716 को जल्लाद ने बंदा सिंह बहादुर का धड़ सिर से अलग कर दिया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:56 +0530</pubDate>
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<title>बहुमुखी प्रतिभा के धनी शानदार व्यक्तित्व के स्वामी थे &amp;apos;गोवर्धन असरानी&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय फिल्म जगत की प्रसिद्ध शख्शियत &#039;गोवर्धन असरानी&#039; का जन्म राजस्थान की विश्व प्रसिद्ध गुलाबी नगरी जयपुर के एक सिंधी हिंदू परिवार में 1 जनवरी 1941 को हुआ था। उनके पिता कालीन व्यापारी थे और वह सात भाई-बहन थे। &#039;असरानी&#039; बचपन से ही नाटकों और मिमिक्री में गहरी दिलचस्पी रखते थे। उन्होंने जयपुर से ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। स्कूल के दिनों से ही वह नियमित रूप से नाटक और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे, जिससे की उनके अंदर छिपी हुई अभिनय की प्रतिभा को निखारने का भरपूर अवसर मिला। पढ़ाई पूरी करने के बाद &#039;असरानी&#039; ने अपने करियर की शुरुआत अखिल भारतीय रेडियो के जयपुर स्टेशन में रेडियो कलाकार के रूप में की थी। &#039;असरानी&#039; ने 1970-80 के दशक की जानी-मानी अभिनेत्री &#039;मन्जू बंसल&#039; से विवाह किया था।&#039;गोवर्धन असरानी&#039; फिल्मी दुनिया का एक ऐसा नाम था जिसने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर देश व दुनिया में अपना व भारतीय फिल्म इंडस्ट्री नाम रोशन करने का काम बखूबी किया था, उन्होंने अपने हास्य अभिनय के दम पर एक विशिष्ट पहचान बनाने का काम किया था। वर्ष 1960 के दशक में जब &#039;असरानी&#039; ने अभिनय को पेशे के रूप में अपनाने का फैसला लिया था, उसके बाद उन्होंने फिर कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने एफटीआईआई (FTII) पुणे में वर्ष 1964 में दाखिला लिया। जहां पर उन्होंने अपने शिक्षक गुरुदत्त सिंह और रोजर मैन से अभिनय की हर एक बारीकियों को सिखाने का कार्य किया था। &#039;असरानी&#039; ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1967 में अपनी पहली फिल्म ‘हरे कांच की चूड़ियां’ से डेब्यू किया था। इस फिल्म में उनके अभिनय को सराहा गया, जिसके बाद उनको शुरुआती दिनों में कई फिल्मों में सपोर्टिंग एक्टर के रूप में काम तो मिला, लेकिन उन्हें इसके लिए संघर्ष करना पड़ा। हालांकि वर्ष 1971 में उनका धैर्य और मेहनत रंग लाया और फिल्म ‘गुड्डी&#039; से डेब्यू करने के बाद हास्य व चरित्र विभिन्न तरह के किरदारों को बखूबी निभाते हुए अपने शानदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने का कार्य &#039;असरानी&#039; ने कर दिखाया। &#039;असरानी&#039; ने वर्ष 1970 के दशक में एक स्थापित अभिनेता के रूप में अपनी एक विशेष पहचान बनाने का काम करके दिखा दिया था। उन्होंने चितचोर, अभिमान, आंधी, चुपके-चुपके, शोले, बावर्ची, गोलमाल, नमक हराम, अमर अकबर एंथनी आदि जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से आम-जनमानस के दिलो-दिमाग पर छा जाने का कार्य कर दिया था। &#039;असरानी&#039; बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे, उन्होंने फिल्मों में अभिनेता, गायक, निर्देशक, लेखक के रूप में काम किया था, वहीं छोटे पर्दे पर टेलीविजन धारावाहिक, स्टेज व रामलीला तक में काम करके अभिनय की एक नज़ीर कायम करने का कार्य किया था। दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले पर हर वर्ष आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध लव-कुश रामलीला की स्टेज़ पर &#039;असरानी&#039; विभिन्न किरदारों को अपने जबरदस्त अभिनय से जीवंत करते हुए नज़र आते थे।इसे भी पढ़ें: Sahir Ludhianvi Death Anniversary: अधूरा प्यार, अमर नग़मे और बॉलीवुड के बेताज बादशाह थे साहिर लुधियानवी, अधूरी रह गई थी मोहब्बतयहां आपको बता दें कि &#039;असरानी&#039; ने अभिनय के साथ गायकी में भी हाथ आजमाया था, उन्होंने कई फिल्मों के गाने गाए, &#039;असरानी&#039; ने वर्ष 1977 में आई फिल्म अलाप में &#039;बिनती सुन ले तनिक&#039; और &#039;हो रामा डर लागे अपनी उमरिया से&#039; गाने को अपनी आवाज़ देने का काम किया था, वहीं वर्ष 1978 में फिल्म फूल खिले हैं गुलशन गुलशन में &#039;मुन्नू भाई मोटर चली पम-पम&#039; गाने में उन्होंने किशोर कुमार का जमकर साथ दिया था। &#039;असरानी&#039; ने एक निर्देशक रूप में वर्ष 1977 में अपनी पहली फिल्म ‘ओस की बूंद’ बनाई। इसके बाद उन्होंने कुछ गुजराती फिल्मों का निर्देशन भी किया। साथ ही उन्होंने लेखक के रूप में कई फिल्मों की कहानी पर भी काम किया। &#039;असरानी&#039; ने वर्ष 1990 के दशक में जब छोटे पर्दे के रूप में घर-घर टेलीविजन लोकप्रिय हो रहा था, तब हम पांच, फासले, श्रीमान-श्रीमती, देख भाई देख जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिक में काम करके घर-घर में जगह बनाने का काम किया था। हालांकि दर्शकों ने &#039;असरानी&#039; को सबसे ज्यादा एक हास्य अभिनेता के रूप में पसंद किया था। वैसे भी अगर &#039;असरानी&#039; के हास्य अभिनय की शैली व डॉयलॉग को देखें तो उसमें डबल मीनिंग की बातें, अश्लीलता, ओछापन व फूहड़ता आदि का कोई स्थान नहीं था, उनका हास्य अभिनय बेहद ही उच्च कोटि का सभ्यता के दायरे में रहते हुए व भरपूर मनोरंजन से परिपूर्ण होता था जिसे हम अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर के देख सकते हैं। &#039;असरानी&#039; की फिल्म स्टार &#039;राजेश खन्ना&#039; से खूब पटती थी, जिसके चलते ही दोनों ने लगभग 25 फिल्मों में एक साथ काम किया, जिनमें अमर प्रेम, आंधी, अवतार, बावर्ची आदि शामिल हैं।&#039;गोवर्धन असरानी&#039; का लगभग पांच दशक से अधिक का शानदार फिल्मी करियर उनके फिल्मी दुनिया में अपार योगदान की स्वयं गवाही देता है। जिस करियर ने ही &#039;असरानी&#039; को हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध हास्य और चरित्र अभिनेता बना दिया। वैसे देखा जाए तो जिस दौर में किसी भी हास्य अभिनेता को अपने प्रतिभा को दिखाने के सीमित अवसर मिलते थे, उस दौर में भी &#039;गोवर्धन असरानी&#039; ने अपने जबरदस्त अभिनय के दम पर देश व दुनिया में एक विशिष्ट पहचान बनाने का कार्य किया था। हालांकि उनकी असली पहचान वर्ष 1975 की फिल्म ‘शोले&#039; से बनी थी, जहां जेलर के किरदार में उनकी डायलॉग डिलीवरी और अंदाज ने उन्हें अमर कर दिया। &#039;असरानी&#039; के चुपके चुपके, नमक हराम, निकाह और वेलकम जैसी फिल्मों में किरदार बेहद ही यादगार रहे। उन्होंने 350 से ज्यादा हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया था।हालांकि अपनी अदाकारी से लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट लाने वाले दिग्गज हास्य अभिनेता &#039;गोवर्धन असरानी&#039; अब हमारे बीच नहीं रहे हैं, वह अपने चहेतों को रूला कर के दुनिया से रुखसत हो गये हैं। 20 अक्टूबर 2025 दीपावली के दिन मुंबई के एक अस्पताल में इलाज़ के दौरान लीजेंड अभिन ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:55 +0530</pubDate>
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<title>Homi J Bhabha Birth Anniversary: भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक थे होमी जे भाभा, विमान हादसे में हुई थी मौत</title>
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<description><![CDATA[ भारत के प्रमुख दूरदर्शी परमाणु भौतिक वैज्ञानिकों में से डॉ होमी जे भाभा का 30 अक्तूबर को जन्म हुआ था। उन्होंने परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में एक शक्तिशाली भारत की कल्पना की थी। होमी जे भाभा को भारत के परमाणु कार्यक्रम का जनक भी कहा जाता है। होमी जे भाभा के प्रयोगों और अथक प्रयास के चलते ही भारत दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण परमाणु शक्तियों में से एक के रूप में उभरा है। उन्होंने परमाणु कार्यक्रम के निदेशक के रूप में भी काम किया है और भारत के परमाणु कार्यक्रम को शुरू करने में अहम भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ होमी जे भाभा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामुंबई के पारसी परिवार में 30 अक्तूबर 1909 को होमी जहांगीर भाभा का जन्म हुआ था। उन्होंने स्कूली शिक्षा कैथेड्रल और जॉन कॉनन स्कूल से पूरी की थी। फिर साल 1930 में भाभा ने इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद साल 1934 में उन्होंने पीएचडी की डिग्री प्राप्त की।इसे भी पढ़ें: Thomas Edison Death Anniversary: सिर्फ बल्ब ही नहीं, एडिसन ने दिए दुनिया को कई क्रांतिकारी आविष्कार, ऐसे थे दूरदर्शी वैज्ञानिकभारतीय परमाणु अनुसंधान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्चसाल 1940 में सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान भाभा ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज, बैंग्लोर में बतौर रीडर ज्वॉइन किया था। इस दौरान साल 1944 में भाभा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के सामने भौतिकी पर शोध के लिए एक संस्थान बनाने का प्रस्ताव रखा था। जिसके बाद भारतीय परमाणु अनुसंधान टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की गई थी।क्वांटम थ्योरी को विकसित करने में अहम भूमिकाएक चित्रकार होने के साथ ही होमी जहांगीर भाभा कला और संस्कृति से काफी प्रभावित थे। उनको ओपेरा और शास्त्रीय में रुचि थी। उन्होंने प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी नील्स बोहर के साथ मिलकर काम किया था। इसके अलावा उन्होंने क्वांटम थ्योरी को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय के अहम रहस्य के विषय मेसन कण की पहचान करने का श्रेय भी होमी जहांगीर भाभा को जाता है। पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के अध्यक्षसाल 1955 में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर भाभा को संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। उन्होंने परमाणु हथियारों के उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा के उपयोग को हतोत्साहित किया था। गरीबी को खत्म करने के लिए होमी जहांगीर भाभा ने परमाणु ऊर्जा के उपयोग की वकालत की थी।वाल्टर हिटलर के साथ किया शोधहोमी जहांगीर भाभा ने कैस्केड थ्योरी को विकसित करने के लिए उन्होंने जर्मनी स्थित भौतिक विज्ञानी वाल्टर हिटलर के साथ मिलकर शोध किया था। इससे उनको ब्रह्मांडीय विकिरण को बेहतर तरीके से समझने में सहायता मिली थी। पुरस्कारपरमाणु कार्यक्रम में होमी जहांगीर भाभा की खोजों के लिए उनको रॉयल सोसाइटी के फेलो, एडम्स पुरस्कार और साल 1954 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारत के परमाणु कार्यक्रम में भाभा के योगदान और समर्पण के लिए &#039;भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक&#039; की उपाधि अर्जित की थी। निधनवहीं एक हवाई जहाज दुर्घटना में 24 जनवरी 1966 को परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:53 +0530</pubDate>
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<title>Sardar Vallabhbhai Patel Birth Anniversary: सरदार वल्लभभाई पटेल ने साकार किया था &amp;apos;अखंड भारत&amp;apos; का सपना, ऐसे बने &amp;apos;लौह पुरुष&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 31 अक्तूबर को भारत के महान नेता लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म हुआ था। सरदार पटेल ने वह काम किया था, जो शायद ही कोई और कर पाता। उन्होंने 562 रियासतों को जोड़कर भारत की एकता को एक सूत्र में बांधने का काम किया था। सरदार पटेल के अद्भुत नेतृत्व, अटूट राष्ट्रभक्ति और दृढ़ निश्चय की वजह से ही उनको &#039;लौह पुरुष&#039; कहा जाता है। अगर सरदार वल्लभ भाई पटेल न होते, तो आज भारत का नक्शा वैसा नहीं होता, जैसा हम देखते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के नाडियाड गांव में 31 अक्तूबर 1875 को सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल और मां का नाम लाडबाई था। सरदार पटेल बचपन से ही ईमानदार, दृढ़ इच्छाशक्ति वाले परिश्रमी व्यक्ति थे। उन्होंने शुरूआती शिक्षा ग्रामीण परिवेश में पूरी की और फिर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड जाकर पढ़ाई की। वकालत की डिग्री हासिल करने के बाद वह अहमदाबाद में वकालत का अभ्यास करना शुरूकर दिया।इसे भी पढ़ें: Homi J Bhabha Birth Anniversary: भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक थे होमी जे भाभा, विमान हादसे में हुई थी मौतसरदार की उपाधिसरदार पटेल महात्मा गांधी के विचारों से काफी ज्यादा प्रभावित थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। सरदार पटेल ने नागपुर ध्वज आंदोलन, खेड़ा सत्याग्रह और विशेष रूप से बारडोली सत्याग्रह का सफल नेतृत्व किया। वहीं बारडोली आंदोलन के दौरान किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए सरदार पटेल का अडिग नेतृत्व और संघर्ष को देखकर वहां की जनता ने उनको &#039;सरदार&#039; की उपाधि दी। जोकि आगे चलकर उनकी पहचान बन गई।भारत का एकीकरणजब साल 1947 में भारत देश आजाद हुआ, तब देश 550 से ज्यादा रियासतों में बंटा हुआ था। इन रियासतों को भारत संघ में शामिल करना असंभव कार्य माना जा रहा था। लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी कूटनीति, राजनीतिक कौशल और दृढ़ संकल्प के बल पर यह कार्य पूरा कर लिया। भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल ने उन रियासतों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया, जो आज भारत की एकता और अखंडता की नींव हैं। सरदार पटेल द्वारा किया गया यह कार्य हमेशा भारतीय इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।मृत्युवहीं 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:52 +0530</pubDate>
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<title>Indira Gandhi Death Anniversary: आयरन लेडी जिसने भारत को दी नई दिशा, राजनीति पर अमिट है इंदिरा गांधी की छाप</title>
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<description><![CDATA[ भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्तूबर को गोली मारकर हत्याकर दी गई थी। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के दो अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उनको गोली मार दी थी। इस दौरान इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं और उनकी हत्या उनके आवास पर हुई थी। इंदिरा गांधी सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि भारत की राजनीतिक दृढ़ता, आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक थीं। इंदिरा गांधी का जीवन संघर्ष, निर्णय और दूरदर्शिता का अद्भुत संगम था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को इंदिरा प्रियदर्शनी गांधी का जन्म हुआ था। इनके पिता देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। वहीं माता का नाम कमला नेहरू था। इंदिरा ने अपनी स्कूली शिक्षा शांतिनिकेतन से पूरी की और फिर उच्च शिक्षा के लिए  इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय एडमिशन लिया। उन्होंने फिरोज गांधी से विवाह किया। इंदिरा बचपन से ही राजनीतिक वातावरण में पली-बढ़ी थीं। इंदिरा गांधी अपने पिता के साथ राजनीति में सक्रिय रहीं। पिता के सानिध्य में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की ज्वाला को बेहद करीब से देखा और उसने उनके अंदर नेतृत्व की लौ जलाने का काम किया।इसे भी पढ़ें: Sardar Vallabhbhai Patel Birth Anniversary: सरदार वल्लभभाई पटेल ने साकार किया था &#039;अखंड भारत&#039; का सपना, ऐसे बने &#039;लौह पुरुष&#039;भारत की पहली महिला प्रधानमंत्रीजब देश अस्थिरता और आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब इंदिरा गांधी ने मजबूत नेतृत्व के साथ भारत की बागडोर को संभालने का काम किया। वह साल 1966 में देश की पहली महिला पीएम बनीं। उन्होंने समाज के निचले तबके के उत्थान के लिए कई नीतियां बनाईं और गरीबी हटाओ अभियान चलाकर जनता के मन में उम्मीद जगाई। भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश की आजादीपीएम इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को हराया और फिर बांग्लादेश का जन्म हुआ था। इस विजय ने इंदिरा गांधी को &#039;आयरन लेडी ऑफ इंडिया&#039; बना दिया था। साल 1974 में इंदिरा गांधी ने भारत को परमाणु शक्ति से संपन्न देशों की श्रेणी में लाकर खड़ाकर दिया। यह भारत के आत्मनिर्भर होने की दिशा में उनका एक ऐतिहासिक कदम माना जाता था।आपातकालवहीं साल 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लगाया था। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित निर्णय माना जाता रहा। हालांकि उनके इस निर्णय की काफी आलोचना हुई, पर इंदिरा गांधी के समर्थकों ने इसको देश की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास माना।मृत्युवहीं 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की अपने ही अंगरक्षकों द्वारा गोली मारकर हत्याकर दी गई थी। आज भी इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की सबसे दमदार और सशक्त महिला नेताओं में गिनी जाती हैं। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 17:41:51 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Indira, Gandhi, Death, Anniversary:, आयरन, लेडी, जिसने, भारत, को, दी, नई, दिशा, राजनीति, पर, अमिट, है, इंदिरा, गांधी, की, छाप</media:keywords>
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<title>Feroze Gandhi Birth Anniversary: आजाद भारत के पहले सांसद थे फिरोज गांधी, जानिए क्यों बिगड़े इंदिरा संग रिश्ते</title>
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<description><![CDATA[ कांग्रेस के पूर्व सांसद और इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी का 12 सितंबर को जन्म हुआ था। फिरोज गांधी एक राजनेता होने के साथ पत्रकार भी थे। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इतनी नहीं थी। फिरोज गांधी आजाद भारत के पहले सांसद रहे, जिन्होंने संसद और उसके बाहर अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ जमकर मुखालफत की थी। उस समय इसके मुखिया फिरोज गांधी के ससुर यानी की पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर फिरोज गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि 12 सितंबर 1912 को फिरोज गांधी का जन्म हुआ था। इनका असली नाम फिरोज घांदी था। फिरोज गांधी के पिता का नाम जहांगीर घांदी था। वहीं अपने पिता की मृत्यु के बाद फिरोज अपनी मां रत्तीमई फरदून के साथ पहले मुंबई और फिर साल 1915 में इलाहाबाद आकर रहने लगे। यहां पर वह अपनी मौसी डॉ शीरीन कमिसएरिएट के साथ रहते थे।इलाहाबाद आने के बाद फिरोज गांधी ने विद्या मंदिर हाईस्कूल में एडमिशन लिया। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इविंग क्रिश्चियन कालेज से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई के साथ ही फिरोज आजादी के आंदोलन में भाग लेने लगे। साल 1930 में उन्होंने कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की। इसी दौरान उनकी मुलाकात इंदिरा गांधी उर्फ इंदिरा प्रियदर्शनी से हुई। एक बार आंदोलन करते हुए इंदिरा की मां कमला नेहरू बेहोश हो गई थीं। तब फिरोज गांधी ने उनकी देखभाल की थी। यहां से ही फिरोज गांधी का आनंद भवन आना-जाना हो गया।इसे भी पढ़ें: Govind Vallabh Pant Birth Anniversary: UP के पहले CM और देश के चौथे गृहमंत्री थे गोबिंद बल्लभ पंतशादीकुछ समय बाद जब कमला नेहरू को इंदिरा और फिरोज के प्रेम प्रसंग के बारे में जानकारी हुई, तो वह काफी नाराज हुईं। दोनों के धर्म अलग-अलग होने की वजह से जवाहरलाल नेहरू को भारतीय राजनीति में खलबली मचने का डर सताने लगा। जवाहर लाल नेहरू इंदिरा और फिरोज के रिश्ते के खिलाफ थे। लेकिन महात्मा गांधी ने फिरोज को गांधी सरनेम की उपाधि दी और साल 1942 में हिंदू रीति-रिवाजों से दोनों की शादी हुई।राजनीतिक सफरअगस्त 1942 में &#039;भारत छोड़ो आंदोलन&#039; में फिरोज गांधी कुछ समय तक भूमिगत रहे। लेकिन उसके बाद गिरफ्तार कर लिए गए। जेल से छूटने के बाद फिरोज एक बार फिर आंदोलन में जुट गए। वहीं इसी बीच साल 1944 में इंदिरा गांधी ने राजीव और फिर साल 1946 में संजय गांधी को जन्म दिया। साल 1946 में फिरोज गांधी लखनऊ के दैनिक पत्रकार &#039;नेशनल हेराल्ड&#039; के प्रबंध निर्देशक का पद संभालने लगे। फिर साल 1952 के प्रथम आम चुनाव में फिरोज गांधी रायबरेली सीट से लोकसभा के सदस्य चुने गए।इसके बाद फिरोज गांधी ने लखनऊ छोड़ दिया और कुछ साल वह और इंदिरा गांधी नेहरू जी के साथ रहे। इंदिरा गांधी का अधिकतर समय अपने पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू की देखरेख में बीतता था। वहीं साल 1956 में फिरोज गांधी ने पीएम निवास में रहना छोड़ दिया और वह सांसद के साधारण मकान में अकेले रहने लगे।नेहरू और फिरोज के रिश्ते में आई खटाससाल 1952 में रायबरेली से पहले निर्वाचित सांसद चुने जाने के साथ ही जवाहर लाल नेहरू और फिरोज गांधी के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई। फिरोज गांधी राजनीति में ईमानदारी और सक्रियता से काम करते थे। इस कारण वह सरकार की आलोचना भी करते थे। जिस कारण उनके ससुर और देश के पीएम पंडित नेहरू असहज हो जाते थे। फिरोज और नेहरू के बीच कई बार संबंध तल्ख भी रहे। लेकिन इसके बाद भी फिरोज का सरकार के प्रति उनका रवैया आलोचनात्मक बना रहा।बताया जाता है कि नेहरू सरकार की आर्थिक नीतियों और बड़े उद्योगपतियों के प्रति झुकाव को लेकर फिरोज गांधी नाराज रहते थे। आजाद भारत में सरकार का पहला घोटाला लाने का श्रेय भी फिरोज को जाता है। साल 1955 में एक बैंक और इंश्योरेंश कंपनी के फ्रॉड को उजागर किया। इस कारण से इंदिरा गांधी से भी उनकी दूरियां बढ़ती चली गईं। इसके बाद साल 1958 में फिरोज गांधी ने संसद में हरिदास मूंदडा के एलआईसी में किए गए घोटाले को उजागर किया। इसके अलावा फिरोज गांधी ने रकार की आर्थिक अनियिमितताओं को भी सामने लाना शुरू किया। उनके इस विरोध के कारण जवाहर लाल नेहरू की पाक साफ छवि को काफी नुकसान पहुंचाया था।अकेले रह गए थे फिरोज गांधीवहीं एक समय ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी अलग-अलग रहने लगे। बताया जाता है कि सरकार में हस्तक्षेप और लगातार आलोचनाओं की वजह से पंडित नेहरू ने फिरोज गांधी से बोलना तक बंद कर दिया था। वहीं जिंदगी के आखिरी पलों में फिरोज गांधी बिल्कुल अकेले रह गए थे।मृत्युजिंदगी के अकेलेपन के बीच साल 1958 में फिरोज गांधी को पहला हार्टअटैक पड़ा। इसके बाद उन्होंने खुद को राजनीति से अलग कर लिया था। वहीं दो साल बाद 1960 में दूसरा हार्टअटैक पहने के कारण फिरोज गांधी को विलिंगडन हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया। वहीं 08 सितंबर 1960 को 47 साल की उम्र में फिरोज गांधी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 16 Sep 2025 04:30:17 +0530</pubDate>
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<title>M Visvesvaraya Birth Anniversary: भारत के पहले सिविल इंजीनियर थे एम विश्वेश्वरैया, भारत रत्न से किए गए थे सम्मानित</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 सितंबर को श्रीलंका और तंजानिया के साथ भारत के महान इंजीनियर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ था। बता दें कि विश्वेश्वरैया भारत के पहले सिविल इंजीनियर थे और उन्होंने राष्ट्र के निर्माण में अहम योगदान दिया था। उनका पूरा नाम मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया था। मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के योगदान के लिए हर साल 15 सितंबर को इंजीनियरर्स डे भी मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाकर्नाटक के मुद्दनहल्ली गांव में 15 सितंबर 1861 को एम विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा गृहनगर से पूरी की थी और फिर आगे की पढ़ाई मद्रास विश्वविद्यालय से की। स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने पुणे के कॉलेज ऑफ़ साइंस में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी।इसे भी पढ़ें: Engineers Day 2025: विश्वेश्वरैया का सपना और आज की सफलताभागीरथ कहते हैं कर्नाटक के लोगबता दें कि एम विश्वेश्वरैया ने भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, कृष्णराजसागर बांध, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत कई अन्य उपलब्धियां हासिल की थीं। जिस वजह से उनको कर्नाटक का भागीरथ भी कहा जाता है। वहीं देश की आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करवाने के लिए समिति बनवाई थी।सिंचाई तकनीकों और बाढ़ आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञ एम विश्वेश्वरैया सिर्फ एक महान सिविल इंजीनियर नहीं थे। बल्कि उन्होंने साल 1912 से लेकर 1919तक मैसूर के 19वें दीवान के तौर पर भी कार्य किया था। मैसूर दीवान के रूप में सेवा करते हुए उनको साल 1915 में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के कमांडर के तौर पर &#039;नाइट&#039; से सम्मानित किया गया था।जिसके लिए एम विश्वेश्वरैया ने स्टील के दरवाजे का इस्तेमाल करके बांध बनाया था। यह बांध पानी के बहाव को रोकने में मददगार था। एम विश्वेश्वरैया द्वारा बनाया गया यह सिस्टम देखकर ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी तारीफ की थी। आज एम विश्वेश्वरैया के इस सिस्टम को पूरा देश अपना रहा है। उनके इस योगदान को देखते हुए आजादी के बाद साल 1955 में एम विश्वेश्वरैया को भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 14 अप्रैल 1962 को 101 साल की उम्र में एम विश्वेश्वरैया का निधन हो गया था। एम विश्वेश्वरैया को उनके कालजयी कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 16 Sep 2025 04:30:16 +0530</pubDate>
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<title>Ram Jethmalani Birth Anniversary: 1 रुपए फीस से देश के कानून मंत्री तक, जानें लीजेंड वकील राम जेठमलानी की अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 14 सितंबर को राम बूलचंद जेठमलानी का जन्म हुआ था। एक भारतीय वकील और राजनीतिज्ञ थे। राम जेठमलानी अपनी बेबाकी, बिंदास और बेलौस अंदाज के लिए जाने जाते थे। इन्होंने ऐसे केस लड़े, जिनको भारत के कद्दावर वकील छूने से भी गुरेज करते थे। सिर्फ 1 रुपए फीस के साथ अपना करियर शुरू करने वाले राम जेठमलानी इतने चर्चित हुए कि देश की न्यायपालिका का इतिहास में उनका नाम हमेशा याद किया जाएगा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर फेमस वकील राम जेठमलानी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के सिंध प्रांत में 14 सितंबर 1923 को राम जेठमलानी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम भूलचन्द गुरुमुखदास जेठमलानी और मां का नाम पार्वती भूलचन्द था। बताया जाता है कि जेठमलानी ने सिर्फ 13 साल की उम्र में 10वीं पास कर ली थी। इसके बाद 17 साल की उम्र में बॉम्बे यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। उस दौरान वकालत की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष थी, लेकिन राम जेठमलानी को छूट दी गई थी।इसे भी पढ़ें: Feroze Gandhi Birth Anniversary: आजाद भारत के पहले सांसद थे फिरोज गांधी, जानिए क्यों बिगड़े इंदिरा संग रिश्तेएक विशेष प्रस्ताव पास कर जेठमलानी के लिये 18 साल की उम्र में प्रैक्टिस करने की इजाजत दी गई। वहीं बाद में उन्होंने साहनी लॉ कॉलेज कराची से एलएलएम की डिग्री प्राप्त की। राम जेठमलानी के पिता खुद एक वकील थे। ऐसे में जेठमलानी ने भी पाकिस्तान में अपना करियर लॉ प्रोफेसर के रूप में शुरू किया। लेकिन साल 1948 में भारत-पाकिस्तान के बीच कराची में दंगे भड़कने पर जेठमलानी को पाकिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा।भारत में जमाए पैरसाल 1948 में जेठमलानी पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गए और मुंबई के रिफ्यूजी कैंप में रात बिताने के बाद अगले दिन से लॉ की प्रैक्टिस करना शुरू की। उन्होंने पहले 6 साल तक प्रैक्टिस की और इसके बाद बॉम्बे यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया। यहां पर सभी एग्जाम पास करने के बाद 60 रुपए में अपना वकील का पहला चेंबर बनाया था।वकालत और सियासतराम जेठमलानी ने वकालत के साथ अपना रुख राजनीति की ओर भी किया। साल 1971 में निर्दलीय के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा। इसमें जनसंघ और शिवसेना दोनों का जेठमलानी को सपोर्ट मिला। लेकिन इसके बाद भी वह चुनाव हार गए। फिर साल 1988 में वह राज्यसभा सदस्य और अटल बिहारी की सरकार में कानून मंत्री बने।ये केस लड़ेबता दें कि राम जेठमलानी के पास वकालत में 70 साल से ज्यादा का अनुभव था। उन्होंने इस अनुभव का जरूरत होने पर इस्तेमाल भी अच्छे से किया था। राम जेठमलानी ने इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस, राजीव गांधी के हत्यारों का केस और संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु का भी केस लड़ा। इसके अलावा उन्होंने स्टॉक मार्केट में स्कैम करने वाले हर्षद मेहता, अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान और आसाराम तक के केस की पैरवी की थी।मृत्युवहीं 08 सितंबर 2019 को 95 साल की उम्र में राम जेठमलानी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 16 Sep 2025 04:30:16 +0530</pubDate>
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<title>Vinoba Bhave Birth Anniversary: विनोबा भावे ने लाखों किसानों को दिया था जीने का सहारा, गांधीजी के माने जाते थे करीबी</title>
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<description><![CDATA[ कर्मठ स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी समाज सुधारक रहे विनोबा भावे का 11 सितंबर को जन्म हुआ था। उनको महात्मा गांधी का बेहद करीबी माना जाता था। हालांकि विनोबा भावे ने हमेशा राजनीति से दूरी बनाते हुए देश सेवा के संकल्प को कायम रखा। महात्मा गांधी के जाने के बाद विनोबा भावे उन लोगों में शामिल रहे, जिन्होंने गांधी जी के कार्य करने के तरीकों को जिंदा रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के गागोदा गांव में 11 सितंबर 1895 को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम ब्राह्मण नरहरि भावे और मां का नाम रुकमणी बाई था। यह बचपन से ही तेज दिमाग वाले बालक थे। मां की संगत के चलते विनोबा भावे को शुरू से ही ईश्वर के प्रति विश्वास और आध्यात्म की ओर लगाव था। वहीं पिता से उनको तार्किक सोच और गणित व विज्ञान का दृष्टिकोण भी मिला था।इसे भी पढ़ें: Govind Vallabh Pant Birth Anniversary: UP के पहले CM और देश के चौथे गृहमंत्री थे गोबिंद बल्लभ पंतविनोबा भावे को गणित और विज्ञान पढ़ने में आनंद आता था। वहीं हाईस्कूल में पहुंचने पर पिता ने जोर दिया कि उनको फ्रेंच सीखनी चाहिए और मां ने संस्कृत सीखने पर जोर दिया। इस पर विनोबा भावे ने हाईस्कूल में फ्रेंच चुनकर और घर में संस्कृत सीखने का फैसला लिया।संन्यास लेने का इरादाउस दौरान इंटर की परीक्षा के लिए मुंबई जाना पड़ता था। ऐसे में इंटर की परीक्षा के लिए विनोबा भी 25 मार्च 1916 को मुंबई की ट्रेन में बैठ गए। लेकिन इस दौरान उनके मन में सवालों के द्वंद उनको परेशान कर रहे थे कि उनको क्या करना चाहिए। उनके जीवन का लक्ष्य क्या है और इंटर की परीक्षा पास करने के बाद क्या करना होगा। इस उधेड़बुन में उनकी गाड़ी सूरत तक पहुंच गई, लेकिन यहां पर वह ट्रेन से उतर गए। वह हिमालय पर सन्यास का मन बनाकर पूर्व की ओर जाने वाली गाड़ी में बैठ गए।हालांकि विनोबा हिमालय जाना चाहते थे, लेकिन वह रास्ते में काशी में उतर गए। क्योंकि उनको लगा कि शिव की नगरी में साधु-संत उनको सही रास्ता दिखा सकते हैं। इस बीच वह गंगाजी के तट पर खूब भटके और वह द्वैत-अद्वैत पर चल रहे शास्त्रार्थ में भी उलझ पड़े। विनोबा द्वारा यहां पर दिए गए तर्कों से लोग काफी प्रभावित हुए, लेकिन उनके मन की बेचैनी बढ़ गई और उन्होंने हिमालय के लिए ट्रेन पकड़ने का फैसला लिया।संयोग से उसी समय हिंदू विश्वविद्यालय में एक सम्मेलन हो रहा था। जिसमें महात्मा गांधी ने राजा सामंतों को अपनी सम्पत्ति गरीबों की सेवा में लगाने की अपील की थी। यह चर्चा अखबार में छपी थी और संयोग से यह अखबार विनोबा भावे को मिल गया। इसमें महात्मा गांधी के बारे में पढ़कर विनोबा भावे को एहसास हुआ कि महात्मा गांधी उनको सही राह दिखा सकते हैं।महात्मा गांधी से हुए प्रभावितऐसे में उन्होंने फौरन महात्मा गांधी को खत लिखा और गांधी ने भी उनको जवाब देते हुए उन्हें आमंत्रण भेज दिया। जिसके बाद वह फौरन अहमदाबाद रवाना हो गए, जहां पर महात्मा गांधी का आश्रम था। 07 जून 1916 को दोनों की मुलाकात हुई और इसके बाद दोनों ही एक-दूसरे के प्रशंसक हो गए।भूदान आंदोलनसाल 1921 से लेकर 1942 तक उन्होंने अनेकों बार जेल यात्राएं कीं। ब्रिटिश जेल उनके लिए एक तीर्थधाम बन गई थी। आजादी के दुखद विभाजन के बाद पूरे भारत में अशांति का माहौल बन गया था। वहीं 18 अप्रैल 1951 को आंध्र प्रदेश में आंदोलनकारी भूमिहर किसानों से मिलने के लिए विनोबा भावे नलगोंडा के पोचमपल्ली गांव पहुंचे। यहां पर विनोबा भावे से आंदोलनकारी किसानों ने कहा कि यदि उनको 80 एकड़ जमीन मिल जाए, तो उनका गुजारा हो सकता है।जिसके बाद उन्होंने किसानों की मांग को जमींदारों के सामने रखा। आचार्य की बातों के प्रभावित होकर एक जमींदार ने अपनी 100 एकड़ जमीन दान करने का फैसला किया। विनोबा भावे की अगुवाई में 3 साल तक चले आंदोलन में गरीब किसानों को करीब 44 लाख एकड़ जमीन दिलाकर 13 लाख गरीबों की मदद की। आगे जाकर यह आंदोलन &#039;सर्वोदय आंदोलन&#039; के रूप में फेमस हुआ। वहीं उनके जीवन का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक &#039;भूदान आंदोलन&#039; है।मृत्युविनोबा भावे को उनके कार्यों और त्याग के लिए &#039;आचार्य&#039; की उपाधि दी गई। वहीं अपने अंतिम समय में उन्होंने अन्न जल त्याग दिया और 15 नवंबर 1982 को वर्धा में विनोबा भावे का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 12 Sep 2025 04:31:40 +0530</pubDate>
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<title>Mahadevi Verma Death Anniversary: महादेवी वर्मा को कहा जाता है &amp;apos;आधुनिक युग की मीरा&amp;apos;, ऐसे बनीं छायावादी कवियत्री</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को कवयित्री, निबंधकार और समाजसेवी महादेवी वर्मा का निधन हो गया था। महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्रियों में से एक मानी जाती थीं। उनको छायावादी युग के चार स्तंभों में गिना जाता है। उनका साहित्यिक योगदान बहुत अहम और व्यापक है। इसी वजह से महादेवी वर्मा को &#039;हिंदी साहित्य की मीरा&#039; भी कहा जाता है। उन्होंने अपने लेखन में भारतीय नारी की पीड़, उनके संघर्षों और उनकी इच्छाओं को सजीव तरीके से प्रस्तुत किया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महादेवी वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाउत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में 26 मार्च 1907 को महादेवी वर्मा का जन्म हुआ था। उनके परिवार की भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था थी। ऐसे में महादेव की झुकाव भी साहित्य और कला की ओर था। महादेवी की शुरूआती शिक्षा उज्जैन से हुई। फिर उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से संस्कृत में एम.ए किया। महादेवी वर्मा लंबे समय तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्य रहीं। इस दौरान वह इलाहाबाद से प्रकाशित मासिक पत्रिका &#039;चांद&#039; की संपादिका थीं।इसे भी पढ़ें: Bhartendu Harishchandra Birth Anniversary: आधुनिक हिंदी के पितामह कहे जाते हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र, जानिए रोचक बातेंसाहित्यिक जीवनहिंदी साहित्य के छायावादी युग की महादेवी वर्मा प्रमुख कवयित्री थीं। उनकी रचनाएं प्रेम, विरह, मानवीय संवेदनाओं और अध्यात्म की गहरी अनुभूतियों से भरी हुई हैं। वहीं महादेवी वर्मा की कविताओं में नारी की व्यथा, पीड़ा और उनकी शक्ति का सूक्ष्म चित्रण किया है। उनकी फेमस काव्य कृतिया दीपशिखा और यामा, नीरजा, सांध्यगीत, जिसको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्होंने न सिर्फ कविताएं लिखीं, बल्कि संस्मरण, निबंध और कहानियां भी लिखीं। महादेवी वर्मा की प्रमुख गद्य रचनाओं में &#039;पथ के साथी&#039;, &#039;स्मृति की रेखाएँ&#039;, &#039;अतीत के चलचित्र&#039; शामिल हैं।उपलब्धियांबता दें कि महादेवी वर्मा ने न सिर्फ साहित्यिक क्षेत्र में बल्कि शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया था। हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए महादेवी को &#039;ज्ञानपीठ पुरस्कार&#039; से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा भारत सरकार ने उनको &#039;पद्म विभूषण&#039; से नवाजा था। महादेवी वर्मा को उनके काव्य संग्रह &#039;यामा&#039; के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 1979 को महादेवी वर्मा को साहित्यिक सेवाओं के लिए साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित फैलोशिप पुरस्कार दिया गया था।मृत्युवहीं 11 सितंबर 1987 को महादेवी वर्मा का प्रयागराज में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 12 Sep 2025 04:31:40 +0530</pubDate>
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<title>Govind Vallabh Pant Birth Anniversary: UP के पहले CM और देश के चौथे गृहमंत्री थे गोबिंद बल्लभ पंत</title>
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<description><![CDATA[ उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे गोविंद बल्लभ पंत का आज ही के दिन यानी की 10 सितंबर को जन्म हुआ था। गोविंद बल्लभ पंत ने अपने राजनीतिक करियर में जितना बड़ा मुकाम हासिल किया था, उतनी ही ज्यादा उनकी निजी जिंदगी उतार-चढ़ाव भरी रही थी। वह यूपी के पहले सीएम होने के अलावा भारत के चौथे गृहमंत्री भी रहे थे। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रुप में कार्य करते हुए जेल की यात्रा की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गोविंद बल्लभ पंत के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में 10 सितंबर 1887 को गोविंद बल्लभ पंत का जन्म हुआ था। उन्होंने साल 1907 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया था। फिर साल 1909 में यहां से उन्होंने लॉ की डिग्री हासिल की। पंत कॉलेज दिनों से ही राजनीतिक रैलियों में हिस्सा लेने लगे। साल 1905 में वह पहली बार बनारस में कांग्रेस के एक कैंप में कार्यकर्ता के तौर पर शामिल हुए। उस कैंप की अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले कर रहे थे।इसे भी पढ़ें: Sarvepalli Radhakrishnan Birth Anniversary: भारत के महान दार्शनिक थे सर्वपल्ली राधाकृष्णन, ऐसे बने देश के दूसरे राष्ट्रपतितीन शादियांसाल 1899 में पहली बार गोबिंद बल्लभ पंत की 12 साल की उम्र में गंगा देवी से विवाह हुआ। लेकिन 1909 में उनकी पत्नी का बीमारी से निधन हो गया था। वहीं साल 1912 में पंत जी का दूसरा विवाह हुआ, लेकिन साल 1914 में उनकी दूसरी पत्नी की भी मृत्यु हो गई। जिसके बाद साल 1916 में पंत जी ने तीसरी शादी की थी। इस शादी से उनके एक पुत्र और दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई।इलाहाबाद से कनेक्शनसाल 1905 में गोबिंद बल्लभ पंत ने अल्मोड़ा छोड़ दिया और इलाहाबाद चले गए। इस दौरान वह म्योर सेन्ट्रल कॉलेज में साहित्य, गणित और राजनीतिक विषयों पढ़ाई की। साल 1910 में उन्होंने अल्मोड़ा आकर वकालत करना शुरूकर दी। साल 1914 में पंत जी के प्रयासों से &#039;उदयराज हिंदू हाईस्कूल&#039; की स्थापना की। वहीं उनका मुकदमा लड़ने का ढंग निराला था।राजनीति में आने का फैसलापंत जब वकालत करते थे तो एक दिन वह गिरीताल घूमने चले गए। इस दौरान उन्होंने देखा कि दो नौजवान लड़के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में चर्चा कर रहे थे। इसी के बाद से गोबिंद बल्लभ पंत ने राजनीति में आने का मन बनाना शुरूकर दिया, उन्होंने राजनीति में बड़ा कद हासिल किया।साइमन कमीशन का विरोधजब साइमन कमीशन विरोध के दौरान गोबिंद बल्लभ पंत को पीटा गया, तो उस घटना में एक ऐसा पुलिस अफसर शामिल था। फिर पंत के सीएम बनने के बाद वह उनके अंडर में काम करने लगा था। जब यह बात पंत को पता चला, तो उन्होंने उस पुलिस अफसर को मिलने के लिए बुलाया। लेकिन पंत ने उससे अच्छे से बात की और अपना काम ईमानदारी से करने की नसीहत दी।नेहरू का विरोधगोबिंद बल्लभ पंत ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के कई कार्यों का खुलकर विरोध भी किया था। जब इंदिरा गांधी को प्रेसिडेंट बनाया था, तो पंत ने इसका विरोध किया। वहीं जमींदारी प्रथा को खत्म कराने में पंतजी का अहम योगदान रहा था। साल 1946 से दिसंबर 1954 तक वह यूपी के सीएम रहे। 21 मई 1952 को उन्होंने जमींदारी उन्मूलन कानून को प्रभावी बनाया।देश के गृहमंत्रीदेश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल की मृत्यु के बाद नेहरू को एक ऐसे राजनीतिज्ञ की तलाश थी, जो उनके जैसा प्रभावशाली और दृढ़इच्छा शक्ति वाला हो। तब पंडित नेहरू ने गोबिंद बल्लभ पंत से देश का गृह मंत्रालय संभालने की अपील की। साल 1955 से लेकर 1961 तक गृहमंत्री के रूप में गोबिंद बल्लभ पंत ने कई ऐतिहासिक और सराहनीय कार्य किए थे।मृत्युवहीं 07 मार्च 1961 को गोबिंद बल्लभ पंत का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 11 Sep 2025 04:31:32 +0530</pubDate>
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<title>Feroze Gandhi Death Anniversary: फिरोज गांधी ने इलाहाबाद में सीखा था राजनीति का ककहरा, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता और पत्रकार रहे फिरोज गांधी का 08 सितंबर को हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया था। वह कांग्रेस सांसद और एक राजनेता होने के साथ पत्रकार भी थे। फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी की शादी के किस्से आज भी काफी ज्यादा प्रचलित हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद फिरोज गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता को समझा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर फिरोज गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबॉम्बे में 12 सितंबर 1912 को फिरोज गांधी का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम फिरोज जहांगीर घांडी था। इनके पिता का नाम जहांगीर फरीदून घांडी और मां का नाम रति माई था। फिरोज गांधी के पिता मरीन इंजीनियर थे। पिता के निधन के बाद फिरोज गांधी इलाहाबाद आ गए। यहां पर उन्होंने इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में एडमिशन ले लिया। बता दें कि जब फिरोज गांधी 18 साल के थे, तो उनकी जिंदगी में दो अहम पड़ाव आए, जिसमें पहला स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव और दूसरा नेहरू परिवार से करीबी बढ़ना था।इसे भी पढ़ें: Neerja Bhanot Birth Anniversary: अशोक चक्र पाने वाली पहली भारतीय महिला थीं नीरजा भनोट, ऐसे बनीं &#039;हिरोइन ऑफ हाइजैक&#039;स्वतंत्रता संग्राम में योगदानउस दौरान जब फिरोज गांधी इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ रहे थे, उसी दौरान जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू कॉलेज के बाहर सत्याग्रह की अगुवाई कर रहे थे। उस दौरान कमला नेहरू गश खाकर गिर पड़ीं और युवा फिरोज फौरन उनकी मदद के लिए आगे बढ़े। बस यहीं से फिरोज गांधी की &#039;आनंद भवन&#039; में आवाजाही बढ़ी। इसी समय से फिरोज ने अपने नाम के आगे घांडी की जगह गांधी लगाना शुरूकर दिया, जोकि महात्मा गांधी के सम्मान से जुड़ा था।फिरोज ने रखा शादी का प्रस्तावबताया जाता है कि जब फिरोज गांधी ने पहली बार इंदिरा से शादी का अनुरोध किया था, तो उस दौरान इंदिरा की उम्र महज 16 साल की थी। वहीं इंदिरा की मां कमला नेहरू ने इस रिश्ते के लिए मना कर दिया था। क्योंकि उनकी बेटी की उम्र बहुत कम थी। इसके बाद फिरोज और इंदिरा दोनों पढ़ाई के लिए यूरोप चले गए। जहां पर लंदन में रहते हुए दोनों एक-दूसरे के करीब आए। जिसके बाद मार्च 1942 में आनंद भवन में वैदिक विधि से इंदिरा और फिरोज की शादी हुई।मृत्युवहीं 08 सितंबर 1960 को दिल्ली के धन वेलिंगटन अस्पताल में सुबह के समय फिरोज गांधी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 04:30:04 +0530</pubDate>
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<title>Neerja Bhanot Birth Anniversary: अशोक चक्र पाने वाली पहली भारतीय महिला थीं नीरजा भनोट, ऐसे बनीं &amp;apos;हिरोइन ऑफ हाइजैक&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 07 सितंबर को नीरजा भनोट का जन्म हुआ था। नीरजा भनोट ने अपनी जान की परवाह किए बिना हथियारबंद आतंकियों का न सिर्फ सामना किया, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों को बचाने का काम किया था। नीरजा भनोट कोई सैन्य कर्मचारी नहीं बल्कि एक फ्लाइट अटेंडेंट थीं। नीरजा भनोट के जीवन को बड़े पर्दे पर फिल्म के रूप में भी दिखाया जा चुका है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नीरजा भनोट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारचंडीगढ़ में 07 सितंबर 1963 को पंजाबी परिवार में नीरजा भनोट का जन्म हुआ था। उनका बचपन चंडीगढ़ में बीता और सैक्रेड हार्ट सीनियर सेकेंडरी स्कूल से शुरूआती शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उनका परिवार मुंबई शिफ्ट हो गया। मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की।शादी और तलाकनीरजा भनोट एक खुले ख्यालों वाली महिला थीं। उनको मॉडलिंग का शौक था। वहीं 1985 में नीरजा की शादी एक बिजनेसमैन से कराई गई थी। लेकिन पति संग रिश्ते ठीक न होने की वजह से वह 2 महीने बाद ही पति से अलग हो गईं। इसके बाद नीरजा ने मॉडलिंग शुरू की और करीब 22 विज्ञापनों में काम किया।इसे भी पढ़ें: Sarvepalli Radhakrishnan Birth Anniversary: भारत के महान दार्शनिक थे सर्वपल्ली राधाकृष्णन, ऐसे बने देश के दूसरे राष्ट्रपतिकरियरनीरजा को बचपन से प्लेन में बैठने और आकाश में उड़ने का शौक था। मॉडलिंग का शौक पूरा करने के बाद नीरजा भनोट ने एयरलाइंस ज्वाइन कर लीं। वहीं वह ट्रेनिंग के लिए फ्लोरिडा और मयामी भी गईं। अपने जन्मदिन से दो दिन पहले यानी की 05 सितंबर 1986 को मुंबई से अमेरिका जाने वाली फ्लाइट में नीरजा भनोट बतौर सीनियर एटेंडेंट शामिल थीं।इस दौरान कराची से उड़ान भरने से पहले चार आतंकियों ने प्लेन को हाइजैक कर लिया। आतंकियों ने यात्रियों को गन प्वाइंट पर ले लिया। लेकिन नीरजा ने अपनी हिम्मत और सूझबूझ के चलते प्लेन का दरवाजा खोल दिया और सभी यात्रियों की जान बचाने में सफल रहीं।मृत्युजब विमान से नीरजा बाहर आने वाली थीं, तभी उनको एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। जिस पर उन्होंने उस बच्चे की जान बचाई, लेकिन तभी उनके सामने एक आतंकी आ गया और 05 सितंबर 1986 को हुई इस आंतकी फायरिंग में नीरजा भनोट की मृत्यु हो गई। नीरजा को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरान्त साल 1987 में उनको अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 04:30:04 +0530</pubDate>
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<title>Vikram Batra Birth Anniversary: कारगिल युद्ध के &amp;apos;शेरशाह&amp;apos; थे कैप्टन विक्रम बत्रा, जानिए क्यों कहा था &amp;apos;दिल मांगे मोर&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 सितंबर को कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। साल 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान को करारी शिकस्त देने वाले विक्रम बत्रा ने अपने नेतृत्व और बहादुरी से भारतीय सेना में अपनी अलग पहचान बनाई थी। जोश और जुनून के साथ देश की रक्षा के लिए विक्रम बत्रा ने अपनी जान की परवाह नहीं की। कारगिल युद्ध के नायक रहे विक्रम बत्रा आज भी हर देशवासी के दिल में जिंदा हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विक्रम बत्रा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारहिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास स्थित घुग्गर गांव में एक पंजाबी-खत्री परिवार में 09 सितंबर 1974 को विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जी.एल. बत्रा था, जोकि स्कूल प्रिंसिपल थे और मां जय कलम बत्रा भी शिक्षिका थीं। ऐसे में देशभक्ति और अनुशासन का पाठ विक्रम को बचपन से ही मिला था।करियरसाल 1996 में विक्रम बत्रा ने इंडियन मिलिट्री अकादमी, देहरादून की मानेकशॉ बटालियन ट्रेनिंग ली। फिर 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में कमीशन मिला। सबसे पहले उनकी पोस्टिंग सोपोर, जम्मू-कश्मीर राइफल्स में हुई थी। इसके बाद उन्होंने लेफ्टिनेंट से कैप्टन तक का सफर तय किया। विक्रम बत्रा के पास विनम्रता, तेज बुद्धि और नेतृत्व करने की असाधारण क्षमता थी। युद्ध के मैदान में विक्रम के यह गुण उनके सबसे बड़े हथियार थे।कारगिल युद्धसाल 1999 में जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तो लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को टोलोलिंग सेक्टर में तैनात किया गया। इस दौरान उनका पहला लक्ष्म पॉइंट 5140 था, जोकि एक मुश्किल लेकिन काफी अहम चोटी थी। विक्रम बत्रा ने दुश्मनों को मात देकर जब यह लक्ष्य हासिल किया गया, तो रेडियो पर एक ऐतिहासिक संदेश दिया। इस संदेश में विक्रम बत्रा ने कहा &#039;यह दिल मांगे मोर&#039; इस नारे ने हर देशवासी को देशभक्ति की भावना से भर दिया। इस विजय के बाद विक्रम बत्रा को प्रमोट करके कैप्टन बनाया गया।विक्रम बत्रा की शहादतविक्रम बत्रा के सामने अगला बड़ा लक्ष्य पॉइंट 4875 था। जिसको अब बत्रा टॉप कहा जाता है। यह सबसे चुनौतीपूर्ण ऑपरेशनों में से एक था। यहां तक पहुंचने के लिए भारतीय सेना को दुश्मन की बंकर पोजीशन को तोड़ना था। फिर 400 मीटर की सीधी चढ़ाई करनी थी और इस दौरान गोलियों और तोपों से लड़ना था। करगिल युद्ध के दौरान आमने-सामने की मुठभेड़ में कैप्टन बत्रा ने 5 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था।इसे भी पढ़ें: Neerja Bhanot Birth Anniversary: अशोक चक्र पाने वाली पहली भारतीय महिला थीं नीरजा भनोट, ऐसे बनीं &#039;हिरोइन ऑफ हाइजैक&#039;कैप्टन बत्रा पहले से घायल थे, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हैंड ग्रेनेड से बंकर साफ किया और आखिरी पल तक जवानों का नेतृ्त्व किया। लेकिन 07 जुलाई 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।सम्मानकैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा &#039;परमवीर चक्र&#039; से सम्मानित किया गया। वहीं विक्रम बत्रा की बहादुरी के कारण आज पॉइंट 4875 को उन्हीं के नाम पर बत्रा टॉप से जाना जाता है। साल 2021 में आई फिल्म &#039;शेरशाह&#039; ने विक्रम बत्रा के जीवन और उनकी वीरगाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 04:30:03 +0530</pubDate>
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<title>Bhartendu Harishchandra Birth Anniversary: आधुनिक हिंदी के पितामह कहे जाते हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 सितंबर को आधुनिक हिंदी के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म हुआ था। उन्होंने सिर्फ 34 साल की उम्र तक में इतना लिखा और इतना काम कर गए कि उनके समय को &#039;भारतेंदु युग&#039; कहा जाता है। भारतेंदु ने गद्य, काव्य, नाटक, अनुवाद, निबंध और पत्रकारिता में उन्होंने जो लिखा-किया, वह कालजयी हुआ। आज हम सभी जो हिंदी बोलते और लिखते हैं, वह भारतेंदु की ही देन है। भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी का जनक माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकाशी के संपन्न वैश्य परिवार में 09 सितंबर 1850 को भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गोपालचंद्र था, जोकि एक अच्छे कवि थे। जब भारतेंदु 5 साल के थे तो उनकी मां का निधन हो गया और जब 10 वर्ष के हुए, तो पिता की मृत्यु हो गई। हरिश्चन्द्र काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत में मिली थी। भारतेंदु ने महज 5 साल की उम्र में अपने पिता को दोहा बनाकर सुनाया था। उन्होंने संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, अंग्रेजी, पंजाबी और उर्दू भाषाएं भी सीख लीं।इसे भी पढ़ें: Dushyant Kumar Birth Anniversary: हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमारखड़ी बोली का विकासबता दें कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय अंग्रेजी हुकूमत का बोलबाला था। अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा था और राजकाज और संभ्रांत वर्ग की भाषा फारसी थी। इस दौरान तक उर्दू भी चलन में आ गई थी। वहीं साहित्य में ब्रजभाषा का बोलबाला था। इस समय में भारतेंदु ने न सिर्फ खड़ी बोली का विकास किया, बल्कि साहित्य में नवीन आधुनिक चेतना का समावेश किया। उन्होंने साहित्य को आम जन से जोड़ा। भारतेंदु के गद्य की भाषा सरल और व्यवहारिक है और उन्होंने कुशलतापूर्वक मुहावरों का प्रयोग किया है।जब भारतेंदु हरिश्चंद्र का अविर्भाव हुआ था, उस समय देश गुलाम था और भारतीय लोगों में विदेशी सभ्यता के प्रति आकर्षण था। इस दौरान लोग अंग्रेजी पढ़ना और समझना गर्व की बात समझते थे। हिंदी के प्रति लोगों में आकर्षण काफी कम था, ऐसे में भारतेंदु ने अपनी लेखनी की धार को अंग्रेजी हुकूमत की ओर मोड़ दिया। वहीं लोगों में खुद की भाषा के प्रति भी आकर्षण पैदा करने का काम किया था।भारतेंदु हरिश्चंद्र ने &#039;सत्य हरिश्चन्द्र&#039;, &#039;श्री चंद्रावली&#039;, &#039;भारत दुर्दशा&#039;, &#039;वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति&#039;, &#039;विषस्य विषमौषधम्&#039;, &#039;प्रेमजोगिनी&#039;, &#039;नीलदेवी&#039;, &#039;अंधेर नगरी&#039; और &#039;सती प्रताप&#039; जैसे विभिन्न विधाओं में नाटक लिखे। भारतेंदु का &#039;अंधेर नगरी&#039; नाटक व्यवस्था पर तंज कसता है और आज भी चर्चित है।मृत्युभारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य को एक से बढ़कर एक अद्भुत रचनाएं लिखीं। वहीं बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी भारतेन्दु हरिश्चचन्द्र का 06 जनवरी 1885 को 34 साल की उम्र में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 04:30:03 +0530</pubDate>
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<title>Bhupen Hazarika Birth Anniversary: गायक ही नहीं लाखों दिलों की धड़कन थे भूपेन हजारिका, खुद लिखते थे गीत</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड के गायक भूपेन हजारिका का 08 सितंबर को जन्म हुआ था। वह असम के गीतकार, फिल्ममेकर, संगीतकार और गायक थे। भूपेन हजारिका असमिया भाषा के लेखक और असम संगीत के अच्छे जानकार थे। उनको संगीत विरासत में मिला था और उनकी मां भी एक गायिका थीं। उन्होंने महज 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना लिखा था और उसको गाया था। वहीं 12 साल की उम्र में भूपेन हजारिका ने असमिया भाषा की फिल्म &#039;इंद्रमालती&#039; में काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर भूपेन हजारिका के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...असमिया और हिंदी में गाए गानेभूपेन हजारिका ने खुद को सिर्फ असम तक सीमित नहीं रखा था। बल्कि वह इससे बाहर निकले और हिंदी पट्टी में छा गए। उन्होंने हिंदी में &#039;दिल हूम हूम करे&#039; गाना गाया था, गाने को दर्शकों का खूब प्यार मिला था। भूपेन हजारिका ने &#039;ओ गंगा तू बहती है क्यों&#039; गाना गाया। इस गाने को जिस किसी ने भी सुना, उसके दिल पर हजारिका का जादू चला। उन्होंने असमिया भाषा के अलावा हिंदी, बंगला और कई दूसरी भाषाओं में भी गाना गाया था।इसे भी पढ़ें: Rishi Kapoor Birth Anniversary: ऋषि कपूर को पहली फिल्म से मिली थी प्रसिद्धि, रोमांटिक हीरो की बनी थी इमेजखुद लिखते थे गानेबता दें कि भूपेन हजारिका कई प्रतिभाओं के धनी थे। वह कई बार अपने गाने खुद लिखते थे और उनको गाते थे। एक बार उन्होंने बताया था कि वह खुद गीत लिखते हैं और खुद ही धुन तैयार करते थे और खुद गाते थे। इसलिए अपने गीत की शैली के बारे में खुद कोई राय नहीं दे सकते हैं। उन्होंने बताया था कि उन्होंने कई नाटकों या फिल्मों के किरदारों को ध्यान में रखकर गीत लिखे थे।पत्नी ने छोड़ा साथसाल 1950 में भूपेन हजारिका ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली प्रियवंदा पटेल से शादी की थी। दोनों का एक बेटा तेज था। शादी के बाद भूपेन अपना करियर बनाने में लग गए। ऐसे में उनकी पत्नी प्रियवंदा उनको छोड़कर अमेरिका वापस लौट गईं। लेकिन भूपेन हजारिका ने अपने करियर पर ध्यान दिया और आगे बढ़ते रहे।मृत्युवहीं सेहत बिगड़ने पर 30 जून 2011 को भूपेन हजारिका को एक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। जिसके बाद 05 नवंबर 2011 को उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया और भूपेन हजारिका का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 04:30:03 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Rishi Kapoor Birth Anniversary: ऋषि कपूर को पहली फिल्म से मिली थी प्रसिद्धि, रोमांटिक हीरो की बनी थी इमेज</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 04 सितंबर को अभिनेता ऋषि कपूर का जन्म हुआ था। भले ही अभिनेता ऋषि कपूर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें और काम आज भी फैंस के दिलों में जिंदा हैं। ऋषि कपूर ने अपने 50 साल के फिल्मी करियर में करीब 121 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। उन्होंने अपने टैलेंट से दर्शकों का दिल जीता और वह अपने खुले स्वभाव के लिए काफी ज्यादा फेमस थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता ऋषि कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 04 सितंबर 1952 को ऋषि कपूर का जन्म हुआ था। उनके पिता जाने-माने अभिनेता और निर्देशक राज कपूर के घर हुआ था। उनको बचपन से ही घर में फिल्मी माहौल देखने को मिला था। उनको बचपन से ही एक्टिंग का शौक था। जब उन्होंने चलना शुरू किया था, तो वह आइने के सामने जाकर तरह-तरह की शक्लें बनाया करते थे।इसे भी पढ़ें: Mukesh Death Anniversary: संगीत की दुनिया में मुकेश ने बनाया था अलग मुकाम, गाते-गाते हुई थी मौतरोमांटिक हीरो थे ऋषि कपूरअभिनेता ऋषि कपूर ने साल 1973 से लेकर 2000 तक 92 फिल्मों में रोमांटिक किरदार निभाए। ऋषि कपूर को रोमांटिक हीरो के तौर पर काफी ज्यादा पसंद किया जाता था और लड़कियां उनके क्यूट लुक्स की दीवानी थीं। ऋषि कपूर ने &#039;लैला मजनू&#039;, &#039;कर्ज&#039;, &#039;नगीना&#039;, &#039;प्रेम रोग&#039;, &#039;दामिनी&#039;, &#039;प्रेम रोग&#039;, &#039;सरगम&#039;, &#039;दो प्रेमी&#039;, &#039;चांदनी&#039; जैसी कई फिल्मों में काम किया है।शादीबता दें कि ऋषि कपूर ने अभिनेत्री नीतू कपूर से शादी की थी। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ऋषि और नीतू दोनों शादी के दौरान बेहोश हो गए थे। एक ओर जहां नीतू अपने भारी लहंगे को नहीं संभाल पाई थीं, तो वहीं ऋषि कपूर भीड़ के कारण बेहोश हो गए थे।स्वेटरमैनऋषि कपूर तरह-तरह के स्वेटर्स के शौकीन थे। उनको स्वेटर इस हद तक पसंद थे कि उन्होंने अपनी एक भी फिल्म में एक भी स्वेटर को रिपीट नहीं किया था। फिल्मों में स्वेटर को स्टाइल स्टेटमेंट की तरह पेश करने के कारण ऋषि कपूर को स्वेटरमैन कहा जाने लगा था।मृत्युवहीं साल 2018 में अभिनेता को कैंसर हो गया था। जिसके बाद अभिनेता का अमेरिका में 11 महीनों तक इलाज चला था। लेकिन 30 अप्रैल 2020 को 67 साल की उम्र में ऋषि कपूर की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 04:30:46 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dadabhai Naoroji Birth Anniversary: ब्रिटिश संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय थे दादाभाई नौरोजी, 3 बार बने कांग्रेस के अध्यक्ष</title>
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<description><![CDATA[ ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया के नाम से लोकप्रिय दादाभाई नौरोजी का 04 सितंबर को जन्म हुआ था। दादाभाई नौरोजी का योगदान सिर्फ स्वतंत्रता तक ही सीमित नहीं रहा। दादाभाई नौरोजी ने शिक्षाविद, समाज सुधारक, राजनेता, पत्रकार और ब्रिटिश भारत के अनौपचारिक राजदूत के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभायी थी। वह एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में उभरे, जिन्होंने अनेक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाई और उनको प्रथम भारतीय होने का सम्मान मिला था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर दादाभाई नौरोजी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारएक साधारण पारसी परिवार में 04 सितंबर 1825 को दादाभाई नौरोजी का जन्म हुआ था। इनके पिता नाम नौरोजी प्लांजी डोरडी और मां का नाम मनेखबाई था। जब वह 4 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में उनकी मां ने दादाभाई नौरोजी का पालन-पोषण किया था। वह अंग्रेजी और गणित में काफी अच्छे थे। वहीं 11 साल की उम्र में उनकी शादी गुलबाई से हुई थी। वहीं 27 वर्ष की उम्र में दादाभाई नौरोजी गणित और प्राकृतिक दर्शन के प्राध्यापक बन गए थे। दादाभाई को साल 1859 में यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में गुजराती का प्रोफेसर नियुक्त किया गया था।इसे भी पढ़ें: Dushyant Kumar Birth Anniversary: हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमारब्रिटिश पार्लियामेंट में चुने गए सांसद साल 1892 में उन्होंने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स का चुनाव लड़ा था। फिर लिबरल पार्टी ने फिनस्बरी सेंट्रल सीट से टिकट देकर नौरोजी को मैदान में उतारा। इस इलाके में कामकाजी और श्रमिक लोगों की संख्या अधिक थी। इस तरह से 5 हजार वोटों से चुनाव जीतकर दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में एंट्री की। सांसद बनने के बाद उनको दादाभाई नैरो मेजोरिटी कहा जाने लगा। वह ब्रिटिश संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय थे।लंदन में रखी इंडियन एसोसिएशन की नींवसाल 1853 में दादाभाई नौरोजी ने मुंबई एसोसिएशन की स्थापना की थी। फिर साल 1866 में लंदन में इंडियन एसोसिएशन की नींव रखी। फिर साल 1867 में लंदन में ही उन्होंने ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य ब्रिटिश जनता को भारत की वास्तविक स्थिति से अवगत कराना था।कांग्रेस अध्यक्षबता दें कि दादाभाई नौरोजी कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। दादाभाई नौरोजी ने 3 बार कांग्रेस की अध्यक्षता की थी। साल 1886 में उन्होंने पहली कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। वहीं साल 1893 में दूसरी बार कांग्रेस के 9वें अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। फिर साल 1906 में तीसरी बार वह कांग्रेस के 22वें अधिवेशन के अध्यक्ष बने थे। जिसमें उन्होंने स्वराज की मांग को प्रमुखता से उठाया था, जोकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित हुई।मृत्युवहीं 30 जून 1917 को 91 साल की उम्र में दादाभाई नौरोजी ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 04:30:45 +0530</pubDate>
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<title>Mother Teresa Death Anniversary: एक अनुभव ने बदल ली मदर टेरेसा की जिंदगी, ऐसे बनीं गरीबों की मां</title>
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<description><![CDATA[ मानव समाज के कल्याण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा का 05 सितंबर को निधन हो गया था। कम उम्र से ही उनके मन में समाज सेवा करने का जज्बा जगा था। जब वह इस क्षेत्र में आईं, तो उन्होंने अपने पहनावे को बदलकर साड़ी पहन ली। मदर टेरेसा को प्रेम और शांति का दूत भी कहा जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा में बिता दिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअल्बानिया में 26 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही मिशिनरी जीवन से काफी ज्यादा प्रभावित थी। भारत के बंगाल में उनकी सेवा की कहानियां सुनते-सुनते महज 12 साल की उम्र में उन्होंने भारत जाने का विचार मन ही मन बना लिया। वहीं 18 साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने फैसला कर लिया था कि वह अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित कर देंगी।इसे भी पढ़ें: Dadabhai Naoroji Birth Anniversary: ब्रिटिश संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय थे दादाभाई नौरोजी, 3 बार बने कांग्रेस के अध्यक्षभारत में सेवा का मकसदभारत आने के अपने इरादे को मजबूत करने के लिए उन्होंने साल 1928 में आयरलैंड के इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी जाने का फैसला किया था। यहां के सदस्यों को सिस्टर्स ऑफ लोरेटो कहा जाता है। इसके पीछे मदर टेरेसा का इरादा मिशनरी बनने के साथ ही अंग्रेजी भाषा सीखना था। क्योंकि भारत में सिस्टर्स ऑफ लोरेटों की निर्देश भाषा थी।भारत में किया शिक्षण कार्यसाल 1929 में जब मदर टेरेसा भारत आईं, तो शुरूआती प्रशिक्षण का समय दार्जिलिंग में बिताया। यहां पर उन्होंने बंगाली सीखी और फिर कॉन्वेंट के पास सेंट थेरेसा स्कूल में पढ़ाने लगीं। साल 1931 में मदर टेरेसा ने अपनी पहली धार्मिक प्रतिज्ञा ली। उनके बचपन का नाम एक्नेस था, लेकिन भारत आकर उन्होंने अपना नाम मदर टेरेसा रख लिया। उन्होंने कलकत्ता में 20 सालों तक एक एनटैले के लोरेट कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया और साल 1944 में वह स्कूल की हेडमिस्ट्रेट बन गईं।जीवन को मिला नया मोड़हालांकि मदर टेरेसा को पढ़ाना काफी अच्छा लगता था, लेकिन वह आसपास की गरीबी और असहायों को देखकर दुखी हो जाया करती थीं। साल 1943 में बंगाल में आए अकाल और फिर अगस्त 1946 में कौमी हिंसा ने मदर टेरेसा की पीड़ा को बढ़ा दिया। इसी साल जब वह दार्जिलिंग जा रही थीं, तब उनकी आत्मा की आवाज ने उनको झझकोर दिया। उनको एहसास हुआ कि उन्हें गरीबों की सेवा कर उनके साथ रहना चाहिए। उन्होंने इसको ईश्वर का संदेश माना और शिक्षण कार्य छोड़कर कलकत्ता की झोपड़ियों में रहकर गरीबों और बीमार लोगों की सेवा करने लगीं।खुद भी किया संघर्षमदर टेरेसा को शुरूआत में झोपड़ी में रहना पड़ा और लोगों का पेट भरने के लिए उन्होंने भीख मांगने तक का काम किया। इस दौरान वह खुद भी संघर्ष करती रहीं। लेकिन वह हर नए दिन के साथ अधिक मजबूती से सेवाकार्य में जुटी रहीं। इस बीच लोगों का उन पर ध्यान गया और धीरे-धीरे उनकी मदद के लिए लोग आगे आते गए।मृत्यु05 सितंबर 1997 को हृदयघात की वजह से मदर टेरेसा का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 04:30:44 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Neerja Bhanot Death Anniversary: ब्रेव डॉटर ऑफ इंडिया कही जाती हैं नीरजा भनोट, बेमिसाल काम कर बचाई थी यात्रियों की जान</title>
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<description><![CDATA[ एविएशन की दुनिया में नीरजा भनोट एक ऐसा नाम हैं, जिनकी हमेशा चर्चा होती रहती है। आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को नीरजा भनोट की मृत्यु हो गई थी। वह एक ऐसी फ्लाइट पर्सन थीं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए विमान अपहरण की घटना में 360 लोगों की जान बचाई थी। दरअसल, मुंबई से उड़ान भरने वाले विमान को फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने कराची के जिन्ना हवाई अड्डे पर का हाइजैक कर लिया था। इस दौरान नीरजा भनोट ने साहस और बहादुरी दिखाते हुए बेमिसाल काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नीरजा भनोट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और शिक्षाचंडीगढ़ में 07 सितंबर 1963 को नीरजा भनोट का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम हरीश भनोट था, जोकि एक पत्रकार थे और मां रमा भनोट हाउसवाइफ थीं। नीरजा ने अपनी शुरूआती शिक्षा चंडीगढ़ से पूरी की। बाद में उनका परिवार मुंबई शिफ्ट हो गया और नीरजा ने आगे की पढ़ाई मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से पूरी की थी।इसे भी पढ़ें: Sarvepalli Radhakrishnan Birth Anniversary: भारत के महान दार्शनिक थे सर्वपल्ली राधाकृष्णन, ऐसे बने देश के दूसरे राष्ट्रपतिशादी में मिला दर्दसाल 1985 में नीरजा भनोट की शादी एक बिजनेसमैन के साथ ही। लेकिन उनके और पति के बीच सब ठीक नहीं था। नीरजा का पति उनको दहेज के लिए परेशान करता था। ऐसे में नीरजा ने शादी के 2 महीने बाद ही पति का घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता के घर वापस आ गईं। इसके बाद उन्होंने अपने मॉडलिंग प्रोजेक्ट पूरे किए। इस बात को काफी कम लोग जानते होंगे कि उस दौरान नीरजा टॉप मॉडल थीं।नीरजा ने करीबन 22 विज्ञापनों में काम किया था और उनको फिल्मों में भी काफी दिलचस्पी थी। इतना ही नहीं नीरजा भनोट अभिनेता राजेश खन्ना की बहुत बड़ी फैन थीं। वह अक्सर उनके डायलॉग बोला करती थीं।ज्वॉइन की एयरलाइननीरजा को बचपन से ही प्लेन में बैठने और आकाश में उड़ने की दिलचस्पी थी। उन्होंने अपने मॉडलिंग के शौक को पूरा करने के बाद एयरलाइंस ज्वाइन की। इसके बाद उन्होंने पैन एएम के लिए अप्लाई किया औऱ उनका सिलेक्शन हो गया। फिर उनको ट्रेनिंग के लिए मियामी और फ्लोरिडा भेजा गया।बर्थडे से दो दिन पहले गई जाननीरजा भनोट का पैन एमए की फ्लाइट 73 की सीनियर पर्सन थीं। यह फ्लाइट उस समय मुंबई से अमेरिका जा रही थी और इसके ठीक दो दिन बाद नीरजा का बर्थडे था। तभी पाकिस्तार से कराची एयरपोर्ट पर प्लेन को आतंकियों ने हाईजैक कर लिया। इस दौरान फ्लाइट में 19 क्रू मेंबर्स और 360 यात्री थे। वहीं नीरजा की इंफोर्मेंशन के बाद फ्लाइट के तीन सदस्य पायलट, को पायलट और फ्लाइट इंजीनियर कॉकपिट फ्लाइट छोड़कर भाग गए।आतंकवादी इस फ्लाइट को साइप्रस ले जाना चाहते थे। जिससे कि वह फिलिस्तीन कैदियों को रिहा करा सकें। आतंकियों ने फ्लाइट को हाईजैक करने के बाद पाक सरकार से पायलट की मांग की। जब पाक सरकार ने उनकी मांग को रिजेक्ट कर दिया तो आतंकियों ने विमान में बैठ अमेरिकी यात्रियों को मारने का फैसला किया। इसी दौरान नीरजा ने फ्लाइट में सवार यात्रियों को एमरजेंसी विंडो के के बारे में बताया। नीरजा को पता था कि फ्लाइट का ईंधन खत्म होते ही अंधेरा छा जाएगा। जैसे ही फ्लाइट का ईंधन खत्म हुआ, नीरजा ने इमरजेंसी विंडो खोल दी और यात्री नीचे कूदने लगे। वहीं नीरजा ने आतंकियों को उलझाए रखा और यात्रियों को बाहर निकालने में सफल रहीं।शहीद हो गईं नीरजायात्रियों के निकलने के बाद नीरजा भी फ्लाइट से कूदने वाली थीं, तभी उनको एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। लेकिन वह जैसे ही बच्चे को लेकर फ्लाइट के दरवाजे पर आईं, उनके सामने एक आतंकी आ गया। नीरजा ने उस बच्चे की जान बचा ली, लेकिन वह खुद मारी गईं। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 04:30:43 +0530</pubDate>
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<title>Sarvepalli Radhakrishnan Birth Anniversary: भारत के महान दार्शनिक थे सर्वपल्ली राधाकृष्णन, ऐसे बने देश के दूसरे राष्ट्रपति</title>
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<description><![CDATA[ एक महान शिक्षक भारत के दूसरे राष्ट्रपति रहे डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का 05 सितंबर को जन्म हुआ था। डॉ राधाकृष्णन देश के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक थे। उन्होंने पूरी दुनिया को भारत के दर्शन शास्त्र से परिचय कराया था। वह देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के तिरुतानी में 05 सितंबर 1888 को राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। उनके पिता एक स्थानीय जमींदार के यहां राजस्व देखने का काम करते थे। इनके पिता नहीं चाहते थे कि वह अंग्रेजी पढ़ें। राधाकृष्णन के पिता चाहते थे कि उनका बेटा पुजारी बने। लेकिन वह अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1896 में उन्होंने Hermansburg Evangelical Lutheran Mission School चले गए।इसे भी पढ़ें: Mother Teresa Death Anniversary: एक अनुभव ने बदल ली मदर टेरेसा की जिंदगी, ऐसे बनीं गरीबों की मांफिर उन्होंने हायर एजुकेशन के लिए वूरी कॉलेज वेल्लौर में एडमिशन लिया। फिर उन्होंने साल 1906 में फिलॉसफी में मास्टर डिग्री ली। जब वह 20 के थे, तब उनकी एमए थीसिस प्रकाशित हुई थी। राधाकृष्णन को पूरी एकेडेमिक लाइफ में ढेरों स्कॉलरशिप्स मिली थीं।फिलॉसफी के प्रोफेसरसाल 1918 में उनको मैसूर यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी का प्रोफेसर नियुक्त किया गया। इस दौरान तक राधाकृष्णन ढेरों लेख और जर्नल्स लिख चुके थे। साल 1929 में वह कलकत्ता यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी के प्रोफेसर बने। यहां से राधाकृष्णन के विदेश जाने का रास्ता खुला और साल 1929 में मैनचेस्टर कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में खाली पद पर बुलाया गया। इस दौरान राधाकृष्णन को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स को लेक्चर देने का मौका मिला। वह अपने छात्रों के बीच पढ़ाने और सिखाने के तरीके के लिए काफी लोकप्रिय थे।शिक्षा में योगदानशिक्षा में राधाकृष्णन के योगदान के लिए साल 1931 में ब्रिटिश सरकार ने उनको नाइटहुड दिया। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने नाम के आगे &#039;सर&#039; टाइटल का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने अपने नाम के आगे &#039;डॉक्टर&#039; लगाने को प्राथमिकता दी। साल 1931 से लेकर 1936 तक डॉ राधाकृष्णन आंध्र यूनिवर्सिटी के वीसी रहे। वहीं साल 1939 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने उनको बीएचयू के कुलपति बनने का आमंत्रण दिया। जिसके बाद वह साल 1948 तक बीएचयू के वीसी रहे।भारत के दूसरे राष्ट्रपतिसाल 1947 में जब भारत आजाद हुआ, तो डॉ राधाकृष्णन ने यूनेस्को में देश का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद वह सोवियत यूनियन में भारत के राजदूत रहे। वह संविधान सभी के लिए भी चुने गए और साल 1952 में उनको भारत के उप राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया। साल 1962 में वह देश के दूसरे राष्ट्रपति बने।मृत्युवहीं 17 अप्रैल 1975 को 86 साल की उम्र में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 04:30:43 +0530</pubDate>
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<title>Dushyant Kumar Birth Anniversary: हिंदुस्तानी गजल से मशहूर हुए दुष्यंत कुमार</title>
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<description><![CDATA[ आज एक सिंतबर है प्रसिद्ध हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार की जन्मदिन है। बिजनौर के राजपुर नवादा गांव में एक सिंतबर 1933 में जन्मे दुष्यंत कुमार का मात्र 43 वर्ष की आयु में 30 दिसंबर 1975 को भोपाल में उनका निधन हुआ।हिंदी साहित्यकार−गजलकार दुष्यंत कुमार हिंदी गजल के लिए जाने जाते हैं। वे हिंदी गजल के लिए विख्यात है किंतु उन्हें यह ख्याति हिंदी गजलों के लिए नहीं, हिंदुस्तानी गजलों के लिए मिली। संसद से सड़क तब मशहूर हुए उनके शेर हिंदुस्तानी हिंदी में हैं। हिंदुस्तानी हिंदी में उन्होंने सभी प्रचलित शब्दों को इस्तेमाल किया। शब्दों को प्रचलित रूप में इस्तेमाल किया।इसे भी पढ़ें: Amrita Pritam Birth Anniversary: सामाजिक बंधन तोड़ अमृता प्रीतम ने कलम से बिखेरा जादू, ऐसा रहा सफरवे अपनी पुस्तक साए में धूप की भूमिका में खुद कहते हैं “ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन,एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू—दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है। उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ’वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।—कि मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ’शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ,किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है,जिस रूप में वे हिन्दी में घुल−मिल गये हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिन्दी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है ।ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘ॠतु’ ‘रुत’ हो गई है।—कि उर्दू और हिन्दी अपने—अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ।—कि ग़ज़ल की विधा बहुत पुरानी,किंतु विधा है,जिसमें बड़े—बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य—रचना की है। हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है।”ग़ज़ल पर्शियन और अरबी  से उर्दू में आयी। ग़ज़ल का मतलब हैं औरतों से अथवा औरतों के बारे में बातचीत करना। यह भी कहा जा सकता हैं कि ग़ज़ल का सर्वसाधारण अर्थ हैं माशूक से बातचीत का माध्यम। उर्दू के  साहित्यकार  स्वर्गीय रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी  ने ग़ज़ल की  भावपूर्ण परिभाषा लिखी हैं।  कहते हैं कि, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते −भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाता हैं जहां से वह निकल नहीं सकता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज़ निकलती हैं। उसी करूण स्वर को ग़ज़ल कहते हैं। इसीलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रगट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही ग़ज़ल का आदर्श हैं’।दुष्यंत  की गजलों की खूबी है साधारण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग, हिंदी− उर्दू के घुले मिले शब्दों का प्रयोग। चुटीले व्यंग उनकी गजल की खूबी है। वे व्यवस्था और समाज पर चोट करते हैं। ये ही उन्हें सीधे  आम आदमी के दिल तक ले जाती है। उनकी ये शैली उन्हें अन्य कवियों से अलग और लोकप्रिय करती है।आम आदमी और व्यवस्था पर चोट करने वाले दुष्यंत कुमार के शेर, व्यवस्था पर चोट करते उनके शेर सड़कों से संसद गूंजतें है। शायद दुष्यंत कुमार अकेले ऐसे साहित्यकार होंगे, जिसके शेर सबसे ज्यादा बार संसद में पढ़े गए हों। सभाओं में नेताओं ने उनके शेर सुनाकर व्यवस्था पर चोट की हो। सरकार को जगाने और जनचेतना का कार्य किया हो। उन्होंने हिंदी गजल भी लिखी, पर वह इतनी प्रसिद्धि नहीं पा सकी, जितनी हिंदुस्तानी हिंदी में लिखी गजल लोकप्रिस हुईं।उनके गुनगुनाए जाने वाले उनके कुछ हिंदुस्तानी हिंदी के शेर हैं−−वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है, माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है। −रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारों।−कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता,एक पत्थर तो तबीअ&#039;त से उछालो यारों।− यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसतें है,खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा, −गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में,सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए।−पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं।-आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं। - इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो, धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं।−सिर से सीने में कभी पेट से पाँव में कभी,इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है।−मत कहो आकाश में कोहरा घना है,ये किसी की व्यक्तगत आलोचना है। −ये  जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,मैं सज्दे में नही था, आपको धोखा हुआ होगा।−तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए,छोटी—छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।−हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुततुमने बासी रोटियाँ नाहक उठा कर फेंक दीं। गजलहो गई है पीर पर्वत सी पिंघलनी चाहिए,अब हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। - अशोक मधुप(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ]]></description>
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<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 04:31:36 +0530</pubDate>
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<title>Amrita Pritam Birth Anniversary: सामाजिक बंधन तोड़ अमृता प्रीतम ने कलम से बिखेरा जादू, ऐसा रहा सफर</title>
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<description><![CDATA[ देश दुनिया की चर्चिल लेखिका अमृता प्रीतम का 31 अगस्त को जन्म हुआ था। उनका व्यक्तित्व रहस्य से भरा हुआ है। अमृता प्रीतम की जिंदगी में तमाम उतार चढ़ाव आए। उनके लेखन ने साहित्य जगत को नया आयाम दिया। अमृता प्रीतम के बारे में जितना पढ़ा जाएगा, रहस्य उतना ही गहराता चला जाएगा। वह एक शायर से एक तरफा प्यार करती थीं और बिना शादी के एक शख्स के साथ जीवन गुजारा, इतने उतार-चढ़ाव कम लोगों की जिंदगी में आते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अमृता प्रीतम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के गुजरांवाला में 31 अगस्त 1919 को अमृता प्रीतम का जन्म हुआ था। जब अमृता 11 साल की थीं, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई। वहीं देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार हिंदुस्तान आकर बस गया। तनहाई के मौसमों में कागज और कलम ने अमृता प्रीतम को सहारा दिया। वहीं 16 साल की उम्र में प्रीतम सिंह से अमृता का विवाह हो गया। इस तरह से अमृता कौर अमृता प्रीतम बन गईं। लेकिन इस रिश्ते में दरार आने लगीं और साल 1960 में उनका तलाक हो गया।इसे भी पढ़ें: Dhyanchand Birth Anniversary: हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने ठुकरा दिया था हिटलर का ऑफर, ऐसे शुरू किया था सफरमासूम प्रेम कहानी को मुकाम देती हैं अमृताअमृता प्रीतम ने अपने उपन्यास &#039;पिंजर&#039; में ऐसा लेखन किया है, जिससे लगता है कि सारी घटनाएं उनकी आंखों के सामने गुजरी हैं। इसमें वह आखिरी में इंसानियत और रिश्ते की मर्यादा का भी चित्रण करती हैं। एक सौ से अधिक पुस्तकों की रचनाकार अमृता प्रीतम को पंजाबी भाषा की पहली कवियत्री माना जाता है। जब वह विभाजन के बाद पाकिस्तान को छोड़कर दिल्ली आ रही थीं, तब उन्होंने &#039;आज अख्खां वारिस शाह नूं&#039; लिखी। यह भारत पाकिस्तान बंटवारे पर उनकी पहली कविता थी, जोकि काफी ज्यादा चर्चित रही। अमृता प्रीतम ने अपने जीवन में कुल 28 उपन्यास लिखे थे। लेकिन &#039;पिंजर&#039; सबसे ज्यादा लोकप्रिय उपन्यास है। इसके अलावा उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया था।पुरस्कारसाल 1982 में अमृता प्रीतम को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, साल 1969 में पद्मश्री, साल 2004 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उनको पद्मविभूषण से भी नवाजा गया था। वहीं साल 1986 में अमृता प्रीतम को राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था।मृत्युअमृता प्रीतम का आखिरी समय काफी तकलीफों में बीता था। बाथरुम में गिर जाने के कारण उनकी हड्डी टूट गई थी, जो कभी ठीक नहीं हुई। वहीं आखिरी समय में इमरोज ने अमृता का बहुत ध्यान रखा। 31 अक्तूबर 2005 को अमृता प्रीतम ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 04:31:11 +0530</pubDate>
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<title>Dhyanchand Birth Anniversary: हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने ठुकरा दिया था हिटलर का ऑफर, ऐसे शुरू किया था सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 29 अगस्त को भारत के महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का जन्म हुआ था। साल 1928, 1932 और 1936 ओलंपिक में ध्यानचंद के रहते हुए टीम ने कमाल किया था। इस दौरान हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीतने में सफलता पाई थी। ध्यानचंद की गोल करने की क्षमता के आगे विपक्षी टीम बेबस नजर आती थी। विपक्षी टीम सिर्फ दूसरे छोर से ध्यानचंद को देखते ही रह जाते थे। हॉकी में ध्यानचंद को वही मुकाम हासिल है, जोकि क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन को और फुटबॉल में पेले को मिला है।जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में 29 अगस्त 2025 को &#039;हॉकी के जादूगर&#039; मेजर ध्यानचंद का जन्म हुआ था। वहीं 16 साल की उम्र में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। भर्ती के बाद ध्यानचंद ने हॉकी खेलना शुरू किया था। वह हॉकी के लिए काफी अभ्यास किया करते थे। रात के समय चांद निकलने पर प्रैक्टिस सेशन किया करते थे। इसलिए उनके साथियों ने उनके नाम के आगे &#039;चंद&#039; लगा दिया। असल में उनका नाम ध्यान सिंह था।इसे भी पढ़ें: Dorabji Tata Birth Anniversary: &#039;मैन ऑफ स्टील&#039; कहे जाते हैं उद्योगपति दोराबजी टाटा, औद्योगिक क्रांति की रखी थी नींवओलंपिक खेलसाल 1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेलों ध्यानचंद भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बने थे। उस टूर्नामेंट में उन्होंने 14 गोल किए थे। इस समय एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था कि यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था और ध्यानचंद हॉकी के जादूगर हैं। उन्होंने कई यादगार मैच खेले थे, लेकिन उनका एक मैच सबसे ज्यादा पसंद किया गया था। ध्यानचंद के मुताबिक साल 1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया। बिगटन क्लब फाइनल ध्यानचंद का सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था।हॉकी के लिए दीवानगीध्यानचंद हॉकी के इस कदर दीवाने थे कि वह पेड़ से हॉकी के आकार की लकड़ी काटकर उससे हॉकी खेलना शुरूकर देते थे। वह रातभर हॉकी खेलते रहते थे। ध्यानचंद को हॉकी के आगे कुछ भी याद नहीं रहता था। साल 1932 के ओलंपिक फाइनल में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 24-1 से हराया था। इस मैच में उन्होंने 8 गोल किए थे। उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे। मेजर ध्यानचंद जब हॉकी खेला करते थे, तब लोग उनकी हॉकी स्टिक के बारे में सोचते थे। क्योंकि लोगों को लगता था कि उनकी स्टिक में कहीं चुंबक तो नहीं लगा है, जो वह इतनी रफ्तार से गोल कर देते हैं।हिटलर ने दिया था ऑफरबता दें कि हिटलर ने खुद ध्यानचंद को जर्मन सेना में शामिल होने और एक बड़ा पद देने की पेशकश की थी। लेकिन ध्यानचंद ने भारत में रहना पसंद किया था। ध्यानचंद के नाम पर देश में खेल रत्न अवॉर्ड दिया जाता है। इससे पहले इसका नाम राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड था।मृत्युमेजर ध्यानचंद ने कैंसर से जंग लड़ते हुए 03 दिसंबर 1979 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 31 Aug 2025 04:29:26 +0530</pubDate>
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<title>Dorabji Tata Birth Anniversary: &amp;apos;मैन ऑफ स्टील&amp;apos; कहे जाते हैं उद्योगपति दोराबजी टाटा, औद्योगिक क्रांति की रखी थी नींव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 27 अगस्त को उद्योगपति दोराबजी टाटा का जन्म हुआ था। उन्होंने टाटा कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम किया था। उन्होंने अपने पिता के सपने को साकार करते हुए भारत का पहला स्टील प्लांट स्थापित किया था। इसी कारण उनको &#039;मैन ऑफ स्टील&#039; भी कहा जाता है। भारत में औद्योगिक क्रांति की नींव रखने के साथ ही भारत को खेल एवं उद्योग के क्षेत्र में अलग पहचान दिलाने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर उद्योगपति दोराबजी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि 27 अगस्त 1859 को दोराबजी टाटा का जन्म हुआ था। उनको बिजनेस विरासत में मिला था। वह जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे थे और उन्होंने अपने पिता से बिजनेस के गुण सीखे थे। साल 1904 में जमशेदजी टाटा की मौत के बाद टाटा समूह की कमान दोराबजी टाटा ने संभाली। उन्होंने अपने पिता के सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाया। कंपनी का नेतृत्व संभालने के 3 साल बाद दोराबजी टाटा ने स्टील के क्षेत्र में कदम रखा। फिर साल 1907 में टाटा स्टील और साल 1911 में टाटा पावर की स्थापना की थी।इसे भी पढ़ें: Mother Teresa Birth Anniversary: मदर टेरेसा ने भारत की बेटी बनके की मानवता की सेवा, भारत रत्न से की गई थीं सम्मानितदेश का पहला इस्पात संयंत्रउस समय टाटा स्टील देश का पहला इस्पात संयंत्र था। दोराबजी टाटा के नेतृत्व में अधिकतर लोहे की खानों का सर्वेक्षण हुआ था। उन्होंने कारखाना लगाने के लिए मैंगनीज, लोहा, कोयला समेत इस्पात और खनिज पदार्थों की खोज की थी। साल 1910 आते-आते ब्रिटिश सरकार द्वारा दोराबजी को नाईटहुड की उपाधि दी गई थी। दोराबजी टाटा समूह के पहले चेहरमैन बने और साल 1908 से लेकर 1932 तक इस पद पर बने रहे।जमशेदपुर का विकासझारखंड के जमशेदपुर का कायाकल्प दोराबजी टाटा ने किया था। उन्होंने अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए जमशेदपुर का विकास किया। जिसका नतीजा यह रहा कि जमशेदपुर औद्योगिक नगर के रूप में भारत के मानचित्र पर छा गया।खेल में रुचिदोराबजी टाटा को उद्योग के अलावा खेल में भी रुचि थी। उन्होंने कैम्ब्रिज में दो साल बिताए थे, इस दौरान उन्होंने खेलों में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। दोराबजी टाटा क्रिकेट और फुटबॉल खेलना जानते थे और कॉलेज के लिए टेनिस भी खेला था। इसके अलावा वह एक अच्छे घुड़सवार भी थे। साल 1920 में दोराबजी ने भारत को पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने भारतीय ओलंपिक परिषद के अध्यक्ष रहते हुए साल 1924 के पेरिस ओलंपिक के लिए भारतीय टीम की आर्थिक सहायता भी की थी।मृत्युवहीं 11 अप्रैल 1932 को दोराबजी टाटा यूरोप यात्रा पर गए थे। इस दौरान 03 जून 1932 को जर्मनी के बैड किसेनगेन में दोराबजी टाटा की मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 04:31:21 +0530</pubDate>
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<title>Mukesh Death Anniversary: संगीत की दुनिया में मुकेश ने बनाया था अलग मुकाम, गाते&#45;गाते हुई थी मौत</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी फिल्म उद्योग के सबसे लोकप्रिय और पार्श्व गायकों में से एक रहे मुकेश का 27 अगस्त को निधन हो गया था। मुकेश द्वारा गाए गीत लोग आज भी गुनगुनाना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने जमाने के कई दिग्गज कलाकारों को आवाज दी थी। जिनमें से मनोज कुमार, राज कपूर, सुनील दत्त, फिरोज खान और दिलीप शामिल हैं। मुकेश एक पार्श्व गायक थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर मुकेश के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ था। उनका पूरा नाम मुकेश चंद माथुर था। इनके पिता जोरावर चंद माथुर एक इंजीनियर थे। संगीत शिक्षक मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को पढ़ाने के लिए घर आते थे। लेकिन उनको मुकेश में अपना शिष्य मिला। मुकेश ने 10वीं के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ दी और दिल्ली जाकर नौकरी करने लगे। इस दौरान वह वॉइस रिकॉर्डिंग का भी प्रयास करने लगे और धीरे-धीरे अपनी गायन क्षमता को विकसित किया।इसे भी पढ़ें: Singer KK Birth Anniversary: म्यूजिक की ट्रेनिंग लिए बिना सिंगिंग की दुनिया के बेताज बादशाह थे केकेसिंगिंग करियरएक्टर और प्रडोड्यूसर मोतीलाल ने सबसे पहले मुकेश की आवाज पर ध्यान दिया था। जिसके बाद मोतीलाल ने मुकेश को पंडित जगन्नाथ प्रसाद से गायन की शिक्षा दिलवाई। फिर साल 1941 में आई फिल्म &#039;निर्दोष&#039; में उनको पहला गाना &#039;दिल ही बुझा हुआ हो तो&#039; गाने का मौका मिला। बतौर पार्श्वगायक यह मुकेश का पहला हिट गाना था। फिर साल 1945 में उन्होंने फिल्म &#039;पहली नजर&#039; में गाना &#039;दिल जलता है तो जलने दो&#039; गाया था।वैसे तो मुकेश ने अपने जमाने के सभी लीड एक्टर्स के लिए गाने गाए हैं। लेकिन उन्होंने सबसे ज्यादा गाने शोमैन राज कपूर के लिए गाए हैं। इनमें से &#039;जीना यहां मरना यहां&#039;, &#039;दुनिया बनाने वाले&#039;, &#039;आवारा हूं&#039;, &#039;दोस्त-दोस्त ना रहा&#039;, &#039;सजन रे झूठ मत बोलो&#039;, &#039;कहता है जोकर&#039; और &#039;मेरा जूता है जापानी&#039; सहित अनेक गाने शामिल हैं।मृत्युजब सिंगर मुकेश यूएस टूर पर थे, तो 27 अगस्त 1976 को 53 साल की उम्र में हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया था। इस दौरान वह सिंगर करियर में पीक पर थे। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 04:31:20 +0530</pubDate>
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<title>Mother Teresa Birth Anniversary: मदर टेरेसा ने भारत की बेटी बनके की मानवता की सेवा, भारत रत्न से की गई थीं सम्मानित</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 26 अगस्त को महान संत और समाजसेवी मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। मदर टेरेसा ने अपनी पूरी जिंदगी भारत में रहकर गरीबों की सेवा में बिता दी थी। उन्होंने अपने कार्यों से पूरी दुनिया में मानवता की सेवा का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। मदर टेरेसा ने बचपन में ही गरीबों और असहायों की सेवा करने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्होंने अल्बानिया से आयरलैंड जाकर प्रशिक्षण भी लिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमेसेडोनिया के स्कोप्जे में एक अल्बेनीयाई परिवार में 26 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। उनके पिता एक साधारण व्यवसायी थे। उनका असली नाम एग्नेस था, जिसको बदलकर उन्होंने अपना नाम टेरेसा रख लिया था। यह नाम चुनने के पीछे एक खास वजह थी, क्योंकि वह संत थेरेस ऑस्ट्रेलिया और टेरेसा ऑफ अविला को सम्मान देना चाहती थीं। पढ़ाई के साथ ही उनको संगीत में दिलचस्पी थी। जब मदर टेरेसा 12 साल की थीं, तभी इनको अनुभव हो गया था कि वह अपना जीवन मानव सेवा में लगाएंगी। वहीं 18 साल की उम्र में उन्होंने &#039;सिस्टर्स ऑफ लोरेटो&#039; में शामिल होने का फैसला लिया।इसे भी पढ़ें: Vijay Lakshmi Pandit Birth Anniversary: नारी शक्ति की प्रतीक थी विजयलक्ष्मी पंडित, ब्रिटिश राज में रचा था इतिहासभारत में बस गईं मदर टेरेसाबता दें कि 06 जनवरी 1929 को मदर टेरेसा भारत आ गई थीं। यहां पर वो मिशनरी के रूप में गरीबों और बीमारों की सेवा करने लगीं। दार्जिलिंग में रहकर उन्होंने बंगाली सीखी और कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने का कार्य शुरू किया। फिर उन्होंने कोलकाता में 20 साल तक एनटैले के लोरेट कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया। वहीं साल 1946 में मदर टेरेसा को आध्यात्मिक अनुभव महसूस हुआ और फिर स्कूल में पढ़ाना छोड़कर कोलकाता के गरीबों, लावारिसों और बीमार लोगों की सेवा करने लगीं। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह लगातार गरीबों और बीमारों की सेवा में लगी रहीं।भारत की नागरिकताजब मदर टेरेसा सेवा क्षेत्र में आईं तो उन्होंने अपनी ड्रेस साड़ी कर ली। जिससे कि वह भारतीय सभ्यता के बीच आसानी से घुल-मिल सकें। इससे पहले वह झोपड़ी में रहा करती थीं और भीख मांगकर अपना पेट भरती थीं। उन्होंने कोढ़, प्लेग आदि बीमारियों के मरीजों की सेवा की। साल 1947 में मदर टेरेसा ने भारत की नागरिकता ले ली थी।सम्मानसाल 1979 में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार मिला। फिर साल 1980 में उनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। वहीं 04 सितंबर 2016 को मदर टेरेसा को संत की उपाधि मिली थी।मृत्युवहीं 05 सितंबर 1997 को मदर टेरेसा का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 27 Aug 2025 04:31:17 +0530</pubDate>
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<title>Neil Armstrong Death Anniversary: चांद पर कदम रखने से पहले जंग के मैदान में थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग, जानिए रोचक किस्से</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति नील आर्मस्ट्रॉन्ग का 25 अगस्त को निधन हो गया था। वह चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने थे। आर्मस्ट्रॉन्ग अपोलो 11 अभियान के जरिए चंद्रमा पर पहुंचे थे। उनको बचपन से ही उड़ने का शौक था। यही शौक उनको अमेरिकी नेवी में ले गया और उन्होंने कोरिया युद्ध में फाइटर प्लेन भी उड़ाया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारओहियो को वापाकाओनेटा में 05 अगस्त 1930 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग का जन्म हुआ था। इनके पिता स्टीफन कोयनिंग ओहिया राज्य सरकार में ऑडिटर थे। तीन भाई बहनों में नील सबसे बड़े थे और उनको बचपन से ही हवा में उड़ने का बहुत शौक था। बता दें कि नील को 6 साल की उम्र में दुनिया के सबसे लोकप्रिय विमान में उड़ने का अनुभव प्राप्त हुआ था। वहीं 15 साल की उम्र में उन्होंने इतना अनुभव प्राप्त कर लिया था कि वह खुद विमान उड़ा सकें।इसे भी पढ़ें: Vikram Sarabhai Birth Anniversary: भारतीय स्पेश मिशन के जनक कहे जाते हैं विक्रम साराभाई, जानिए रोचक तथ्यउड़ान के लिए पढ़ाईमहज 16 साल की उम्र में ही उन्होंने स्टूडेंट फ्लाइट सर्टिफिकेट हासिल कर लिया था। इस दौरान उनको स्काउट में भी ईगल स्काउट की रैंक मिली। इसके साथ ही ईगल स्काउट अवार्ड के साथ सिल्वर बफैलो अवार्ड मिला था। फिर 17 साल की उम्र में नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने परड्यू यूनिवर्सिटी से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। वह यूएस नेवी में एविएटर के रूप में सेवा दी, लेकिन उन्होंने न तो नेवल साइंस का कोर्स किया और न नेवी से जुड़े।कोरिया युद्धसाल 1950 में नील पू्र्ण क्वालिफाइड नेवल एविएटर बने, जिसके बाद उन्हें कई तरह की उड़ानों के अनुभव के साथ फाइटर बॉम्बर उड़ाने का अवसर मिला था। वहीं साल 1951 में नील को कोरिया युद्ध में टोही विमान उड़ाने की जिम्मेदारी मिली।ऐसे बनें अंतरिक्ष यात्रीनील साल 1958 में अमेरिका एयरफोर्स के मैन इन स्पेस सूनेस्ट कार्यक्रम के लिए चुने गए थे। लेकिन यह कार्यक्रम रद्द हो गया। सिविलयन टेस्ट पायलट होने की वजह से नील अंतरिक्ष यात्री होने की योग्यता नहीं रखते थे। साल 1962 में प्रोजेक्ट जेमिनी के लिए आवेदन मंगाए थे, जिसके लिए सिविलियन टेस्ट पायलटों को योग्य माना गया था। सितंबर 1962 को नील को नासा बुलाया गया और वह नासा एरोनॉट्सकॉर्प के लिए चुने गए। नील इस समूह में चुने गए दो सिविलियन पायलट में से एक थे। इसके बाद वह जेमिनी अभियान के तहत तीन बार अंतरिक्ष गए।अपोलो 1 अभियान के बाद नील 18 अंतरिक्ष यात्रियों के दल में शामिल हो गए, जिसे चंद्रमा पर जाता था। एक बार लूनार लैंडिंग के अभ्यास के समय जब उनका विमान उतर रहा था, तो सही समय पर पैराशूट खोलने के कारण वह बाल-बाल बच गए थे। फिर अपोलो 11 के क्रू के लिए नील आर्मस्ट्रॉन्ग को कमांडर चुना गया।मृत्युबता दें कि नील आर्मस्ट्रॉन्ग 20 जुलाई 1969 को चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति बनें। इसके बाद पृथ्वी पर लौटने के बाद वह दो साल तक नासा पर रहे। इसके बाद नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने ओहिया में इंजीनियरिंग का शिक्षण कार्य किया। फिर साल 1980 में उन्होंने शिक्षण कार्य भी छोड़ दिया। वहीं 25 अगस्त 2012 को 82 साल की उम्र में नील आर्मस्ट्रॉन्ग का ओहिया में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 26 Aug 2025 04:31:04 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Singer KK Birth Anniversary: म्यूजिक की ट्रेनिंग लिए बिना सिंगिंग की दुनिया के बेताज बादशाह थे केके</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड के फेमस प्लेबैक सिंगर केके का 23 अगस्त को जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम कृष्णकुमार कुन्नथ है। वह इंडस्ट्री के टॉप सिंगर में से थे। सिंगर केके का जीवन काफी सरल था और उन्होंने कई फिल्मों में हिट गाने दिए थे। भले ही आज केके हमारे साथ नहीं हैं, लेकिन उनके गाने लोगों की जुबान और दिल के करीब रहते हैं। केके को सिंगिंग की दुनिया का बेताज बादशाह कहा जाता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने कभी गाना सीखा नहीं था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर केके के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारदिल्ली में 23 अगस्त 1968 को केके का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली के माउंट सेंट मेरी स्कूल से की है और किरोड़ीमल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था। फिल्मों से ब्रेक मिलने से पहले केके ने करीब 35000 जिंगल्स गाए थे। साल 1999 में क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान भारतीय टीम को सपोर्ट करने के लिए &#039;जोश ऑफ इंडिया&#039; गाना गाया था। केके के गाने में कई भारतीय क्रिकेटर भी नजर आए थे।इसे भी पढ़ें: Shammi Kapoor Death Anniversary: पर्दे पर मस्तमौला पर असल में &#039;गुस्सैल&#039; थे शम्मी कपूर, जानिए अनसुने किस्सेकरियरइसके बाद केके ने म्यूजिक एल्बम &#039;पल&#039; से बतौर गायक अपने करियर की शुरूआत की थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि सिनेमा जगत को हिट गाने देने वाले केके ने अपने पूरे जीवन में कभी भी सिंगिंग की ट्रेनिंग नहीं ली थी। केके हमेशा से आरडी बर्मन और किशोर कुमार से प्रेरित थे। उन्होंने सलमान खान और ऐश्वर्या राय की फेमस फिल्म हम दिल दे चुके सनम का गाना &#039;तड़प-तड़प&#039; गाया है। इस गाने से सिंगर की जिंदगी बदल गई थी। साल 2000 में इन गाने के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था। फिल्मों के अलावा उन्होंने &#039;शाका लाका बूम बूम&#039;, &#039;काव्यांजली&#039;, &#039;जस्ट मोहब्बत&#039;, &#039;हिप-हिप हुर्रे&#039; जैसे शो के टाइटल गाने भी गाए थे।मृत्युकोलकाता के एक म्यूजिक इवेंट में 31 मई 2022 को केके परफॉर्म कर रहे थे। जब वह परफॉर्मेंस करने के बाद होटल पहुंचे, तो बेहोश होकर बिस्तर पर गिर गए। उसके बाद उनको जब हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, तो डॉक्टरों ने उनको मृत घोषित कर दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 25 Aug 2025 04:31:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ustad Bismillah Khan Death Anniversary: शहनाई के जादूगर कहे जाते थे उस्ताद बिस्मिल्ला खां, जानिए कुछ रोचक तथ्य</title>
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<description><![CDATA[ शहनाई के शहंशाह उस्ताद बिस्मिल्ला खान आज ही के दिन यानी की 21 अगस्त को इस दुनिया से रुखसत हो गए थे। उन्होंने शहनाई को पूरी दुनिया में नई पहचान देने का काम किया था। वहीं उस्ताद बिस्मिल्ला खां का परिवार पिछली पांच पीढ़ियों से शहनाई वादन के क्षेत्र में असरदार हैसियत रखता है। उन्होंने छोटी उम्र से ही शहनाई बजाना सीख लिया था, वहीं जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनकी शहनाई को भी सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उस्ताद बिस्मिल्ला खां के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबिहार के डुमराव जिले में 21 अगस्त 1916 को उस्ताद बिस्मिल्ला खां का जन्म हुआ था। वहीं जब वह 6 साल के थे, तो अपने पिता पैगंबर खां के साथ वाराणसी आ गए थे। यहां पर उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और शांतिनिकेतन से अपनी शिक्षा पूरी की थी। शहनाई वादन बिस्मिल्ला खां साहब को विरासत में मिला था। दरअसल, उनके परिवार के लोगों को शुरूआत से ही राग दरबारी बजाने में महारत हासिल थी। इसे भी पढ़ें: Shammi Kapoor Death Anniversary: पर्दे पर मस्तमौला पर असल में &#039;गुस्सैल&#039; थे शम्मी कपूर, जानिए अनसुने किस्सेस्वतंत्रता दिवस पर सुनाई देती है शहनाई की गूंजहर साल स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री के भाषण के बाद आज भी बिस्मिल्ला खां की शहनाई की गूंज सुनाई देती है। यह परंपार देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू से समय से चली आ रही है। इसके अलावा दूरर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून में भी बिस्मिल्ला खां की शहनाई सुनाई देती है। पुरस्कारमहज 14 साल की उम्र में प्रयागराज में संगीत परिषद में बिस्मिल्ला खां ने अपनी शहनाई से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। साल 2001 में उनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। इससे पहले साल 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, साल 1968 में पद्म भूषण और साल 1980 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा साल 1930 में बिस्मिल्ला खां को ऑल इंडिया म्यूजिक कॉफ्रेंस में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का पुरस्कार मिला था। एमपी सरकार ने सर्वोच्च संगीत पुरस्कार &#039;तानसेन&#039; की पदवी से बिस्मिल्ला खां को सम्मानित किया था।डॉक्ट्रेट की उपाधिउस्ताद बिस्मिल्लाह खां को संगीत की लोकधुनें बजाने में महारत हासिल थी। इनमें से &#039;झूला&#039;, &#039;बजरी&#039;, &#039;चैती&#039; जैसी कठिन और प्रतिष्ठित धुनों पर अपनी पकड़ बनाने के लिए बिस्मिल्ला खां ने कठोर तपस्या की थी। इसके साथ ही उन्होंने क्लासिकल और मौसिकी में भी शहनाई को सम्मान दिलाया था। उन्होंने अपनी काबिलियत से शहनाई को संगीत के शिखर पर पहुंचाया था। शांतिनिकेतन और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उनको डॉक्ट्रेट की उपाधि से नवाजा गया था।मृ्त्युवह अपना सारा पैसा परिवार और जरूरतमंदों पर खर्च कर देते थे। जिस कारण बाद में उनको आर्थिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ा था। तब सरकार ने आगे आकर बिस्मिल्ला खां की मदद की थी। वहीं 21 अगस्त 2006 को उस्ताद बिस्मिल्ला खां का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 22 Aug 2025 04:31:25 +0530</pubDate>
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<title>Rajiv Gandhi Birth Anniversary: पायलट की कुर्सी छोड़ भारत के सबसे युवा PM बने राजीव गांधी, ऐसा रहा सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 20 अगस्त को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी का जन्म हुआ था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने थे। वह 40 साल की उम्र में भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने थे। राजीव गांधी पेशे से पायलट थे, उनको राजनीति में रुचि नहीं थी। लेकिन एक हादसे के बाद उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया था। राजीव गांधी को आधुनिक भारत के अग्रणी नेताओं में गिना जाता है। भले ही आज राजीव गांधी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका विजन आज भी लोगों को प्रेरणा देता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजीव गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 20 अगस्त 1944 को राजीव गांधी का जन्म हुआ था। इनके पिता फिरोज गांधी और मां इंदिरा गांधी थे। लेकिन राजीव गांधी को राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी। जन्म के बाद राजीव गांधी अपनी मां और पिता फिरोज गांधी के साथ लखनऊ आ गए थे। लेकिन जब जवाहर लाल नेहरू पीएम बनें तो इंदिरा और फिरोज गांधी भी दिल्ली आ गए। ऐसे में राजीव गांधी का बचपन उनके नाना यानी की पंडित जवाहर लाल नेहरू के सरकारी आवास तीन मूर्ति हाउस में बीता।इसे भी पढ़ें: Dr Shankar Dayal Sharma Birth Anniversary: डॉ शंकर दयाल शर्मा ने तय किया था स्वतंत्रता संग्राम से राष्ट्रपति भवन तक सफरऐसे बनें प्रधानमंत्रीबता दें कि राजीव गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने साल 1984 में अपनी मां और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की बागडोर संभाली थी। साल 1984 से 1989 तक उन्होंने भारत में तकनीकी विकास, शिक्षा और आर्थिक सुधारों में अहम प्रगति की थी। साल 1986 में राजीव गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया। वहीं तकनीकी क्षेत्र में कंप्यूटर क्रांति की नींव रखी थी। इसके अलावा देश की विविध आबादी के बीच राजीव गांधी ने एकता और शांति को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए।स्वभाव से गंभीर राजीव गांधी चाहते थे कि देश तकनीकी दृष्टि से दुनिया का सर्वोत्तम देश बने। इसके लिए उन्होंने काफी प्रयास भी किए। हालांकि इसके साथ ही उनका राजनीतिक जीवन काफी विवादों भरा भी रहा। राजीव गांधी के समय भोपाल गैस त्रासदी और बोफोर्स घोटाला सामने आया। फिर शाहबानो केस में भी उनकी काफी किरकिरी हुई थी। इसके साथ ही साल 1986 में हुए कश्मीर के दंगे भी राजीव गांधी के दामन में दाग लगा गए।मृत्युवहीं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई 1991 के एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 21 Aug 2025 04:31:10 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dr Shankar Dayal Sharma Birth Anniversary: डॉ शंकर दयाल शर्मा ने तय किया था स्वतंत्रता संग्राम से राष्ट्रपति भवन तक सफर</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने देश को बहुत सारे बहुमूल्य नेता दिए। जिनमें से एक डॉ शंकर दयाल शर्मा भी हैं। वह देश के स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। आज ही के दिन यानी की 19 अगस्त को डॉ शंकर दयाल शर्मा का जन्म हुआ था। उन्होंने अपने सरल स्वभाव से सभी लोगों का मन जीता। जिसके कारण वह हमेशा देश के स्वीकार्य नेता रहे। डॉ दयाल गांधीवादी की तरह अपने विरोधियों को अपने उदार व्यवहार से जीत लेते थे। डॉ दयाल मध्य प्रदेश सरकार के कई विभागों में कैबिनेट मंत्री रहे। इसके अलावा वह कई राज्यों के राज्यपाल, केंद्र सरकार में मंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष और फिर देश के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति पद तक पहुंचे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ शंकर दयाल शर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामध्यप्रदेश के भोपाल में एक ब्राह्मण परिवार में 19 अगस्त 1918 को शंकर दयाल शर्मा का जन्म हुआ था। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने छात्र जीवन में बेहतरीन एथलीट हुआ करते थे। वह क्रॉस कंट्री धावक होने के साथ ही विजेता तैराक भी रहे थे। साल 1940 में उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई में भाग लेते हुए अपना राजनैतिक जीवन शुरूकर दिया था। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, आगरा कॉलेज और लखनऊ यूनिवर्सिटी जैसे देश के कई उच्च संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की थी। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत साहित्य में प्रथम स्थान हासिल किया। उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के फिट्जविलियम कॉलेज पीएचडी की उपाधि हासिल की।इसे भी पढ़ें: Vijay Lakshmi Pandit Birth Anniversary: नारी शक्ति की प्रतीक थी विजयलक्ष्मी पंडित, ब्रिटिश राज में रचा था इतिहासआजादी के लिए संघर्षसाल 1940 में डॉ शर्मा ने कानून की प्रैक्टिस शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता हासिल की थी और राजनीति में आए। इस दौरान डॉ शर्मा गिरफ्तार होकर 8 महीनों के लिए जेल चले गए। भारत की आजादी के बाद भोपाल के नवाब ने आजाद रहने का ऐलान किया। तब डॉ शर्मा ने भोपाल के नवाब के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया और साल 1948 में नवाब ने उनको गिरफ्तार कर लिया। हालांकि जनता के दबाव के बाद नवाब ने उनको छोड़ दिया। फिर 30 अप्रैल 1949 को नवाब भोपाल के भारत में विलय पर सहमत हो गए।भोपाल और मध्यप्रदेश की सेवासाल 1952 में डॉ शर्मा में भोपाल स्टेट के पहले मुख्यमंत्री बनें। वह साल 1956 तक इस पद पर काबिज रहे। इसके बाद वह कांग्रेस और उसकी सरकारों पर विभिन्न पदों पर काबिज रहे। साल 1956 से लेकर 1971 तक वह मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे और कई पदों पर रहे।राजनीति में प्रवेशसाल 1960 में डॉ शर्मा ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया और फिर वह राष्ट्रीय राजनीति में आ गए। साल 1971 में वह भोपाल सीट से लोकसभा सदस्य बने। फिर साल 1972 में वह कांग्रेस अध्यक्ष बने। फिर साल 1974 में तीन साल तक संचार मंत्री बने। इसके बाद साल 1980 में उन्होंने भोपाल लोकसभा सीट से जीत हासिल की थी।राज्यपाल से राष्ट्रपति पद तकसाल 1984 के बाद बहुत से राज्यों के वह राज्यपाल बने। पहले वह आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बने और इस दौरान सिख आतंकियों ने बेटी गीतांजली माकन और दामाद ललित माकन की हत्या कर दी थी। साल 1985 में वह पंजाब के राज्यपाल बनाए गए। लेकिन जल्द ही वह साल 1986 में महाराष्ट्र के राज्यपाल बनाए गए। यह डॉ शंकर दयाल शर्मा का आखिरी राज्यपाल पद था। फिर साल 1987 में भारत के 8वें उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति चुने गए। फिर साल 1992 में वह भारत के 9वें राष्ट्रपति बने।मृत्युवहीं 26 दिसंबर 1999 को हृदय घात के कारण डॉ शंकर दयाल शर्मा का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 04:31:05 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bajirao I Birth Anniversary: दूर&#45;दूर तक सुनाई देती थी बाजीराव प्रथम के जौहर की ध्वनि, जीवन में नहीं हारे एक भी युद्ध</title>
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<description><![CDATA[ बाजीराव प्रथम न सिर्फ एक महान योद्धा बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी थे। बड़े-बड़े सूरमा बाजीराव के सामने पानी मांगते थे। बाजीराव महज 20 साल की उम्र में पेशवा बन गए थे। बता दें कि पिता के निधन के बाद उनको यह जिम्मेदारी छत्रपति शाहूजी महाराज ने सौंपी थी। इसके बाद बाजीराव ने जो करतब दिखाए कि उनके जौहर की ध्वनि दूर-दूर तक सुनी जाने लगी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बाजीराव प्रथम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि 18 अगस्त 1700 को बाजीराव प्रथम का जन्म हुआ था। बाजीराव को मराठा समुदाय आज भी बहुत सम्मान से देखता है। उनको युद्ध कौशल पिता से विरासत में मिला था। उन्होंने बचपन से ही ट्रेनिंग लेना शुरूकर दिया था। जब बाजीराव मराठा साम्राज्य के पेशवा नियुक्त हुए, तो उनका हर कौशल निखरता चला गया। बाजीराव ने दो कार्य बड़ी मजबूती से किए, जिनमें से एक मराठा साम्राज्य का विस्तार और दूसरा हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अनेक प्रयास किए।इसे भी पढ़ें: Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य तिलक ने उठाई थी पूर्ण स्वराज की मांग, क्रांति की ज्वाला से दहल उठा था ब्रिटिश राजपेशवा बने बाजीरावजब बाजीराव पेशवा बने तो भारत में मुगल सक्रिय थे, वहीं पुर्तगालियों और अंग्रेजों का दबाव बढ़ने लगा था। इसके बाद भी बाजीराव न तो डरे और न ही डिगे। वह अपने बनाए मार्ग पर चलते रहे और मराठा साम्राज्य की नीतियों के मुताबिक ताबड़तोड़ फैसले करते करे। वह लगातार युद्ध लड़ते रहे और जीतते रहे। बाजीराव के इसी कौशल और रणनीति के कारण मराठा साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत तक हुआ।हर युद्ध में मिली जीतबाजीराव ने पालखी का युद्ध जीता और इसमें मुगलों की हार हुई और मराठा साम्राज्य का विस्तार दक्षिण भारत में हुआ। वहीं मालवा पर विजय पाने के लिए बाजीराव को करीब 2 साल तक युद्ध लड़ना पड़ा। मालवा का युद्ध 1729 से 1731 तक चला। यहां पर भी मुगलों को हार मिली और बाजीराव ने मराठा साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत में किया। साल 1737 में बाजीराव भोपाल पर हमला कर बैठे। यहां पर भी मुगलों को हराया और संधि कर मध्य भारत में भी मराठा साम्राज्य की स्थापना को बल दिया। इसी साल बाजीराव ने दिल्ली पर हमला बोला और मुगलों को हिला दिया।बाजीराव खुद के शानदार घुड़सवार थे, इसी कारण वह दुश्मन सेना के इरादे को खत्म कर देती थी। वह दुश्मन की कमजोरियों पर हाथ रखते थे। बाजीराव सीधे आक्रमण से बचते थे, इससे विरोधी कमजोर हो जाते थे और बाजीराव जीत जाते थे। पेशवा के रूप में वह न सिर्फ युद्ध जीतने में माहिर थे, बल्कि वह मराठा साम्राज्य की आर्थिक स्थिति को ठीक रखने के लिए तमाम प्रशासनिक उपाय करते थे।मृत्युलगातार युद्धों में व्यस्त रहने के कारण वह अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह दिखते थे। इसी कारण अज्ञात बुखार की वजह से 4-5 दिन के बाद 28 अप्रैल 1740 को उनका निधन हो गया था। बता दें कि मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के रावरखेड़ी नामक जगह पर बाजीराव ने आखिरी सांस ली। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 04:31:07 +0530</pubDate>
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<title>Vijay Lakshmi Pandit Birth Anniversary: नारी शक्ति की प्रतीक थी विजयलक्ष्मी पंडित, ब्रिटिश राज में रचा था इतिहास</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पुरुषों के अलावा महिलाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। उस समय जब महिलाएं पर्दे के पीछे रहा करती थीं, तब कुछ महिलाओं ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आजादी की लड़ाई लड़ी थी। ऐसी ही एक महिला विजयलक्ष्मी पंडित थीं। वह एक ऐसी स्वतंत्रता सेनानी थीं, जोकि आजादी की लड़ाई में कई बार जेल यात्रा कर चुकी थीं। विजय लक्ष्मी पंडित देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन थीं। वह पहली महिला थीं, जिन्होंने समाज में भारतीय महिला शक्ति की एक नई पहचान बनाई थी। आज ही के दिन यानी की 18 अगस्त को विजय लक्ष्मी पंडित का जन्म हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित विजय लक्ष्मी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारइलाहाबाद में 18 अगस्त 1900 को विजयलक्ष्मी पंडित का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू और मां का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। विजय लक्ष्मी ने घर आनंद भवन से अपनी शिक्षा प्राप्त की। फिर साल 1921 में उनका विवाह काठियावाड़ के सुप्रसिद्ध वकील रंजीत सीताराम पंडित से हुआ। शादी के बाद से विजयलक्ष्मी लगातार सुर्खियों में बनी रहीं।इसे भी पढ़ें: Sri Aurobindo Birth Anniversary: क्रांतिकारी और योगी थे श्री अरबिंदो घोष, स्वतंत्रता संग्राम में दिया था अहम योगदानराजनीतिक सफरखुद को आजादी की जंग में झोंकने वाली विजय लक्ष्मी पंडित ने राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। साल 1935 में भारत सरकार अधिनियम लागू हुआ और साल 1937 में इस कानून के तहत कई प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी। इस दौरान विजय लक्ष्मी पंडित को यूपी प्रांत का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। ब्रिटिश राज में कैबिनेट मंत्री का पद पाने वाली विजय लक्ष्मी पंडित पहली महिला थीं। उन्होंने अपने संघर्षों से देश और विदेश में पहचान बनाई थी।महिलाओं के हक की लड़ाईविजयलक्ष्मी पंडित ने महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ने में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए काफी संघर्ष किया। साल 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बनाने विजयलक्ष्मी ने काफी प्रयास किया। इसके बाद ही महिलाओं को अपने पिता और पति की संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त हो सका। इसके अलावा उन्होंने साल 1952 में चीन जाने वाले सद्भावना मिशन का नेतृत्व किया था।मृत्युवहीं 01 दिसंबर 1990 को विजयलक्ष्मी पंडित का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 04:31:07 +0530</pubDate>
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<title>Muhammad Zia ul Haq Death Anniversary: जिया उल हक ने किया था भुट्टो का तख्तापलट, पाकिस्तान को भुगतनी पड़ रही विरासत</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 17 अगस्त को पाकिस्तान के तानाशाह और छठे राष्ट्रपति रहे जनरल जिया उल हक की प्लेन क्रैश में मौत हो गई थी। आज भी उनकी मौत पर रहस्य बना हुआ है। जनरल जिया उल हक ने करीब एक दशक तक पाकिस्तान में शासन किया है। उस प्लेन क्रैश में 30 लोग मौजूद थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व वाली सरकार को जनरल जिया उल हक के नेतृत्व में उखाड़ फेंका गया और सैन्य शासन का दौर शुरू हुआ। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जनरल जिया उल हक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारभारत के पंजाब प्रांत के जालंधर में 12 अगस्त 1924 को मुहम्मद जिया-उल-हक का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से पूरी की थी। वहीं साल 1947 में जब दोनों देशों का बंटवारा हुआ, तो जिया उल हक पाकिस्तान चले गए। उन्होंने भारत के खिलाफ दो जंग भी लड़ी थीं।इसे भी पढ़ें: Muhammad Zia-ul-Haq Birth Anniversary: पाकिस्तान के चौथे फौजी तानाशाह और छठे राष्ट्रपति थे जिया उल हकडिवीजनल कमांडर से सेना प्रमुखदरअसल, साल 1973 में प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो मुल्तान यात्रा पर गए थे। उस दौरान जिया उल हक सेना में डिवीजनल कमांडर थे। उन्होंने तत्कालीन पीएम के स्वागत में तमाम सैनिकों को सड़कों पर उतार दिया और पीएम भुट्टो की कार पर फूल फेंके गए। इस मेहमानवाजी से पीएम भुट्टो बेहद खुश हुए। वहीं जिया उल हक ने पीएम भुट्टो की खूब आवभगत की। वहीं साल 1976 में टिक्का खान के रिटायरमेंट के बाद से सेना प्रमुख की कुर्सी खाली थी।ऐसे में जुल्फिकार भुट्टो ने ऐसे व्यक्ति को सेना प्रमुख बनाने की सोची, जो उनकी बात सुनें। इस पद के लिए भुट्टो को जिया उल हक एकदम फिट थे और इस तरह से उनको सेना प्रमुख बनाया गया। लेकिन 05 जुलाई 1977 को जनरल जिया उल हक ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो का तख्ता पलट कर उन्हें जेल में डाल दिया। इसी दिन जिया उल हक ने मार्शल लॉ लागू कर दिया। वहीं 18 मार्च 1978 को जुल्फिकार भुट्टो को हत्या के मामले में दोषी पाया गया और फांसी की सजा सुनाई गई। जिसके बाद 04 अप्रैल 1979 को जुल्फिकार भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया गया।पाकिस्तान में शरिया लागूपाकिस्तान में जुल्फिकार भुट्टो का तख्तापलट करने के बाद खुद राष्ट्रपति बने जिया उल हक ने देश का इस्लामीकरण करना शुरू कर दिया। उन्होंने पाकिस्तान में शरिया लागू कर दी। क्योंकि उनका मानना था कि पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना है, ऐसे में वह तभी तक जिंदा रहेगा, जब तक इस्लाम से जुड़ा रहेगा। साल 1978 से लेकर 1985 तक उन्होंने पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र में बदलने के लिए वह सब किया, जोकि किया जा सकता था।मृत्युवहीं पाकिस्तान के बहावलपुर एयरबेस से 17 अगस्त 1988 को एक विमान उड़ा। इस विमान में जनरल जिया उल हक और उनके साथ पाकिस्तान के सीनियर अफसर भी मौजूद थे। इसके अलावा इस विमान में अमेरिकी राजदूत आर्नल्ड रफेल थे। लेकिन एयरबेस से 18 किमी दूर यह विमान क्रैश हो गया। इस विमान में मौजूद सभी लोगों की मौत हो गई।बता दें कि पाकिस्तान के इतिहास में राष्ट्रपति या सैन्य तानाशाह के रूप में जिया उल हक का कार्यकाल सबसे लंबा रहा है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि अपने कार्यकाल में जनरल जिया उल-हक ने जो कुछ किया था, उसका नतीजा आज तक पाकिस्तान को भुगतना पड़ रहा है। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 04:31:07 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Muhammad, Zia, Haq, Death, Anniversary:, जिया, उल, हक, ने, किया, था, भुट्टो, का, तख्तापलट, पाकिस्तान, को, भुगतनी, पड़, रही, विरासत</media:keywords>
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<title>Ramakrishna Paramahamsa Death Anniversary: महज 6 साल की उम्र में मिला था ईश्वरीय अनुभव, ऐसे बने परमहंस</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 16 अगस्त को भारत के महान संत, आध्यात्मिक गुरु और विचारक रामकृष्ण परमहंस ने अपनी देह त्याग दी थी। वह मां काली के प्रति गहरी श्रद्धा और आस्था रखते थे। उन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। रामकृष्ण परमहंस ने ईश्वर के दर्शन के लिए कम उम्र से ही कठोर साधना और भक्ति करनी शुरूकर दी थी। बताया जाता है कि उनको मां काली के साक्षात् दर्शन भी हुए थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबंगाल के कामारपुकुर गांव में फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष में द्वितीय तिथि को 18 फरवरी 1836 को रामकृष्ण परमहंस का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। उनके पिता के देहांत के बाद 12 साल की उम्र में गदाधर चट्टोपाध्याय ने बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। हालांकि कुशाग्र बुद्धि होने की वजह से गदाधर चट्टोपाध्याय ने रामायण, महाभारत, पुराण और भगवद् गीता कंठस्थ हो गई थी।इसे भी पढ़ें: Sri Aurobindo Birth Anniversary: क्रांतिकारी और योगी थे श्री अरबिंदो घोष, स्वतंत्रता संग्राम में दिया था अहम योगदानपहला आध्यात्मिक अनुभवबता दें कि रामकृष्ण परमहंस जब 6-7 साल के थे। तब उनको आध्यात्मिक अनुभव हुआ था। एक दिन सुबह के समय वह धान की संकरी पगडंडियों पर चावल के मुरमुरे खाते हुए जा रहे थे। उसी समय मौसम ऐसा हो गया, जैसे घनघोर वर्षा होने वाली है। तभी उन्होंने देखा कि बादलों की चेतावनी के खिलाफ सारस पक्षी का एक झुंड भी उड़ान भर रहा था। उस प्राकृतिक मनमोहक दृश्य में में रामकृष्ण परमहंस की सारी चेतना समा गई और उनको खुद की कोई सुधबुध नहीं रही और अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस का यह पहला आध्यात्मिक अनुभव था। जिससे उनके आगे की आध्यात्मिक दिशा तय हुई। इस तरह से कम उम्र में ही रामकृष्ण परमहंस का झुकाव धार्मिकता और आध्यात्म की ओर हुआ।मां काली के अनन्य भक्तमहज 9 साल की उम्र में रामकृष्ण परमहंस का जनेऊ संस्कार हुआ था। इसके बाद वह धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ करने व कराने के योग्य हो गए थे। रानी रासमणि द्वारा कोलकाता के बैरकपुर में हुगली नदी के किनारे दक्षिणेश्वर काली मंदिर बनवाया गया। इस मंदिर की देखभाल की जिम्मेदारी रामकृष्ण के परिवार को मिली थी। इस तरह से रामकृष्ण परमहंस भी मां काली की सेवा करने लगे और साल 1856 में उनको इस मंदिर का मुख्य पुरोहित नियुक्त किया गया था। इसके बाद वह मां काली की साधना में पूरी तरह से रम गए। माना जाता है के रामकृष्ण परमहंस को मां काली के दर्शन भी हुए थे।मृत्युअपने जीवन के अंतिम दिनों में स्वामी रामकृष्ण समाधि की स्थिति में रहने लगे थे। उनके गले में कैंसर बन गया था और डॉक्टरों ने उनको समाधि लेने से मना किया था। लेकिन रामकृष्ण परमहंस अपना इलाज नहीं करवाना चाहते थे। इलाज के बाद भी लगातार उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। वहीं 16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण परमहंस ने अंतिम सांस ली। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 17 Aug 2025 04:30:38 +0530</pubDate>
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<title>Sri Aurobindo Birth Anniversary: क्रांतिकारी और योगी थे श्री अरबिंदो घोष, स्वतंत्रता संग्राम में दिया था अहम योगदान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 अगस्त को महान क्रांतिकारी और योगी श्री अरबिंदो का जन्म हुआ था। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के लिए जनमानस को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी। वहीं इस दौरान उनको जेल यात्रा भी करनी पड़ी थी। वह साल 1910 के के प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। इसके अलावा श्री अरबिंदो एक भारतीय दार्शनिक, योगी, कवि और भारतीय राष्ट्रवादी थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महान क्रांतिकारी और योगी श्री अरबिंदो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकलकत्ता में 15 अगस्त 1872 को श्री अरबिंदो का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कृष्णधन घोष था। जोकि एक समृद्ध डॉक्टर थे। जब वह सात वर्ष के थे, तो उनको अपने भाइयों के साथ इंग्लैंड भेजा गया था। क्योंकि उनके पिता की इच्छा थी कि वह प्रशासनिक सेवा की प्रतियोगिता में भाग लें और भारत वापस आने के बाद उच्च पद पर कार्य करें। श्री अरबिंदो को गुजराती, मराठी, बंगला और संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान था।हालांकि पिता की इच्छा होने की वजह से उन्होंने परीक्षा दी, लेकिन उनकी इसमें रुचि नहीं थी। ऐसे में श्री अरबिंदो जानबूझकर घुड़सवारी की परीक्षा देने नहीं गये। दरअसल, उनका इस परीक्षा में सम्मिलित न होने का कारण अंग्रेजों की नौकरी के प्रति उनकी घृणा भावना थी।इसे भी पढ़ें: Bhikaji Cama Death Anniversary: भीकाजी कामा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विदेशी धरती पर फहराया था भारत का झंडास्वाधीनता संग्रामश्री अरबिंदो ने &#039;वंदे मातरम&#039; नामक अखबार का प्रकाशन किया। इस समाचार पत्र के जरिए उन्होंने तत्कालीन जनमानस को स्वाधीनता संग्राम के लिए तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इस समाचार पत्रों में उनके संपादकीय लेखों ने उन्हें अखिल भारतीय ख्याति दिला दी। उस दौरान अंग्रेज कहते थे कि वंदे मातरम की एक-एक पंक्ति में राजद्रोह भरा है। जिसको इतनी चालाकी से छिपाया गया है कि उस पर मुकदमा नहीं चल सकता।फिर साल 1908 से लेकर 1909 तक अंग्रेज सरकार ने श्री अरबिंदो को अलीपुर जेल में रखा था। इस दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने ध्यान, धारणा और योगाभ्यास को समय दिया। जेल में रहते हुए उन्होंने भारतीय दर्शन और वेदों का अध्ययन भी किया जिसके बाद वे योगी बन गए। वहीं जेल से बाहर आने के बाद वह कोलकाता छोड़कर पुडुचेरी रहने के लिए चले गए। वहीं योगी बनने के बाद उन्होंने पुडुचेरी में आश्रम स्थापित कर लिया था। उन्होंने 40 सालों तक पुडुचेरी में रहकर पृथ्वी पर दिव्य जीवन के लिये प्रसार किया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 16 Aug 2025 04:30:33 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Sri, Aurobindo, Birth, Anniversary:, क्रांतिकारी, और, योगी, थे, श्री, अरबिंदो, घोष, स्वतंत्रता, संग्राम, में, दिया, था, अहम, योगदान</media:keywords>
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<title>Shammi Kapoor Death Anniversary: पर्दे पर मस्तमौला पर असल में &amp;apos;गुस्सैल&amp;apos; थे शम्मी कपूर, जानिए अनसुने किस्से</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 14 अगस्त को बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेताओं में शुमार शम्मी कपूर का निधन हुआ था। अभिनेता को अपनी शानदार अभिनय कला के लिए जाना जाता था। शम्मी कपूर को भारत का एल्विस प्रेस्ली भी कहा जाता है। हालांकि पर्दे पर मस्तमौला किरदार से दर्शकों का दिल जीतने वाले शम्मी कपूर असल जिंदगी में काफी गुस्सैल मिजाज के थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता शम्मी कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि 14 अगस्त 1931 को शम्मी कपूर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम पृथ्वीराज कपूर था। इनका असली नाम शमशेर राज कपूर था। कपूर खानदान में जन्मे शम्मी कपूर को अभिनय विरासत में मिला था। ऐसे में शम्मी कपूर ने पृथ्वी थिएटर में अभिनय के गुर सीखे थे।इसे भी पढ़ें: Sridevi Birth Anniversary: बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरस्टार थीं श्रीदेवी, हीरो से ज्यादा चार्ज करती थी पैसेपहली फिल्मसाल 1953 में फिल्म जीवन ज्योति से शम्मी कपूर ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा था। उनकी पहली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुई। फिर साल 1957 में आई फिल्म &#039;तुमसा नहीं देखा&#039; से शम्मी कपूर को हिंदी सिनेमा में असली पहचान मिली थी।मनवाया अभिनय का लोहाअभिनेता शम्मी कपूर ने फिल्म &#039;दिल देके देखो&#039;, &#039;कॉलेज गर्ल&#039;, &#039;चाइना टाउन&#039;, &#039;सिंगापुर&#039;, &#039;जंगली&#039;, &#039;प्रोफेसर&#039;, &#039;कश्मीर की कली&#039;, &#039;प्यार किया तो डरना क्या&#039;, &#039;जानवर&#039;, &#039;तीसरी मंजिल&#039; और &#039;ब्रह्मचारी&#039; जैसी कई हिट फिल्में दी और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। अभिनेता की निजी जिंदगी की बात करें, तो वह काफी गुस्सैल मिजाज के व्यक्ति थे।मृत्युक्रोनिक किडनी डिजीज के कारण 14 अगस्त 2011 को अभिनेता शम्मी कपूर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 15 Aug 2025 04:30:52 +0530</pubDate>
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<title>Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: महाराष्ट्र राजनीति का बड़ा नाम थे विलासराव देशमुख, सरपंच से महाराष्ट्र के सीएम तक का तय किया सफर</title>
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<description><![CDATA[ महाराष्ट्र की राजनीति के लिए 14 अगस्त का दिन बेहद खास है। आज ही के दिन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का निधन हो गया था। वह महाराष्ट्र कांग्रेस के कद्दावर नेता थे। हालांकि उनका जीवन साधारण नहीं था। क्योंकि उन्होंने एक साधारण से लातूर जिले से राजनीति की शुरूआत की और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया था। इस दौरान उनके सामने कई मुश्किलें भी आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विलासराव देशमुख के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...राजनीतिक सफरसाल 1974 में अपने गांव से विलासराव देशमुख ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी। विलासराव देशमुख अपने गांव से पहले सदस्य चुने गए। फिर साल 1974 से लेकर 1979 तक वह सरपंच रहे। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1980 में वह पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा की सीढ़ी चढ़ें। विधायक बनने के बाद साल 1985 से 1990 तक वह राज्यमंत्री के तौर पर उभरे। लेकिन साल 1995 के विधानसभा चुनाव में विलासराव देशमुख को हार का सामना करना पड़ा।इसे भी पढ़ें: Shibu Soren: जंगल से संसद तक —दिशोम गुरु की राजनीतिक दास्तानबता दें कि इस दौरान देश में राममंदिर निर्माण के कारण हिंदुत्व की लहर चल रही थी। जिस कारण विलासराव देशमुख 35 हजार वोटों से हार गए थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वह मदद के लिए सीधे शिवसेना में बालासाहेब ठाकरे के पास पहुंचे। बालासाहेब ठाकरे की मदद से विलासराव देशमुख ने विधान परिषद का चुनाव लड़ा और सीधे मातेश्वरी पहुंचे। वहीं उनकी महाराष्ट्र में पकड़ देखते हुए बालासाहेब भी उनको रोक नहीं पाए और उनका साथ दिया।विलासराव देशमुख ने कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ विधान परिषद का चुनाव लड़ा और इसमें भी उनको हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद उनके मुख्यमंत्री बनने के सभी रास्ते बंद होते नजर आ रहे थे। साल 1999 में भाजपा और शिवसेना गठबंधन सरकार में थी। शिवसेना और भाजपा को रोकने के लिए एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर लड़ाई लड़ी। ऐसे में विलासराव देशमुख ने एक बार फिर साल 1999 में कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की।महाराष्ट्र सीएमइस जीत के बाद 18 अक्तूबर 1999 को विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के मुख्य बनें। वहीं साल 2004 में दोबारा फिर उन्होंने महाराष्ट्र के सीएम के तौर पर अपनी पारी शुरू की। लेकिन यह पारी अधिक दिनों तक नहीं चल पाई। असल, में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकवादी हमले के कारण विलासराव देशमुख को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा।महाराष्ट्र राजनीति पर विलासराव देशमुख की पकड़ को देखते हुए कांग्रेस ने उनको राज्यसभा सदस्य बनाया। फिर 28 मई 2009 को वह केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री बने। जनवरी 2011 से जुलाई 2011 तक वह केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे और फिर उनको विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया गया।मृत्युवहीं लिवर और किडनी की बीमारी के चलते चेन्नई में 14 अगस्त 2012 को विलासराव देशमुख का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 15 Aug 2025 04:30:51 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bhikaji Cama Death Anniversary: भीकाजी कामा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विदेशी धरती पर फहराया था भारत का झंडा</title>
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<description><![CDATA[ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई वीरांगनाओं ने अपने साहस और बलिदान से इतिहास के पन्नों को स्वर्णिम किया है। इनमें से एक भीकाजी कामा का नाम भी बड़े सम्मान से लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 13 अगस्त को भीकाजी कामा का निधन हो गया था। वह एक भारतीय राजनीतिक कार्यकर्ता और महिला अधिकारों की समर्थक थीं। उन्होंने विदेश में रहकर देशसेवा का काम जारी रखा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मैडम भीकाजी रुस्तम कामा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 24 सितंबर 1861 को भीकाजी कामा का जन्म हुआ था। वह शुरूआत से ही तीव्र बुद्धिवाली और संवेदनशील थीं। भीकाजी कामा में लोगों की मदद और सेवा करने की भावना थी। साल 1885 में इनका विवाह पारसी समाज सुधारक रुस्तम जी कामा से हुआ। यह दोनों अधिवक्ता होने के साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। भीकाजी कामा अपने राष्ट्र के विचारों से प्रभावित थीं और उनको यह विश्वास था कि ब्रिटिश लोग भारतीयों के साथ छल कर रहे हैं। इस कारण वह हमेशा भारत की स्वतंत्रता को लेकर चिंतित रहती थीं।इसे भी पढ़ें: Kamla Nehru Birth Anniversary: सादगी और सेवा की मिसाल थीं कमला नेहरू, आजादी की लड़ाई में लिया था बढ़-चढ़कर हिस्साक्रांतिकारी कार्यधनी परिवार में जन्म लेने के बाद भी भीकाजी कामा ने अपने सुखी जीवन वाले वातावरण को तिलांजलि दे दी। उन्होंने साम्राज्य के विरुद्ध क्रांतिकारी कार्यों से उपजे खतरों और कठिनाइयों का सामना किया। भारत में स्वाधीनता के लिए लड़ते हुए भी भीकाजी कामा ने लंबे समय तक निर्वासित जीवन बिताया था। साल 1896 में मुंबई में प्लेग रोग फैल गया, तब उन्होंने तन-मन से गरीबों की सेवा की और इस दौरान वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में गईं। जिसके बाद साल 1902 में वह लंदन आ गईं और यहां से भी उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करना जारी रखा।अलग-अलग देशों रहीं भीकाजी कामा	बता दें कि भीकाजी कामा 33 सालों तक भारत से बाहर रहीं। इस दौरान भीकाजी कामा यूरोप के अलग-अलग देशों में घूमकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के पक्ष में माहौल बनाया। इस दौरान लंदन में उनकी मुलाकात वीर सावरकर, क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा और हरदयाल से हुई। लंदन में रहने के दौरान भीकाजी दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव रहीं। समाचार पत्र &#039;वंदे मातरम&#039; तथा &#039;तलवार&#039; में वह अपने क्रांतिकारी विचार प्रकट करती थीं। बता दें कि आजादी से करीब 4 दशक पहले पहली बार किसी विदेशी सरजमीं पर भारत का झंडा फहराया गया था।वहीं 22 अगस्त 1907 को भीकाजी कामा ने सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में पहली बार विदेशी धरती पर तिरंगा फहराया था। बाद में उनके द्वारा तैयार किए गए ध्वज से काफी ज्यादा मिलती-जुलती डिजाइन को भारत के ध्वज के रूप में अपनाया गया था।मृत्युअपने जीवन से आखिरी दिनों में साल 1935 को भीकाजी कामा 74 साल की उम्र में भारत वापस लौटीं। वहीं 13 अगस्त 1936 को भीकाजी कामा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 14 Aug 2025 04:30:43 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sridevi Birth Anniversary: बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरस्टार थीं श्रीदेवी, हीरो से ज्यादा चार्ज करती थी पैसे</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की हिंदी सिनेमा की पहली फीमेल सुपरस्टार कही जाने वाली श्रीदेवी का 13 अगस्त को जन्म हुआ था। भले की श्रीदेवी आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आज भी उनकी यादें फैंस के दिलों में जिंदा हैं। अगर आज श्री इस दुनिया में होती, तो वह अपना 62वां जन्मदिन मना रही होती। श्रीदेवी इतनी अधिक खूबसूरत थीं, जिन्होंने कई लोगों की अपनी खूबसूरती और अभिनय प्रतिभा से लट्टू बनाया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस श्रीदेवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के मीनमपट्टी गांव में 13 अगस्त 1963 को श्रीदेवी का जन्म हुआ था। हालांकि उनका बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था। क्योंकि उन्होंने कम उम्र में फिल्मी दुनिया में कदम रखा था। श्रीदेवी ने अपनी मेहनत, डेडिकेशन और बेहतरीन अदाकारी के दम पर बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरस्टार बनीं।इसे भी पढ़ें: Marilyn Monroe Death Anniversary: तीन शादियों के बाद भी प्यार को तरसती रहीं मर्लिन मुनरो, आज भी राज है एक्ट्रेस की मौतफिल्मी करियरजिस उम्र में बच्चे खेलते हैं और स्कूल जाते हैं, वहीं महज 4 साल की उम्र में श्रीदेवी ने कैमरे के सामने अभिनय करना शुरूकर दिया था। उन्होंने पहला अभिनय तमिल फिल्म &#039;कंधन करुणई&#039; में एक बाल कलाकार के तौर पर किया था।तमिल फिल्मों में सफल शुरुआत के बाद एक्ट्रेस से 9 साल की उम्र में हिंदी फिल्म &#039;मेरा नाम रानी&#039; से बॉलीवुड में एंट्री की थी। श्री की बचपन से ही अभिनय की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह किरदार में ढल जाती थीं।सुपरस्टारडम की शुरुआतसाल 1979 में एक्ट्रेस ने हिंदी सिनेमा में &#039;सोलहवां सावन&#039; से अभिनेत्री के रूप में खुद को स्थापित कर लिया। लेकिन उनको असली पहचान साल 1983 में आई फिल्म &#039;हिम्मतवाला&#039; से मिली थी। इस फिल्म में श्रीदेवी के डांस और डायलॉग डिलीवरी ने दर्शकों के दिल जीत लिए थे। इसके बाद 80 और 90 का दशक श्रीदेवी के नाम रहा। फिल्मों में श्री की मौजूदगी हिट की गारंटी मानी जाती थी। श्रीदेवी की लोकप्रियता के बल पर निर्माता-निर्देशक फिल्में बनाते थे।हीरो से बड़ी स्टार बनीं श्रीदेवीश्रीदेवी को न सिर्फ दर्शकों से प्यार मिला, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री में भी एक्ट्रेस को एक अलग दर्जा प्राप्त हुआ। जिस दौर में हीरो को फिल्म का केंद्र माना जाता था। उस दौर में श्रीदेवी ने फिल्मों में ऐसे किरदार निभाए, जिनमें पूरी कहानी उनके इर्द-गिर्द घूमती थी।फिल्मेंश्रीदेवी ने अपने फिल्मी करियर में करीब 300 से अधिक फिल्मों में काम किया है। जिनमें &#039;लम्हे&#039;, &#039;चालबाज&#039;, &#039;चांदनी&#039;, &#039;मिस्टर इंडिया&#039;, &#039;जुदाई&#039;, &#039;नगीना&#039; और &#039;खुदा गवाह&#039; जैसी फिल्मों में एक्ट्रेस के रोल को आज भी याद किया जाता है। वहीं शादी और परिवार की जिम्मेदारियां संभालने के बाद अभिनेत्री ने साल 2017 में फिल्म &#039;मॉम&#039; से फिर बड़े पर्दे पर वापसी की थी।मृत्युवहीं 24 फरवरी 2018 को दुबई में एक पारिवारिक समारोह के दौरान बाथटब में डूबने से श्रीदेवी की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 14 Aug 2025 04:30:43 +0530</pubDate>
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<title>Muhammad Zia&#45;ul&#45;Haq Birth Anniversary: पाकिस्तान के चौथे फौजी तानाशाह और छठे राष्ट्रपति थे जिया उल हक</title>
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<description><![CDATA[ पाकिस्तान में सेना ने कई बार तख्तापलट किया है। आज हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के सबसे ताकतवर नेता की, जिसने तख्तापलट करके प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो से सत्ता छीन ली थी। वह और कोई नहीं बल्कि जनरल जिया उल हक थे। आज ही के दिन यानी की 12 अगस्त को मुहम्मद जिया उल हक का जन्म हुआ था। प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो ने खुद जिया उल हक को सेना प्रमुख के पद पर पदोन्नत किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुहम्मद जिया उल हक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षापंजाब के जालंधर में 12 अगस्त 1924 को जिया उल हक का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से की थी। वहीं देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान में जाकर बस गया।इसे भी पढ़ें: Pervez Musharraf Birth Anniversary: राजद्रोह मामले पर सुनाई गई थी मौत की सजा, जानिए परवेज़ मुशर्रफ के अर्श से फर्श पर आने की कहानीभारत-पाकिस्तान युद्ध में सक्रियसाल 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में जिया उल हक कश्मीर में सक्रिय रूप से तैनात थे। युद्ध के बाद जिया उल हक को कर्नल के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। फिर साल 1969 में वह खुद ब्रिगेडियर बन गए। बता दें कि साल 1976 में सात अधिकारियों को दरकिनार करके तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने जिया को सेना प्रमुख नियुक्त किया था। तख्तापलटसेना प्रमुख का पद संभालने के ठीक एक साल बाद 1977 में जिया उल हक ने एक सैन्य तख्तापलट में भुट्टो सरकार को उखाड़ फेंका। उन्होंने पूरे पाकिस्तान में मार्शल लॉ लागू कर दिया था। इस दौरान उन्होंने लोगों को आश्वासन दिया कि यह अस्थायी है और जल्द चुनाव होंगे। जिया उल हक पाकिस्तान के चौथे फौजी तानाशाह और छठे राष्ट्रपति थे, उन्होंने साल 1977 में तख्तापलट करने के बाद करीब 11 साल तक देश की कमान संभाली थी।मृत्युवहीं 17 अगस्त 1988 को प्लेन हादसे में जिया उल हक की मौत हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 13 Aug 2025 04:30:50 +0530</pubDate>
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<title>Vikram Sarabhai Birth Anniversary: भारतीय स्पेश मिशन के जनक कहे जाते हैं विक्रम साराभाई, जानिए रोचक तथ्य</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 12 अगस्त को भारत के महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का जन्म हुआ था। उनको देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम का पिता भी कहा जाता है। विक्रम साराभाई के प्रयासों से ही इसरो की स्थापना हुई थी और वह इसके पहले चेयरमैन बने थे। वह एक प्रतिष्ठित भौगोलिक वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विक्रम साराभाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के अहमदाबाद शहर में 12 अगस्त 1919 को विक्रम साराभाई का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा भारत में पूरी की। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सेंट जॉन्स कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। यहां पर उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि ली और कॉस्मिक किरण अनुसंधान में अपना योगदान दिया।इसे भी पढ़ें: VV Giri Birth Anniversary: इंदिरा के दांव से राष्ट्रपति बने थे वीवी गिरी, जानें अद्वितीय सफर की कहानीशादीसाल 1942 में विक्रम साराभाई ने मृणालिनी से शादी की थी। जोकि एक निपुण शास्त्रीय डांसर थीं। जिस समय विक्रम साराभाई ने शादी की थी, उस दौरान भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। ऐसे में उनका परिवार विवाह में शामिल नहीं हो पाया था।इसरो की रखी नींवडॉ विक्रम साराभाई ने संयुक्त राज्य अमेरिका से भारत लौटने के बाद नवंबर 1947 में अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की। शुरूआत में PRL ने अनुसंधान पर ध्यान दिया। लेकिन फिर साराभाई के घर से रिट्रीट की शुरूआत हुई। जिसने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की नींव रखी थी।अंतरिक्ष में अहम दिया योगदानबता दें कि 21 नवंबर 1963 को वैज्ञानिकों के एक समूह के साथ मिलकर विक्रम साराभाई ने अंतरिक्ष में छोटा रॉकेट लॉन्च किया। इसके लिए वह तिरुअनंतपुरम के छोटे से गांव थंबा गए और त्रिवेंद्रम के बिशप को चर्च के अधिग्रहण के लिए मनाया। जिसके बाद इसके विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के नाम से जाना जाता है। इसके सफल लॉन्च के बाज साराभाई ने घर पर सूचना दी थी।मृत्युवहीं 19 अप्रैल 1975 को डॉ विक्रम साराभाई का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 13 Aug 2025 04:30:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Pervez Musharraf Birth Anniversary: राजद्रोह मामले पर सुनाई गई थी मौत की सजा, जानिए परवेज़ मुशर्रफ के अर्श से फर्श पर आने की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 11 अगस्त को पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ का जन्म हुआ था। बता दें कि वह साल 1999 के कारगिल युद्ध के सूत्रधार थे। उन्होंने तानाशाही शैली में पाकिस्तान पर शासन किया था। अपने शासनकाल के दौरान परवेज़ मुशर्रफ ने जम्मू-कश्मीर सहित तमाम मुद्दों पर भारत के साथ बातचीत की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर परवेज़ मुशर्रफ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में 11 अगस्त 1943 में परवेज़ मुशर्रफ का जन्म हुआ था। पुरानी दिल्ली में आज भी उनके परिवार की पुश्तैनी हवेली मौजूद है। उनके बचपन के कुछ साल दिल्ली में गुजरे थे। लेकिन देश का बंटवारा होने के बाद उनका परिवार 1947 में नव सृजित देश पाकिस्तान में जाकर बस गया।इसे भी पढ़ें: VV Giri Birth Anniversary: इंदिरा के दांव से राष्ट्रपति बने थे वीवी गिरी, जानें अद्वितीय सफर की कहानीसेना प्रमुख और कारगिल युद्धसाल 1997 में पाकिस्तान के आम चुनावों में नवाज शरीफ की जीत हुई, तो उन्होंने पीएम बनने के बाद परवेज़ मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाया। इस तरह वह धीरे-धीरे ताकतवर होते चले गए और सरकार में भी उनका रसूख बढ़ता गया। इसके अलावा उनको कारगिल युद्ध के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बिना बताए कारगिल युद्ध की शुरूआत कर दी थी।तख्तापलट कियासाल 1999 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने सैन्य तख्तापलट करके नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल कर दिया। हालांकि नवाज को पहले से इसका अंदाजा था, इसलिए उन्होंने मुशर्रफ को सेनाध्यक्ष के पद से हटा दिया और जनरल अजीज को सेना प्रमुख बनाया। लेकिन वह मुशर्रफ के वफादार निकले और नवाज का तख्तापलट कर दिया।राष्ट्रपति पदनवाज शरीफ का तख्तापलट करने के बाद परवेज़ मुशर्रफ ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। साल 2001 से लेकर 2008 तक वह पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे और बाद में उनको भी पाकिस्तान के सरकारी सिस्टम का शिकार होना पड़ा था।मौत की सजापूर्व पीएम बेनजीर भुट्टो हत्याकांड और लाल मस्जिद मामले में परवेज़ मुशर्रफ को भगोड़ा घोषित किया गया। वहीं साल 2019 में एक विशेष अदालत ने राजद्रोह के मामले में परवेज़ मुशर्रफ को मौत की सजा सुना दी थी। परवेज़ मुशर्रफ पर देशद्रोह का आरोप साल 2007 में आपातकाल घोषित करने के कारण लगाया गया था।मृत्युजब पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ को जेल जाने का डर सताने लगा, तो साल 2016 में वह स्वास्थ्य का हवाला देकर विदेश चले गए। वहीं तत्कालीन पाकिस्तानी हुकूमत ने उनका नाम एग्जिट कंट्रोल लिस्ट से हटा लिया था। बाद में उनको देश से बाहर जाने की इजाजत मिल गई। फिर साल 2016 से वह दुबई में निर्वासित जीवन बिताने लगे। वहीं लंबी बीमारी के बाद 5 फ़रवरी 2023 को 79 साल की उम्र में परवेज़ मुशर्रफ का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 12 Aug 2025 04:30:40 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>VV Giri Birth Anniversary: इंदिरा के दांव से राष्ट्रपति बने थे वीवी गिरी, जानें अद्वितीय सफर की कहानी</title>
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<description><![CDATA[ भारत के चौथे राष्ट्रपति वीवी गिरी का 10 अगस्त को जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम वराहगिरि वेंकट गिरि था। उन्होंने 24 अगस्त 1969 से 24 अगस्त 1974 तक भारत के राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया था। वीवी गिरी को मजदूरों का नेता भी कहा जाता था। बता दें कि उन्होंने रेलवे कर्मचारियों के लिए &#039;बंगाल-नागपुर रेलवे एसोसिएशन&#039; बनाया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर भारत के चौथे राष्ट्रपति वीवी गिरी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारओडिशा के ब्रह्मपुर में 10 अगस्त 1894 को वीवी गिरी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम वीवी जोगय्या पंतुलु था, जोकि पेशे से वकील और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रि सदस्य भी थे। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा ब्रह्मपुर से पूरी की। वहीं साल 1913 में वकालत की पढ़ाई के लिए आयरलैंड गए। जहां पर उन्होंने साल 1913-16 तक डबलिन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। फिर बाद में वकालत की और ब्रह्मपुर बार काउंसलि के नेता बने। वहीं साल 1920 में उन्होंने गांधी की अपील पर असहयोग आंदोलन में हिस्‍सा लिया था।इसे भी पढ़ें: Rabindranath Tagore Death Anniversary: नोबेल जीतने वाले पहले एशियाई थे रबींद्रनाथ टैगोर, इन देशों को दिया था राष्ट्रगानगिरि अप्रोचदेश के चौथे राष्ट्रपति रहे वीवी गिरी शुरूआत से ही मजदूरों के बड़े नेता रहे। साल 1928 में गिरी के नेतृ्व में रेलवे कामगारों की अहिंसक हड़ताल हुई। ऐसे में ब्रिटिश राज और रेलवे प्रबंधन को कामगारों की मांग माननी पड़ी। ट्रेड यूनियनों को आजादी के आंदोलन का भागीदार बनाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। वीवी गिरी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कामगारों का प्रतिनिधित्‍व किया था। साल 1952 में नेहरू सरकार ने वी वी गिरी को श्रम मंत्रालय का जिम्मा मिला। उनकी सोच थी कि औद्योगिक विवाद में प्रबंधन मजदूरों से बाच करके समाधान निकाला जाए। इसी को &#039;गिरी अप्रोच&#039; कहा जाता है।चौथे राष्ट्रपतिदेश के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन का 13 मई 1969 को मौत हो गई थी। जिसके बाद गिरी को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया गया। बाद में फैसला लिया गया कि अगले राष्ट्रपति का चुनाव कराया जाए। जिस पर देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के नाम से फेमस कांग्रेस पार्टी के नेताओं के बीच तनातनी का माहौल बना। इस पर इंदिरा गांधी के विरोध को दरकिनार करते हुए ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर देने का फैसला किया।वहीं इंदिरा गांधी ने भी सिंडिकेट से नाराज होकर वीवी गिरी को समर्थन देने का ऐलान किया। इंदिरा गांधी ने सांसदों और विधायकों से अपनी अंतरात्मा से वोट करने की अपील की। फिर 16 अगस्त 1969 को नीलम संजीव रेड्डी, वीवी गिरि और विपक्ष के उम्मीदवार सीडी देशमुख के बीच मुकाबला हुई। जिसमें वीवी गिरी को जीत मिली। इस तरह से वीवी गिरी न सिर्फ देश के पहले निर्दलीय राष्ट्रपति बने, बल्कि इकलौते कार्यवाहक राष्ट्रपति थे, जोकि बाद में राष्ट्रपति बने। वह 24 अगस्त 1969 से 24 अगस्त 1974 तक राष्‍ट्रपति पद पर रहे।मृत्युवहीं चेन्नई में 24 जून 1980 को 85 साल की उम्र में वीवी गिरी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 11 Aug 2025 04:30:38 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Rabindranath Tagore Death Anniversary: नोबेल जीतने वाले पहले एशियाई थे रबींद्रनाथ टैगोर, इन देशों को दिया था राष्ट्रगान</title>
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<description><![CDATA[ भारत और बंगाल के बहुमखी प्रतिभा संपन्न विद्वान गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर का 07 अगस्त को निधन हो गया था। रबींद्रनाथ टैगोर एक लेखक, कवि, नाटककार, संगीतकार, चित्रकार, दार्शनिक और समाज सुधारक थे। उन्होंने बंगाल के अलावा भारतीय संस्कृति, संगीत और कला को नए आयाम देने का काम किया था। उनकी रचनाएं न सिर्फ देश बल्कि यूरोप में भी पसंद की जाती थीं। वह साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले गैर यूरोपीय बने थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर रबींद्रनाथ टैगोर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता के जोड़ासाको ठाकुरबाड़ी में 07 मई 1861 को रबींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। इनके पिता देवेंद्रनाथ अक्सर यात्राओं पर रहते थे। ऐसे में इनका पालन-पोषण नौकरों ने किया था। इन्होंने सेंट जेवियर में शिक्षा हासिल की और बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। जहां पर उन्होंने ब्रिजस्टोन पब्लिक स्कूल के बाद लंदन यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई की। लेकिन रबींद्रनाथ टैगोर बिना डिग्री लिए वापस भारत आ गए।इसे भी पढ़ें: Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य तिलक ने उठाई थी पूर्ण स्वराज की मांग, क्रांति की ज्वाला से दहल उठा था ब्रिटिश राजलेखन और काव्यबता दें कि महज 8 साल की उम्र में रबींद्रनाथ ने पहली कविता लिखी थी। वहीं 16 साल की उम्र में उनकी कविता का संकलन छपा था। फिर उन्होंने छोटी कहानियों और नाटकों का संकलन अपने नाम से छपवाया। रबींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं ने बांग्ला साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं, जिसमें गोरा, गीतांजली और घरे बाइरे काफी फेमस रहीं।संगीत से नातारबींद्रनाथ टैगोर ने भारत और बांग्लादेश का राष्ट्रगान लिखा और उसको संगीतबद्ध किया है। इसके अलावा श्रीलंका का राष्ट्रगान भी टैगोर की रचना से प्रेरित है। लेखन के अलावा रबींद्रनाथ ने अपने लिखे करीब 2230 गीतों को संगीतबद्ध किया है। जिसको रबींद्र संगीत के नाम से भी जाना जाता है।स्वामी विवेकानंद के बाद रबींद्रनाथ टैगोर दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने विश्व धर्म संसद को संबोधित किया। उन्होंने ऐसा दो बार किया था। रबींद्रनाथ टैगोर को महात्मा गांधी ने गुरुदेव की उपाधि दी थी। गांधी से वैचारिक मतभेदों पर रबींद्रनाथ टैगोर काफी मुखर थे, वहीं महात्मा गांधी भी उनका काफी सम्मान करते थे।मृत्युअपने जीवन से अंतिम दिनों में रबींद्रनाथ टैगोर प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। वहीं 07 अगस्त 1941 में रबींद्रनाथ टैगोर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 08 Aug 2025 04:30:48 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>MS Swaminathan Birth Anniversary: एम एस स्वामीनाथन ने देश को अन्न संकट से निकाल बनाया था आत्मनिर्भर</title>
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<description><![CDATA[ हरित क्रांति के जनक एम एस स्वामीनाथन का 07 अगस्त को जन्म हुआ था। एम एस स्वामीनाथन एक मशहूर कृषि वैज्ञानिक थे। उनको फादर ऑफ ग्रीन रेवोल्यूशन भी कहा जाता है। बताया जाता है कि साल 1960 में जब भारत अनाज की कमी से जूझ रहा था, तब एम एस स्वामीनाथन आगे आए थे और उन्होंने देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एम एस स्वामीनाथन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु में 07 अगस्त 1925 में एमएस स्वामीनाथन का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम मनकोम्बु संबाशिवन स्वामीनाथन था। साल 1972 और 1979 के बीच डॉ. स्वामीनाथन ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक बने। वहीं उन्होंने भारत सरकार में कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के सचिव के तौर पर भी काम किया था।इसे भी पढ़ें: Shibu Soren: जंगल से संसद तक —दिशोम गुरु की राजनीतिक दास्तानभारतीय हरित क्रांति के जनक की मिली उपाधिस्वामीनाथन के काम से कृषि और गेंहू की खेती समेत अन्य उत्पादन में बेतहाशा वृद्धि हुई। इससे भारत जोकि भोजन की कमी वाला देश बन रहा था, वह देश आत्मनिर्भर राष्ट्र्र में तब्दील हो गया। जिस कारण एम एस स्वामीनाथन को &#039;भारतीय हरित क्रांति के जनक&#039; की उपाधि से नवाजा गया।प्रतिष्ठित पुरस्कारकृषि जगत में एमएस स्वामीनाथन को अहम योगदान के कारण कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया है। जिनमें से साल 1971 में  सामुदायिक नेतृत्व के लिए स्वामीनाथन को &#039;रेमन मैग्सेसे पुरस्कार&#039; और साल 1987 में विश्व खाद्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं साल 1967 में पद्मश्री और साल 1972 में पद्म भूषण और 1989 में पद्म विभूषण से नवाजा गया।स्वामीनाथन रिपोर्टराष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष के तौर पर डॉ स्वामीनाथन ने किसानों की परेशानियां दूर करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने किसानों को फसल की औसत लागत से कम से कम 50% अधिक MSP निर्धारित करने की सिफारिश की थी। जिसको स्वामीनाथन रिपोर्ट कहा गया था।राज्यसभा सांसदचेन्नई में डॉ स्वामीनाथन ने एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन में इकोटेक्नोलॉजी में यूनेस्को की कुर्सी संभाली। यहां पर स्वामीनाथन का काम सस्टेनेबल एग्रीकल्चर प्रैक्टिसेस को जारी रखना था। वहीं साल 2007 और 2013 के बीच स्वामीनाथन को सांसद के तौर पर राज्यसभा के लिए नामित किया गया था।मृत्युवहीं 28 सितंबर 2023 को 98 वर्ष की आयु में एमएस स्वामीनाथन का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 08 Aug 2025 04:30:48 +0530</pubDate>
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<title>Satyapal Malik: संविधान का वह सिपाही जिसने सत्ता से सच कहने की कीमत चुकाई</title>
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<description><![CDATA[ &quot;जब इतिहास की किताबें लिखी जाएँगी, तो यह जरूर लिखा जाएगा कि जिस दौर में राजभवन नौकरशाहों के अड्डे बन गए थे, एक जाट किसान का बेटा वहाँ संविधान की धज्जियाँ उड़ाने से इनकार कर रहा था।&quot;5 अगस्त 2025- अनुच्छेद 370 हटाए जाने की छठी वर्षगांठ पर, सत्यपाल मलिक ने दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अंतिम साँस ली। विडंबना देखिए- जिस शख्स ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहते हुए इस फैसले पर दस्तखत किए, वही बाद में इसके सबसे मुखर आलोचक बन गए।  पुलवामा का सच- एक राज्यपाल का पश्चाताप फरवरी 2023 में &#039;द वायर&#039; को दिए साक्षात्कार में मलिक ने जो खुलासे किए, वे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज हो गए:  &quot;वो 40 जवान नहीं मरने चाहिए थे। मैं उस वक्त राज्यपाल था जब उनका खून कश्मीर की बर्फ पर बहा। सच तो यह है कि गृह मंत्रालय ने जम्मू-श्रीनगर हाइवे पर आईईडी हमले की तीन लिखित चेतावनियों को नजरअंदाज किया था। सिर्फ सामान्य अलर्ट नहीं, बल्कि ठीक वैसे ही हमले की सटीक जानकारी जो बाद में हुआ।&quot;इसे भी पढ़ें: Kashmir से Kisan Andolan तक, पूर्व राज्यपाल Satyapal Malik की बगावत की कहानी कई बड़े संदेश देती हैउनकी आवाज़ भर्राई जब उन्होंने बताया: &quot;सीआरपीएफ ने 15 बार रोड की जगह हवाई सुरक्षा की माँग की थी। हर बार &#039;प्रक्रियात्मक कारणों&#039; से मना कर दिया गया। और हमारे प्रधानमंत्री जी कहाँ थे उस दिन? जैसलमेर की रेत में &#039;मैं भी चौकीदार&#039; का प्रचार वीडियो बना रहे थे।&quot; प्रतिक्रिया तत्काल थी- 72 घंटे के भीतर मलिक की सुरक्षा घटा दी गई, पेंशन रोक दी गई। पर वे नहीं झुके:  &quot;मैंने हर दस्तावेज़ की दो कॉपियाँ बनाई हैं - एक सीबीआई के लिए, एक अपनी चिता के लिए।&quot; मोदी युग में संविधान की लड़ाई2016 के नोटबंदी विरोध के बारे में मलिक ने अपनी अप्रकाशित डायरी में लिखा:  &quot;गवर्नर्स कॉन्फ्रेंस में मैंने सीधे कहा- &#039;सर, यह किसानों की कमर तोड़ देगा।&#039; पूरा हॉल सन्न रह गया। उन्होंने वही रहस्यमय मुस्कान दी और कहा &#039;मलिक साहब, विश्वास रखिए।&#039; उसी शाम एक आरएसएस अधिकारी ने &#039;सलाह&#039; दी कि राज्यपालों को सिर्फ औपचारिकताएँ निभानी चाहिए।&quot;आरएसएस नेता का प्रलोभन- &#039;देशभक्ति की कीमत 300 करोड़&#039;अक्टूबर 2021 में झुंझुनू रैली में मलिक ने बताया: &quot;एक आरएसएस संयुक्त सचिव मेरे कार्यालय में दो फाइलें लेकर आया। बिना अपॉइंटमेंट के। कहा- &#039;मलिकजी, ये देशभक्ति की परीक्षा है। एक फाइल हाइड्रो प्रोजेक्ट की, दूसरी जमीन हस्तांतरण की। प्रत्येक के 150 करोड़।&#039; मेरे मना करने पर उस &#039;सांस्कृतिक राष्ट्रवादी&#039; ने धमकी दी- &#039;नागपुर यह अपमान नहीं भूलेगा।&#039;&quot;बिहार में राज्यपाल-मुख्यमंत्री टकरावनीतीश कुमार के साथ भी सत्यपाल मलिक का संवैधानिक मुकाबला हुआ। 2017 में जब सत्यपाल मलिक बिहार के राज्यपाल बने, तो नीतीश कुमार ने सोचा होगा कि यह एक औपचारिक नियुक्ति है। पर मलिक ने राजभवन को जनता की आवाज़ का केंद्र बना दिया। &quot;राजभवन और सचिवालय के बीच की यह लड़ाई सत्ता और संविधान की लड़ाई थी।&quot;शराब घोटाला से लेकर भ्रष्टाचार तक (2018)  - मलिक ने नीतीश सरकार पर शराब माफिया को संरक्षण देने के आरोप लगाए  - एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा: &quot;जब मैंने मुख्यमंत्री से इस पर सफाई माँगी, तो उन्होंने मुझे &#039;राजभवन की सीमाएँ&#039; याद दिलाईं&quot;- नीतीश ने जवाब दिया: &quot;राज्यपाल का काम संवैधानिक मर्यादाओं में रहकर काम करना है&quot;  नियुक्तियों पर टकराव  - मलिक ने 12 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति रोक दी  - आरोप लगाया: &quot;योग्यता नहीं, सत्ता के नजदीकी आधार पर चयन हो रहा है&quot;- नीतीश प्रशासन ने इसे &quot;राज्यपाल का संविधान से ऊपर उठना&quot; बताया  बिहार में भ्रष्टाचार के आरोप - 2019 में मलिक ने एक बिल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया  - कारण बताया: &quot;इसमें खनिज संसाधनों की लूट का प्रावधान है&quot;- नीतीश समर्थकों ने प्रतिक्रिया दी: &quot;राज्यपाल सरकार के कामकाज में दखल दे रहे हैं&quot;मलिक की मौत पर नीतीश कुमार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पर बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया:  &quot;नीतीश जानते थे कि मलिक उनकी सरकार के  कई दस्तावेज़ लेकर गए हैं। यह डर अब खत्म हो गया है।&quot;मोदी सरकार पर तीखे प्रहार:मलिक ने 2022 के एक इंटरव्यू में कहा था: &quot;आज की केंद्र सरकार संविधान को ताक पर रख चुकी है। मैंने प्रधानमंत्री को सीधे कहा था - &#039;सर, आपके मंत्री राज्यपालों को बाबू समझते हैं।&#039;&quot;  &#039;लोकतंत्र का दमघोंटू दौर&#039;: मलिक के आरोप1. संस्थाओं की गिरावट:  &quot;राज्यपालों की नियुक्ति अब योग्यता से नहीं, वफादारी से होती है&quot;2. किसान आंदोलन पर:  &quot;जब मैंने किसानों के पक्ष में बोला, PMO से फोन आया - &#039;आपको संयम बरतना चाहिए&#039;&quot;  3. पुलवामा हादसे पर:&quot;सुरक्षा व्यवस्था की लापरवाही को &#039;बलिदान&#039; बताकर राजनीति की गई&quot; उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने कहा- &quot;जब संवैधानिक पदों ने रबर स्टैम्प बनना स्वीकार कर लिया था, सत्यपाल मलिक जी ने आज्ञाकारिता से ऊपर अपने शपथ को रखा।&quot;आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने कहा- &quot;उन पर तो छानबीन हुई, पर आरएसएस के 300 करोड़ के घूस प्रस्ताव की जाँच क्यों नहीं हुई? यह चयनात्मक न्याय व्यवस्था का पर्दाफाश करता है।&quot;राज्यपालों के लिए आदर्श उदाहरणउनके जीवन का सन्देश इतिहास में संवैधानिक पदों पर बैठने वाले लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में हमेशा प्रासंगिक रहेगा। उनकी समाधि के पत्थर पर लिखा जाना चाहिए - &quot;यहाँ वो शख्स दफन है जो मानता था कि राज्यपालों को आदेश मानने से पहले संविधान पढ़ना चाहिए।&quot; - ओंकारेश्वर पांडेय वरिष्ठ पत्रकार, रणनीतिकार, अनेक पुस्तकों के लेखक, विभिन्न अखबारों, टीवी चैनलों व डिजिटल मीडिया के पूर्व संपादक और यूनेस्को से संबद्ध थिंक टैंक –गोल्डेन सिगनेचर्स के संस्थापक हैं। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 07 Aug 2025 04:30:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Satyapal, Malik:, संविधान, का, वह, सिपाही, जिसने, सत्ता, से, सच, कहने, की, कीमत, चुकाई</media:keywords>
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<title>Marilyn Monroe Death Anniversary: तीन शादियों के बाद भी प्यार को तरसती रहीं मर्लिन मुनरो, आज भी राज है एक्ट्रेस की मौत</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 अगस्त को दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला मर्लिन मुनरो की मृत्यु हो गई थी। मर्लिन मुनरो ने अपने सौंदर्य और दमदार अभिनय से जल्द ही सफलता का आसमान छू लिया था। हालांकि बताया जाता है कि हॉलीवुड की सुपरस्टार और ग्लैमरस एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो ने खुदकुशी की थी। लेकिन एक्ट्रेस की मृत्यु आज भी रहस्यों में घिरी है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर हॉलीवुड की सुपरस्टार रही मर्लिन मुनरो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि 01 जून 1926 को मर्लिन मुनरो का जन्म हुआ था। इनकी मां का नाम ग्लैडिस पर्ल बेकर था। मर्लिन की मां की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, जिस कारण पहले के 6 सालों के लिए मर्लिन को कैलिफोर्निया के हॉथोर्न शहर में वह पली बढ़ीं। मां की मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण मर्लिन मुनरो को कई अनाथ आश्रमों में रहना पड़ा था। उनका बचपन काफी कठिन था, जिसके कारण वह बेहद शर्मीली और अंतरमुखी थीं।इसे भी पढ़ें: Kishore Kumar Birth Anniversary: आधा पैसा मिलने पर आधा काम करते थे किशोर कुमार, जानिए रोचक किस्सेऐसे बनीं फैशन आइकनमॉडल के रूप में अपना करियर शुरू करने में मर्लिन मुनरो काफी जल्दी सफल हो गईं। फिर साल 1946 मर्लिन के लिए काफी अहम साबित हुआ। इस साल उन्होंने अपने पति का तलाक दिया और अभिनय सीखना शुरूकर दिया। कुछ ही समय बाद उनको पहली फिल्म का प्रस्ताव मिल गया। हालांकि एक्ट्रेस की शुरूआती फिल्में कुछ खास नहीं रहीं। लेकिन इन्हीं शुरूआती फिल्मों की वजह से एक्ट्रेस को आगे प्रमुख भूमिकाएं मिलीं। मर्लिन मुनरो विश्व स्तर पर फेमस हो गईं। इस समय तक वह हॉलीवुड, ग्लैमर और फैशन आइकन बन चुकी थीं।साल 1955 में मर्लिन मुनरो ने फॉक्स से अधिक आजादी की मांग करते हुए खुद का फिल्म प्रोडक्शन शुरू किया। फिर साल 1956 में एक्ट्रेस को &#039;बस स्टॉप&#039; के लिए गोल्डन ग्लोब सर्वश्रेष्ठ एक्ट्रेस पुरस्कार के लिए नामांकित हुईं। फिर साल 1959 में उन्होंने &#039;सम लाइक इट हॉट&#039; के लिए गोल्डन ग्लोब भी जीता। हालांकि इस बीच एक्ट्रेस का पति डिमैगियो के साथ रिश्ता बिगड़ने लगा। मर्लिन ने उनसे तलाक लेकर ऑर्थर मिलर के साथ शादी की और यहूदी धर्म अपना लिया। वहीं 1960 के दशक में एक्ट्रेस की तबियत बिगड़ने लगी। क्योंकि बताया जाता है कि इस दौरान उनको ड्रग्स की लत लग गई और मिलर के साथ भी शादी टूट गईं।मृत्युवहीं 05 अगस्त 1962 को 36 साल की उम्र में मर्लिन मुनरो अपने घर में मृत पाई गईं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि एक्ट्रेस की मौत ड्रग्स की अधिक मात्रा लेने से हुई। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 06 Aug 2025 04:30:47 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Shibu Soren: जंगल से संसद तक —दिशोम गुरु की राजनीतिक दास्तान</title>
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<description><![CDATA[ दिशोम गुरु शिबू सोरेन चले गए। 10 बार सांसद, 3 बार मुख्यमंत्री, और उससे भी बढ़कर—वो शख्स जिसने तीर-कमान से नहीं, बल्कि संघर्ष और अपनी सियासी चालों से बिहार के आदिवासियों को उनका हक दिलाया। अलग झारखंड का सपना उठाने वाले कई थे, पर उसे सच करने वाला सिर्फ एक नाम था—दिशोम गुरु।लोग कहते हैं, “गुरुजी सिर्फ नेता नहीं थे, आंदोलन की आत्मा थे।” उनके समर्थकों के लिए वे एक विचार थे, एक प्रतिरोध की पहचान।- नेमरा से उठी हुंकार, जिसने पूरा बिहार हिला दियाभारतीय राजनीति में झारखंड आंदोलन दरअसल आदिवासी पहचान की वह कहानी है, जिसे दिशोम गुरु ने खून-पसीने से लिखा। 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन में साहूकारों की लूट देखी, खनन कंपनियों का लालच देखा। 1969 का अकाल, जब सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा था और आदिवासी भूख से मर रहे थे, ने उनके भीतर ज्वाला भर दी। उन्होंने कसम खाई—“जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ी जाएगी।”नेमरा (रामगढ़) की गलियों से उठी उनकी आवाज़ ने 1960–70 के दशक में आवाम को झकझोरा। जब धनकटनी आंदोलन शुरू हुआ, तब आदिवासी महिलाएँ खेतों से धान काटकर ले जाती थीं, पुरुष तीर-कमान लिए पहरे पर खड़े रहते थे। पर सिस्टम भी था—सरेंडर, गिरफ्तारी, गिरफ्तारी वारंट तक जारी। उनकी शुरुआत छोटी थी, पर असर बड़ा। धान जब्ती आंदोलन से शिबू सुर्खियों में आए। साहूकारों के गोदामों से अनाज निकालना, तीर-कमान लिए आदिवासी पहरेदारों का पहरा—यह केवल विरोध नहीं था, यह सिस्टम को सीधी चुनौती थी।इसे भी पढ़ें: Vijay Rupani Birth Anniversary: मोदी और शाह के करीबी माने जाते थे विजय रुपाणी, दो बार बने थे गुजरात के CMएक दिन शिबू सोरेन पारसनाथ के जंगलों में छिप गए, वहीं से आंदोलन चला—“बाहरी” लोगों को निकालो, “झारखंड को शोषण से मुक्त करो”—सपनों के इस आंदोलन ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की पहचान दी। 1973 में उन्होंने ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा बनाई। उस समय उनके नारे गूंजते थे &#039;&#039;हमारी जमीन हमारी है, कोई दीकु (बाहरी) नहीं छीन सकता।&#039;&#039; इसके साथ ही झारखंड आंदोलन तेज होने लगा।उस समय JMM का बनना कोई आसान बात नहीं थी—राजनीतिक विरोध, विभाजन और मानसिक खींचतान के बीच उन्होंने पार्टी को जीवंत रखा। तब लालू यादव ने 1998 में कहा था, “झारखंड मेरी लाश पर ही बनेगा,”। लेकिन शिबू सोरेन ने सभी विरोधों को पार करते हुए, कांग्रेस, RJD और BJP से गठबंधन बनाया और बातचीत से राज्य का मामला संसद तक पहुँचाया।- राजनीति के शतरंज में माहिर खिलाड़ीशिबू सोरेन ने समझ लिया था कि झारखंड का सपना सिर्फ जंगलों में धरना देकर पूरा नहीं होगा, इसके लिए दिल्ली की सत्ता के दरवाजे खोलने होंगे। और यही उन्होंने किया। 1989 में वी.पी. सिंह की सरकार को समर्थन, 1993 में नरसिम्हा राव को अविश्वास मत से बचाना, फिर 1999 में वाजपेयी की NDA सरकार से डील—शिबू हर बार सही मोड़ पर सही दांव खेलते रहे। कहते हैं, “गुरुजी का भरोसा सिर्फ लिखित वादों पर था, शब्दों पर नहीं।&#039;&#039; और हुआ भी वही। 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड बना। जयपाल सिंह मुंडा ने आंदोलन की शुरुआत की थी, लेकिन उसे मंज़िल तक पहुंचाने वाला नाम था शिबू सोरेन।- कॉरपोरेट से जंग, जीती भी, हारी भीशिबू सोरेन की राजनीति का मूल था—आदिवासी पहचान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा। उन्होंने सरहुल जैसे त्योहारों को विरोध का मंच बनाया। खदान मजदूरों को संगठित किया और खनन कंपनियों की नाक में दम किया। उनकी पहल पर PESA कानून आया, जिसने ग्राम सभाओं को जमीन पर फैसला लेने का अधिकार दिया। 2006 का वन अधिकार कानून भी उनकी जिद का नतीजा था। सरहुल जैसे त्योहारों को विरोध-अवसर में बदला, कंपनियों की चौकी को बाधित किया। लेकिन फिर भी व्यापार-शक्ति रास्ते में आई— कॉरपोरेट का कॉकस नहीं टूटा। खनिज संपदा पर कंपनियों की पकड़ कायम रही। झारखंड से अरबों का कोयला और लौह अयस्क दिल्ली तक गया, पर गांवों तक सिर्फ गरीबी पहुंची।यही विडंबना है—राज्य तो बना, पहचान मिली, पर आर्थिक न्याय अब भी अधूरा है।झारखंड देश के सबसे समृद्ध खनिज राज्यों में है। कोयले, लौह अयस्क और अन्य खनिजों से केंद्र को सालाना ₹40-45 हजार करोड़ से ज्यादा का हिस्सा मिलता है, जबकि राज्य को खुद के टैक्स से करीब ₹34 हजार करोड़ की आमदनी होती है। केंद्र से टैक्स शेयर और ग्रांट्स मिलाकर राज्य को कुल राजस्व का लगभग आधा हिस्सा ही मिलता है।— स्थानीय कर-रकम ₹34 हजार करोड़— टैक्स शेयर एवं ग्रांट ~₹45–50 हजार करोड़आसान शब्दों में—खनिज निकलता है झारखंड से, फायदा जाता है दिल्ली को। यही सबसे बड़ी लड़ाई रही है। और यह लड़ाई आज भी जारी है। - मुकदमे, सज़ा और जनता का अटूट विश्वासदिशोम गुरु का सफर सियासत और मुकदमों की सफेद-स्याह परछाइयों और विवादों से भरा रहा। 975 में ‘बाहरी-विरोधी अभियान’, जिसमें 11 मौतें हुईं, उन पर हत्या का आरोप लगा। 1993 के अविश्वास मत में रिश्वत का आरोप, 1994 में उनके निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या का मामला—2006 में सजा हुई, फिर 2007 में बरी हुए। आरोप जितने भी लगे, शिबू सोरेन बरी हो गए।”फिर भी जनता ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जेल से निकलकर भी चुनाव जीते। तीन बार मुख्यमंत्री बने। दस बार सांसद रहे। पार्टी के एक नेता कहते हैं—“एक आदिवासी जब खड़ा होता है, तो उसे राजनीति में फंसाया भी जाता है। हेमंत सोरेन को भी जेल में डाला गया। पर क्या साबित हुआ? जनता अब इन चालों को अच्छी तरह समझने लगी है।” शिबू सोरेन के उपर मुकदमे, सज़ा और विवादों का बोझ था, पर जनता ने उनका साथ नहीं छोड़ा। नके योगदान को लोग याद करते हैं— उन्होंने झारखंड का सपना रखा, आदिवासी पहचान को राष्ट्रीय विमर्श में रखा, और सबसे बड़ी बात— कारपोरेट पावर को चुनौती दी। ज के दौर में विकास की जो रफ़्तार है, वह आर्थिक अधिकारों के सवाल को और गहरा कर देती है—क्या राज्य की खनिज संपदा उसी जनता को लाभान्वित कर पाएगी जिसने इसे जन्म दिया? गुरुजी चले गए, पर स ]]></description>
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<pubDate>Wed, 06 Aug 2025 04:30:46 +0530</pubDate>
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<title>Kishore Kumar Birth Anniversary: आधा पैसा मिलने पर आधा काम करते थे किशोर कुमार, जानिए रोचक किस्से</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के गायक किशोर कुमार का 04 अगस्त को जन्म हुआ था। वह संगीत के उस्ताद होने के साथ ही अपनी शानदार गायन प्रतिभा के लिए भी जाने जाते थे। किशोर कुमार गायक होने के साथ ही अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, लेखक और पटकथा लेखक भी थे। भले ही आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गाए गाने आज भी लोग गुनगुना या सुनना पसंद करते हैं। भारतीय संगीत इंडस्ट्री में किशोर कुमार का योगदान अतुलनीय है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर किशोर कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमध्य प्रदेश के खंडवा जिले में 04 अगस्त 1929 में किशोर कुमार का जन्म हुआ था। इनका असली नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार अभिनेता अशोक कुमार के भाई थे। किशोर कुमार अपनी गायन प्रतिभा के लिए जाने जाते थे, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने कई गायन प्रशिक्षण नहीं लिया था।इसे भी पढ़ें: Mohammed Rafi Death Anniversary: फकीर को देखकर सीखा था मोहम्मद रफी ने गाना, 13 की उम्र में पहली बार दी थी स्टेज परफॉर्मेंससिनेमा में बनाई पहचानकिशोर कुमार फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखते समय अपना नाम बदलकर किशोर कुमार रख लिया। हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार की पहचान एक गायक और अभिनेता के तौर पर हुई। उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग, स्वभाव और स्वर में अनूठेपन से सबको चौंका दिया था। धीरे-धीरे वह हिंदी सिनेमा के फेमस डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और लेखक बन गए।सिंगर के हिट गानेकिशोर कुमार की संगीत प्रतिभा ने हिंदी सिनेमा को कई सुरों से भरा था। उन्होंने अपने लंबे करियर में कई हिट गाने दिए थे। सिंगर ने पन्ना की तमन्ना है&#039;, &#039;बाबुल का घर, &#039;दिल क्या करें&#039;, &#039;नीले नीले अंबर पर&#039;, &#039;मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू&#039;, &#039;गाता रहे मेरा दिल&#039;, &#039;मेरे सामने वाली खिड़की में&#039; और &#039;कयामत होगी&#039;, जैसे सदाबहार गाने गाए हैं। उस समय किशोर कुमार राजेश खन्ना की आवाज हुआ करते थे। पर्सनल लाइफसिंगर किशोर कुमार ने 4 शादियां की थीं। जिसमें पहली शादी सला 195 में गायिका रूमा गुहा ठाकुरता से की थी। लेकिन साल 1958 में यह रिश्ता खत्म हो गया था। इसके बाद किशोर कुमार ने दूसरी शादी साल 1960 में मधुबाला से की थी। लेकिन साल 1969 में मधुबाला की मौत हो गई। उन्होंने तीसरी शादी साल 1976 में योगिता बाली से की। लेकिन दो साल बाद 1978 में रिश्ता भी खत्म हो गया। जिसके बाद किशोर कुमार ने चौथी शादी साल 1980 में लीना चंद्रावरकर से की थी, जोकि आखिरी समय तक उनके साथ रहीं।मृत्युवही 13 अक्तूबर 1987 को 58 साल की उम्र में किशोर कुमार ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 05 Aug 2025 04:30:37 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Alexander Graham Bell Death Anniversary: ग्राहम बेल की क्रांतिकारी खोज ने दुनिया को दिया था टेलीफोन, जानिए कैसे रचा इतिहास</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 02 अगस्त को वैज्ञानिक और आविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल का निधन हो गया था। वह टेलीफोन के प्राथमिक आविष्कारकों में से एक थे। 07 मार्च 1876 में ग्राहम बेल ने टेलीफोन का पेटेंट करवाया था। जिसको दुनिया के सबसे विवादास्पद पेटेंट्स में से एक कहा जाता है। ग्राहम बेल की पत्नी और मां दोनों बहरेपन का शिकार थीं। जिस कारण उन्होंने अपना अधिकांस काम श्रवण और भाषणों के अनुसंधान और श्रवण बाधित संचार में सहायता करने में लगाया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अलेक्जेंडर ग्राहम बेल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातो के बारे में...जन्मस्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में 03 मार्च 1847 को अलेक्जेंडर ग्राहम बेल का जन्म हुआ था। वह ध्वनि, वाणी और मानव संचार की यांत्रिकी में रुचि रखते थे। इनके पिता भाषण प्रशिक्षण के प्रसिद्ध शिक्षक थे। वहीं ग्राहम बेल की मां हाउसवाइफ थीं। लेकिन वह सुन नहीं सकती थीं। ग्राहम बेल अपनी स्कूली शिक्षा के लिए एडिनबर्ग रॉयल हाई स्कूल गए। फिर उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी की।इसे भी पढ़ें: Vijay Rupani Birth Anniversary: मोदी और शाह के करीबी माने जाते थे विजय रुपाणी, दो बार बने थे गुजरात के CMसाल 1871 में ग्राहम बेल संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए और वहां पर उन्होंने बोस्टन में बधिर स्टूडेंट्स को पढ़ाना शुरूकर दिया। फिर दो साल बाद ग्राहम बेल को बोस्टन यूनिवर्सिटी में वोकल फिजियोलॉजी और एलोक्यूशन के प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त किया गया।टेलीफोन का मिला था पेटेंटखोज के दौरान ग्राहम बेल ने कई टेलीग्राफ बनाए, जिसके साथ उन्होंने कई संदेश भी भेजे। ग्राहम ने अपने साथी इलेक्ट्रीशियन थॉमस वॉट्सन के साथ काम किया और साल 1875 में शुरूआती मॉडल बनाकर तैयार किया। इस बीच कई अन्य अविष्कारक भी इस पर काम कर रहे थे। लेकिन ग्राहम बेल ने एक ऐसा उपकरण विकसित कर लिया था, जिससे तार के जरिए आवाज को एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा सकता था।फिर साल 1890 में उन्होंने अपना ध्यान एनिएशन में प्रयोग के लिए लगाया। साल 1907 में उनके द्वारा एविएशन में और नवाचार करने के लिए एरियल एक्सपेरिमेंट एसोसिएशन की स्थापना की गई। मृत्युकनाडा के नोवा स्कोटिया में 02 अगस्त 1922 को अलेक्जेंडर ग्राहम बेल का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 03 Aug 2025 04:30:27 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Vijay Rupani Birth Anniversary: मोदी और शाह के करीबी माने जाते थे विजय रुपाणी, दो बार बने थे गुजरात के CM</title>
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<description><![CDATA[ गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय रुपाणी का 02 अगस्त को जन्म हुआ था। विजय रुपाणी की गिनती भाजपा के बड़े नेताओं में की जाती थी। इसके अलावा वह पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते थे। विजय रुपाणी का राजनीतिक जीवन काफी सफल रहा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुजरात के पूर्व सीएम विजय रुपाणी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारविजय रुपाणी का जन्म बर्मा में 02 अगस्त 1956 में हुआ था। लेकिन बर्मा में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से साल 1960 में उनका परिवार गुजरात के राजकोट में आकर बस गया। वहीं रुपाणी ने महज 16 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ज्वाइन कर लिया था। फिर बाद में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के भी सदस्य रहे।इसे भी पढ़ें: Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य तिलक ने उठाई थी पूर्ण स्वराज की मांग, क्रांति की ज्वाला से दहल उठा था ब्रिटिश राजराजनीतिक सफरजब भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ, तो विजय रुपाणी पार्टी में शामिल हो गए। वहीं साल 1978 से लेकर 1981 तक वह RSS के प्रचारक रहे। उन्होंने पहली बार साल 1987 में राजकोट म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के कॉरपोरेटर का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। फिर साल 1995 में वह राजकोट म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन बन गए। साल 1998 में विजय रुपाणी को गुजरात बीजेपी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया।साल 2006 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम बने, तो विजय रुपाणी को राज्यसभा भेजा गया। साल 2014 में विजय रुपाणी राजकोट पश्चिम से विधायक बने। फिर साल 2016 से लेकर 2021 तक वह दो बार गुजरात के सीएम बनें। विजय रुपाणी ने मुश्किल हालात में राज्य की कमान संभाली थी। जब रुपाणी मुख्यमंत्री बनें, तो उनके सामने कई चुनौतियां थीं। हालांकि उन्होंने सभी चुनौतियों को बारीकी से संभाला। लेकिन 11 सितंबर 2021 को विजय रुपाणी ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया।मृत्युबता दें कि 12 जून 2025 को गुजरात में हुए भीषण विमान हादसे में पूर्व सीएम विजय रुपाणी की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 03 Aug 2025 04:30:27 +0530</pubDate>
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<title>Meena Kumari Birth Anniversary: हिंदी सिनेमा की सुपरस्टार बन किया लाखों दिलों पर राज, ऐसा रहा मीना कुमारी का फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री मीना कुमारी का 01 अगस्त को जन्म हुआ था। एक्ट्रेस ने कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया था। मीना कुमारी अपने जमाने की मशहूर अदाकारा और बहुत अच्छी कवियत्री थीं। मीना कुमारी को ट्रेजडी क्वीन के नाम से भी जाना जाता है। एक्ट्रेस ने महज 4 साल की उम्र से अभिनय करना शुरूकर दिया था। अभिनेत्री ने अपने 33 साल के फिल्मी करियर में करीब 90 से अधिक फिल्मों में काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...  जन्म और परिवारबता दें कि 01 अगस्त 1933 को मीना कुमारी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम अली बक्स था और मां इकबाल बेगम था। वहीं इनका असली नाम महजबीन बानो था। मीना का पैदा होना उनके पिता को अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वह बेटी नहीं बल्कि बेटा चाहते थे। इसलिए मीना के जन्म के बाद उनको एक अनाथालय में छोड़ दिया, हालांकि कुछ देर बाद उन्होंने मन बदल लिया और मीना को वापस घर ले गए। इसे भी पढ़ें: Mohammed Rafi Death Anniversary: फकीर को देखकर सीखा था मोहम्मद रफी ने गाना, 13 की उम्र में पहली बार दी थी स्टेज परफॉर्मेंसपहली फिल्महालांकि मीना कुमारी को कभी फिल्मों का शौक नहीं रहा। वह शुरू से स्कूल जाना और पढ़ाई करना पसंद करती थीं। लेकिन इसके बाद भी उनके माता-पिता उनको फिल्म स्टूडियो ले जाते थे। वहीं निर्देशक विजय भट्ट ने मीना को फिल्म &#039;लेदरफेस&#039; में कास्ट किया और काम के पहले दिन मीना को 25 रुपए मिले। यानी की मीना कुमारी की पहली फिल्म के लिए उनको 25 रुपए मिले थे।अभिनेत्री मीना कुमारी ने अधिकतर विजय भट्ट प्रोडक्शन्स में काम किया। इसमें लेदर फेस, अधूरी कहानी, पूजा और एक ही भूल जैसी कई फिल्में हैं। विजय भट्ट ने ही महजबीन बानो का नाम बदलकर बेबी मीना रख दिया था। मीना कुमारी ने फिल्मों में अभिनय करने के साथ गाने भी गाए। जिसमें &#039;पिया घर आजा&#039;, &#039;दुनिया एक सराय&#039; और &#039;बिछड़े बालम&#039; शामिल हैं। मीना कुमारी को असली पहचान फिल्म &#039;बैजू बावरा&#039; से मिली थी।मृत्युसाल 1968 में मीना कुमारी को पता चला कि वह लीवर सिरोसिस से पीड़ित हैं। वहीं 31 मार्च 1972 में मीना कुमारी का निधन हो गया था। वहीं मौत के बाद मीना कुमारी की करीबी दोस्त रहीं अभिनेत्री नरगिस ने उनके अंतिम संस्कार का खर्च उठाया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 02 Aug 2025 04:31:18 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Kamla Nehru Birth Anniversary: सादगी और सेवा की मिसाल थीं कमला नेहरू, आजादी की लड़ाई में लिया था बढ़&#45;चढ़कर हिस्सा</title>
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<description><![CDATA[ अधिकांश लोग उन भारतीय पुरुषों के बारे में जानते हैं, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। लेकिन हम महिला अग्रदूतों को भूल जाते हैं, जिन्होंने भारत से अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए जमकर संघर्ष किया था। ऐसी ही एक महिला कमला नेहरू थीं। कमला नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की पत्नी थीं। उन्होंने भी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। आज ही के दिन यानी की 01 अगस्त को कमला नेहरू का जन्म हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर कमला नेहरू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारदिल्ली में 01 अगस्त 1899 को कमला नेहरू का जन्म हुआ था। उनका जीवन आज भी लोगों के लिए सादगी और सेवा का मिसाल हैं। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अन्य महिलाओं को भी इससे जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। बता दें कि उस समय कमला नेहरू ने शुरूआती पढ़ाई घर पर की। वहीं ये वह दौर था, जब लड़कियों की शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था। साल 1916 में जब कमला नेहरू 16 साल की थीं, तो उनकी शादी पंडित जवाहर लाल नेहरू से हो गई। शादी के बाद कमला नेहरू इलाहाबाद के आनंद भवन में रहने लगीं।इसे भी पढ़ें: Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य तिलक ने उठाई थी पूर्ण स्वराज की मांग, क्रांति की ज्वाला से दहल उठा था ब्रिटिश राजदेश की आजादी में योगदानबता दें कि कमला नेहरू ने असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह जैसे आंदोलनों में हिस्सा लिया। जब पंडित नेहरू जेल गए, तब कमला नेहरू ने महिलाओं को लीड किया और खुद मोर्चा संभाला। उन्होंने इस दौरान देश की आजादी की लड़ाई को मजबूत करने का काम किया। क्योंकि यह वो दौर था जब महिलाएं घर से बाहर निकलने में हिचकिचाती थीं, लेकिन वह कमला नेहरू थीं, जिन्होंने महिलाओं को भरोसा दिलाया कि वह भी आजादी की इस लड़ाई में अपना योगदान दे सकती हैं।सादा जीवन जीती थीं कमला नेहरूकमला नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को भी त्याग, संघर्ष और देशसेवा के संस्कार बचपन से दिए। कमला नेहरू सादा जीवन जीना पसंद करती थीं। वह दिखावे से दूर रहती थीं। वह खादी पहनती थीं और महात्मा गांधी की सादगी और उनके विचारों को अपनाकर जीती थीं। कमला नेहरू के विचार और संकल्प बेहद मजबूत थे।जेल में बिगड़ा स्वास्थ्यदेश की आजादी के लिए कमला नेहरू का बार-बार जेल जाना, आंदोलन में हिस्सा लेना और समाज सेवा करते-करते उनका स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया था। इस दौरान उनको टीबी हो गई और इलाज के लिए उन्हें विदेश जाना पड़ा। क्योंकि उस समय देश में इस बीमारी का इलाज नहीं था। वहीं 28 फरवरी 1936 को स्विट्जरलैंड में इलाज के दौरान कमला नेहरू का निधन हो गया। जब कमला का निधन हुआ, तो पंडित नेहरू अल्मोड़ा जेल में थे। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 02 Aug 2025 04:31:18 +0530</pubDate>
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<title>Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य तिलक ने उठाई थी पूर्ण स्वराज की मांग, क्रांति की ज्वाला से दहल उठा था ब्रिटिश राज</title>
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<description><![CDATA[ भारत के प्रमुख नेता, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और लोकप्रिय नेता बाल गंगाधर तिलक का 01 अगस्त को निधन हो गया था। उनके नाम के आगे &#039;लोकमान्य&#039; लगाया जाता है, जोकि उन्होंने अर्जित की थी। उन्होंने ब्रिटिश राज के दौरान सबसे पहले पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थी। &#039;स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है&#039; का नारा बाल गंगाधर तिलक ने दिया था। उनका पूरा जीवन ही आदर्श था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के रत्नागिरी में 13 जुलाई 1856 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था। वह संस्कृत के विद्वान और प्रख्यात शिक्षक थे। उनकी मां का नाम पार्वती बाई गंगाधर था। साल 1871 में तिलक का तपिबाई नामक कन्या से उनका विवाह हुआ था। शादी के बाद तपिबाई का नाम सत्यभामा हो गया।इसे भी पढ़ें: Udham Singh Death Anniversary: उधम सिंह ने लंदन में घुसकर लिया था जलियांवाला बाग का बदला, जानें कैसे मारी डायर को गोलीअंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के आलोचक थे तिलकपढ़ाई पूरी करने के बाद बाल गंगाधर तिलक ने पुणे के एक निजी स्कूल में गणित और अंग्रेजी के शिक्षक बनकर पढ़ाने लगे। लेकिन अन्य शिक्षकों के मतभेद के बाद साल 1880 में तिलक ने पढ़ाना छोड़ दिया था। दरअसल, वह अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के आलोचक थे। वह स्कूलों में ब्रिटिश छात्रों की तुलना में भारतीय छात्रों के साथ हो रहे दोगले व्यवहार का विरोध करते थे। उन्होंने समाज में फैली छुआछूत के खिलाफ भी आवाज उठाई थी।समाज सेवाबाल गंगाधर तिलक ने बंबई में अकाल और पुणे में प्लेग महामारी के दौरान कई सामाजिक कार्य किए। साल 1893 में उन्होंने महाराष्ट्र में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाने की शुरूआत की। इस दौरान गणेश चतुर्थी के दिन लोग घर में भगवान गणेश की मूर्ति को 10 दिन रखकर उत्सव मनाते थे। वहीं तिलक ने विचार किया कि क्यों न घरों से निकालकर सार्वजनिक स्थल पर गणेशोत्सव मनाया जाए, जिससे कि इस पर्व में हर जाति के लोग शिरकत कर सकें।तिलक के प्रयासबाद में तिलक ने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की थी। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में शिक्षा के स्तर को सुधारना था। वहीं उन्होंने मराठी भाषा में मराठा दर्पण और केसरी नाम से दो अखबार शुरू किए थे। जोकि उस दौर में काफी ज्यादा लोकप्रिय हुए थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया और भारतीयों के लिए पूर्ण स्वराज की मांग की। केसरी अखबार में छपने वाले लेखों के कारण तिलक ने कई बार जेल यात्रा भी की।मृत्युवहीं 01 अगस्त 1920 में बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 02 Aug 2025 04:31:18 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Tulsidas Jayanti 2023: तुलसीदास जयंती आत्मोन्नति की ओर अग्रसर होने को कराता है स्मरण</title>
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<description><![CDATA[ आज तुलसीदास जयंती है, हर साल सावन महीने की सप्तमी तिथि को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती मनाई जाती है। यह दिन भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में विशेष स्थान रखता है। इस अवसर पर उत्तर भारत में विभिन्न स्थानों पर उनकी रचनाओं का पाठ, भजन-कीर्तन और विचार गोष्ठियों का आयोजन होता है तो आइए हम आपको तुलसीदास जयंती के महत्व के बारे में बताते हैं। जानें तुलसीदास जयंती के बारे में सावन महीने की सप्तमी तिथि पर मनाई जाने वाली गोस्वामी तुलसीदास जयंती केवल एक संत की स्मृति नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति साहित्य की अमूल्य धरोहर का उत्सव है। तुलसीदास जी ने अपनी लेखनी से भगवान श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने भक्ति को केवल पूजा नहीं, जीवन जीने की एक सजीव विधा के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी रचनाएं आज भी धर्म, नीति और भक्ति के अमिट स्रोत हैं।  प्रसिद्ध कवि और संत तुलसीदास जी को भगवान राम का अनन्य भक्त माना जाता है। तुलसीदास जी ने कई रचनाएं की हैं लेकिन सबसे ज्यादा ख्याति उनको महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अवधी भाषा में अनुवाद किए गए महाकाव्य रामचरितमानस से मिली है।इसे भी पढ़ें: Munshi Premchand Birth Anniversary: जिनकी कहानियों में सांस लेता है भारतजानें तुलसीदास जयंती का इतिहास भारत की पावन भूमि पर कई विद्वानों, ऋषियों और मुनियों ने जन्म लिया है। इन्हीं विद्वानों में से एक हुए हैं गोस्वामी तुलसीदास जी। तुलसीदास ग्रंथों के रचयिता, लोकप्रिय साहित्यकार और हिंदू धर्म के ज्ञाता के रूप में विख्यात हैं। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की। आपने इनकी काफी रचनाओं के बारे में सुना होगा क्योंकि यह अपने जीवन के घटनाओं को कागज पर संजो कर रखते थे और यह उनकी सरलता थी। वह इस संसार में होकर भी इस संसार से मुक्त थे। 31 जुलाई यानी कल तुलसीदास जयंती है। श्रावण मास की सप्तमी तिथि पर मनाई जाने वाली गोस्वामी तुलसीदास जयंती केवल एक संत की स्मृति नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति साहित्य की अमूल्य धरोहर का उत्सव है। तुलसीदास जी ने अपनी लेखनी से भगवान श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने भक्ति को केवल पूजा नहीं, जीवन जीने की एक सजीव विधा के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी रचनाएं आज भी धर्म, नीति और भक्ति के अमिट स्रोत हैं।तुलसीदास जयंती का है धार्मिक महत्वहर साल सावन महीने की सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती मनाई जाती है। यह दिन भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में विशेष स्थान रखता है। इस अवसर पर उनकी रचनाओं का पाठ, भजन-कीर्तन और विचार गोष्ठियों का आयोजन होता है। भक्त उनके जीवन और शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर भक्ति, सेवा और सदाचार का मार्ग अपनाने का संकल्प लेते हैं।श्रीराम के अनन्य भक्त थे गोस्वामी तुलसीदास तुलसीदास जी ने अपने जीवन को भगवान श्रीराम की भक्ति के लिए सम्पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया। वह सगुण रामभक्ति के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। पंडितों के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद से उन्हें राम दर्शन की अनुभूति हुई। उन्होंने भक्ति को जीवन की सबसे बड़ी साधना माना और अपने लेखन से लोगों को उस पथ पर चलने की प्रेरणा दी। उनकी भक्ति ने उन्हें एक साधारण कवि से संत बना दिया।रामचरितमानस की रचना कर तुलसीदास हो गए अमर ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास जी की कालजयी रचना है। यह वाल्मीकि रामायण का सरल और सरस हिंदी रूपांतरण है, जिसे उन्होंने अवधि भाषा में लिखा ताकि साधारण जन भी भगवान राम की लीलाओं को समझ सकें। यह ग्रंथ भक्ति, मर्यादा, धर्म, प्रेम, त्याग और आदर्श जीवन का अद्भुत संगम है। श्रीराम का आदर्श चरित्र आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का पथदर्शक है।हनुमान चालीसा  के रचयिता भी हैं तुलसीदास तुलसीदास जी ने कुल 12 प्रमुख ग्रंथों की रचना की। इनमें &#039;हनुमान चालीसा&#039; सबसे लोकप्रिय है, जिसे हर वर्ग और उम्र के लोग श्रद्धा से पढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त &#039;कवितावली&#039;, &#039;विनय पत्रिका&#039;, &#039;दोहावली&#039;, &#039;जानकी मंगल&#039; आदि ग्रंथों में भी उनकी भक्ति, करुणा और आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रभाव झलकता है। उनकी हर रचना लोकभाषा में होने के कारण सीधे हृदय तक पहुँचती है।तुलसीदास जी के जीवन से मिलती है प्रेरणा, होता है आत्मबोधगोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन साधना, सेवा और संतुलित विचारों का आदर्श उदाहरण है। उन्होंने भक्ति को आडंबर से मुक्त कर सीधे आत्मा से जोड़ा। उनके ग्रंथों में न केवल धार्मिक भाव हैं, बल्कि जीवन जीने की व्यवहारिक शिक्षा भी निहित है। तुलसीदास जयंती हमें स्मरण कराती है कि सच्ची भक्ति वही है, जो हमें आत्मोन्नति की ओर ले जाए और समाज में सद्भाव फैलाए।  तुलसीदास जयंती का महत्व आज हमारे सामने धार्मिक ग्रंथ हैं जिनसे हम अपने धर्म के इतिहास की जानकारी प्राप्त कर पाते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन्हें हम तक पहुंचाने के लिए इतिहास में कई प्रतिष्ठित साहित्यकार हुए। इन्हीं प्रतिष्ठित साहित्यकारों में से एक थे गोस्वामी तुलसीदास, जिन्हें आसान भाषा में ज्ञान का सागर भी कहा जा सकता है। इनकी सरलता ही इनकी ताकत बनी। कल तुलसीदास जयंती है, इस दिन आपको श्रीरामचरितमानस का पाठ करना चाहिए। इसके साथ प्रभु श्रीराम और उनके परम भक्त हनुमान की पूजा करनी चाहिए। यदि संभव हो तो 11 ब्राह्मणों को भोज कराना चाहिए या फिर अन्न और वस्त्रों का दान करना चाहिए। कहते हैं ऐसा करने से कार्य मंगल होते हैं और आपका कार्य सफल होता है। तुलसीदास जयंती है 31 जुलाई को तुलसीदास जयंती 2025 की डेट 31 जुलाई है जो गुरुवार के दिन पड़ेगी। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 31 जुलाई को सुबह 02:41 बजे से शुरू होगी। इस तिथि का समापन 1 अगस्त को सुबह 04:58 बजे होगा। इस तरह सूर्योदय के समय के अनुसार सप्तमी तिथि 31 जुलाई को रहेगी। इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 12:54 तक रहेगा। जबकि राहुकाल दोपहर 02:09 बजे से शाम 03:50 तक रहेगा।जानें गोस्वामी तुलसीदास के बारे में संत व कवि तुलसीदास जी का जीवनक ]]></description>
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<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 04:30:39 +0530</pubDate>
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<title>Mohammed Rafi Death Anniversary: फकीर को देखकर सीखा था मोहम्मद रफी ने गाना, 13 की उम्र में पहली बार दी थी स्टेज परफॉर्मेंस</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय संगीत के स्वर्ण युग में जिस आवाज ने करोड़ों दिलों को छुआ, वह मोहम्मद रफी की आवाज थी। उनके गाए नगमे आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। लेकिन आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई को यह आवाज हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो गई। भले ही आज मोहम्मद रफी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत और उनकी शख्सियत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोहम्मद रफी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को मोहम्मद रफी का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही संगीत के दीवाने थे। खास बात यह भी कि मोहम्मद रफी के घर में संगीत का कोई माहौल नहीं था। इसके बावजूद भी गांव में गाने वाले एक सूफी फकीर को देखकर मोहम्मद रफी इतना प्रेरित हुए कि वह हर रोज उस सूफी फकीर का इंतजार करते। वहीं उसकी नकल उतारकर वह खुद भी रियाज करते थे। यहीं से मोहम्मद रफी की सुरों की यात्रा की शुरूआत हुई। इसे भी पढ़ें: Mehmood Death Anniversary: एक्टिंग करने से पहले ड्राइवरी करते थे महमूद, ऐसे बने इंडस्ट्री के सबसे बड़े कॉमेडियनपहली बार मंच पर उतरे रफी साहबसाल 1937 में लाहौर में एक प्रदर्शनी में जब मंच पर बिजली चली गई, तो फेमस गायक के एल सहगल ने गाना गाने से मना कर दिया। ऐसे में आयोजकों ने 13 साल के मोहम्मद रफी को गाना गाने के लिए। मोहम्मद रफी ने जैसे ही सुर छेड़े, तो लोग मंत्रमुग्ध हो गए। यहां तक की फेमस गायक सहगल भी उनके प्रशंसक बन गए और उन्होंने भविष्यवाणी की कि यह लड़का एक दिन महान गायक बनेगा। रफी साहब लाहौर में अपने बड़े भाई की नाई की दुकान में काम करते थे। दुकान में रफी सुरों को गुनगुनाते रहते थे। एक ग्राहक ने मोहम्मद रफी के सुरों को पहचाना और जीवनलाल नामक व्यक्ति के द्वारा उनको संगीत की शिक्षा मिलने लगी। यहीं से मोहम्मद रफी का प्रोफेशनल दौर शुरू हुआ।एक रुपए में गाया था गानामोहम्मद रफी साहब जितने बड़े गायक थे, उतने ही वह सरल और विनम्र स्वभाव के भी थे। कई बार वह सिर्फ 1 रुपए में गाना गाते थे। उन्होंने कभी भी गाना गाने से पहले पैसों की डिमांड नहीं की। क्योंकि गाना सिर्फ उनका पेशा नहीं बल्कि इबादत भी थी।पं. नेहरु के लिए खास पेशकशबता दें कि साल 1948 में रफी साहब ने &#039;सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी&#039; गाया। यह गीत काफी ज्यादा लोकप्रिय हुआ था। ऐसे में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रफी साहब को अपने आवास पर बुलाकर विशेष प्रस्तुति देने को कहा था। यह पल मोहम्मद रफी के लिए ऐतिहासिक मोड़ था। संगीत के हर रंग में रंगे थे रफीमोहम्मद रफी ने कव्वाली, देशभक्ति, भजन, गजल, रोमांस, ट्रैजिक, हर रंग के गाने गाए। उन्होंने एसडी बर्मन, ओपी नैय्यर, नौशाद, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। वहीं रफी साहब ने करीब 7000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए थे।मृत्युवहीं 31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया। रफी साहब के निधन पर भारत सरकार ने दो दिन का शोक घोषित किया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 04:30:39 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Mohammed, Rafi, Death, Anniversary:, फकीर, को, देखकर, सीखा, था, मोहम्मद, रफी, ने, गाना, की, उम्र, में, पहली, बार, दी, थी, स्टेज, परफॉर्मेंस</media:keywords>
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<title>Premchand Birth Anniversary: प्रेमचंद ने साहित्य के गागर को अपनी रचनाओं के सागर से किया था तृप्त</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद का जन्म हुआ था। उनको &#039;उपन्यास सम्राट&#039; और &#039;कलम का जादूगर&#039; कहा जाता है। मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को यथार्थवादी रंगों से जीवंत किया। उनका जीवन काफी संघर्षों से भरा हुआ था। बता दें कि हिंदी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद का कद काफी ऊंचा माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुंशी प्रेमचंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारवाराणसी के लमही गांव में 31 जुलाई 1880 को प्रेमचंद का जन्म हुआ था। इनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। जब प्रेमचंद 7 साल के थे, तो उनके सिर से मां का साया उठ गया था। वहीं उनके पिता ने दूसरी महिला से शादी कर ली। लेकिन फिर 15 साल की उम्र में प्रेमचंद अपने पिता को भी खो बैठे। इसके बाद उनकी सौतेली मां ने उनकी शादी एक ऐसी लड़की से कराई, जिसको प्रेमचंद पसंद नहीं करते थे।इसे भी पढ़ें: Munshi Premchand Birth Anniversary: जिनकी कहानियों में सांस लेता है भारतदूसरी शादीप्रेमचंद ने खुद लिखा था कि यह शादी उनके पिता की गलती थी, जिसने उनको डुबो दिया। प्रेमचंद का कहना था कि उनकी पहली पत्नी बदसूरत और झगड़ालू थी और वह इस महिला से तंग आ चुके थे। प्रेमचंद का पहला विवाह जल्दी टूट गया, जिसके बाद साल 1906 में प्रेमचंद ने बाल विधवा शिवरानी देवी से दूसरी शादी की। यह प्रेमचंद के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। यह विवाह प्रेमचंद के अनुरूप था। इससे उनके जीवन में स्थिरता आई और सुखद वैवाहिक जीवन से प्रेमचंद की रचनात्मकता को उड़ान दी।वहीं प्रेमचंद स्कूल में डिप्टी इंस्पेक्टर बने। इस दौरान उन्होंने साल 1908 में &#039;सोजे वतन&#039; कहानी संग्रह प्रकाशित किया। जिसको अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया। फिर साल 1918 में &#039;सेवासदन&#039; ने उनको हिंदी साहित्य स्थापित किया। वहीं साल 1918-1936 का कालखंड &#039;प्रेमचंद युग&#039; कहलाया।प्रेमचंद की रचनाएंबता दें कि प्रेमचंद की रचनाएं &#039;पंच परमेश्वर&#039;, &#039;गोदान&#039;, &#039;कफन&#039;, &#039;पूस की रात&#039; आदि सामाजिक कुरीतियों और मानवीय संवेदना को उजागर करने का काम करती हैं। प्रेमचंद के दूसरे विवाह ने उनको भावनात्मक स्थिरता देने के साथ उनके निजी रिश्ते को भी संवारा और इससे प्रेमचंद की लेखनी भी समृद्ध हुई।300 से ज्‍यादा कहानियां लिखीप्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू में 18 से ज्यादा उपन्यास और 300 से अधिक कहानियां लिखी थीं। जोकि आज भी प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद की कृतियां हिंदी साहित्य में अमर हैं और उनकी लेखनी आज भी लेखकों को प्रेरित करने का काम करती हैं।मृत्युवहीं 08 अक्तूबर 1936 को पेचिश रोग के कारण प्रेमचंद का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 04:30:39 +0530</pubDate>
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<title>Udham Singh Death Anniversary: उधम सिंह ने लंदन में घुसकर लिया था जलियांवाला बाग का बदला, जानें कैसे मारी डायर को गोली</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई को उधम सिंह को फांसी दी गई थी। उधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया था। भारत के इस वीर सपूत ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति में अहम भूमिका निभाई थी। यह जलियांवाला बाग का बदला लेने के लिए भारत से ब्रिटेन गए थे। उधम सिंह देश की आजादी की लड़ाई में भगत सिंह के योगदान से काफी ज्यादा प्रेरित थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उधम सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के संगरूर में 26 दिसंबर 1899 उधम सिंह का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम शेर सिंह था। उधम सिंह ने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता और भाई को खो दिया था। जिसके बाद इनकी परवरिश अमृतसर के खालसा अनाथालय में हुई। वहीं 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उधम सिंह को अंदर तक झझकोर दिया था। 13 अप्रैल को ब्रिगेडियर जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों पर चली गोलियों ने उधम सिंह के दिल में बदले की भावना पैदा कर दी थी।इसे भी पढ़ें: Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: देश को गुलामी से आजाद कराने में चंद्रशेखर आजाद का रहा था अतुलनीय योगदानभगत सिंह के शागिर्दउधम सिंह ने भगत सिंह से प्रेरित होकर क्रांतिकारी आंदोलन में कदम रखा था। साल 1927 में वह हथियार और देशद्रोही साहित्य के आरोप में जेल गए। जहां पर भगत सिंह से उनकी मुलाकात हुई और उधम सिंह के इरादे अधिक मजबूत हुए। जेल से रिहा होने के बाद उधम सिंह ने सीधे लंदन की राह पकड़ी और वहां पर जलियांवाला बाग के लिए जिम्मेदार माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की ठानी।वहीं 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटोन हॉल में उधम सिंह ने एक किताब में छिपाई रिवॉल्वर से जनरल ओ डायर को दो गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया। उधम सिंह द्वारा लिया गया यह बदला जलियांवाला बाग हत्याकांड के घाव का प्रतीक था। हिला दी थी अंग्रेजों की नींवइसके बाद उधम सिंह पर मुकदमा चला, तो उन्होंने गर्व से कहा कि ऐसा उन्होंने अपने देश के लिए किया। वहीं 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में उधम सिंह को फांसी दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 04:30:38 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Munshi Premchand Birth Anniversary: जिनकी कहानियों में सांस लेता है भारत</title>
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<description><![CDATA[ आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह और उपन्यास सम्राट महान् कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से न सिर्फ दासता के विरुद्ध आवाज उठाई बल्कि लेखकों के उत्पीड़न के विरुद्ध भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने उपन्यासों और कहानियों के अलावा नाटक, समीक्षा, लेख, संस्मरण इत्यादि कई विधाओं में साहित्य सृजन किया। प्रेमचंद ऐसे कहानीकार और साहित्यकार थे, जिन्हें आज भी सबसे ज्यादा पढ़ा जाता रहा है। उन्हें ‘आम आदमी का साहित्यकार’ भी कहा जाता है। चूंकि उनकी लगभग सभी कहानियां आम जीवन और उसके सरोकारों से ही जुड़ी होती थी, इसीलिए उनके सबसे ज्यादा पाठक आम लोग रहे हैं। दरअसल उन्होंने अपने सम्पूर्ण साहित्य लेखन में एक आम गरीब आदमी की पीड़ा को न केवल समझा बल्कि अपनी कहानियों और उपन्यासों के जरिये उसका निदान बताने का प्रयास भी किया। उन्होंने अपनी लगभग सभी रचनाओं में आम आदमी की भावनाओं, उनकी परिस्थितियों, समस्याओं तथा संवेदनाओं का मार्मिक शब्दांकन किया। आज भी हिन्दी भाषी दिग्गज लेखकों और साहित्यकारों का यही मानना है कि मुंशी प्रेमचंद जैसा कलमकार हिन्दी साहित्य में न आज तक कोई हुआ है और न होगा। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने समाज को सदैव रूढि़वादी परम्पराओं और कुरीतियों से निकालने का प्रयास किया। उन्हें ‘हिन्दी साहित्य का माइलस्टोन’ भी कहा जाता है।इसे भी पढ़ें: Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: विधवा पुनर्विवाह कानून बनवाने में ईश्वर चंद्र विद्यासागर की रही थी अहम भूमिकाकम ही लोग यह जानते हैं कि जो मुंशी प्रेमचंद हिन्दी लेखन के लिए इतने विख्यात रहे हैं, उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू से की थी। अपना पहला साहित्यिक कार्य उन्होंने गोरखपुर से उर्दू में शुरू किया था और 1909 में कानपुर के ‘जमाना प्रेस’ से उर्दू में ही उनका पहला कहानी-संग्रह ‘सोज ए वतन’ प्रकाशित हुआ था, जिसकी सभी प्रतियां ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी। उस समय में वे उर्दू में ‘नबावराय’ के नाम से लिखते थे। उनका लिखा कहानी संग्रह जब्त करने के बाद ‘जमाना’ के सम्पादक मुंशी दयानारायण ने उन्हें परामर्श दिया कि भविष्य में अंग्रेज सरकार की नाराजगी से बचने के लिए नवाब राय के बजाय वे नए उपनाम ‘प्रेमचंद’ के नाम से लिखना शुरू करें। इस प्रकार वे नवाब राय से प्रेमचंद बन गए। उत्तर प्रदेश में वाराणसी के लमही गांव के डाक मुंशी अजायबलाल के घर 31 जुलाई 1880 को जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ मुंशी प्रेमचंद की हम 145वीं जयंती मना रहे हैं। प्रेमचंद वकील बनना चाहते थे लेकिन आर्थिक तंगी के चलते उनका वह सपना पूरा नहीं हो सका। मुंशी प्रेमचंद विधवा विवाह के पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने पहली पत्नी के निधन के बाद समाज के विरुद्ध जाकर वर्ष 1905 में 25 साल की आयु में शिवरानी नामक एक बाल विधवा से विवाह किया, जिसके बाद उनकी आर्थिक और पारिवारिक स्थितियों में बदलाव आया। वैसे तो उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में लेखन कार्य शुरू कर दिया था लेकिन उनके लेखन में परिपक्वता शिवरानी से विवाह के बाद ही आई थी, जिससे उनके लेखन की मांग बढ़ने लगी। उनकी दूसरी पत्नी शिवरानी ने ही बाद में उनकी जीवनी लिखी थी। अपने जीवन के आखिरी दिनों में प्रेमचंद जलोदर नामक बीमारी से ग्रसित हो गए थे और 8 अक्तूबर 1936 को दुनिया से अलविदा हो गए।मुंशी प्रेमचंद एक दिन बालेमियां मैदान में महात्मा गांधी का भाषण सुनने गए और उनके विचारों से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और उसके बाद पूरी तरह से स्वतंत्र लेखन में जुट गए। अपने जीवनकाल में मुंशी प्रेमचंद ने कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें और हजारों की संख्या में लेखों व संस्मरणों की रचना की। उनके चर्चित उपन्यासों में बाजार-ए-हुस्न (उर्दू में), गोदान, कर्मभूमि, गबन, सेवा सदन, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा इत्यादि और कहानियों में पूस की रात, नमक का दरोगा, बूढ़ी काकी, कफन, मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, आत्माराम, बड़े भाईसाहब, बड़े घर की बेटी, उधार की घड़ी, जुर्माना इत्यादि बहुत प्रसिद्ध रही। अपना अंतिम कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ उन्होंने वर्ष 1936 में लिखा, जो बेहद चर्चित रहा और आज भी आधुनिक क्लासिक माना जाता है। प्रेमचंद की कुछ कहानियों पर उनके निधन के बाद फिल्में भी बनी। 1980 में उनके उपन्यास ‘निर्मला’ पर एक टीवी धारावाहिक भी बना, जो काफी लोकप्रिय हुआ था। 1938 में उनके एक उपन्यास ‘सेवासदन’ पर फिल्म बनी। 1963 में ‘गोदान’ और 1966 में ‘गबन’ उपन्यास पर फिल्में बनी। 1977 में उनकी कहानी ‘कफन’ पर फिल्मकार मृणाल सेन द्वारा ‘ओका ऊरी कथा’ नामक तेलुगू फिल्म बनाई गई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। उनकी दो कहानियों 1977 में उनकी एक कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और 1981 में ‘सद्गति’ पर बॉलीवुड फिल्मकार सत्यजित राय ने फिल्में बनाई।- योगेश कुमार गोयल(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं) ]]></description>
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<pubDate>Thu, 31 Jul 2025 04:30:46 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: विधवा पुनर्विवाह कानून बनवाने में ईश्वर चंद्र विद्यासागर की रही थी अहम भूमिका</title>
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<description><![CDATA[ 19वीं सदी का भारत बदलावों के दौर से गुजर रहा था। एक ओर अंग्रेजी हुकूमत थी, तो दूसरी तरफ समाज में फैली कुरीतियों का अंधेरा फैला हुआ था। ऐसे समय में ईश्वर चंद्र विद्यासागर एक रोशनी की किरण बनकर उभरे। विद्यासागर ने न सिर्फ लोगों की सोच बदली बल्कि शिक्षा के लिए नई राहें भी खोलीं। आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ईश्वर चंद्र विद्यासागर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के वीरसिंह गांव में 26 सितंबर 1820 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म हुआ था। उनका परिवार काफी गरीब था, लेकिन उनके माता-पिता ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर को अच्छे संस्कार दिए और शिक्षा की अहमियत भी सिखाई। उन्होंने कठिन हालातों में भी पढ़ाई नहीं छोड़ी और संस्कृत में अपनी पकड़ इतनी मजबूत बनाई कि उनको &#039;विद्यासागर&#039; यानी की &#039;ज्ञान का सागर&#039; कहा जाने लगा। इसे भी पढ़ें: Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: देश को गुलामी से आजाद कराने में चंद्रशेखर आजाद का रहा था अतुलनीय योगदानसामाजिक कुरीतियों के खिलाफ उठाई आवाजउस समय समाज में विधवाओं की हालत बुरी थी, उनको दोबारा शादी करने का अधिकार नहीं था। बाल विवाह आम था और एक आदमी कई शादियां कर सकता था। विद्यासागर ने समाज में फैली इन गलत प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाई और विधवा पुनर्विवाह कानून बनवाने में मदद की। इसके साथ ही उन्होंने समाज को सही रास्ता दिखाने के लिए अपने बेटे की एक विधवा से शादी करवाई।बच्चों के पढ़ाई का हकविद्यासागर का मानना था कि सिर्फ अमीरों या ब्राह्मणों के लिए शिक्षा नहीं होनी चाहिए। बल्कि यह हर इंसान का हक है। उन्होंने बंगाली भाषा को सरल बनाया, जिससे कि आम लोग पढ़ सकें। विद्यासागर ने कई स्कूल और कॉलेज खोले और लड़कियों को पढ़ने का मौका दिया। उन्होंने गैर ब्राह्मण छात्रों के लिए भी स्कूल के दरवाजे खोले। जोकि उस समय बड़ा और साहसी कदम था।मृत्युईश्वर चंद्र विद्यासागर का जीवन साहस, सादगी और समाज सेवा का प्रतीक था। वहीं 29 जुलाई 1981 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 30 Jul 2025 04:30:44 +0530</pubDate>
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<title>Gayatri Devi Death Anniversary: इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी आलोचक थीं गायत्री देवी, जेल में किया गया था अमानवीय व्यवहार</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को जयपुर की महारानी गायत्री देवी का निधन हो गया था। वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहने वाली भारत की सबसे खूबसूरत महारानी थीं। गायत्री देवी उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी आलोचक थीं। बता दें कि जब देश में आपातकाल लगा, तो गायत्री देवी को गिरफ्तार कर लिया गया था। वह कांग्रेस के खिलाफ स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ती थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गायत्री देवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारयूनाइटेड किंगडम के लंदन में 23 मई 1919 को गायत्री देवी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जितेंद्र नारायण और मां का नाम इंदिरा देवी था। इनके पिता बंगाल के कूच बिहार के राजा थे। जयपुर के राजा महाराजा सवाई मान सिंह II से गायत्री देवी की शादी हुई थी।इसे भी पढ़ें: JRD Tata Birth Anniversary: जेआरडी टाटा ने दी थी देश को पहली एयरलाइंस, टाटा ग्रुप को शिखर तक पहुंचायाइंदिरा गांधी से गायत्री देवी का रिश्तागुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन से गायत्री देवी की स्कूली शिक्षा हुई थी। वह बचपन से बेहद खूबसूरत थीं। शांतिनिकेतन में ही इंदिरा गांधी भी पढ़ाई करती थीं। ऐसे में गायत्री देवी और इंदिरा गांधी बचपन से एक-दूसरे को जानती थीं और उसी समय से दोनों के बीच रंजिश शुरू हुई। ऐसा भी कहा जाता था कि इंदिरा गांधी को गायत्री देवी की खूबसूरती और प्रसिद्धि से जलन होती थी। वहीं बाद में यह रंजिश राजनीतिक दुश्मनी में बदल गई।राजनीतिक सफरगायत्री देवी को कांग्रेस में आने का न्‍योता पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। साल 1962 में गायत्री देवी ने कांग्रेस पार्टी के खिलाफ स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लड़ा और बड़े अंतर से जीत हासिल की। इतनी बड़ी जीत के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। हालांकि संसद में गायत्री देवी की मौजूदगी इंदिरा गांधी को खास रास नहीं आती थी। एक बार इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी को &#039;कांच की गुड़िया&#039; तक कह दिया था।इमरजेंसी में गईं जेलदेश में आपातकाल लगने के दौरान इंदिरा गांधी के विरोधी नेताओं को मीसा एक्ट के तहत जेल भेजा जा रहा था। इस समय गायत्री देवी मुंबई में इलाज करा रही थीं, तो वह बच गईं, लेकिन वह जैसे ही दिल्ली पहुंची उनको गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान गायत्री देवी 6 महीने तक जेल में रहीं। जेल में रहने के दौरान गायत्री देवी को माउथ अल्सर हो गया, इसके इलाज के लिए अनुमति देने में 3 सप्ताह लगा दिए गए। जेल में गायत्री देवी के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। हालांकि गायत्री देवी और इंदिरा गांधी के बीच आजीवन रंजिश बनी रही। वहीं बाद में गायत्री देवी ने राजनीति छोड़ दी।मृत्युवहीं 29 जुलाई 2009 को जयपुर में 90 वर्ष की आयु में गायत्री देवी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 30 Jul 2025 04:30:44 +0530</pubDate>
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<title>JRD Tata Birth Anniversary: जेआरडी टाटा ने दी थी देश को पहली एयरलाइंस, टाटा ग्रुप को शिखर तक पहुंचाया</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा का जन्म हुआ था। वह व्यवसायी रतनजी दादाभाई टाटा और उनकी फ्रांसीसी पत्नी सुजैन ब्रिएरे की दूसरी संतान थे। भारतीय उद्योग ही नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय इतिहास में भी जेआरडी टाटा एक सम्मानीय नाम हैं। वह टाटा समूह के लंबे समय तक चेयरमैन रहे और अपने अथक प्रयासों से समूह को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जेआरडी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...  जन्म और परिवारपेरिस में 29 जुलाई 1904 के जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। इनका बचपन अधिकतर फ्रांस में बीता। वहीं जेआरडी टाटा ने अपनी शिक्षा लंदन, फ्रांस, जापान और भारत से प्राप्त की। इनके पिता का नाम रतनजी दादाभाई टाटा और मां का नाम सुजैन ब्रिएरे था।इसे भी पढ़ें: Jim Corbett Birth Anniversary: जंगल के दोस्त और आदमखोरों के शिकारी थे जिम कार्बेट, 300 बाघों को सुलाई थी मौत की नींदप्राप्त किया पहला पायलट लाइसेंसबता दें कि 10 फरवरी 1929 को जेआरडी टाटा ने भारत में जारी पहला पायलट लाइसेंस प्राप्त किया। फिर उनको भारत में नागरिक उड्डयन के पिता के रुप में जाना जाने लगा। वह टाटा एयरलाइंस के संस्थापक थे, जिसको बाद में एयर इंडिया के नाम से जाना गया। जेआरडी टाटा ने साल 1932 में एयर इंडिया की स्थापान की और इसका नाम टाटा एयरलाइंस पर रखा गया। खुद भी उड़ाते रहे विमानसाल 1930 में आगा खान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए जेआरडी ने भारत से इंग्लैंड तक अकेले सफर किया था। इसके साथ ही जेआरडी टाटा ने कराची से बंबई की उड़ान भरी थी। फिर 78 साल की उम्र में उन्होंने अपने एकल उद्घाटन उड़ान को इसलिए दोहराया, ताकि युवा पीढ़ी में साहस की भावना आ सके।टाटा समूह की तरक्कीअपने परिवार का व्यवसाय संभालने के लिए जेआरडी टाटा को साल 1924 में मुंबई बुलाया गया था। जहां पर उन्होंने बाम्बे हाउस में टाटा स्टील के प्रभावरी निदेशक जॉन पीटरसन अधीन काम किया। इसके दो साल बाद ही वह टाटा सन्स के निदेशक बने और साल 1991 में वह चेयरमैन बन गए। इस दौरान उन्होंने टाटा समूह को 14 कंपनियों से 90 कंपनियों का मालिक बना दिया।पुरस्कारसाल 1955 में भारत सरकार ने जेआरडी टाटा को पद्म विभूषण से सम्मानित किया और साल 1992 में उनको भारत रत्न से नवाजा गया।मृत्युस्विट्जरलैंड में 29 नवंबर 1993 को गुर्दे में संक्रमण के कारण 89 वर्ष की आयु में जेआरडी टाटा का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 30 Jul 2025 04:30:44 +0530</pubDate>
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<title>Vincent Van Gogh Death Anniversary: पश्चिमी कला के इतिहास में सबसे महान चित्रकार थे विंसेंट वैन गाग, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ विंसेंट वैन गाग एक डच पोस्ट-इंप्रेशनिस्ट चित्रकार थे। जिनको सबसे महान कलाकारों में माना जाता है। हालांकि उनको अपने जीवनकाल में बहुत कम मान्यता मिली थी। बता दें कि 29 जुलाई 1890 को वैन गाग ने अपने सीने में खुद को गोली मार ली थी। वहीं दो दिन बाद 37 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई थी। वैन गाग के कार्यों ने उनकी मृत्यु के बाद पहचान हासिल की थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विंसेंट वैन गाग के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारनीदरलैंड में 30 मार्च 1853 को एक उच्च-मध्यमवर्गीय परिवार में विंसेंट वैन गाग का जन्म हुआ था। उनको बचपन से ही चित्रकारी का शौक था। लेकिन उनमें मानसिक अस्थिरता के लक्षण भी दिखते थे। युवावस्था में उन्होंने एक कला डीलर के तौर पर काम करना शुरू किया। वह अक्सर यात्रा करते रहते थे। वान गॉग कला में आधुनिकतावादी रुझानों से अच्छी तरह वाकिफ थे। 1881 में उन्होंने चित्रकला शुरू की, इसमें उनके छोटे भाई थियो ने आर्थिक सहायता प्रदान की।इसे भी पढ़ें: Jim Corbett Birth Anniversary: जंगल के दोस्त और आदमखोरों के शिकारी थे जिम कार्बेट, 300 बाघों को सुलाई थी मौत की नींदवान गाग की कृतियांउनकी शुरुआती कृतियों में ज्यादातर स्थिर जीवन चित्र और किसान मजदूरों के चित्रण शामिल हैं। साल 1888 में वह पेरिस चले गए, जहां पर उनकी मुलाकात कला जगत के अवांट-गार्डे के सदस्यों से हुई। फिर वह कलात्मक आश्रय और कम्यून स्थापित करने के लिए दक्षिणी फ्रांस के आर्ल्स चले गए। जहां पर उनके चित्र अधिक निखरते चले गए और उन्होंने अपना ध्यान प्राकृतिक दुनिया की तरफ लगाया। वान गॉग ने अपनी पहली बड़ी कृति &#039;द पोटैटो ईटर्स&#039; और &#039;किसान चरित्र अध्ययनों&#039; की एक श्रृंखला थी। उन्होंने सिर्फ एक दशक में करीब 2,100 कलाकृतियां बनाई थीं।मानसिक विकारों से पीड़ित थे वान गागवह मानसिक विकारों और भ्रमों से ग्रस्त थे। वान गाग अक्सर अपने शारीरिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करते थे। वह खाना कम खाते थे और खराब का सेवन अधिक करते थे। वान गाग ने मनोरोग अस्पतालों में भी समय बिताया। हालांकि हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद वह होम्योपैथिक चिकित्सक पॉल गैशेट की देखभाल में आ गए, लेकिन उनका अवसाद बना रहा।मृत्युअपने जीवन के अंतिम वर्षों में वान गाग ने आलोचनात्मक कलात्मक ध्यान करना शुरू किया। वान गाग के काम को अगले दशकों में व्यापक आलोचनात्मक और व्यावसायिक सफलता मिली। वहीं  29 जुलाई 1890 को वान गाग ने रिवॉल्वर से खुद को सीने में गोली मार ली, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 30 Jul 2025 04:30:43 +0530</pubDate>
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<title>APJ Abdul Kalam Death Anniversary: पायलट बनना चाहते थे एपीजे अब्दुल कलाम, संघर्ष से बनें 11वें राष्ट्रपति</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 27 जुलाई को भारत के 11वें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। वह एक अद्भुत वैज्ञानिक थे, जिनको हम सभी मिसाइल मैन के नाम से जानते हैं। डॉ अब्दुल कलाम ने विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। उनको प्रतिष्ठित पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने जीवन के 40 साल रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के लिए काम करते हुए बिताया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...बचपन में रहा संघर्षतमिलनाडु के रामेश्वरम में 15 अक्टूबर 1931 को डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन और मां का नाम आशियम्मा था। अब्दुल कलाम का बचपन काफी संघर्षों में बीता था। साथ ही उन्होंने आर्थिक परेशानियां दूर करने के लिए अखबार बांटा था। उन्होंने बतपन की पढ़ाई रामेश्वर से की है। इसके बाद साल 1954 में त्रिची के सेंट जोसेफ कॉलेज से साइंस की डिग्री हासिल की। इसे भी पढ़ें: Jim Corbett Birth Anniversary: जंगल के दोस्त और आदमखोरों के शिकारी थे जिम कार्बेट, 300 बाघों को सुलाई थी मौत की नींदइसके बाद अब्दुल कलाम ने साल 1957 मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर उन्होंने भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में भी किया था। साथ ही वह रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार रहे।पायलट बनना चाहते थे बता दें कि अब्दुल कलाम बचपन में पायलट बनना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। वह वैज्ञानिक बन गए और साल 2002 से लेकर 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे। वह हमेशा स्टूडेंट्स को प्रेरित करते थे और बड़े सपने देखने के लिए कहते थे।पुरस्कारडॉ अब्दुल कलाम को साल 1981 में पद्म भूषण, साल 1990 में पद्म विभूषण और साल 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 27 जुलाई 2015 को IIM शिलांग में लेक्चर देते समय डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 28 Jul 2025 04:30:27 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Jim Corbett Birth Anniversary: जंगल के दोस्त और आदमखोरों के शिकारी थे जिम कार्बेट, 300 बाघों को सुलाई थी मौत की नींद</title>
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<description><![CDATA[ उत्तराखंड के लिए जिम कार्बेट किसी फरिश्ते से कम नहीं थे। आज ही के दिन यानी की 25 जुलाई को जिम कार्बेट का जन्म हुआ था। इनका असली नाम एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट था और यह एक प्रसिद्ध शिकारी थे। जिम कार्बेट एक ओर आदमखोर हिंसक बाघ व तेंदुओं को मारकर आम जनता की रक्षा करते थे, तो वहीं वह दूसरी ओर पर्यावरण व वन्यजीवों का भी संरक्षण करते थे। आइरिस के नागरिक होने के बाद भी उनको भारत से इतना लगाव था कि वह यहीं के होकर रह गए। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जिम कार्बेट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तराखंड के नैनीताल में 25 जुलाई 1875 को जिन कार्बेट का जन्म हुआ था। इनके पिता पोस्टमास्टर थे। वहीं 4 साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया। जिसके बाद जिम कार्बेट की मां मैरी ने घर की जिम्मेदारी उठाई। वह 12 भाई-बहन थे, ऐसे में इतने बड़े परिवार को संभालने के लिए जिम कॉर्बेट ने रेलवे में नौकरी ले ली। लेकिन उनका सफर अलग था। लेकिन 1914 में सेकेंड वर्ल्ड वॉर होने पर वह कुमाऊं लौट आए।इसे भी पढ़ें: Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों तक पहुंचाए थे योग और वेदांत के दर्शननरभक्षियों के लिए थे कालजिम कार्बेट ने पवलगढ़ का कंवारा बाघ, थाक का बाघ के अलावा पौड़ी गढ़वाल और चंपावत आदि स्थानों पर हजारों लोगों को अपना शिकार बना चुके आदमखोर बाघों को मौत की नींद सुलाई थी। उन्होंने लोगों को बाघों के आतंक से राहत दिलाई। वहीं जिम कार्बेट को वन्य जीवों व पक्षियों की आवाज निकालने में भी महारथ हासिल थी।बेहतरीन लेखकउनकी गिनती बेहतरीन लेखकों में भी होती थी। उन्होंने शिकारी जीवन पर द टेंपल टाइगर, माई इंडिया, मैन ईटर्स ऑफ़ कुमांऊ, पर्ड आफ रुद्रप्रयाग, जंगल रोर व ट्री ट्राप्स जैसी किताबें लिखीं। कार्बेट के ऊपर फिल्म और डाक्यूमेंट्री भी बन चुकी है।एशिया का पहला टाइगर पार्क जिम कार्बेट आदमखोर जानवरों को मारने के बाद दुखी हो जाया करते थे। वह चाहते थे कि अगर जंगलों को न काटा जाए, तो जीवों को वनों के अंदर ही उनका भोजन मिल जाएगा। ऐसे में जंगली जीव मानव पर हमला नहीं करेंगे। जंगल को बचाने के लिए उन्होंने मुहिम भी चलाई थी। जिम कार्बेट की सलाह पर साल 1936 में अंग्रेज गर्वनमेंट ने उत्तराखंड में एशिया का पहला पार्क बनाया था।मृत्युवहीं 19 अप्रैल 1955 को आयरिश मूल के भारतीय लेखक व दार्शनिक जेम्स ए. जिम कार्बेट का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 26 Jul 2025 04:30:45 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>विश्व पटल पर भारतीय रंगमंच को स्थापित कर गये रतन</title>
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<description><![CDATA[ रतन थियम चले गए। दादा 23 जुलाई, 2025 को गए। मणिपुर रो रहा है। शांति की बात उन्होंने की। उनका रंगमंच चमका। वे कहते थे- “रंगमंच हमारी आत्मा है।” रचनात्मकता के हथियारों से युद्ध के खिलाफ युद्ध लड़ने वाला योद्धा नहीं रहा। अशांत मणिपुर को शांति का संदेश देते देते खामोश हो गये रतन थियम। रतन थियम भारतीय रंगमंच के एक विशाल पर्वत थे। उन्होंने मणिपुरी परंपराओं को विश्व के साथ जोड़ा। उनकी रचनाएँ—महाभारत त्रयी (उरुभंगम, चक्रव्यूह, कर्णभरम) और लैरेंबीगी ईशेई—युद्ध, पहचान और शांति पर गहरी सोच रखती थीं। मणिपुर के मैतेई-कुकी झगड़े से वे दुखी थे और शांति की आवाज़ बने। रतन एक रंगकर्मी या निर्देशक भर नहीं, वह रंग वैज्ञानिक थे, जिसने मणिपुर की आत्मा को वैश्विक कैनवास पर उकेरा। उनकी कला आज भी एकता की मिसाल है। उनका जाना भारत और दुनिया को झकझोर रहा है।  23 जुलाई, 2025 को रंगमंच की दुनिया एक अनमोल सितारे के बुझने से शोकाकुल हो उठी। रतन थियाम, वह दूरदर्शी नाटककार, निर्देशक और सांस्कृतिक दीपक, जिन्होंने 77 वर्ष की आयु में इम्फाल के रिम्स अस्पताल में अंतिम प्रणाम लिया। उनका निधन केवल भारतीय रंगमंच के लिए ही नहीं, अपितु वैश्विक मंच के लिए भी एक युग का अंत है, जहां उनके कार्य ने सीमाओं, भाषाओं और संस्कृतियों को लाँघकर मानव आत्मा की सार्वभौमिक पुकार को स्वर दिया। उन्हें केवल रंग कलाकार या निर्देशक कहना उनके अपार प्रतिभा को कमतर आंकना होगा; मैं कहूंगा कि वे एक रंग वैज्ञानिक थे—एक ऐसे महान रसायनज्ञ, जिन्होंने प्राचीन और समकालीन, स्थानीय और सार्वभौमिक, आध्यात्मिक और राजनैतिक तत्वों को सानंदित कर रंगमंच को एक अनुपम प्रयोगशाला बनाया। उनका मंच वह पवित्र स्थल था, जहाँ मणिपुर की परंपराएं, वैश्विक सौंदर्यबोध और मानवीय अनुभवों का कच्चा स्पंदन एक अनुपम सत्य और सौंदर्य के रूप में सानंदित हुआ।रंगमंच को समर्पित जीवन20 जनवरी, 1948 को मणिपुर के इम्फाल में जन्मे रतन थियाम एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, जिनकी रचनात्मक यात्रा चित्रकला और लेखन से प्रारंभ होकर रंगमंच में अपनी पराकाष्ठा तक पहुँची। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से 1974 में स्नातक होने के पश्चात, उन्होंने 1976 में इम्फाल के निकट कोरस रिपर्टरी थिएटर की स्थापना की, जो मणिपुर की संनादित संस्कृति और विश्व के साथ संवाद का एक पवित्र मंदिर बन गया। उनकी रंगमंचीय प्रस्तुतियाँ केवल नाटक नहीं थीं, अपितु युद्ध, पहचान और मानवता की अनंत खोज पर गहन चिंतन थीं।इसे भी पढ़ें: Mehmood Death Anniversary: एक्टिंग करने से पहले ड्राइवरी करते थे महमूद, ऐसे बने इंडस्ट्री के सबसे बड़े कॉमेडियनरतन थियम की महाभारत त्रयी—उरुभंगम (1981), चक्रव्यूह (1984), और कर्णभरम (1989)—तथा उत्तर प्रियदर्शी और लैरेंबीगी ईशेई जैसे कार्य युद्ध, पहचान और मानवता की अनंत खोज पर गहन चिंतन थे। यह त्रयी, जो भास के संस्कृत क्लासिक्स और थियम के मूल चक्रव्यूह पर आधारित थी, प्रतीकात्मक रूप से एक व्यक्ति के संरचित हिंसा के विरुद्ध संघर्ष और उसकी अनिवार्य पराजय को चित्रित करती थी। उरुभंगम में दुर्योधन का टूटा शरीर और आत्मा, चक्रव्यूह में अभिमन्यु का करुणाजनक फँसना और कर्णभरम में कर्ण का अस्तित्वगत संकट विश्व के युद्धों के बीच उभरकर सामने आया। जैसा कि समीक्षक समिक बंद्योपाध्याय ने, डॉ. पिनाक शंकर भट्टाचार्य, बनेश्वर सरथीबाला महाविद्यालय के अंग्रेजी के सहायक प्रोफेसर, के हवाले से कहा, “1981 में भास के उरुभंगम से शुरूआत कर, 1984 में अपने चक्रव्यूह के साथ और 1989 में भास के कर्णभरम के साथ समापन करते हुए, रतन ने एक महाभारत त्रयी पूर्ण की, जो एक व्यक्ति के हिंसा के विश्वव्यापी प्रवाह के सामने अपनी पहचान पर प्रश्न उठाने की थीम से जुड़ी थी।”थियम का 2014 का मैकबेथ, जिसे मैतेई संदर्भ में मणिपुरी संगीत और थांग-टा के साथ पुनर्रचित किया गया, ने शेक्सपियर के त्रासदी को एक सार्वभौमिक, और विशिष्ट रूप से स्थानीय महत्वाकांक्षा और विनाश की खोज में बदल दिया।भारत में, थियम का रंगमंच बेजोड़ था, जो मणिपुर की परंपराओं को आधुनिक संवेदनाओं के साथ इस तरह मिश्रित करता था, जैसा कि बादल सरकार के शहरी यथार्थवाद या हबीब तनवीर के लोक प्रयोगों में भी नहीं दिखता। थियम का मंच वह स्थान था जहाँ मणिपुर का सौंदर्यशास्त्र विश्व की रंगमंचीय परंपराओं से मिला, जिसने उनकी विरासत को बेजोड़ दूरदर्शी के रूप में स्थापित किया। उनके नाटक मणिपुर के अशांत सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य का दर्पण थे, जो जातीय संघर्षों, विद्रोहों और युद्ध के दागों को प्रतिबिंबित करते थे। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था, “युद्ध बच्चों को प्रभावित करता है। युद्ध महिलाओं को प्रभावित करता है; यह उन्हें वेश्या बना देता है। यह सब सामान्य नहीं है।” उनका रंगमंच युद्ध के खिलाफ एक युद्ध था, जो कला, सहानुभूति और अथक रचनात्मकता के हथियारों से लड़ा गया।वैश्विक स्तर पर, उनकी रस्मी तीव्रता ने जेर्जी ग्रोटोव्स्की के आध्यात्मिक न्यूनतमवाद, पीटर ब्रूक के अंतर सांस्कृतिक दायरे और तदाशी सुजुकी की शारीरिक सटीकता के साथ समानताएँ खींचीं, फिर भी उनका कार्य मणिपुर की सानंदित संस्कृति में अनूठा रहा। उनकी प्रस्तुतियाँ, जैसे कि नॉर्वे के इब्सन उत्सव में व्हेन वी डेड अवेकन, ने अपनी अतियथार्थवादी सार्वभौमिकता से वैश्विक दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।उनका कार्य प्राचीन नाट्य शास्त्र, मणिपुरी मार्शल आर्ट थांग-टा और जापानी नोह व ग्रीक त्रासदियों जैसे वैश्विक रंगमंचीय रूपों के बीच एक सेतु था, जिसने उन्हें ग्रोटोव्स्की और ब्रूक जैसे महानायकों की तुलना में ला खड़ा किया।थियम का रंगमंच औपनिवेशिक प्रभावों के खिलाफ एक विद्रोह था, जो भारत में उसके जड़ों को मिटाने का प्रयास करता था। “रंगमंच की जड़ों” के आंदोलन के अग्रणी व्यक्तित्व के रूप में, बी.वी. कारंत और के.एन. पाणिकर जैसे दिग्गजों के साथ, उन्होंने मणिपुर की परंपराओं—इसके नृत्य, संगीत और कथावाचन—को पुनर्जन्म देकर ऐसी कथ ]]></description>
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<pubDate>Fri, 25 Jul 2025 04:30:47 +0530</pubDate>
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<title>Mehmood Death Anniversary: एक्टिंग करने से पहले ड्राइवरी करते थे महमूद, ऐसे बने इंडस्ट्री के सबसे बड़े कॉमेडियन</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय सिनेमा में कॉमेडी को एक अलग लेवल पर ले जाने वाले महमूद का 23 जुलाई को निधन हो गया था। उनको किंग ऑफ कॉमेडी का खिताब मिला था। अभिनेता अपनी शानदार कॉमेडी के लिए जाने जाते थे। उन्होंने करीब 300 हिंदी फिल्मों में काम किया था। वह 50-70 के दशक के ऐसे कॉमेडियन थे, जिनकी तस्वीर सिनेमाघरों के बाहर हीरो के साथ पोस्टर पर छपती थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मशहूर कॉमेडियन महमूद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्ममुंबई में 29 जुलाई 1933 को महमूद का जन्म हुआ था। वह शुरूआत से फिल्मों में आना चाहते थे। लेकिन फिल्मों में आने से पहले महमूद मीना कुमारी के टेनिस कोच रहे थे। इसके अलावा वह हिंदी सिनेमा के डायरेक्टर पीएल संतोषी के ड्राइवर भी रहे थे।इसे भी पढ़ें: Mukesh Birth Anniversary: शोमैन राज कपूर की आवाज कहे जाते थे मुकेश, ऐसे बनाई थी इंडस्ट्री में जगहफिल्मी करियरमहमूद ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत फिल्म &#039;सीआईडी&#039; से की थी। &#039;किंग ऑफ कॉमेडी&#039; कहे जाने वाले महमूद ने अपने फिल्मी करियर के दौरान &#039;बॉम्बे टू गोवा&#039; समेत करीब 300 फिल्मों में अभिनय का हुनर दिखाया है। वहीं सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी महमूद की एक्टिंग के दीवाने थे। बिग बी उनको अपना गॉडफादर मानते थे। एक ऐसा भी दौर था, जब अभिनेता के पास इंडस्ट्री में कोई खास मुकाम नहीं था। जब महमूद ने ही बच्चन को अपने घर में रहने की जगह दी थी और फिल्मों में भी काम दिलाने की मदद की थी।अफेयरबता दें अभिनेता को न सिर्फ उनकी बेहतरीन फिल्मों बल्कि बेमिसाल लाइफस्टाइल के लिए भी जाने जाते हैं। अभिनेता की उस जमाने की जानी मानी एक्ट्रेस अरुणा ईरानी के साथ अफेयर रहा। लेकिन उन्होंने मीना कुमारी की बहन मधु से शादी की। फिर साल 1967 में उनका तलाक हो गया। जिसके बाद महमूद ने ट्रेसी अली से दूसरी शादी की।मृत्युवहीं 23 जुलाई 2004 को कॉमेडी के किंग महमूद ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 04:31:09 +0530</pubDate>
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<title>Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: देश को गुलामी से आजाद कराने में चंद्रशेखर आजाद का रहा था अतुलनीय योगदान</title>
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<description><![CDATA[ भारत की आजादी की लड़ाई में अनेक क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपने जान की परवाह न करके अपने अपने प्राणों की आहूति दी। उन्हीं में से एक चंद्रशेखर आजाद थे, जिनका नाम आज भी साहस और बलिदान के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था। आजाद सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं बल्कि युवाओं के लिए प्रेरणा थे। जिन्होंने अपने प्राणों को देश के लिए समर्पित कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर आजाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्ममध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के भावरा गांव में 23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और मां का नाम जगरानी देवी था। चंद्रशेखर बचपन से ही साहसी और आत्मसम्मान से भरे हुए थे। एक बार चंद्रशेखर से आम तोड़ने पर माली से माफी मांगने के लिए कहा गया, लेकिन वह माफी न मांगकर घर ही छोड़कर चले गए थे।इसे भी पढ़ें: Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: बुलंद हौसलों की मिसाल थे बाल गंगाधर तिलक, हिला दी थी अंग्रेजी सरकार की नींवऐसे मिला आजाद नामबता दें कि चंद्रशेखर आजाद ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया था। पहली बार जब चंद्रशेखर को पुलिस ने गिरफ्तार किया और जब जज के सामने उनसे उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम &#039;आजाद&#039; बताया था। अपने पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया था। यहीं से उनको चंद्रशेखर आजाद कहा जाने लगा था।कई क्रांतिकारी गतिविधियों में लिया हिस्साचंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ मिलकर कई क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया। इनमें से साल 1925 का काकोरी कांड, साल 1928 का सांडर्स हत्याकांड और 1929 में वह दिल्ली असेंबली बम कांड में शामिल रहे। चंद्रशेखर आजाद ने राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को एकजुट करने का काम किया था।निधनइलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जब चंद्रशेखर आजाद पुलिस से घिर गए, तो उन्होंने 27 फरवरी 1931 को खुद को गोली मार ली। क्योंकि आजाद ने कसम खाई थी कि अंग्रेज उनको जिंदा नहीं पकड़ सकेंगे। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 04:31:09 +0530</pubDate>
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<title>Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: बुलंद हौसलों की मिसाल थे बाल गंगाधर तिलक, हिला दी थी अंग्रेजी सरकार की नींव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को लोकमान्य बाल गंगाधर का जन्म हुआ था। वह एक भारतीय राष्ट्रवादी शिक्षक, वकील और स्वतंत्रता सेनानी हैं। उनके नाम के आगे &#039;लोकमान्य&#039; लगाया जाता है। यह ख्याति बाल गंगाधर तिलक ने अर्जित की है। उन्होंने सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थीं। इसी वजह से बाल गंगाधर तिलक को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक कहा जाता है। वैसे तो उनका पूरा जीवन ही आदर्श है, भारत के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के रत्नागिरी में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था। वह संस्कृत के विद्वान और प्रख्यात शिक्षक थे। उनकी मां का नाम पार्वती बाई गंगाधर था। साल 1871 में तिलक का विवाह तपिबाई से हुआ था। जिनका नाम शादी के बाद सत्यभामा हो गया। उन्होंने पुणे के एंग्लो वर्नाकुलर स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। वहीं 16 साल की उम्र में माता और फिर पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण करियर की शुरुआत कर दी। तिलक ने मुंबई के सरकारी लॉ कॉलेज से एलएलबी किया।इसे भी पढ़ें: Mangal Pandey Birth Anniversary: आजादी के महानायक मंगल पांडे के विद्रोह से शुरू हुई थी स्वाधीनता की अलखशिक्षक बन गए तिलकअपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद तिलक पुणे के एक निजी स्कूल में अंग्रेजी और गणित के शिक्षक बन गए। लेकिन स्कूल के अन्य शिक्षकों से मतभेद के बाद 1880 में उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया था। क्योंकि वह अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के आलोचक थे। तिलक स्कूलों में ब्रिटिश छात्रों की तुलना में भारतीय छात्र के साथ होने वाले दोगले व्यवहार का विरोध करते थे। वहीं उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ भी आवाज उठाई थी।आजादी के लिए प्रयासबाद में बाल गंगाधर तिलक ने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की। इसका उद्देश्य भारत में शिक्षा के स्तर को सुधारना था। इसके साथ ही उन्होंने मराठी भाषा में मराठा दर्पण और केसरी नाम से दो अखबार भी शुरू किए। जोकि उस दौर में काफी ज्यादा लोकप्रिय हुए थे। तिलक ने स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया। साथ ही उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भारतीयों को पूर्ण स्वराज देने की मांग की। अखबार में छपने वाले लेखों के कारण तिलक कई बार जेल भी गए। &#039;लोकमान्य&#039; की उपाधितिलक को उनके तेजस्वी विचारों, निर्भीक लेखनी और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जन-जागरण के लिए &#039;लोकमान्य&#039; की उपाधि मिली थी। वह ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिनके लिए जनता ने यह सार्वजनिक रूप से कहना शुरूकर दिया था कि बाल गंगाधर तिलक हमारे सच्चे नेता हैं। उन्होंने &#039;स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा&#039; का नारा दिया था।मृत्युवहीं 01 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरुआत के दिन बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 04:31:09 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Mukesh Birth Anniversary: शोमैन राज कपूर की आवाज कहे जाते थे मुकेश, ऐसे बनाई थी इंडस्ट्री में जगह</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा में कई ऐसे गायक हुए, जो आज भी अपने बेहतरीन गानों के लिए याद किए जाते हैं। ऐसे ही एक गायक मुकेश थे। आज ही के दिन यानी की 22 जुलाई को मुकेश का जन्म हुआ था। मुकेश को अभिनेता राज कपूर की आवाज कहा जाता था। मुकेश भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वह आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करते हैं। मुकेश सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी काफी फेमस थे। उनकी आवाज को काफी ज्यादा पसंद किया गया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुकेश के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ था और उनका पूरा नाम मुकेश चंद्र माथुर था। इनके पिता का नाम जोरावर चंद्र माथुर था, जोकि पेशे से इंजीनियर थे। मुकेश 10 भाई-बहन थे और वह छठे नंबर पर थे। मुकेश को बचपन से ही गाने में रुचि थी और वह अपने क्लासमेट्स को गाना गाकर सुनाया करते थे। मुकेश ने 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और पीडब्लूडी में नौकरी करने लगे थे। मुकेश हमेशा से फिल्मों में काम करना चाहते थे।इसे भी पढ़ें: Geeta Dutt Death Anniversary: गुरु दत्त का इश्क बना था गीता दत्त की मौत की वजह, सिंगर बन इंडस्ट्री पर किया था राजसिंगिंग करियरमुकेश एक बार अपने रिश्तेदार मोतीलाल की बहन की शादी में गाना गा रहे थे। मुकेश की आवाज मोतीलाल को इतनी पसंद आई कि वह उनको लेकर मुंबई चले गए। मुंबई में मोतीलाल ने मुकेश को गाने की ट्रेनिंग दिलाई। वहीं साल 1941 में आई फिल्म निर्दोष में भी मुकेश ने अभिनय किया था और इस फिल्म के सभी गाने भी गाए थे। इसके बाद सिंगर ने &#039;आह&#039;, &#039;अनुराग&#039;, &#039;माशूका&#039; और &#039;दुल्हन&#039; जैसी फिल्मों में भी बतौर अभिनेता काम किया।मुकेश ने अपने करियर में सबसे पहला गाना &#039;दिल ही बुझा हुआ हो तो&#039; गाया था। फिल्म इंडस्ट्री में मुकेश का शुरूआती दौर काफी मुश्किलों भरा था। लेकिन एक दिन के.एल सहगल पर मुकेश की आवाज का जादू चल गया। जिसके बाद उन्होंने मुकेश को गाने का मौका दिया। राज कपूर के लिए एक-दो गाने गाने के बाद ही 50 के दशक में मुकेश को &#039;शोमैन की आवाज&#039; कहा जाने लगा था। मुकेश ने &#039;दोस्त-दोस्त न रहा&#039;, &#039;जीना यहां मरना यहां&#039;, &#039;कहता है जोकर&#039;, &#039;आवारा हूं&#039; जैसे हिट गाने दिए।मुकेश ने अपने 40 साल के लंबे करियर में करीब 200 से अधिक फिल्मों के लिए गाने गाए। मुकेश उस जमाने के हर सुपरस्टार की आवाज बन गए थे। मुकेश की आवाज का जादू लोगों पर इस कदर था कि एक बार एक लड़की बीमार हो गई थी। लड़की अपनी मां से बोली कि यदि मुकेश आकर उसको अपना गाना सुनाएं, तो वह ठीक हो सकती है। डॉक्टर से यह बात पता लगने पर मुकेश फौरन उस लड़की से मिलने पहुंच गए और उसको गाना गाकर सुनाया।मृत्युबता दें कि 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो में परफॉर्मेंस के दौरान मुकेश को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। मुकेश के निधन पर राज कपूर ने कहा था कि मेरी आवाज और आत्मा दोनों चली गईं। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 04:30:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bruce Lee Death Anniversary: बिजली से भी तेज होती थी ब्रूस ली के किक की रफ्तार, ऐसे बने मार्शल आर्ट के बेहतरीन योद्धा</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी 20 जुलाई को मार्शल आर्ट के बेहतरीन योद्धा ब्रूस ली ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। उनकी शोहरत का यह आलम था कि यदि कोई मार्शल आर्ट में अच्छा होता था, तो उसकी तुलना ब्रूस ली से होती है। लेकिन उनकी महज 32 साल की उम्र में मृत्यु हो गई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मार्शल आर्ट के फेमस योद्धा ब्रूस ली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारसैन फ्रांसिस्को में 27 नवंबर 1940 को ब्रूस ली का जन्म हुआ था। मार्शल आर्ट के इस योद्धा को उस नर्स ने यह नाम दिया था, जहां पर उनका जन्म हुआ था। ब्रूस ली की मां ने उनका नाम ली जून-फैन रखा था। जोकि एक लड़की का नाम था।इसे भी पढ़ें: K Kamaraj Birth Anniversary: आजाद भारत के पहले किंगमेकर थे के कामराज, तीन बार बने तमिलनाडु के सीएमकरियरबेहद कम उम्र में ही ब्रूस ली ने अपने करियर की शुरुआत कर दी थी। महज 18 साल की उम्र में ही उन्होंने 20 फिल्मों में एक्टिंग की थी। ब्रूस ली ने अपनी फिल्मों में कई मार्शल कलाकारों के साथ काम किया था, जोकि बाद में बहुत बड़े सितारे बन गए। इस लिस्ट में सामो हंग, चंक नोरिस, जैकी चेन और यूएन बियाओ शामिल थे। ब्रूस ली बॉक्सर मोहम्मद अली और गामा पहलवान के बहुत बड़े फैन थे। ब्रूस ली एक फाइट मोहम्मद अली के साथ भी लड़ना चाहते थे। ब्रूस ली ने अपने करियर में करीब 7 हॉलीवुड फिल्मों में काम किया था। जिनमें से 3 फिल्में ब्रूस ली की मौत के बाद रिलीज हुई थीं।लोगों को हैरान कर देते थे ब्रूस लीब्रूस ली ने 18 साल की उम्र में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में एडमिशल लिया। यूनिवर्सिटी की फीस भरने के लिए ब्रूस ली ने लोगों को कुंग फू सिखाना शुरूकर दिया था। साल 1962 में उन्होंने एक फाइट लड़ी थी, जिसमें महज 11 सेकेंड में अपने विरोधी को 15 पंच मारे थे। ब्रूस ली दो उंगलियों से पुश अप लगा लेते थे। ब्रूस ली के किक की रफ्तार इतनी तेज होती थी कि शूटिंग के समय एक शूट को 34 फ्रेम स्लो करना पड़ता था। मौतबताया जाता है कि ब्रूस ली को पानी से बहुत नफरत थी और उनको तैरना भी नहीं आता ता। वहीं दावा किया जाता है कि ब्रूस ली की मौत की वजह भी पानी ही बना। बता दें कि 20 जुलाई 1973 को ब्रूस ली की 32 साल की उम्र में मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 21 Jul 2025 04:30:20 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Geeta Dutt Death Anniversary: गुरु दत्त का इश्क बना था गीता दत्त की मौत की वजह, सिंगर बन इंडस्ट्री पर किया था राज</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 20 जुलाई को फेमस गायिका गीता दत्त का निधन हो गया था। हिंदी सिनेमा में गीता दत्त को एक पार्श्व गायिका के रूप में विशेष पहचान मिली थी। भले ही आज गीता दत्त हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वह अपने गानों के जरिए अपने प्रशंसकों के दिलों में जिंदा रहेंगी। गीता दत्त के गानों लता मंगेशकर भी मुरीद हुआ करती थीं। उन्होंने तमाम सुपरहिट गानों में अपनी आवाज दी थी। जिनको दर्शक आज भी गुनगुनाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गीता दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारभारत के विभाजन से पहले फरीदपुर में 23 नवंबर 1930 को गीता दत्त का जन्म हुआ था। उनका असली नाम गीता घोष रॉय चौधरी था। वह बांग्लादेश के फरीदपुर जिले की रहने वाली थीं। लेकिन 40 के दशक में गीता का परिवार कोलकात आ गया था। गीता दत्त का संगीत से जुड़ाव बचपन से ही हो गया था। असल में गीता दत्त की मां अमिय देवी एक कवियत्री थीं और उनके पिता मुकुल रॉय संगीतकार थे।सिंगिंग करियरगीता दत्त ने छोटी उम्र से ही गाना शुरूकर दिया था। लेकिन गीता को बतौर सिंगर पहला ब्रेक साल 1946 में मिला था। जब वह महज 16 साल की थीं। गीता दत्त ने फिल्म &#039;भक्त प्रह्वाद&#039; के एक गाने में दो लाइनें गाई थीं। फिर उन्होंने फिल्म &#039;दो भाई&#039; के गाने में अपनी आवाज दी।इसे भी पढ़ें: Rajesh Khanna Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे राजेश खन्ना, बैक टू बैक दी थीं 15 हिट फिल्मेंअफेयर और शादीफिल्म &#039;बाजी&#039; की शूटिंग के दौरान गीता की गुरु दत्त से दोस्ती हो गई। इस फिल्म के गाने &#039;तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले&#039; में गीता ने अपनी आवाज दी थी। यह गाना सुपरहिट रहा था। गुरु और गीता की दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गई और साल 1953 में दोनों ने शादी कर ली। इसके बाद गीता और गुरु के तीन बच्चे तरुण, नीना और अरुण हुए। दोनों की लाइफ बहुत अच्छी चल रही थी।वहीदा रहमान की एंट्रीगुरु और गीता की शादी काफी अच्छी चल रही थी और फिर गुरुदत्त की जिंदगी में वहीदा रहमान की एंट्री हुई। गुरु दत्त का वहीदा की तरफ झुकाव बढ़ता जा रहा था। इस वजह से गुरु दत्त और गीता दत्त के रिश्ते में तनाव बढ़ने लगा। साल 1957 में गुरु दत्त और गीता दत्त की शादीशुदा जिंदगी में दरार आ गई और दोनों अलग-अलग रहने लगे।पति की मौत से याददाश्त खो बैठीं गीतागीता दत्त अपने पति से बेहद प्यार करती थीं। गीता ने निजी जिंदगी में परेशानी के कारण अपने काम पर ध्यान देना बंद कर दिया। जिस कारण इंडस्ट्री के लोगों ने गीता दत्त से मुंह मोड़ लिया। वहीं साल 1964 में गुरु दत्त के अचानक निधन की खबरें आईं। बताया जाता है कि गुरु दत्त ने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली। पति की मौत ने गीता दत्त को तोड़कर रख दिया था।मृत्युअभिनेता गुरु दत्त की मौत के बाद गीता दत्त की जिंदगी में एक समय वह भी आया, जब गीता अपनी याददाश्त खो बैठी थीं। कुछ समय बाद गीता की हालत ऐसी हो गई कि वह अपने बच्चों को भी नहीं पहचानती थीं। हालांकि समय के साथ गीता दत्त की हालात में सुधार आया और आर्थिक तंगी की वजह से एक बार उन्होंने फिर से गाने की कोशिश की। लेकिन 20 जुलाई 1972 को 41 साल की उम्र में गीता दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 21 Jul 2025 04:30:20 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Geeta, Dutt, Death, Anniversary:, गुरु, दत्त, का, इश्क, बना, था, गीता, दत्त, की, मौत, की, वजह, सिंगर, बन, इंडस्ट्री, पर, किया, था, राज</media:keywords>
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<title>Mangal Pandey Birth Anniversary: आजादी के महानायक मंगल पांडे के विद्रोह से शुरू हुई थी स्वाधीनता की अलख</title>
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<description><![CDATA[ हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था। लेकिन देश की आजादी के लिए वर्षों तक लड़ाई लड़ी गई थी। बता दें कि सबसे पहले साल 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंका गया था। इस चिंगारी को भड़काने का काम मंगल पांडे ने किया था। साल 1857 में मंगल पांडे ने भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मंगल पांडे भारत के ऐसे वीर सपूत थे, जिनके बदौलत आजादी की लड़ाई ने रफ्तार पकड़ी थी। आज ही के दिन यानी की 19 जुलाई को मंगल पांडे का जन्म हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मंगल पांडे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के बलिया जिले में 19 जुलाई 1827 को मंगल पांडे का जन्म हुआ था। वह ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था। वहीं महज 22 साल की उम्र में मंगल पांडे का ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में चयन हो गया। वह बंगाल के नेटिव इंफेंट्री की 34 बटालियन में शामिल हुए थे। इस बटालियन में ब्राह्मणों की भर्ती अधिक होती थी।इसे भी पढ़ें: Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों तक पहुंचाए थे योग और वेदांत के दर्शनक्यों मशहूर हुए मंगल पांडेसाल 85 के भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडेय ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपनी ही बटालियन के खिलाफ बगावत कर दी थी। दरअसल, ब्रिटिश शासन ने अपनी बटालियन को एंफील़्ड राइफल दी थी। इसका निशाना अचूक था। लेकिन इस बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया काफी पुरानी थी। राइफल में गोली भरने के लिए कारतूस को दांतों से खोलना होता था। लेकिन मंगल पांडे ने ऐसा करने से मना कर दिया, क्योंकि ऐसी बात फैल चुकी थी कि कारतूस में सुअर और गाय के मांस का उपयोग किया जा रहा है।अंग्रेजी हुकूमत को मंगल पांडे का विरोध पसंद नहीं आया और उनको गिरफ्तार कर लिया गया। इसी बगावत ने मंगल पांडे को मशहूर कर दिया और देश की आजादी की ज्वाला में घी डालने का काम किया। इसी कारण से मंगल पांडे को स्वतंत्रता सेनानी कहा गया। हालांकि 1857 का विद्रोह सिर्फ बंदूक की एक गोली के कारण शुरू हुआ था, लेकिन इसका नतीजा देश को आजादी मिलने तक जारी रहेगा, यह किसी ने भी नहीं सोचा था।मृत्युबैरकपुर में ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला करने और उनके खिलाफ विद्रोह करने के कारण 08 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दी गई। मंगल पांडे को फांसी तय डेट से 10 दिन पहले दी गई, क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत को यह डर था कि मंगल पांडे की फांसी से हालात अधिक बिगड़ सकते हैं। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 20 Jul 2025 04:30:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Mangal, Pandey, Birth, Anniversary:, आजादी, के, महानायक, मंगल, पांडे, के, विद्रोह, से, शुरू, हुई, थी, स्वाधीनता, की, अलख</media:keywords>
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<title>Rajesh Khanna Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे राजेश खन्ना, बैक टू बैक दी थीं 15 हिट फिल्में</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का आज ही के दिन यानी की 18 जुलाई को निधन हो गया था। इंडस्ट्री में राजेश खन्ना को प्यार से &#039;काका&#039; भी कहा जाता था। 60-70 के दशक में राजेश खन्ना का ऐसा जादू चलता था कि उनकी फिल्में देखने के लिए सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ पड़ती थी। एक समय पर जब निर्माता-निर्देशक की उनके पास लाइन लगी रहती थी, तो वहीं एक समय ऐसा भी आया था, जब उनको काम मिलना मुश्किल हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राजेश खन्ना के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को राजेश खन्ना का जन्म हुआ था। उनका असली नाम जतिन खन्ना था। राजेश खन्ना ने अपनी पढ़ाई पुणे और मुंबई से पूरी की थी। वहीं साल 1973 में राजेश खन्ना ने एक्ट्रेस डिंपल कपाड़िया से शादी की थी, जोकि उस समय 16 साल की थीं। राजेश और डिंपल की दो बेटियां ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना हैं। इसके अलावा राजेश खन्ना के एक्ट्रेस अंजू महेंद्र के साथ भी रिश्ता चर्चा में रहा था।इसे भी पढ़ें: Guru Dutt Birth Anniversary: सक्सेज और शोहरत पाने के बाद भी ताउम्र बेचैन रहे गुरुदत्त, जानिए लाइफ के अनसुने किस्सेफिल्मी करियरराजेश खन्ना ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत 1966 में फिल्म &#039;आखिरी पतंग&#039; से की थी। हालांकि अभिनेता को असली पहचान साल 1969 में आई फिल्म &#039;आराधना&#039; से मिली थी। इस फिल्म में अभिनेता के रोमांटिक अंदाज ने दर्शकों का दिल जीत लिया था। इसके बाद राजेश खन्ना को &#039;कटी पतंग&#039;, &#039;आनंद&#039;, &#039;सफर&#039;, &#039;बावर्ची&#039; और &#039;हाथी मेरे साथी&#039; जैसी फिल्मों ने सुपरस्टार बना दिया था। साल 1969 से 1971 तक राजेश ने 15 से ज्यादा सुपरहिट फिल्में दी हैं, जोकि एक रिकॉर्ड है। वहीं उनके डायलॉग जैसे &#039;बाबा मोशाय&#039; और गाने &#039;मेरे सपनों की रानी&#039; आज भी लोगों की जुबान पर है।सेट पर देर से आने की आदतअभिनेता राजेश खन्ना अपनी फिल्मों के लिए जितने फेमस हैं, उतना ही सेट पर देर से आने की आदत के लिए भी जाने जाते थे। एक बार फिल्म &#039;आखिरी खत&#039; की शूटिंग के समय जोकि उनकी पहली फिल्म थी, उसका समय सुबह 8 बजे तय किया गया था। लेकिन अभिनेता सेट पर 11 बजे पहुंचे। जिस कारण उनको डांट भी पड़ी थी। लेकिन काका ने बेबाकी से जवाब देने हुए कहा कि वह किसी के लिए अपनी लाइफस्टाइल नहीं बदलेंगे।राजेश खन्ना का स्टारडमआप राजेश खन्ना के स्टारडम का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि शूटिंग सेट के बाहर प्रशंसकों की भीड़ जमा हो जाती थी। खासकर लड़कियां राजेश खन्ना की एक झलक पाने के लिए बेताब रहती थीं। जब काका की सफेद कार स्टूडियो या निर्माता के दफ्तर के बाहर रुकती थी, तो लड़कियां उनकी कार को चूम लेते थी। कार पर इतने लिपस्टिक के निशान पड़ते थे कि उनकी सफेद कार गुलाबी दिखने लगती थी।मृत्युराजेश खन्ना सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि एक दौर थे। उनकी मुस्कान, रोमांटिक अंदाज और भावुक अभिनय ने लाखों दिलों पर राज किया। अपनी जिंदगी के आखिरी समय में वह काफी अकेले रह गए थे। वहीं 18 जुलाई 2012 को लंबी बीमारी के बाद राजेश खन्ना ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 19 Jul 2025 04:30:32 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Rajesh, Khanna, Death, Anniversary:, हिंदी, सिनेमा, के, पहले, सुपरस्टार, थे, राजेश, खन्ना, बैक, टू, बैक, दी, थीं, हिट, फिल्में</media:keywords>
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<title>K Kamaraj Birth Anniversary: आजाद भारत के पहले किंगमेकर थे के कामराज, तीन बार बने तमिलनाडु के सीएम</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 जुलाई को कुमारस्वामी कामराज का जन्म हुआ था। उनको आजादी के बाद कांग्रेस के सबसे ताकतवर अध्यक्ष के तौर पर भी जाना जाता है। वहीं पं. नेहरू के निधन के बाद के कामराज कांग्रेस में अधिक ताकतवर हो गए थे। हालांकि बाद में उनसे इंदिरा गांधी ने टक्कर ली थी। हालांकि जब साल 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं, तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका के कामराज की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर के कामराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के विरदुनगर में 15 जुलाई 1903 को के कामराज का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नाडेर था। हालांकि बाद में वह कामराज के नाम से जाने गए थे। वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। वहीं के कामराज 15 साल की उम्र में जलियावाला बाग हत्याकांड के कारण स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। फिर महज 16 साल की उम्र में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। जब के कामराज 18 साल के थे, तब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन की शुरूआत की थी।इसे भी पढ़ें: Chandrashekhar Death Anniversary: राजनीति में सिद्धांतों के योद्धा माने जाते थे पूर्व पीएम चंद्रशेखरके कामराज भी इस आंदोलन में शामिल हुए और साल 1930 में के कामराज ने नमक आंदोलन में हिस्सा लिया और इस दौरान वह पहली बार जेल गए। इसके बाद वह 6 बार जेल गए। के कामराज ने करीब 3,000 दिन जेल में बिताए थे। जेल में रहने के दौरान के कामराज ने अपनी पढ़ाई पूरी की और इसी दौरान वह म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चेयरमैन चुने गए। लेकिन जेल से आने के करीब 9 महीने बद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।तमिलनाडु के सीएमके कामराज को दक्षिण भारत की राजनीति में शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए जाना जाता है। देश की आजादी के बाद 13 अप्रैल 1954 में के कामराज अनिच्छा से तमिलनाडु के सीएम बनें। इससे राज्य को एक ऐसा नेता मिला, जो क्रांतिकारी कदम उठाने वाला था। के कामराज तीन बार तमिलनाडु के सीएम बनें। किंगमेकर बने के कामराजबता दें कि के कामराज को आजाद भारत के पहले किंगमेकर के रूप में भी जाना जाता है। कामराज को दो बार पीएम बनने का मौका मिला, लेकिन उन्होंने यह पद नहीं लिया। फिर पं. नेहरू की मौत के बाद साल 1964 में कांग्रेस नेतृत्व के संकट का सामना कर रही थी। ऐसे में बतौर कांग्रेस अध्यक्ष उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को पीएम पद की कुर्सी तक पहुंचाया।लेकिन शास्त्री की मौत के बाद एक बार फिर जब पीएम की कुर्सी खाली हुई, तब भी के कामराज के पास प्रधानमंत्री बनने का मौका था। लेकिन उन्होंने फिर से इस पद को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। इंदिरा गांधी से बढ़ने लगे थे मतभेदकांग्रेस के भीतर कामराज और उनके सहयोगियों को &#039;सिंडिकेट&#039; के नाम से जाना जाता था। जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी में कामराज की पकड़ कमजोर करने का काम शुरू किया। दरअसल, सिंडिकेट पार्टी चलाता था और इंदिरा सरकार चला रही थीं। पार्टी और सरकार के बीच इतने मतभेद हो गए कि साल 1969 में औपचारिक रूप से पार्टी का विभाजन हो गया।साल 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कई राज्यों में हार मिली। लोकसभा में पार्टी को 258 सीटें मिलीं। वहीं के कामराज भी गृह विधानसभा विरदुनगर से हार गए। इस बार इंदिरा गांधी ने कहा कि हारे हुए नेताओं को पद छोड़ना होगा। ऐसे में के कामराज ने भी कांग्रेस अध्यक्ष पद को छोड़ दिया। इस बार नए कांग्रेस अध्यक्ष निजा लिंगाप्पा बने, लेकिन संगठन के फैसले के कामराज ही ले रहे थे। लेकिन ऐसा लंबे समय तक नहीं चला और संगठन व सरकार के बीच दूरी बढ़ती गई।मृत्युवहीं 02 अक्तूबर 1975 को गांधी जयंती के दिन 72 साल की उम्र में के कामराज की हार्ट अटैक से मौत हो गई। साल 1976 में के कामराज को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 18 Jul 2025 04:30:43 +0530</pubDate>
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<title>Aruna Asaf Ali Birth Anniversary: अरुणा आसफ अली के शौर्य ने हिला दी थीं ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें</title>
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<description><![CDATA[ वर्तमान समय में महिलाएं हर क्षेत्र में परचम लहरा रही हैं। लेकिन न सिर्फ आज बल्कि देश की आदाजी से पहले भी महिलाओं की सहभाहिता ने अहम भूमिका निभाई थी। जब अंग्रेजों से देश को स्वतंत्र कराने में देशवासी संघर्ष कर रहे थे, तो इस दौरान महिलाएं भी अपना योगदान दे रही थीं। ऐसी ही एक महिला अरुणा आसफ अली हैं। जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और भारत छोड़ो आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। आज ही के दिन यानी की 16 जुलाई को अरुणा आसफ अली का जन्म हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अरुणा आसफ अली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षातात्कालिक पंजाब के कालका में 16 जुलाई 1909 को अरुणा आसफ अली का जन्म हुआ था। इनका असली नाम अरुणा गांगुली था। इनके पिता का होटल था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा नैनीताल से पूरी की और फिर आगे की शिक्षा के लिए वह लाहौर चली गईं। अरुणा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और पढ़ाई में अव्वल रहती थीं।इसे भी पढ़ें: K Kamaraj Birth Anniversary: आजाद भारत के पहले किंगमेकर थे के कामराज, तीन बार बने तमिलनाडु के सीएमकरियरअपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अरुणा शिक्षिका बन गईं। इस दौरान वह कोलकाता के गोखले मेमोरियल कॉलेज में पढ़ाने लगीं। फिर साल 1928 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के नेता आसफ अली से प्रेम विवाह कर लिया। बता दें कि आसफ अली अरुणा गांगुली से 21 साल बड़े थे।स्वतंत्रता संग्राम में योगदानफिर अरुणा आसफ अली ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और साल 1930, 1932 और 1942 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के समय जेल गईं। साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में जब गांधी जी और पंडित नेहरू समेत कांग्रेस के सभी नेता गिरफ्तार हुए। उस समय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अरुणा आसफ ने हिस्सा लिया और अगले दिन गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा लहराया था। इस दौरान उन्होंने तीन साल तक भूमिगत रहते हुए आंदोलन जारी रखा। जब उनको ब्रिटिश पुलिस गिरफ्तार न कर सकी, तो अरुणा की संपत्ति जब्त कर बेच दी गई।मृत्युवहीं 29 जुलाई 1996 में 87 साल की उम्र में अरुणा आसफ अली का कोलकाता में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 18 Jul 2025 04:30:42 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Guru Dutt Birth Anniversary: सक्सेज और शोहरत पाने के बाद भी ताउम्र बेचैन रहे गुरुदत्त, जानिए लाइफ के अनसुने किस्से</title>
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<description><![CDATA[ बेहतरीन फिल्मों के जरिए भारतीय सिनेमा को गुलजार करने वाले फिल्ममेकर गुरुदत्त का 09 जुलाई को जन्म हुआ था। उन्होंने जिंदगी के हर रंग देख थे और अपने करियर में कई शानदार फिल्मों का निमार्ण करने के साथ एक्टिंग का भी लोहा मनवाया था। गुरुदत्त एक काबिल-ए-तारीफ फिल्ममेकर, अभिनेता, राइटर और प्रोड्यूसर थे। सब कुछ होने के बाद भी गुरुदत्त ताउम्र बेचैन रहे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर गुरुदत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबेंगलुरू में 09 जुलाई 1925 को गुरुदत्त का जन्म हुआ था। इनका असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह 10वीं के आगे पढ़ाई नहीं कर पाए थे। लेकिन उनको शुरू से ही संगीत और कला में काफी दिलचस्पी थी। इस कारण उनको स्कॉलरशिप मिलने के बाद उदय शंकर इंडिया कल्चर सेंटर में एडमिशन ले लिया था। यहां पर गुरुदत्त ने डांस सीखा और कोरियोग्राफर बन गए।इसे भी पढ़ें: RD Burman Birth Anniversary: सुरों के सरताज थे पंचम दा, बॉलीवुड को दिए कई बेहतरीन गानेंफिल्मी करियरभारतीय सिनेमा की मिसाल बन चुके गुरुदत्त एक ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने न सिर्फ जीवन को सिनेमा का पर्दा समझा, बल्कि उसमें अपना सबकुछ झोंक दिया। उनके अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी। गुरुदत्त के अंदर पर्दे पर कुछ अद्भुत और अद्वितीय रचने की बेचैनी थी। वह अपने आप में सिनेमा का महाविद्यालय थे। उनकी तीन क्लासिक फिल्में &#039;प्यासा&#039;, &#039;साहिब बीवी और गुलाम&#039; और &#039;कागज के फूल&#039; को टेक्स्ट बुक का दर्जा प्राप्त है।साल 1946 में गुरुदत्त ने प्रभात स्टूडियो की फिल्म &#039;हम एक हैं&#039; से बतौर कोरियोग्राफर अपना फिल्मी करियर शुरू किया था। इसके बाद उनको फिल्म में एक्टिंग करने का भी मौका मिला था। साल 1951 में देवानंद की फिल्म &#039;बाजी&#039; के सक्सेज के बाद गुरुदत्त की मुलाकात गीता दत्त से हुई। इस फिल्म के दौरान गुरु और गीता करीब आए और उन्होंने साल 1953 में शादी कर ली।पर्सनल लाइफअपनी शादीशुदा जिंदगी में गुरुदत्त काफी खुश थे और करियर में भी लगातार आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान गुरुदत्त की मुलाकात वहीदा रहमान से हुई। बताया जाता है कि वहीदा और गुरुदत्त एक-दूसरे के प्यार में पड़ गए। हालांकि गुरुदत्त पहले से शादीशुदा थे, ऐसे में वहीदा रहमान की वजह से गुरुदत्त और उनकी पत्नी गीता दत्त से आए दिन झगड़े होते रहते थे। साल 1975 में गुरुदत्त और गीता की शादीशुदा जिंदगी में दरार आ गई और दोनों अलग-अलग रहने लगे।मृत्युइंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक कई हिट फिल्में देने वाले गुरुदत्त उस दौरान दिवालिया हुए, जब उनकी फिल्म &#039;कागज के फूल&#039; फ्लॉप हो गई। जहां एक ओर उनकी निजी जिंदगी में परेशानियां थीं, तो वहीं दूसरी तरफ प्रोफेशनल लाइफ में भी होने वाले नुकसान से वह टूट गए थे। गुरुदत्त ने दो बार आत्महत्या करने का भी प्रयास किया था। वहीं 10 अक्तूबर 1964 को गुरुदत्त अपने बेडरूम में मृत पाए गए। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 10 Jul 2025 04:30:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Jyoti Basu Birth Anniversary: बंगाल के लौह पुरुष कहे जाते थे ज्योति बसु, जानिए क्यों ठुकराया था PM पद</title>
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<description><![CDATA[ भारत के वामपंथी सुपरस्टार ज्योति बसु का 08 जुलाई को जन्म हुआ था। हालांकि उनकी एकतरफा शैली के लिए हमेशा आलोचना की जाती थी। लेकिन ज्योति बसु की राजनीतिक सूझबूझ और निर्णय क्षमता को भी समान रूप से स्वीकार किया गया था। ज्योति बसु हमेशा हमेशा कलफ लगे सफेद कपड़े पहनना पसंद करते थे। बता दें कि वह 23 साल से भी ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल के सीएम रहे। वह किसी भी भारतीय राज्य के सबसे लंबे समय तक सीएम बने रहने वाले पहले व्यक्ति थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योति बसु के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाकोलकाता में 08 जुलाई 1914 को ज्योति बसु का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम निशिकांत बसु और मां का नाम हेमलता देवी था। इन्होंने शुरूआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक किया। फिर साल 1935 में कानून की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन चले गए। ब्रिटेन में रहने के दौरान वह वामपंथी सिद्धांत और व्यवहार से प्रभावित हो गए। वह ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। जब वह भारत वापस लौटे तो भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करना जारी रखा।इसे भी पढ़ें: Shyama Prasad Mukherjee Birth Anniversary: श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नींव पर खड़ी हुई BJP, आर्टिकल 370 के थे आलोचकइस दौरान वह जवाहलाल नेहरू जैसे व्यक्तियों के लिए काम करने लगे। साल 1940 में भारत वापस लौटने के बाद बसु ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में बैरिस्टर के तौर पर रजिस्ट्रेशन करवाया। फिर साल 1944 में बंगाल असम रेलरोड वर्कर्स यूनियन का गठन हुआ, तो ज्योति बसु इसके पहले सचिव बने।पश्चिम बंगाल के सीएमदेश को ब्रिटिश शासन से आजादी मिलने के साल 1952 में ज्योति बसु बारानगर से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। 1950-60 के दशक में वह मूल रूप से प्रांतीय राजनीतिज्ञ बने रहे। अक्सर उनको गिरफ्तार किया जाता था और वह पुलिस को चकमा देने के लिए भूमिगत हो जाते थे। जब सीपीआई का विभाजन हुआ, तो ज्योति बसु सीपीआई (एम) के पोलित ब्यूरो के सदस्य बन गए। साल 1977 में यानी की आपातकाल के बाद वाम मोर्चे ने पश्चिम बंगाल राज्य में अपनी सरकार बनाई और ज्योति बसु राज्य का मुख्यमंत्री चुना गया।पीएम पद का ऑफरसाल 1996 में ज्योति बसु भारत के पहले कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री बनने के काफी करीब पहुंच गए थे। ज्योति बसु को पीएम बनने का प्रस्ताव मिला, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। यह भारतीय राजनीति के इतिहास में अहम घटना है, जिसको ज्योति बसु ने बाद में ऐतिहासिक भूल बताया था। ज्योति बसु का मानना था कि भारत में वामपंथी आंदोलन के लिए एक बड़ा मौका था, जिसको पार्टी ने गंवा दिया था।मृत्युसाल 2000 में ज्योति बसु ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। वहीं 17 जनवरी 2010 को ज्योति बसु का निधन हो गया था। ज्योति बसु को बंगाल के लौह पुरुष के रूप में याद किया जाता है। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 09 Jul 2025 04:30:36 +0530</pubDate>
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<title>Chandrashekhar Death Anniversary: राजनीति में सिद्धांतों के योद्धा माने जाते थे पूर्व पीएम चंद्रशेखर</title>
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<description><![CDATA[ भारत के 8वें प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर का 08 जुलाई को निधन हो गया था। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले पूर्व पीएम चंदशेखर &#039;युवा तुर्क&#039; और &#039;क्रांतिकारी जोश&#039; के नाम से भी फेमस रहे। बता दें कि प्रधानमंत्री बनने से पहले वह किसी राज्य या केंद्र में मंत्री पद पर नहीं रहे थे। लेकिन फिर भी चंद्रशेखर की आवाज संसद से लेकर सड़क तक गूंजती थी। भले ही उनका बतौर प्रधानमंत्री कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन उससे कहीं ज्यादा लंबा उनका राजनीतिक सफर रहा है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम चंद्रशेखर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाउत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में 17 अप्रैल 1927 चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में पोस्‍ट-ग्रेजुएशन किया। उन्होंने युवावस्था में ही सामाजिक न्याय और समानता के लिए आवाज उठाना शुरूकर दिया था। साल 1950 में वह समाजवादी आंदोलन से जुड़े और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के जरिए राजनीतिक यात्रा शुरू की थी।इसे भी पढ़ें: Jyoti Basu Birth Anniversary: बंगाल के लौह पुरुष कहे जाते थे ज्योति बसु, जानिए क्यों ठुकराया था PM पदराजनीतिक सफरसाल 1962 में वह पहली बार बलिया से लोकसभा के लिए चुने गए थे। तब से चंद्रशेखर की भारतीय राजनीति में उपस्थिति लगातार मजबूत होती चली गई। साल 1960 और 1970 के दशक में वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। इस दौरान वह &#039;युवा तुर्क&#039; के रूप में उभरे। उन्होंने गरीबों और वंचितों के लिए जोरदार आवाज उठाई। समाजवादी नीतियों और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कदमों के समर्थन ने चंद्रशेखऱ को जनता के बीच लोकप्रिय बनाया।साल 1975 में आपातकाल के समय उन्होंने इंदिरा गांधी की नीतियों का विरोध किया और जेल भी गए। लेकिन इस कठिन समय में भी उनके सिद्धांतों के प्रति निष्ठा अडिग रही। साल 1977 में चंद्रशेखर ने जनता पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई। साल 1995 में चंद्रशेखर को उत्कृष्ट सांसद का पुरस्कार दिया गया।देश के 8वें पीएमतभी तमाम सियासी उथल-पुथल के बीच 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर ने देश के 8वें पीएम के तौर पर शपथ ली। हालांकि उनका कार्यकाल सिर्फ 7 महीने का रहा। पीएम के तौर पर चंद्रशेखर का कार्यकाल राजनीति के सबसे अस्थिर दौरों में से एक था। इस समय देश सामाजिक अशांति, आर्थिक संकट और राजनीतिक अनिश्चितता से जूझ रहा था। चंद्रशेखर की सरकार को कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर निर्भर रहना पड़ा। उन्होंने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में कई निर्णायक कदम भी उठाए।राजीव गांधी की जासूसी कराने का आरोपसाल 1990-91 में चंद्रशेखर पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जासूसी कराने का आरोप लगा था। इन आरोपों की वजह से कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। जिस कारण उनकी सरकार अल्पमत में आ गई। वहीं 06 मार्च 1991 को उन्हें पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। मृत्युवहीं 08 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 09 Jul 2025 04:30:35 +0530</pubDate>
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<title>Vikram Batra Death Anniversary: विक्रम बत्रा ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को चटाई थी धूल, परमवीर चक्र से किए गए सम्मानित</title>
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<description><![CDATA[ कारगिल युद्ध के हीरो और परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा का 07 जुलाई को निधन हो गया था। उन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने जान की परवाह न करते हुए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया था। वह कारगिल युद्ध के हीरो होने के साथ ही बहुत बहादुर भी थे। बहादुरी के कारण ही उनको भारतीय सेना ने &#039;शेरशाह&#039; तो पाकिस्तानी सेना से &#039;शेरखान&#039; नाम दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारविक्रम बत्रा का जन्म 09 सितंबर 1974 को हुआ था। इनके पिता का नाम गिरधारी लाल बत्रा और मां का नाम कमला था। यह जुड़वा बच्चे थे, ऐसे में इनका नाम लव-कुश रखा गया था। जिसमें से लव विक्रम बत्रा और कुश यानी की उनके छोटे भाई विशाल बत्रा थे। विक्रम बत्रा की शुरूआती शिक्षा मां कमला के मार्गदर्शन में हुए। फिर केंद्रीय विद्यालय पालमपुर से 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से बीएससी किया। विक्रम एनसीसी के होनहार कैडेट थे, इसी वजह से विक्रम बत्रा ने सेना में जाने का निर्णय लिया।इसे भी पढ़ें: Shyama Prasad Mukherjee Birth Anniversary: श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नींव पर खड़ी हुई BJP, आर्टिकल 370 के थे आलोचकमर्चेंट नेवी की नौकरी को कहा था नसाल 1997 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से भी नौकरी का ऑफर आया था। लेकिन विक्रम ने लेफ्टिनेंट की नौकरी को चुना। साल 1996 में इंडियन मिलिट्री एकैडमी में मॉनेक शॉ बटालियन में विक्रम बत्रा का चयन हुआ और उनको जम्मू कश्मीर राइफल यूनिट, श्योपुर में लेफ्टिनेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था। वहीं कुछ समय बाद उनको कैप्टन रैंक दिया गया था। विक्रम बत्रा के नेतृत्व में टुकड़ी ने 5140 पर कब्जा किया था।यह दिल मांगे मोर 01 जून 1999 को विक्रम बत्रा की टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया था। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद विक्रम बत्रा को कैप्टन बना दिया गया था। वहीं कैप्टन विक्रम बत्रा को श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। हालांकि बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बाद भी उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर 20 जून 1999 को इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया था। शेरशाह के नाम से फेमस विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के माध्यम से विजय उद्घोष &#039;दिल मांगे मोर&#039; कहा, तो न सिर्फ सेना बल्कि पूरे भारत में यह शब्द गूंजने लगे थे। इस लाइन का कई अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल किया गया। मृत्युवहीं 07 जुलाई 1999 को एक अहम चोटी को जीतने के इरादे से विक्रम बत्रा की बटालियन आगे बढ़ती है, इस चोटी पर पाकिस्तानी सेना ने कब्जा कर लिया था। इस दौरान बत्रा की बटालियन को भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ता है। हालांकि विक्रम बत्रा के नेतृत्व में बटालियन चोटी पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लेते हैं। लेकिन इस दौरान विक्रम बत्रा को दुश्मन सेना की गोलियां लग जाती हैं। इस दौरान विक्रम बत्रा के एक सैनिक राइफलमैन संजय कुमार को भी गोली लगती है और वह गंभीर रूप से घायल हैं।विक्रम बत्रा अपने साथी की मदद करने के लिए आगे बढ़ते हैं। संजय कुमार एक खुली पहाड़ी पर फंसे होते हैं। लेकिन विक्रम बत्रा बिना किसी डर के आगे बढ़ते हैं और खतरनाक गोली बारी में वह अपने साथी तक पहुंचने में कामयाब रहते हैं। वह अपने सैनिक साथी को वहां से निकाल लेते हैं। लेकिन पहाड़ी से उतरते समय कैप्टन विक्रम बत्रा को गोली लग जाती है और 07 जुलाई 1999 को उनकी मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 08 Jul 2025 04:30:33 +0530</pubDate>
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<title>Shyama Prasad Mukherjee Birth Anniversary: श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नींव पर खड़ी हुई BJP, आर्टिकल 370 के थे आलोचक</title>
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<description><![CDATA[ जब भी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम आता है, तो एक हिंदूवादी नेता की छवि उभरती है। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जनसंघ का संस्थापक माना जाता है। जोकि बाद में भारतीय जनता पार्टी बनकर उभरी थी। आज ही के दिन यानी की 06 जुलाई को श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ था। साथ ही मुखर्जी को एक देश, एक निशान, एक विधान और एक प्रधान के संकल्प के अगुवाकार के तौर पर भी जाना जाता है। भारत के विकास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बड़ा योगदान है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राष्ट्रवादी नेता डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकलकत्ता के एक प्रतिष्ठित परिवार में 06 जुलाई 1901 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम आशुतोष मुखर्जी था। वहीं साल 1917 में उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की और साल 1921 में बीए की डिग्री प्राप्त की। साल 1923 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लॉ की डिग्री हासिल की। फिर वह इंग्लैंड चले गए। फिर जब वह भारत वापस आए तो वह बैरिस्टर बन चुके थे। वहीं 33 साल की उम्र में मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने।इसे भी पढ़ें: राष्ट्रीय एकीकरण के नायक: डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जीराजनीतिक सफरसियासी सफर की शुरूआत में श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे। लेकिन मतभेद होने पर वह हिंदू महासभा के सदस्य बन गए। साल 1939 में वह जब पश्चिम बंगाल के प्रवास पर गए, तो इस दौरान उनकी मुलाकात की। एक समय पर जब उनको यह एहसास हुआ कि मुस्लिम लीग भारत में अलगाव पैदा कर रही है, राजनीतिक दलों द्वारा मुस्लिमों के अधिकारों की बात की जाती है, लेकिन हिंदुओं की बात उठाने के लिए कोई राजनीतिक दल सामने नहीं आता है।नेहरू मंत्रिमंडल से दिया इस्तीफासाल 1947 में भारत के आजाद होने पर पहली बार सरकार का गठन किया गया और मंत्रिमंडल की स्थापना की गई। इस मंत्रिमंडल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग मंत्री के रूप में जगह मिली। लेकिन उस दौरान परिस्थितियों को देखते हुए मुखर्जी ने साल 1950 में अपने पद से और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। क्योंकि वह मानते थे कि नेहरू-लियाकत पैक्ट के जरिए हिंदुओं के साथ धोखा किया गया है।जनसंघ की नींवपंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ मिलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 मई 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की। डॉ. मुखर्जी को जनसंघ के अध्यक्ष और उपाध्याय महामंत्री चुने गए। साल 1952 में हुए पहली बार आम चुनाव में बंगाल से जीत हासिल कर डॉ. मुखर्जी लोकसभा पहुंचे। इस दौरान मुखर्जी सदन में मुखर होकर कांग्रेस के खिलाफ बोलते थे। वहीं जम्मू-कश्मीर को लेकर मुखर्जी का रुख यही था कि अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया जाए। वहीं जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के तहत लाया जाए। आगे जाकर जनसंघ के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की थी।मृत्युबता दें कि 23 जून 1953 हार्ट अटैक से डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 07 Jul 2025 04:30:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dhirubhai Ambani Death Anniversary: धीरूभाई अंबानी ने तय किया था शून्य से शिखर तक सफर, ऐसे बने बिजनेस टायकून</title>
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<description><![CDATA[ आज के समय में रिलायंस इंडस्ट्रीज देश की ही नहीं बल्कि दुनिया की दिग्गज कंपनी मानी जाती है। कंपनी पेट्रोलियम से लेकर मोबाइल, रिटेल, टेक्सटाइल आदि के क्षेत्र में भी फैली है। कंपनी की सफलता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज का मार्केट कैप 16 लाख करोड़ रुपये के भी पार है। लेकिन रिलायंस कंपनी की स्थापना करने वाले धीरूभाई अंबानी ने सिर्फ 500 रुपए से बिजनेस की शुरूआत की थी। आज यानी की 06 जुलाई को धीरूभाई अंबानी का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर धीरूभाई अंबानी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारगुजरात के छोटे से कस्बे में 28 दिसंब 1933 को धीरूभाई अंबानी का जन्म हुआ था। घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए धीरूभाई अंबानी ने हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद छोटे-मोटे काम करना शुरूकर दिया था। वहीं महज 17 साल की उम्र में वह अपने भाई रमणिकलाल के पास यमन चले गए और वहां पर पेट्रोल पंप पर काम करने लगे। इस दौरान उनको हर महीने 300 रुपए मिलते थे। धीरूभाई अंबानी बड़ा सोचते थे और उसको करके भी दिखाते थे।इसे भी पढ़ें: Ram Vilas Paswan Birth Anniversary: सियासी दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाते थे राम विलास पासवानइतने रुपए लेकर आए थे मायानगरीधीरूभाई अंबानी हमेशा से कुछ अलग करने में विश्वास रखते थे। वह साल 1954 में यमन से भारत वापस आए। अपना कारोबार करने के सपने को लेकर मुंबई पहुंच गए। उस समय धीरूभाई अंबानी के पास 500 रुपए थे। उनको भारतीय बाजार की अच्छी समझ थी और उन्होंने देखा कि भारत में पॉलिस्टर की मांग बहुत है। विदेशों में भारतीय मसालों की काफी मांग है। धीरूभाई ने चचेरे भाई चंपकलाल दिमानी की सहायता से रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन कंपनी बनाई। इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने पश्चिमी देशों में हल्दी, अदरक और अन्य मसालों का निर्यात करने लगे। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे बनाई रिलायंस कंपनीसबसे पहले धीरूभाई अंबानी ने कंपनी का नाम रिलायंस कमर्शियल कॉर्पोरेशन रखा। इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने भारत में विदेशी पोलिस्टर और विदेशों में भारत के मसालों को बेचना शुरू किया। कुछ समय बाद उन्होंने नरोदा में एक वस्त्र निर्माण इकाई शुरू की। फिर उन्होंने विमल ब्रांड की शुरूआत की, जोकि चचेरे भाई रमणिकलाल अंबानी के बेटे विमल अंबानी के नाम पर था। फिर इसका नाम रिलायंस टेक्सटाइल्स प्राइवेट रख दिया। अंत में उन्होंने इसका नाम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड कर दिया। साल 1996 में वह भारत की पहली निजी कंपनी बन गई, जिसकी S&amp;P और मूडीज जैसी इंटरनेशनल क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने उसकी रेटिंग करना शुरूकर दिया। धीरूभाई अंबानी ने खून-पसीने से सींचकर रिलायंस कंपनी को खड़ा किया। मृत्युवहीं 06 जुलाई 2022 को 69 साल की उम्र में धीरूभाई अंबानी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 07 Jul 2025 04:30:29 +0530</pubDate>
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<title>Ram Vilas Paswan Birth Anniversary: सियासी दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाते थे राम विलास पासवान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 जुलाई को LJP नेता राम विलास पासवान का जन्म हुआ था। बता दें कि बिहार की राजनीति में उनका नाम अमर है। उन्होंने करीब पांच दशकों तक देश की सियासत में अपना योगदान दिया था और हमेशा दलितों के हक के लिए संघर्ष करते रहे। वह सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राम विलास पासवान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाबिहार के खगड़िया जिले के शहरबन्नी गांव में एक दलित परिवार में 05 जुलाई 1946 को राम विलास पासवान का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा कोसी कॉलेज और पटना विश्वविद्यालय से पूरी की। साल 1969 में राम विलास पासवान का चयन बिहार पुलिस में DSP के रूप में हो गया। सरकारी नौकरी होने के बाद भी उनका मन समाज सेवा में और बदलाव में लगा था। जिस कारण उन्होंने नौकरी छोड़ दी और राजनीति का रुख किया। इसे भी पढ़ें: Gulzari Lal Nanda Birth Anniversary: दो बार देश के अंतरिम PM बने थे गुलजारी लाल नंदा, ऐसा रहा राजनीतिक सफरऐसे की राजनीति में एंट्रीराम विलास पासवान ने अपने सियासी सफर की शुरुआत संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से की। फिर साल 1969 में वह अलौली विधानसभा सीट से विधायक बने। साल 1977 में हाजीपुर से जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता और उन्होंने करीब 4.25 लाख वोटों के रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की। जोकि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।फिर साल 1989 में पासवान ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा। साल 2000 में पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की, यह पार्टी दलित और पिछड़े वर्गों के लोगों की आवाज बनी। वह 9 बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सांसद रहे। उन्होंने 6 प्रधानमंत्रियों वी.पी. सिंह, एच.डी. देवगौड़ा, आई.के. गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सरकार में रह चुके हैं। वह केंद्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं, जोकि उनके राजनीतिक सूझबूझ को दिखाता है।सियासत का मौसम वैज्ञानिकबता दें कि राम विलास पासवान को &#039;मौसम वैज्ञानिक&#039; कहा जाता था। क्योंकि वह सही समय पर गठबंधन चुनने में माहिर रहे। वहीं उनका निजी जीवन भी चर्चा में रहा। उन्होंने साल 1960 में राजकुमारी देवी से शादी की फिर साल 1981 में तलाक के बाद साल 1983 में रीना शर्मा से दूसरी शादी की। वर्तमान समय में उनके बेटे चिराग पासवान अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।मृत्युराम विलास पासवान की 08 अक्तूबर 2020 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 06 Jul 2025 04:30:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Gulzari Lal Nanda Birth Anniversary: दो बार देश के अंतरिम PM बने थे गुलजारी लाल नंदा, ऐसा रहा राजनीतिक सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 04 जुलाई को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा का जन्म हुआ था। बता दें कि वह साल 1964 और फिर 1966 में दो बार भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने संकट के समय दो बार देश की बागडोर संभाली, लेकिन फिर भी उन्होंने कभी सरकारी सुख-सुविधाओं की चाहत नहीं रखी। देश की आजादी की लड़ाई में गुलजारी लाल नंदा ने जेल की यात्रा की और यातनाएं भी सही, वह मजदूरों की आवाज बने लेकिन सत्ता के शिखर पर पहुंचकर भी उन्होंने हमेशा सादगी की चादर ओढ़े रखी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुलजारी लाल नंदा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षापाकिस्तान के सियालकोट में 04 जुलाई 1898 को गुलजारी लाल नंदा का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा लाहौर, आगरा और इलाहाबाद से पूरी की थी। गुलजारी लाल नंदा का जीवन जितना सादा और महान रहा उतना ही गुमनाम भी रहा।दो बार बने प्रधानमंत्रीसाल 1957 और 1962 में गुलजारी लाल नंदा साल दो लोकसभा के लिए चुने गए। वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के निधन के बाद 27 मई 1964 को गुलजारी लाल ने अंतरिम पीएम का पदभार संभाला। हालांकि यह कार्यकाल सिर्फ 13 दिनों के लिए थे। इसके बाद ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद एक बार फिर 11 जनवरी 1966 को उन्होंने अंतरिम पीएम पद की शपथ ली। साल 1962 और 1963 में उन्होंने केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री का पदभार संभाला। इसके बाद साल 1963 से 1966 तक वह गृह मामलों के मंत्री रहे।इसे भी पढ़ें: Swami Vivekananda Death Anniversary: विचारों के युगदृष्टा, युवाओं के पथप्रदर्शक हैं स्वामी विवेकानंदमकान मालिक ने घर से निकालादो बार देश के प्रधानमंत्री और काफी वक्त तक केंद्रीय मंत्री रहने वाले गुलजारी लाल नंदा के पास आखिरी समय में अपना घर तक नहीं था। उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह किराया दे सकें। कुछ समय तक किराया न मिलने की वजह से मकान मालिक ने उनको घर से निकाल दिया। जब यह खबर फैली तो केंद्रीय अधिकारियों को उनके पास भेजा गया। साथ ही उनको स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाला 500 रुपये का भत्ता लेने के लिए किसी तरह से मनाया गया। जब मकान मालिक को यह पता चला कि वह पूर्व पीएम हैं, तो उसने भी गुलजारी लाल नंदा से माफी मांगी।सम्मानसाल 1997 में गुलजारी लाल नंदा को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 15 जनवरी 1998 को गुलजारी लाल नंदा का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 05 Jul 2025 04:30:41 +0530</pubDate>
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<title>Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों तक पहुंचाए थे योग और वेदांत के दर्शन</title>
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<description><![CDATA[ स्वामी विवेकानंद एक महान भारतीय संत, आध्यात्मिक गुरु और समाज सुधारक थे। स्वामी विवेकानंद का असली नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। आज ही के दिन यानी की 04 जुलाई को स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने अपने जीवन में जो उपलब्धियां अर्जित की थीं, वह देशवासियों के लिए सम्मान योग्य बन गई थीं। उनका जीवन हर युवा के लिए प्रेरणास्त्रोत है। स्वामी विवेकानंद के जीवन और शिक्षाओं ने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में आध्यात्मिक जागरण और मानव की सेवा की प्रेरणा दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाकोलकाता में 12 जनवरी 1863 को नरेंद्र नाथ दत्त का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वदत्त था, जोकि फेमस वकील थे और उनकी मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था। उनकी शुरूआती शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन से पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। नरेंद्र नाथ एक मेधावी छात्र थे और उनको पढ़ाई के अलावा संगीत, खेलकूद और अन्य कलाओं में भी रुचि रखते थे।इसे भी पढ़ें: Swami Vivekananda Death Anniversary: विचारों के युगदृष्टा, युवाओं के पथप्रदर्शक हैं स्वामी विवेकानंदरामकृष्ण परमहंस से मिलननरेन्द्रनाथ की आध्यात्मिक खोज ही उनको रामकृष्ण परमहंस के पास लेकर आई। रामकृष्ण परमहंस के साथ नरेन्द्रनाथ की पहली मुलाकात साल 1881 में हुई थी। परमहंस ने उनको अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया।संन्यास और नया नाम1886 में रामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद, नरेन्द्रनाथ ने संन्यास ले लिया। संन्यासी नरेंद्रनाथ ने अपना नाम बदलकर स्वामी विवेकानंद रख लिया। इसके बाद उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की और भारतीय समाज की दशा को देखा और समझा।शिकागो धर्म महासभासाल 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में स्वामी विवेकानंद ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। यहां पर उनके भाषण में पश्चिमी देशों में भारतीय संस्कृति और वेदांत दर्शन की महत्ता को उजागर किया। स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण की शुरूआत &#039;अमेरिका के भाइयों और बहनों&#039; के संबोधन से हुई और इसने सबका दिल जीत लिया। उनके भाषण से दो मिनट तक धर्म संसद तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।रामकृष्ण मिशन की स्थापनासाल 1897 में स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस को समर्पित रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य शिक्षा, सेवा और आध्यात्मिकता के जरिए से समाज की सेवा करना था। इस मिशन द्वारा कई विद्यालय, अस्पताल औऱ सामाजिक सेवा के कार्य शुरू हुई। इसके अलावा स्वामी विवेकानंद ने बारानगोर मठ की स्थापना की, जोकि बाद में रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय बना। इस मठ का उद्देश्य धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक कार्यों को समर्थन देना है। निधनस्वामी विवेकानंद का 04 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में निधन हो गया था, उस दौरान वह सिर्फ 39 साल के थे। लेकिन स्वामी विवेकानंद के जीवन और कार्यों का प्रभाव आज भी व्यापक रूप से महसूस किया जा सकता है। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 05 Jul 2025 04:30:40 +0530</pubDate>
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<title>Swami Vivekananda Death Anniversary: विचारों के युगदृष्टा, युवाओं के पथप्रदर्शक हैं स्वामी विवेकानंद</title>
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<description><![CDATA[ स्वामी विवेकानंद सदैव युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्त्वि के धनी माने जाते रहे हैं, जिन्हें उनके ओजस्वी विचारों और आदर्शों के कारण ही जाना जाता है। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि थे और खासकर भारतीय युवाओं के लिए उनसे बढ़कर भारतीय नवजागरण का अग्रदूत अन्य कोई नेता नहीं हो सकता। 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे स्वामी विवेकानंद अपने 39 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में समूचे विश्व को अपने अलौकिक विचारों की ऐसी बेशकीमती पूंजी सौंप गए, जो आने वाली अनेक शताब्दियों तक समस्त मानव जाति का मार्गदर्शन करती रहेगी। विवेकानंद के बारे में कहा जाता है कि वे स्वयं भूखे रहकर अतिथियों को खाना खिलाते थे और बाहर ठंड में सो जाते थे। मानवता के वे कितने बड़े हितैषी थे, यह उनके इस वक्तव्य से समझा जा सकता है कि भारत के 33 करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी-देवताओं की भांति मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी-देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए। विवेकानंद का व्यक्तित्व कितना विराट था, यह गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि अगर आप भारत को जानना चाहते हैं तो आप विवेकानंद को पढि़ए। विवेकानंद का कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। युवा शक्ति का आव्हान करते हुए उन्होंने अनेक मूलमंत्र दिए।वे एक ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिनकी ओजस्वी वाणी सदैव युवाओं के लिये प्रेरणास्रोत बनी रही। विवेकानंद ने देश को सुदृढ़ बनाने और विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए हमेशा युवा शक्ति पर भरोसा किया। युवा वर्ग से उन्हें बहुत उम्मीदें थीं और युवाओं की अहम् भावना को खत्म करने के उद्देश्य से ही उन्होंने अपने एक भाषण में कहा भी था कि यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खड़े हो जाओगे तो तुम्हें सहायता देने के लिए कोई भी आगे नहीं बढ़ेगा। इसलिए यदि सफल होना चाहते हो तो सबसे पहले अपने अहम् का नाश कर डालो। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। युवा शक्ति का आव्हान करते हुए उन्होंने एक मंत्र दिया था, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ अर्थात् ‘उठो, जागो और तब तक मत रूको, जब तक कि मंजिल प्राप्त न हो जाए।’ ऐसा अनमोल मूलमंत्र देने वाले स्वामी विवेकानंद ने सदैव अपने क्रांतिकारी और तेजस्वी विचारों से युवा पीढ़ी को ऊर्जावान बनाने, उसमें नई शक्ति एवं चेतना जागृत करने और सकारात्कमता का संचार करने का कार्य किया।इसे भी पढ़ें: Dadabhai Naoroji Death Anniversary: दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में बने थे भारतीयों की आवाज, ऐसा रहे जीवनयुवा शक्ति का आव्हान करते हुए स्वामी विवेकानंद ने अनेक मूलमंत्र दिए, जो देश के युवाओं के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। उनका कहना था, ‘‘ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं। वो हम ही हैं, जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है। मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में है, आधुनिक पीढ़ी से मेरे कार्यकर्ता आ जाएंगे। डर से भागो मत, डर का सामना करो। यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है लेकिन जो दूसरों के लिए जीते हैं, वे वास्तव में जीते हैं। जो भी कार्य करो, वह पूरी मेहनत के साथ करो। दिन में एक बार खुद से बात अवश्य करो, नहीं तो आप संसार के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति से मिलने से चूक जाओगे। उच्चतम आदर्श को चुनो और उस तक अपना जीवन जीयो। सागर की तरफ देखो, न कि लहरों की तरफ। महसूस करो कि तुम महान हो और तुम महान बन जाओगे। काम, काम, काम, बस यही आपके जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। धन पाने के लिए कड़ा संघर्ष करो पर उससे लगाव मत करो। जो गरीबों में, कमजोरों में और बीमारियों में शिव को देखता है, वो सच में शिव की पूजा करता है। पृथ्वी का आनंद नायकों द्वारा लिया जाता है, यह अमोघ सत्य है, अतः एक नायक बनो और सदैव कहो कि मुझे कोई डर नहीं है। मृत्यु तो निश्चित है, एक अच्छे काम के लिए मरना सबसे बेहतर है। कुछ सच्चे, ईमानदार और ऊर्जावान पुरुष और महिलाएं एक वर्ष में एक सदी की भीड़ से अधिक कार्य कर सकते हैं। विश्व एक व्यायामशाला है, जहां हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।’’11 सितम्बर 1893 को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म पर अपने प्रेरणात्मक भाषण की शुरूआत उन्होंने ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ के साथ की तो बहुत देर तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही। अपने उस भाषण के जरिये उन्होंने दुनियाभर में भारतीय अध्यात्म का डंका बजाया। विदेशी मीडिया और वक्ताओं द्वारा भी स्वामीजी को धर्म संसद में सबसे महान व्यक्तित्व और ईश्वरीय शक्ति प्राप्त सबसे लोकप्रिय वक्ता बताया जाता रहा। यह स्वामी विवेकानंद का अद्भुत व्यक्तित्व ही था कि वे यदि मंच से गुजरते भी थे तो तालियों की गड़गड़ाहट होने लगती थी। उन्होंने 1 मई 1897 को कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन तथा 9 दिसंबर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की थी। 4 जुलाई 1902 को इसी रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण किए वे चिरनिद्रा में लीन हो गए लेकिन उनकी कीर्ति युगों-युगों तक जीवंत रहेगी।- योगेश कुमार गोयल(लेखक 35 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं) ]]></description>
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<pubDate>Fri, 04 Jul 2025 04:30:28 +0530</pubDate>
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<title>Dadabhai Naoroji Death Anniversary: दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में बने थे भारतीयों की आवाज, ऐसा रहे जीवन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 30 जून को दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था। वह एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, विद्वान और लेखक थे। उन्होंने अंग्रेजों के भ्रष्टाचार को पूरी दुनिया के सामने लाकर देश के लोगों जागरुक करने का काम किया था। इस कारण दादाभाई नौरोजी को &#039;ग्रांड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया&#039; भी कहा जाता है। उनका भारत के लिए योगदान अतुलनीय था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दादाभाई नौरोजी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...पहले पारसी समाज के लिएबता दें कि 04 सितंबर 1825 को नवसारी में दादाभाई नौरोजी का जन्म हुआ था। उन्होंने एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट स्कूल में अपनी शुरूआती पढ़ाई की थी। जहां पर उनको बड़ोदरा के महाराजा का संरक्षण मिला और वह दीवान के रूप में कार्य करने लगे। उन्होंने रहनुमाई माजदासन सभा की स्थापना की। दादाभाई नौरोजी ने गुजराती पाक्षिक रस्त गुफ्तार का संपादन करते हुए पारसी समाज सुधार की पैरोकारी की थी। फिर उन्होंने द वॉइस ऑफ इंडिया समाचार पत्र का प्रकाशन भी किया।इसे भी पढ़ें: PV Narasimha Rao Birth Anniversary: भारत की राजनीति के चाणक्य थे पीवी नरसिम्हा राव, एक हादसे की वजह से बन गए थे PMखुद का व्यवसाय और प्रोफेसरदादाभाई नौरोजी ने लंदन में कामा एंड कंपनी में सफलतापूर्वक काम किया और फिर खुद का कपास का व्यापार शुरू किया। कई व्यवसायों को संभालते हुए वह यूनिवर्सिटी कॉलेज में 10 साल तक गुजारती के प्रोफेसर भी रहे। दादाभाई नौरोजी से जुड़ने वालों की संख्या काफी तेजी से बढ़ती रही। हालांकि शुरूआत में उन्होंने किसी नियोजित राजनैतिक एजेंडा या सिद्धांत को नहीं अपनाया। लेकिन वह एक राष्ट्रवादी लेखक और प्रवक्ता बनते चले गए।भारतीयों की आवाज बनेभारतीय राजनेता के रूप में साल 1892 से लेकर 1895 तक दादाभाई नौरोजी यूके के हाउस ऑफ कॉमन्स में लिबरल पार्टी के सांसद थे। वह भारत के अनाधिकृत राजदूत भी कहे जाते थे। दादाभाई नौरोजी अंग्रेजी हुक्मरानों और ब्रिटिश नागरिकों तक भारतीयों की समस्याओं को पहुंचाया करते थे। इसके अलावा उन्होंने ब्रिटेन में महिलाओं को वोट देने के अधिकार, आयरलैंड में स्वराज, बुजुर्गों को पेंशन, हाउस ऑफ लॉर्ड्स को खत्म करने जैसे मुद्दों को भी उठाया था।दादाभाई नौरोजी तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। साल 1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेधन में भी वह पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इस मौके पर दादाभाई नौरोजी ने अपने भाषण में स्वराज को सबसे ज्यादा महत्व दिया था।मृत्युवहीं 30 जून 1917 को बंबई में दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 01 Jul 2025 04:30:24 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>PV Narasimha Rao Birth Anniversary: भारत की राजनीति के चाणक्य थे पीवी नरसिम्हा राव, एक हादसे की वजह से बन गए थे PM</title>
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<description><![CDATA[ भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का आज ही के दिन यानी की 28 जून को जन्म हुआ था। देश में आर्थिक सुधारों का श्रेय पीवी नरसिम्हा राव को जाता है। क्योंकि उन्होंने देश की आर्थिक स्थिति में सुधार और आम आदमी के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए थे। उनको भारत की राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भारत के पूर्व पीएम पीवी नरसिम्हा राव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाआंध्र प्रदेश के करीमनगर में 28 जून 1921 को पीवी नरसिम्हा राव का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी, मुंबई विश्वविद्यालय और नागपुर यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की थी।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Death Anniversary: पाकिस्तान पर भारी पड़ गए थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, नाराज होकर सेना में हुए थे भर्तीराजनीतिक सफरपीवी नरसिम्हा राव ने बतौर वकील अपने करियर की शुरूआत की, लेकिन बाद में वह राजनीति में आए। साल 1962 से 1964 तक आंध्र प्रदेश में वह कानून और सूचना मंत्री फिर साल 1967 तक कानून और विधि मंत्री, फिर 1967 में स्वास्थ्य और चिकित्सा मंत्री और 1968 से 1971 तक शिक्षा मंत्री रहे। वहीं साल 1971 से लेकर 1973 तक वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। साल 1975 से 1976 तक वह अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव पद पर रहे।बता दें कि साल 1991 के चुनाव से पहले नरसिम्हा राव 69 साल के हो चुके थे। वहीं खुद राजीव गांधी भी युवाओं को कांग्रेस के लिए मौका देने लगे थे। ऐसे में राव ने फैसला किया कि अब उनके राजनीति से दूर जाने का समय आ चुका है। उन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने की कोई महत्वकांक्षा नहीं दिखाई।ऐसे बनें देश के प्रधानमंत्रीनरसिम्हा राव के पीएम बनने के पीछे बड़ी वजह तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की असमय मौत बताई गई थी। इस घटना ने न सिर्फ देश बल्कि चुनाव की भी तस्वीर बदल गई। जहां राजीव गांधी की मौत से पहले भाजपा और कांग्रेस में टक्कर चल रही थी, तो वहीं इस हादसे के बाद कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर दौड़ गई और लोकसभा में 232 सीटें जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि पार्टी को बहुमत नहीं मिला, लेकिन फिर भी वह सरकार बनाने में सक्षम थी। अब कांग्रेस के सामने नेतृ्त्व का संकट था। राजीव गांधी के बच्चे छोटे थे और सोनिया गांधी राजनीति में आना नहीं चाहती थीं।ऐसे में वरिष्ठता के आधार पर सर्वानुमति पीवी नरसिम्हा राव के नाम पर मुहर लगी और वह देश के 9वें प्रधानमंत्री बन गए। उन्होंने बतौर पीएम पार्टी के अंदर चल रही गतिरोधों को संभाला। लेकिन इसके कारण नरसिम्हा राव के विरोधी बढ़ते गए। वहीं अर्जुन सिंह और शरद पराव जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ दी, लेकिन फिर भी नरसिम्हा राव की सरकार ने पांच साल पूरे किए।बदलावों के गवाह रहा कार्यकालपीएम नरसिम्हा राव का कार्यकाल कई बदलावों का गवाह रहा। फिर चाहे वह साल 1991 में अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाकर देश में निजीकरण करना हो, या बाबर मस्जिद ढांचा ढहाए जाने का विवाद हो। उन्होंने पंजाब से आतंकवाद का खात्मा, परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत और भारत का गिरवी रखा सोना छुड़वाकर विदेशी मुद्रा भंडार में इजाफा ऐसे ही कुछ काम किए हैं।मृत्युवहीं 23 दिसंबर 2004 को 83 साल की उम्र में पीवी नरसिम्हा राव का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 12:41:22 +0530</pubDate>
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<title>Sam Manekshaw Death Anniversary: पाकिस्तान पर भारी पड़ गए थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, नाराज होकर सेना में हुए थे भर्ती</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय सेना में फील्ड मार्शल का पद पाने वाले सैम मानेकशॉ अपनी बहादुरी के किस्सों के लिए जाने जाते हैं। आज ही के दिन यानी की 27 जून को 94 साल की उम्र में सैम का निधन हो गया था। सैम मानेकशॉ अपनी बहादुरी और रण कौशल के लिए जाने जाते थे। वहीं उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को युद्ध में धूल चटाई थी। वहीं फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में भी सैम मानेकशॉ की अहम भूमिका थी। वह अपनी बहादुरी, जिंदादिली और हाजिरजवाबी के लिए भी जाने जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के अमृतसर में 03 अप्रैल 1914 में सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से पूरी की थी। बाद में वह देहरादूर के इंडियन मिलिटरी अकादमी में पढ़ाई करने लगे। हालांकि सैम इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन उनके पिता ने इसकी इजाजत नहीं दी। ऐसे में सैम नाराज होकर सेना में भर्ती हो गए और सैम मानेकशॉ से सैम बहादुर बन गए।इसे भी पढ़ें: Sanjay Gandhi Death Anniversary: संजय गांधी को माना जाता था इंदिरा गांधी का राजनैतिक उत्तराधिकारी, विमान दुर्घटना में हुई थी मौतब्रिटिश इंडियन आर्मीसाल 1934 में सैम मानेकशॉ ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हुए। वहीं सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान सैम मानेकशॉ ने बर्मा में अपनी सेवाएं दीं, जहां पर वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। वहीं देश की आजादी के बाद वह भारतीय सेना में शामिल रहे और इस दौरान वह विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर भी कार्यरत रहे।साल 1942 में सैम अपने साथियों के साथ बर्मा के मोर्चे पर तैनात थे। युद्ध के दौरान जापानी सैनिक ने सैम के शरीर में 7 गोलियां दाग दीं। जोकि उनकी आंत, लिवर और किडनी में जाकर लगी। सैम मानेकशॉ की हालात इतनी गंभीर थी कि डॉक्टर ने पहले तो इलाज के लिए मना कर दिया, लेकिन इलाज के बाद तो जैसे उनके साथ चमत्कार हो गया और वह पूरी तरह से स्वस्थ हो गए।सम्मानबता दें कि सैम मानेकशॉ को उनकी बहादुरी के लिए कई सम्मान भी मिले थे। वहीं साल 1972 में सैम को फील्ड मार्शल का पद दिया गया था, जोकि भारतीय सेना का सर्वोच्च रैंक होता है। फील्ड मार्शल का पद पाने वाले वह देश के पहले सैन्य अधिकारी बने थे। साल 1968 में पद्म भूषण और 1972 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।भारत-पाक युद्धसाल 1971 में देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से पाकिस्तान पर चढ़ाई करने के लिए कहा। लेकिन सैम ने पीएम को ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह समय सही नहीं है और उनको 6 महीने का समय दीजिए। जिस पर पीएम इंदिरा गांधी मान गईं और सैम ने 6 महीनों में सेना को इस तरह से तैयार किया कि भारत ने युद्ध में पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे।मृत्युबता दें कि साल 1973 में सैम सेना प्रमुख के पद से रिटायर हुए खे। इसके बाद वह तमिलनाडु के कन्नूर में रहने लगे। वहीं 27 जून 2008 को 94 साल की उम्र में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 12:41:22 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Sam, Manekshaw, Death, Anniversary:, पाकिस्तान, पर, भारी, पड़, गए, थे, फील्ड, मार्शल, सैम, मानेकशॉ, नाराज, होकर, सेना, में, हुए, थे, भर्ती</media:keywords>
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<title>RD Burman Birth Anniversary: सुरों के सरताज थे पंचम दा, बॉलीवुड को दिए कई बेहतरीन गानें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 27 जून को महान संगीतकार राहुल देव बर्मन का जन्म हुआ था। आज भले ही आरडी बर्मन हम लोगों के बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा कंपोज किए गए गाने लोग आज भी सुनना और गुनगुनाना पसंद करते हैं। आरडी बर्मन ने बॉलीवुड को कई बेहतरीन गानों से नवाजा है। आरडी बर्मन को इंडस्ट्री के लोग प्यार से पंचम दा भी कहते थे। हालांकि इस नाम के पड़ने के पीछे भी एक कहानी है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर आरडी बर्मन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...कैसे पड़ा पंचम दा नामआरडी बर्मन को पंचम दा नाम अभिनेता अशोक कुमार ने दिया था। वह जब भी किसी धुन को गुनगुनाते थे, तो अक्सर &#039;प&#039; शब्द का इस्तेमाल करते थे। यह बात अभिनेता अशोक कुमार ने नोटिस कर ली और उन्होंने आरडी बर्मन को पंचम दा नाम दे दिया। धीरे-धीरे यह नाम इतना ज्यादा फेमस हो गया कि दुनिया भर में लोग उनको पंचम दा के नाम से पुकारने लगी।इसे भी पढ़ें: Michael Jackson Death Anniversary: 150 साल जीने की इच्छा रखते थे किंग ऑफ पॉप माइकल जैक्सन, जानिए कैसे हुई थी मौतजन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के कोलकाता में 27 जून 1939 में राहुल देव बर्मन का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सचिन देव बर्मन था, जोकि बॉलीवुड के महान संगीतकारों में गिना जाता था। वहीं आरडी बर्मन ने भी अपने पिता की तरह इंडस्ट्री में अपना नाम बनाया। उनको बचपन से ही संगीत का शौक था। आपको जानकर हैरानी होगी कि महज 9 साल की उम्र में पंचम दा ने अपना पहला गाना कंपोज किया था। साल 1956 में उनके पिता सचिन देव बर्मन ने फिल्म फंटूश में इस गाने का इस्तेमाल किया था।पहली शादीआरडी बर्मन की पहली शादी रीता पटेल से हुई थी। वह आरडी बर्मन की फैन थीं। कहा जाता है कि रीता पटेल ने अपने दोस्त से शर्त लगाई थी कि वह राहुल के साथ डेट पर जाकर रहेंगी। वहीं रीता ने ऐसा कर दिखाया। साल 1966 में दोनों की शादी हो गई, लेकिन साल 1971 में रीता और आरडी बर्मन का तलाक हो गया।फिल्मी है लव स्टोरीसाल 1956 में पंचम दा और आशा भोसले की मुलाकात हुई थी। इस समय आशा भोसले म्यूजिक इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना चुकी थीं। वहीं पंचम दा ने फिल्म तीसरी मंजिल के लिए आशा जी से संपर्क किया। यह वह समय था जब आरडी बर्मन का पहली पत्नी रीता पटेल से तलाक हुआ था। वहीं उधर आशा भोसले भी अपने पति से अलग हो चुकी थीं। पंचम दा और आशा भोसले ने साथ मिलकर कई गाने बनाएं।इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। लेकिन पंचम दा की मां ने इस रिश्ते का विरोध किया। जिस कारण आरडी बर्मन को शादी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। हालांकि उन्होंने आशा भोंसले से शादी मां के रहते ही की थी। लेकिन उनकी मां इस समय तक किसी को पहचान नहीं पाती थीं।गाना कॉपी करने का आरोपएक समय ऐसा भी आया जब आरडी बर्मन पर धुनें कॉपी करने का आरोप लगा था। लेकिन उन्होंने कई बार ऐसा फिल्म मेकर के दबाव में आकर दिया। उन्होंने चुरा लिया है तुमने, ओ मेरे दिल के चैन, क्या हुआ तेरा वादा, महबूबा, गिली गिली अक्खा, हमने तुमको देखा जैसे कई सुपरहिट गाने बनाए। पंचम दा ने अपने करियर के दौरान करीब 300 फिल्मों में संगीत देने का काम किया है।मृत्युसाल 1985 के बाद से आरडी बर्मन के करियर में ढलान का दौर शुरू हो गया। वहीं 04 जनवरी 1994 को दिल की बीमारी के कारण आरडी बर्मन का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 12:41:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Yash Johar Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के जाने&#45;माने निर्देशक थे यश जौहर, कभी मिठाई की दुकान पर देखते थे हिसाब&#45;किताब</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक यश जौहर का 26 जून को निधन हो गया था। उनको उभरते सितारों को निखारने वाले निर्देशक के रूप में भी जाना जाता था। यश जौहर की फिल्में हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान रखती थीं। भले ही आज यश जौहर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में आज भी लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर यश जौहर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान पंजाब के लाहौर में 06 सितंबर 1929 को यश जौहर का जन्म हुआ था। वहीं देश का विभाजन होने के बाद उनकी फैमिली दिल्ली आकर रहने लगी। बताया जाता है कि यश जौहर के पिता ने दिल्ली आकर &#039;नानकिंग स्वीट्स&#039; के नाम से मिठाई की दुकान खोली थी। वहीं 9 भाई-बहनों से बड़े होने के कारण यश जौहर को उनके पिता ने मिठाई की दुकान पर बिठाया। इस दौरान वह दुकान का हिसाब-किताब देखा करते थे। जोकि यश जौहर को बिल्कुल भी पसंद नहीं था। एक दिन यश जौहर की मां ने उनसे कहा कि वह मिठाई की दुकान पर बैठने के लिए नहीं बने हैं, इसलिए बंबई जाकर अपने पसंद की जिंदगी जियो।इसे भी पढ़ें: Michael Jackson Death Anniversary: 150 साल जीने की इच्छा रखते थे किंग ऑफ पॉप माइकल जैक्सन, जानिए कैसे हुई थी मौतफिल्मी करियर की शुरूआतबता दें कि साल 1952 में यश जौहर ने अपने करियर की शुरुआत सुनील दत्त के प्रोडक्शन हाउस &#039;अजंता आर्ट्स&#039; से की थी। इसके बाद वह सहायक निर्माता के तौर पर देवानंद के प्रोडक्शन हाउस &#039;नवकेतन फिल्म्स&#039; से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने साथ मिलकर &#039;ज्वैल थीफ&#039;, &#039;प्रेम पुजारी&#039;, &#039;गाइड&#039;, &#039;हरे रामा-हरे कृष्णा&#039; जैसी शानदार फिल्मों को बनाया। वहीं साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म &#039;हरे राम हरे कुष्णा&#039; में यश जौहर के प्रोडक्शन का कमाल देखने को मिला था। इसके बाद उन्होंने अग्निपथ,  गुमराह, डुप्लिकेट, मुकद्दर का फैसला, कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी गम, कल हो न हो, जैसी तमाम बेहतरीन फिल्मों का निर्माण किया था।मृत्युवहीं चेस्ट इन्फेक्शन और कैंसर की वजह से 26 जून 2004 में यश जौहर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 27 Jun 2025 03:31:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Michael Jackson Death Anniversary: 150 साल जीने की इच्छा रखते थे किंग ऑफ पॉप माइकल जैक्सन, जानिए कैसे हुई थी मौत</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 25 जून को किंग ऑफ पॉप बने माइकल जैक्सन का निधन हो गया था। भले ही अब वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके चाहने वाले अब भी दुनिया के हर कोने में मिलेंगे। अमेरिकन सिंगर, डांसर और सॉन्ग राइटर माइकल जैक्सन एक सुपरस्टार थे। जिन्होंने सिंगिंग के अलावा डांस से भी दुनिया को अपना दीवाना बनाया हुआ था। लेकिन महज 50 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से माइकल जैक्सन का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर माइकल जैक्सन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअमेरिका के इंडियाना प्रांत के गैरी शहर में 29 अगस्त 1958 को माइकल जैक्सन का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही म्यूजिक में रुचि रखते थे। माइकल जैक्सन अपने भाई के पॉप बैंड &#039;जैक्सन फाइव&#039; का हिस्सा बने थे। जैसे-जैसे बैंड की पॉपुलैरिटी बढ़ती गई, लोग माइकल को अधिक प्यार करने लगे। साल 1982 में माइकल जैक्सन का पहला एल्बम रिलीज हुई थी, इसका नाम &#039;थ्रिलर&#039; था। बता दें कि इस एल्बम ने रिकॉर्ड तोड़ कमाई की थी। जिसके बाद माइकल जैक्सन ने अपने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।इसे भी पढ़ें: Sunil Dutt Birth Anniversary: कभी बस कंटक्टर का काम करते थे सुनील दत्त, फिर ऐसे बने एक्टिंग की दुनिया के बादशाहडांस मूव्स की दुनिया दीवानीमाइकल के डांस मूव्स की दुनिया दीवानी थी। म्यूजिक वीडियो &#039;स्मूथ क्रिमिनल&#039; में &#039;किंग ऑफ पॉप&#039; ने अपने डांस मूव्स से हर किसी को चौंका दिया था। इसमें उन्होंने 45 डिग्री टिल्ट डांस मूव किया था। इसको लेकर साइंटिस्ट के बीच चर्चा छिड़ गई थी कि आखिर वह ऐसा कैसे कर पाते थे। तब न्यूरो सर्जन की टीम ने शोध कर पता लगाया कि इस डांस मूव का राज माइकल के जूतों में छिपा था। यह जूते माइकल जैक्सन को बेहतरीन डांस मूव्स करने में काफी सपोर्ट करते थे।150 साल तक जीना चाहते थे माइकलमाइकल जैक्सन अपनी जिंदगी और बॉडी दोनों से बहुत प्यार करते थे। वह अक्सर खुद को लेकर तरह-तरह के एक्सपेरिमेंट करते थे। वह 150 साल जीने की इच्छा रखते थे। इसलिए माइकल जैक्सन ऑक्सीजन चैंबर में सोया करते थे। क्योंकि इससे न सिर्फ बॉडी अच्छी रहती है, बल्कि उम्र भी बढ़ती है। उन्होंने अपनी स्किन और लुक्स में बदलाव के लिए कई बार प्लास्टिक सर्जरी भी कराई थी। जिसके लिए वह खासे चर्चा में रहा करते थे।मृत्युअपनी लंबी उम्र के लिए माइकल जैक्सन अपने साथ 12 डॉक्टर्स की एक टीम रखते थे। यह टीम हमेशा उनके साथ रहती थी। वहीं योग करने के लिए माइकल ने 15 ट्रेनर की एक अलग से टीम रखी थी। वह किसी से भी मिलने से पहले मास्क और दस्ताना पहनना नहीं भूलते थे। लेकिन 25 जून 2009 को हार्ट अटैक के कारण माइकल जैक्सन का निधन हो गया था। बताया जाता है कि उनकी मौत ड्रग्स ओवरडोज के कारण हुई थी। तो कुछ रिपोर्ट में माइकल जैक्सन की मौत का कारण सर्जरी को भी बताया गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 26 Jun 2025 03:31:37 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Shyama Prasad Mukherjee Death Anniversary: अखंड भारत के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने खुद को कर दिया था बलिदान</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 जून को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया था। उनके निधन को करीब 7 दशक का समय बीत चुका है, लेकिन उनकी मौत आज भी पहेली बनी हुई है। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक ने जनसंघ के संस्थापक डॉ मुखर्जी के किसी साजिश का शिकार होने का संदेह जताया था। बता दें कि 23 जून 1953 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक और अध्यक्ष डॉक्टर मुखर्जी की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारकोलकाता में 06 जुलाई 1901 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम आशुतोष मुखर्जी था, जोकि राज्य में बतौर शिक्षाविद् जाने जाते थे। पढ़ाई-लिखाई के माहौल में पले बढ़े मुखर्जी सिर्फ 33 साल की उम्र में कोलकाता यूनिवर्सिटी के कुलपति बन गए। यहां से वह कोलकाता विधानसभा पहुंचे। यहीं से उनका राजनैतिक करियर शुरू हुआ। लेकिन मतभेदों की वजह से वह लगातार अलग रहे।इसे भी पढ़ें: Rani Lakshmibai Death Anniversary: सौंदर्य और साहस की मिसाल थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी आजादी की जंगअखंड भारत का सपनाडॉ मुखर्जी हमेशा अनुच्छेद 370 का विरोध करते रहे। वह चाहते थे कि कश्मीर भी अन्य राज्यों की तरह देश के अखंड हिस्सा रहे और वहां पर भी समान कानून रहे। यही वजह रही कि जब पंडित नेहरू ने डॉ मुखर्जी को अपनी अंतरिम सरकार में मंत्री पद दिया, तो उन्होंने कुछ समय बाद ही इस्तीफा दे दिया। मुखर्जी ने कश्मीर मामले को लेकर पंडित नेहरू पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे।गिरफ्तारीअपना इस्तीफा देने के बाद डॉ मुखर्जी कश्मीर के लिए निकल पड़े। वह चाहते थे कि देश के इस हिस्से में जाने के लिए किसी को भी इजाजत की जरूरत न पड़े। वहीं नेहरू की नीतियों के विरोध के समय डॉ मुखर्जी कश्मीर जाकर अपनी बात कहना चाहते थे। लेकिन 11 मई 1953 को श्रीनगर पहुंचते ही उनको गिरफ्तार कर लिया था। इस दौरान कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की सरकार थी। डॉ मुखर्जी को उनके दो सहयोगियों के साथ गिरफ्तार करके पहले श्रीनगर के सेंट्रल जेल भेजा गया फिर उनको शहर के बाहर एक कॉटेज में ट्रांसफर कर दिया गया।लगातार बिगड़ती गई सेहतगिरफ्तारी के बाद डॉ मुखर्जी करीब एक महीने तक कैद में रखे गए और इस दौरान उनकी सेहत बिगड़ रही थी। उनको बुखार के साथ पीठ में दर्द की शिकायतें बनी हुई थीं। वहीं 19-20 जून की रात डॉ मुखर्जी को प्लूराइटिस होना पाया गया। वहीं 22 जून को डॉ मुखर्जी को सांस लेने में तकलीफ महसूस हुई। वहीं हॉस्पिटल में शिफ्ट करने पर उनको हार्ट अटैक होना भी पाया गया। वहीं 23 जून 1952 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Jun 2025 03:31:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Shyama, Prasad, Mukherjee, Death, Anniversary:, अखंड, भारत, के, लिए, श्यामा, प्रसाद, मुखर्जी, ने, खुद, को, कर, दिया, था, बलिदान</media:keywords>
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<title>Nanasaheb Peshwa Death Anniversary: अद्वितीय वीरता के प्रतीक थे नाना साहेब पेशवा, मराठा साम्राज्य का लिखा था स्वर्णिम अध्याय</title>
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<description><![CDATA[ मराठा साम्राज्य का इतिहास वीर गाथाओं से भरा पड़ा है। इन्हीं में से एक बालाजी बाजीराव हैं, जिनको नाना साहेब पेशवा के नाम से भी जाना जाता है। नाना साहेब पेशवा ने अपने 21 साल के शासनकाल में मराठा साम्राज्य को दक्षिण से तमिलनाडु और उत्तर से पंजाब तक फैलाया था और भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखा। उन्होंने अपने कुशल प्रशासक, दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ और साहसी योद्धा के तौर पर मराठा शक्ति को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नाना साहेब पेशवा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबालाजी बाजीराव यानी की नाना साहेब पेशना का जन्म 08 दिसंबर 1720 को हुआ था। पिता पेशवा बाजीवार प्रथम की मृत्यु के बाद 1740 में नाना साहेब को पेशवा नियुक्त किया गया था। बालाजी ने अपने 21 साल के शासनकाल में मराठा शक्ति को राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, मालवा और बंगाल तक मजबूत किया था। फिर मुगल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर नाना साहेब पेशवा ने मराठाओं को उत्तर भारत को प्रमुख शक्ति बनाया।इसे भी पढ़ें: Rani Lakshmibai Death Anniversary: सौंदर्य और साहस की मिसाल थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी आजादी की जंगबता दें कि बालाजी ने पेशवा शासन को संगठित करने का काम किया और स्थानीय सरदारों के साथ संगठन बनाकर मराठा प्रशासन को मजबूत करने का काम किया। पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 में मराठों को अहमद शाह अब्दाली की अफगान सेना से बड़ी हार मिली। इस हार ने मराठा साम्राज्य को कमजोर किया, इससे बालाजी बाजीराव को गहरा आघात पहुंचाया। वह इस हार को बर्दाश्त नहीं कर सके और शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गए।मृत्युइस हार से उनकी तबियत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी और 23 जून 1761 को पूणे में उनका निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Jun 2025 03:31:34 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sanjay Gandhi Death Anniversary: संजय गांधी को माना जाता था इंदिरा गांधी का राजनैतिक उत्तराधिकारी, विमान दुर्घटना में हुई थी मौत</title>
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<description><![CDATA[ स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में कई बड़े बदलाव लाने वाले मोड़ दिखते हैं। इन्हीं में से एक तारीफ 23 जून की है। 23 जून 1980 को एक विमान दुर्घटना में देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की मौत हो गई थी। हालांकि संजय गांधी कभी पीएम, सीएम और मंत्री जैसे संवैधानिक पद पर नहीं रहे। लेकिन संजय गांधी का कांग्रेस पार्टी में रुतबा और दखल सीधे तौर पर हुआ करता था। संजय गांधी को इंदिका गांधी का राजनैतिक विरासत का उत्तराधिकारी माना जाता था, लेकिन उनकी असमय मौत ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर संजय गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...पढ़ाई में नहीं थी दिलचस्पीनई दिल्ली में 14 दिसंबर 1946 को संजय गांधी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम फिरोज गांधी और मां का नाम इंदिरा गांधी था। वह भारत के पूर्व पीएम राजीव गांधी के छोटे भाई थे। संजय गांधी ने स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग को अपने करियर के तौर पर चुना। वहीं संजय गांधी ने इंग्लैंड को क्रू में रॉल्स रॉयल में तीन साल एप्रेंटिसशिप की थी। संजय गांधी को स्पोर्ट्स कारों में खासी रुचि थी। वहीं साल 1976 में संजय गांधी को पायलट का लायसेंस भी ले लिया था।इसे भी पढ़ें: Shyama Prasad Mukherjee Death Anniversary: अखंड भारत के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने खुद को कर दिया था बलिदानपढ़ाई छोड़ देश वापसीसाल 1966 में तत्कालीन पीएम लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की अगली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनीं। इस दौरान संजय गांधी अपनी इंटर्नशिप को बीच में छोड़ दिया और देश वापस आ गए। इस बीच इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में अपनी पकड़ को बनाने का काम शुरूकर दिया। साल 1970 में कांग्रेस पार्टी पर इंदिरा गांधी का पूरी तरह से नियंत्रण हो गया। फिर साल 1971 में इंदिरा गांधी सरकार ने देश के मध्यम वर्ग के लिए कार बनाने के लिए मारूति उद्योग लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई। इस कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर संजय गांधी को बनाया गया। साथ ही उनको कार के उत्पादन का कॉन्ट्रैक्ट और उत्पादन का भी लाइसेंस दिया गया। हालांकि इससे पहले इस पर कुछ आगे काम हो पाता, तभी देश बांग्लादेश की आजादी के लिए पाकिस्तान से युद्ध करने लगा।आपातकाल और राजनीतिआपातकाल के दौरान संजय गांधी आपातकाल और राजनीतिक तौर पर सक्रिय हुए। वह इंदिरा गांधी के सलाहकार के तौर पर जाने जाते थे। संजय गांधी का हर मामले में उनका सीधा दखल हुआ करता था। वह अक्सर मंत्रालय और विभागों को सीधे आदेश दिया करते थे। आपातकाल के दौरान की गई सख्तियों के लिए संजय गांधी को जिम्मेदार माना जाता है।मृत्युबता दें कि संजय गांधी 23 जून 1980 को नई दिल्ली के सफदरजंग विमानतल के पास दिल्ली फ्लाइंग क्लब के नए विमान को उड़ा रहे थे। इस दौरान संजय गांधी ने एरोबैटिक कलाबाजी करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन इस दौरान विमान उनके नियंत्रण से बाहर हो गया और क्रैश हो गया। जिसमें संजय गांधी की मौत हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 24 Jun 2025 03:31:34 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Sanjay, Gandhi, Death, Anniversary:, संजय, गांधी, को, माना, जाता, था, इंदिरा, गांधी, का, राजनैतिक, उत्तराधिकारी, विमान, दुर्घटना, में, हुई, थी, मौत</media:keywords>
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<title>KB Hedgewar Death Anniversary: के बी हेडगेवार की बताई राह पर अग्रसर है RSS, अपने ढंग से लड़ी थी आजादी की लड़ाई</title>
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<description><![CDATA[ आरएसएस की नींव रखने वाले डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का 21 जून को निधन हो गया था। कांग्रेस से भी मोहभंग होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में।राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखने वाले डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का 21 जून को निधन हो गया था। उनको स्कूल में वंदे मातरम गाने के कारण निकाल दिया गया था। वहीं देश की आजादी के संघर्ष के समय वह कांग्रेस में शामिल हुए और फिर उन्होंने कांग्रेसी पदाधिकारी के रूप में अपनी गिरफ्तारी दी। हालांकि उनका कांग्रेस से भी मोहभंग हो गया था। जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...इसे भी पढ़ें: Rani Lakshmibai Death Anniversary: सौंदर्य और साहस की मिसाल थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी आजादी की जंगजन्म और शिक्षानागपुर के ब्राह्मण परिवार में 01 अप्रैल 1889 को डॉ हेडगेवार का जन्म हुआ था। उनकी शुरूआती पढ़ाई नागपुर नील सिटी हाईस्कूल में हुई। वहीं जब वह नागपुर के स्कूल में वंदेमातरम गाने की वजह से निकाल दिया गया था। इसके बाद वह पढ़ाई के लिए यवतमाल और पुणे भेजा गया। मैट्रिक पास करने के बाद हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी एस मूंजू ने हेडगेवार को मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता भेजा।कांग्रेस में सक्रिय हुएजब कोलकाता में डॉ हेडगेवार डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान वहां पर वह देश के नामी क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़ गए। साल 1915 में नागपुर लोटने पर वह कांग्रेस में सक्रिय हो गए। फिर कुछ समय बाद वह विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव भी बन गए। इस दौरान वह लगातार हिंदू महासभा में भी शामिल रहे।गिरफ्तारी दीजब साल 1920 में नागपुर में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ, तो हेडगेवार ने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव पेश किया। जो तब तक पारित नहीं हुआ था। साल 1921 में कांग्रेस के असहयोग आंदोलन में शामिल हुए और गिरफ्तारी दी और उनको एक साल की जेल हुई।हिंदुत्व की राह पर चल पड़ेफिर भारत में शुरू हुए धार्मिक-राजनीतिक खिलावत आंदोलन के कारण हेडगेवार का कांग्रेस से मन खिन्न हो गया। साल 1923 में सांप्रदायिक दंगों में हेडगेवार की राह पूरी तरह हिंदुत्व की ओर चल पड़ी। वह हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी एस मुंजे के संपर्क में शुरूआत से थे। मुंजे के अलावा हेडगेवार के व्यक्तित्व पर बाल गंगाधर तिलक और विनायक दामोदर सावरकर का अधिक प्रभाव था।संघ की नींवसाल 1925 को हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिए विजया दशमी के दिन डॉ हेडगेवार ने संघ की नींव रखी थी। हेडगेवार संघ के पहले सरसंघचालक बने थे। वह शुरू से ही संघ को सक्रिय राजनीति से दूर सिर्फ सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रहे। डॉ हेडगेवार का मानना था कि संगठन का प्राथमिक काम हिंदुओं को एक धागे में पिरोकर एक ताकतवर समूह के रूप में विकसित करना है।मृत्युवहीं 21 जून 1940 को डॉ हेडगेवार का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 22 Jun 2025 03:31:28 +0530</pubDate>
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<title>Jijabai Death Anniversary: शस्त्र और शास्त्र विद्या में पारंगत थीं जीजाबाई, शिवाजी को बनाया था महान योद्धा</title>
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<description><![CDATA[ कुछ मातृशक्तियां ऐसी हैं, जिन्होंने महान नायकों और महापुरुषों को न सिर्फ जन्म दिया, बल्कि उनको मातृशिक्षा और संस्कारों से भी सिंचित किया। इन माताओं ने अपनी शिक्षा से उन्हें इस योग्य बनाया कि वह भावी पीढ़ियों को युगों-युगों तक प्रेरित कर सकें। ऐसी ही एक मातृशक्ति का नाम राजमाता जीजा बाई है। इनका पूरा नाम जीजाबाई शाहजी भोंसले था। आज ही के दिन यानी की 17 जून को राजमाता जीजाबाई का निधन हो गया था। यह स्वतंत्र मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की मां थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राजमाता जीजाबाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जीजाबाई का जीवनबता दें कि जीजाबाई का कठिन और विपरीत परिस्थितियों से भरा था। लेकिन उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। जीजाबाई ने अपने पुत्र को ऐसे संस्कार दिए, जिससे वह आगे चलकर हिंदू समाज का गौरव और संरक्षक बना। स्वराज के प्रति प्रतिबद्धता जीजाबाई की सर्वोच्च प्राथमिकता थी। वह एक दूरदर्शी महिला थीं, जिनमें सभी प्रशासकीय गुण थे और वह खुद भी शस्त्र और शास्त्र विद्या में पारंगत थीं। उन्होंने बालक शिवा में भी इन्हीं गुणों का संचार किया था और देशप्रेश और स्वराज की ज्वाला जलाई थी। शिवाजी को अपनी मां जीजाबाई से साहस और धैर्य के साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्राप्त हुआ था।इसे भी पढ़ें: Guru Arjun Dev Martyrdom: गुरु अर्जुन देव ने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का दिया था बलिदानशिवाजी महाराज ने जीजाबाई के मार्गदर्शन और शिक्षाओं से धार्मिक सहिष्णुता और न्याय के साथ राष्ट्र प्रेम और स्वराज की स्थापना की। वहीं अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी महिला का सम्मान और मानवीय जीवन मूल्यों के प्रति शिवाजी महाराज की निष्ठा का श्रेय भी पूरी तरह से जीजाबाई को जाता है। वहीं जीजाबाई ने भी अपना पूरा जीवन शिवाजी को स्वराज की स्थापना करने और मराठा साम्राज्य के महान शासक बनाने में लगाया था।वहीं 1674 में जीजाबाई का स्वराज का सपना तब पूरा हुआ, जब शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। शिवाजी महाराज स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले प्रतापी राजा बने। वहीं स्वतंत्र शासक के तौर पर उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलाया।मृत्युछत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के सिर्फ 12 दिन बाद 17 जून 1674 को राजमाता जीजाबाई ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Jun 2025 03:32:20 +0530</pubDate>
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<title>Rani Lakshmibai Death Anniversary: सौंदर्य और साहस की मिसाल थीं रानी लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी आजादी की जंग</title>
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<description><![CDATA[ आज यानी की 18 जून को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का निधन हो गया था। हर साल इस दिन झांसी की रानी की वीरता को नमन किया जाता है और अंग्रेजों के खिलाफ उनकी शौर्य गाथा को भी याद किया जाता है। झांसी की रानी ने अंग्रेजों को धूल चटाने का काम किया था। क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत ने झांसी को अपने अधिकार में लेने का प्रयास किया था। वहीं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र गोद लिया था, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने उसको झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबनारस में 19 नवंबर 1828 में लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था। प्यार से लोग उनको मनु कहा जाता था। उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और मां भागीरथी सप्रे था। जब मनु 4 साल की थीं, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई और उनके पिता बिठूर जिले के पेशवा बाजी राव द्वितीय के लिए काम करते थे। उन्होंने लक्ष्मीबाई का पालन-पोषण किया। इस दौरान मनु ने तीरंदाजी, आत्मरक्षा, घुड़सवारी और निशानेबाजी की ट्रेनिंग ली।इसे भी पढ़ें: Jijabai Death Anniversary: शस्त्र और शास्त्र विद्या में पारंगत थीं जीजाबाई, शिवाजी को बनाया था महान योद्धापरिवारमहज 14 साल की उम्र में साल 1842 में मनु की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव नेवलकर से हुई। शादी के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई पड़ा। उस दौरान में शादी के बाद लड़कियों का नाम बदला जाता था। विवाह के बाद लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन उसकी मृत्यु सिर्फ 4 महीने में हो गई। वहीं बाद में उनके पति और झांसी के राजा गंगाधर राव नेवलकर का भी निधन हो गया। पति और बेटे को खोने के बाद लक्ष्मीबाई ने खुद अपनी प्रजा और साम्राज्य की रक्षा करने की ठान ली।झांसी पर कब्जा करने की साजिशउस दौरान ब्रिटिश इंडिया कंपनी के वायसराय डलहौजी ने झांसी पर कब्जे का यह समय बेहतर समझा। क्योंकि झांसी की रक्षा के लिए कोई नहीं था। वायसराय ने लक्ष्मीबाई पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह झांसी को अंग्रेजी हुकूमत के हवाले कर दिया। तब रानी ने अपने रिश्तेदार के एक बच्चे को अपना दत्तक पुत्र बनाया, जिनका नाम दामोदर था।अंग्रेजों और झांसी के बीच युद्धअंग्रेजी हुकूमत ने दामोदर को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया था। ब्रिटिश सरकार ने झांसी का किला उनके हवाले करने को कहा। अंग्रेजों में झांसी के साम्राज्य पर कब्जा करने का प्रयास किया, लेकिन लक्ष्मीबाई ने 14000 बागियों की एक बड़ी फौज तैयार की। फिर 23 मार्च 1858 को ब्रिटिश फौज ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। वहीं 30 मार्च को बमबारी करके अंग्रेजों ने किले की दीवार में सेंध लगाने में सफल हुए। लक्ष्मीबाई 17 जून 1858 को आखिरी जंग के लिए निकली। फिर 18 जून 1858 को लक्ष्मीबाई को एक सैनिक ने गोली मार दी। फिर एक सैनिक ने तलवार से वार किया, जिसमें रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 20 Jun 2025 03:32:19 +0530</pubDate>
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<title>Guru Arjun Dev Martyrdom: गुरु अर्जुन देव ने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का दिया था बलिदान</title>
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<description><![CDATA[ पांचवे सिख गुरु, गुरु अर्जुन देव ने का नाम सिख इतिहास में एक ऐसी महान आत्मा के रूप में दर्ज है, जिन्होंने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए। वह सिखों के पांचवे गुरु थे। उन्होंने आदि गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया। इसके साथ ही उन्होंने हरमंदिर साहिब यानी की स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। बता दें कि 16 जून 1606 में गुरु अर्जुन देव की शहादत ने सिख समुदाय के लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दी थी।जीवनगोइंदवाल में 15 अप्रैल 1563 को गुरु अर्जुन देव का जन्म हुआ था। इनके पिता गुरु रामदाय जी थे, जोकि चौथे सिख गुरु थे। उन्होंने सिख धर्म को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। गुरु अर्जुन देव द्वारा आदि ग्रंथ का संकलन उनकी सबसे बड़ी देन थी। जिसमें उन्होंने सिख गुरुओं, हिंदु और मुस्लिम संतों की वाणी को भी सम्मिलित किया था। गुरु अर्जुन देव ने पंजाब के अमृतसर में हरमंदिर साहिब की स्थापना की। जोकि आज के समय में सिखों का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है। इसके अलावा उन्होंने सुखमनी साहिब जैसे पवित्र बानी की रचना की और समाज में समानता का संदेश दिया था।इसे भी पढ़ें: Guru Hargobind Singh Jayanti 2025: परोपकारी और क्रांतिकारी योद्धा थे गुरु हरगोबिंद सिंह, सिख धर्म को दिया था नया आयाममुगल साम्राज्य से टकरावगुरु अर्जुन देव के समकालीन मुगल शासक जहांगीर का शासन था। सिख पंथ के बढ़ते प्रभाव से मुगल बादशाह जहांगीर आशंकित था। जब जहांगीर के विद्रोही बेटी खुसरो ने अपने पिता के खिलाफ बगावत की, तो खुसरो गुरु अर्जुन देव की शरण में पहुंचा। इस घटना को आधार बनाकर जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव पर राजद्रोह का आरोप लगा दिया और उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए। गुरु अर्जुन देव को गिरफ्तार करने के बाद उनके सामने दो शर्तें रखी गईं, जिसमें या तो वह इस्लाम स्वीकार करें या फिर भारी जुर्माना अदा करें। वहीं गुरु अर्जुन देव ने जहांगीर की दोनों शर्तें ठुकरा कीं, जिसके बाद उनको क्रूर यातनाएं दी गईं।मृत्युगुरु अर्जुन देव को लाहौर के किले में कैद कर दिया गया। उनको गर्म रेत पर बैठाया गया और उबलते हुए पानी से नहलाया गया। फिर लोहे की तपती प्लेटों पर बैठने के लिए मजबूर किया गया। वहीं पांच दिनों तक यातनाएं झेलने के दौरान भी गुरु अर्जुन देव ने ईश्वर का नाम जपना नहीं छोड़ा। वहीं आखिरी में 30 मई 1606 को उनको रावी नदी में बहा दिया गया। वहीं मृत्यु से पहले गुरु अर्जुन देव ने अपने पुत्र गुरु हरगोबिंद सिंह को सिखों की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने का आदेश दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 17 Jun 2025 03:31:37 +0530</pubDate>
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<title>अपने शांत स्वभाव और दृढ़ प्रशासनिक शैली के लिए जाने जाते थे विजय रूपाणी</title>
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<description><![CDATA[ अहमदाबाद में एअर इंडिया विमान दुर्घटना में जान गवाने वाले गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी अपने शांत स्वभाग और दृढ़ प्रशासनिक शैली के लिए जाने जाते थे। विजय रूपाणी अगस्त 2016 से सितंबर 2021 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और उन्होंने गुजरात को कोरोना से उभारने में राज्य का नेतृत्व करते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने कॉलेज के दिनों में रूपाणी एक छात्र नेता थे जिन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया और उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में काम किया। रूपाणी ने 1975 में आपातकाल के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए भावनगर जेल में एक वर्ष के कारावास की सजा काटी थी। राजकोट नगर निगम में पार्षद चुने जाने के साथ ही 1987 में उन्होंने जन सेवा में प्रवेश किया और बाद में वह महापौर बने। वह 2006 से 2012 के बीच राज्यसभा के सदस्य भी रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में राज्य औद्योगिक नीति 2020 की शुरूआत और आदिवासी उत्थान के लिए पहल देखी गई। रूपाणी ने सितंबर 2021 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी इस पहल से राज्य चुनावों से पहले ही भूपेंद्र पटेल के लिए मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया।इसे भी पढ़ें: Sunil Dutt Birth Anniversary: कभी बस कंटक्टर का काम करते थे सुनील दत्त, फिर ऐसे बने एक्टिंग की दुनिया के बादशाहगुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के लिए 1206 जिंदगी भर लकी नंबर की तरह रहा। लेकिन 12 तारीख और छठे महीने को उनकी दर्दनाक मौत के चलते यह नंबर उनके लिए दुर्भाग्य का प्रतीक बन गया। हम आपको बता दें कि विजय रूपाणी 1206 नंबर के प्रति गहरी आस्था रखते थे। उनके सभी वाहनों– स्कूटर से लेकर कार तक की नंबर प्लेट पर 1206 अंक होता था। उनके मित्र कहते हैं कि यह हमेशा उनका लकी चार्म रहा है। लेकिन किस्मत ने उनके साथ इसी नंबर के जरिये क्रूर खेल खेल दिया। 12 जून, यानी 12/06 को उनकी जीवन यात्रा समाप्त हो गई।विजय रूपाणी का जन्म 2 अगस्त, 1956 को म्यांमार (तब रंगून) में एक जैन परिवार में हुआ था। वह सात भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उनका परिवार म्यांमार में राजनीतिक अस्थिरता के चलते 1960 में राजकोट आ गया था। विजय रूपाणी राज्यसभा के सदस्य, गुजरात विधानसभा के सदस्य और राज्य के दो बार मुख्यमंत्री रहे थे। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 14 Jun 2025 03:31:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>अपने, शांत, स्वभाव, और, दृढ़, प्रशासनिक, शैली, के, लिए, जाने, जाते, थे, विजय, रूपाणी</media:keywords>
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<title>Guru Hargobind Singh Jayanti 2025: परोपकारी और क्रांतिकारी योद्धा थे गुरु हरगोबिंद सिंह, सिख धर्म को दिया था नया आयाम</title>
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<description><![CDATA[ आमतौर पर जून महीने में गुरु हरगोविंद सिंह की जयंती मनाई जाती है। इस बार 12 जून 2025 को गुरु हरगोविंद सिंह जयंती मनाई जा रही है। बता दें कि सिख धर्म में यह दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। बता दें कि गुरु हरगोविंद सिंह सिखों के 5वें गुरु अर्जुन सिंह और मां गंगा के पुत्र थे। वहीं 1595-1644 ईस्वी में गुरु हरगोविंद सिंह सिख धर्म के छठे गुरु रहे। अपने पिता की शहादत के बाद गुरु हरगोविंद सिंह ने गुरु गद्दी संभाली और सिख धर्म को एक नया आयाम देने का काम किया।मीरी-पीरी के प्रवर्तकगुरु हरगोविंद सिंह जी को मीरी-पीरी सिंद्धांत का प्रवर्तक माना जाता है। उनका यह सिद्धांत सिख धर्म के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। बता दें कि गुरु हरगोविंद सिंह जी ने दो तलवारें धारण करना शुरूकर दिया था। जोकि एक मीरी का प्रतीक हुआ करती थी और दूसरी पीरी का। गुरु हरगोविंद सिंह का यह संदेश था कि सिख धर्म सिर्फ आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग नहीं बल्कि यह अपने अनुयायियों के खिलाफ उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए सैन्य और शारीरिक रूप से भी तैयार करना है।इसे भी पढ़ें: Kabirdas Jayanti 2025: कबीरदास ने मानव सेवा में गुजार दिया था पूरा जीवन, हर धर्म के लोग करते थे सम्मानसैन्यीकरणपिता और गुरु अर्जुन देव की शहादत और मुगलों के बढ़ते अत्याचारों को देखते हुए गुरु हरगोविंद सिंह ने यह जाना कि सिर्फ आध्यात्मिक उपदेशों से सिख धर्म और इस धर्म को मानने वाले अनुयायियों की रक्षा नहीं की जा सकती है। ऐसे में उन्होंने सिखों को आत्मरक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने और सैन्य बल के तौर पर संगठित करने के लिए प्रेरित किया।अकाल तख्तगुरु हरगोविंद सिंह ने अमृतसर में हरमंदिर साहिब यानी की स्वर्ण मंदिर के सामने अकाल तख्त का निर्माण कराया। यह सिख समुदाय के लिए सामाजिक, राजनीतिक और न्यायिक केंद्र बन गया था। जहां पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे।मृत्युमुगल शासक जहांगीर ने गुरु हरगोविंद सिंह जी को ग्वालियर के किले में कैद कर लिया था। वहीं रिहाई के समय उन्होंने अपने साल 52 हिंदू राजाओं को भी आजाद कराया था। वहीं अंत समय में उन्होंने कश्मीर के पहाड़ों में शरण ली। वहीं पंजाब के कीरतपुर में 1644 ईस्वी में गुरु हरगोविंद सिंह जी की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 13 Jun 2025 03:31:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sant Kabirdas Jayanti 2025: अंधविश्वास तथा आडम्बरों के घोर विरोधी थे संत कबीर</title>
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<description><![CDATA[ मध्यकालीन युग के महान कवि संत कबीर दास जी ने अपना सारा जीवन देशाटन करने और साधु-संतों की संगति में व्यतीत कर दिया और अपने उन्हीं अनुभवों को उन्होंने मौखिक रूप से कविताओं अथवा दोहों के रूप में लोगों को सुनाया। अपनी बात लोगों को बड़ी आसानी से समझाने के लिए उन्होंने उपदेशात्मक शैली में लोक प्रचलित और सरल भाषा का प्रयोग किया। उनकी भाषा में ब्रज, अवधी, पंजाबी, राजस्थानी तथा अरबी फारसी के शब्दों का मेल था। अपनी कृति सबद, साखी, रमैनी में उन्होंने काफी सरल और लोक भाषा का प्रयोग किया है। गुरु के महत्व को सर्वोपरि बताते हुए समाज को उन्होंने ज्ञान का मार्ग दिखाया। मध्यकालीन युग के इन्हीं महान कवि संत कबीर दास जी की जयंती प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, जो इस वर्ष 11 जून को मनाई जा रही है। माना जाता है कि इसी पूर्णिमा को विक्रमी संवत् 1455 सन् 1398 में उनका जन्म काशी के लहरतारा ताल में हुआ था। संत कबीर सदैव कड़वी और खरी बातें करने वाले ऐसे स्वच्छंद विचारक थे, जिन्होंने समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा, आडम्बरों की कड़ी आलोचना करते हुए समाज में प्रेम, सद्भावना, एकता और भाईचारे की अलख जगाई। उन्होंने अपने दोहों और वाणी के माध्यम से धर्म के नाम पर आम जनता को दिग्भ्रमित करने वाले काजी, मौलवी, पंडितों, पुरोहितों को आईना दिखाने का भी साहसिक प्रयास किया।इसे भी पढ़ें: Sant Kabirdas Jayanti 2025: भारतीय अध्यात्म जगत के महासूर्य हैं कबीरसंत कबीर नित्य प्रति सत्संग किया करते थे और लोग दूरदराज से भी उनके प्रवचन सुनने आया करते थे। उनकी वाणी में ऐसी अद्भुत ताकत थी कि लोग उनका सत्संग सुनने अपने आप ही दूर-दूर से उनकी ओर खिंचे चले आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने के बाद भी एक व्यक्ति वहां बैठा रहा। कबीरदास ने उस व्यक्ति से इसका कारण पूछा तो उसने उत्तर दिया, ‘‘महाराज! मुझे आपसे कुछ जानना है। दरअसल मैं एक गृहस्थ हूं और परिवार में सभी लोगों से अक्सर मेरा झगड़ा होता रहता है। मुझे समझ ही नहीं आता कि आखिर मेरे यहां गृह क्लेश क्यों होता है और वह किस प्रकार दूर हो सकता है?’’संत कबीर कुछ देर चुप रहे, फिर उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज लगाते हुए कहा कि जरा लालटेन जलाकर लाओ! दोपहर का समय था और बाहर तेज धूप निकली हुई थी लेकिन उनकी पत्नी बिना कोई सवाल पूछे चुपचाप उनके कहेनुसार लालटेन जलाकर ले आई। वह आदमी भौंचक्का सा यह दृश्य देखते हुए विचार करने लगा कि आखिर संत ने इतनी दोपहर में भी लालटेन क्यों मंगाई है? कुछ मिनटों के बाद कबीरदास ने फिर पत्नी को आवाज लगाई और कहा कि जरा कुछ मीठा दे जाना। पत्नी आई और मीठे के बजाय थोड़ी नमकीन रखकर चली गई। वह व्यक्ति सोचने लगा कि ये संत और इनकी पत्नी शायद पागल हैं, तभी दोपहर के समय लालटेन जलाते हैं और मीठे के बदले यहां नमकीन मिलती है। यही सोचकर उसने चुपचाप वहां से खिसकने के इरादे से कहा कि महाराज! मैं अब चलता हूं। लेकिन कबीरदास ने उससे पूछा कि आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या अभी भी कोई संशय शेष है?उस व्यक्ति को कुछ समझ नहीं आया और वह आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा तो संत कबीर ने उसे समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार मैंने दोपहर की रोशनी में भी लालटेन मंगवाई तो मेरी धर्मपत्नी मुझे ताना मारते हुए कह सकती थी कि मैं सठिया गया हूं, जो इस दोपहरी में भी लालटेन मंगवा रहा हूं लेकिन उसने सोचा कि अवश्य ही मुझे किसी काम के लिए लालटेन की जरूरत होगी। इसी प्रकार मेरे मीठा मंगवाने पर जब वह नमकीन देकर गई तो मैं भी उससे बहस कर सकता था लेकिन मैंने विचार किया कि संभवतः घर में कोई मीठी वस्तु नहीं होने पर ही वह नमकीन देकर गई है। आखिर गृहस्थ जीवन में ऐसे बातों को लेकर तकरार का क्या अर्थ? कबीरदास ने उसे गृहस्थ जीवन का मूल मंत्र समझाते हुए कहा कि अगर पति से कोई गलती हो जाए तो पत्नी संभाल ले और पत्नी से कोई गलती होने पर पति उसे नजरअंदाज कर दे। गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है और इससे विषम से विषम परिस्थिति भी स्वतः ही हल हो जाती है।- योगेश कुमार गोयल(लेखक 35 वर्षों से साहित्य एवं पत्रकारिता में निरन्तर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं) ]]></description>
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<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 03:31:25 +0530</pubDate>
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<title>Kabirdas Jayanti 2025: कबीरदास ने मानव सेवा में गुजार दिया था पूरा जीवन, हर धर्म के लोग करते थे सम्मान</title>
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<description><![CDATA[ संत कबीर दास भक्तिकाल के कवि थे, उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने में लगाया। हर साल की ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को संत कबीरदास की जयंती के रूप में मनाई जाती है। इस बार 11 जून को संत कबीर जयंती मनाई जा रही है। हालांकि इनके जन्म के विषय में कुछ सटीक नहीं मालूम हैं। लेकिन कुछ पुराने साक्ष्यों के मुताबिक कबीरदास का जन्म 1398 ईं में काशी में हुआ था। वहीं इनकी मृत्यु 1518 में मगहर नामक स्थान पर हुई थी। संत कबीरदास अपने दोहे में धार्मिक पाखंडों का पुरजोर विरोध किया करते थे। उनके जन्म के समय समाज में हर तरफ पाखंड और बुराइयां फैली हुई थीं। वहीं उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज से पाखंड और अंधविश्वास को दूर करने में लगा दिया था। वह अपने दोहे के जरिए व्यक्ति को अधंकार से निकालकर सही राह दिखाते थे। कबीरदास के दोहे अत्यंत सरल भाषा में थे। आज भी लोग कबीरदास के दोहे गुनगुनाते हैं।इसे भी पढ़ें: Sant Kabirdas Jayanti 2025: अंधविश्वास तथा आडम्बरों के घोर विरोधी थे संत कबीरहालांकि कबीरदास जी के जन्म के विषय में विद्वानों में मतभेद देखने को मिलते हैं। बताया जाता है कि कबीरदास का जन्म रामानंद गुरु की आशीर्वाद से एक विधवा ब्रह्माणी के गर्भ से हुआ था। विधवा ब्राह्मणी ने लोकलाज के भय से उनको काशी के समक्ष लहरतारा नामक ताल के पास छोड़ दिया था। जिसके बाद उस रास्ते से गुजरे लेई और लोइमा नामक जुलाहे ने इनका पालन-पोषण किया। तो वहीं कुछ विद्वानों का मत है कि वह जन्म से ही मुस्लिम थे और इनको गुरु रामानंद से राम नाम का ज्ञान प्राप्त हुआ था।बताया जाता है कि कबीरदास निरक्षर थे। इनके द्वारा जितने भी दोहों की रचना की गई वह सिर्फ मुख से बोले गए। कबीरदास ने अपनी अमृतवाणी से लोगों के मन में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने का काम किया और धर्म के कट्टरपंथ पर तीखा प्रहार किया था। संत कबीर के नाम से कबीर पंथ नामक समुदाय की स्थापना की। आज भी इस पंथ के लाखों अनुयायी हैं।उस दौरान समाज में एक अंधविश्वास था कि काशी में जिसकी मृत्यु होती है, उसको स्वर्ग की प्राप्ति होती है। लेकिन मगहर में मृत्यु होने पर नरक में जाना पड़ता है। लोगों में फैले इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए कबीरदास जीवन भर काशी में रहे। लेकिन अपने अंत समय में वह मगहर चले गए और वहीं पर उनकी मृत्यु हुई। कबीरदास को मानने वाले लोग हर धर्म से थे। ऐसे में जब कबीरदास की मृत्यु हुई तो हिंदू और मुस्लिम में उनके अंतिम संस्कार को लेकर विवाद होने लगा। बताया जाता है कि जब कबीरदास के शव से चादर हटाई गई, तो वहां पर सिर्फ फूल थे। इन फूलों को हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आपस में बांट लिया और अपने-अपने धर्म के हिसाब से अंतिम संस्कार किया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 12 Jun 2025 03:31:24 +0530</pubDate>
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<title>Sant Kabirdas Jayanti 2025: भारतीय अध्यात्म जगत के महासूर्य हैं कबीर</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय संत परम्परा और संत-साहित्य में संत कबीर एक महान् हस्ताक्षर, समाज-सुधारक, अध्यात्म की सुदृढ़ परम्परा के संवाहक एवं अनूठे संत हैं। जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरूप रूढ़ियों एवं आडम्बरों में जकड़ा एवं अधंकारमय था, एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांधता से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी और दूसरी तरफ हिंदूओं के कर्मकांडों, विधानों एवं पाखंडों से धर्म-बल का हृास हो रहा था, तब संत कबीर एक रोशनी बनकर समाज को दिशा दी। कबीर ने मानव चेतना के विकास के हर पहलू को उजागर किया। श्रीकृष्ण, श्रीराम, महावीर, बुद्ध, जीसस के साथ-ही-साथ भारतीय अध्यात्म आकाश के अनेक संतों-आदि शंकराचार्य, नानक, रैदास, मीरा आदि की परंपरा में कबीर ने धर्म की त्रासदी एवं उसकी चुनौतियों को समाहित करने का अनूठा कार्य किया। जीवन का ऐसा कोई भी आयाम नहीं है जो उनके दोहों-विचारों से अस्पर्शित रहा हो। अपनी कथनी और करनी से मृतप्रायः मानव जाति के लिए कबीर ने संजीवनी का कार्य किया। इतिहास गवाह है, इंसान को ठोंक-पीट कर इंसान बनाने की घटना कबीर के काल में, कबीर के ही हाथों हुई। शायद तभी कबीर कवि मात्र ना होकर युगपुरुष और युगस्रष्टा कहलाए।महात्मा कबीर सत्व, रज, तम तीनों गुणों को छोड़कर त्रिगुणातीत बन गये थे। उन्होंने निर्गुण रंगी चादरिया रे, कोई ओढ़े संत सुजान को चरितार्थ करते हुए सद्भावना और प्रेम की गंगा को प्रवाहित किया। उन्होंने इस निर्गुणी चदरिया को ओढ़ा है। उन्हें जो दृष्टि प्राप्त हुई है, उसमें अतीत और वर्तमान का वियोग नहीं है, योग है। उन्हें जो चेतना प्राप्त हुई, वह तन-मन के भेद से प्रतिबद्ध नहीं है, मुक्त है। उन्हें जो साधना मिली, वह सत्य की पूजा नहीं करती, शल्य-चिकित्सा करती है। सत्य की निरंकुश जिज्ञासा ही उनका जीवन-धर्म रहा है। वही उनका संतत्व रहा, वही उनकी साधना का अभिन्न अंग रहा। वे उसे चादर की भाँति ओढ़े हुए नहीं हैं बल्कि वह बीज की भाँति उनके अंतस्तल से अंकुरित होता रहा है। कबीर ने सगुण-साकार भक्ति पर जोर दिया है, जिसमें निर्गुण निहित है।इसे भी पढ़ें: Guru Arjun Dev Death Anniversary: शहीदों के &#039;सरताज&#039; कहे जाते थे गुरु अर्जुन देव, स्वर्ण मंदिर की रखी थी नींवहर जाति, वर्ग, क्षेत्र और सम्प्रदाय का सामान्य से सामान्य व्यक्ति हो या कोई विशिष्ट व्यक्ति हो -सभी में विशिष्ट गुण खोज लेने की दृष्टि कबीर में थी। गुणों के आधार से, विश्वास और प्रेम के आधार से व्यक्तियों में छिपे सद्गुणों को वे पुष्प में से मधु की भाँति उजागर करने में सक्षम थे। परस्पर एक-दूसरे के गुणों को देखते हुए, खोजते हुए उनको बढ़ाते चले जाना कबीर के विश्व मानव या वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन का द्योतक है। उन्होंने मन, चेतना, दंड, भय, सुख और मुक्ति जैसे सूक्ष्म विषयों पर भी किसी गंभीर मनोवैज्ञानिक की तरह विचार किया था और व्यक्ति को अध्यात्म की एकाकी यात्रा का मार्ग सुझाया था। कबीर ने लोगों को एक नई राह दिखाई। घर-गृहस्थी में रहकर और गृहस्थ जीवन जीते हुए भी शील-सदाचार और पवित्रता का जीवन जिया जा सकता है तथा आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त किया जा सकता है। वे संसार से भागे नहीं, बल्कि संसार में रहकर सादगी को, संतता को साधा। इसीलिये कबीर एक सामान्य मनुष्य के लिये आशा का द्वार है।संत कबीर का जन्म लहरतारा के पास जेठ पूर्णिमा को हुआ था। उनके पिता नीरू नाम के जुलाहे थे। 119 वर्ष की आयु में उन्होने मगहर में अपना देह त्यागा। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवा अवस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्होंने हिन्दू धर्म की विशेषताओं को स्वीकारा। कबीर ने हिन्दु, मुसलमान का भेद मिटाकर हिन्दू भक्तों तथा मुसलमान फकीरों के साथ सत्संग किया और दोनांे की अच्छी बातों को आत्मसात किया। उनके जीवन में कुरान और वेद ऐसे एकाकार हो गये कि कोई भेदरेखा भी नहीं रही। कबीर पढ़े लिखे नहीं थे पर उनकी बोली बातों को उनके अनुयायियों ने लिपिबद्ध किया जो लगभग 80 ग्रंथों के रूप में उपलब्ध है। कबीर ने भाईचारे, प्रेम और सद्भावना का संदेश दिया है। उनके प्रेरक एवं जीवन निर्माणकारी उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन अक्षरी, उलट बासी में देखे जा सकते हैं। कबीर एक ऐसे संत हैं, जिनके लिये पंथ और ग्रंथ का भेद बाधक नहीं। वे दो संस्कृतियों के संगम हैं। उनका मार्ग सहजता है, यही कारण है कि उन्होंने सहज योग का मार्ग सुझाया। वे जाति-पांति के भेदभावों से मुक्त एक सच्चा इंसान, क्रांतिकारी संतपुरुष एवं अनूठे योगी थे। कबीर ने इन क्रांतिकारी शब्दों के जरिये पाखंडियों को किया था लहूलुहान-कबीर बानी अटपटी, सुनकर लागे आग। अज्ञानी जन जल मुए,ज्ञानी जाए जाग। कबीर की वाणी धधकती हुई आग के समान थी, जिस अग्नि में अज्ञानी और पाखंडियों का भस्म होना निश्चित है। संत सज्जन व्यक्तियों का जीवन सुसज्जित तथा उन्हें परम सत्य की प्राप्ति होना सुनिश्चित है। सत्य परम प्रकाश हमारे अंदर है जिसकी प्राप्ति संत कबीर जैसे महापुरुषों के ज्ञान से की जा सकती है।महात्मा कबीर ने स्वयं को ही पग-पग पर परखा और निथारा। स्वयं को भक्त माना और उस परम ब्रह्म परमात्मा का दास कहा। वह अपने और परमात्मा के मिलन को ही सब कुछ मानते। शास्त्र और किताबें उनके लिये निरर्थक और पाखण्ड था, सुनी-सुनाई तथा लिखी-लिखाई बातों को मानना या उन पर अमल करना उनको गंवारा नहीं। इसीलिये उन्होंने जो कहा अपने अनुभव के आधार पर कहा, देखा और भोगा हुआ ही व्यक्त किया, यही कारण है कि उनके दोहे इंसान को जीवन की नई प्रेरणा देते थे। कबीर शब्दों का महासागर है, ज्ञान का सूरज हैं। उनके बारे में जितना भी कहो, थोड़ा है, उन पर लिखना या बोलना असंभव जैसा है। सच तो यह है कि बूंद-बूंद में सागर है और किरण-किरण में सूरज। उनके हर शब्द में गहराई है, सच का तेज और ताप है।संत शिरोमणि कबीर सर्वधर्म सद्भाव के प्रतीक थे, साम्प्रदायिक सद्भावना एवं सौहार्द को बल दिया। उनको हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही संप्रदायों में बराबर का सम्मान प्राप्त था। दोनो ]]></description>
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<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 03:31:14 +0530</pubDate>
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<title>Sunil Dutt Birth Anniversary: कभी बस कंटक्टर का काम करते थे सुनील दत्त, फिर ऐसे बने एक्टिंग की दुनिया के बादशाह</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के फेमस और दिग्गज अभिनेता रहे सुनील दत्त का 06 जून को जन्म हुआ था। उन्होंने काफी संघर्ष के बाद सफलता हासिल की थी। प्रोफेशनल लाइफ के अलावा पर्सनल लाइफ में भी सुनील दत्त ने काफी परेशानियां झेली थीं। लेकिन उन्होंने कभी इन मुश्किल हालातों से हार नहीं मानी। भले ही आज सुनील दत्त आज हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन फिर भी वह अपनी फिल्मों के जरिए अपने दर्शकों के दिलों में जिंदा है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता सुनील दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारब्रिटिश इंडिया के पंजाब के झेलम में 06 जून 1929 को सुनील दत्त का जन्म हुआ था। वह एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनका बचपन काफी तंगहाली में बीता था। महज 5 साल की उम्र में सुनील दत्त ने अपने पिता को खो दिया था। फिर उन्होंने जैसे-तैसे अपनी पढ़ाई पूरी की और उन्होंने हायर एजुकेशन के लिए मुंबई के जय हिंद कॉलेज में एडमिशन लिया। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने काम तलाशना भी शुरूकर दिया। शुरूआत में उनको बस कंडक्टर की नौकरी मिली और वह ये नौकरी करने लगे।इसे भी पढ़ें: Nutan Birth Anniversary: मिस इंडिया का पहला खिताब पाने वाली पहली एक्ट्रेस थीं नूतन, अफेयर की अफवाह सुन एक्टर को जड़ दिया था थप्पड़रेडियो जॉकीइसके बाद उन्होंने कंडक्टर की नौकरी छोड़ दी और बतौर रेडियो जॉकी काम करने लगे। वहीं कई सालों तक यह नौकरी करने के बाद सुनील दत्त को पहली फिल्म मिली। साल 1955 में सुनील दत्त ने पहली फिल्म &#039;रेलवे प्लेटफॉर्म&#039; में काम किया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।फिल्मेंबता दें कि अभिनेता ने अपनी करियर में &#039;साधना&#039;, &#039;इंसान जाग उठा&#039;, &#039;मदर इंडिया&#039;, &#039;सुजाता&#039;, &#039;मुझे जीने दो&#039;, &#039;पड़ोसन&#039; जैसी कई फिल्मों में काम किया है। हर फिल्म में सुनील दत्त का अलग अंदाज और तेवर देखने को मिला। वह अभिनय के साथ राजनीति में भी कामयाब रहे।सुनील-नरगिस की लव-स्टोरीसुनील दत्त जब बतौर रेडियो जॉकी काम करते थे, तब उनको सुपरस्टार नरगिस का इंटरव्यू करने का मौका मिला था। उस दौरान सुनील दत्त एक्ट्रेस के बहुत बड़े फैन थे। लेकिन तब नरगिस के दिल पर राज कपूर का राज चलता था। लेकिन जब सुनील दत्त को फिल्म &#039;मदर इंडिया&#039; में काम करने का मौका मिला, तो इस दौरान अभिनेता की नरगिस से दोस्ती हो गई। इस फिल्म के दौरान सुनील दत्त ने नरगिस को शादी के लिए प्रपोज कर दिया, वहीं इस दौरान तक नरगिस और राज कपूर का रिश्ता भी टूट चुका था। जिसके बाद साल 1958 में नरगिस और सुनील दत्त ने शादी कर ली। मृत्युवहीं 25 मई 2005 को सुनील दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 07 Jun 2025 03:31:10 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Chaudhary Bhajanlal Death Anniversary: अल्पमत सरकार को बहुमत में बदलने का हुनर रखते थे भजनलाल, 3 बार बने थे हरियाणा के CM</title>
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<description><![CDATA[ हरियाणा के सबसे लंबी अवधि करीब 11 साल और 9 महीने तक सीएम रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले चौधरी भजनलाल का 03 जून को निधन हो गया था। बता दें कि चौधरी भजन लाल हरदिल अजीज राजनेता माने जाते थे। वह सिर्फ हरियाणा के ही नहीं बल्कि पूरे भारत की राजनीति के चाणक्य कहे जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर चौधरी भजनलाल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के बहावलपुर के गांव कोड़ावाली में 06 अक्तूबर 1930 को चौधरी भजनलाल का जन्म हुआ था। वहीं भारत के बंटवारे के बाद उनका परिवार बतौर शरणार्थी हिसार आकर बस गया था। उस दौरान उनकी आयु 17 साल थी। युवावस्था में ही भजनलाल ने जिला हिसार में मंडी आदमपुर को अपना कार्यस्थल बनाया। भजनलाल ने आदमपुर के छोटे से गांव से अपने जीवन का संघर्ष शुरू किया और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सामाजिक और राजनीतिक पहचान बनाई थी।इसे भी पढ़ें: M Karunanidhi Birth Anniversary: फिल्मों के अलावा राजनीति के भी सुपरस्टार रहे एम करुणानिधि, 5 बार बने थे CMराजनीतिक सफरसाल 1960 में भजनलाल आदमपुर के पंच चुने गए थे। वहीं साल 1961 में जिल परिषद के हिसार ब्लाक-II में निर्वाचित हुए। वहीं साल 1968 में पहली बार उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर आदमपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। इसके बाद उन्होंने साल 1968, 1972, 1977, 1982, 1991, 1996, 2000, 2005 और 2008 में लगातार 9 बार आदमपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।हरियाणा के मुख्यमंत्रीइसके बाद साल 1970 से लेकर 1975 तक चौधरी भजन लाल हरियाणा की बंसीलाल सरकार में कृषि मंत्री बनाए गए। फिर साल 1978 में वह देवीलाल सरकार में सहकारिता मंत्री बनाए गए। फिर उन्होंने 28 जून 1979 को सीएम पद की शपथ ली। इसके बाद वह 23 मई 1982 से 04 जून 1986 तक सीएम पद पर रहे। फिर 21 अक्तूबर 1986 को भजनलाल को पहला केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री बने। इसके बाद साल 1988 में वह कृषि मंत्री पद पर सुशोभित हुए। इसके बाद 23 जून 1991 को तीसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने और 10 मई 1996 तक सीएम पद पर बने रहे। बता दें कि चौधरी भजनलाल ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ के चलते साल 1991 में कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की अल्पमत सरकार को बहुमत में बदलने का काम कर दिया था। मृत्युवहीं 03 जून 2011 को हृदय गति रुकने के कारण चौधरी भजनलाल का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 06 Jun 2025 03:32:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dorabji Tata Death Anniversary: भारत के स्टील मैन थे दोराबजी टाटा, भारत को ओलंपिक में जाने के लिए किया था प्रेरित</title>
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<description><![CDATA[ आज के दौर में टाटा कंपनी किसी परिचय की मोहताज नहीं है। इस कंपनी की को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में सर दोराबजी जमशेदजी टाटा का अहम योगदान रहा था। आज ही के दिन यानी की 03 जून को दोराबजी जमशेदजी टाटा का निधन हो गया था। उन्होंने टाटा ग्रुप को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने का काम किया था। निस्वार्थता और परोपकार की भावना उनको अपने पिता से विरासत में मिली थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दोराबजी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारदोराबजी टाटा का जन्म 27 अगस्त 1859 को हुआ था। उनके पिता का नाम जमशेदजी टाटा था और वह सबसे बड़े बेटे थे। देश के महान उद्योगपति सर दोराबजी टाटा बिजनेस अपने पिता से विरासत में मिला था। उन्होंने अपने पिता से बिजनेस के गुण भी सीखे थे। साल 1904 में पिता जमशेदजी टाटा की मृत्यु के बाद दोराबजी टाटा ने टाटा समूह की कमान संभाली थी।इसे भी पढ़ें: Raj Kapoor Death Anniversary: राज कपूर ने स्पॉटब़ॉय के रूप में रखा था इंडस्ट्री में कदम, ऐसे बने हिंदी सिनेमा के शोमैनटाटा स्टीलकंपनी का नेतृत्व संभालने के सिर्फ 3 महीने बाद ही दोराबजी टाटा ने स्टील के क्षेत्र में कदम रखा और साल 1907 में टाटा स्टील और साल 1911 में टाटा पावर की स्थापना की थी। उस दौर में टाटा स्टील देश का पहला इस्पात संयंत्र हुआ करता था। अधिकतर लोहे की खानों का सर्वेक्षण उन्हीं के नेतृत्व में हुआ। दोराबजी टाटा ने कारखाना लगाने के लिए मैंगनीज, कोयला और लोहा समेत इस्पात और खनिज पदार्थों की खोज की। वहीं साल 1910 आते आते ब्रिटिश सरकार की तरफ से उनको नाइटहुड की उपाधि से नवाजा गया।बता दें कि दोराबजी टाटा समूह के पहले चेयरमैन बने और साल 1908 से लेकर 1932 तक इस पद पर कायम रहे। उन्होंने अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए जमशेदपुर का विकास किया और यह शहर औद्योगिक नगर के तौर पर भारत के नक्शे पर छा गया।खेल में रुचिउद्योग के अलावा दोराबजी टाटा को खेलों में भी रुचि थी। उन्होंने कैंब्रिज में बिताए 2 साल में खेलों में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। वह क्रिकेट और फुटबॉल भी खेलना जानते थे और अपने कॉलेज के लिए टेनिस भी खेला था। इसके अलावा दोराबजी एक अच्छे घुड़सवार थे। साल 1920 में उन्होंने भारत को पहली बार ओलंपिक में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था। बता दें कि भारतीय ओलंपित परिषद के अध्यक्ष रहते हुए दोराबजी टाट ने साल 1924 में पेरिस ओलंपिक के लिए भारतीय टीम की आर्थिक तौर पर मदद की थी। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले संपत्ति का बड़ा हिस्सा दान कर दिया था। जिसके बाद से दोराबजी टाटा ट्रस्ट की स्थापना हुई थी।मृत्युवहीं 11 अप्रैल 1932 को दोराबजी टाटा यूरोप की यात्रा पर गए थे, इसी यात्रा के दौरान 03 जून 1932 को जर्मनी के बैड किलेनगेन में दोराबजी टाटा का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 06 Jun 2025 03:32:21 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>M Karunanidhi Birth Anniversary: फिल्मों के अलावा राजनीति के भी सुपरस्टार रहे एम करुणानिधि, 5 बार बने थे CM</title>
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<description><![CDATA[ राजनीति से लेकर फिल्मों की दुनिया तक अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले एम करुणानिधि का 03 जून को जन्म हुआ था। वह एक सफल राजनेता, पत्रकार, साहित्यकार, प्रकाशक कार्टूनिस्ट और समाजसुधारक थे। जब उन्होंने फिल्मों के लिए लिखना शुरू किया, वह तमिल इंडस्ट्री में छा गए और जब राजनीति में आए, तो ताउम्र चुनाव नहीं हारे। एम करुणानिधि पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और जब तक जिंदा थे, राजनीति के केंद्र में बने रहे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एम करुणानिधि के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतमिलनाडु के तिरुकुवालाई में 03 जून 1924 को एम करुणानिधि का जन्म हुआ था। यहां से ही उन्होंने आगे की पढ़ाई लिखाई की। बचपन में उनका नाम दक्षिणमूर्ति था, वहीं एक आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपना नाम करुणानिधि रख लिया।फिल्मी करियरमहज 20 साल की उम्र में वह ज्यूपिटर पिक्चर्स से बतौर लेखक जुड़ गए। उनकी पहली फिल्म राजकुमारी रिलीज हुई और इस फिल्म से उनको फेम मिला। इसके बाद एम करुणानिधि ने राजा रानी, मदुरै मीनाक्षी, रंगून राधा, अबिमन्यु, देवकी, पराशक्ति, पनम, तिरुम्बिपार समेत कई सुपरहिट फिल्मों की कहानी लिखी। 20 साल से लेखन कार्य शुरू करके वह 87 साल की उम्र तक लिखते रहे। इस बीच कई ब्लॉकबस्टर फिल्में उनकी कलम से निकलीं। सिर्फ फिल्मों के लिए ही नहीं बल्कि उन्होंने टीवी सीरियल्स के लिए भी स्क्रिप्ट और डायलॉग भी लिखे थे।इसे भी पढ़ें: Chaudhary Bhajanlal Death Anniversary: अल्पमत सरकार को बहुमत में बदलने का हुनर रखते थे भजनलाल, 3 बार बने थे हरियाणा के CMराजनीतिक सफरएक करुणानिधि ने महज 14 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखा और पूरी जिंदगी राजनीति के केंद्र में बने रहे। उन्होंने हिंदी विरोधी और जातीय भेदभाव को खत्म करने और सामाजिक बदलावों के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों में हिस्सा लिया। वहीं 17 साल की उम्र में उन्होंने एक छात्र संगठन बनाया। कहा जाता है कि करुणानिधि राजनीति की दुनिया के ऐसे धुरंधर थे, जो सदियों में एक बार पैदा होते हैं। भले ही वह तमिलनाडु की राजनीति करते थे, लेकिन उनकी धमक प्रधानमंत्री की कुर्सी तक थी।राजनीति में आप करुणानिधि के कद का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह अपने 80 साल के सियासी सफर में कभी भी चुनाव में नहीं हारे। जोकि अपने आप में बेमिसाल है। 1940 के दशक में उनको डीएमके की प्रचार समिति में शामिल किया गया। वहीं पहली बार 33 साल की उम्र में वह कुलिथलाई से चुनाव लड़े। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह 13 बार विधायक बने। फिर साल 1967 में उनको लोक निर्माण मंत्री बनाया गया। वहीं सीएन अन्नादुरै की मौत के बाद साल 1969 में एम करुणानिधि डीएमके के अध्यक्ष बने और राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका पहला कार्यकाल सिर्फ 2 साल रहा।इसके बाद वह साल 1971 में फिर सीएम बने और 1976 तक इस पद पर रहे। तीसरी बार साल 1989 में, चौथी बार 1996 में और पांचवी बार साल 2006 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने साल 2016 में आखिरी चुनाव लड़ा था। वह अपनी आखिरी सांस तक डीएमके के अध्यक्ष बने रहे। वहीं अपने कार्यकाल में एम करुणानिधि ने कई उल्लेखनीय कार्य किए थे। मृत्युवहीं 07 अगस्त 2018 को लंबी बीमारी के बाद 94 साल की उम्र में एम करुणानिधि की मौत हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 06 Jun 2025 03:32:20 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Karunanidhi, Birth, Anniversary:, फिल्मों, के, अलावा, राजनीति, के, भी, सुपरस्टार, रहे, एम, करुणानिधि, बार, बने, थे</media:keywords>
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<title>SP Balasubrahmanyam Birth Anniversary: सुरों के बादशाह थे एसपी बालासुब्रमण्यम, पहले गाने से बनाई थी बॉलीवुड में पहचान</title>
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<description><![CDATA[ संगीत की दुनिया के बादशाह रहे एसपी बालासुब्रमण्यम किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। आज ही के दिन यानी की 04 जून को एसपी बाला का जन्म हुआ था। उनकी खनकती आवाज सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। दक्षिण सिनेमा में नाम बनाने के बाद बालासुब्रमण्यम ने बॉलीवुड का रुख किया था और वह अपने पहले ही गाने से इंडस्ट्री में छा गए थे। एसपी बाला ने मलयालम, कन्नड़, तमिल, तेलुगु और हिंदी समेत 16 भाषाओं में 40,000 से अधिक गाने गाए हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एसपी बालासुब्रमण्यम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमद्रास में एक तेलुगु परिवार में 04 जून 1946 को एसपी बालासुब्रमण्यम का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम एसपी सांबामूर्ति था, जोकि एक कलाकार थे और उन्होंने नाटकों में भी अभिनय किया था। वहीं इनकी मां का नाम शकुंतलम्मा था। इंजीनियरिंग के दौरान एसपी बाला को टाइफाइड हो गया था, जिसके कारण उनको पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। ऐसे में उन्होंने अपनी पढ़ाई बाद में पूरी की। पढ़ाई करने के साथ ही वह संगीत प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेते और जीतते थे।इसे भी पढ़ें: Raj Kapoor Death Anniversary: राज कपूर ने स्पॉटब़ॉय के रूप में रखा था इंडस्ट्री में कदम, ऐसे बने हिंदी सिनेमा के शोमैनसिंगिंग करियरबता दें कि साल 1966 में बालासुब्रमण्यम ने तेलुगु फिल्म &#039;श्री श्री श्री मर्यादा रमन्ना&#039; के साथ अपने सिंगिंग करियर की शुरूआत की थी। इसके लिए उनको बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर के लिए 6 बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीता था। वहीं साल 2001 में उनको पद्मश्री और 2011 में पद्म भूषण अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। एसपी बाला ने रजनीकांत, सलमान खान, शाहरुख खान, कमल हासन, अनिल कपूर और गिरीश कर्नाड के लिए वॉइस ओवर भी किया है। वहीं डबिंग के लिए सिंगर को नंदी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जोकि थिएटर, तेलुगु सिनेमा और टीवी के लिए आंध्र प्रदेश सरकार का सर्वोच्च सम्मान है।बॉलीवुड में ऐसे जमाई धाकहिंदी से ज्यादा तमिल और तेलुगू फिल्मों के लिए बालासुब्रमण्यम ने गाने गाए हैं। लेकिन 80-90 के दशक में वह बॉलीवुड के रोमांटिक गानों के लिए जाने जाते थे। उनकी बॉलीवुड इंडस्ट्री में एंट्री इतनी धमाल की थी कि पहली फिल्म &#039;एक दूजे के लिए&#039; में गाना गाने के लिए उनको सर्वश्रेष्ठ पुरूष पार्श्वगायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। एसपी बाला द्वारा गाया गया गाना &#039;हम बने, तुम बने एक दूजे के लिए&#039; भी बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है।सिंगर ने यह गाना स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ गाया था। इसके बाद फिल्म &#039;साजन&#039; और &#039;मैंने प्यार किया&#039; सहित सलमान खान की कई फिल्मों के गाने गाए थे। कहा जाता था कि वह सलमान खान की आवाज बन गए थे। उन्होंने कई रिकॉर्ड भी बनाए थे। वहीं 8 फरवरी 1981 को एसपी बाला ने सुबह 9 बजे से रात के 9 बजे तक 12 घंटों में 21 कन्नड़ गाने रिकॉर्ड किए थे। इसके अलावा उन्होंने एक दिन में 19 तमिल गाने और 16 हिंदी गाने भी रिकॉर्ड कर चुके हैं।मृत्युवहीं 05 अगस्त 2020 को बालासुब्रमण्यम को कोविड हो गया। जिसके बाद उनको हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया। लेकिन उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया। हालांकि उन्होंने कोविड के खिलाफ जंग जीत ली थी। लेकिन उनको वेंटिलेटर पर रखा गया था, वहीं एक महीने तक हॉस्पिटल में एडमिट रहने के बाद 25 सितंबर 2020 को एसपी बालासुब्रमण्यम ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 06 Jun 2025 03:32:19 +0530</pubDate>
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<title>Nutan Birth Anniversary: मिस इंडिया का पहला खिताब पाने वाली पहली एक्ट्रेस थीं नूतन, अफेयर की अफवाह सुन एक्टर को जड़ दिया था थप्पड़</title>
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<description><![CDATA[ अपनी अदाकारी से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने वाली अभिनेत्री नूतन का 04 जून को जन्म हुआ था। भले ही नूतन अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन शानदार कलाकार के तौर पर वह आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं। अभिनेत्री के काम को पसंद करने वाले आज भी कम नहीं हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस नूतन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 04 जून 1936 को नूतन का जन्म हुआ था। इनके पिता डायरेक्टर और कवि कुमारसेन समर्थ थे। जबकि मां शोभना समर्थ खुद एक दिग्गज कलाकार थीं। ऐसे में नूतन को बचपन से फिल्मी माहौल मिला था। वह अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। इसे भी पढ़ें: SP Balasubrahmanyam Birth Anniversary: सुरों के बादशाह थे एसपी बालासुब्रमण्यम, पहले गाने से बनाई थी बॉलीवुड में पहचानफिल्मी सफरमहज 14 साल की उम्र से नूतन ने फिल्मी दुनिया में एंट्री कर ली थी। 14 साल की उम्र में उन्होंने फिल्म &#039;हमारी बेटी&#039; से अभिनय की दुनिया में कदम रखा था। इस फिल्म का निर्देशन एक्ट्रेस की मां शोभना समर्थ ने किया था। जिसके बाद एक्ट्रेस ने &#039;अनाड़ी&#039;, &#039;कर्मा&#039;, &#039;मेरी जंग&#039;, &#039;छलिया&#039;, &#039;मैं तुलसी तेरे आंगन की&#039;, &#039;पेइंग गेस्ट&#039; और &#039;सौदागर&#039; जैसी फिल्मों में काम किया है। एक्ट्रेस ने करीब 70 फिल्मों में अभिनय किया था।पर्सनल लाइफबता दें कि साल 1959 में नूतन ने रजनीश बहल से शादी की थी। जोकि इंडियन नेवी में लेफ्टिनेंट कमांडर थे। उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम मोहनीश बहल हैं और वह भी एक अभिनेता हैं। नूतन &#039;मिस इंडिया&#039; का खिताब पाने वाली पहली एक्ट्रेस थीं। किरदार की मांग के हिसाब से एक्ट्रेस बोल्ड कपड़े पहना करती थीं। साल 1958 में आई फिल्म &#039;दिल्ली का ठग&#039; में एक्ट्रेस ने स्विम सूट पहना था।एक्टर को मारा था थप्पड़बताया जाता है कि वह फिल्म के सेट पर खामोश रहती थीं। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान नूतन की संजीव कुमार से दोस्ती हो गई। दोनों की दोस्ती देखकर उनके अफेयर की अफवाह उड़ने लगी। एक दिन एक्ट्रेस ने मैग्जीन में यह खबर पढ़ ली। बाद में उनको पता चला कि अभिनेता संजीव कुमार उस अफवाह को फैला रहे हैं, हालांकि यह गलतफहमी थी। लेकिन यह जानकर उन्होंने संजीव कुमार को तमाचा जड़ दिया था।मृत्युवहीं 21 फरवरी 1991 में ब्रेस्ट कैंसर के चलते नूतन के इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 06 Jun 2025 03:32:18 +0530</pubDate>
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<title>Madhav Sadashiv Golwalkar Death Anniversary: माधव सदाशिव गोलवलकर ने बनाया था आरएसएस को महान संस्थागत शक्ति</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 जून को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर का निधन हो गया था। वह मां भारती के अनन्य उपासक, राष्ट्र चिंतक और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक थे। वह आरएसएस के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते थे। बता दें कि वह सबसे अधिक 33 सालों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षानागपुर के पास रामटेक में एक मराठी परिवार में 19 फरवरी 1906 को माधवराव सदाशिव गोलवलकर का जन्म हुआ था। उन्होंने साल 1937 में बीएचयू से एमएससी की डिग्री हासिल की थी। वह राष्ट्रवादी नेता और यूनिवर्सिटी के संस्थापक मदन मोहन मालवीय से काफी ज्यादा प्रभावित थे। इसी कारण से उन्होंने बीएचयू में जंतु शास्त्र पढ़ाते थे। इस दौरान उनको गुरुजी का उपनाम मिला था। वहीं साल 1932 में गोलवलकर की हेडगेवार से मुलाकात हुई और इसी के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर को बीएचयू में संघचालक नियुक्त किया गया।इसे भी पढ़ें: Dorabji Tata Death Anniversary: भारत के स्टील मैन थे दोराबजी टाटा, भारत को ओलंपिक में जाने के लिए किया था प्रेरितआरएसएस के दूसरे सरसंघचालकवह आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की मृत्यु के बाद साल 1940 में आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक बने थे। वह हमेशा राजनीति से दूर रहने की सलाह देते थे। क्योंकि गोलवलकर राजनीति को अच्छी चीज नहीं मानते थे। आरएसएस और राजनीति के बीच खींची एक लकीरआज भी आरएसएस और राजनीति के बीच एक लकीर साफ नजर आती है। क्योंकि आरएसएस का सीधे तौर पर कभी भी राजनीति में हस्तक्षेप नहीं रहा है। आरएसएस खुद को हमेशा राजनीति से अलग ही बताता है। इसका उद्देश्य हिंदू समाज को सशक्त बनाना और संगठित करना है। महाभारत के एक श्लोक में राजनीति को वेश्याओं का धर्म बताया गया है। इसी श्लोक को माधवराव गोलवलकर और उनके बाद सभी सरसंघचालक दोहराते थे।युवाओं के प्रेरणा पुंजबता दें कि साल 1940 से लेकर 1973 तक गोलवलकर ने सरसंघचालक का दायित्व बड़ी ही कुशलता से निभाया। सरसंघचालक के तौर पर गोलवलकर के 33 साल बहुत महत्वपूर्ण रहे। इन 33 सालों में भारत छोड़ो आंदोलन, विभाजन के पहले और विभाजन के बाद हुआ भीषण रक्तपात, गांधीजी की हत्या, भारत के संविधान का निर्माण, पंडित नेहरू का निधन, भारत-पाक युद्ध आदि अनेक घटनाएं हुईं। इस दौरान गोलवलकर का अध्ययन और चिंतन इतना ज्यादा सर्वश्रेष्ठ रहा कि वह देशभर के युवाओं के लिए प्रेरक पुंज बन गए और पूरे राष्ट्र के दिशा-निर्देशक बन गए थे।मृत्युमाधव सदाशिव गोलवलकर ने समाज में रहते हुए एक संन्यासी की तरह अपनी जीवन जिया। वहीं साल 1969 में उनको कैंसर हो गया। जिसके बाद 05 जून 1973 को नागपुर में माधव सदाशिव गोलवलकर का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 06 Jun 2025 03:32:17 +0530</pubDate>
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<title>Raj Kapoor Death Anniversary: राज कपूर ने स्पॉटब़ॉय के रूप में रखा था इंडस्ट्री में कदम, ऐसे बने हिंदी सिनेमा के शोमैन</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन राज कपूर का 02 जून को निधन हो गया था। राज कपूर को एक अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के तौर पर याद किया जाता है। हालांकि उनका यह सफर इतना भी आसान नहीं रहा था। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपने सफर की शुरूआत बतौर स्पॉटबॉय के रूप में की थी। राज कपूर ने सिनेमा की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनका योगदान सिर्फ अभिनय तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इस क्राफ्ट को एक आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राज कपूर को भले ही अभिनय विरासत में मिला था, लेकिन अभिनय के प्रति उनके जज्बे में हिंदी सिनेमा को &#039;राज&#039; दिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राज कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के पेशावर में 14 दिसंबर 1924 को राज कपूर का जन्म हुआ था। राज कपूर अपने 6 भाई-बहनों में से सबसे बड़े थे। राज कपूर के पिता का नाम पृथ्वीराज कपूर था। वह अपने पिता के साथ मुंबई आ गए। तब उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने कहा कि नीचे से शुरूआत करोगे तो ऊपर तक जाओगे। इस बात को राज कपूर ने दिल से लगा लिया और इंडस्ट्री के सबसे निचले स्तर से शुरूआत की थी।इसे भी पढ़ें: Nargis Birth Anniversary: राज्यसभा की सदस्य बनने वाली पहली अभिनेत्री थीं नरगिस, ऐसा रहा फिल्मी सफरफिल्मी सफरबता दें कि राज कपूर ने महज 11 साल की उम्र में इंडस्ट्री में काम करना शुरूकर दिया था। वह पहली बार साल 1935 में फिल्म &#039;इंकलाब&#039; में दिखाई दिए थे। वहीं 17 साल की उम्र में उन्होंने रंजीत मूवीकॉम और बॉम्बे टॉकीज में स्पॉटबॉय और क्लैपर ब्वॉय के तौर पर काम किया था। राज कपूर ने साल 1947 में आई फिल्म &#039;नील कमल&#039; से बतौर लीड एक्टर काम किया। इसमें उन्होंने एक्ट्रेस मधुबाला के साथ काम किया था। वहीं महज 24 साल की उम्र में साल 1948 में राज कपूर ने अपना स्टू़डियो खोल दिया था। जिसका नाम आरके फिल्म्स था।आरके स्टूडियो हिंदी सिनेमा के लिए एक सौगात था। जिसने कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों की झड़ी लगा दी। वहीं राज कपूर ने फिल्म आग से निर्देशन में कदम रखा था। हालांकि यह फिल्म कुछ खास कमला नहीं कर सकी। लेकिन आलोचकों ने राज कपूर के काम को सराहा। इसके बाद साल 1949 में बरसात और अंदाज जैसी फिल्मों ने राज कपूर को सुपरस्टार बना दिया था।मृत्युवहीं 02 जून 1988 को 63 साल की उम्र में अस्थमा के कारण राज कपूर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 03 Jun 2025 03:32:05 +0530</pubDate>
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<title>Nargis Birth Anniversary: राज्यसभा की सदस्य बनने वाली पहली अभिनेत्री थीं नरगिस, ऐसा रहा फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की लीजेंड्री एक्ट्रेस नरगिस का 01 जून को जन्म हुआ था। वह बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में से एक थीं। उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्में दी हैं। नरगिस एक ऐसी एक्ट्रेस थीं, जिनके अभिनय की प्रशंसा हर कोई करता है। महज 28 साल की उम्र में नरगिस ने अभिनेता सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार की मां का किरदार निभाकर हर किसी को चौंका दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नरगिस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबता दें कि नरगिस का जन्म 01 जून 1929 को हुआ था। अभिनेत्री ने कई शानदार फिल्में दी थीं। साल 1935 में नरगिस ने फिल्म &#039;तलाश-ए-हक&#039; से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। फिर साल 1949 में एक्ट्रेस ने महबूब खान की फिल्म अंदाज में बतौर लीड एक्ट्रेस डेब्यू किया था। वहीं अभिनेता राज कपूर के साथ अभिनेत्री ने आवारा, बरसात और आग जैसी हिट फिल्मों में काम किया था।राज कपूर संग रिश्ताएक समय ऐसा भी था, जब नरगिस और राज कपूर एक-दूसरे के प्यार में पड़ गए। इनका रिश्ता करीब 9 साल तक चला। इन 9 सालों में राज कपूर और नरगिस का प्यार इतना परवान चढ़ा कि दोनों शादी करना चाहते थे। जबकि राज कपूर पहले से शादीशुदा थे। राज कपूर ने कई बार नरगिस से वादा किया कि वह अपनी पत्नी कृष्णा को तलाक दे देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नरगिस व राज कपूर का रिश्ता खत्म हो गया। राज कपूर संग रिश्ता खत्म होने के बाद नरगिस की जिंदगी में अभिनेता सुनील दत्त की एंट्री हुई। दरअसल, राज कपूर से अलग होने के बाद नरगिस ने फिल्म मदर इंडिया साइन की थी। इस फिल्म के सेट पर नरगिस और सुनील दत्त की बीच अच्छी दोस्ती हो गई और यह दोस्ती वक्त के साथ प्यार में बदल गई। जिसके बाद साल 1958 में नरगिस और सुनील दत्त ने शादी कर ली थी।बॉलीवुड में नरगिस को बहुत मान-सम्मान मिला और उनको पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। साल 1980 में नरगिस को इंदिरा गांधी की सरकार ने राज्यसभा का सदस्य बनाया। वह राज्यसभा के लिए निर्वाचित पहली महिला स्टार थीं। नरगिस ने अपने अभिनय के दम पर लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। वह अपने बेटे संजय दत्त के काफी करीब थीं।मृत्युवहीं कैंसर हो जाने के कारण 03 मई 1981 को 51 साल की उम्र में नरगिस दत्त का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 02 Jun 2025 03:31:24 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ahilyabai Holkar Birth Anniversary: अहिल्याबाई होलकर को दी गई थी &amp;apos;द फिलॉसफर क्वीन&amp;apos; की उपाधि, जानिए दिलचस्प बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 31 मई को होलकर वंश का महारानी अहिल्याबाई का जन्म हुआ था। जब देश में सती होने की प्रथा का चलना था, उस दौरान अहिल्याबाई होलकर ने होलकर वंश को संभाला था। अहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को अपने पुत्र से भी अधिक प्रेम किया था। लोग उनको लोकमाता भी कहते थे। अहिल्याबाई होलकर का जीवन संस्कृति, धर्म और राष्ट्र के लिए समर्पित था। जिसके कारण उनको &#039;द फिलॉसफर क्वीन&#039; की उपाधि दी गई। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अहिल्याबाई होलकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के जामखेड कस्बे के ग्राम चांडी में 31 मई 1725 को अहिल्याबाई का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मनकोजी राव शिंदे था, जोकि मराठा सेना में सैनिक थे और बाद में नायक बने। वहीं उनकी मां का नाम सुशीला बाई थी। बता दें कि मराठा सैनिकों के परिवार की महिलाओं को कुछ सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था और आत्मरक्षा का अभ्यास कराया जाता है। इसके पीछे वजह यह थी कि जब गांव के युवा सैन्य अभियानों पर होते थे तो अराजक तत्व गांव हमला बोल देते थे। ऐसे में गांवों को लूटने के साथ ही महिलाओं को भी निशाना बनाया जाता था। इसलिए सैन्य परिवार की महिलाओं और बेटियों को सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था। इस दौरान अहिल्याबाई भी भाला और तीर कमान चलाना सीख गई थीं।इसे भी पढ़ें: Ahilyabai Holkar Birth Anniversary: दूरदर्शी एवं साहसी महिला शासक थी अहिल्यादेवी होलकरपति का निधनवहीं 1733 में अहिल्याबाई का विवाह इंदौर के महाराज मल्हार राव होलकर के पुत्र खांडेराव होलकर से हुआ। उस दौरान उनकी उम्र 8 साल थी और खंडेराव अहिल्याबाई से दो साल बड़े थे। बाल विवाह के कारण अहिल्याबाई 4 साल तक अपने मायके में रहीं। वहीं 1737 में उनका गौना हुआ और वह सामान्य सैनिक की बेटी से राजवधू बन गई थीं। लेकिन मजह 29 साल की उम्र में अहिल्यबाई होलकर के पति का निधन हो गया था। ऐसे में जब खांडेराव होलकर का निधन हुआ, तो मल्हारराव जी ने अपनी बहू को सती होने से रोका था और उनको राजकाज से जोड़ा। फिर उनके ससुर मल्हारराव का भी निधन हो गया। पुत्र को सुनाई मौत की सजाससुर मल्हारराव होलकर की मृत्यु के बाद उनका पौत्र मालेराव होलकर मालवा का सूबेदार बना। लेकिन पुत्र के गलत आचरण के कारण अहिल्याबाई दुखी रहती थीं। जहां अहिल्याबाई धार्मिक कार्यों और समाज सेवा में रुचि लेती थीं, तो वहीं मालेराव को यह सब पसंद नहीं था। वह लोगों के साथ निर्दयतापूर्वक और कठोर व्यवहार करता था। ऐसे में अहिल्याबाई ने मालेराव को हाथी से कुचलवा दिए जाने का आदेश दे दिया। इस घटना से अहिल्याबाई को मानसिक आघात पहुंचा और उन्होंने एकांतवास का विचार किया। लेकिन उनको जल्द ही अपने कर्तव्य को बोध हुआ और राजकाज में जुट गईं।महिलाओं के अधिकारअहिल्याबाई महिलाओं के सम्मान और अधिकार के प्रति संवेदनशील थीं। उस दौरान एक नियम था कि यदि किसी पुरुष का निधन हो जाता है और उसकी कोई संतान न हो तो उस व्यक्ति की सारी संपत्ति राजकोष में चली जाती थी। पुरुष उत्तराधिकारी के न होने पर संपत्ति में महिला का अधिकार नहीं होता था। लेकिन अहिल्याबाई ने इस नियम को बदला और पति या पुत्र के निधन पर मां और पत्नी का अधिकार सुनिश्चित किया।मृत्युवहीं 13 अगस्त 1795 को अहिल्याबाई होलकर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 01 Jun 2025 03:31:48 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Prithviraj Kapoor Death Anniversary: फिल्मी दुनिया के सिकंदर थे पृथ्वीराज कपूर, मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक तय किया था सफर</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय सिनेमा जगत में पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी पहचान बनाकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाले कपूर खानदान से तो हर कोई वाकिफ है। आज भी बॉलीवुड फिल्मों में कपूर फैमिली सक्रिय है। जब सिनेमा जगत में बोलती फिल्मों का प्रचलन नहीं था, तब से कपूर खानदान सिनेमा में सक्रिय है। कपूर खानदान में अभिनय की शुरूआत पृथ्वीराज कपूर ने की थी। आज ही के दिन यानी की 29 मई को पृथ्वीराज कपूर का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पृथ्वीराज कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारलायलपुर (फैसलाबाद) में 03 नवंबर 1906 को पृथ्वीराज कपूर का जन्म हुआ था। महज 3 साल की उम्र में पृथ्वीराज कपूर ने अपनी मां को खो दिया था। वह दौर उनके लिए काफी मुश्किल भरा था। बता दें कि पृथ्वीराज कपूर ने महज 8 साल की उम्र से अभिनय की शुरूआत कर दी थी। इसके बाद जब उन्होंने कॉलेज ज्वॉइन किया, तो उस दौरान उनकी अभिनय में दिलचस्पी देखकर उनके प्रोफेसर ने उनको थिएटर ज्वॉइन करने के लिए कहा।इसे भी पढ़ें: NT Rama Rao Birth Anniversry: राजनीति में धूमकेतू की तरह चमके थे एनटी रामा राव, जानिए दिलचस्प बातेंफिल्मी करियरपृथ्वीराज कपूर ने कुछ प्ले और पैसे उधार लेकर सपनों की नगरी मुंबई आ गए। मुंबई आकर वह इंपीरियल फिल्म कंपनी से जुड़ गए, यह वो दौर था जब साइलेंट फिल्मों का चलन था। पृथ्वीराज कपूर ने भी साइलेंट फिल्मों का रुख किया और इन फिल्मों में काम करके एक्टर ने अपने अभिनय को निखारने का काम किया। इसके बाद जब पहली बोलती फिल्मों का आगाज हुआ, तब पहली फिल्म &#039;आलमआरा&#039; बनीं। वहीं पृथ्वीराज कपूर बोलती फिल्मों के पहले खलनायक बनकर उभरे थे। इस फिल्म में उन्होंने बेहतरीन भूमिका निभाकर अपने अभिनय की लाजवाब मिसाल पेश की।वहीं साल 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने मुंबई में पृथ्वी थिएटर की स्थापना की थी। जो देश में घूम-घूमकर नाटकों का प्रदर्शन किया करता था। पृथ्वीराज कपूर ने बचपन से लेकर जवानी और बुढ़ापे तक पूरी जिंदगी अभिनय में गुजार दी। फिल्म &#039;मुगल ए आजम&#039; में पृथ्वीराज कपूर ने अकबर का किरदार निभाया था। जो आज भी लोगों के जहन में जिंदा है।मृत्युवहीं 29 मई 1972 को 65 साल की उम्र में कैंसर से ग्रसित होने के कारण पृथ्वीराज कपूर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 31 May 2025 03:32:52 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Chaudhary Charan Singh Death Anniversary: बिना खेती किए किसानों के मसीहा कहलाए थे चौधरी चरण सिंह, ऐसे बने थे 5वें पीएम</title>
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<description><![CDATA[ देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का 29 मई को निधन हो गया था। उन्होंने हमेशा किसानों के हित के लिए आवाज उठाई और संघर्ष किया। बता दें कि चौधरी चरण सिंह ने साल 1979 से लेकर जनवरी 1980 तक देश के प्रधानमंत्री के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने किसानों के उत्थान और विकास के लिए तमाम नीतियां बनाईं। उनकी इन नीतियों से किसानों के हालातों में काफी सुधार देखने को मिला। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमेरठ जिले के नूरपुर की मंडैया गांव में 23 दिसंबर 1902 को चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था। आर्थिक संकट से जूझता उनका परिवार नूरपुर की मंडैया से जानी के पास भूपगढ़ी गांव चला गया। यहां पर दो वक्त की रोटी की लड़ाई चौधरी चरण सिंह के परिवार को खरखौदा के पास स्थित भदौला गांव ले गईं। किसी तरह से चौधरी चरण सिंह ने अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर मेरठ आगरा यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री प्राप्त की।इसे भी पढ़ें: Jawaharlal Nehru Death Anniversary: लोकतंत्र के सबसे बड़े मार्गदर्शक थे जवाहर लाल नेहरू, ऐसा रहा सियासी सफरपहली बार बने विधायकलॉ की डिग्री लेने के बाद चौधरी चरण सिंह ने गाजियाबाद से अपने पेशे की शुरूआत की थी। साल 1929 में मेरठ आ गए और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। वह सबसे पहले साल 1937 में छपरौली से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए। वहीं साल 1946, 1952, 1962 और 1967 में विधानसभा में अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया गया। वहीं चौधरी चरण सिंह ने साल 1946 में पंडित गोविंद वल्लभ पंत की सरकार में संसदीय सचिव बने। उन्होंने चिकित्सा और लोक स्वास्थ्य, राजस्व, न्याय और सूचना समेत कई विभागों में कार्य किया।जून 1951 में चौधरी चरण सिंह को राज्य के कैबिनेट मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। इस दौरान उन्होंने न्याय और सूचना विभागों का प्रभार दिया गया। फिर साल 1952 में वह डॉ. सम्पूर्णानन्द के मंत्रिमंडल में राजस्व एवं कृषि मंत्री बने। अप्रैल 1959 में चौधरी चरण सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया, तो उस दौरान उन्होंने राजस्व एवं परिवहन विभाग का प्रभार संभाला हुआ था। लेखपाल का पदबता दें कि चौधरी चरण सिंह ने ही उत्तर प्रदेश में लेखपाल का पद बनाया था। इसके अलावा उन्होंने यूपी भूमि संरक्षण का भी कानून पारित किया था। साल 1967 में वह यूपी के सीएम बने और फिर साल 1968 में चौधरी चरण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वह गृहमंत्री रहते हुए मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रीय कृषि ग्रामीण विकास बैंक नाबार्ड की स्थापना की और चकबंदी कानून, जमींदारी उन्मूलन विधेयर और ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना की थी। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 31 May 2025 03:32:51 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Chaudhary, Charan, Singh, Death, Anniversary:, बिना, खेती, किए, किसानों, के, मसीहा, कहलाए, थे, चौधरी, चरण, सिंह, ऐसे, बने, थे, 5वें, पीएम</media:keywords>
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<title>Maharana Pratap Birth Anniversary: मेवाड़ बचाने के लिए अकबर से 12 साल तक लड़ते रहे महाराणा प्रताप</title>
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<description><![CDATA[ हमारा देश भारत जिसे आस्था और विश्वास, शौर्य एवं शक्ति, बहादुरी और साहस, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की वीरभूमि कहा जाता है, जहां की सभ्यता और संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति में शुमार है, जिसका अनुसरण संपूर्ण विश्व करता है। भारत की भूमि महान योद्धाओं की भूमि रही है, जिन्होंने भारत की एकता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे ही एक वीर एवं साहसिक योद्धा एवं सच्चे भारतीय महानायक थे महाराणा प्रताप, जो राजपूतों के सिसोदिया वंश से संबंध रखते थे। महाराणा को भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने कभी अकबर के सामने समर्पण नहीं किया। मुगल साम्राज्य के विस्तार के विरुद्ध उनके प्रबल प्रतिरोध ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर बना दिया है। हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की विशाल सेना का सामना करते हुए उन्होंने जो वीरता दिखाई, वह आज भी शौर्य, पराक्रम, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की प्रेरणा देती है। उनके जीवन की घटनाएं गौरवमय इतिहास बनी है। वे एकलौते ऐसे महान् राजपूत योद्धा थे, जिन्होंने अकबर को चुनौती देने का साहस ही नहीं दिखाया बल्कि युद्ध के मैदान में लोहे के चने चबवाये। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था। जो हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। जो इस वर्ष 29 मई को मनाई जाएगी। युवावस्था में ही महाराणा प्रताप ने तलवारबाजी, घुड़सवारी और युद्धनीति में महारत हासिल कर ली थी। उनकी जन्म जयंती न केवल उनके जन्म का उत्सव है, बल्कि उनके आदर्शों, विरासत और भारत की सांस्कृतिक धरोहर में दिए गए उनके अमूल्य योगदान का सम्मान भी है। महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर के सेनापति राजा मानसिंह के बीच 8 जून 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था। महाराणा प्रताप ने लगभग 20 हजार सैनिकों के साथ 85 हजार की मुगल सेना से बहुत ही साहस, शौर्य, पराक्रम एवं बहादुरी के साथ सामना किया। दोनों सेनाओं के बीच गोगुडा के नजदीक अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के बीच यह युद्ध हुआ। इस लड़ाई को हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाइयां लड़ते रहे।इसे भी पढ़ें: Malharrao Holkar Death Anniversary: मालवा के प्रथम मराठा सूबेदार थे मल्हारराव होलकर, ऐसे गढ़ी थी अपनी किस्मतइस युद्ध में उनका प्रिय घोड़ा चेतक भी वीरगति को प्राप्त हो गया, लेकिन इसके बाद भी महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और युद्ध जारी रखा। मुगल शासक अकबर ने मेवाड़ पर अपना अधिकार स्थापित करने की भरपूर कोशिश की। लेकिन महाराणा प्रताप ने कभी भी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया और जीवन भर मुगलों के खिलाफ स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करते रहे। उनका परिवार बहुत ही कठिन परिस्थितियों में रहा। वे कई सालों तक जंगलों, गुफाओं और पहाड़ियों में रहे। उन्होंने पेड़ों की छाल से बने साधारण कपड़े पहने और जंगली फल और जड़ें खाईं। उनकी पत्नी और बच्चे कभी-कभी घास की रोटी खाते थे। फिर भी, उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया या मुगलों के साथ समझौता नहीं किया। उनके शौर्य और वीरता की कहानी को आज भी बहुत ही गर्व के साथ याद किया जाता है। राजस्थानी भाषा के ख्यात कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध राजस्थानी कविता ‘पातल और पीथल’ हल्दीघाटी युद्ध के बाद की घटनाओं पर आधारित राणा प्रताप के जीवन में आई कठिनाइयों और उनके संघर्ष को दर्शाती है। आजाद भारत में महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों के त्याग एवं बलिदान, शौर्य एवं पराक्रम को विस्मृत करने की चेष्टायें व्यापक पैमाने पर हुई है। हमने इन असली महानायकों को भूलाकर अकबर एवं औरंगजेब जैसे आक्रांताओं को नायक बनाने की भारी भूल की है, नायक अकबर नहीं महाराणा प्रताप हैं, उन्होंने औरंगजेब को घुटने टेकने पर मजबूर किया और घुट-घुट कर मरने पर मजबूर किया। सनातन धर्म को नष्ट करने की साजिश करने वाले भारत के नायक कैसे हो सकते? अकबर हो या औरंगजेब, हिन्दुओं एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रति सबकी मानसिकता एक ही थी- भारत की सनातन परंपरा को रौंदने के लिए तमाम षड्यंत्र रचना एवं भारत की समृद्ध विरासत को लूटना। इसके विपरीत, महाराणा प्रताप ने अपने बलिदान से सनातन संस्कृति की रक्षा की। ये राष्ट्रनायक हमारी असली प्रेरणा हैं। भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। कहा जाता है कि चेतक कई फीट ऊंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था। कुछ लोकगीतों के अलावा हिन्दी कवि श्यामनारायण पांडेय की वीर रस कविता ‘चेतक की वीरता’ में उसकी बहादुरी की खूब तारीफ की गई है। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। मेवाड़ की जनजाति ‘भील’ कहलाती है। भीलों ने हमेशा हर संकट एवं संघर्ष के क्षणों में महाराणा प्रताप साथ दिया। एक किवदंती है कि महाराणा प्रताप ने अपने वंशजों को वचन दिया था कि जब तक वह चित्तौड़ वापस हासिल नहीं कर लेते, तब तक वह पुआल यानी घास पर सोएंगे और पेड़ के पत्ते पर खाएंगे। आखिर तक महाराणा को चित्तौड़ वापस नहीं मिला। उनके वचन का मान रखते हुए आज भी कई राजपूत अपने खाने की प्लेट के नीचे एक पत्ता रखते हैं और बिस्तर के नीचे सूखी घास का तिनका रखते हैं। महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदाय के साथ बिता, भीलों के साथ ही वे युद्ध कला सीखते थे, भील अपने पुत्र को कीका कहकर पुकारते है, इसलिए भील महाराणा को भी कीका नाम से पुकारते थे। महाराणा प्रताप का दिल और दिमाग ही नहीं, बल्कि उनका शरीर भी साहसी एवं लोह समान था। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप 7 फीट 5 इंच ल ]]></description>
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<pubDate>Sat, 31 May 2025 03:32:50 +0530</pubDate>
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<title>Ahilyabai Holkar Birth Anniversary: दूरदर्शी एवं साहसी महिला शासक थी अहिल्यादेवी होलकर</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल इतिहास के सुवर्ण पृष्ठों पर अनेक शील, शौर्य, शक्ति एवं पराक्रम संपन्न नारियों के नाम अंकित हुए हैं। शील, भक्ति, आस्था, शौर्य, शक्ति एवं धर्मनिष्ठा के अद्वितीय प्रभाव के कारण ही वे प्रणम्य हैं। ऐसी ही श्रृंखला में एक नाम है राजमाता अहिल्याबाई होलकर का, जो परम विदुषी, सनातन धर्म-शासन प्रभाविका, मातृहृदया, कुशल शासक एवं प्रबल धर्मनिष्ठा पूज्याप्रवर हैं। वे हिन्दू धर्म की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों और जीवनमूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान विभूति थी, शासक रश्मि थी, सृजन रश्मि थी, नेतृत्व रश्मि थी, विकास रश्मि थी। सनातन धर्म की ध्वजवाहिका थी, एक ऊर्जा थी। उन्होंने ने न केवल कुशल-शासक व्यवस्था के मूल्य मानक गढ़े, बल्कि सामाजिकता, सेवा एवं परोपकार के नये आयाम भी उद्घाटित किये। जन कल्याण एवं सेवा के क्षेत्र में भी उन्होंने अनेक कार्य किए। भारत ऐसी ही आदर्श नारी चरित्रों की गौरव-गाथा से विश्व गुरु कहलाता था। इस वर्ष 31 मई, 2025 को उनकी जन्म जयन्ती का त्रिशताब्दी दिवस है। कभी-कभी वास्तविक जीवन की घटनाएं कहानियों से भी अधिक अद्भुत, साहसी, रोमांचकारी एवं विलक्षण होती है। सच यह भी है कि कभी-कभी जिन्दगी की किताब के किरदार कहानियों, फिल्मों एवं उपन्यासों के किरदारों से भी कहीं अधिक सशक्त और अविस्मरणीय होते हैं। लौह महिला महारानी अहिल्याबाई होल्कर का व्यक्तित्व व कृतित्व भी ऐसा ही है, जो उन्हें विश्व की श्रेष्ठतम महिलाओं की पंक्ति में अग्रणी बनाता है, जिनका भारत के इतिहास और जनमानस पर विशेष प्रभाव रहा है। वे भारतीय इतिहास की एक विलक्षण, साहसी, दूरदर्शी, दार्शनिक एवं पराक्रमी नायिका है। राजमाता अहिल्याबाई होलकर, मालवा साम्राज्य की होलकर रानी थीं। उन्हें भारत की सबसे दूरदर्शी एवं साहसी महिला शासकों में से एक माना जाता है। 18वीं शताब्दी में, मालवा की महारानी के रूप में, धर्म का संदेश फैलाने में, नयी शासन-व्यवस्था स्थापित करने और औद्योगीकरण के प्रचार-प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा था। अतीत से आज तक वे व्यापक रूप से अपनी बुद्धिमत्ता, साहस और प्रशासनिक कौशल के लिए जानी जाती हैं। इसे भी पढ़ें: Guru Arjun Dev Death Anniversary: शहीदों के &#039;सरताज&#039; कहे जाते थे गुरु अर्जुन देव, स्वर्ण मंदिर की रखी थी नींव31 मई 1725 को जामखेड, अहमदनगर (महाराष्ट्र) के चोंडी गाँव में जन्मी अहिल्या, एक साधारण परिवार से थीं। उनके पिता मनकोजी राव शिंदे, ग्राम प्रधान थे, जिन्होंने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया था। एक युवा लड़की के रूप में, उनकी सादगी और सुचरित्र के संयोजन ने, मालवा क्षेत्र के राजा मल्हार राव होलकर का ध्यान उनकी ओर आकर्षित किया। वे युवा अहिल्या से इतने प्रभावित थे कि 1733 में जब वे मुश्किल से आठ साल की भी नहीं हुई थीं, तब उन्होंने उनका विवाह अपने बेटे खंडेराव होलकर से करवा दिया। उनकी शादी के बारह साल बाद, कुम्हेर किले की घेराबंदी के दौरान, उनके पति खंडेराव की मृत्यु हो गई। अहिल्याबाई इतनी आहत हुईं कि उन्होंने सती होने का फ़ैसला कर लिया। लेकिन उनके ससुर मल्हार राव ने उन्हें इतना कठोर कदम उठाने से रोक लिया और अहिल्या को अपनी छत्र-छाया में लेकर, उन्हें सैन्य, राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में प्रशिक्षित किया। राज-काज की बारीकियां समझाई।‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’- मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। ज्योति की यात्रा मनुष्य की शाश्वत अभीप्सा है। इस यात्रा का उद्देश्य है, प्रकाश की खोज। प्रकाश उसे मिलता है, जो उसकी खोज करता है। कुछ व्यक्तित्व प्रकाश के स्रोत होते हैं। वे स्वयं प्रकाशित होते हैं और दूसरों को भी निरंतर रोशनी बांटते हैं। अहिल्याबाई ऐसा ही एक लाइटहाउस था यानी प्रकाश-गृह, जिसके चारों ओर रोशनदान थे, खुले वातायन थे। उनका चिंतन, शासन-व्यवस्था, संस्कृति-प्रेम, संभाषण, आचरण, सृजन, सेवा, परोपकार- ये सब ऐसे खुले वातायन थे, जिनसे निरंतर आलोक प्रस्फुटित होता रहा और पूरी मानवजाति को उपकृत किया। राजमाता अहिल्याबाई होलकर का जीवन अनेक संकटों एवं संघर्षों का साक्षी बना। एक के बाद एक पहाड जैसे दुःख, आघात उन्हें झेलने पड़े। 1766 में अहिल्या के ससुर मल्हार राव का भी निधन हो गया। उसके अगले ही वर्ष, उन्होंने अपने बेटे माले राव को भी खो दिया। बेटे को खोने का दुःख उन्होंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। राज्य और अपनी प्रजा के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पेशवा से, मालवा के शासन को संभालने की अनुमति मांगी। हालांकि, कुछ अभिजातों ने इसका विरोध किया, लेकिन उन्हें सेना का समर्थन प्राप्त था। सेना को उन पर पूरी श्रद्धा और विश्वास था, क्योंकि वह सैन्य और प्रशासनिक मामलों में अच्छी तरह से प्रशिक्षित थीं। उन्होंने कई मौकों पर सेना का नेतृत्व किया था और एक सच्चे योद्धा की तरह लड़ाई लड़ी थी। 1767 में, पेशवा ने अहिल्याबाई को मालवा पर अधिकार करने की अनुमति दे दी। 11 दिसंबर 1767 को वे गद्दी पर बैठीं और इंदौर की शासक बनीं। अगले 28 वर्षों तक महारानी अहिल्याबाई ने न्यायोचित, बुद्धिमत्तापूर्ण और ज्ञानपूर्वक तरीके से मालवा पर शासन किया। अहिल्याबाई के शासन के तहत, मालवा में शांति, समृद्धि, खुशहाली और स्थिरता बनी रही। साथ ही साथ उनकी राजधानी साहित्यिक, संगीतात्मक, कलात्मक और औद्योगिक गतिविधियों के एक बेहतरीन स्थान में परिवर्तित हो गई। कवियों, कलाकारों, मूर्तिकारों और विद्वानों का उनके राज्य में स्वागत किया गया, क्योंकि वे उनके काम को बहुत सम्मान दिया करती थीं।रानी अहिल्याबाई ने अपने समय में विभिन्न दिशाओं में सृजन की ऋचाएं लिखी हैं, नया इतिहास रचा है। अपनी योग्यता और क्षमता से स्वयं को साबित किया है। नारी शासक के रूप उन्होंने एक छलांग लगाई, राज-व्यवस्था एवं उन्नत समाज संरचना को निर्मित करते हुए जीवन की आदर्श परिभाषाएं गढ़ी थीं। वह अपनी प्रजा को अपनी संतान मानती थी। उन्होंने अपने शासनकाल में कई कानूनों को समाप्त किया, किसानों का लगान कम किया, कृषि, उद्योग धन्धो ]]></description>
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<pubDate>Sat, 31 May 2025 03:32:48 +0530</pubDate>
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<title>Guru Arjun Dev Death Anniversary: शहीदों के &amp;apos;सरताज&amp;apos; कहे जाते थे गुरु अर्जुन देव, स्वर्ण मंदिर की रखी थी नींव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 30 मई को सिखों के 5वें गुरु अर्जुन देव जी की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने हमेशा गुरु परंपरा का पालन किया और गलत चीजों के आगे कभी नहीं झुके। उन्होंने शरणागतों की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान हो जाना स्वीकार किया। गुरु अर्जुन देव मानव सेवा के पक्षधर थे और वह सिख धर्म के सच्चे बलिदानी थी। गुरु अर्जुन देव से ही सिख धर्म में बलिदान की परंपरा शुरू हुई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अर्जुन देव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारगुरु अर्जुन देव का 15 अप्रैल 1563 को जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गुरु रामदास और मां का नाम बीवी भानी था। इनके पिता गुरु रामदास सिखों के चौथे गुरु थे और नाना गुरु अमरदास सिखों के तीसरे गुरु थे। ऐसे में गुरु अर्जुन देव का बचपन नाना यानी की गुरु अमरदास की देखरेख में बीता था। गुरु अमरदास ने गुरु अर्जुन देव को गुरुमुखी की शिक्षा दी थी। साल 1579 में उनका विवाह मां गंगा जी के साथ हुआ था।इसे भी पढ़ें: Maharana Pratap Birth Anniversary: मेवाड़ बचाने के लिए अकबर से 12 साल तक लड़ते रहे महाराणा प्रतापस्वर्ण मंदिर की नींवबता दें कि साल 1581 में गुरु अर्जुन देव सिखों के पांचवे गुरु बने थे। उन्होंने अमृतसर में श्री हरमंदिर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी। जिसको आज गोल्डन टेंपल या स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। बताया जाता है कि स्वयं गुरु अर्जुन देव जी ने ही स्वर्ण मंदिर का नक्शा बनाया था।धर्म के लिए दिया स्वयं का बलिदानधर्म की रक्षा के लिए गुरु अर्जुव देव ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। दरअसल, मुगल बादशाह जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को लाहौर की भीषण गर्मी में गर्म तवे पर बिठाया। उन पर गर्म रेत डाली गई और अन्य तरह की तमाम यातनाएं दी गई थीं। यातनाओं के कारण गुरु अर्जुन देव का शरीर बुरी तरह से जल गया था। वहीं 30 मई 1606 को उनको रावी नदी में नहलाने के लिए ले जाया गया, जहां पर उन्होंने प्राण त्याग दिए। गुरु अर्जुन देव के स्मरण में रावी नदी के किनारे गुरुद्वारा डेरा साहिब का निर्माण कराया गया, जोकि वर्तमान समय में पाकिस्तान में है।युद्ध के साथ कलम के थे सिपाहीगुरु अर्जुन देव ने भाई गुरुदास के सहयोग से गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन किया था। इसके साथ ही उन्होंने रागों के आधार पर गुरु वाणियों का भी वर्गीकरण किया था। वहीं श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में गुरु अर्जुन देव के हजारों शब्द हैं। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 31 May 2025 03:32:48 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Guru, Arjun, Dev, Death, Anniversary:, शहीदों, के, सरताज, कहे, जाते, थे, गुरु, अर्जुन, देव, स्वर्ण, मंदिर, की, रखी, थी, नींव</media:keywords>
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<title>Sambhaji Maharaj Birth Anniversary: मराठा साम्राज्य के वीर योद्धा थे संभाजी महाराज, जानिए क्यों कहा जाता था &amp;apos;छावा&amp;apos;</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 14 मई को छत्रपति संभाजी महाराज का जन्म हुआ था। वह मराठा साम्राज्य के वीर और साहसी योद्धा थे। संभाजी महाराज सिर्फ एक योद्धा नहीं बल्कि विद्वान, धार्मिक सहिष्णुता और वीरता के भी प्रतीक थे। राजकुमार होने के नाते छोटी उम्र में ही संभाजी को युद्ध अभियानों और राजनीतिक चालों का अनुभव हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर संभाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामहाराष्ट्र के पुरंदर किले में 14 मई 1657 को संभाजी महाराज का जन्म हुआ था। वह मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज और सईबाई के पुत्र थे। संभाजी महाराज की देखभाल उनकी दादी राजमाता जीजाबाई ने की थी। हालांकि उनकी सौतेली मां पुतलीबाई भी उनसे स्नेह रखती थीं। लेकिन संभाजी की सौतेली मां सोयराबाई ने उनके राजनीतिक जीवन में कई बार दखल किया। संभाजी को संस्कृत, मराठी, फारसी और हिंदी भाषा में दक्षता हासिल थी। वह एक विद्वान होने के साथ लेखक भी थे।इसे भी पढ़ें: Maharana Pratap Birth Anniversary: महाराणा प्रताप को कहा जाता है देश का पहला &#039;स्वतंत्रता सेनानी&#039;, जानिए दिलचस्प बातेंऔरंगजेब की कैद से भाग निकले संभाजीसंभाजी महाराज बहादुर होने के साथ चतुर राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने राजनीतिक बारीकियों को बहुत अच्छे से आत्मसात किया था। महज 9 साल की उम्र में शिवाजी महाराज उनको अपने साथ यात्रा पर ले गए। संभाजी की सोच थी कि अगर वह छोटी उम्र में मुगल दरबार की घटनाओं और राजनीति के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेंगे, तो यह भविष्य में उनके लिए उपयोगी साबित होगी। उधर औरंगजेब के इशारे पर शिवाजी महाराज और संभाजी को कैद करने का प्रयास किया गया, लेकिन शिवाजी और संभाजी फलों की टोकरी में छिपकर वहां से भाग निकले।मुगलों से संघर्षसंभाजी महाराज 1681 में मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति बने थे। उन्होंने अपने शासनकाल में सिद्धी, पोर्तुगीज, मुगलों और अन्य दुश्मनों से कई बार युद्ध किया और मराठा साम्राज्य की रक्षा की। वहीं उन्होंने कई वर्षों तक औरंगजेब की विशाल सेना से युद्ध किया। संभाजी के नेतृत्व में मुगल सेना कई बार पीछे हटने को मजबूर हुई।मृत्युहालांकि 1689 में औरंगजेब की सेना ने संभाजी को पकड़ लिया और उनसे इस्लाम धर्म कुबूल करने का आदेश दिया, लेकिन संभाजी महाराज ने धर्म परिवर्तन करने से इंकार कर दिया। जिस पर औरंगजेब की तरफ से उनको तरह-तरह की यातनाएं दी गईं। वहीं 11 मार्च 1689 को संभाजी के सिर को कलम कर दिया गया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:37 +0530</pubDate>
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<title>RK Narayan Death Anniversary: अद्भुत लेखन प्रतिभा के धनी थे आर के नारायण, लिखी थीं ये यादगार किताबें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 13 मई को भारत के फेमस लेखक आर के नारायण का निधन हो गया था। उन्होंने हमें एक ऐसा टीवी सीरियल दिया, जिसको देखने के लिए लोगों ने टीवी तक का जुगाड़ किया। बता दें कि 80-90 के दशक में जन्मे बच्चों को आर के नारायण ने टीवी सीरियल की मदद से बेहद कमाल का बचपन दिया था। जिसको हम कभी भूल नहीं पाएंगे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर फेमस लेखक आर के नारायण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामद्रास में 10 अक्तूबर 1906 को आर के नारायण का जन्म हुआ था। वर्तमान समय में इस जगह को चेन्नई के नाम से जाना जाता है। आर के नारायण के पिता तमिल के अध्यापक थे। ऐसे में घर में भी हमेशा पढ़ाई-लिखाई का माहौल रहता था। आर के नारायण ने अपना अधिकतर समय मैसूर में पढ़ाई करते हुए बताया। उन्होंने इस दौरान बच्चों को पढ़ाया और पत्रकारिता व लेखन को भी बहुत समय दिया।इसे भी पढ़ें: Gopal Krishna Gokhale Birth Anniversary: नरम दल के नेता थे गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी जी मानते थे राजनीतिक गुरुलेखन कार्यबता दें कि आर के नारायण का जीवन बहुत एकांत में बीता। उन्होंने लेखन कार्य में बहुत समय दिया। आर के नारायण ने मालगुडी डेज की रचना की। इसकी कहानी को टीवी पर दिखाया गया, जिसको देखने के बाद बड़ों से लेकर बच्चों तक सभी ने अपने सुनहरे दिनों को याद किया। हालांकि यह काल्पनिक थी। लेकिन अपनी असाधारण लेखन के जरिए साधारण चरित्रों को उकेरा था। वहीं इसके रेखाचित्र को उनके भाई कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण ने तैयार किया था। पुरस्कारआर के नारायण का नाम साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया। लेकिन उनको यह पुरस्कार कभी नहीं मिला। दरअसल इस पुरस्कार के पीछे सम्पन्न पश्चिमी देशों की राजनीति हावी रहती थी। ऐसे में उन लोगों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता था, जिनके लेखन कार्य से उनके हितों की पूर्ति होती है। लेकिन हमेशा अपनी बात को खरी भाषा में कहने वाले आर के नारायण इस कसौटी पर कभी खरे नहीं उतर सके।फेमस कहानियांलॉली रोडअ हॉर्स एण्ड गोट्स एण्ड अदर स्टोरीज़अंडर द बैनियन ट्री एण्ड अद स्टोरीज़मृत्युजीवन के आखिरी समय में वह चेन्नई शिफ्ट हो गए थे। वहीं 13 मई 2001 को 94 साल की उम्र में आर के नारायण की लेखन यात्रा सदा के लिए थम गई। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:37 +0530</pubDate>
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<title>KM Cariappa Death Anniversary: भारत के पहले कमांडर इन चीफ थे केएम करियप्पा, पाक जनरल भी करते थे सम्मान</title>
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<description><![CDATA[ आजाद भारत के पहले फील्ड मार्शल केएम करियप्पा का 15 मई को निधन हो गया था। उनको 15 जनवरी 1949 को सेना प्रमुख बनाया गया था। करियप्पा सेना प्रमुख होने के साथ ही भारतीय सेना के पहले फाइव स्टार रैंक के अधिकारी हुआ करते थे। उन्होंने करीब 30 साल भारतीय सेना में रहकर देश की सेवा की और साल 1953 में वह सेवानिवृत्त हो गए। बता दें कि रिटायरमेंट के बाद भी केएम करियप्पा किसी न किसी रूप में भारतीय सेना में अपना योगदान देते रहे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर केएम करियप्पा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और शिक्षाकर्नाटक में 28 जनवरी 1899 को केएम करियप्पा का जन्म हुआ था। इनकी शुरूआती शिक्षा माडिकेरी सेंट्रल हाई स्कूल से हुई और फिर आगे की पढ़ाई मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से पूरी की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद केएम करियप्पा इंदौर स्थित आर्मी ट्रेनिंग स्कूल के लिए सेलेक्ट हो गए। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद साल 1919 में उनको सेना में कमीशन मिला और वह भारतीय सेना में बतौर लेफ्टिनेंट तैनाती कर दी गई।इसे भी पढ़ें: RK Narayan Death Anniversary: अद्भुत लेखन प्रतिभा के धनी थे आर के नारायण, लिखी थीं ये यादगार किताबेंसेना दिवस का करियप्पा से कनेक्शनदरअसल, 15 जनवरी 1949 को केएम करियप्पा को भारत का सेना प्रमुख नियुक्त किया गया था। इस दिन ही भारतीय अधिकारी को कमांडर इन चीफ का पद मिला था। इससे पहले भारत में इस पद पर अंग्रेजों की नियुक्ति होती थी। वहीं 15 जनवरी 1949 को पहली बार ब्रिटिश शासन ने भारतीय सेना को कमान सौंपी थी। इस दौरान केएम करियप्पा भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने जनरल सर फ्रांसिस बुचर का स्थान लिया और भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ के रूप में पद संभाला था। 15 जनवरी को भारत में हर साल सेना दिवस भी मनाया जाता है।ऐसे बने फील्ड मार्शलसाल 1953 में केएम करियप्पा सेना से रिटायर हो गए थे। जिसके बाद करियप्पा को ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का राजदूत बनाया गया। उन्होंने अपने अनुभव से कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी सहायता की। वहीं साल 1986 में भारत सरकार ने उनको &#039;फील्ड मार्शल&#039; का पद सौंपा था। बता दें कि केएम करियप्पा को मेन्शंड इन डिस्पैचेस, ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर और लीजियन ऑफ मेरिट जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया था।मृत्युवहीं 15 मई 1993 को 94 साल की उम्र में केएम करियप्पा का बेंगलुरू में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:36 +0530</pubDate>
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<title>Jamshedji Tata Death Anniversary: जमशेदजी टाटा ने अफीम का बिजनेस शुरूकर छुआ था बुलंदियों का आसमान</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय उद्योगों के पिता कहा जाने वाले जमशेदजी टाटा का 19 मई को निधन हो गया था। जमशेदजी टाटा के हालात कभी उनके अनुकूल नहीं थे। लेकिन उन्होंने स्थितियों से आगे जाकर सोचा और ऐसी उपलब्धियां हासिल करने की ठानी, जिसके बारे में किसी के लिए सोचना भी मुश्किल है। जमशेदजी टाटा ने जिस भी व्यवसाय में हाथ डाला, वहां से सोना निकालने का काम किया। साथ ही अपने समय के सबसे बड़े दानवीर माने जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जमशेदजी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और शिक्षागुजरात के नवसारी में 03 मार्च 1839 को जमशेदजी टाटा का जन्म हुआ था। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने 14 साल से पिता के व्यापार में हांथ बंटाना शुरूकर दिया था। वहीं साल 1858 में उन्होंने एल्फिस्टन कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई की और फिर वह पूरी तरह से व्यवसाय से जुड़ गए।इसे भी पढ़ें: KM Cariappa Death Anniversary: भारत के पहले कमांडर इन चीफ थे केएम करियप्पा, पाक जनरल भी करते थे सम्मानअफीम का व्यवसायजमशेदजी टाटा के पिता की निर्यात कंपनी चीन, यूरोप, जापान और अमेरिका में शाखाएं थीं। वहीं सला 1857 के विद्रोह की स्थितियों की वजह से व्यवसाय चलाना काफी मुश्किल था। ऐसे में नुसेरवानजी टाटा नियमित तौर पर चीन जाया करते थे और वहां अफीम का व्यवसाय करते थे। वह अपने बेटे जमशेदजी टाटा को भी इस व्यवसाय में डालना चाहते थे, इसके लिए वह उनको चीन भेजना चाहते थे, जिससे कि वह अफीम के व्यवसाय की बारीकियां सीख सकें।कपड़े का व्यवसायजब जमशेदजी टाटा चीन गए, तो उन्होंने वहां पर देखा कि कपड़े के व्यवसाय में भविष्य में अच्छा स्कोप है। 29 साल की उम्र तक जमशेदजी ने पिता की कंपनी में काम किया और फिर साल 1868 में 21 हजार रुपए से एक व्यवसाय कंपनी खोली। उन्होंने चिंचपोकली में दिवालिया तेल की कारखाने को खरीदा और उसको रुई की फैक्ट्री में बदला। फिर 2 साल बाद उन्होंने इस कंपनी को मुनाफे में बेच दिया।इसके बाद उन्होंने नागपुर में रुई का कारखाना खोला और वहीं पर उन्होंने कपड़े का भी कारखाना खोला। इसमें भी उनको काफी सफलता मिली और फिर साल 1877 में नागपुर में जमशेदजी ने एक और मिल खोल दी।जीवन के चार लक्ष्यबता दें कि जमशेदजी टाटा के जीवन में चार लक्ष्य थे। जिसमें वह एक स्टील कंपनी खोलना चाहते थे। एक विश्वस्तरीय प्रशिक्षण संस्थान, एक खास तरह का होटल और एक एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक संयंत्र खोलना चाहते थे। हालांकि वह अपने जीवन में सिर्फ होटल खोलने का सपना पूरा होते देख सके। 03 दिसंबर 1903 को मुंबई के कोलाब इलाके में ताज महज होटल खोला। उस दौरान वह भारत का एकमात्र ऐसा होटल था, जहां पर बिजली की सुविधा थी। वहीं बाकी के तीन अधूरे सपनों को जमशेदजी टाटा के वंशजों ने पूरा किया।मृत्युजमशेद जी टाटा ने 19 मई 1904 को दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:35 +0530</pubDate>
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<title>Bhairon Singh Shekhawat Death Anniversary: राजनीति के नक्षत्र पर हमेशा &amp;apos;धूमकेतु&amp;apos; की तरह चमकते रहे भैरोंसिंह शेखावत</title>
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<description><![CDATA[ उपराष्ट्रपति और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत का 15 मई को निधन हो गया था। भैरोसिंह शेखावत ने अपनी 60 सालों के राजनीतिक जीवन में सत्यनिष्ठा से काम किया था और समाज में कई अहम बदलाव किए थे। उन्होंने सती प्रकरण और भूमि उन्मूलन जैसे कई अहम मुद्दों पर साहसिक कदम उठाए थे। भैरोसिंह शेखावत ने पार्टी पॉलिटिक्स से उपर उठकर राजनीति की थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भैरोसिंह शेखावत के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारजयपुर रियासत के गांव खाचरियावास जोकि अब सीकर के नाम से जाना जाता है, वहां पर 23 अक्तूबर 1923 को भैरोसिंह शेखावत का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम देवी सिंह शेखावत और मां का नाम बन्ने कंवर था। उन्होंने 30 किमी दूर जोबनेर से हाई स्कूल से शिक्षा प्राप्त की, जहां पर पढ़ाई के लिए उनको पैदल जाना पड़ता था। पिता के निधन के बाद परिवार को संभालने के लिए उन्होंने खेती करना शुरू किया। हालांकि उन्होंन पुलिस की नौकरी भी की, लेकिन मन नहीं लगने पर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और खेती करने लगे।इसे भी पढ़ें: KM Cariappa Death Anniversary: भारत के पहले कमांडर इन चीफ थे केएम करियप्पा, पाक जनरल भी करते थे सम्मानराजनीति में प्रवेशसाल 1952 में राजस्थान में विधानसभा की स्थापना हुई तो भैरोंसिंह ने भी अपना भाग्य आजमाया। साल 1952 से लेकर 1972 तक शेखावत राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। वहीं साल 1974 से 1977 तक वह राज्यसभा सदस्य के तौर पर सेवाएं देते रहे। फिर साल 1977 से 2002 तक वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। साथ ही 1977 में वह राजस्थान के मुख्यमंत्री भी बने और साल 1980 तक इस पद पर सेवाएं देते रहे। बता दें कि साल 2002 में भैरोसिंह शेखावत सुशील कुमार शिंदे को हराकर देश के उपराष्ट्रपति बन गए। वहीं जुलाई 2007 में उन्होंने नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस के समर्थन से निर्दलीय राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा, लेकिन इस दौरान उनको हार का सामना करना पड़ा और प्रतिभा पाटिल चुनाव जीतकर देश की अगली राष्ट्रपति बनीं। फिर 21 जुलाई 2007 को भैरोसिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।मृत्युकैंसर और उम्र से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के आगे भैरोसिंह शेखावत के शरीर ने घुटने टेक दिए। वहीं 15 मई 2010 को इस लंबे जीवन सफर अंत हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:35 +0530</pubDate>
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<title>Christopher Columbus Death Anniversary: क्रिस्टोफर कोलंबस को समुद्री यात्राओं का था शौक, ऐसे की थी अमेरिका की खोज</title>
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<description><![CDATA[ क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की थी। आज ही के दिन यानी की 20 मई को क्रिस्टोफर कोलंबस का निधन हो गया था। वह अपनी यात्रा के दौरान अक्तूबर 1492 में वह समुद्र के रास्ते होते हुए अमेरिका पहुंचे थे। हालांकि मरते दम तक कोलंबस के जन्म स्थान को लेकर विवाद छिड़ा रहा। लेकिन कई दस्तावेजों के मुताबिक कोलंबस पुर्तगाली थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर क्रिस्टोफर कोलंबस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारक्रिस्टोफर का जन्म 1451 में हुआ था। वहीं उनके पिता एक जुलाहे थे और कोलंबस को भी बचपन से ही समुद्री यात्राओं का शौक हो गया था। बड़े होकर वह अपने पिता का काम में हाथ बंटाने लगे थे। उस दौरान भारत और एशिया से सुदूर यूरोप तक खूब व्यापार होता था।इसे भी पढ़ें: Jamshedji Tata Death Anniversary: जमशेदजी टाटा ने अफीम का बिजनेस शुरूकर छुआ था बुलंदियों का आसमानऐसे की अमेरिका की खोजबता दें कि कोलंबस 1492 में स्पेन से सुदूर पूर्वी एशिया यानी भारत,चीन और जापान पहुंचने का आसान रास्ता खोजने के लिए निकले थे। वह जलमार्ग से रवाना हुआ थे। लेकिन पश्चिम दिशा में यात्रा करते हुए वह पश्चिमी दीप समूह में पहुंच गए। वहीं अटलांटिक महासागर में लंबे समय तक नौकायन करने के बाद 1492 में कोलंबस ने नई दुनिया यानी की अमेरिका की खोज की। उस दौरान तक दुनिया में अमेरिका की कोई खास पहचान नहीं थी। समुद्र यात्री कोलंबस के शुरुआती जीवन के बारे में जानकारी बेहद कम है। हालांकि 515 साल पहले मर चुके कोलंबस के बारे में साल 2003 में एक बड़ी सफलता मिली थी। दरअसल सेविले में गिरिजाघर के मकबरे में हड्डियां रखी मिली थीं। जोकि डीएनए जांच में कोलंबस की पाई गई थीं। ऐसे में उम्मीद है जल्द ही कोलंबस की वंशावली और जन्म क्षेत्र को जानने में वंशाणु भूगोल मदद कर सकता है। मृत्युवहीं 20 मई 1506 को क्रिस्टोफर कोलंबस की मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:34 +0530</pubDate>
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<title>Nathuram Godse Birth Anniversary: हिंदू राष्ट्रवाद का कट्टर समर्थक था नाथूराम गोडसे, जानिए क्यों की थी गांधीजी की हत्या</title>
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<description><![CDATA[ महात्मा गांधी का हत्यारा, यह नाम सुनते ही हमारे दिमाग में नाथूराम गोडसे का आता है। नाथूराम गोडसे ने दिल्ली के बिड़ला हाउस में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्याकर दी गई थी। उन्होंने एक के बाद एक तीन गोलियां दागी, जिससे महात्मा गांधी का देहांत हो गया। जिसके बाद लोगों ने गोडसे को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था। वहीं कोर्ट में भी उन्होंने अपना जुर्म कुबूला। आज ही के दिन यानी की 19 मई को नाथूराम गोडसे का जन्म हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नाथूराम गोडसे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुणे के बारामती में 19 मई 1910 को नाथूराम गोडसे का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम विनायक वामनराव गोडसे और मां का नाम लक्ष्मी था। वह अपने परिवार का चौथा बेटा था और उनका परिवार खुद को श्रापित मानता था। क्योंकि उनके घर पर लड़कियां जन्म लेती तो बच जाती थीं, लेकिन लड़के श्राप की वजह से मर जाते थे। ऐसे में नाथूराम गोडसे के जन्म के बाद उनको बेटे की तरह नहीं बल्कि बेटी की तरह पाला गया। बचपन में नाथूराम की नाक छिदवा दी थी और उनको 12 साल की उम्र तक फ्रॉक पहनाकर रखा।इसे भी पढ़ें: Jamshedji Tata Death Anniversary: जमशेदजी टाटा ने अफीम का बिजनेस शुरूकर छुआ था बुलंदियों का आसमानकांग्रेस सभाओं में देते थे भाषणएक समय पर नाथूराम के पिता की पोस्टिंग महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुई थी। यहां पर नाथूराम गोडसे कांग्रेस के नेताओं से मिले। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस की कई सभाओं में भाषण दिया। रत्नागिरी में उनकी मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर से हुई। जिससे गोडसे की विचारधारा बदली और वह आरएसएस से जुड़ गए। इसके बाद उनकी पहचान आरएसएस के नेताओं से होने लगी और इस दौरान गोडसे ने अपना एक नया संगठन हिंदू राष्ट्र दल बना लिया। जिसको आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों का समर्थन मिला। इसी संगठन में नारायण दत्तात्रेय आप्टे से उनकी मुलाकात हुई।गांधी की हत्यानाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या की वजह देश के बंटवारे के खिलाफ माना जाता है। क्योंकि गोडसे नहीं चाहता था कि देश का धर्म के आधार पर बांटा जाए। यही सब देखकर गोडसे ने गांधीजी की हत्या की प्लानिंग की। नाथूराम ने दत्तात्रेय आप्टे, विष्णु करकरे और मदन लाल पहवा के साथ मिलाकर गांधी को मारने की सोची। लेकिन इस दौरान वह सफल नहीं हो पाए। अपनी नफरत की आग बुझाने के लिए 29 जनवरी की शाम दिल्ली के बिड़ला भवन में गोडसे ने गांधी जी के सीने में तीन गोलियां दाग दीं। जिसके बाद उनको गिरफ्तार कर लिया गया। मृत्युजिसके बाद पंजाब के अंबाला जेल में 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी की सजा दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:34 +0530</pubDate>
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<title>Malharrao Holkar Death Anniversary: मालवा के प्रथम मराठा सूबेदार थे मल्हारराव होलकर, ऐसे गढ़ी थी अपनी किस्मत</title>
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<description><![CDATA[ मल्हारराव होल्कर एक ऐसे इंसान का नाम है, जिसने अपनी किस्मत खुद गढ़ी थी। आज ही के दिन यानी की 20 मई को मल्हारराव होल्कर का निधन हो गया था। चरवाहा परिवार में जन्म लेने के बाद भी उन्होंने इंदौर जैसे राज्य पर शासन किया। इसके साथ ही मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र के बाहर स्थापित किया और गैर सैनिक परिवार के होकर भी सैन्य कौशल की मिसाल स्थापित की। तो आइए जानते हैं मराठी योद्धाओं में अग्रणी नाम मल्हारराव होलकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुणे के निकट एक होले गांव में 16 मार्च 1693 को मल्हार राव होल्कर का जन्म हुआ था। बड़े होकर वह मल्हारराव खानदेश के सरकार कदम बांदे के संपर्क में आए। वहीं किराए के रूप में सैनिक के रूप में खुद की सेवाएं देने लगे। साल 1721 में वह बाजीराव पेशवा की सेना का हिस्सा बन गए। फिर धीरे-धीरे वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। वह जल्द ही पेशवा के काफी करीबी हो गए। जिसके बाद वह सैनिकों के दस्ता की मुखिया बना दिए गए।इसे भी पढ़ें: Bipin Chandra Pal Death Anniversary: क्रांतिकारी विचारों के जनक कहे जाते थे बिपिन चंद्र पाल, अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे छक्केनिजाम को हरायावहीं 1728 में हैदराबाद के निजाम के साथ मराठों की लड़ाई में होल्ककर की भूमिका अग्रणी रही। उन्होंने छोटी टुकड़ी के दम पर निजाम के लिए मुगलों की तरफ से भेजी जाने वाली रसद को रोक दिया था। जिसकी वजह से पेशवा ने निजाम को हरा दिया था। पेशवा इतना प्रभावित हुए कि पश्चिमी मालवा का बड़ा इलाका उन्हें सौंप दिया गया और कई हजार घुड़सवार सैनिक उनके अधीन कर दिए गए थे।दिल्ली में 1737 में हुई जंग से लेकर 1738 तक निजाम को भोपाल में हराने तक मल्हारराव का पूरा योगदान दिया था। इसके अलावा उन्होंने पुर्तगालियों के खिलाफ लड़ाइयां भी जीती थीं। साल 1748 आते-आते मालवा में मल्हारराव होलकर की स्थिति बेहद मजबूत हो चुकी थी। जिसके बाद उनके अधीन इंदौर की रियासत तक कर दी गई थी।मृत्युवहीं 20 मई 1766 को मल्हारराव होलकर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:33 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Bipin Chandra Pal Death Anniversary: क्रांतिकारी विचारों के जनक कहे जाते थे बिपिन चंद्र पाल, अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे छक्के</title>
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<description><![CDATA[ भारत की आजादी को करीब सात दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है। लेकिन देश को आजादी इतनी आसानी से नहीं मिली है। देश को आजाद कराने में न जाने में कितने स्वतंत्रता सेनानियों को बलिदान देना पड़ा था। ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी बिपिन चंद्र पाल थे। आज ही के दिन यानी की 20 मई को बिपिन चंद्र पाल का निधन हो गया था। उनको भारत में &#039;क्रांतिकारी विचारों के जनक&#039; कहा जाता है। बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय औऱ बाल गंगाधर तिलक की प्रसिद्ध लाल-बाल-पाल तिकड़ी का हिस्सा थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बिपिन चंद्र पाल के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबांग्लादेश के सिलहट जिले के पोइल गांव में 07 नवंबर 1858 को बिपिन चंद्र पाल का जन्म हुआ था। वह पेशे से पत्रकार थे और वह साप्ताहिक अखबार परिदर्शक के संस्थापक-संपादक के रूप में काम करते थे। उन्होंने आजादी के आंदोलन के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए बंगाली और अंग्रेजी भाषा में ढेरों व्याखान दिए और कई सारे लेख लिखे। बिपिन चंद्र को &#039;बंगाल टाइगर&#039; के तौर पर भी जाना जाता है। उनको स्वतंत्रता और मुखर विचारकों में से एक माना जाता था। इसे भी पढ़ें: Gopal Krishna Gokhale Birth Anniversary: नरम दल के नेता थे गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी जी मानते थे राजनीतिक गुरुबंगाल बंटवाराअंग्रेजों ने जब सांप्रादायिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया, तो इस घटना से बिपिन चंद्र पाल भीतर से हिल गए थे। वहीं साल 1905 में बंगाल विभाजन के जवाब में स्वदेशी आंदोलन का जन्म हुआ। इस आंदोलन के द्वारा ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार शुरू हुआ। बता दें कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ सबसे मजबूत आंदोलनों में से एक था। इस आंदोलन के दौरान लोगों ने बड़े पैमाने पर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार किया और विदेशी सामान जलाया।वहीं बिपिन चंद्र पाल का मानना था कि यदि देश को राजनीतिक आजादी चाहिए, तो भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को पुनरोद्धार होना होगा। इसलिए उन्होंने भारतीयों को प्राचीन सभ्यता, परंपराओं और मूल्यों पर गर्व करने की जरूरत पर जोर दिया। उनका मानना था कि भारत के सांस्कृतिक सार को पुनर्जीवित करने से लोगों को फिर से अपनी सभ्यता पर आत्मविश्वास बढ़ सकेगा।विधवा महिला से शादीबता दें कि वह सामाजिक स्तर पर भी बदलाव की मांग करते थे। उन्होंने इसका खुद की जिंदगी में उदाहरण भी पेश किया था। जब उनकी पहली पत्नी का निधन हो गया, तो उन्होंने एक विधवा महिला से शादी की। जिसके बाद वह ब्रह्म समाज से जुड़ गए। उन्होंने जाति व्यवस्था की आलोचना की और लैंगिक समानता का समर्थन किया। वहीं साल 1920 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया, हालांकि वह अपने अंतिम समय तक देश की आजादी के लिए अपनी बात रखते रहे।मृत्युवहीं 20 मई 1932 को बिपिन चंद्र पाल का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:33 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Bipin, Chandra, Pal, Death, Anniversary:, क्रांतिकारी, विचारों, के, जनक, कहे, जाते, थे, बिपिन, चंद्र, पाल, अंग्रेजों, के, छुड़ा, दिए, थे, छक्के</media:keywords>
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<title>Raja RamMohan Roy Birth Anniversary: तमस से ज्योति की ओर एक सुधारवादी यात्रा</title>
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<description><![CDATA[ यह वह समय था जब हिन्दुस्तान एक तरफ विदेशी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था वहीं दूसरी तरफ रूढ़िवाद, धार्मिक संकीर्णता, सामाजिक कुरीतियों और दमघोंटू प्रथाओं के बोझ तले दबा हुआ था। तभी एक मसीहा, समाज-सुधारक एवं क्रांतिकारी महामानव अवतरित हुआ जिसने तमाम बुराइयों को चुनौती दी और आखिरी सांस तक बदलाव के लिये क्रांतिकारी योद्धा की तरह लड़ा। ये मसीहा था राजा राममोहन राय। इन्हें देश एवं दुनिया आज भारत में सामाजिक सुधारों के अग्रदूत के तौर पर याद करती है। अपने दौर में वे ‘भारतीय पुनर्जागरण के पितामह’ बनकर सच्चे जीवन की लौ बनें और इस लौ का आह्वान था नये भारत का निर्माण। वे तमस से ज्योति की ओर एक बहुआयामी सुधारवादी यात्रा का उजाला थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी राय के द्वारा स्थापित ‘ब्रह्म समाज’, जो आधुनिक पश्चिमी विचारों से प्रभावित था, सबसे शुरुआती सुधार आंदोलन था। एक सुधारवादी विचारक के रूप में राय आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय गरिमा तथा सामाजिक समानता के सिद्धांतों में विश्वास करते थे। राय के प्रयासों से ही भारत में आधुनिक धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों की नींव पड़ी। राय के बाद, देवेंद्रनाथ ठाकुर और केशव चंद्र सेन जैसे सुधारकों ने ब्रह्म समाज के विचारों को आगे बढ़ाया और इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन बनाया। उन्नीसवीं सदी के भाल पर अपने कर्तृत्व की जो अमिट रेखाएं उन्होंने खींची, वे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। वे साहित्यस्रष्टा के साथ-साथ धर्मक्रांति एवं समाजक्रांति के सूत्रधार विराट व्यक्तित्व थे। राजा राम मोहन राय का जन्म पश्चिम बंगाल स्थित हुगली जिले के राधानगर गांव में 22 मई 1772 को हुआ। पिता रमाकांत राय शुद्ध वैष्णव परंपरा को मानने वाले थे, वहीं माता तारिणी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। पूरा परिवार कट्टर हिन्दु परंपराओं का हिमायती था लेकिन राममोहन राय को बिना तर्क किसी भी बात को स्वीकार नहीं करते थे, इसलिए जब केवल 15 साल के थे तो उन्होंने मूर्ति पूजा को लेकर सवाल खड़े कर दिये। साथ ही अन्य प्रथाओं की भी आलोचना करनी आरंभ कर दी। हिन्दू परंपराओं का विरोध करना शुद्ध वैष्णव परंपरा को मानने वाले पिता रमाकांत को नागवार गुजरी। पिता-पुत्र में गहरा मतभेद हो गया। राय को पढ़ने के लिए पटना भेज दिया गया। यहां उन्होंने बांग्ला, पारसी, अरबी, संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। यहां भी वो हिन्दू परंपराओं और प्रथाओं को तर्क की कसौटी पर परखते रहे और सवाल उठाते रहे। पढ़ाई पूरी करने के बाद राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में नौकरी कर ली, यहां वे कई अंग्रेजों के संपर्क में आये। उनकी सभ्यता, सोच और तौर-तरीकों को करीब से महसूस किया। उन्होंने समझ लिया कि पश्चिमी सभ्यता विकास की प्रक्रिया में काफी आगे निकल गयी है जबकि हिन्दुस्तान इसके मुकाबले सदियों पीछे जी रहा है।इसे भी पढ़ें: Rajiv Gandhi Death Anniversary: &#039;मॉर्डन इंडिया&#039; की नींव रख गए थे राजीव गांधी, बम धमाके में हुई थी मौतराजा राममोहन राय ने हिन्दू ग्रंथों के साथ इस्लाम एवं ईसाई धर्मों एवं ग्रंथों का भी गहराई से अध्ययन किया। उन्हें एक बात समझ आयी कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में वो कतई नहीं लिखा है जो पोंगा पंडित, लोगों को बता रहे हैं। उन्होंने महसूस किया कि भारतीय जनमानस अपने ग्रंथों की मूलभावना से काफी अनजान है। ऐसा इसलिए था क्योंकि धर्मग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गये थे और लोगों की पहुंच से दूर थे। इसलिए उन्होंने धर्मग्रंथों का हिन्दी, बांग्ला, अरबी और फारसी भाषाओं में अनुवाद किया। उन्होंने अपने अखबारों ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मिरात-उल-अखबार’ में लेखों के जरिये आम जनमानस को जागरूक करने का प्रयास किया। राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। वे एक महान समाज सुधारक, विचारक एवं क्रांतिपुरुष थे, जिन्होंने 19वीं सदी में भारत में सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक सुधारों के लिए अनूठे एवं विलक्षण उपक्रम किये। उन्होंने व्यक्ति-क्रांति के साथ समाज-क्रांति करते हुए सती प्रथा, बाल विवाह और जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया।राजा राममोहन राय का मानना था कि धार्मिक रूढ़िवादिताएं समाज की स्थिति को सुधारने के बजाय क्षति का कारण, परेशानी का स्रोत, सामाजिक जीवन के लिए हानिकारक और लोगों को भ्रमित करने वाली बन गई हैं। उनका यह भी मानना था कि बलिदान और अनुष्ठान लोगों के पापों की भरपाई नहीं कर सकते; यह आत्म-शुद्धि और पश्चाताप के माध्यम से किया जा सकता है। उन्होंने धार्मिक सुधार से सामाजिक सुधार और राजनीतिक आधुनिकीकरण दोनों का सूत्रपात किया। राय अपने समय से बहुत आगे चलने एवं सोचने वाले दूरदर्शी व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता, समानता और न्याय के सिद्धांतों के अंतर्राष्ट्रीय चरित्र के बारे में उनकी समझ ने आधुनिक युग के महत्त्व को बखूबी समझा। ये सिद्धांत वर्तमान ‘न्यू इंडिया’ के विचार को प्रेरित करते हैं। राय ने वर्ष 1803 मंे अपनी पहली पुस्तक ‘तुहफ़त-उल-मुवाहिदीन’ या ‘गिफ्ट टू मोनोथिस्ट’ प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने एकेश्वरवाद यानी एकल ईश्वर की अवधारणा के पक्ष में तर्क दिया है। उन्होंने अपने इस तर्क में प्राचीन हिंदू ग्रंथों के एकेश्वरवाद का समर्थन करने के लिये वेदों और पाँच उपनिषदों का बंगाली में अनुवाद किया। वर्ष 1814 में उन्होंने मूर्तिपूजा, जातिगत रूढ़िवादिता, निरर्थक अनुष्ठानों और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अभियान चलाने के लिये कलकत्ता में आत्मीय सभा की स्थापना की। जब उनके बड़े भाई का देहांत हो गया तो परंपरा के मुताबिक गांव वालों ने पंडितों के साथ मिलकर उनकी भाभी को सती हो जाने के लिए मजबूर किया। उन्हें मृतक के साथ उसी चिता में जिंदा जला दिया गया। इस घटना से राय बहुत दुखी हुए। उन्होंने पूरे हिन्दुस्तान में ऐसी क्रूर प्रथा को धर्म के नाम पर खुलेआम होते देखा।  ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:32 +0530</pubDate>
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<title>Rajiv Gandhi Death Anniversary: &amp;apos;मॉर्डन इंडिया&amp;apos; की नींव रख गए थे राजीव गांधी, बम धमाके में हुई थी मौत</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 21 मई को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई थी। उन्होंने कम समय में एक जननेता और प्रधानमंत्री के तौर पर देश को विकासपथ पर ले गए। उन्होंने भारत को जो पहचान दिलाई, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित है। राजीव गांधी ने भारत को मजबूत, आधुनिक और खुशहाल राष्ट्र बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपनी मां और पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 40 साल की उम्र में राजीव गांधी देश के छठे प्रधानमंत्री रहे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राजीव गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारराजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 में हुआ था। उनके पिता का नाम फिरोज गांधी और मां का नाम इंदिरा गांधी था। राजीव गांधी का बचपन तीन मूर्ति भवन में बीता। शुरूआती शिक्षा के बाद राजीव गांधी ने इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया। लेकिन उनको किताबी ज्ञान तक सीमित रहना पसंद नहीं आया। इसलिए वह पहले लंदन और फिर कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए। लेकिन तीन साल शिक्षा लेने का बाद राजीव को यहां से भी डिग्री नहीं मिल सकी।इसे भी पढ़ें: Bipin Chandra Pal Death Anniversary: क्रांतिकारी विचारों के जनक कहे जाते थे बिपिन चंद्र पाल, अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे छक्केऐसे में राजीव गांधी ने लंदन के ही इंपीरियल कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया। हालांकि यहां भी मन न लगने पर वह भारत लौट आए और दिल्ली के फ्लाइंग क्लब में पायलट की ट्रेनिंग ली। साल 1970 में राजीव गांधी ने एयर इंडिया के साथ अपने करियर की शुरूआत की।राजनीतिक सफरभले ही राजीव गांधी का परिवार भले ही राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय था। लेकिन राजीव गांधी को अपने नाना या मां की तरह राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह राजनीति में आने से पहले पेशेवर पायलट थे। इंदिरा गांधी के साथ उनके बेटे संजय गांधी राजनीतिक विरासत संभाल रहे थे। उस दौरान तक राजीव ने राजनीति में आने के बारे में नहीं सोचा था। लेकिन संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद और बद्रीनाथ धाम के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद जी सलाह पर राजीव गांधी राजनीति में सक्रिय हो गए थे।राजीव गांधी की छवि हमेशा बेदाग और साफ-सुथरी रही। उन्होंने साल 1980 में जब राजनीति में कदम रखा तो उनको मिस्टर क्लीन माना जाता था। वहीं विदेश से पढ़ाई करने वाले राजीव गांधी 40 साल की उम्र में राष्ट्रीय राजनीति की ऊंचाइयों पर पहुंच गए थे। लेकिन राजनीति में सक्रिय होने के बाद उनका नाम कई बड़े घोटालों में आया। जिसके कारण उनकी छवि धूमिल हुई। बताया जाता है कि राजीव गांधी एक मात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो खुद अपनी गाड़ी चलाकर जगह-जगह आते-जाते थे।मृत्युबता दें कि 21 मई 1991 में तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी सभा के दौरान राजीव गांधी पर एक आत्मघाती हमलावर द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:32 +0530</pubDate>
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<title>Gayatri Devi Birth Anniversary: भारत की सबसे खूबसूरत महारानी थीं गायत्री देवी, ऐसा रहा राजनीतिक सफर</title>
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<description><![CDATA[ भारत की महिलाएं हर क्षेत्र में विश्व स्तर पर अपना परचम लहरा रही हैं। आज ही के दिन यानी की 23 मई को महारानी गायत्री देवी का जन्म हुआ था। वह शाही परिवार से ताल्लुक रखती थीं। गायत्री देवी ने शादी के बाद न सिर्फ अपने राज्य को संभाला बल्कि राजनीति में भी अहम योगदान दिया था। उस दौर में महारानी गायत्री देवी की टक्कर इंदिरा गांधी से हुआ करती हैं। माना जाता है कि वह किसी भी मामले में इंदिरा गांधी से कम नहीं थीं। वहीं कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि इंदिरा गांधी को गायत्री देवी से जलन थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गायत्री देवी के राजशाही जीवन और राजनीतिक करियर के बारे में...जन्म और परिवारलंदन में 23 मई 1919 को महारानी गायत्री देवी का जन्म हुआ था। वह जयपुर के राजघराने से ताल्लुक रखती थीं। इनके पिता का नाम राजकुमार जितेंद्र नारायण था, जोकि बंगाल में कूचबिहार के युवराज के छोटे भाई थे। कूंच बिहार के राजा की मृत्यु के बाद जितेंद्र नारायण वहां के राजा बन गए। महारानी गायत्री और उनके अन्य भाई-बहन छोटे ही थे, जब उनके पिता का निधन हो गया था। जिसके बाद माता इंदिरा राजे ने राजघराने और बच्चों को संभाला था।इसे भी पढ़ें: Raja Ram Mohan Roy Birth Anniversary: राजा राम मोहन राय ने बनवाया था सती प्रथा के खिलाफ कानून, एकेश्वरवाद के थे समर्थकलव लाइफ और शादीगायत्री देवी प्यार और शादी के मामले में अपनी मां इंदिरा राजे जैसी ही थीं। सिर्फ 12 साल की उम्र में उनको जयपुर के राजा मानसिंह बहादुर से प्यार हो गया। जबकि मानसिंह की पहले से दो शादियां हो चुकी थीं। मानसिंह गायत्री देवी से 9 साल बड़े थे। जब गायत्री देवी 16 साल की हुईं, तो मानसिंह ने उनसे शादी के बारे में पूछा, वहीं गायत्री देवी ने हामी भर दी और समाज के खिलाफ जाकर मानसिंह से शादी कर ली।राजनीतिक जीवनमानसिंह बहादुर से शादी के बाद गायत्री सिंह जयपुर की महारानी बन गईं। उनको न तो बंगाली और न ही राजस्थानी भाषा सही से बोलनी आती थी। वह अंग्रेची और फ्रेंच में बात किया करती थीं। उस दौर में गायत्री सिंह को सबसे सुंदर महिला का खिताब मिला था। हालांकि राजनीति में गायत्री देवी को अपनी बेबाकी के लिए भी जाना जाता था। साल 1962 में स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और 1 लाख 92 हजार वोटों से जीत हासिल की थी। उस दौरान इतनी बड़ी जीत की वजह से उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हो गया था।इंदिरा गांधी से विवादएक बार गायत्री देवी की संसद में जवाहर लाल नेहरू से बहस हो गई थी। हालांकि नेहरू और गायत्री देवी के बीच राजनीतिक विरोध था। लेकिन जब इंदिरा गांधी राजनीति में आईं, तो यह निजी बन गया। गायत्री देवी और इंदिरा गांधी दोनों एक-दूसरे को बचपन से जानती थीं। एक बार सदन में इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी को कांच की गुड़िया कहकर पुकारा था। दोनों का एक किस्सा मशहूर है, जब महारानी गायत्री देवी को जेल में डालकर इंदिरा गांधी ने जयगढ़ के किले में फौज भेज दी थी। मृत्युवहीं 29 जुलाई 2009 को 90 साल की उम्र में महारानी गायत्री देवी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:31 +0530</pubDate>
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<title>Raja Ram Mohan Roy Birth Anniversary: राजा राम मोहन राय ने बनवाया था सती प्रथा के खिलाफ कानून, एकेश्वरवाद के थे समर्थक</title>
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<description><![CDATA[ आधुनिक भारत की नींव रखने वाले राज राम मोहन राय का 22 मई को जन्म हुआ था। शायद ही कोई ऐसा होगा, जो इनके बारे में नहीं जानता होगा। इन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को खत्म करने के लिए अथक प्रयास किए थे और महिलाओं के हक के लिए आवाज भी उठाई थी। वह एकेश्वरवाद के एक सशक्त समर्थक थे। तो आइए जानते हैं इनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर समाज सुधारक राजा राम मोहन राय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपश्चिम बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गांव में 22 मई 1772 को राजा राम मोहन राय का जन्म हुआ था। इनके पिता एक हिंदू ब्राह्मण थे। वह दिमाग के मामले में इतने तेज थे कि उन्होंने महज 15 साल की उम्र में संस्कृत, अरबी, बांग्ला और फारसी जैसी कई भाषाएं सीख ली थीं। उन्होंने शुरूआती पढ़ाई अपने गांव से पूरी की थी और आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए पटना भेज चले गए।इसे भी पढ़ें: Raja RamMohan Roy Birth Anniversary: तमस से ज्योति की ओर एक सुधारवादी यात्राछोड़ा अपना घरबता दें राजा राम मोहन राय मूर्ति पूजा और रूढ़िवादी हिंदू परंपराओं के खिलाफ थे। सिर्फ यही नहीं वह सभी तरह के सामाजिक धर्मांधता और अंधविश्वास के भी विरुद्ध थे। राजा राम मोहन राय के पिता एक कट्टर हिंदू ब्राह्मण थे। जिसके कारण उनका अपने पिता से विचारों का मतभेद होता रहा था। यही एक वजह थी कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपना घर छोड़ दिया था और हिमालय व तिब्बत की यात्रा पर निकल पड़े थे।कुरीतियों का किया विरोधईस्ट इंडिया कंपनी के रिवेन्यू डिपार्टमेंट में राजा राम काम कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने जैन और मुस्लिम धर्म पर कई रिसर्च भी किए। उन्होंने अपने जीवनकाल में समाज में चल रही कई कुरीतियों की काफी जमकर आलोचना और विरोध किया। वह राजा राम ही थे, जिन्होंने सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कई कुरीतियों का विरोध किया था। उन्होंने गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक के माध्यम से सती प्रथा के खिलाफ कानून बनवा दिया था। उन्होंने माना कि जब वेदों में सती प्रथा की बात नहीं है, तो फिर हमारे समाज में भी यह नियम नहीं होना चाहिए।महिलाओं के हक के लिए उठाई आवाजराजा राम मोहन राय ने हमेशा महिलाओं के हक के लिए आवाज उठाई और उनके लिए लड़ाई भी लड़ी। इसके साथ ही महिलाओं को प्रॉपर्टी का अधिकार दिलाने की भी लड़ाई लड़ी। यह वह दौर था, जब समाज कुरीतियों से जकड़ा हुआ था और राय एक ऐसे व्यक्ति थे, जोकि मॉर्डन सोच के मालिक थे।मृत्युभारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत के जनक राजा राम मोहन राय का 27 सितंबर 1833 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:31 +0530</pubDate>
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<title>Vilasrao Deshmukh Birth Anniversary: विलासराव देशमुख ने पंचायत से की थी अपने सियासी सफर की शुरूआत, दो बार बने थे CM</title>
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<description><![CDATA[ महाराष्ट्र के कद्दावर नेता और पूर्व सीएम रहे विलासराव देशमुख का 26 मई को जन्म हुआ था। न सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी विलासराव कांग्रेस के अहम सिपहसलार थे। उन्होंने पंचायत से अपने सियासी सफर की शुरूआत की थी और अपनी पहुंच राष्ट्रीय राजनीति तक बनाई थी। महाराष्ट्र कांग्रेस में विलासराव का कद सबसे बड़ा रहा। वह दो बार महाराष्ट्र के सीएम रहे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विलासराव देशमुख के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामहाराष्ट्र के लातूर जिले के बाभालगांव में 26 मई 1945 को विलासराव देशमुख का जन्म हुआ था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में ग्रेजुएशन किया। फिर पुणे के इंडियन लॉ सोसाइटी लॉ कॉलेज से कानूनी शिक्षा प्राप्त की। बता दें कि उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत पंचायत चुनावों से की थी। पहले विलासराव देशमुख पहले पंच और फिर बाद में सरपंच बने। इसके बाद वह जिला परिषद के सदस्य और फिर लातूर तालुका पंचायत समिति के उपाध्यक्ष पद पर रहे।इसे भी पढ़ें: Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो अनाउंसर से बॉलीवुड के सुपरस्टार तक सुनील दत्त ने ऐसे तय किया सफर, जानिए रोचक बातेंराजनीतिक सफरइसके बाद युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष पद से विलासराव देशमुख ने अपने सियासी सफर की बड़ी पारी शुरू की। फिर उन्होंने राज्य की राजनीति में कदम रखा। साल 1980 से लेकर 1995 तक वह लगातार तीन बार विधानसभा के लिए चुने गए। इस दौरान उन्होंने कृषि, पर्यटन, मतस्य, गृह, उद्योग, परिवहन, ग्रामीण विकास, शिक्षा, युवा मामले, तकनीकी शिक्षा और खेल समेत अनेक पदों पर बतौर मंत्री कार्यरत रहे।वहीं साल 1995 के चुनाव में विलासराव देशमुख को चुनाव में हार मिली। लेकिन किसे पता था कि चुनाव में हारे विलासराव देशमुख के लिए एक बड़ा पद इंतजार कर रहा था। साल 1999 के चुनाव में विधानसभा में उनकी फिर वापसी हुई और वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनें। लेकिन वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। वहीं साल 2004 में वह दोबारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। विलासराव देशमुख की गिनती राज्य कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में होती थी।विवादविलासराव देशमुख के मुख्यमंत्री पद का दूसरा कार्यकाल चल रहा था, तब 26/11 का हमला हुआ था। इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए विलासराव देशमुख ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि इस दौरान उनकी काफी आलोचना भी हुई थी। क्योंकि वह सीरियल ब्लास्ट के बाद अपने बेटे और अभिनेता रितेश देशमुख और फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा के साथ ताज होटल का मुआयना करने पहुंचे थे। इस मामले पर विपक्ष ने उनकी जमकर आलोचना की थी।दरअसल, विपक्ष ने आरोप लगाया था कि विलासराव देशमुख अपने पद का गलत इस्तेमात करते हुए रामगोपाल वर्मा को ताज होटल ले गए थे। हालांकि सीएम पद के इस्तीफे के बाद उन्होंने केंद्रीय राजनीति की ओर रुख किया। वह राज्यसभा के सदस्य बने और साथ ही उनको केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई।मृत्युकिडनी और लिवर में दिक्कत होने की वजह से विलासराव देशमुख लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वहीं 14 अगस्त 2012 को चेन्नई के ग्लोबल हॉस्पिटल में विलासराव देशमुख ने अंतिम सांस ली। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:30 +0530</pubDate>
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<title>Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो अनाउंसर से बॉलीवुड के सुपरस्टार तक सुनील दत्त ने ऐसे तय किया सफर, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ गुजरे जमाने के एक्टर और पॉलिटिशियन दिवंगत अभिनेता सुनील दत्त का आज ही के दिन यानी की 25 मई को निधन हो गया था। लेकिन आज भी वह दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं। सुनील दत्त बॉलीवुड के फेमस अभिनेताओं की लिस्ट में शामिल थे, लेकिन उनका यह सफर इतना भी आसान नहीं रहा है। वह इंडस्ट्री में अपनी नफासत और शराफत के लिए जाने जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दिवंगत अभिनता सुनील दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपाकिस्तान के झेलम में 06 जून 1929 को सुनील दत्त का जन्म हुआ था। इनका असली नाम बलराज दत्त था। जब यह 5 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। उन्होंने अपनी पढ़ाई लखनऊ से पूरी की थी। फिल्मों में आने के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर सुनील दत्त रख लिया था।इसे भी पढ़ें: Gayatri Devi Birth Anniversary: भारत की सबसे खूबसूरत महारानी थीं गायत्री देवी, ऐसा रहा राजनीतिक सफररेडियो सिलोन में किया कामफिल्म इंडस्ट्री में अपना नाम बनाने से पहले सुनील दत्त रेडियो सिलोन में काम करते थे। वहीं लोग सुनील साहब की आवाज के दीवाने हुआ करते थे। बताया जाता है कि एक बार सुनील दत्त अभिनेता दिलीप कुमार का इंटरव्यू लेने गए थे। इसी दौरान डायरेक्टर समेश सहगल की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने सुनील दत्त को स्क्रीन टेस्ट देने के लिए कहा। कुछ इस तरह से सुनील दत्त की फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री हुई।बॉलीवुड डेब्यूसुनील दत्त ने फिल्म &#039;रेलवे स्टेशन&#039; से अपना बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इस फिल्म के बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। हालांकि उनको बतौर हीरो और शोहरत फिल्म &#039;मदर इंडिया&#039; से मिली थी। अभिनेता के बारे में एक बार फेमस थी कि वह अपनी फिल्मों में डाकू का रोल निभाते थे। बताया जाता है सुनील दत्त ने करीब 20 फिल्मों में डाकू बने थे। वह डाकू बनकर दर्शकों के दिलों को लूट लिया करते थे।अभिनेता की फेमस फिल्मों की बात करें, तो उन्होंने &#039;इंसान जाग उठा&#039;, &#039;साधना&#039;, &#039;खानदान&#039; और &#039;मुझे जीने दो&#039; जैसी कई हिट फिल्मों में काम किया था। बता दें कि फिल्म मदर इंडिया के सेट पर सुनील दत्त और नरगिस की प्रेम कहानी शुरू हुई थी। जिसके बाद उन्होंने अभिनेत्री नरगिस से शादी कर ली थी। हालांकि सुनील दत्त का फिल्मी करियर और राजनीतिक करियर सफल रहा। लेकिन इसके बाद भी उनके जीवन से संघर्ष कम नहीं हुआ। दरअसल, उनके बेटे संजय दत्त को ड्रग्स की लत थी, तो वहीं पत्नीव नरगिस को कैंसर था। वहीं पत्नी नरगिस की मृत्यु के बाद सुनील दत्त बुरी तरह से टूट गए थे।मृत्युवहीं हार्ट अटैक के चलते मुंबई के बांद्रा में 75 साल के उम्र में 25 मई 2005 को अभिनेता सुनील दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:30 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Sunil, Dutt, Death, Anniversary:, रेडियो, अनाउंसर, से, बॉलीवुड, के, सुपरस्टार, तक, सुनील, दत्त, ने, ऐसे, तय, किया, सफर, जानिए, रोचक, बातें</media:keywords>
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<title>Jawaharlal Nehru Death Anniversary: लोकतंत्र के सबसे बड़े मार्गदर्शक थे जवाहर लाल नेहरू, ऐसा रहा सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ देश की आजादी में प्रयागराज की काफी अहम भूमिका रही। क्योंकि आजादी से पहले और बाद में इस शहर ने कई महापुरुषों और शीर्ष राजनेताओं को जन्म दिया है। इन्हीं में से एक आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री और भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन के नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। नेहरू ने देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। आज ही के दिन यानी की 27 मई को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित जवाहर लाल नेहरू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाउत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 14 नवंबर 1889 को पंडित नेहरू का जन्म हुआ था। इनका बचपन भी प्रयागराज में बीता और यहां से उन्होंने शुरूआती शिक्षा प्राप्त की। फिर उन्होंने इंग्लैंड में हैरो स्कूल और कॉलेज की शिक्षा लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज से पूरी की। इसके बाद कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री प्राप्त की। साल 1912 में वह भारत वापस आ गए और वकालत शुरू की।इसे भी पढ़ें: Vilasrao Deshmukh Birth Anniversary: विलासराव देशमुख ने पंचायत से की थी अपने सियासी सफर की शुरूआत, दो बार बने थे CMमहात्मा गांधी से हुए प्रभावितबता दें कि साल 1917 में पंडित नेहरू होम रूल लीग में शामिल हुए और साल 1919 में वह महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस दौरान महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। ऐसे में नेहरू भी गांधी जी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। फिर पंडित नेहरू ने गांधी जी के उपदेशों की तरह अपने परिवार को भी उसी तरह से ढाल लिया था।दरअसल, जवाहर लाल नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने अपनी महंगी संपत्ति और वेस्टर्न ड्रेस को त्याग दिया था। वह खाली का कुर्ता और गांधी टोपी पहनने लगे। वहीं 1920-1922 में पंडित नेहरू ने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और पहली बार गिरफ्तार हुए। लेकिन कुछ महीनों बाद वह रिहा हो गए। फिर साल 1924 में वह इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष बने और इस शहर के मुख्य कार्यकारी के रूप में उन्होंने दो सालों तक सेवा की।वहीं 1927 में पंडित नेहरू ने मास्को में अक्तूबर समाजवादी क्रांति की 10वीं वर्षगांठ समारोह में हिस्सा लिया। फिर साल 1928 में साइमन कमीशन के दौरान लखनऊ में पंडित नेहरू पर लाठीचार्ज किया गया था। वहीं 29 अगस्त 1928 को जवाहर लाल नेहरू ने सर्वदलीय कांग्रेस में भाग लिया और भारतीय संवैधानिक सुधार पर नेहरू रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए। साल 1928 में नेहरू ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की और इसके महासचिव बनें। इसके बाद साल 1929 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष बने।देश के पहले प्रधानमंत्रीदेश की स्वतंत्रता में अहम योगदान देने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरू 15 अगस्त 1947 से लेकर 27 मई 1964 तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे। बता दें कि इससे पहले वह 02 सितंबर 1946 से लेकर 15 अगस्त 1947 तक वह देश की अंतरिम सरकार के मुखिया थे।मृत्युवहीं 27 मई 1964 की दोपहर में 74 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:28 +0530</pubDate>
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<title>NT Rama Rao Birth Anniversry: राजनीति में धूमकेतू की तरह चमके थे एनटी रामा राव, जानिए दिलचस्प बातें</title>
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<description><![CDATA[ अभिनेता, फिल्ममेकर और पूर्व मुख्यमंत्री रहे एनटी रामा राव का 28 मई को जन्म हुआ था। सिनेमा का मसीहा कहा जाता था। बता दें कि एनटी रामा राव ने राजनीति में भी कई ऐसे काम किए जिसके कारण उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। उनके राजनीति और सामाजिक कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एनटी रामा राव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकर्नाटक में 28 मई 1923 को एनटी रामा राव जन्म हुआ था। वह किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे। हालांकि गरीब परिवार में जन्में एनटी रामा राव ने अपने काबिलियत के दम पर एक बड़ी विरासत खड़ी कर दी थी। उन्होंने 20 साल की उम्र में मामा की बेटी बासव तारकम से शादी की थी। फिर साल 1993 में 70 साल की उम्र में तेलुगू राइटर लक्ष्मी पार्वती से दूसरी शादी की थी।इसे भी पढ़ें: Jawaharlal Nehru Death Anniversary: लोकतंत्र के सबसे बड़े मार्गदर्शक थे जवाहर लाल नेहरू, ऐसा रहा सियासी सफरफिल्मी सफरएनटी रामा राव ने तेलुगू फिल्म &#039;माना देशम&#039; से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। 50 के दशक में उनको कर्ण, कृष्ण और राम जैसे किरदारों में देखा गया और जनता का खूब प्यार भी मिला। उन्होंने स्क्रीन पर 17 बार श्रीकृष्ण का रोल अदा किया था। एनटी रामा राव ने करीब 300 से ज्यादा फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया। वहीं तीन बार नेशनल अवॉर्ड भी जीता। रामा राव ने नंदी अवॉर्ड से लेकर फिल्मफेयर जैसे बड़े अवॉर्ड्स अपने नाम किए थे। एनटी रामा राव का वर्ल्ड रिकॉर्डसाल 1982 में एनटी रामा राव ने राजनीति में आने का फैसला किया और कहा जाता है कि यह उनकी सोची-समझी राय थी। उन्होंने बताया कि वह अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अब राजनीति में आ रहे हैं और अपने प्रदेशवासियों की सेवा करना चाहते हैं। वह ऐसे शख्स थे, जिन्होंने रथ यात्रा का प्रचलन शुरू किया था। एनटी रामा राव ने 9 महीनों में करीब 40 हजार किमी से अधिक यात्रा की। इस दौरान वह तरह-तरह के लोगों से मिले और उनकी परेशानियों को जाना समझा। इस तरह से रामा राव का नाम &#039;गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स&#039; में दर्ज हुआ।राजनीतिक सफरसाल 1982 में एनटी रामा राव ने तेलुगू देशम पार्टी की स्थापना कर अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की। जब से इस राज्य का गठन हुआ था, तब से यह कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। लेकिन एनटी रामा राव के नेतृत्व में रामा राव ने कांग्रेस की छवि को कमजोर कर दिया और सत्ता पर काबिज हुए। एनटी रामा राव की पार्टी ने चुनावों में जीत हासिल की और वह पहली बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। साल 1983 से 1994 तक एनटी रामा राव तीन बार राज्य के सीएम बने थे।मृत्युवहीं 18 जनवरी 1996 को एनटी रामा राव ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:27 +0530</pubDate>
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<title>Veer Savarkar Birth Anniversary: हिंदुत्व के पुरोधा थे विनायक दामोदर सावरकर, दो बार मिली थी आजीवन कारावास</title>
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<description><![CDATA[ एक भारतीय राजनीतिज्ञ, कार्यकर्ता और लेखक विनायक दामोदर सावरकर का 28 मई को जन्म हुआ था। उन्होंने सशस्त्र क्रांति और हिंदुत्व की विचारधारा से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने का काम किया था। हालांकि नासिक षड्यंत्र कांड के कारण सावरकर को कालापानी की सजा मिली, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनायक दामोदर सावरकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमहाराष्ट्र के नासिक के पास स्थिति भगूर गांव में विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ था। वह मराठी हिंदू चितपावन ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम दामोदर और मां का नाम राधाबाई सावरकर था। स्कूली जीवन से ही सावरकर के अंदर राजनीतिक चेतना थी। उन्होंने साल 1903 में अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ मिलकर मित्र मेला नामक संगठन की स्थापना की। जिसको बाद में अभिनव भारत सभा के नाम से भी जाना गया। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ना था और हिंदू गौरव को पुनर्जीवित करना था।अंग्रेजों के लिए खतरा थे सावरकरलोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का सावरकर पर गहरा प्रभाव पड़ा था। साल 1905 में सावरकर ने बंगाल विभाजन का विरोध किया था और तिलक की उपस्थिति में उन्होंने अन्य छात्रों के साथ विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। वहीं सावरकर से तिलक भी काफी प्रभावित हुए थे और साल 1906 में लंदन में कानून की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दिलाने में सहायता की थी।इसे भी पढ़ें: NT Rama Rao Birth Anniversry: राजनीति में धूमकेतू की तरह चमके थे एनटी रामा राव, जानिए दिलचस्प बातेंफिर साल 1909 में वीर सावरकर पर ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रचने और अंग्रेजी अफसरों की हत्या का आरोप लगा। ऐसे में गिरफ्तारी से बचने के लिए सावरकर पेरिस चले गए और बाद में लंदन गए। वहीं मार्च 1910 में सावरकर को लंदन में हथियार बांटने, भड़काऊ भाषण देने और सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने जैसे कई आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजों के मन में सावरकर के प्रति इसलिए भी डर था, क्योंकि वह सिर्फ एक क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि एक प्रखर विचारक भी थे।सावरकर के हिंदुत्व की अवधारणा ने भारतीय समाज को एकजुट करने का काम किया था। जिसको अंग्रेज &#039;फूट डालो और राज करो&#039; नीति से कमजोर करना चाहते थे। वहीं सावरकर के भाषणों और लेखन में स्वाभिमान और देशभक्ति की ऐसी आग थी कि अंग्रेजों को डर था कि यह आग ब्रिटिश साम्राज्य को भस्म कर देगी। साल 1936 में किसी मुद्दे पर कांग्रेस और वीर सावरकर में मतभेद हो गया था। पार्टी के भीतर विरोध की आवाज तेज होने लगी। इस दौरान मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, कवि और नाटककार पीके अत्रे ने सावरकर का साथ दिया। अत्रे ने ही सावरकर को वीर की उपाधि से संबोधित किया था। आगे चलकर वह वीर सावरकर ने नाम से मशहूर हो गए थे।साल 1949 में वीर सावरकर पर गांधी हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगा था। वहीं अन्य 8 लोगों के साथ उनको भी इस साजिश में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस कारण से वीर सावरकर की छवि को धक्का लगा था। लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में सावरकर को बरी कर दिया गया था।मृत्युबता दें कि 26 फरवरी 1966 को 82 साल की उम्र वीर सावरकर का निधन हो गया था। बताया जाता है कि सावरकर ने एक महीने पहले से उपवास करना शुरूकर दिया था। जिसके कारण उनका शरीर कमजोर होता चला गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 29 May 2025 03:33:26 +0530</pubDate>
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<title>Gopal Krishna Gokhale Birth Anniversary: नरम दल के नेता थे गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी जी मानते थे राजनीतिक गुरु</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 मई को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष के दौरान गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म हुआ था। वह एक प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। वह एक समाज सुधारक थे, जिनका लक्ष्य अहिंसा की विचारधारा को आगे बढ़ाना था। गोपाल कृष्ण गोखले जन-जन तक शिक्षा को पहुंचाना चाहते थे। वहीं उन्होंने सभी तरह के जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए कई तरह के काम किए थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गोपाल कृष्ण गोखले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षारत्नागिरी में 09 मई 1866 को गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम कृष्णा राव गोखले और मां का नाम वलूबाई गोखले था। वह एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे। लेकिन वह एक मेधावी छात्र थे। गोखले के मन में हमेशा राष्ट्रभक्ति की भावना थी। जिसने आगे चलकर उनको देश के लिए बहुत कुछ करने के लिए प्रेरित किया था। साल 1881 में गोखले ने मैट्रिक की परीक्षा पास की और साल 1882 में राजाराम कॉलेज से आगे की पढ़ाई पूरी की। उनको हर महीने छात्रवृत्ति भी मिला करती थी।इसे भी पढ़ें: Rabindranath Tagore Birth Anniversary: रोशनी जिनके साथ चलती थीकांग्रेस अध्यक्ष बने गोखलेबता दें कि कानून की पढ़ाई करने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले राष्ट्रभावना के चलते नरम दल के नेता के रूप में काम करते रहे। वह साल 1905 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। फिर साल 1907 आते-आते यह पार्टी दो टुकड़ों में बंट गई। हालांकि वैचारिक मतभेद होने के बाद भी उन्होंने गरम दल के नेता लाला लाजपत राय की रिहाई के लिए अंग्रेजों के खिलाफ अभियान चलाने का काम किया था।उन्होंने अपनी जीवनकाल में कई क्रांतिकारी परिवर्तन किए थे। गोखले ने साल 1905 में भारतीय शिक्षा के विस्तार के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी। गोखले का मानना था कि भारतीयों को इस तरह की शिक्षा प्राप्त होनी चाहिए, जो उनके मन में नागरिक कर्तव्य और देशभक्ति की अलख जगाए।इसके बाद साल 1912 में गोपाल कृष्ण गोखले ने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी से मुलाकात की थी और उन्हीं के अनुरोध पर गांधी जी भारत आए थे। वहीं महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा &#039;सत्य के साथ मेरे प्रयोग&#039; में उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु बताया था।मृत्युभारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी गोखले भारत भूमि को गुलामी से आजाद कराने के लिए देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत थे। वहीं 19 फरवरी 1915 को उनका निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 10 May 2025 03:31:22 +0530</pubDate>
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<title>Maharana Pratap Birth Anniversary: महाराणा प्रताप को कहा जाता है देश का पहला &amp;apos;स्वतंत्रता सेनानी&amp;apos;, जानिए दिलचस्प बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 09 मई को मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महान वीर योद्धा महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उन्होंने मुगलों के खिलाफ कई युद्ध लड़े थे और मुगल सम्राट अकबर को युद्ध की भूमि में कई बार टक्कर दी थी। महाराणा प्रताप ने मुगल शासक अकबर के सामने कभी घुटने नहीं टेके। महाराणा प्रताप के शौर्य और वीरता की कहानी इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों से लिखी है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारराजस्‍थान के मेवाड़ में 09 मई 1540 को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। वह प्रताप उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र थे। वह महान पराक्रमी और युद्ध रणनीति कौशल में दक्ष थे। मुगलों द्वारा बार-बार हुए हमलों से महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की रक्षा की। उन्होंने कभी भी अपनी आन-बान और शान के लिए कभी समझौता नहीं किया। चाहे जितनी विपरीत परिस्थिति क्यों न हो, वह कभी हार नहीं मानते।हल्दीघाटी का युद्धहल्दी घाटी में 1576 को महाराणा प्रताप और मुगल बादशाह अकबर के बीच युद्ध हुआ था। महाराणा प्रताप ने अपनी 20 हजार सैनिक और सीमित संसाधनों के बल पर अकबर की 85 हजार सैनिकों वाली विशाल सेना से कई वर्षों तक संघर्ष किया। यह युद्ध 3 घंटे से अधिक समय तक चला था। इस युद्ध में जख्मी होने बाद भी वह मुगलों के हाथ नहीं आए।इसे भी पढ़ें: Shahu Maharaj Death Anniversary: महान योद्धा होने के साथ समाज सुधारक भी थे शाहू महाराज, पिछड़ी जातियों के लिए लागू किया था आरक्षणजंगलों में छिप गए थेमहाराणा प्रताप कुछ साथियों के साथ जंगल जाकर छिप गए। वहीं जंगलों में कंद-मूल फल खाकर लड़ते रहे। फिर यही से वह सेना को जमा करने में जुट गए। लेकिन तब तक मेवाड़ के मारे गए सैनिकों की संख्या 1,600 तक पहुंच गई थी। वहीं मुगल सेना में 350 घायल सैनिकों के अलावा 3500 से लेकर 7800 सैनिकों की जान चली गई। वहीं 30 सालों के लगातार प्रयास के बाद भी मुगल शासक अकबर महाराणा प्रताप को बंदी नहीं बना सका। ऐसे में अकबर को महाराणा प्रताप को पकड़ने का ख्याल अपने दिल से निकालना पड़ा।मृत्युवहीं 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप का निधन हो गया था। बताया जाता है कि महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर की भी आंखें नम हो गई थीं। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 10 May 2025 03:31:22 +0530</pubDate>
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<title>Rabindranath Tagore Birth Anniversary: रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत ही नहीं इन देशों का भी लिखा था राष्ट्रगान, कहा जाता था विश्वकवि</title>
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<description><![CDATA[ महान क्रांतिकारी, संगीत और साहित्य के सम्राट रवींद्रनाथ टैगोर का 07 मई को जन्म हुआ था। रवींद्रनाथ टैगोर ने बांग्ला साहित्य और कला को समृद्ध करने के साथ ही भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान भी लिखे। टैगोर को कविगुरु और विश्वकवि के नाम से भी जाना जाता है। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले गैर यूरोपीय थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाकोलकाता में 07 मई 1861 को रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। वह एक धनी परिवार से ताल्लुक रखते थे। जहां पर उनको कला, साहित्य और संगीत के प्रति प्रोत्साहन मिला था। टैगोर ने महज 8 साल की उम्र में ही कविता लिखना शुरूकर दिया था। साल 1879 में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई थी। उन्होंने घर पर रहकर ही शिक्षा प्राप्त की थी। रवींद्रनाथ टैगोर ने बांग्ला और अंग्रेजी में कविताएं लिखीं।इसे भी पढ़ें: Rabindranath Tagore Birth Anniversary: रोशनी जिनके साथ चलती थीरचनाएंरवींद्रनाथ टैगोर की रचनाएं में गोरखा, गीतांजली, गोरा, चंडालिका और रश्मिरथी शामिल है। साल 1913 में उनको गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। बता दें कि उन्होंने संगीत नामक एक विशिष्ट संगीत शैली विकसित की। टैगोर ने करीब 2,000 से अधिक गीतों की रचना की, जिसको &#039;रवींद्र संगीत&#039; के नाम से जाना जाता है। उनको भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रीय कवि के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। टैगोर की रचनाओं का दुनिया में कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। साल 1901 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में शांति निकेतन स्थित एक प्रायोगिक विद्यालय की स्थापना की थी। टैगोर ने इस विद्यालय में भारत और पश्चिमी परंपराओं को मिलाने का प्रयास किया। वहीं टैगोर भी विद्यालय में रहने लगे। साल 1921 में यह विद्यालय विश्व भारती विश्वविद्यालय बन गया।दो देशों का लिखा राष्ट्रगानभारत और बांग्लादेश की आजादी के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने दोनों देशों के लिए राष्ट्रगान लिखा। जिसको आज भी राष्ट्रीय पर्व के मौके पर गर्व से गाया जाता है। इसके अलावा टैगोर ने श्रीलंका का भी राष्ट्रगान लिखा। रवींद्रनाथ टैगोर दूसरे ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने विश्व धर्म संसद को दो बार संबोधित किया। इससे पहले स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद को संबोधित किया था।मृत्युवहीं 07 अगस्त 1941 में रवींद्रनाथ टैगोर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 08 May 2025 03:31:28 +0530</pubDate>
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<title>Giani Zail Singh Birth Anniversary: चुनौती भरा था पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल, उतार&#45;चढ़ाव भरा रहा राजनीतिक सफर</title>
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<description><![CDATA[ 05 मई को ज्ञानी जैल सिंह का जन्म हुआ था। अगर अब तक के हुए राष्ट्रपतियों की बात की जाए, तो पंजाब से सिर्फ ज्ञानी जैल सिंह सर्वोच्च पद पर सुशोभित हुए हैं। वह देश के 7वें राष्ट्रपति थे। लेकिन देश के 7वें राष्ट्रपति के तौर पर उनका कार्यकाल काफी चुनौतीपूर्ण रहा। उनका जीवन और राजनीतिक सफर दोनों ही काफी दिलचस्प और विवादों से घिरे रहे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ज्ञानी जैल सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफरीदकोट-कोटकपूरा हाइवे पर स्थित संधवां गांव में 05 मई 1916 को ज्ञानी जैल सिंह का जन्म हुआ था। उनका वास्तविक नाम जरनैल सिंह था। उनके पिता किशन सिंह एक समर्पित सिख थे और वह गांव में बढ़ई का काम करते थे। छोटी उम्र में ज्ञानी जैल सिंह की मां का देहांत हो गया था। ऐसे में उनका लालन-पालन मां की बड़ी बहन द्वारा किया गया था। महज 15 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ काम करने लगे और अकाली दल से जुड़ गए।इसे भी पढ़ें: Pramod Mahajan Death Anniversary: भाजपा के &#039;लक्ष्मण&#039; माने जाते थे प्रमोद महाजन, सियासी सितारे की भाई ने कर दी थी हत्याऐसे नाम पड़ा ज्ञानीअमृतसर के शहीद सिख मिशनरी कॉलेज से गुरु ग्रंथ का पाठ याद करने के बाद उनको ज्ञानी की उपाधि मिली थी। साल 1938 में जरनैल सिंह ने प्रजा मंडल नामक एक पार्टी का गठन किया। जोकि भारतीय कांग्रेस के साथ संबद्ध होकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन करती थी। यह बात अंग्रेजों और फरीदकोट रियासत को पसंद नहीं आई, ऐसे में जरनैल सिंह को जेल भेज दिया गया और पांच साल की सजा सुनाई गई।ऐसे पंजाब के सीएमसाल 1962 में पंजाब विधानसभा का सदस्य चुने जाने पर जैल सिंह को राज्यमंत्री बनाया गया। साल 1966 में प्रदेश कांग्रेस के प्रधान बने और साल 1972 में पंजाब विधानसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करके राज्य के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। साल 1979 में लोकसभा सांसद बनने पर उनको तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की सरकार में उनको केंद्रीय गृहमंत्री बनाया गया। वहीं साल 1982 में राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी का कार्यकाल खत्म होने के बाद ज्ञानी जैल सिंह को देश के 7वें राष्ट्रपति के तौर पर नामित गया था। ज्ञानी जैल ने 25 जुलाई 1982 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली और उनका कार्यकाल 25 जुलाई 1987 तक रहा।विवादों से घिरा रहा कार्यकालराष्ट्रपति के रूप में ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल शुरूआत से लेकर अंत तक विवादों से घिरा रहा था। उनके राष्ट्रपति कार्यकाल में आपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख-विरोधी दंगे जैसी कई अहम घटनाएं घटी। वहीं  31 मई 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार से एक दिन पहले तक उन्होंने अपनी योजना के बारे में एक शब्द साझा नहीं किया। वहीं ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सिखों ने उन पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया। फिर उसी साल 31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। वहीं तत्कालीन पीएम राजीव गांधी के साथ भी ज्ञानी जैल सिंह का मनमुटाव हो गया था।मृत्युसाल 1994 में तख्तश्री केशगढ़ जाते समय ज्ञानी जैल सिंह की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। ऐसे में 25 दिसंबर 1994 को ज्ञानी जैल सिंह का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 07 May 2025 03:31:34 +0530</pubDate>
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<title>Shahu Maharaj Death Anniversary: महान योद्धा होने के साथ समाज सुधारक भी थे शाहू महाराज, पिछड़ी जातियों के लिए लागू किया था आरक्षण</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 06 मई को कोल्हापुर की रियासत के पहले महाराजा मराठा छत्रपति शाहू महाराज का निधन हो गया था। वह भोंसले राजवंश से थे। वह सिर्फ एक महान योद्धा ही नहीं बल्कि दूरदर्शी नेता और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने समाज को बदलने के लिए शिक्षा समेत कई मुद्दों को अहमियत दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर छत्रपति शाहू महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोल्हापुर में 26 जून 1874 को छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबा साहब घाटगे और मां का नाम राधाबाई साहिबा था। उनकी शुरूआती शिक्षा राजकोट में राजकुमार कॉलेज से हुई थी। वहीं उच्च शिक्षा के लिए वह 1890 से लेकर 1894 तक धाड़बाड़ में रहे। इस दौरान उन्होंने इतिहास, अंग्रेजी और कारोबार चलाने की शिक्षा प्राप्त की। वहीं अप्रैल 1897 में उनकी शादी लक्ष्मीबाई से हुई थी।इसे भी पढ़ें: Motilal Nehru Birth Anniversary: देश के बड़े और महंगे वकील थे मोतीलाल नेहरू, देश की आजादी में था बड़ा योगदानउठाए कई अहम कदमउन्होंने 20 साल की उम्र में कोल्हापुर का राजकाज संभाला। उन्होंने अपने शासनकाल में लगे सभी ब्राह्मणों को हटा दिया। साथ ही बहुजन समाज को मुक्ति दिलाने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाया। इसके साथ ही उन्होंने शूद्रों और दलितों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोला। आमतौर पर राजाओं को जबरन वसूलने और हड़पने के लिए जाने जाते थे। लेकिन शाहू महाराज ने अपने शासन काल के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं किया।उन्होंने अपने कार्यकाल में राज्य में कई परिवर्तन किए और इन परिवर्तन का उद्देश्य समाज के सभी जाति के लोगों की सहभागिता चाहते थे। छत्रपति शाहूजी महाराज ने नीचे तबके के लोगों के लिए आरक्षण का कानून बनाया और इस कानून के तहत बहुजन समाज के लोगों को 50 फीसदी आरक्षण दिया गया।शाहू महाराज ने दलितों को समाज में सम्मान और हक दिलाने में उनकी मदद की। लेकिन इस बात को ब्राह्मण समाज को बर्दाश्त नहीं कर पाए। शाहू महाराज के जीवन पर ज्योतिबा फूले का काफी गहरा प्रभाव था। फूले के निधन के बाद महाराष्ट्र में चले सत्य शोधक समाज आंदोलन चलाने वाला कोई नायक नेता नहीं था। साल 1910 से 1911 तक शाहू महाराज ने इस आंदोलन का अध्ययन किया। राजा शाहूजी ने साल 1911 में अपने संस्थान में सत्य शोधक समाज की स्थापना की।मृत्युबहुजन समाज के हितकारी राजा छत्रपति शाहू महाराज का 06 मई 1922 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 07 May 2025 03:31:33 +0530</pubDate>
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<title>Motilal Nehru Birth Anniversary: देश के बड़े और महंगे वकील थे मोतीलाल नेहरू, देश की आजादी में था बड़ा योगदान</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख व्यक्तियों में एक पंडित मोतीलाल नेहरू का 06 मई को जन्म हुआ था। हालांकि अधिकतर लोग उनको देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पिता के रूप में जानते हैं। वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता, वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे। मोतीलाल नेहरू ने अपना जीवन भारतीय स्वतंत्रता को समर्पित कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मोतीलाल नेहरू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के आगरा में 06 मई 1861 को मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर नेहरू और मां का नाम इंद्राणी था। मोतीलाल नेहरू के जन्म के तीन महीने पहले इनके पिता का निधन हो गया था। जिसके बाद इनका पालन-पोषण बड़े भाई नंदलाल नेहरू ने किया था।इसे भी पढ़ें: Giani Zail Singh Birth Anniversary: चुनौती भरा था पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल, उतार-चढ़ाव भरा रहा राजनीतिक सफरकानूनी करियरमोतीलाल नेहरू ने कानून की पढ़ाई की थी और उन्होंने अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। शुरूआती दिन बहुत गरीबी में गुजारे थे, लेकिन बाद में वह सबसे अमीर भारतीयों में शामिल हो गए थे। मोतीलाल नेहरू को अंग्रेज जज अधिक तवज्जो नहीं देते थे, लेकिन अपनी काबिलियत और मेहनत की वजह से कई अंग्रेज जज मोतीलाल नेहरू से प्रभावित थे। उनको हाईकोर्ट में अपने पहले केस के लिए 5 रुपए मिले थे। हालांकि बाद में उन्होंने ऐसी तरक्की की कि वह एक महंगे वकील बन गए थे।राजनीतिक सफरबता दें कि मोतीलाल नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। उन्होंने दो बार पार्टी के अध्यक्ष के रूप में काम किया था। साल 1919 में पहली बार मोतीलाल नेहरू अमृतसर से और फिर साल 1928 में कलकत्ता से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की वजह से मोतीलाल नेहरू को कई बार जेल भी जाना पड़ा था। राजनीतिक सक्रियता के साथ वह सम्मानित वकील भी थे। वहीं उन्होंने भारत की कानूनी व्यवस्था को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।वहीं 01 जनवरी 1924 को मोतीलाल नेहरू ने चितरंजन दास के साथ स्वराज पार्टी की सह-स्थापना की थी। जिसके बाद मोतीलाल नेहरू दिल्ली में ब्रिटिश भारत की संयुक्त प्रांत विधान परिषद के लिए चुने गए। जहां पर नेहरू ने विपक्ष के नेता के रूप में काम किया था। उन्होंने &#039;नेहरू रिपोर्ट&#039; लिखी थी।, जिसमें उन्होंने कानूनी अधिकारों और संवैधानिक के साथ एक लोकतांत्रिक समाज के विचारों को सामने रखा।मृत्युभारतीय स्वतंत्रता सेनानी और वकील मोतीलाल नेहरू का 06 फरवरी 1931 को लखनऊ में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 07 May 2025 03:31:33 +0530</pubDate>
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<title>Rabindranath Tagore Birth Anniversary: रोशनी जिनके साथ चलती थी</title>
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<description><![CDATA[ भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बांङ्ला’ के रचयिता एवं भारतीय साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की जन्म जयंती हर साल 7 मई को मनाई जाती है। वे एक महान एवं विश्वविख्यात कवि, लेखक, साहित्यकार, दार्शनिक, समाज सुधारक और चित्रकार थे। उन्हें बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा, युगस्रष्टा एवं युग-निर्माता माना जाता है। रवींद्रनाथ टैगोर को उनकी अनूठी, हृदयस्पर्शी एवं आध्यात्मिक रचनाओं के लिए लोग गुरुदेव कहकर पुकारते हैं। उनका जन्मदिन केवल जन्म का जश्न मनाने के लिए नहीं है, बल्कि उनके विचारों और मूल्यों को याद करने और उनके सद्भाव, संपूर्णता और अखंडता के आदर्शों और आकांक्षाओं के अमूल्य योगदान का सम्मान करने का भी एक अवसर है। टैगोर एक ऐसे दिव्य एवं अलौकिक व्यक्ति एवं समाजक्रांति के प्रेरक थे, रोशनी जिनके साथ चलती थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर और माता शारदा देवी थीं। उनकी आरम्भिक शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की इच्छा में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम लिखाया फिर लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया किन्तु 1880 में बिना डिग्री प्राप्त किए ही स्वदेश लौट आए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। टैगोर परिवार बंगाल पुनर्जागरण के समय अग्रणी था। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया; बंगाली और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत एवं रंगमंच और पटकथाएं वहां नियमित रूप से प्रदर्शित हुईं थीं। टैगोर के सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ एक दार्शनिक और कवि थे एवं दूसरे भाई सत्येंद्रनाथ कुलीन और पूर्व में सभी यूरोपीय सिविल सेवा के लिए पहले भारतीय नियुक्त व्यक्ति थे। एक भाई ज्योतिरिंद्रनाथ, संगीतकार और नाटककार थे एवं इनकी बहिन स्वर्णकुमारी उपन्यासकार थीं। टैगोर ने लगभग 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रूवपद शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं के अलग-अलग रंग प्रस्तुत करते हैं।इसे भी पढ़ें: Shahu Maharaj Death Anniversary: महान योद्धा होने के साथ समाज सुधारक भी थे शाहू महाराज, पिछड़ी जातियों के लिए लागू किया था आरक्षणगुरुदेव टैगोर की कविताओं में हमें अस्तित्व के असीम सौन्दर्य, प्रकृति और भक्ति के दर्शन होते हैं। उनकी बहुत-सी कविताएं प्रकृति के सौन्दर्य से जुड़ी हैं। गुरुदेव ने जीवन के अंतिम दिनों में चित्र बनाना शुरू किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लान्ति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओं में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। टैगोर और महात्मा गाँधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गांधी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। एक समय था जब शान्ति निकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे, उस समय गांधीजी ने टैगोर को एक बड़ी राशि का अनुदान का चेक दिया था।टैगोर के कई गीतों और कहानियों ने मानव चेतना को बदलने और कार्य करने के लिए साहस और प्रतिबद्धता को प्रेरित किया। उन्होंने कला का अभ्यास कला के लिए नहीं किया, न ही आत्म-अभिव्यक्ति के तरीके के रूप में और कम से कम मनोरंजन के लिए तो कत्तई नहीं किया, बल्कि उनकी कला भी नये मानव एवं नये विश्व की संरचना से प्रेरित थी। उनकी कला जीवन के गहरे अर्थ को स्पष्ट करने और आत्मा को ठीक करने की पेशकश थी। अपने शिल्प के उस्ताद के रूप में, टैगोर ने कविता की शुद्धता को जीने के उद्देश्य के साथ जोड़ा। उन्होंने न केवल अपने जीवन में मृत्यु, अवसाद और निराशा के कारण अनुभव किए गए दुख और पीड़ा को ठीक किया, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के भीतर अन्याय और असमानता के घावों को भरने के लिए भी काम किया। उन्होंने उन्नत कृषि, अच्छे स्कूलों, आरामदायक आर्थिक स्थितियों और बेहतर जीवन स्तर के माध्यम से मानव समुदायों के बाहरी विकास के लिए काम किया, लेकिन साथ ही उन्होंने आत्मा के नवीनीकरण, आत्मा की देखभाल, हृदय को पोषण और कल्पना को पोषित करने के माध्यम से आंतरिक विकास पर जोर दिया। वे एक ऐसे पुरुषार्थी पुरुष का महापुरुष के रूप में जाना पहचाना नाम है, जिन्होंने हर इंसान के महान् बनने का सपना संजोया और उसके लिये उनके हाथ में सुनहरे सपनों को साकार होने की जीवनशैली भी सौंपी।टैगोर गहन आध्यात्मिक एवं साधक पुरुष थे, उन्होंने अध्यात्म के गहन रहस्यों को उद्घाटित किया। उनके अनुसार मौन की भाषा शब्दों की भाषा से किसी भी रूप में कमजोर नहीं होती, बस उसे समझने वाला चाहिए। जिस प्रकार शब्दों की भाषा का शास्त्र होता है, उसी प्रकार मौन का भी भाषा विज्ञान होता है। मौन को समझा तो जा सकता है, पर समझाया नहीं जा सकता। संभवतः इसीलिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि मौन अनंत की भाषा है। टैगोर अध्यात्म एवं विज्ञान के समन्वयक थे। टैगोर ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और भौतिक कल्याण के साथ आध्यात्मिक विकास की आवश्यकता व्यक्त की। एक के बिना दूसरा एक पैर पर चलने जैसा है। वे आध्यात्मिक-वैज्ञानिक व्यक्तित्व निर्माण के प्रेरक थे। इस संतुलित और समग्र विश्वदृष्टि की अब पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, क्योंकि यह हमारे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी और लचीले भविष्य के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता एवं शर्त है। शुद्ध तर्क और शुद्ध भौतिकवाद उतने ही विनाशकारी हैं, जितने कि विशुद्ध रूप  ]]></description>
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<pubDate>Wed, 07 May 2025 03:31:32 +0530</pubDate>
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<title>Napoleon Bonaparte Death Anniversary: जहर देकर की गई थी नेपोलियन बोनापार्ट की हत्या, जानिए दिलचस्प बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 05 मई को महान योद्धा और फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट का निधन हो गया था। नेपोलियन ने अपनी युद्ध नीति और पराक्रम के दम पर दुनिया के एक बड़े हिस्से पर कब्जा किया था। लेकिन इनके जीवन के आखिरी समय में यह इतने गुमनाम हो गए थे कि इनकी मौत एक रहस्य बनकर रह गई थी। तो आइए जानते हैं कि उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महान योद्धा और फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारफ्रांस के अजाचियो शहर में 15 अगस्त 1769 में नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म हुआ था। वह एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखते थे। परिवार ने उनको सैन्य अफसर बनाने के लिए फ्रांस की सैन्य अकादमी भेजा था। सैनिक स्कूल में शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने 1784 में पेरिस के एक कॉलेज में एडमिशन लिया। जहां पर उन्होंने तोपखाने से जुड़े से मुद्दों की पढ़ाई की। नेपोलियन की प्रतिभा को देखते हुए फ्रांस के राजकीय तोपखाने में नेपोलियन को सब-लेफ्टिनेंट की जॉब मिल गई।इसे भी पढ़ें: Leonardo Da Vinci Death Anniversary: इटली के महान चित्रकार थे लियोनार्डो दा विंची, जानिए दिलचस्प बातेंविवाहबता दें कि 09 मार्च 1796 को नेपोलियन का जोसेफाइन से विवाह हुआ था। वहीं पहली पत्नी के निसंतान रहने पर नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया के सम्राट की पुत्री &#039;मैरी लुईस&#039; से दूसरा विवाह किया था। दूसरी पत्नी से नेपोलियन को संतान की प्राप्ति हुई थी। अपने युद्ध कौशल से नेपोलियन ने फ्रांस को विदेशी दुश्मनों से मुक्ति दिलाई थी। वहीं 15 दिसंबर 1799 को फ्रांसीसी जनता ने नेपोलियन को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया था। नेपोलियन ने अपनी वीरता और सूझबूझ से कई युद्धों में जीत हासिल की थी। सेनापति के तौर पर फ्रांस में सबसे ताकतवर सेना भी नेपोलियम की थी। वहीं साल 1804 में पोप की मौजूदगी में खुद को बादशाह घोषित किया था। मौतबताया जाता है कि नेपोलियन के बाल में आर्सेनिक नामक जहर पाया गया था। वहीं बीमारी में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी। तो वहीं कई रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया था कि नेपोलियन की बीमारी का जो इलाज किया गया, जिसने उनको मौत के घाट उतार दिया था। नेपोलियन को पोटेशियम टार्ट्रेट नामक जहरीला नमक दिया जाता था, जोकि उनके दिल के लिए नुकसानदायक था। वहीं 05 मई 1581 को 51 साल की उम्र में नेपोलियन बोनापार्ट की मौत हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 06 May 2025 03:31:33 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Nargis Death Anniversary: कभी आरके फिल्म्स की जान हुआ करती थीं नरगिस, ऐसे बनीं थी बॉलीवुड की सुपरस्टार</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी सिनेमा की फेमस अभिनेत्री नरगिस का 03 मई को निधन हो गया था। नरगिस ने बाल कलाकार के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। वहीं नरगिस सिनेमा के शोमैन राज कपूर की प्रोडक्शन कंपनी आरके फिल्म्स की जान हुआ करती थीं। अभिनेत्री नरगिस की अदाकारी आज भी सितारों के लिए मिसाल है। नरगिस का फिल्मी करियर काफी शानदार रहा, लेकिन बीमारी के कारण उनका निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेत्री नरगिस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकलकत्ता में 01 जून 1929 को नरगिस का जन्म हुआ था। उनकी मां का नाम जद्दनबाई थी, जोकि उस दौर की मशहूर तवायफ और संगीतकार थीं। लेकिन नरगिस ने इन दीवारों को तोड़कर इतिहास रच दिया था। बता दें कि नरगिस की मां ने उन पर चढ़े कर्ज को उतारने के लिए महज 6 साल की उम्र से उनको फिल्मों में उतारा था।इसे भी पढ़ें: Satyajit Ray Birth Anniversary: सत्यजीत रे ने अपनी फिल्मों से बदल दी थी इंडस्ट्री की सीरत, विदेशों में भी बजता था डंकाफिल्मी करियरसाल 1935 में नरगिस ने फिल्म &#039;तलाश-ए-हक&#039; से बाल कलाकार के रूप में डेब्यू किया था। फिर साल 1949 में नरगिस ने महबूब खान की फिल्म &#039;अंदाज&#039; से बतौर लीड एक्ट्रेस डेब्यू किया था। अभिनेता राज कपूर के साथ नरगिस की पहली फिल्म &#039;आग&#039; थी। जोकि शोमैन के आरके फिल्म्स की पहली फिल्म थी। फिर उन्होंने राज कपूर के साथ &#039;श्री420&#039;, &#039;बरसात&#039; और &#039;आवारा&#039; जैसी फिल्मों में काम किया। इस दौरान राज कपूर और नरगिस के बीच नजदीकियां बढ़ती रहीं और एक समय ऐसा रहा कि एक्ट्रेस सिर्फ आरके फिल्म्स की हिरोइन बनकर रह गईं।जुदा हुईं राहेंअभिनेता राज कपूर और नरगिस करीब 9 साल तक साथ रहे। दोनों शादी भी करना चाहते थे, लेकिन राज कपूर पहले से शादीशुदा थे। एक समय के बाद जब नरगिस को एहसास हुआ कि उनका और राज कपूर का कोई भविष्य नहीं है, तो उन्होंने दूरियां बनानी शुरूकर दीं। राज कपूर से रिश्ता खत्म होने के बाद नरगिस की सुनील दत्त से दोस्ती बढ़ी।करियर के पीक पर की शादीकरियर के पीक पर नरगिस ने सुनील दत्त से शादी कर ली। शादी के बाद उन्होंने फिल्मों में काम करना छोड़ दिया और अपने परिवार को प्राथमिकता दी। साल 1967 में आई फिल्म &#039;रात और दिन&#039; नरगिस की आखिरी फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के लिए नरगिस को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।मृत्युनरगिस का आखिरी समय काफी ज्यादा दर्दनाक रहा। एक्ट्रेस को पैंक्रियाज का कैंसर हुआ था और साल 1981 में 51 साल की उम्र में नरगिस ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 04 May 2025 03:31:11 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Pramod Mahajan Death Anniversary: भाजपा के &amp;apos;लक्ष्मण&amp;apos; माने जाते थे प्रमोद महाजन, सियासी सितारे की भाई ने कर दी थी हत्या</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 03 मई को भाजपा के कद्दावर नेता प्रमोद महाजन की हत्या कर दी गई थी। यह हत्या किसी और ने नहीं बल्कि प्रमोद महाजन के छोटे भाई प्रवीण महाजन ने की थी। प्मोद महाजन को गजब के संभावनाओं वाला नेता कहा जाता था। वह हमेशा मीडिया के सामने मुस्कुराते हुए आते थे। प्रमोद महाजन को कभी पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्टी का लक्ष्मण कहा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर प्रमोद महाजन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षातेलंगाना के महबूबनगर में 30 अक्तूबर 1949 को प्रमोद महाजन का जन्म हुआ था। स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही प्रमोद महाजन संघ से जुड़ गए थे। उन्होंने पुणे के रानाडे इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म से पत्रकारिता की पढ़ाई की थी। लेकिन इस क्षेत्र में कुछ खास न कर पाने के बाद वह एक कॉलेज में अंग्रेजी के टीचर बन गए। उनके पिता पेशे से शिक्षक थे। वहीं वह 22 साल के थे, जब उनके सिर से पिता का साया उठ गया था।संघ प्रचारकप्रमोद महाजन को शुरूआत से ही दिलचस्पी थी, वह राजनीतिक बहसों में भी हिस्सा लिया करते थे। साल 1974 में उन्होंने कॉलेज में पढ़ाना बंद कर दिया था। संघ से जुड़ने के बाद आरएसएस के मराठी अखबार &#039;तरुण भारत&#039; में काम करना शुरूकर दिया और वह जल्द ही उप संपादक बन गए। फिर वह पूरी तरह से संघ के लिए काम करने लगे। साल 1974 में प्रमोद महाजन को संघ प्रचारक बनाया गया औऱ वह लगातार तीन बार भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे।इसे भी पढ़ें: Morarji Desai Death Anniversary: लंबे समय तक PM पद के दावेदार रहे मोरारजी देसाई, फिर ऐसे बनें भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्रीजब देश में आपातकाल लगा तो प्रमोद महाजन ने आरएसएस के लिए जमकर काम करते हुए इंदिरा विरोध मार्च निकाला था। संघ के प्रति उनकी निष्ठा देखते हुए उनको भाजपा में शामिल कर लिया गया। यहीं से प्रमोद महाजन के राजनीतिक सफर की शुरूआत हुई थी। साल 1983 से लेकर 1985 तक वह भाजपा के अखिल भारतीय सचिव थे। इसके बाद साल 1986 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने। फिर साल 1984 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था। लेकिन इस दौरान उनको हार का सामना करना पड़ा था।बीजेपी ने भेजा राज्‍यसभाजब साल 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता पर काबिज हुए, उसी दौरान उन्होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव जीते और रक्षा मंत्री बनाया गया। लेकिन यह सरकार महज 13 दिन चल सकी। फिर साल 1998 में एक बार फिर चुनाव हुए और भाजपा ने सत्ता में वापसी की। लेकिन प्रमोद महाजन हार गए और उनको राज्यसभा भेजा गया। राजनीति में प्रमोद महाजन वह नाम थे, जो कम समय में शीर्ष पर पहुंच गए।मृत्युप्रमोद महाजन 22 अप्रैल 2006 को मुंबई में वर्ली स्थित अपने आवास पर मौजूद थे। तभी उनके छोटे भाई प्रवीण महाजन उनसे मिलने पहुंचे और दोनों भाइयों के बीच किसी बात को लेकर बहस हो गई। इसी दौरान बहस इतनी बढ़ी कि प्रवीण ने प्रमोद पर रिवॉल्वर तान दी और फायर कर दिया। जिसके बाद उनको आनन-फानन में अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन इलाज के दौरान 03 मई 2006 को उनकी मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 04 May 2025 03:31:10 +0530</pubDate>
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<title>Surdas Jayanti 2025: श्रीकृष्ण&#45;भक्ति के दिव्य एवं अलौकिक प्रतीक हैं सूरदास</title>
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<description><![CDATA[ इस संसार में यदि सबसे बड़ा कोई संगीतकार है तो वो हैं श्रीकृष्ण। जिस प्रकार से तत्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के समन्वय को प्रकृति कहा गया है, उसी प्रकार से गायन, वादन और भक्ति इन तीनों में जो रमा हो, जो पारंगत हो उसे श्रीकृष्ण-भक्त गया गया है। ऐसे ही दिव्य एवं अलौकिक श्रीकृष्ण भक्ति के एक महान् चितेरे एवं श्रीकृष्ण भक्ति को समर्पित शीर्षस्थ भक्त-कवि व्यक्तित्व हैं सूरदासजी। वे एक दृष्टिहीन संत थे, जिन्होंने पूरी दुनिया को श्रीकृष्ण भक्ति का मार्ग दिखाया। वे बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित थे और उनकी भक्ति में पूरी तरह से डूब गए। वे एक महान भक्ति कवि एवं हिन्दी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं। उनका आदर्श चरित्र और जीवन दर्शन अंधेरे को भी उजाला प्रदान करता है। वे जहां भक्त, वैरागी, त्यागी और संत थे, वहीं वह उत्कृष्टतम काव्य प्रतिभा के धनी एवं गायन में कुशल भी थे। इसलिए उनके अन्तर्मन की पावन भक्तिधारा मन्दाकिनी की भांति कल-कल करके प्रस्फुटित हुई।सूरदास ने जीवनपर्यंत भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की और ब्रज भाषा में उनकी लीलाओं का वर्णन किया। कान्हा की भक्ति में उन्होंने कई गीत, दोहे और कविताएं लिखी हैं। प्रभु श्रीकृष्ण का गुणगान करते हुए उन्होंने सूरसागर, सूर-सारवली और साहित्य लहरी जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं कीं, जो भक्ति-साहित्य की अनमोल धरोहर है। उनका जन्म एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में संभवतः सन् 1535 की वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ जो इस वर्ष की 2 मई, 2025 है। चार भाइयों में सूरदास सबसे छोटे एवं नेत्रहीन थे। माता-पिता इनकी ओर से उदासीन रहते थे। निर्धनता एवं माता-पिता की उनके प्रति उदासीनता ने उन्हें विरक्त बना दिया। वह घर से निकल कर चार कोस की दूरी पर तालाब के किनारे रहने लगे। इसे भी पढ़ें: Guru Arjun Dev Birth Anniversary: सिख धर्म में गुरु अर्जुन देव से शुरू हुई थी बलिदान की परंपरा, स्वर्ण मंदिर की रखवाई थी नींवसूरदास, श्रीकृष्ण भक्ति के महान कवियों में से एक हैं, जिनकी भक्ति में प्रेम, माधुर्य और विरह का अनूठा संगम है। सूरदास की भक्ति सगुण भक्ति धारा के पुष्टिमार्ग से जुड़ी है, जहाँ वे श्रीकृष्ण को अपने जीवन का सर्वस्व मानते हैं। उनकी भक्ति में सख्य भाव की प्रधानता है, जहाँ वे श्रीकृष्ण को अपना सखा मानते हैं और उनके साथ प्रेममय संबंध स्थापित करते हैं। सूरदास का व्यक्तित्व भी बहुत विरल है, वे एक अनूठे भक्त थे जो श्रीकृष्ण के प्रति सर्वात्मना समर्पित थे और उनकी भक्ति में पूरी तरह से लीन थे। उन्होंने ऐसे समय में श्रीकृष्ण भक्ति की धारा प्रवाहित की जब समाज में धर्म की हानि हो रही थी, अधर्म पुष्ट हो रहा था, सज्जन कष्ट झेल रहे थे और दुर्जन आनन्द भोग रहे थे। ऐसे समय में सूरदास भला तटस्थ कैसे रहते? इस तरह सूरदास की भक्ति केवल श्रीकृष्ण तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने अपने काव्य में मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी चित्रित किया है। मान्यता के अनुसार एक बार सूरदास श्रीकृष्ण की भक्ति में इतने डूब गए थे कि वे एक कुंए में जा गिरे, जिसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने खुद उनकी जान बचाई और आंखों की रोशनी वापस कर दी। जब श्रीकृष्ण भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान में कुछ मांगने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि ‘आप फिर से मुझे अंधा कर दें। मैं श्रीकृष्ण के अलावा अन्य किसी को देखना नहीं चाहता।’ वे भले ही अंधे थे, लेकिन उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को अपने हृदय से देखा और सुना और उनके बारे में सुंदर पद लिखे। संत सूरदास द्वारा रचित काव्य साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान भारतीय लोक संस्कृति और परम्परा को उच्च शिखर पर आसीन कराने में हुआ। उन्होंने द्वापर के नायक श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का समसामयिक लोक-आस्था के अनुरूप चित्रण किया और भगवान को एक लोकनायक के रूप में प्रस्तुत किया। भगवान को लौकिक रूप में प्रस्तुत कर सूरदासजी ने हमारे समाज को एक नई आस्था एवं नई भक्ति की अवधारणा दी है। वास्तव में सूरदासजी का काव्य लालित्य, सौन्दर्य, वात्सल्य, श्रृंगार, शांत रस और प्रेम का काव्य है।कुछ लोगों के अनुसार सम्राट अकबर सूरदास से मिलने आए थे। कहते हैं कि तानसेन ने अकबर के समक्ष सूरदास का एक पद गाया। पद के भाव से मुग्ध होकर सम्राट अकबर मथुरा जाकर सूरदास से मिले। सूरदास ने बादशाह को ‘मना रे माधव सौं करु प्रीती गाकर सुनाया।’ बादशाह ने प्रसन्न होकर सूरदास को अपना यश वर्णन करने का आग्रह किया। तब निर्लिप्त सूरदास ने ‘नाहिन रहनो मन में ठौर’ पद गाया। पद के अंतिम चरण ‘सूर ऐसे दरस को ए मरत लोचन व्यास’ को लेकर बादशाह ने पूछा ‘‘सूरदासजी आप नेत्र ज्योति से वंचित हैं, फिर आपके नेत्र दरस को कैसे प्यासे मरते हैं?’’ सूरदासजी ने कहा, ‘‘ये नेत्र भगवान को देखते हैं और उस स्वरूप का रसपान प्रतिक्षण करने पर भी अतृप्त बने रहते हैं।’’ अकबर ने सूरदास से द्रव्य-भेंट स्वीकार करने का अनुरोध किया पर निडरतापूर्वक भेंट अस्वीकार करते हुए सूरदासजी ने कहा आज पीछे हमको कबहूं फेरि मत बुलाइयो और मोको कबहूं लिलियो मती। सूरदासजी संगीत-शास्त्र के परम ज्ञाता, काव्य नेपुण्य एवं गान-विद्या विशारद विषय में प्रतिभा सम्पन्न थे। सूरदास आशु कवि थे। उन्होंने काव्य लिखा नहीं बल्कि उनके मुखारविन्द से स्वतः श्रीकृष्ण की लीला गान करते हुए पद झड़ने लगे थे और वे पद रूप सामृत-बिन्दू की तरह एकत्र होकर सागर ही नहीं काव्य रस का महासागर बन गए, जिसे ‘सूरसागर’ के नाम से जाना जाता है। महाकवि सूरदासजी का जीवन वृत स्वल्प अंश में ही ज्ञात है। उनके लिए महत्व अपनी अस्मिता का नहीं, आराध्य का था। इसलिए उनके जीवन संबंधी साक्ष्य नहीं के बराबर मिलते हैं। कुल मिलाकर ‘संसार से विराग और ईश्वर से राग’ यही सूरदास की आरंभिक दौर की भक्ति का मूल आधार रहा है, जिसे उन्होंने बड़ी तल्लीनता के साथ व्यक्त किया है। सूरदास ने स्वयं को अपने ईश्वर का तुच्छ सेवक मानते हुए उनके समक्ष दैन्य प्रकट किया है। इस कारण सूरदास की भक्ति ‘दास्य भ ]]></description>
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<pubDate>Sat, 03 May 2025 03:31:18 +0530</pubDate>
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<title>Leonardo Da Vinci Death Anniversary: इटली के महान चित्रकार थे लियोनार्डो दा विंची, जानिए दिलचस्प बातें</title>
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<description><![CDATA[ दुनिया के महान चित्रकार लियोनार्डो दा विंची का 02 मई को निधन हो गया था। हालांकि उनकी सबसे फेमस पेंटिंग मोनालिसा मानी जाती है। वह न सिर्फ एक महान अविष्कारक थे, बल्कि वह एक आर्किटेक्ट, जीव विज्ञान और शरीर रचना विज्ञान के एक्सपर्ट भी थे। उन्होंने यूरोपीय कला में कुछ सबसे प्रसिद्ध चित्र बनाए थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर लियोनार्डो दा विंची के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारइटली में विंचीटाउन के अंचियानो गांव में 15 अप्रैल 1452 को लियोनार्डो दा विंची का जन्म हुआ था। उन्होंने पूरी जिंदगी शादी नहीं की थी। इसके अलावा बताया जाता है कि वह कभी स्कूल भी नहीं गए थे। बता दें कि वह एक चित्रकार होने के साथ ही कई अविष्कारों का शुरूआती खाका खींचने वाले महान अविष्कारक भी थे।इसे भी पढ़ें: Balraj Sahni Birth Anniversary: दिग्गज कलाकार ही नहीं क्रांतिकारी भी थे बलराज साहनी, ऐसे शुरू किया था फिल्मी सफरलियोनार्डो के आविष्कारचित्रकारी के साथ ही लियोनार्डो का संगीत से भी गहरा लगाव था। वहीं 1482 में उन्होंने घोड़े के सिर के आकार का एक वाद्ययंत्र बनाया था। इसको देखकर फ्लोरेंस के ड्यूक काफी खुश हुए थे। वहीं लियोनार्डे ने हथियारबंद वाहन, उड़ने वाली मशीन, सौर ऊर्जा के इस्तेमाल और आकाश के रंग को लेकर भी अवधारणा देने का श्रेय उन्हीं को जाता है। इसके अलावा लियोनार्डो ने जीव विज्ञान, ऑर्किटेक्टर और शरीर की रचना के विज्ञान पर भी बहुत सारी जानकारी एकत्र की थी।प्राप्त जानकारी के अनुसार, उन्होंने अस्पतालों में मौजूद शवों के माध्यम से शरीर की संरचना का भी अध्ययन किया था। इसके अलावा लियोनार्डो ने कई और बेहतरीन चित्रों की रचना की है। जोकि दुनियाभर में काफी लोकप्रिय हुए हैं। उनके चित्रों की रचना में &#039;द बप्तिस्म ऑफ क्राइस्ट&#039;, &#039;द अनंसिएशन&#039;, &#039;द अडोरेशन ऑफ द मागी&#039; आदि शामिल हैं।बता दें कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के मुताबिक लियोनार्डो दा विंची कि मोनालिसा कि पेंटिंग इतिहास में सबसे ज्यादा इंश्योर्ड पेंटिंग है। साल 1911 में पेरिस के लौव्रे म्यूजियम से चोरी होने के बाद मोनालिसा की पेंटिंग सबसे फेमस तस्वीर बन गई थी। लियोनार्डो ने मोनालिसा की आंख की दाईं पुतली पर उन्होंने अपने हस्ताक्षर किए थे। वह एक समय पर दोनों हाथों से काम कर सकते थे।मृत्युलियोनार्डो का 02 मई 1519 को 67 साल की उम्र में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 03 May 2025 03:31:17 +0530</pubDate>
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<title>Satyajit Ray Birth Anniversary: सत्यजीत रे ने अपनी फिल्मों से बदल दी थी इंडस्ट्री की सीरत, विदेशों में भी बजता था डंका</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 02 मई को भारतीय सिनेमा के जाने-माने निर्देशक सत्यजीत रे का जन्म हुआ था। उन्होंने एक से बढ़कर एक कई हिट फिल्में दी थीं। वह एक ऐसे शानदार निर्देशक थे कि उनका डंका सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी बजता था। सत्यजीत रे ने अपने शानदार काम से फिल्म इंडस्ट्री की सूरत और सीरत दोनों ही बदल कर रख दी थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सत्यजीत रे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म कोलकाता में 02 मई 1921 को सत्यजीत रे का जन्म हुआ था। वह एक सफल निर्देशक होने के साथ ही महान लेखक, कलाकार, फिल्म निर्माता, चित्रकार, गीतकार और कॉस्ट्यूम डिजाइनर भी थे। उन्होंने अपने जीवन काल में कुल 37 फिल्में बनाई थीं।इसे भी पढ़ें: Manna Dey Birth Anniversary: मुश्किल गाना गाने में मन्ना डे को हासिल थी महारथ, जानिए दिलचस्प बातेंफिल्मों के प्रति आकर्षणभारतीय सिनेमा में एक बड़ा योगदान सत्यजीत रे का रहा। हालांकि फिल्मों के प्रति आकर्षण उनके अंदर इंग्लैंड यात्रा के बाद से आया था। यह अप्रैल 1950 की बात है, जब पत्नी के साथ वह इंग्लैंड यात्रा पर गए थे। इस दौरान वह एक विदेशी विज्ञापन कंपनी के लिए काम करते थे। काम को अच्छे से सीखने के लिए कंपनी ने उनको 6 महीने के लिए लंदन हेड ऑफिस भेजा था। लंदन में उन्होंने कई फिल्में देखीं और वह काफी प्रभावित हुए।इस दौरान उन्होंने तय किया कि भारत आकर वह &#039;पाथेर पांचाली&#039; पर फिल्म बनाएंगे। इस फिल्म के निर्माण के लिए सत्यजीत रे ने अपनी पत्नी के गहने तक बेच दिए थे। लेकिन शूटिंग के बीच में पैसे खत्म हो गए थे और उन्होंने कई लोगों से मदद मांगी। लेकिन जिन लोगों ने भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया तो उन्होंने फिल्म में बदलाव की शर्त रखी, जिसके लिए वह तैयार नहीं हुए। आखिरी में पश्चिम बंगाल सरकार ने साल 1955 में फिल्म &#039;पाथेर पांचाली&#039; रिलीज हो गई।अवॉर्ड्सबता दें कि सिनेमा के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए सत्यजीर रे ने विशेष ऑस्कर सम्मान दिया गया था। वहीं साल 1992 में सत्यजीत रे को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 03 May 2025 03:31:16 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Manna Dey Birth Anniversary: मुश्किल गाना गाने में मन्ना डे को हासिल थी महारथ, जानिए दिलचस्प बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 01 मई को हिंदी सिनेमा के फेमस गायक मन्ना डे का जन्म हुआ था। उन्होंने कई यादगार और सदाबहार गाने गाए हैं। वह गायकी की दुनिया के ऐसे अनमोल रत्न थे, जिनके सुर और ताल की दुनिया आज भी दीवानी है। आज भी लोगों की जुबान पर मन्ना डे के खूबसूरत गाने चढ़े रहते हैं। मन्ना डे एक ऐसे गायक थे, जिन्होंने न सिर्फ हिंदी बल्कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी हिट गाने दिए हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर मन्ना डे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता के एक बंगाली परिवार में 01 मई 1919 को मन्ना डे का जन्म हुआ था। उनका असली नाम प्रबोध चंद्र था। मन्ना डे को बचपन से ही संगीत में रुचि थी, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि मन्ना वकील बनें। लेकिन मन्ना डे ने अपने मन की बात सुनते हुए संगीत की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया।इसे भी पढ़ें: Dadasaheb Phalke Birth Anniversary: फिल्मों का ऐसा जुनून, संपत्ति तक रख दी गिरवी, दादा साहेब फाल्के ऐसे बने भारतीय सिनेमा के जनकसंगीत शिक्षामन्ना डे ने संगीत की शुरूआती शिक्षा अपने चाचा और उस्ताद कृष्ण चंद्र डे और उस्ताद दाबिर खान से ली थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा में साल 1947 में आई फिल्म &#039;तमन्ना&#039; से गाना गाने की शुरूआत की थी। मन्ना डे अपनी गायकी के अनोखे अंदाज और शैली के लिए जाने जाते थे।पेचीदा होते थे मन्ना डे के गानेबता दें कि मन्ना डे के गानों की पसंद अन्य गायकों से बिलकुल अलग थी। उनके गाने बहुत पेचीदा होते थे। लेकिन उनको कठिन गाने गाना पसंद था। मन्ना डे सिंगर किशोर कुमार और मोहम्मद रफी के गानों को बड़े आराम से अपनी आवाज दे सकते थे। लेकिन उनके गाने गाना अन्य गायकों के बस की बात नहीं थी। अपने 5 दशक के सिंगिंग करियर में मन्ना डे ने मराठी, बंगाली, गुजराती, मलयालम, असमी और कन्नड़ भाषा में करीब 3,500 से अधिक गाने गए। शास्त्रीय संगीत पर उनकी पसंद काफी मजबूत थी। मन्ना डे ने कई क्लासिकल और सेमी क्लासिकल गानों में अपनी आवाज दी थी।सिंगर मन्ना डे ने हिंदी सिनेमा में इतने पेचीदा गाने गाए थे कि मोहम्मद रफी और किशोर कुमार भी उनके प्रशंसक बन गए थे। वह भी मन्ना डे के गानों की तारीफ किया करते थे। मोहम्मद रफी ने उनके गानों को लेकर कहा था, &#039;आप सब मेरे गाने सुनते हैं, लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना डे के गानों का फैन हूं।&#039;मृत्युवहीं 24 अक्तूबर 2013 को 94 साल की उम्र में मन्ना डे का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 02 May 2025 03:31:03 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Balraj Sahni Birth Anniversary: दिग्गज कलाकार ही नहीं क्रांतिकारी भी थे बलराज साहनी, ऐसे शुरू किया था फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड में अपने दमदार अभिनय से पहचान बनाने वाले अभिनेता बलराज साहनी का 01 मई को जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी अदाकारी के जरिए आम आदमी की कहानी को पर्दे पर दिखाने का काम किया था। वह सिर्फ एक अभिनेता ही नहीं बल्कि क्रांतिकारी भी थे। वह इकलौते ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने महात्मा गांधी से मुलाकात की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता बलराज साहनी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के रावलपिंडी में 01 मई 1913 में बलराज साहनी का जन्म हुआ था। इनका असली नाम युद्धिष्ठिर था। बलराज ने अपनी शिक्षा गवर्नमेंट कॉलेज (लाहौर) और गार्डन कॉलेज से पूरी की थी। इंग्लिश लिटरेचर में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी करने के बाद बलराज रावलपिंडी वापस आ गए और अपने परिवार का बिजनेस संभालने लगे। उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम में भी काम किया था।इसे भी पढ़ें: Manna Dey Birth Anniversary: मुश्किल गाना गाने में मन्ना डे को हासिल थी महारथ, जानिए दिलचस्प बातेंफिल्मी करियरफिल्मों में अपने किरदारों की वजह से बलराज साहनी दर्शकों के दिलों पर राज करते थे। उन्होंने अपने करियर की शुरूआत फिल्म &#039;हलचल&#039; से की थी। इस फिल्म में बलराज साहनी ने जेलर का किरदार निभाया था। इसी दौरान एक खबर आई कि कम्युनिस्ट पार्टी का जुलूस निकलने वाला है। जिसमें बलराज साहनी ने भी हिस्सा लिया, लेकिन तभी वहां पर हिंसा शुरू हो गई और पुलिस ने उनको गिरफ्तार कर लिया। बलराज साहनी 3 महीने जेल में रहे और वह सिर्फ फिल्म की शूटिंग के लिए जेल से बाहर आते थे।कई फिल्मों में किया कामबलराज साहनी ने हिंदी सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्रियों के साथ काम किया है, जिसमें, नूतन, वैयजंती माला, मीना कुमारी, पद्मिनी और नरगिस जैसी अभिनेत्री शामिल हैं। बलराज साहनी की फिल्मों की बात करें, तो उन्होंने सुट्टा बाजारा, घर संसार, बिंदिया, सीमा, सोने की चिड़िया, भाभी की चूड़ियां, लाजवंती जैसी फिल्मों में काम किया है। इसके अलावा उन्होंने पंजाबी फिल्म &#039;नानक दुखिया सब संसार&#039; फिल्म में भी काम किया।लेखन के शौकीनबलराज साहनी न सिर्फ बेहतरीन अभिनेता बल्कि एक अच्छे लेखक भी थे। वह साल 1960 में पाकिस्तान गए थे और उन्होंने &#039;मेरा पाकिस्तानी सफरनामा&#039; नामक किताब लिखी थी। वहीं साल 1969 में सोवियत यूनियन के टूर के बाद बलराज साहनी ने &#039;मेरा रूसी सफरनामा&#039; किताब लिखी थी। इस किताब के लिए उनको &#039;सोवियत लेंड नेहरू अवॉर्ड&#039; से नवाजा गया था। इसके अलावा उन्होंने कई कहानियां, कविताएं लिखी हैं। मृत्युवहीं 13 अप्रैल 1973 को अभिनेता बलराज साहनी का कार्डियक अरेस्ट के चलते निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 02 May 2025 03:31:02 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Dadasaheb Phalke Birth Anniversary: फिल्मों का ऐसा जुनून, संपत्ति तक रख दी गिरवी, दादा साहेब फाल्के ऐसे बने भारतीय सिनेमा के जनक</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के का 30 अप्रैल को जन्म हुआ था। उन्होंने एक मूक फिल्म बनाई थी, जिसके सभी कैरेक्टर्स सिर्फ एक्टिंग कर रहे थे। इस फिल्म का नाम &#039;राजा हरिश्चंद्र&#039; था। भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का श्रेय दादा साहेब फाल्के को जाता है। वह एक मशहूर प्रोड्यूसर, डायरेक्टर के साथ स्क्रीनराइटर भी थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर दादा साहेब फाल्के के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षामहाराष्ट्र के नासिक में एक मराठी परिवार में 30 अप्रैल 1870 को दादा साहेब फाल्के का जन्म हुआ था। इनका असली नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था। इनके पिता संस्कृत के विद्वान थे। दादा साहेब फाल्के ने बड़ौदा के कला भवन से अपनी शिक्षा पूरी की थी। यहां पर उन्होंने इंजीनियरिंग, चित्रकला, मूर्तिकला, पेंटिंग और फोटोग्राफी की शिक्षा ली थी। वहीं साल 1910 में बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में &#039;द लाइफ ऑफ क्राइस्ट&#039; फिल्म दिखाई गई। इस फिल्म को देखने के बाद उन्होंने यह निश्चय किया कि वह भारतीय धार्मिक और मिथकीय चरित्रों को रुपहले पर्दे पर जीवंत करने का काम करेंगे।इसे भी पढ़ें: Satyajit Ray Death Anniversary: सत्यजीत रे को कहा जाता था सिनेमा का जीनियस, ऐसे मिला था ऑस्करफिल्मी सफरइसके बाद उन्होंने बंबई में मौजूद थियेटरों की लगभग सभी फिल्में देख डालीं। दो महीने तक वह रोजाना शाम में चार से पांच घंटे सिनेमा देखते थे। वहीं बाकी के समय में वह फिल्म बनाने में लगे रहते थे। जिसका असर यह हुआ कि उनकी आंखों की रोशनी करीब-करीब चली गई। फिर दादा साहेब फाल्के ने फिल्म शुरू की। जिसको आज सभी हम हिंदुस्तान की पहली फीचर फिल्म &#039;राजा हरिश्चंद्र&#039; के नाम से जानते थे। वह इस फिल्म के सिर्फ निर्माता, निर्देशक ही नहीं बल्कि उन्होंने कॉस्ट्यूम डिजाइन, लाइटमैन और कैमरा डिपार्टमेंट भी संभाला था। वह इस फिल्म के पटकथा लेखक भी थे। इस फिल्म को 3 मई 1913 को कोरोनेशन सिनेमा बॉम्बे में रिलीज किया गया।फिल्म राजा हरिश्चंद्र की सफलता के बाद दादा साहेब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने बिजनेसमैन के साथ मिलकर &#039;हिंदुस्तान फिल्म्स&#039; नामक कंपनी बनाई। यह देश की पहली फिल्म कंपनी थी। वहीं इसके तहत वह अभिनेताओं के अलावा टेक्नीशियनों को भी ट्रेनिंग देने लगे। लेकिन फिर साल 1920 में उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म्स से इस्तीफा दे दिया और सिनेमा जगत से भी रिटायरमेंट लेने की घोषणा कर दी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 01 May 2025 03:31:34 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Dadasaheb, Phalke, Birth, Anniversary:, फिल्मों, का, ऐसा, जुनून, संपत्ति, तक, रख, दी, गिरवी, दादा, साहेब, फाल्के, ऐसे, बने, भारतीय, सिनेमा, के, जनक</media:keywords>
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<title>Adolf Hitler Death Anniversary: दर्दनाक मौत मरा था दुनिया का तानाशाह एडोल्फ हिटलर, बर्बरता से तबाह की थी लाखों जिंदगियां</title>
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<description><![CDATA[ जब कभी भी तानाशाही की बात होती है, तो एडोल्फ हिटलर का नाम सबसे पहले सामने आता है। किसी को जर्मन का तानाशाह हीरो नजर आता है, तो किसी को विलेन नजर आता है। वह 20वीं सदी का सबसे क्रूर तानाशाह था। आज ही के दिन यानी की 30 अप्रैल को एडोल्फ हिटलर की मृत्यु हो गई थी। वह साल 1933 में जर्मनी की सत्ता पर काबिज हुआ था। जिसके बाद उसने 6 साल में करीब 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी। तो आइए जानते हैं उसकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर एडोल्फ हिटलर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारआस्ट्रिा के वॉन में 20 अप्रैल 1889 को एडोल्फ हिटलर का जन्म हुआ था। उनके पिता सिविल सेवक थे, तो वहीं हिटलर शुरूआत से पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से अपने पिता की तरह सिविल सेवक नहीं बनना चाहते थे। उनकी शुरूआती शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई। पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से और संघर्ष के चलने वह स्कूल से ड्राप आउट हो गए। वहीं 1930 में महज 17 साल की उम्र में हिटलर के सिर से पिता का साया उठ गया। जिसके बाद वह आर्टिस्ट बनने के लिए वियना चले गए।इसे भी पढ़ें: William Shakespeare Death Anniversary: महान नाटककार और कवि विलियम शेक्सपियर ने आज ही के दिन दुनिया को कहा था अलविदाजर्मन की सत्ता पर काबिजहालांकि वियना की अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स ने हिटलर को सेलेक्ट नहीं किया, जिसके बाद वह भरण-पोषण के लिए घरों में पेंटिंग का काम करने लगे। यह वही समय था, जब हिटलर के मन में यहूदियों और साम्यवादियों के प्रति घृणा पैदा होने लगी। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के साल 1933 में समाजवादी जर्मन वर्कर्स पार्टी को सत्ता में लाने के बाद हिटलर ने जर्मन सरकार पर आधिपत्य कर लिया था। जर्मनी की सत्ता पर काबिज होने के बाद हिटलर ने वहां नस्लवाल साम्राज्य की स्थापना की। हिटलर यहूदियों से सख्त नफरत करता था। हिटलर के मन में यहूदियों के प्रति नफरत का नतीजा नरसंहार के रूप में सामने आया था। वह होलोकास्ट इतिहास का ऐसा नरसंहार था, जिसमें करीब 6 साल में 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी, इनमें 15 लाख सिर्फ बच्चे थे।मौत का सताता था डरबताया जाता है कि हिटलर को अपनी मौत का डर सताया करता था। इसलिए वह सीधे तौर पर खाना नहीं खाता था, पहले खाना उसके सेवकों द्वारा चखा जाता था, उसके बाद वह खाना खाता था। एडोल्फ हिटलर को लगता था कि ब्रिटेन उसको मारना चाहता था, जिसकी वजह से वह हर समय चौकन्ना रहता था।मृत्युबताया जाता है कि हिटलर में आत्महत्या करने से कुछ घंटे पहले अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन से शादी की थी। हिटलर शादी के समय जमीन से 50 फीट नीचे बने एक बंकर के कांफ्रेंस रूम में था, जिसमें वह रहा करता था। वह सेकेंड वर्ल्ड वॉर में जर्मनी से बुरी तरह हारने के बाद काफी दुखी था, जिसकी वजह से हिटलर डिप्रेशन में चला गया था। पूरी दुनिया में मौत का तांडव कर चुका हिटलर अपनी हार से इतना दुखी था कि उसने 30 अप्रैल 1945 को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 01 May 2025 03:31:34 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Raja Ravi Varma Birth Anniversary: फादर ऑफ मॉडर्न इंडियन आर्ट कहे जाते हैं राजा रवि वर्मा, भारतीय इतिहास को बनाया था रंगीन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 29 अप्रैल को भारतीय कला के इतिहास के सबसे महान चित्रकार और कलाकार राजा रवि वर्मा का जन्म हुआ था। राजा रवि वर्मा अपने समय के महान चित्रकारों में से एक थे। उन्होंने अपने समय के सभी राजाओं के दरबारों को अपनी चित्रकलाओं से सुशोभित किया था। उनके द्वारा बनाई गई भगवान की चित्रकारी हर घऱ और हर मंदिर में पहुंची। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजा रवि वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतिरुवनंतपुरम के किलिमानूर पैलेस में 29 अप्रैल 1848 को राजा रवि वर्मा का जन्म हुआ था। इनके सबसे पहले गुरु उनके चाचा राजराजा वर्मा थे। उस दौरान चित्रकारी सीखने वालों को शुरूआती पाठ के लिए समतल जमीन और चॉक दी जाती थी। इस पर अभ्यास करने के बाद ही उनको कागज और पेंसिल मिलती थी।इसे भी पढ़ें: Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से देश की आजादी का अलख जगाते थे रामधारी सिंह दिनकरतिरुवनंतपुरम में सीखी चित्रकलाउस दौरान बाजारों में रंग नहीं मिला करते थे, तब चित्रकार पौधों और फूलों से रंग तैयार करते थे। साल 1862 में  बाल कलाकार रवि वर्मा अपने चाचा के साथ पारंपरिक तरीके से चित्रकारी सीखने के लिए तिरुवनंतपुरम आए। यहां पर आयिल्यम तिरुनाल महाराजा से मिले, जिन्होंने उनको वहीं रहकर चित्रकला सीखने की सलाह दी। इस तरह से वह इटालियल पुनर्जागरण शैली में चित्रकला सीखने लगे।बता दें कि पश्चिमी शैली की चित्रकला और ऑयल पेंटिंग तकनीक रवि वर्मा ने थियोडोर जेंसन से सीखी थी। थियोडोर जेंसन साल 1868 में त्रिवेंद्रम पैलेस आने वाले डच चित्रकार थे। महाराजा और राज परिवार के सदस्यों के चित्र रवि वर्मा ने नई शैली में बनाए और उनकी पेंटिंग &#039;मुल्लप्पू चूडिया नायर स्त्री&#039; से वह फेमस हुए। वहीं साल 1873 में चेन्नई में आयोजित चित्र प्रदर्शनी में रवि वर्मा को प्रथम पुरस्कार मिला था। वहीं इस चित्रकला को ऑस्ट्रिया के विएना में एक प्रदर्शनी में पुरस्कृत किया गया था। उनकी पेंटिंग &#039;शकुंतला&#039; को साल 1876 में पुरस्कृत किया गया था।फादर ऑफ मॉडर्न इंडियन आर्टराजा रवि वर्मा को फादर ऑफ मॉडर्न इंडियन आर्ट के नाम से भी जाना जाता था। उनकी एक चित्रकला 130 से अधिक सालों बाद नीलाम हुई थी। उनकी यह पेटिंग 21.61 करोड़ रुपए में बिकी थी। इस उत्कृष्ट पेंटिंग का नाम &#039;द्रौपदी वस्त्रहरण&#039; था। जिसमें महाभारत में महल में कौरवों और पांडवों से घिरी द्रौपदी की साड़ी उतारने के प्रयास को दिखाया गया है। उनकी कृतियाँ भारतीय सांस्कृतिक तत्वों को पश्चिमी कला के साथ खूबसूरती से मिश्रित करती हैं।मृत्युवहीं 02 अक्तूबर 1906 को राजा रवि वर्मा ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 30 Apr 2025 03:31:17 +0530</pubDate>
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<title>Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से देश की आजादी का अलख जगाते थे रामधारी सिंह दिनकर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 24 अप्रैल को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का निधन हो गया था। वह एक राष्ट्रकवि होने के साथ जनकवि भी थे। उनकी गिनती ऐसी कवियों में की जाती हैं, जिनकी कविताएं आम आदमी से लेकर विद्वानों तक भी पसंद करते हैं। देश की गुलामी से लेकर आजादी मिलने तक के सफर को दिनकर ने अपनी कविताओं द्वारा व्यक्त किया है। दिनकर की कविताओं में विद्रोह, ओज, आक्रोश और क्रांति की पुकार है। तो वहीं दूसरी ओर कविताओं में कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति भी देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाबिहार राज्य में पड़ने वाले बेगूसराय जिले के सिमरिया ग्राम में 23 सितंबर 1908 को रामधारी सिंह दिनकर का जन्म हुआ था। इनके पिता एक साधारण किसान थे। वहीं जब दिनकर 2 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में दिनकर और उनके बहन-भाई का पोषण मां ने किया था। फिर साल 1928 को उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। फिर पटना विश्वविद्यालय इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान में बीए किया। इसके अलावा दिनकर ने बांग्ला, संस्कृत और उर्दू का गहन अध्ययन किया। इसके बाद वह मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। भागलपुर यूनिवर्सिटी में उपकुलपति के पद पर रहे और फिर भारत सरकार के हिंदी सलाहकार बने।इसे भी पढ़ें: William Shakespeare Death Anniversary: महान नाटककार और कवि विलियम शेक्सपियर ने आज ही के दिन दुनिया को कहा था अलविदारचनाएंबता दें कि रामधारी सिंह दिनकर की पहली रचना साल 1930 के दशक में &#039;रेणुका&#039; प्रकाशित हुई थी। फिर करीब तीन साल बाद रचना &#039;हुंकार&#039; प्रकाशित हुई। तो देश के युवा दिनकर के लेखन से चकित रह गए। इसके अलावा दिनकर की रचना &#039;संस्कृति के चार अध्याय&#039; के साल 1959 में उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया था। फिर साल 1959 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।राजनीतिक सफरकवि होने के साथ-साथ रामधारी सिंग दिनकर स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इसके अलावा उनको राजनीति में भी रुचि थी। साल 1952 में जब पहली बार भारत की पहली संसद का गठन हुआ था। तो वह राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुने गए थे और वह दिल्ली चले गए। दिनकर की फेमस पुस्तक &#039;संस्कृति के चार अध्याय&#039; की प्रस्तावना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने लिखी है। इस प्रस्तावना में पीएम नेहरु ने दिनकर को अपना &#039;साथी&#039; और &#039;मित्र&#039; बताया है।मृत्युवहीं 24 अप्रैल 1974 को 65 साल की उम्र में रामधारी सिंह दिनकर का बेगुसराय में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 25 Apr 2025 03:30:58 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>BR Chopra Birth Anniversary: पहली फिल्म फ्लॉप होने के बाद रच दिया इतिहास, &amp;apos;महाभारत&amp;apos; बनाकर घर&#45;घर में फेमस हुए बीआर चोपड़ा</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 22 अप्रैल को बलदेव राज चोपड़ा का जन्म हुआ था। वह हिंदी सिनेमा की एक ऐसी शख्सियत रहे, जिन्होंने कई लोकप्रिय फिल्में बनाईं। बी आर चोपड़ा की विरासत आज भी हिंदी सिनेमा में चमक रही है। उनके द्वारा बनाई गई फिल्में और ऐतिहासिक धारावाहिक &#039;महाभारत&#039; आज भी दर्शकों के बीच जीवित है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बी आर चोपड़ा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के लुधियाना में 22 अप्रैल 1914 को बी आर चोपड़ा का जन्म हुआ था। इन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। बता दें कि सिनेमा की दुनिया में आने से पहले उन्होंने एक पत्रकार के रुप में अपने करियर की शुरूआत की थी। साल 1944 में उन्होंने &#039;सिने हेराल्ड&#039; पत्रिका में काम करना शुरू किया। इसके बाद साल 1947 में भारत पाकिस्तान के विभाजन के बाद बी आर चोपड़ा मुंबई आ गए।  इसे भी पढ़ें: Charlie Chaplin Birth Anniversary: कॉमेडी की दुनिया के बेताज बादशाह थे चार्ली चैपलिन, ऑस्कर से किया गया था सम्मानितफिल्मी करियरसाल 1947 में वह मुंबई आ गए और उन्होंने फिल्म निर्माण में कदम रखा। साल 1948 में आई उनकी पहली फिल्म &#039;करवट&#039; भले ही कुछ खास कमाल नहीं कर पाई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बाद बी आर चोपड़ा ने फिल्म निर्देशक के रूप में चांदनी चौक, शोले, नया दौर और धूल का फूल जैसी फिल्मों का निर्माण किया। इसके साथ ही उन्होंने कई टीवी सीरियल का निर्माण किया। जिसमें बहादुर शाह जफर, महाभारत, कानून और विष्णु पुराण जैसे शो शामिल हैं।ऐतिहासिक धारावाहिक महाभारतबी आर चोपड़ा द्वारा बनाया गया &#039;महाभारत&#039; भारतीय टेलीविजन का ऐतिहासिक धारावाहिक है। उन्होंने इसके हर किरदार को जीवंत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस शो की शुरूआत में हरीश भिमानी की आवाज में &#039;मैं समय हूं&#039; डायलॉग काफी ज्यादा लोकप्रिय हुआ था।पुरस्कारबता दें कि बी आर चोपड़ा को उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया था। उनको फिल्म &#039;कानून&#039; के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा साल 1998 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और साल 2001 में पद्म भूषण से नवाजा गया था। वहीं साल 2004 में बी आर चोपड़ा को फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।मृत्युफिल्म निर्माता बलदेव राज चोपड़ा का लंबी बीमारी के बाद 05 नवंबर 2008 को 94 साल की उम्र में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 24 Apr 2025 03:31:30 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Chopra, Birth, Anniversary:, पहली, फिल्म, फ्लॉप, होने, के, बाद, रच, दिया, इतिहास, महाभारत, बनाकर, घर-घर, में, फेमस, हुए, बीआर, चोपड़ा</media:keywords>
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<title>William Shakespeare Death Anniversary: महान नाटककार और कवि विलियम शेक्सपियर ने आज ही के दिन दुनिया को कहा था अलविदा</title>
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<description><![CDATA[ एक मशहूर कहावत जिसको आप सभी ने सुना होगा कि हमारी किस्मत के सितारे नहीं, बल्कि हम खुद बनाते हैं। यह कहावत अंग्रेजी के महान विद्वान विलियम शेक्सपियर ने कहा था। उन्होंने अपनी रचनाओं से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना लिया था। आज ही के दिन यानी की 26 अप्रैल को विलियम शेक्सपियर का जन्म हुआ था। विलियम शेक्सपियर एक अंग्रेजी कवि, नाटककार और लेखक थे। शेक्सपियर इतने महान थे, जिसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि लोगों को उनके नाम से नवाजा जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विलियम शेक्सपियर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारइंग्लैंड के स्ट्रैटफोर्ड के आन एवन में 26 अप्रैल 1564 को विलियम शेक्सपियर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जॉन शेक्सपियर था, जोकि दस्ताने बनाते थे। वहीं उनकी मां एक घरेलू महिला थीं। वह एक सफल व्यापारी थे और विलियम अपने पेरेंट्स की तीसरी संतान थे। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा स्ट्रैटफोर्ड के किंग्स न्यू स्कूल से पूरी की। 28 नवंबर 1582 को 18 साल की उम्र में विलियम शेक्सपियर की ऐनी हैथवे से शादी की थी।इसे भी पढ़ें: Mark Twain Death Anniversary: अमेरिका के सबसे बड़े लेखक थे मार्क ट्वेन, कभी प्रिंटिंग प्रेस में करते थे कामविलियम शेक्सपियर का करियरसाल 1592 में विलियम शेक्सपियर ने अपने करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने नाटककार और अभिनेता के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। शेक्सपियर की दो कविताएं &#039;वीनस एंड एडोनिस&#039; और &#039;द रैप ऑफ ल्यूक्रेस&#039; हेनरी व्रियोथस्ले को समर्पित की थी। उनकी यह दोनों कविताएं काफी लोकप्रिय हुई थीं। अपने शुरूआती करियर के सात साल बाद तक उन्होंने करीब 15 से ज्यादा नाटक लिखे। साल 1599 में विलियम शेक्सपियर ने अपना एक खुद का थियेटर बनाया था। इस थियेटर नाम ग्लोब रखा था।शेक्सपियर की रचनाएंबता दें कि 1590 से लेकर 1613 तक विलियम शेक्सपियर ने करीब 37 नाटक लिखे थे। उनके ज्यादातर नाटक त्रासदी, हास्य और इतिहास जैसे विषयों पर आधारित हैं। उन्होंने एक फेमस नाटक &#039;जूलियस सीजर&#039; लिखा, जोकि राजनीति पर आधारित था। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में 154 लघु काव्य, 38 नाटक और 2 कहानी और कई कविताएं लिखीं। शेक्सपियर को दुनिया के सभी देशों में पढ़ा जाता है। मृत्युविलियम शेक्सपियर ने 23 अप्रैल 1616 को अंतिम सांस ली थी। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 24 Apr 2025 03:31:29 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Satyajit Ray Death Anniversary: सत्यजीत रे को कहा जाता था सिनेमा का जीनियस, ऐसे मिला था ऑस्कर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 23 अप्रैल को भारतीय सिनेमा बल्कि पूरी दुनिया की सिनेमा का जीनियस कहे जाने वाले सत्यजीत रे का निधन हो गया था। आज भी लोग सत्यजीत रे की फिल्मों से सीख लेते हैं। वहीं हॉलीवुड के निर्देशक भी उनके निर्देशन के तरीकों को अपनी फिल्मों के लिए इस्तेमाल करते हैं। भले ही आज वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन फिल्मों के प्रति सत्यजीत रे का त्याग और समर्पण काफी यादगार है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सत्यजीत रे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारकोलकाता में 02 मई 1921 को सत्यजीत रे का जन्म हुआ था। जब वह महज तीन साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में सत्यजीत रे की मां ने तमाम तरह की समस्याओं का सामना करते हुए उनका पालन-पोषण किया था। इसे भी पढ़ें: BR Chopra Birth Anniversary: पहली फिल्म फ्लॉप होने के बाद रच दिया इतिहास, &#039;महाभारत&#039; बनाकर घर-घर में फेमस हुए बीआर चोपड़ाफिल्मी सफरएक बार काम के सिलसिले में साल 1950 को सत्यजीत रे लंदन जाने का मौका मिला था। इस दौरान उन्होंने लंदन में कई फिल्में देखीं। उन फिल्मों से वह इस कदर प्रभावित हुए कि सत्यजीत रे ने ठान लिया कि वह भारत आकर फिल्म &#039;पाथेर पंचोली&#039; बनाएंगे। फिर साल 1952 में उन्होंने नई टीम के साथ फिल्म की शूटिंग शुरू की। नया फिल्ममेकर होने के कारण कोई भी इस पर पैसा नहीं लगाना चाहता था। इस फिल्म को बनाने के लिए सत्यजीत रे ने अपनी पत्नी के गहने बेच दिए थे। फिर अंत में पश्चिम बंगाल सरकार ने उनकी सहायता की और साल 1955 में फिल्म &#039;पाथेर पंचोली&#039; रिलीज हुई थी।पुरस्कारबता दें कि फिल्म &#039;पाथेर पंचोली&#039; ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते थे। इस फिल्म को फ्रांस के कांस फिल्म फेस्टिवल में मिला विशेष पुरस्कार बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट मिला। इसके बाद साल 1972 में सत्यजीत रे को ऑस्कर देने की घोषणा की थी। लेकिन उस समय सत्यजीत रे बीमार चल रहे थे और यह सम्मान लेने नहीं जा सके। जिस पर ऑस्कर के पदाधिकारियों की टीम कोलकाता सत्यजीत रे के घर पहुंची और उनको यह अवॉर्ड दिया था।मृत्युवहीं 23 अप्रैल 1992 को कोलकाता में सत्यजीत रे ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 24 Apr 2025 03:31:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Mark Twain Death Anniversary: अमेरिका के सबसे बड़े लेखक थे मार्क ट्वेन, कभी प्रिंटिंग प्रेस में करते थे काम</title>
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<description><![CDATA[ मार्क ट्वेन एक 19वीं सदी के अमेरिकी लेखक थे। आज ही के दिन यानी की 21 अप्रैल को मार्क ट्वेन का निधन हो गया था। मार्क ट्वेन की लघु कथाएं और उपन्यास में क्षेत्रीयवाद के उपयोग के लिए फेमस था। बता दें कि मार्क ट्वेन को &#039;अमेरिकी साहित्य का पिता&#039; कहा जाता है। कई साहित्य विशेषज्ञों की मानें, तो वह अमेरिकी साहित्य के सबसे महान हास्यकारों में से एक थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मार्क ट्वेन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातो के बारे में...जन्मअमेरिका के फ्लोरिडा में 30 सितंबर 1935 को मार्क ट्वेन का जन्म हुआ था। उनका मूल नाम सैमुअल लैंग हॉर्न क्लीमेंस था। वह एक बेहतरीन पत्रकार, हास्यकार, रिवर बोट चालक और बिजनेसमैन थे। उनके माता-पिता का नाम जॉन और जेन क्लेमेंस था। मार्क ट्वेन के जन्म के कुछ समय बाद उनका परिवार हैनिबल शहर चले गए थे। जोकि 1000 लोगों की आबादी वाला एक शहर है। जब ट्वेन महज 11 साल के थे, तो उनके पिता की मौत हो गई थी। जिसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। इसे भी पढ़ें: Jim Corbett Death Anniversary: फेमस शिकारी और पर्यावरणविद् थे जिम कॉर्बेट, कई बाघों और तेंदुओं का किया था शिकारअमेरिकी पश्चिम की यात्राजब ट्वेन 21 साल के थे तो उन्होंने मिसिसिपी नदी पर स्टीमबोट चलाना सीखना शुरू किया। फिर साल 1859 को वह एक लाइसेंस पाने वाले स्टीमबोट पायलट बन गए। उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद नदी के तटों और चैनलों में नौकायन करने के लिए एक नियमित नौकरी प्राप्त की। स्टीमबोट व्यवसाय में नुकसान के बाद साल 1861 में वह नेवादा क्षेत्र चले गए, जहां पर उनके भाई ओरियन गवर्नर थे। जल्द ही उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और वर्जीनिया सिटी के अखबार टेरिटोरियल एंटरप्राइज में एक लेखक के रूप में कार्य करना शुरू किया। यहीं इस लेखक की नौकरी में ट्वेन ने पहली बार अपने नाम का एक लेख लिखा था। कैलिफोर्निया में ट्वेन की मुलाकात ब्रेट हार्ट और आर्टेमस वार्ड जैसे लेखकों से हुई। जहां पर उन्होंने अपने अनूठी लेखन शैली के जरिए पश्चिम में बहुत लोकप्रियता हासिल की। रचनाएंबता दें कि मार्क ट्वेन अंग्रेजी साहित्य के सबसे उल्लेखनीय और प्रमुख लेखकों में से एक थे। वह अपने लेखन में हास्य और व्यंग्य के लिए जाने जाते थे। मार्क ट्वेन के अधिकतर लेखन कार्यों पर उनके बचपन का प्रभाव था। उनका लेखन गरीबी में होने वाले अत्याचारों और समस्याओं के इर्द-गिर्द है। उनकी एडवेंचर्स ऑफ टॉम शायर और उसकी सीक्वेल एडवेंचर्स ऑफ हकलबरी फिन सहित दर्जनों कृतियों ने ट्वेन को अमर बना दिया था।मृत्युवहीं 21 अप्रैल 1910 को 74 साल की आयु में मार्क ट्वेन की मृत्यु हो गई थी। ]]></description>
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<pubDate>Tue, 22 Apr 2025 03:31:07 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Jim Corbett Death Anniversary: फेमस शिकारी और पर्यावरणविद् थे जिम कॉर्बेट, कई बाघों और तेंदुओं का किया था शिकार</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 19 अप्रैल को आयरिश मूल के भारतीय लेखक व दार्शनिक जेम्स ए. जिम कार्बेट का निधन हो गया था। जिम कार्बेट ने मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष किया और संरक्षित वनों के आंदोलन की शुरूआत की थी। बता दें कि जिम कार्बेट एक शिकारी और महान व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। साल 1907 से लेकर 1938 के बीच उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाल दोनों जगह नरभक्षी बाघों व तेंदुओं के आतंक से निजात दिलाने का काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जेम्स ए. जिम कार्बेट के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तराखंड के नैनीताल में 25 जुलाई 1875 को एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट उर्फ जिम कॉर्बेट का जन्म हुआ था। वह एक फेमस शिकारी थे। जिम कार्बेट के पिता एक पोस्टमास्टर थे और महज 4 साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। जिसके बाद उनकी मां ने घर-परिवार की जिम्मेदारी निभाई। वहीं आर्थिक तंगी के कारण जिम कार्बेट ने रेलवे में नौकरी कर ली थी। लेकिन जिम कार्बेट का सफर इससे अलग था।बचपन से ही जिम कार्बेट को जंगलों से बहुत लगाव था और वह अपना अधिकतर समय जंगलों में बिताते थे। जिम कार्बेट ने जंगलों के बारे में बड़ी बारीक जानकारी हासिल की थी। वह कहते थे कि जंगलों की इतनी जानकारी किताबों से नहीं ली जा सकती है। इसके लिए जंगल को अपने भीतर समाना होगा। उनके कमाल के शिकार कौशल का श्रेय जिम कार्बेट के जंगल के प्रति प्रेम को देना गलत नहीं होगा।इसे भी पढ़ें: Albert Einstein Death Anniversary: सामान्य बच्चों से अलग था अल्बर्ट आइंस्टीन का बचपन, फिर पूरी दुनिया ने माना लोहाबाघों को उतारा था मौत के घाटजिम कार्बेट जंगलों को बहुत अच्छी तरह से समझने लगे थे और इसी वजह से उनकी शिकार करने की कला बेहतर हुई। जिम जानवरों के हमला करने के तरीकों को जान चुके थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में कुल 19 बाघ और 14 तेंदुओं का शिकार किया था। इसकी वजह से वह पूरी दुनिया में मशहूर शिकारियों में गिने जाते हैं। जिम ने सबसे पहले चंपावत बाघिन का शिकार किया था। इस बाघिन ने 436 लोगों को मौत के घाट उतारा था।बता दें कि जिम कार्बेट का जादू कुछ ऐसा था कि आज भी कुमाऊ और गढ़वाल क्षेत्र के लोगों में उनकी प्रसिद्धि बरकरार है। क्योंकि उस दौरान कुमाऊ और गढ़वाल में आदमखोर तेंदुओं और बाघों ने काफी उत्पात मचाया था। ऐसे में लोगों की रक्षा के लिए वहां की सरकार ने जिम कार्बेट को बुलावा भेजा। तब जिम ने कई तेंदुओं और बाघों का शिकार करके वहां के स्थानीय लोगों की रक्षा की। आजादी के बाद छोड़ा भारतवह न सिर्फ एक बेहतरीन शिकारी थे, बल्कि वह कमाल के लेखक भी थे। जिम कार्बेट ने अपने शिकार से जुड़े तमाम किस्से लोगों को सुनाते और उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं। इसके अलावा वह एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी थे। लेकिन आजादी के बाद जिम कार्बेट भारत छोड़कर केन्या चले गए थे और अपने जीवन के आखिरी समय तक वहीं रहे।मृत्युवहीं 19 अप्रैल 1955 को केन्या में एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट का निधन हो गया था। बता दें कि उनके नाम से जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का भी नामकरण किया गया है। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 21 Apr 2025 03:31:16 +0530</pubDate>
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<title>Albert Einstein Death Anniversary: सामान्य बच्चों से अलग था अल्बर्ट आइंस्टीन का बचपन, फिर पूरी दुनिया ने माना लोहा</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 18 अप्रैल को दुनिया के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का निधन हो गया था। हालांकि बचपन में आइंस्टीन की गिनती कमजोर बुद्धि वाले बच्चों में होती थी। लेकिन बाद में दुनिया उनके दिमाग का लोहा मानने लगी थी। तो वहीं एक समय ऐसा भी आया था, जब आइंस्टीन को स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से निकाले जाने के बाद अल्बर्ट आइंस्टीन ने कभी अपने जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।जन्म और शिक्षाजर्मनी में 14 अप्रैल 1879 को एक यहूदी इंजीनियर के घर पर अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म हुआ था। जन्म के करीब 4 सालों तक उन्होंने एक भी शब्द नहीं बोला था। वहीं जन्म के समय उनका सिर सामान्य बच्चों की तुलना में काफी बड़ा था। स्कूल में पढ़ाई के दौरान आइंस्टीन की गिनती बेवकूफ बच्चों में होती थी। वह सिर्फ गणित और विज्ञान में पास होते थे और अन्य सभी सब्जेक्ट्स में फेल हो जाते थे।इसे भी पढ़ें: Tatya Tope Death Anniversary: अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तात्या टोपे को दी गई थी फांसी की सजा, अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे छक्केएक बार अल्बर्ट की अध्यापिका ने उनको एक पत्र दिया था और कहा कि यह पत्र अपनी मां को देना। अल्बर्ट ने अपनी मां को यह पत्र दिया और पढ़कर मन ही मन मुस्कुराने लगी। तब अल्बर्ट ने पूछा कि इसमें क्या लिखा है, तो उनकी मां ने बताया कि पत्र में लिखा कि बच्चा पढ़ने में बहुत होशियार है और स्कूल में ऐसे टीचर नहीं है, जो आपके बच्चे को पढ़ा सकें। इसलिए आप अपने बच्चे का दूसरी जगह एडमिशन करा दें।जिसके बाद अल्बर्ट की मां ने उसका एडमिशन दूसरे स्कूल में करा दिया था। फिर अल्बर्ट में मन लगाकर पढ़ाई करना शुरूकर दिया। वह अपनी मेहनत के दम पर एक महान वैज्ञानिक बने और जब उनकी मां का निधन हो गया तो अल्बर्ट आइंस्टीन ने मां की अलमारी से वह पत्र निकालकर पढ़ा, जिसमें लिखा था कि आपका बेटा पढ़ाई में बहुत कमजोर है और जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ रही है, उसकी बुद्धि का विकास नहीं हो रहा है। इसलिए हम उसको अपने स्कूल से निकाल रहे हैं।अलबर्ट आइंस्टीन की मुख्य खोजेंबता दें कि अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक वैज्ञानिक के तौर पर कई खोज की थी। लेकिन अल्बर्ट को सबसे ज्यादा सापेक्षता के सिद्धांत के लिए जाना जाता है। उनके इस सिद्धांत ने दुनिया को देखने के तरीके में बहुत बदलाव किया। उन्होंने परमाणु बम और परमाणु ऊर्जा सहित कई आधुनिक अविष्कारों की नींव रखी। साल 1905 में आइंस्टीन की इस अवधारणा के साथ आए कि प्रकाश कणों से बना है। लेकिन इस अवधारणा से अधिकतर वैज्ञानिक सहमत नहीं थे। लेकिन बाद में हुए प्रयोगों ने इस मामलों को दिखाया। साल 1921 में अल्बर्ट आइंस्टीन को भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 19 Apr 2025 03:31:05 +0530</pubDate>
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<title>Tatya Tope Death Anniversary: अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तात्या टोपे को दी गई थी फांसी की सजा, अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे छक्के</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 18 अप्रैल को महान क्रांतिकारी तात्या टोपे की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ी जाने वाली पहली लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तात्या टोपे का नाम उन क्रांतिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह छेड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महान क्रांतिकारी तात्या टोपे की जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारतात्या टोपे का जन्म 16 फरवरी 1814 को एक मराठी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम रामचंद्र पाण्डुरंग राव था। लेकिन उनको लोग तात्या टोपे के नाम से जानते थे। साल 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ हुई क्रांति में तात्या टोपे का अहम योगदान रहा था।इसे भी पढ़ें: Sarvepalli Radhakrishnan Death Anniversary: देश के दूसरे राष्ट्रपति और महान दार्शनिक थे डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन1857 का विद्रोहजब 1857 के विद्रोह की लड़ाई उत्तर प्रदेश के कानपुर तक पहुंची तो नाना साहेब को नेता घोषित कर दिया गया। यहीं पर आजादी की लड़ाई में तात्या टोपे ने अपनी जान लगा दी थी। उन्होंने कई बार अंग्रेजों के खिलाफ कई बार लोहा लिया था। नाना साहेब ने तात्या टोपे को अपना सैनिक सलाहकार नियुक्त किया था। साल 1857 में बुंदेलखंड में ब्रिटिश शासकों के खिलाफ नाना साहेब पेशवा, तात्या टोपे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, अवध के नवाब और मुगल शासकों ने विद्रोह कर दिया था।हालांकि उस दौरान तात्या पेशवा की सेवा में लगे थे। लेकिन उनको कोई सैन्य नेतृत्व का अनुभव नहीं था। अपनी कोशिशों के कारण तात्या टोपे ने यह भी हासिल कर दिया था। साल 1857 के बाद वह अपने आखिरी समय तक लगातार युद्ध में लगे रहे या फिर यात्रा करते रहे। तात्या टोपे नाना साहेब के दोस्त, दीवान, प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख जैसे पदों पर रहे। साल 1857 के स्वाधीनता संग्राम के शुरूआती दिनों में तात्या की योजना काफी हद तक कामयाब रही थी।बता दें कि दिल्ली में 1857 के विद्रोह के बाद झांसी, लखनऊ और ग्वालियर जैसे साम्राज्य तो 1858 में स्वतंत्र हो गए। लेकिन झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को बाद में हार का सामना करना पड़ा। वहीं आजमगढ़, वाराणसी, इलाहाबाद, दिल्ली, कानपुर, फैजाबाद, बाराबंकी और गोंडा जैसे इलाके भी अंग्रेजों से मुक्त हो गए। इस दौरान तक तात्या टोपे ने नाना साहेब की सेना को मोर्चा संभाल रखा था। इसमें सैनिकों भर्ती, वेतन, प्रशासन और योजनाएं तात्या ही देख रहे थे।मृत्युभारत के कई हिस्सों में तात्या टोपे ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। लेकिन अंग्रेज सेना उनको पकड़ने में नाकाम रही। तकरीबन एक साल तक तात्या ने अंग्रेजों के साथ लंबी लड़ाई लड़ी। फिर 08 अप्रैल 1959 को अंग्रेजों ने तात्या टोपे को पकड़ लिया और 15 अप्रैल को उनको शिवपुरी में कोर्ट मार्शल किया गया। फिर 18 अप्रैल 1959 को तात्या टोपे को फांसी की सजा दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 19 Apr 2025 03:31:05 +0530</pubDate>
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<title>Chandrashekhar Birth Anniversary: राजनीति में युवा तुर्क के नाम से मशहूर थे पूर्व पीएम चंद्रशेखर, रोलर&#45;कोस्टर की तरह रहा सियासी सफर</title>
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<description><![CDATA[ युवा तुर्क के नाम से मशहूर पूर्व पीएम चंद्रशेखर का 17 अप्रैल को जन्म हुआ था। बता दें कि वह पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने सीधे प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि भारत के 8वें प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर का आधी शताब्दी का राजनीतिक जीवन रोलर-कोस्टर की तरह रहा। लेकिन वह कभी भी राजनीतिक अस्पृश्यता और असहिष्णुता के फेर में नहीं रहे। उनको राजनीति का अजातशत्र कहा जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के बलिया के इब्राहिमपट्टी में 17 अप्रैल 1927 चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। वह एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने सतीश चंद्र पीजी कॉलेज ग्रेजुएशन किया और फिर साल 1950 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से मास्टर्स किया। चंद्रशेखर को उनके गर्म स्वभाव और क्रांतिकारी विचारों के लिए जाना जाता था। वह समाजवाद के मजबूत स्तंभ आचार्य नरेंद्रदेव के शिष्य थे। छात्र जीवन से ही वह समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए थे। छात्र राजनीति में चंद्रशेखर की पहचान फायरब्रैंड नेता के रूप में होती थी।राजनीतिक सफऱबता दें कि चंद्रशेखर ने अपना राजनीतिक सफर राम मनोहर लोहिया के साथ शुरू किया था और बलिया उनकी कर्मभूमि रही। यहां से वह 8 बार सांसद रहे थे। वह एक ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने युवा साथियों के जरिए देश को समाजवादी दिशा में ले जाने का काम किया था। फिर वह जयप्रकाश नारायण के साथ आकर खड़े हो गए, जिसकी कीमत उनको जेल जाकर चुकानी पड़ी। हालांकि इसके बाद समाजवाद के प्रति उनकी धारण अधिक बढ़ गई।इसे भी पढ़ें: Abraham Lincoln Death Anniversary: अमेरिका के पहले रिपब्लिकन राष्ट्रपति थे अब्राहम लिंकन, संघर्षों में बीता था जीवनऐसे बने प्रधानमंत्रीतत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा में 400 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन राजीव गांधी की सरकार पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा, जिसके चलते साल 1989 के चुनावों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और जनता दल की सरकार सत्ता में आई। फिर एक साल के अंतराल पर भाजपा के समर्थन वापस लेने की वजह से वीपी सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। जिसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए और राजीव गांधी की जासूसी कराने के आरोप में 3 महीने बाद ही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। ऐसे में 21 जून 1991 को चंद्रशेखर को इस्तीफा देना पड़ा। भले ही उन्होंने 4 महीने के अंदर पीएम पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं इसके बाद देश में फिर से लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान हुआ। ऐसे में नई सरकार के बनने तक उन्होंने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर कामकाज संभाला। इस तरह से वह 8 महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे।मृत्युसीधे-सरल स्‍वभाव वाले चंद्रशेखर ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। हालांकि पीएम के रूप में उनका कार्यकाल काफी छोटा रहा। वहीं 08 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 18 Apr 2025 03:31:06 +0530</pubDate>
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<title>Benjamin Franklin Death Anniversary: अमेरिका के स्वतंत्रता आंदोलन में बेंजामिन फ्रैंकलिन ने निभाई थी अहम भूमिका, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 17 अप्रैल को लेखक, नागरिक नेता, आविष्कारक, राजनयिक और शीर्ष राजनीतिक विचारक बेंजामिन फ्रैंकलिन का निधन हो गया था। उनको देश के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक माना जाता है। अमेरिका उनके साहसी विद्युत प्रयोग के बारे में जानते हैं। बता दें कि उन्होंने बिजली के तूफान में पतंग उड़ाने के लिए अपने जीवन और अंगों को जोखिम में डाला था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बेंजामिन फ्रैंकलिन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारबोस्टन में 17 जनवरी 1706 को बेंजामिन फ्रैंकलिन का जन्म हुआ था। उन्होंने महज 10 साल की उम्र में स्कूल जाना छोड़ दिया था और अपने भाई के साथ 12 साल की उम्र में अपने भाई की प्रिंट शॉप में नौकरी करने लगे। फिर 17 साल की उम्र में उन्होंने काम छोड़ दिया और फिर वह पहले फिलाडेल्फिया, फिर लंदन और फिर वापस फिलाडेल्फिया पहुंचे। जहां पर उन्होंने एक प्रिंट शॉप खोली। उनको म्यूजिक का भी बहुत शौक था।आविष्कारसाल 1761 में बेंजामिन फ्रैंकलिन ने ग्लास हारमोनिका बनाया। इस म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट को गीले हाथों से रगड़ने पर इसमें से बहुत अच्छी ध्वनि निकलती थी। फ्रैंकलिन अपने इस आविष्कार के बारे में कहते थे कि उन्होंने अब तक जितने भी आविष्कार किए, उनमें से सबसे ज्यादा संतुष्टि उनको ग्लास हारमोनिका बनाकर हुई है।इसे भी पढ़ें: Pablo Picasso Death Anniversary: कला क्षेत्र के दिग्गज चित्रकार और मूर्तिकार थे पाब्लो पिकासो, 13 की उम्र में लगाई थी पहली प्रदर्शनीबोस्टन टी पार्टीबता दें कि अमेरिका को स्वतंत्रता दिलाने वाली अहम घटना मानी जाने वाली &#039;बोस्टन टी पार्टी&#039; पर फ्रैंकलिन का विचार था कि यह घटना नहीं घटनी चाहिए थी। उनका मानना था कि यह एक अमानवीय कार्य था, जिसके लिए ईस्ट इंडिया को हर्जाना देना चाहिए। हालांकि उनकी इस बात को सुनकर कई अमेरिकी देशभक्तों को ऐसा लगने लगता था कि बेंजामिन फ्रैंकलिन अमेरिका की स्वतंत्रता के लिए नहीं बल्कि ब्रिटेन के लिए काम कर रहे हैं।मृत्युअमेरिका की स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका अदा करने वाले वैज्ञानिक, लेखक और दार्शनिक बेंजामिन फ्रैंकलिन का 17 अप्रैल 1790 को निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 18 Apr 2025 03:31:05 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Sarvepalli Radhakrishnan Death Anniversary: देश के दूसरे राष्ट्रपति और महान दार्शनिक थे डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 17 अप्रैल को देश के पहले उपराष्ट्रपति और दार्शनिक डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन हो गया था। उन्होंने पूरी दुनिया को भारत के दर्शन शास्त्र से परिचय कराया था। वह देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। बता दें कि 10 सालों तक बतौर उपराष्ट्रपति जिम्मेदारी संभालने के बाद 13 मई 1962 को राधाकृष्णन को देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवारतत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के चित्तूर जिले के तिरुत्तनी गांव में 05 सितंबर 1888 को सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। वह एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीताम्मा था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति से पूरी की और फिर साल 1902 में उन्होंने मैट्रिक स्तर की परीक्षा पास की। फिर साल 1905 में उन्होंने कला संकाय की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। इसके बाद साल 1918 में राधाकृष्णन ने मैसूर महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र का सहायक प्रध्यापक नियुक्त किया गया।इसे भी पढ़ें: Chandrashekhar Birth Anniversary: राजनीति में युवा तुर्क के नाम से मशहूर थे पूर्व पीएम चंद्रशेखर, रोलर-कोस्टर की तरह रहा सियासी सफरबचपन में देखा था संघर्षसर्वपल्ली राधाकृष्णन बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। वह इतने गरीब थे कि उनको केले के पत्तों पर भोजन करना पड़ा था। एक बार उनके पास केले के पत्तों को खरीदने के पैसे नहीं थे। तब उन्होंने जमीन को साफ करने के बाद उस पर ही भोजन कर लिया था।राजनीतिबता दें कि साल 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले पीएम बनें। इस दौरान नेहरू ने डॉ. राधाकृष्णन से सोवियत संघ में राजदूत के तौर पर काम करने का अनुरोध किया। इस बात को मानते हुए सर्वपल्ली साल 1947 से 1949 तक संविधान संभा के सदस्य के रूप में काम किया। फिर साल 1952 तक वह रूस में भारत के राजदूत बनकर रहे। इसके बाद वह 13 मई 1952 को देश के पहले उपराष्ट्रपति बने। वहीं साल 1953 से लेकर 1962 तक वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रहे।मृत्युडॉ. राधाकृष्णन का 17 अप्रैल 1975 को निधन हो गया था। उनको एक आदर्श शिक्षक और दार्शनिक के रूप में जाना जाता है। वहीं साल 1975 में मरणोपरांत अमेरिका सरकार ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन को टेम्पल्टन पुरस्कार से सम्मानित किया था। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 18 Apr 2025 03:31:04 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Charlie Chaplin Birth Anniversary: कॉमेडी की दुनिया के बेताज बादशाह थे चार्ली चैपलिन, ऑस्कर से किया गया था सम्मानित</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 16 अप्रैल को शानदार अभिनेता और कॉमेडियन चार्ली चैपलिन का जन्म हुआ था। चार्ली चैपलिन का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। उनकी अदाकारी, बातों और लहजे हर एक अंदाज में लोगों को हंसाने की कला छिपी थी। भले ही उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों को हंसाने में निकाल दिया, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी किसी त्रासदी से कम नहीं रही। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर दिवंगत महान कलाकार चार्ली चैपलिन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारलंदन में 16 अप्रैल 1889 को चार्ली चैपलिन का जन्म हुआ था। बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद उनको अपनी मां के साथ आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। ऐसे में कम उम्र में ही चार्ली के ऊपर परिवार चलाने की जिम्मेदारी आ गई। चार्ली चैपलिन के पिता एक फेमस गायक और अभिनेता थे। तो वहीं उनकी मां हन्ना चैपलिन भी एक गायिकी और एक्ट्रेस थीं। माता-पिता के अभिनय जगत से होने के चलते चार्ली चैपलिन को एक्टिंग विरासत में मिली थी। वहीं 13 साल की उम्र में चार्ली की मां बीमार हो गईं, जिसके चलते उन्होंने छोटे-मोटे काम करना शुरूकर दिया।इसे भी पढ़ें: Pablo Picasso Death Anniversary: कला क्षेत्र के दिग्गज चित्रकार और मूर्तिकार थे पाब्लो पिकासो, 13 की उम्र में लगाई थी पहली प्रदर्शनीकॉमिक एक्टर और फिल्ममेकरबता दें कि 14 साल की उम्र में पहली बार चार्ली चैपलिन ने एक नाटक में कॉमिल रोल किया था। इस रोल को दर्शकों को काफी सराहा गया था। चार्ली ने कॉमिक एक्टर और फिल्ममेकर के तौर पर अपना करियर बनाया था। वह अपने पूरे जीवन में लोगों को हंसाते रहे, लेकिन अगर आप करीब से उनकी जिंदगी देखेंगे, तो यह त्रासदी नजर आती है। वह मूक फिल्म युग के सबसे रचनात्मक और प्रभावशाली व्यक्तित्व में से एक थे।चार्ली चैपलिन कला के हर क्षेत्र में माहिर थे, वह अपनी फिल्म में निर्देशन, पटकथा, अभिनय, निर्माण और संगीत खुद दिया था। साल 1940 में चार्ली चैपलिन ने तानाशाह हिटलर पर एक फिल्म बनाई थी। इस फिल्म का नाम &#039;द ग्रेट डिक्टेटर&#039; था। इस फिल्म में उन्होंने हिटलर का रोल निभाया था। वहीं फिल्म में चार्ली द्वारा हिटलर को कॉमिक कैरेक्टर के रूप में पेश दर्शकों को बहुत पसंद आया था। इस फिल्म के बाद उन्होंने एक के बाद एक कई सुपरहिट फिल्में दीं। साल 1973 में चार्ली चैपलिन को ऑस्कर से सम्मानित किया गया।मृत्युअपने शानदार अभिनय से लोगों को हंसाना वाले चार्ली चैपलिन का 25 दिसंबर 1977 में 88 साल की उम्र में निधन हो गया। आज भी मनोरंजन और ठहाकों का प्रतीक चार्ली चैपलिन को माना जाता है। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 17 Apr 2025 03:31:08 +0530</pubDate>
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<title>Guru Arjun Dev Birth Anniversary: सिख धर्म में गुरु अर्जुन देव से शुरू हुई थी बलिदान की परंपरा, स्वर्ण मंदिर की रखवाई थी नींव</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 अप्रैल को सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव का जन्म हुआ था। गुरु परंपरा का पालन करते हुए गुरु अर्जन देव जी कभी भी गलत चीजों के आगे नहीं झुके। वह हमेशा शरणागतों की रक्षा के लिए खड़े रहे और स्वयं का बलिदान देना भी स्वीकार किया। गुरु अर्जुन देव के समकालीन मुगल शासक जहांगीर था। गुरु अर्जुन देव कभी मुगल शासक जहांगीर के आगे नहीं झुके और वह हमेशा मानव सेवा के पक्षधर रहे। गुरु अर्जुन देव से ही सिख धर्म में बलिदान की परंपरा का आगाज हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अर्जुन देव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपंजाब के गोइंदवाल में 15 अप्रैल 1563 को गुरु अर्जुन देव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गुरु रामदास और मां का नाम बीवी भानी था। गुरु रामदास स्वयं चौथे सिख गुरु थे और उनके नाना गुरु अमरदास भी सिखों के तीसरे गुरु थे। ऐसे में गुरु अर्जुन देव का बचपन गुरु की देखरेख में बीता। गुरु अर्जुन देव को गुरु अमरदास ने गुरुमुखी की शिक्षा दी। साल 1579 में उनका विवाह मां गंगा देवी जी के साथ हुआ था। उनके बेटे का नाम हरगोविंद सिंह था, जोकि बाद में सिखों के छठवें गुरु बने थे।इसे भी पढ़ें: Chhatrapati Shivaji Death Anniversary: छत्रपति शिवाजी ने रखी थी &#039;स्वराज&#039; की नींव, कहे जाते थे नौसेना के जनकस्वर्ण मंदिर की नींव साल 1581 में गुरु अर्जुन देव सिखों के 5वें गुरु बने थे। गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर में श्री हरमंदिर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी, जिसको आज गोल्डन टेंपल यानी की स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि गुरुद्वारे का नक्शा खुद अर्जुन देव जी ने बनाया था।गुरु ग्रंथ साहिब का संपादनगुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन भाई गुरदास के सहयोग से किया था। गुरु अर्जुन देव ने रागों के आधार पर गुरु वाणियों का वर्गीकरण भी किया था। बता दें कि गुरु ग्रंथ साहिब में स्वयं गुरु अर्जुन देव के हजारों शब्द हैं।बलिदान गाथाबता दें कि मुगल बादशाह अकबर की मौत के बाद 1605 में जहांगीर अगला मुगल शासक बना। जहांगीर के सम्राज्य संभालते ही गुरु अर्जुन देव के भी विरोधी सक्रिय हो गए। विरोधी जहांगीर को अर्जुन देव जी के खिलाफ भड़काने लगे। इसी बीच शहजादा खुसरो ने अपने पिता जहांगीर के खिलाफ विद्रोह कर दिया, जिसके बाद जहांगीर अपने बेटे की जन के पीछे पड़ गया तो वह भागकर पंजाब चला गया और गुरु अर्जन देव जी ने उसका स्वागत किया और उसको अपने यहां शरण दी।जब इस बात की जानकारी जहांगीर को हुई तो वह गुरु अर्जुन देव पर भड़क गया। ऐसे में जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। जिसके बाद गुरु अर्जुन देव ने बाल हरिगोबिंद साहिब को गुरुगद्दी सौंप दी और वह खुद लाहौर पहुंच गए। जहां पर उन पर बगावत करने का आरोप लगा और जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को यातना देकर मारने का आदेश दे दिया।मृत्युबता दें कि मुगल शासक जहांगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन देव को पांच दिनों तक तमाम तरह की यातनाएं दी गईं। लेकिन उन्होंने शांत मन से सब सहा। फिर ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को 30 मई 1606 को गुरु अर्जुन देव को लाहौर में भीषण गर्मी के दौरान गर्म तवे पर बिठाया। इसके बाद उनके ऊपर गर्म तेल और रेत डाली गई। यातना की वजह से जब वह मूर्छित हो गए तो उनके शरीर को रावी नदी की धारा में बहा दिया गया। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 16 Apr 2025 03:31:00 +0530</pubDate>
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<title>Abraham Lincoln Death Anniversary: अमेरिका के पहले रिपब्लिकन राष्ट्रपति थे अब्राहम लिंकन, संघर्षों में बीता था जीवन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 15 अप्रैल को अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को वॉशिंगटन में गोली मारकर हत्याकर दी थी। वह पहले रिपब्लिकन थे, जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे। अब्राहम लिंकन का बचपन संघर्षों में बीता था। वहीं उनको अमेरिका के राष्ट्रपति के पद तक पहुंचने के लिए बहुत ही संघर्षों को सामना करना पड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारअमेरिका के हार्डिन काउंटी, केंटकी में 12 अप्रैल 1809 को अब्राहम लिंकन का जन्म हुआ था। इनका बचपन आसान नहीं रहा, जब वह 10 साल के थे तो उनकी मां की मृत्यु हो गई। जिसके बाद वह अपने पिता के साथ केंटकी से इंडियाना आ गए। लिंकन ने पढ़ाई करने के लिए फर्म में काम करना शुरू किया, दीवारों में बाड़ लगाई और इलिनोइस के स्टोर में भी काम किया। बताया जाता है कि उनको पढ़ने का इतना शौक था कि वह रोड में लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ते थे।इसे भी पढ़ें: Morarji Desai Death Anniversary: लंबे समय तक PM पद के दावेदार रहे मोरारजी देसाई, फिर ऐसे बनें भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्रीराजनीति में प्रवेशशुरूआती संघर्षों के बाद अब्राहम लिंकन वकील के रूप में काम करने लगे और फिर बाद में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। साल 1858 में उन्होंने सीनेटर के लिए स्टीफन ए डगलस के खिलाफ चुनाव लड़ा, जिसमें उनको हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इस चुनाव में हार मिलने के बाद भी वह पूरे देश में फेमस हो गए। जिसका फायदा यह हुआ कि 1860 में उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन नामांकन जीता।फिर 1860 में वह पहले रिपब्लिकन थे, जो अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बने थे। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को एक मजबूत राष्ट्रीय संगठन बनाया। फिर 01 जनवरी 1863 को लिंकन ने मुक्ति की उद्घोषणा जारी की, इस उद्घोषणा में गुलामों को हमेशा के लिए आजाद करने का ऐलान किया गया था। इसके बाद 04 मार्च 1864 में दोबारा फिर से अब्राहम लिंकन को अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया।मृत्युगृह युद्ध के खत्म होने पर 14 अप्रैल गुड फ्राइडे को एक समारोह रखा गया था। इस समारोह में शिरकत के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन वाशिंगटन डीसी के फोर्ड थिएटर में पहुंचे। यहां पर एक्टर जॉन विल्कीस बूथ ने अब्राहम लिंकन को गोली मार दी गई। जिसके बाद आनन-फानन अब्राहम लिंकन को हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां पर 15 अप्रैल 1865 को अब्राहम लिंकन की मृत्यु हो गई। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 16 Apr 2025 03:30:59 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
<media:keywords>Abraham, Lincoln, Death, Anniversary:, अमेरिका, के, पहले, रिपब्लिकन, राष्ट्रपति, थे, अब्राहम, लिंकन, संघर्षों, में, बीता, था, जीवन</media:keywords>
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<title>Anandi Gopal Joshi Birth Anniversary: 19 साल की उम्र में एमडी की डिग्री हासिल कर आनंदी गोपाल जोशी बनीं थी भारत की पहली महिला डॉक्टर</title>
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<description><![CDATA[ 19वीं सदी का समय भारत के लिए बहुत सारे बदलावों का दौर माना जाता है। इस दौर में बहुत सारे समाज सुधारक आंदोलन हुए और इसमें नारी शिक्षा और विधवा विवाह जैसे कार्यों को प्रोत्साहित किया गया। जिस दौर में लड़कियों का शिक्षित होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। उस समय देश की एक लड़की ने अनोखी कहानी लिख दी। आनंदी गोपाल जोशी ने उस दौर में डॉक्टर बन लड़कियों और महिलाओं को प्रेरित करने का काम किया था। बता दें कि आज ही के दिन यानी की 31 मार्च को भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदी गोपाल जोशी का जन्म हुआ था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर आनंदी गोपाल जोशी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारपुणे में 31 मार्च 1865 को आनंदी गोपाल जोशी का जन्म हुआ था। उस दौरान उनकी उम्र सिर्फ 9 साल की थी, जब आनंदी की शादी हो गई थी। इनके पति गोपालराव उनसे उम्र में 16 साल बड़े थे। वहीं महज 14 साल की उम्र में आनंदी एक बच्चे की मां बन गईं। लेकिन महज 10 दिन के अंदर बच्चे की बीमारी की वजह से मौत हो गई। इसके बाद आनंदी गोपाल जोशी ने निश्चय किया कि वह किसी भी बच्चे को बीमारी से मरने नहीं देंगी।इसे भी पढ़ें: Mahadevi Varma Birth Anniversary: छायावादी युग की महान कवियत्री थीं महादेवी वर्मा, बनना चाहती थी बौद्ध भिक्षुणीपति ने शिक्षा के लिए किया प्रोत्साहितआनंदी गोपाल जोशी को शिक्षित करने के लिए पति गोपालराव ने बहुत सपोर्ट किया। उन्होंने अपनी पत्नी आनंदी को पढ़ाई के लिए मिशनरी स्कूल भेजा और साल 1980 में गोपालराव ने अमेरिका के मिशनरी को लेटर भेजकर अमेरिका में डॉक्टरी की पढ़ाई की जानकारी हासिल की। परिवार वालों और समाज की असहमति के बाद भी आनंदी गोपाल जोशी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। वहीं अपने सारे गहने बेचकर पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया।एमडी की डिग्रीबता दें कि महज 19 साल की उम्र में आनंदी गोपाल जोशी ने एमडी की डिग्री हासिल कर ली थी। वह पहली भारतीय महिला थीं, जिनको यह डिग्री मिली थी। भारत लौटने के बाद वह कोल्हापुर रियासत के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल के महिला वार्ड में डॉक्टर इन-चार्ज की पोस्ट पर काम करने लगीं। हालांकि डॉक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान आनंदी गोपाल जोशी टीबी का शिकार हो गईं।मृत्युवहीं 26 फरवरी 1887 को आनंदी गोपाल जोशी का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:45 +0530</pubDate>
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<media:keywords>Anandi, Gopal, Joshi, Birth, Anniversary:, साल, की, उम्र, में, एमडी, की, डिग्री, हासिल, कर, आनंदी, गोपाल, जोशी, बनीं, थी, भारत, की, पहली, महिला, डॉक्टर</media:keywords>
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<title>Bhagat Singh Death Anniversary: शहीद ए आजम भगत सिंह को 23 मार्च को दी गई थी फांसी, मौत को बताया था अपनी दुल्हन</title>
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<description><![CDATA[ भारत के वीर सपूतों ने 23 मार्च को देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया था। हर देश प्रेमी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का नाम तो हर कोई जानता है। आज ही के दिन यानी की 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी दी गई थी। भगत सिंह को लाहौर षड़यंत्र के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई थी। दरअसल, भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर 08 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर आजादी के नारे लगाए थे। इस दौरान भगत सिंह वहां से भागे नहीं बल्कि बम फेंकने के बाद उन्होंने खुद को गिरफ्तार करवा दिया और इस दौरान उनको दो साल की सजा हुई थी।जन्म और परिवारपाकिस्तान के लायलपुर जिले के बंगा में 27 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जिसकी पांच पीढ़ियों में क्रांति की ज्वाला का उद्घोष किया था। भगत सिंह अपने चाचा अजीत सिंह से बहुत प्रभावित थे और उनके चाचा भी भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रिय थे।इसे भी पढ़ें: Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का सपना देखते थे राम मनोहर लोहियादो साल की कैदभगत सिंह जेल में करीब दो साल रहे और इस दौरान वह क्रांतिकारी लेख लिखा करते थे। इन लेखों में वह अपने विचारों को व्यक्त करते थे। भगत सिंह के लेखों में अंग्रेजी के अलावा पूंजीपतियों के नाम भी शामिल थे। पूंजीपतियों को भगत सिंह अपना और अपने देश को दुश्मन मानते थे। अपने एक लेख में भगत सिंह ने लिखा था कि मजदूरों का शोषण करने वाला उनका शत्रु है, फिर चाहे वह कोई भारतीय ही क्यों न हो।जेल में भी जारी था विरोधभगत सिंह बहुत बुद्धिमान थे और साथ ही कई भाषाओं के भी जानकार थे। उन्होंने अपना जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया था। भगत सिंह को हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, बांग्ला और उर्दू आती थी। वह भारतीय समाज में लिपि, जाति और धर्म के कारण आई दूरियों पर अपने लेखों में चिंता और दुख व्यक्त किया करते थे।मृत्युबता दें कि दो साल की कैद के बाद 24 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी जानी थी और उन्हीं के साथ सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी होनी थी। लेकिन देश में उनकी फांसी को लेकर लोग काफी भड़क गए थे। भारतीयों का आक्रोश और विरोध देखकर अंग्रेज सरकार काफी डर गई थी। ऐसे में ब्रिटिश हुकूमत को लग रहा था कि फांसी वाले दिन भारतीयों का आक्रोश फूट पड़ा तो माहौल बिगड़ सकता है। इसलिए भगत सिंह को तय समय और डेट से 11 घंटे पहले 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:45 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का सपना देखते थे राम मनोहर लोहिया</title>
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<description><![CDATA[ देश के महानायक और समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया का 23 मार्च को जन्म हुआ था। वह एक ऐसे चिंतक और नेता थे, जिन्होंने अपना जन्मदिन शहादत दिवस के लिए मनाना छोड़ दिया था। लोहिया एक ऐसे समाज की स्थापना का सपना देखते थे, जिमें शोषण, भेदभाव, असमानता और किसी प्रकार का अप्राकृतिक या अमानवीय विभेद न हो। वह एक समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का सपना देखते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ राम मनोहर लोहिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाउत्तर प्रदेश के जनपद अंबेडकर नगर में 23 मार्च 1910 को राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। साल 1925 में 15 साल की उम्र में वह पढ़ाई के लिए बीएचयू के सीएचएस से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की थी। यहीं से उनके किशोर मन में स्वतंत्रता और स्वदेशी आंदोलन का ऐसा असर हुआ कि इसी उम्र में उनको खादी भा गई, जोकि ताउम्र उनके बदन से लिपटी रही।इसे भी पढ़ें: Kanshi Ram Birth Anniversary: राजनीति के अजातशत्रु कहे जाते थे कांशीराम, दलित उत्थान के लिए समर्पित किया पूरा जीवनबदलाव की बयार आजादीदेश की राजनीति में भावी बदलाव की बयार राम मनोहर लोहिया ने आजादी से पहले पहले ही ला दी थी। वहीं उनके पिता गांधीजी के अनुयायी थे। वहीं अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्‍वी समाजवादी विचारों की वजह से कम समय में ही डॉ राम मनोहर लोहिया ने अपने विरोधियों और समर्थकों के बीच सम्मान हासिल कर लिया था। स्वतंत्रता के बाद लोहिया उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया था।भारत के स्वतंत्रता युद्ध के आखिरी दौर में डॉ राम मनोहर लोहिया ने अहम भूमिका निभाई थी। वह भारतीय राजनीति के अकेले ऐसे नेता थे, जिनके पास एक सुविचारित सिद्धांत था। बता दें कि वह भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद के शिल्पी थे। यह लोहिया के अथक प्रयासों का फल था कि साल 1967 में कई राज्यों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। उनके द्वारा चलाई गई गैर कांग्रेसवाद की विचारधारा की वजह से आगे चलकर साल 1977 में पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी।बता दें कि डॉ लोहिया ने अपने पूरे जीवन में कभी भी राजनीतिक लाभ उठाने के लिए अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया था। साल 1967 में वह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे। लोहिया ने कन्नौज सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इस दौरान लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हो रहे थे। वहीं इससे पहले साल 1967 में लोहिया फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से उपचुनाव में जीत हासिल कर पहली बार सांसद बने थे।मृत्युअपने अंतिम समय में डॉ राम मनोहर लोहिया मधुमेह से पीड़ित थे और उनको उच्च रक्तचाप की भी समस्या थी। वहीं 12 अक्तूबर 1967 को 57 साल की उम्र में उनका नई दिल्ली में निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:45 +0530</pubDate>
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<title>Sam Manekshaw Birth Anniversary: भारत के पहले फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने पाकिस्तान को चटाई थी धूल, ऐसे सेना में हुए थे भर्ती</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 03 अप्रैल को भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम सैम होरमूजजी फ्रांमजी जमशेदजी मानेकशॉ था। मानेकशॉ के नेतृत्व में भारत ने साल 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में जीत हासिल की थी। उन्होंने अपनी वीरता, नेतृत्व और सैन्य रणनीति से भारत को गौरवान्वित किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षापंजाब के अमृतसर में 03 अप्रैल 1914 को एक पारसी परिवार में सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा अमृतसर से पूरी की और फिर उन्होंने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में एडमिशन लिया। इसके बाद वह देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए। यहां से ही मानेकशॉ कमीशन पाकर भारतीय सेना में भर्ती हुए।इसे भी पढ़ें: Chhatrapati Shivaji Death Anniversary: छत्रपति शिवाजी ने रखी थी &#039;स्वराज&#039; की नींव, कहे जाते थे नौसेना के जनककरियरसैम बहादुर के नाम से मशहूर सैम मानेकशॉ ने 07 जून 1969 को भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया। जिसके बाद दिसंबर 1971 में उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ था। देशप्रेम व देश के प्रति निस्वार्थ सेवा के चलते सैम मानेकशॉ को साल 1972 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। वहीं साल 1973 में मानेकशॉ को फील्ड मार्शल का पद दिया गया था। बता दें कि इसी साल सैम मॉनेकशा रिटायर हो गए थे।मृत्युबता दें कि सैम मानेकशॉ देश के एकमात्र ऐसे सेनाधिकारी थे, जो अपनी रिटायरमेंट से पहले पांच सितारा रैंक तक पहुंच गए थे। वहीं अंत में उनको फेफड़े संबंधी रोग हो गया था। वहीं 27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य हॉस्पिटक में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:44 +0530</pubDate>
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<title>K B Hedgewar Birth Anniversary: बचपन से ही क्रांतिकारी स्वभाव थे के बी हेडगेवार, ऐसे खड़ा किया था दुनिया का सबसे बड़ा संगठन</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 01 अप्रैल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखने वाले डॉ केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। देश की आजादी के संघर्ष के दौरान हेडगेवार पहले कांग्रेस में शामिल हुए। फिर कांग्रेस पदाधिकारी के तौर पर उनकी गिरफ्तारी भी हुई। लेकिन जल्द ही कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारनागपुर में एक ब्राह्मण परिवार में 01 अप्रैल 1889 को केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही क्रांतिकारी स्वभाव के थे और उनको अंग्रेजी हुकूमत से नफरत थी। ऐसे में उनमें देश प्रेम-भाव उत्पन्न होने में समय नहीं लगा। आप के बी हेडगेवार की अपने समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि उन्होंने इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के 60 साल के पूरे होने पर बांटी गई मिठाई को स्वीकार नहीं किया था।इसे भी पढ़ें: Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व कर दिया था बलिदान, जानिए रोचक बातेंRSS की स्थापनाबता दें कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के सपने के साथ राष्ट्री स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई थी। डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के मन में हिन्दुवादी संगठन बनाने का विचार आया था। हेडगेवार ने  नागपुर में 17 लोगों की बैठक में सबसे पहले आरएसएस की स्थापना का विचार रखा था। इस बैठक में डॉ हेडगेवार के अलावा भाऊजी कावरे, अण्णा साहने, विश्वनाथ केलकर, बाला ही हुद्दार एवं बापूराव भेदी जैसे प्रमुख लोग शामिल हुए थे।डॉ हेडगेवार बने पहले सरसंघचालक25 सितंबर 1925 का बने हिन्दुवादी संगठन को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानि RSS का नाम 17 अप्रैल 1926 को मिला था। इस दौरान डॉ हेडगेवार को RSS का पहला सरसंघचालक चुना गया था। साल 1925 में अस्तित्व में आया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वर्तमान समय में दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।मृत्युडॉ हेडगेवार का मानना था कि हिंदुओं को एक धागे में पिरो कर एक ताकतवर समूह के रूप में विकसित करना ही संगठन का प्राथमिक काम है। वहीं 21 जून 1940 को डॉ हेडगेवार का निधन हो गया था। वहीं उनकी मृत्यु के बाद सरसंघचालक की जिम्मेदारी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर को सौंप दी गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:44 +0530</pubDate>
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<title>Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व कर दिया था बलिदान, जानिए रोचक बातें</title>
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<description><![CDATA[ गुरु तेग बहादुर एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे और वह 9वें सिख गुरु थे। गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। गुरु तेग बहादुर को &#039;हिंद की चादर&#039; कहा जाता था। इसका अर्थ &#039;भारत की ढाल&#039; होता है। बता दें कि इंसानियत के कल्याण के लिए गुरु तेग बहादुर ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु तेग बहादुर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्मपंजाब के अमृतसर नगर में 01 अप्रैल 1621 को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। उनके पिता सिखों के छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद जी थे। बता दें कि 8वें गुरु हरकिशन की असमय मृत्यु के बाद गुरु तेग बहादुर को 9वां गुरु बनाया गया था। धर्म और मानवीय मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांत की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर ने कभी समझौता नहीं किया। उनके बचपन का नाम त्यागमल था और वह बचपन से ही उदार, संत स्वरूप, बहादुर और निर्भीक स्वभाव के थे। इसे भी पढ़ें: Lord Rishabhdev Birth Anniversary: ऋषभदेव हैं सभ्यता और संस्कृति के पुरोधा पुरुषउन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ घुड़सवारी आदि की भी शिक्षा प्राप्त की थी। महज 14 साल की उम्र में गुरु तेग बहादुर ने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया था। उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी की तलवार के धनी रख दिया।मुगल के नापाक इरादों को किया नाकामयाबगुरु तेग बहादुर जहां भी गए, लोगों ने उनसे प्रेरित होकर न सिर्फ नशे का त्याग किया बल्कि तंबाकू की खेती भी छोड़ दी। उन्होंने देश को दुष्टों के चुंगल से छुड़ाने के लिए जनमानस में विरोध की भावना भरकर कुर्बानियों के लिए तैयार किया। गुरु तेग बहादुर के समकालीन मुगल बादशाह औरंगजेब था। उसकी छवि कट्टर बादशाह के रूप में थी। औरंगजेब के शासनकाल में हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। इसका सबसे ज्यादा शिकार कश्मीरी पंडित हो रहे थे। तब औरंगजेब से परेशान होकर कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल गुरु तेग बहादुर साहिब की शरण में सहायता के लिए पहुंचा। तब गुरु तेज बहादुर ने कश्मीरी पंडितों को उनके धर्म की रक्षा का आश्वासन दिया। जिसके बाद गुरु तेग बहादुर ने खुले स्वर में औरंगजेब का विरोध किया और कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली। उनके इस कदम से औरंगजेब गुस्से से भर गया और उसने इसको गुरु तेग बहादुर की खुली चुनौती मान ली।औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को किया कैदसाल 1675 में गुरु तेग बहादुर अपने 5 सिखों के साथ आनंदपुर से दिल्ली के लिए चल पड़े। इस दौरान औरंगजेब ने उनको रास्ते में ही पकड़ लिया और 3-4 महीनों तक कैद में रखा और तमाम अत्याचार किए। औरंगजेब गुरु तेग बहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर किया। दरअसल, औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर के सामने 3 शर्तें रखी थीं। जिसमें से पहली कलमा पढ़कर मुसलमान बनने की, चमत्कार दिखाने की या फिर मौत स्वीकार करने की। तब गुरु तेग बहादुर ने धर्म बदलने और चमत्कार दिखाने से मना कर दिया।मृत्युदिल्ली के चांदनी चौक में 24 नवंबर 1675 को जल्लाद जलालदीन ने तलवार से गुरु तेग बहादुर का शीश धड़ से अलग कर दिया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:44 +0530</pubDate>
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<title>Isaac Newton Death Anniversary: भौतिकी और गणित में न्यूटन ने दिया था विशेष योगदान, रहस्यमई तरीके से हुई थी मौत</title>
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<description><![CDATA[ इसाक न्यूटन अपने समय के बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने दुनिया को कई ऐसी वैज्ञानिक धारणाएं दी थीं, जो उस दौर में लोगों के लिए कल्पना से भी परे थीं। न्यूटन की तर्कशक्ति और कल्पनाशक्ति के बड़े-बड़े लोग कायल थे। लेकिन अंतिम दिनों में न्यूटन के जीवन में काफी कुछ बदल गया था। न्यूटन की शख्सियत पहले से ही मिलनसार नहीं थी और उनके कई उस दौर के वैज्ञानिकों से विवाद भी थे। न्यूटन एक गणितज्ञ, भौतिकविद, खगोलविद के साथ महान वैज्ञानिक भी थे। न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण और गति के नियमों के लिए जाना जाता है। बता दें कि आज ही के दिन यानी की 31 मार्च को आइजैक न्यूटन का निधन हो गया था।एक महान वैज्ञानिकबता दें कि न्यूटन अपने समय के सबसे महान वैज्ञानिक माने जाते थे। वह भौतिकविद, खगोलविद, गणितज्ञ, धर्म और एक अल्केमिस्ट के तौर पर मशहूर थे। न्यूटन ने भौतिकी और गणित में अपना विशेष योगदान दिया था। न्यूटन के कैल्कुलस के सिद्धांत ने गणित को नया आधार देने का काम किया था। वर्तमान समय में कैल्कुलस के बिना इंजीनियरिंग की कल्पना करना ही संभव नहीं है।इसे भी पढ़ें: Kalpana Chawla Birth Anniversary: कल्पना चावला ने दो बार स्पेस यात्रा कर बढ़ाया था भारत का मानन्यूटन के विवादन्यूटन का लेबिनिट्ज के साथ यह विवाद रहा था कि सबसे पहले कैल्क्यूलस का आविष्कार किसने किया था। वहीं विज्ञान का मानना है कि दोनों ने स्वतंत्र रूप से यह काम किया था। लेकिन अंग्रेजी के व्यापक होने की वजह से न्यूटन को इसकी स्वीकृति पहले मिली थी। विज्ञान में न्यूटन का योगदानइसके अलावा न्यूटन का भौतिकी में भी बड़ा योगदान था। उन्होंने गुरुत्व और गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत देते हुए भौतिकी के शास्त्रीय सिद्धांत की नींव रखी थी। न्यूटन ने पृथ्वी की सही आकार बताया, प्रतिबिम्ब आधारित पहला टेलीस्कोप बनाया, ग्रहों की चाल की बेहतर व्याख्या की और प्रिज्म के जरिए प्रकाशीय रंगों का अध्ययन किया। इसके साथ ही न्यूटन ने कूलिंग का नियम, ध्वनि की गति की गणना और न्यूटन का द्रव्य की अवधारणा जैसे कई अहम योगदान दिए।मौतन्यूटन की मौत 31 मार्च 1727 में हुई थी। बताया जाता है कि उनकी मौत सोते हुए हो गई थी और मृत्यु के बाद न्यूटन की शरीर में बहुत सारा पारा मिला था। क्योंकि पारे का अल्केमी से गहरा नाता बताया जाता है। इसलिए उनकी मौत को अल्केमी से भी जोड़ने की कोशिश की गई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:44 +0530</pubDate>
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<title>Bankim Chandra Chatterjee Death Anniversary: बंकिम चंद्र चटर्जी ने 19वीं सदी में शुरू किया था सांस्कृतिक जागरुकता की शुरूआत</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 08 अप्रैल को प्रसिद्ध लेखक, कवि और पत्रकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का निधन हो गया था। उनको बंगाली भाषा के साहित्य का सम्राट कहा जाता है। हालांकि वह भारतीय राष्ट्रवाद के शुरुआती समर्थकों में शामिल थे और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाएं स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा देती थीं। वहीं उनकी सबसे फेमस रचना वंदे मातरम् आजादी की लड़ाई का नारा बन गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाबंगाल स्थित कंथालपाड़ा में 26 जून 1838 को बंकिमचंद्र चटर्जी का जन्म हुआ था। बंकिम ने बंगाली और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने फिर कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की और फिर ब्रिटिश शासन के दौरान नौकरी की। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाएं भारतीय संस्कृति और सोच को उजागर करती हैं।  इसे भी पढ़ें: Pablo Picasso Death Anniversary: कला क्षेत्र के दिग्गज चित्रकार और मूर्तिकार थे पाब्लो पिकासो, 13 की उम्र में लगाई थी पहली प्रदर्शनीवंदे मातरम् गीतबता दें कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ का एक गीत &#039;वंदे मातरम&#039; है। बाद में राष्ट्रीय गौरव के परिदृश्यों और भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए यह राष्ट्रगान बन गया। साल 1870 में बंकिम ने &#039;वंदे मातरम&#039; लिखा था। आनंदमठ बंकिमचंद्र का सबसे लोकप्रिय उपन्यास है। महज 27 साल की उम्र में उन्होंने दुर्गेशनंदिनी उपन्यास लिखा था। बंकिम ने भारतीय साहित्य और समाज को एक नई दिशा देने का काम किया था। उन्होंने 19वीं सदी में भारत में सांस्कृतिक जागरुकता की शुरूआत की थी।मृत्युवहीं 08 अप्रैल 1894 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का निधन हो गया था।  ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:43 +0530</pubDate>
<dc:creator>PNS</dc:creator>
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<title>Pablo Picasso Death Anniversary: कला क्षेत्र के दिग्गज चित्रकार और मूर्तिकार थे पाब्लो पिकासो, 13 की उम्र में लगाई थी पहली प्रदर्शनी</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन 08 अप्रैल को दुनिया के सबसे प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक पाब्लो पिकासो का निधन हो गया था। उन्होंने अपने वयस्क जीवन के दौरान लगभग 50,000 कृतियां बनाईं थीं। वह एक स्पेनिश चित्रकार और मूर्तिकार थे। बता दें कि पिकासो की मृत्यु से कला जगत में एक युग का अंत हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर चित्रकार और मूर्तिकार पाब्लो पिकासो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्मस्पेन में 25 अक्तूबर 1881 को पाब्लो पिकासो का जन्म हुआ था। इनके पिता एक पेंटर के रूप में काम किया करते थे। ऐसे में यह उम्मीद थी कि पिकासो के खून में भी यह कला होगी। साल 1892 में उन्होंने मालागा स्कूल ऑफ आर्ट लिया। वहीं स्कूली शिक्षा के अलावा वह अपने खाली समय में पेंटिंग और ड्राइंग बनाया करते थे।इसे भी पढ़ें: Pandit Ravi Shankar Birth Anniversary: विश्व संगीत के गॉडफादर कहे जाते थे पंडित रविशंकर, अंतिम सांस तक नहीं छूटा सितार से नातापिता से सीखी चित्रकारीपाब्लो पिकासो के पिता पक्षियों की प्राकृतिक चित्रकारी करने में सिद्धहस्त थे। उन्होंने महज 7 साल की उम्र से चित्रकारी सिखनी शुरूकर दी थी। पिकासो के पिता ने खुद यह तय किया कि जब उनके बेटे 14 साल के हो जाएंगे, तो वह घोषणा करके पेंटिंग छोड़ देंगे। जिससे कि उनका बेटा उनसे भी बेहतर पेंटर बने। फिर 13 साल की उम्र में उनके पिता ने पाब्लो पिकासो को फाइन आर्ट स्कूल भेज दिया।हुई थी गिरफ्तारीबता दें कि साल 1911 में अंतरराष्ट्रीय कला की दुनिया में एक सबसे बड़ा स्कैंडल सामने आया। जब लियोनार्डो द विंसी की पेंटिंग मोनालिसा चोरी हो गई थी। इस चोरी के बाद जब पुलिस ने एक चोर पकड़ा तो उसने फ्रांस के एक जाने-माने साहित्यकार की ओर इशारा किया, जिसको वह चोरी का सामान बेचता था। पुलिस पूछताछ में चोर ने दावा किया कि पिकासो इस चोरी के लिए जिम्मेदार है। इस तरह पुलिस ने संदिग्ध तौर पर पुलिस को हिरासत में लिया लिया। हालांकि बाद में चोरी के आरोप में एक सुरक्षा गार्ड को गिरफ्तार किया गया था।लड़की से प्रभावित होकर बना दी पेंटिंगपाब्लो पिकासो के दौरान पेरिस कला और संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था और वहां पर कई फेमस चित्रकार रहते थे। वहीं पर पिकासो भी अपनी चित्रकारी से गुजर-बसर कर रहे थे। एक दिन पिकासो खाली बैठे थे, तभी गर्ट्रूड स्टाइन नाम की एक लड़की पिकासो के पास आई और उनसे ढेरों सवाल पूछें और पेंटिंग के गुर भी सीखे। इस लड़की से प्रभावित होकर पिकासो ने फौरन एक शानदार पेंटिंग बनाकर उसको गिफ्ट कर दी।बाद में जब अमेरिकी कला संग्रहकर्ता अल्बर्ट बान ने गर्ट्रूड से पिकासो की उस पेंटिंग की कीमत पूछी तो पता चला कि वह पेंटिंग पिकासो ने उपहार में दी है। तो अल्बर्ट को यकीन नहीं हुई। हालांकि उस पेंटिंग पर पिकासो के साइन और उनके लिखे संदेश ने अल्बर्ट को यकीन करने पर मजबूर कर दिया। पिकासो ने अपना सारा जीवन पेंटिंग को समर्पित कर दिया था और करीब डेढ़ लाख से ज्यादा कलाकृतियां बनाईं। हालांकि उनकी सबसे ज्यादा पेंटिंग चोरी होने का रिकॉर्ड भी है।मृत्युवहीं 08 अप्रैल 1973 को 91 साल की उम्र में पाब्लो पिकासो का निधन हो गया। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:43 +0530</pubDate>
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<title>Pandit Ravi Shankar Birth Anniversary: विश्व संगीत के गॉडफादर कहे जाते थे पंडित रविशंकर, अंतिम सांस तक नहीं छूटा सितार से नाता</title>
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<description><![CDATA[ शास्त्रीय संगीत की बात हो तो सितार वादक पंडित रविशंकर का जिक्र न हो, ऐसा तो नहीं हो सकता है। आज ही के दिन यानी की 07 अप्रैल को पंडित रविशंकर का जन्म हुआ था। पंडित रविशंकर को विश्व संगीत का गॉडफादर कहा जाता था। उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय शास्त्रीय संगीत को अलग पहचान दिलाई। वहीं रविशंकर ने अपनी पूरी जिंदगी सितार के नाम कर दी थी। वहीं उन्होंने अपने आखिरी समय तक सितार को खुद से दूर नहीं होने दिया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित रविशंकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश के वाराणसी में 07 अप्रैल 1920 को पंडित रविशंकर का जन्म हुआ था। उनका असली नाम रविंद्र शंकर चौधरी था। रविशंकर ने धमार, ध्रुपद और ख्याल के साथ-साथ रूद्र वीणा, रुबाब और सुरसिंगार जैसे संगीत शैलियों का अध्ययन किया। उन्होंने मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खान से दीक्षा ली। फिर साल 1939 में रविशंकर ने अपना सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन शुरू किया।इसे भी पढ़ें: Suchitra Sen Birth Anniversary: अपने उसूलों की खातिर ठुकरा दिया था दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड, ऐसा था सुचित्रा सेन का फिल्मी सफरऐसे शुरू हुआ ये सफरउन्होंने संगीत की शुरूआत सरोद वादक अली अकबर खान के साथ जुगलबंदी के साथ की। फिर 25 साल की उम्र में पंडित रविशंकर ने लोकप्रिय गीत &#039;सरे जहां से अच्छा&#039; को फिर से संगीतबद्ध किया। उन्होंने पूरी दुनिया में संगीत का प्रदर्शन किया। वहीं पंडित रविशंकर का संगीत देश की सरहदों का कभी मोहताज नहीं रहा। भारत के अलावा विदेशों में भी रविशंकर के संगीत को खास अहमियत दी गई थी। विश्व संगीत जगत में दिए जाने वाले सबसे प्रसिद्ध अवॉर्ड &#039;ग्रेमी&#039; को तीन बार अपने नाम किया।इसके अलावा पंडित रविशंकर ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी अपनी सेवा दी। साल 1949 से 1956 में उन्होंने आकाशवाणी के लिए म्यूजिक डायरेक्शन भी किया। वहीं संसद में भी संगीतकार रविशंकर ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। वह साल 1986 से लेकर 1992 तक राज्यसभा के सांसद रहे। वहीं साल 1999 में उनको देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था।मृत्युवहीं अमेरिका के सैन डिएगो के एक अस्पताल में 12 दिसंबर 2012 में पंडित रविशंकर का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:43 +0530</pubDate>
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<title>Morarji Desai Death Anniversary: लंबे समय तक PM पद के दावेदार रहे मोरारजी देसाई, फिर ऐसे बनें भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री</title>
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<description><![CDATA[ भारतीय राजनीतिज्ञ और पूर्व पीएम मोरारजी देसाई का 10 अप्रैल को निधन हो गया था। उन्होंने साल 1977 से लेकर 1979 तक भारत के चौथे प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य किया था। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी अपना योगदान दिया था। मोरारजी देसाई को उनकी गांधीवादी सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता के लिए भी जाना जात है। वह ऐसे पीएम थे, जिन्होंने देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया था। वहीं कांग्रेस में रहते हुए वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने इंदिरा गांधी को &#039;गूंगी गुड़िया&#039; तक कह दिया था। आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम मोरारजी देसाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षागुजरात के भदेली नामक स्थान पर 29 फरवरी 1896 को मोरारजी देसाई का जन्म हुआ था। वह ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम रणछोड़जी देसाई था, जोकि एक अध्यापक थे। वहीं उनकी मां का नाम वीजाबाई था। मोरारजी देसाई ने सेंट बुसर हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की। फिर साल 1918 में उन्होंने बंबई प्रांत के विल्सन सिविल सेवा से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और 12 सालों तक वह डिप्टी कलेक्टर के तौर पर कार्य किया।इसे भी पढ़ें: Bankim Chandra Chatterjee Death Anniversary: बंकिम चंद्र चटर्जी ने 19वीं सदी में शुरू किया था सांस्कृतिक जागरुकता की शुरूआतराजनीतिक सफरसाल 1931 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में शामिल हो गए। साल 1931 से 1937 तक वह गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिन थे। साल 1937 में तत्कालीन बॉम्बे प्रांत के मुख्यमंत्री बी.जी. खेर ने मोरारजी को राजस्व, कृषि, वानिकी और सहकारिता मंत्री नियुक्त किया। फिर 1957 से 1980 तक वह लोकसभा के सदस्य के तौर पर सूरत निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। फिर साल 1956 में मोरारजी देसाई को वाणिज्य और उद्योग मंत्री बनाया गया और साल 1967 में वह इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में उप-प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्रालय के प्रभारी मंत्री के तौर पर शामिल हुए।हालांकि साल 1969 में इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय वापस ले लिया। लेकिन इससे मोरारजी देसाई के आत्म सम्मान को ठेस पहुंची, क्योंकि इंदिरा गांधी ने उनसे परामर्श कर शिष्टाचार नहीं दिखाया। ऐसे में उनको लगा कि उप-प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है।भारत के प्रधानमंत्रीबता दें कि राजनीतिक गतिविधियों की वजह से साल 1975 से लेकर 1977 तक मोरारजी देसाई को एकान्त कारावास में रखा गया। फिर उन्होंने जनता पार्टी में हिस्सा लेना शुरूकर दिया। वहीं 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी ने एक अप्रत्याशित चुनाव जीता। वहीं जनता पार्टी के नेताओं ने पीएम के तौर पर मोरारजी देसाई को चुना और इस तरह से उन्होंने साल 1977 में भारत के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।भारत के प्रधानमंत्री के रूप में वह चाहते थे कि देश के लोगों को इस हद तक निडर बनाया जाए कि यदि देश में कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी सर्वोच्च पद पर आसानी व्यक्ति की गलती बता सके कि उसने क्या गलत किया है। वहीं दो साल की राजनीतिक अशांति और जनता पार्टी के अंदर की कलह और विभाजन के बाद उन्होंने अविश्वास मत को टालने के लिए 15 जुलाई 1979 में पीएम पद से इस्तीफा दे दिया।मृत्युवहीं 10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में मोरारजी देसाई का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:56:42 +0530</pubDate>
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<title>Lord Rishabhdev Birth Anniversary: ऋषभदेव हैं सभ्यता और संस्कृति के पुरोधा पुरुष</title>
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<description><![CDATA[ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ यानी भगवान ऋषभदेव विश्व संस्कृति के आदि पुरुष, आदि संस्कृति निर्माता थे। वे प्रथम सम्राट और प्रथम धर्मतीर्थ के आद्य प्रणेता थे। उनकी निर्मल जीवनगाथा हजारों वर्षों से जनजीवन को प्रेरणा प्रदान करती रही है। जैन, बौद्ध और वैदिक परम्परा में ही नहीं, विश्व की अन्य संस्कृतियों में भी उनकी यशोगाथा गायी गई है। भगवान ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति में असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प रूपी जीवनशैली दी, आज हमारा जीवन उसी पर आधारित है। इन छह कर्मों के द्वारा उन्होंने जहां समाज को विकास का मार्ग सुझाया, वहीं अहिंसा, संयम और तप के उपदेश द्वारा समाज की आंतरिक चेतना को जगाया। उनकी जन्म जयन्ती कोरा आयोजनात्मक माध्यम न होकर एक प्रयोजनात्मक उपक्रम है, जिसमें हम भारतीय संस्कृति को दिये उनके योगदान को स्मरण करते हुए अपने जीवन को आदर्श बना सकते हैं।भगवान ऋषभदेव वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है-जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर यानी जन्म मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदत्त करें। ऋषभदेव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है। वे भगवान विष्णु के अवतार थे। जन-जन की आस्था के केन्द्र तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव का जन्म चैत्र कृष्ण नवमी को अयोध्या में हुआ। उन्होंने मनुष्य जाति को नया जीवन दर्शन दिया। जीने की शैली सिखलाई। वे जानते थे कि नहीं जानना बुरा नहीं मगर गलत जानना, गलत आचरण करना बुरा है। इसलिए उन्होंने सही और गलत को देखने, समझने, परखने की विवेकी आंख दी जिसे सम्यक् दृष्टि कहा जा सकता है। यह वह समय था जब भोगभूमि का काल पूर्ण होकर कर्मभूमि का काल प्रारंभ हो गया था। भोगभूमि में दस कल्पवृक्ष होते थे जो मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे। मनुष्य को कोई काम नहीं करना पड़ता था। धीरे-धीरे काल के प्रभाव से यह कल्पवृक्ष लुप्त होते गए और मनुष्य के सामने भूख प्यास, गर्मी सर्दी और बीमारियों की समस्याएं आने लगी। प्रजा अपने राजा नाभिराय के पास गई और उपाय पूछा तो राजा ने प्रजा को युवराज ऋषभ के पास भेज दिया। युवराज ऋषभ ने संसारी रहते हुए प्रजाजनों को शस्त्र, लेखनी, विद्या, व्यापार, खेती एवं शिल्प इन छह कार्यों को करना सिखलाया। उन्होंने जनता को इन छह कार्य के द्वारा आजीविका पैदा करने के उपदेश दिए। इसीलिए वे युगकर्ता, सृष्टि के पालनहार और सृष्टि के ब्रह्मा कहलाए। इस रचना के द्वारा ऋषभदेव ने प्रजा का पालन किया। इसलिए उन्हें प्रजापति भी कहा गया। इसे भी पढ़ें: Ramakrishna Paramahamsa Birth Anniversary: रामकृष्ण के पहले आध्यात्मिक अनुभव ने बदल दी गदाधर की जिंदगी, मां काली के हुए थे दर्शनमहाराज नाभि के यहां ऋषभ रूपी दिव्य बालक का जन्म हुआ। उसके चरणों में वज्र, अंकुश आदि के चिन्ह जन्म के समय ही दिखाई दिये। बालक के अनुपम सौन्दर्य को जिसने भी देखा वह मोहित हो गया। बालक के जन्म के साथ महाराज नाभि के राज्य में सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सुख-शांति एवं वैभवता परिव्याप्त हो गयी। नाभि के राज्य में अतुल ऐश्वर्य को देखकर इन्द्र को ईर्ष्या हुई। उन्होंने इनके राज्य में वर्षा बंद कर दी। भगवान ऋषभदेव ने अपनी योगमाया के प्रभाव से इन्द्र के प्रयत्न को निष्फल कर दिया। इन्द्र ने अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। ऋषभ के सौ पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम भरत था। उसी के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ। ऋषभ ने पुत्रों को मोक्षधर्म का अति सुंदर उपदेश दिया। तदनन्तर ऋषभ अपने बड़े पुत्र भरत को राज्यभार सौंपकर दिगम्बर वेष में वन को चले गये। ऋषभ जब शासक बने, अनूठा थी उनकी शासन-व्यवस्था। क्योंकि उनके लिये सत्ता से ऊंचा समाज एवं मानवता का हित सर्वाेपरि था। उन्होंने कानून कायदे बनाए। सुरक्षा की व्यवस्था की। संविधान निर्मित किए। नियमों का अतिक्रमण करने वालों के लिए दण्ड संहिता भी तैयार की। सचमुच वह भी कैसा युग था। न लोग बुरे थे, न विचार बुरे थे और न कर्म बुरे थे। राजा और प्रजा के बीच विश्वास जुड़ा था। बाद में जब कभी बदलते परिवेश, पर्यावरण, परिस्थिति और वैयक्तिक विकास के कारण व्यवस्था में रुकावट आई, कहीं कुछ गलत हुआ, मनुष्य का मन बदला तो उस गलत कर्म के लिए इतना कह देना ही बड़ा दण्ड माना जाता कि ‘हाय! तूने यह क्या किया?’ ‘ऐसा आगे मत करना’, ‘धिक्कार है तूने ऐसा किया।’ ये हाकार, माकार और धिक्कार नीतियां अपराधों का नियमन करती रहीं। आज की तरह उस समय ऐसा नहीं था कि अपराधों के सच्चे गवाह और सच्चे सबूत मिल जाने के बाद भी अदालत उसे कटघरे में खड़ा कर अपराधी सिद्ध न कर सके। निर्दाेष व्यक्ति न्याय पाने के लिए दर-दर भटके और अपराधी धड़ल्ले से शान-शौकत के साथ ऐशो आराम करे।सत्ता के नाम पर युद्ध तो सदियों में होते रहे हैं मगर ऋषभ के राज वैभव छोड़कर संन्यस्त बन जाने के बाद सिंहासन के लिए भाई-भाई भरत बाहुबली में जो संघर्ष हुआ वह ऐतिहासिक प्रसंग भी आज के संदर्भ में एक सीख है। आज भी सत्ता और स्वार्थ का संघर्ष चलता है। सब लड़ते हैं पर देश के हित में कम, अपने हित में ज्यादा। लेकिन न तो आज ऋषभ के 98 पुत्रों की तरह समस्या के समाधान पाने की जिज्ञासा है कि हम किसको मुख्य मानकर उनसे अंतिम समाधान मांगे और न ही कोई ऐसा ऋषभ है जो अंतहीन समस्याओं के बीच सबको सामयिक संबोध दे। राज्य प्राप्ति के प्रश्न पर जब भरत बाहुबली के बीच अहं और आकांक्षा आ खड़ी हुई तो ऋषभ ने शस्त्र युद्ध को नकारा और आत्मयुद्ध की प्रेरणा दी, क्योंकि स्वयं को जीत लेना ही जीवन की सच्ची जीत है।भगवान ऋषभदेव को सभ्यता और संस्कृति की विकास यात्रा का प्रणेता माना जाता है, उनका अवतरण आदिम युग का परिष्कारक बना। वे पुरुषार्थ चतुष्टयी के पुरोधा थे। अर्थ और काम संसार की अनिवार्यता है तो धर्म और मोक्ष जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुंचाने वाले सही रास्ते। उन्होंने प्रयोगधर्मा ऋषि बनकर जगत् की भूमिका पर जीवन के बिखराव की व्यवस्था दी तो अध्यात्म के परिप्रेक्ष्य में धर्म की जीवंतता प्रस्तुत की। समाज व्यव ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:52 +0530</pubDate>
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<title>Mahadevi Varma Birth Anniversary: छायावादी युग की महान कवियत्री थीं महादेवी वर्मा, बनना चाहती थी बौद्ध भिक्षुणी</title>
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<description><![CDATA[ हिंदी कवियत्री महादेवी वर्मा सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की वह रोशनी थीं, जिसने अपनी कविताओं से असंख्य दिलों को छुआ था। महादेवी वर्मा को प्यार से &#039;आधुनिक युग की मीरा&#039; कहा जाता है। क्योंकि महादेवी वर्मा की कविताओं में पीड़ा, प्रेम और आध्यात्मिकता की वही गहराई झलकती है, जोकि मीरा की भक्ति में थी। आज ही के दिन यानी की 26 मार्च को कवियत्री महादेवी वर्मा का जन्म हुआ था। हिंदी साहित्य में निराला, प्रसाद और पंत के साथ साथ महादेवी वर्मा को छायावाद युग का एक महान स्तंभ माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महादेवी वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षाउत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में 26 मार्च 1907 को महादेवी वर्मा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा था, जोकि एक प्रगतिशील विचारधारा के थे और मां का नाम हेमरानी देवी था। जोकि काफी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। ऐसे में उनका बचपन साहित्य और संस्कारों की छांव में बीता था। इसलिए महादेवी वर्मा के मन में बचपन से ही शब्दों की महक बस गई थी। उन्होंने इंदौर के मिशन स्कूल से पढ़ाई की और यहां पर उन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत, संगीत और चित्रकला सीखी। लेकिन महादेवी वर्मा के मन को साहित्य का संसार सबसे ज्यादा भाया।इसे भी पढ़ें: Avantibai Lodhi Death Anniversary: वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने अंग्रेजों की चूलें हिला कर रख दी थीछायावाद की आत्माबता दें कि महादेवी छायावादी युग की उन स्तंभों में शामिल थीं, जिन्होंने हिंदी कविता को नई आत्मा दी थी। उनके शब्द सिर्फ भावनाओं की अभिव्यक्ति तक ही नहीं बल्कि वेदना, प्रेम और विरह का स्पंदन था। महादेवी वर्मा की रचनाएं सिर्फ प्रेम और पीड़ा तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने स्त्री स्वाधीनता और आध्यात्मिकता को भी अपने लेखन में उतारा था। महादेवी वर्मा ने अपने समय की महिलाओं की स्थिति पर भी गंभीरता से लिखा था।जीवनभर पहने सफेद वस्त्रमहादेवी वर्मा महात्मा बुद्ध के विचारों से काफी ज्यादा प्रभावित थीं। उनका मानना था कि जीवन दुख का मूल है। वहीं यह उनकी कविताओं में भी बार-बार दिखाई देता है। हालांकि उनकी जिंदगी में एक ऐसा भी आया, जब उन्होंने घर-गृहस्थी छोड़ संन्यासी बनने का मन बना लिया था। लेकिन तभी उनकी मुलाकात गांधीजी से हुई और उन्होंने महादेवी को साहित्य साधना जारी रखने की सलाह दी। उनकी सलाह मानकर वह रुकी और हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। साल 1966 में पति के निधन के बाद वह स्थाई रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं। महादेवी वर्मा ने जीवनभर सफेद साड़ी पहनी और तख्त पर सोईं। इसके साथ ही उन्होंने शीशा नहीं देखा था।मृत्युवहीं 11 सितंबर 1987 को महादेवी वर्मा ने इलाहाबाद में अंतिम सांस ली। वहीं साहित्य प्रेमियों के दिलों में आज भी उनके शब्द और संवेदनाएं जीवित हैं। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:51 +0530</pubDate>
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<title>Sheila Dixit Birth Anniversary: शीला दीक्षित ने ससुर से सीखे थे राजनीति के दांव&#45;पेंच, 3 बार बनीं दिल्ली की सीएम</title>
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<description><![CDATA[ पंजाब की बेटी और यूपी की बहु कही जाने वाली शीला दीक्षित का 31 मार्च को जन्म हुआ था। शीला दीक्षित तीन बार दिल्ली की सत्ता संभाल चुकी थीं। वह कांग्रेस की दिग्गज नेताओं में शामिल थीं। शीला दीक्षित का राजनीतिक सफर जितना ज्यादा शानदार रहा, उतनी ही उनकी निजी जिंदगी भी रोचक थी। शीला दीक्षित ने अपने ससुर से राजनीति के दांव-पेंच सीखे थे। कई राजनीतित उपलब्धियों को अपने नाम करने वाली शीला दीक्षित कांग्रेस नेताओं की टीम का एक बड़ा नाम बन गईं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर शीला दीक्षित के जीवन से जुड़े कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और शिक्षापंजाब के कपूरथला में 31 मार्च 1938 को शीला दीक्षित का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई दिल्ली से पूरी की। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा कॉन्वेंट आफ जीसस एंड मैरी स्कूल से पूरी की थी। फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से कला में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की और फिर बाद में पीएचडी किया।इसे भी पढ़ें: Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का सपना देखते थे राम मनोहर लोहियाप्रेम विवाहपूर्व राज्यपाल व केंद्रीय मंत्री रहे उमा शंकर दीक्षित के बेटे विनोद दीक्षित से शीला दीक्षित का प्रेम विवाह किया था। दरअसल, शीला और विनोद एक ही क्लास में पढ़ते थे। इस दौरान दोनों को प्यार हो गया था। लेकिन अंतरजातीय विवाह की अड़चन की वजह से ठंडी पड़ गई। कॉलेज के बाद विनोद प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की और शीला एक स्कूल में पढ़ाने लगी। इसी बीच विनोद ने अपने पिता से शीला को मिलवाया। उमाशंकर दीक्षित को शीला बहुत पसंद आईं। विनोद और शीला ने दो साल इंतजार किया और फिर परिवार की रजामंदी से शादी की।राजनीतिक सफरशादी के बाद शीला दीक्षित ने अपने ससुर के लिए काम करना शुरूकर दिया था। उस दौरान उमाशंकर दीक्षित इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री बने और शीला अपने ससुर की कानूनी सहायता किया करती थीं। जब इंदिरा गांधी को शीला दीक्षित के बारे में पता चला तो उन्होंने संयुक्त राष्ट्र कमिशन के दल के सदस्य के तौर पर शीला को नामित किया। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं का प्रतिनिधित्व करना था। यही से शीला दीक्षित के राजनीतिक सफर की शुरूआत हुई थी। साल 1970 में शीला दीक्षित युवा महिला मोर्चा की अध्यक्ष बनीं। फिर साल 1984 से 1989 वह कन्नौज सीट से लोकसभा सदस्य बनीं।उपलब्धियांशीला दीक्षित ने केंद्रीय मंत्री के पद पर भी काम किया। उन्होंने दो पीएमओ में राज्यमंत्री संसदीय कार्य मंत्रालय का कार्यभार संभाला। वहीं साल 1990 में शीला दीक्षित ने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार को लेकर आंदोलन किया। फिर साल 1998 में वह पहली बार दिल्ली की सीएम बनीं और लगातार 3 बार वह इस पद पर बनी रहीं। वहीं साल 2014 में शीला दीक्षित को केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया। लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया।मृत्युवहीं हृदय संबंधी रोगों के चलते 20 जुलाई 2019 को 81 साल की उम्र में शीला दीक्षित का निधन हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:50 +0530</pubDate>
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<title>Meena Kumari Death Anniversary: &amp;apos;ट्रेजडी क्वीन&amp;apos; बनकर मीना कुमारी ने इंडस्ट्री पर किया राज, ऐसा रहा फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री मीना कुमारी ने भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाई। अपने शानदार अभिनय की वजह से मीना कुमारी ने हिंदी सिनेमा ने एक खास मुकाम हासिल किया था। फिल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी को &#039;ट्रेजडी क्वीन&#039; के नाम से जाना जाता था। क्योंकि उनका फिल्मी करियर जितना ज्यादा शानदार था, उनकी पर्सनल लाइफ उतनी ही दुख भरी थी। मीना कुमारी ने बाल कलाकार के तौर पर इंडस्ट्री में कदम रखा था। वह भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन और उम्दा अभिनेत्रियों में से एक थीं। उन्होंने अपने 33 साल के फिल्मी करियर में करीब 90 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारमुंबई में 01 अगस्त 1933 को मीना कुमारी का जन्म हुआ था। उनका असली नाम महजबीं बानो था। महज 4 साल की उम्र में मीना कुमारी ने &#039;लेदरफेस&#039; से बाल कलाकार के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। मीना कुमारी के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, जिसकी वजह से उनको कम उम्र से ही काम करना शुरूकर दिया था। एक्ट्रेस की मासूमियत और अभिनय की काबिलियत ने जल्द की लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और धीरे-धीरे वह बड़ी फिल्मों का हिस्सा बनने लगीं।इसे भी पढ़ें: Sahir Ludhianvi Birth Anniversary: साहिर लुधियानवी की शायरी में झलकता है अधूरी मोहब्बत का दर्द, तन्हा बीती जिंदगीचार बार जीता फिल्मफेयर अवॉर्ड50-60 के दशक में मीना कुमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे बड़ी और फेमस अभिनेत्री बन गई थीं। साल 1952 में अभिनेत्री मीना कुमारी को फिल्म बैजू बावरा से बड़ी कामयाबी मिली थी। इसके बाद एक्ट्रेस ने &#039;परिणीता&#039;, &#039;साहिब बीबी और गुलाम&#039;, &#039;दिल अपना और प्रीत पराई&#039; और &#039;काजल&#039; जैसी फिल्मों से दर्शकों का दिल जीत लिया। मीना कुमारी की आंखों और आवाज से दर्द बयां करने की कला बेमिसाल थी। मीना कुमारी के करियर की फिल्म &#039;पाकीजा&#039; उनकी फिल्मी करियर की सबसे बड़ी और यादगार फिल्म मानी जाती है। फिल्म पाकीजा में मीना कुमारी का किरदार आज भी लोगों के जहन में ताजा है। मीना कुमारी ने तीन बार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता।शराब की लत ने छीनी जिंदगीएक्ट्रेस मीना कुमारी का जीवन सुखद नहीं रहा। पति कमाल अमरोही से अलगाव और निजी जिंदगी से परेशान होकर उन्होंने शराब पीना शुरूकर दिया। उनकी यह आदत सेहत के लिए काफी खतरनाक साबित हुई। वहीं 31 मार्च 1972 को महज 38 साल की उम्र में मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। उनकी मौत लिवर सिरोसिस की वजह से हुई। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:50 +0530</pubDate>
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<title>Chhatrapati Shivaji Death Anniversary: छत्रपति शिवाजी ने रखी थी &amp;apos;स्वराज&amp;apos; की नींव, कहे जाते थे नौसेना के जनक</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन यानी की 03 अप्रैल को मराठा साम्राज्य के संस्थापक और भारत के महान राजा छत्रपति शिवाजीराजे भोसले का निधन हो गया था। गंभीर बुखार के चलते 03 अप्रैल 1680 को शिवाजी महाराज की मृत्यु हो गई थी। छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के सबसे महान योद्धाओं और कुशल प्रशासकों में से एक थे। शिवाजी महाराज का जीवन लोगों के लिए प्रेरणादायक है और वह अपनी नीतियों के लिए भी जाने जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजीसाल 1674 में शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। उन्होंने अपना रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया था। शिवाजी ने हिंदवी स्वराज्य की संकल्पना को साकार किया था। इसके साथ ही उन्होंने निजामशाही, मुगलों और आदिलशादी जैसे शक्तियों के साथ संघर्ष कर स्वतंत्र राज्य की नींव रखी थी।नौसेना के जनक थे शिवाजीशिवाजी महाराज ने भारतीय समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक शक्तिशाली नौसेना का गठन किया था। इसके लिए उन्होंने कई अहम किलों को समुद्री तटों पर बनवाया और विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा की। इसलिए शिवाजी महाराज को भारतीय नौसेना का जनक भी कहा जाता था।इसे भी पढ़ें: K B Hedgewar Birth Anniversary: बचपन से ही क्रांतिकारी स्वभाव थे के बी हेडगेवार, ऐसे खड़ा किया था दुनिया का सबसे बड़ा संगठनशिवाजी सभी धर्मों का करते थे सम्मानछत्रपति शिवाजी महाराज सभी धर्मों का सम्मान करते थे और कभी भी जबरन धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपने शासन काल में हिंदू और मुस्लिम दोनों को उच्च पदों पर नियुक्त किया था। वह एक धर्मनिरपेक्ष और न्यायप्रिय शासक थे।गुरिल्ला युद्ध के जनकछत्रपति शिवाजी महाराज छापामार युद्ध यानी गुरिल्ला युद्धनीति में निपुण थे। उन्होंने अपनी इस शक्तिशाली युद्धनीति से मुगलों और अन्य शत्रुओं को कई बार हराया था। शिवाजी महाराज ने दुर्गों का रणनीतिक रूप से उपयोग किया और तेजी से हमले कर दुश्मनों को चौंका देते थे।कर व्यवस्थाबता दें कि शिवाजी महाराज ने एक संगठित प्रशासन प्रणाली बनाई थी, इस प्रणाली में अष्टप्रधान मंडल शामिल थी। शिवाजी ने कर व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के साथ जनता के हित में नीतियां लागू की थीं। इन नीतियों से मराठा साम्राज्य एक सशक्त और स्थिर राज्य बना। छत्रपति शिवाजी महाराज सिर्फ एक महान योद्धा नहीं बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक और कुशल रणनीतिकार थे।  ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:49 +0530</pubDate>
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<title>Nizamuddin Auliya Death Anniversary: निजामुद्दीन औलिया को कहा जाता था दिलों का हकीम, जानिए अनसुनी बातें</title>
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<description><![CDATA[ भारत के सबसे प्रसिद्ध सूफी संतों में से एक रहे सैयद मुहम्मद निज़ामुद्दीन औलिया का 03 अप्रैल को निधन हो गया था। उनको हजरत निज़ामुद्दीन और महबूब-ए-इलाही के नाम से भी जाना जाता है। वह एक सुन्नी मुस्लिम विद्वान और चिश्ती सूफी संत थे। निजामुद्दीन औलिया भी अन्य सूफी संतों की तरह अल्लाह को महसूस करने के लिए प्रेम पर जोर दिया करते थे। निजामुद्दीन औलिया का मानना था कि अल्लाह से प्रेम में मानवता का प्रेम निहित है। उनका प्रभाव सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर के मुसलमानों पर था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर निजामुद्दीन औलिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारउत्तर प्रदेश में 1238 को निजामुद्दीन औलिया का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सैयद अब्दुल्ला बिन अहमद अल हुसैनी बदायुनी और मां का नाम बीबी जुलेखा था। बताया जाता है कि जब निजामु्द्दीन औलिया 5 साल के थे, तो उनके पिता की मौत हो गई थी। वहीं 21 साल की उम्र में निजामुद्दीन सूफी संत फरीदुद्दीन गंजशकर के शिष्य बन गए। बता दें कि सूफी संत फरीदुद्दीन गंजशकर को बाबा फरीद के नाम से जाना जाता था। वहीं निजामुद्दीन उनके शिष्य अजोधन गए थे। जब तक बाबा फरीद जिंदा रहे, वह हर साल रमजान के पाक महीने में अजोधन जाया करते थे।इसे भी पढ़ें: Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व कर दिया था बलिदान, जानिए रोचक बातेंबाबा फरीद के उत्तराधिकारीबता दें कि जब तीसरी बार निजामुद्दीन औलिया अजोधन गए, तो बाबा फरीद ने उनको अपना उत्तराधिकारी बना दिया। लेकिन उनकी यात्रा के फौरन बाद निजामुद्दीन को खबर मिली कि बाबा फरीद की मृत्यु हो गई है। निजामुद्दीन औलिया दिल्ली में कई स्थानों पर रहे और अंत में वह यूपी के गियासपुर में बस गए। निजामुद्दीन ने अपना खानकाह बनाया, जिसमें अमीर और गरीब सभी तरह के लोगों की भीड़ रहती थी।मृत्युनिजामुद्दीन औलिया के कुछ शिष्य थे, जिनमें शेख नसीरुद्दीन चिराग डेलहवी और अमीर खुसरो भी शामिल हैं। बता दें कि 03 अप्रैल 1325 में निजामुद्दीन औलिया ने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है। इस दरगाह पर हर रोज तीर्थयात्रियों की भीड़ रहती है, वहीं शाम के समय यहां पर लोग कव्वाली सुनने भी आते हैं। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:49 +0530</pubDate>
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<title>Suchitra Sen Birth Anniversary: अपने उसूलों की खातिर ठुकरा दिया था दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड, ऐसा था सुचित्रा सेन का फिल्मी सफर</title>
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<description><![CDATA[ आज ही के दिन 06 अप्रैल को हिंदी सिनेमा की महानायिका का दर्जा पाने वाली एक्ट्रेस सुचित्रा सेन का जन्म हुआ था। सुचित्रा सेन ने बंगाली सिनेमा के साथ-साथ हिंदी सिनेमा में भी अपनी अलग पहचान बनाई थी। लेकिन महज 48 साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों से संन्यास ले लिया था।हिंदी सिनेमा की महानायिका का दर्जा पाने वाली एक्ट्रेस सुचित्रा सेन का आज ही के दिन 06 अप्रैल को जन्म हुआ था। वह न सिर्फ एक शानदार एक्ट्रेस थीं, बल्कि वह बेइंतहा खूबसूरत भी थीं। बॉलीवुड अभिनेता दिलीप कुमार और विमल दा भी सुचित्रा सेन के फैन थे। सुचित्रा सेन ने बंगाली सिनेमा के साथ-साथ हिंदी सिनेमा में भी अपनी अलग पहचान बनाई थी। लेकिन महज 48 साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों से संन्यास ले लिया था। भले ही अब अदाकारा इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें आज भी जिंदा हैं। एक्ट्रेस सुचित्रा सेन अपने अभिनय से ज्यादा अपने उसूलों के लिए जानी जाती थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सुचित्रा सेन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...इसे भी पढ़ें: करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा राज करते रहेंगे मनोज (भारत) कुमारजन्म और शिक्षाबांग्लादेश के पबना जिले में 06 अप्रैल 1931 में सुचित्रा सेन का जन्म हुआ था। उनका असली नाम रोमा दास गुप्ता था। उनके पिता का नाम करुणामय दासगुप्ता था, जोकि हेडमास्टर थे। वहीं उन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई पबना से की थी। वहीं साल 1947 में महज 15 साल की उम्र में उनका विवाह बंगाल के जाने-माने उद्योगपति आदिनाथ सेन के बेटे दिबानाथ सेन से हुई थी। वहीं शादी के 5 साल बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री ले ली थी।उत्तम कुमार के साथ जमी जोड़ीसाल 1952 में सुचित्रा की बांग्ला फिल्म सारे चतुर रिलीज हुई। यह सुचित्रा की पहली फिल्म थी। एक समय ऐसा भी था जब उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी को बांग्ला सिनेमा की सबसे ज्यादा फेमस जोड़ी माना जाने लगा था। उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन ने एक से बढ़कर एक कई हिट फिल्में की। वहीं साल 1953 से 1978 तक एक्ट्रेस ने हिंदी और बांग्ला की कुल 61 फिल्मों में काम किया था। जिनमें से 30 फिल्में सिर्फ उत्तम कुमार के साथ थीं। वहीं साल 1978 में सुचित्रा सेन ने फिल्म इंडस्ट्री से संन्यास ले लिया था।ठुकरा दिया दादा साहब फाल्के पुरस्कार सुचित्रा सेन के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत ही ज्यादा स्वाभिमानी एक्ट्रेस थीं। वह अपनी निजी जिंदगी में बेहद उसूलों वाली थीं। बताया जाता है कि एक बार उन्होंने जो मन में ठान लिया उसको वह किसी भी हाल में करके रहती थीं। बता दें कि उन्होंने दादा साहेब फाल्के पुरस्कार ठुकरा दिया था। उन्होंने यह सम्मान लेने से सिर्फ इसलिए मना किया था, क्योंकि उनको यह सम्मान लेने के लिए कोलकाता से दिल्ली जाना पड़ता, जबकि उन्होंने पब्लिक के बीच न जाने का वादा किया था।मृत्युवहीं 17 जनवरी 2014 में 82 साल की उम्र में सुचित्रा सेन ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:48 +0530</pubDate>
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<title>करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा राज करते रहेंगे मनोज (भारत) कुमार</title>
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<description><![CDATA[ ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ तथा ‘क्रांति’ जैसी उन्नत एवं श्रेष्ठ फिल्में बनाने वाले दिग्गज निर्माता, निर्देशक, लेखक और अभिनेता मनोज कुमार का 87 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे पिछले कुछ महीनों से ‘डीकंपेंसेटेड लिवर सिरोसिस’ नामक बीमारी से जूझ रहे थे। 21 फरवरी को स्थिति बिगड़ने पर उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां पर शुक्रवार की सुबह अंतिम सांस ली। ‘भारत कुमार’ के नाम से लोकप्रिय रहे मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए देशभक्ति की ऐसी अलख जगाई, जो आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में जीवित है। बहरहाल, उनके निधन से न केवल हिंदी सिनेमा जगत्, बल्कि देश और दुनिया भर में निवास करने वाले उनके प्रशंसकों में शोक की लहर छा गई है। मनोज कुमार की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा अभिनीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा... मै गीत वहां के गाता हूं... भारत का रहने वाला हूं... भारत की बात सुनाता हूं...’ शीर्षक गीत आज भी लोग सुनते नहीं अघाते। यहां तक कि आज की पीढ़ी में भी उनके द्वारा अभिनीत देशभक्ति गीतों को सुनने वाले बहुत बड़ी संख्या में मिल जाएंगे।होठों पर मीठी मुस्की, आंखों में स्वाभिमान की लौ, गले में देशभक्ति के सुर और चाल में मस्तानापन के लिए देश-विदेश में विख्यात् मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार जब सिल्वर स्क्रीन पर अपने अभिनय का जादू बिखेर रहे होते थे, तब देश भर के सिनेमा घरों में बैठे दर्शकों के दिल और दिमाग में उत्तेजना से भरी एक अद्भुत शांति व्याप्त रहती थी। देशभक्ति, साहस, दृढ़ता और सिनेमा के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले मनोज कुमार को भारतीय सिनेमा में किए गए योगदानों के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। गौरतलब है कि उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनके नाम एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अलग-अलग श्रेणियों में सात फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल हैं। भारतीय कला में अद्भुत योगदान के लिए सरकार द्वारा उन्हें 1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इनके अलावा, 2015 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 24 जुलाई 1937 को ऐबटाबाद में जन्मे मनोज कुमार का वास्तविक नाम हरिकिशन गिरी गोस्वामी था। बंटवारे के बाद ऐबटाबाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, जिसके बाद उनके माता-पिता ने भारत में रहना स्वीकार किया और वे दिल्ली आ गए। मनोज कुमार ने बंटवारे के दर्द को अपनी आंखों से देखा था।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Birth Anniversary: भारत के पहले फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने पाकिस्तान को चटाई थी धूल, ऐसे सेना में हुए थे भर्तीवे अशोक कुमार, दिलीप कुमार और कामिनी कौशल के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनकी सारी फिल्में देखते थे। उनके नाम बदलने से जुड़ी एक रोचक घटना है कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही हरिकिशन दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत फिल्म ‘शबनम’ देखने गए और उनके किरदार से इतने प्रभावित हुए कि उसके नाम पर ही उन्होंने अपना नाम ‘मनोज कुमार’ रख लिया था। मनोज कुमार कॉलेज के दिनों में दिल्ली में रहते हुए थिएटर से जुड़े हुए थे। थिएटर करते-करते एक दिन अचानक उन्होंने दिल्ली से मुंबई का रास्ता चुन लिया। मुंबई आकर उन्होंने फिल्मों में कार्य तलाशना शुरू किया। अभिनेता के रूप में उनके करियर की शुरुआत 1957 में आई फिल्म ‘फैशन’ से हुई थी। उसके बाद, 1960 में उनकी अगली फिल्म ‘कांच की गुड़िया’ आई, जिसमें उन्होंने बतौर लीड अभिनेता कार्य किया। सौभाग्य से, उनकी यह फिल्म बहुत चली। उसके बाद तो बतौर अभिनेता मनोज कुमार का करियर लगातार ऊंचाइयां छूता चला गया। ‘उपकार’, ‘पत्थर के सनम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘संन्यासी’, ‘शहीद’, ‘क्रांति’ आदि उनकी कुछ अत्यंत लोकप्रिय एवं सुपर हिट फिल्में थीं। देशभक्त मनोज कुमार ने अपनी अधिकतर फिल्में देशभक्ति की थीम पर बनाई थीं और उन फिल्मों में मनोज कुमार ने ‘भारत कुमार’ के रूप में अभिनय किया था। यही कारण है कि वे अपने प्रशंसकों के बीच ‘भारत कुमार’ के नाम से विख्यात हुए।गौरतलब है कि 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान उनका परिवार दिल्ली आया, जहां उन्होंने शरणार्थी शिविरों में बेहद कठिन वक्त गुजारे। उस दौरान ही उनके मन में देश के लिए कुछ करने की भावना जागी। भगत सिंह के व्यक्तित्व से गहरे प्रभावित मनोज ने सिनेमा को माध्यम बनाया और अपनी देशभक्ति की फिल्मों के जरिए अपने देशप्रेम को सुनहरे पर्दे पर उतारा। उनका मानना था कि फिल्में केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का जरिया भी होती हैं। जाहिर है कि अपने इसी सिद्धांत का अनुसरण करते हुए उन्होंने देशभक्ति पर आधारित अनेक फिल्में बनाईं, जो फिल्मकारों एवं आलोचकों के बीच खूब सराही भी गईं और सुपर हिट भी रहीं। मनोज कुमार की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक ‘उपकार’ (1967) से जुड़ी एक बहुत रोमांचक कहानी है। दरअसल,  1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उनकी फिल्म ‘शहीद’ देखी थी। भगत सिंह के जीवन पर बनी इस फिल्म से प्रभावित होकर शास्त्री जी ने मनोज कुमार से अपने लोकप्रिय नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर एक फिल्म बनाने के लिए कहा। मनोज कुमार ने शास्त्री जी के उस सुझाव को गंभीरता से लिया और रेलयात्रा करते हुए दिल्ली से मुंबई लौटते समय ही ‘उपकार’ की कहानी लिख डाली। न सिर्फ यह फिल्म सुपर हिट रही, बल्कि इसके गाने भी बहुत लोकप्रिय हुए। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे-मोती...’ शीर्षक गीत तो उन दिनों जन-जन की जुबान पर थी।मनोज कुमार न सिर्फ अपनी देशभक्ति, बल्कि दृढ़ता और साहस के लिए भी विख्यात् थे, लेकिन यही दृढ़ता और साहस बाद में उनके लिए संकट भी बन गए, जब 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाए गए आपातकाल (इमरजेंसी) का विरोध करके उन्होंने सरकार को नाराज कर दिया था। सरकार की नाराजगी का परिणाम यह हुआ कि मनोज कुमार ने जब अपनी सुपरहिट फिल्म ‘शोर’ को सिनेमाघरों में दोबारा रिलीज  ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:48 +0530</pubDate>
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<title>Makhanlal Chaturvedi Birth Anniversary: जब पत्रकारिता ने चलाया गो&#45;संरक्षण का सफल आंदोलन</title>
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<description><![CDATA[ पंडित माखनलाल चतुर्वेदी उन विरले स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रणी हैं, जिन्होंने अपनी संपूर्ण प्रतिभा को राष्ट्रीयता के जागरण एवं स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। अपने लंबे पत्रकारीय जीवन के माध्यम से माखनलाल जी ने रचना, संघर्ष और आदर्श का जो पाठ पढ़ाया वह आज भी हतप्रभ कर देने वाला है। आज की पत्रकारिता के समक्ष जैसे ही गो-हत्या का प्रश्न आता है, वह हिंदुत्व और सेकुलरिज्म की बहस में उलझ जाता है। इस बहस में मीडिया का बड़ा हिस्सा गाय के विरुद्ध ही खड़ा दिखाई देता है। सेकुलरिज्म की आधी-अधूरी परिभाषाओं ने उसे इतना भ्रमित कर दिया है कि वह गो-संरक्षण जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय को सांप्रदायिक मुद्दा मान बैठा है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में गो-संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है, इस बात को समझना कोई टेड़ी खीर नहीं। हद तो तब हो जाती है जब मीडिया गो-संरक्षण या गो-हत्या को हिंदू-मुस्लिम रंग देने लगता है। गो-संरक्षण शुद्धतौर पर भारतीयता का मूल है। इसलिए ही ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से विख्यात महान संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी गोकशी के विरोध में अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी पत्रकारिता के माध्यम से देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर देते हैं। गोकशी का प्रकरण जब उनके सामने आया, तब उनके मन में द्वंद्व कतई नहीं था। उनकी दृष्टि स्पष्ट थी- भारत के लिए गो-संरक्षण आवश्यक है। कर्मवीर के माध्यम से उन्होंने खुलकर अंग्रेजों के विरुद्ध गो-संरक्षण की लड़ाई लड़ी और अंत में विजय सुनिश्चित की।1920 में मध्यप्रदेश के शहर सागर के समीप रतौना में ब्रिटिश सरकार ने बहुत बड़ा कसाईखाना खोलने का निर्णय लिया। इस कसाईखाने में केवल गोवंश काटा जाना था। प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश का कत्ल करने की योजना थी। अंग्रेजों की इस बड़ी परियोजना का संपूर्ण विवरण देता हुआ चार पृष्ठ का विज्ञापन अंग्रेजी समाचार-पत्र हितवाद में प्रकाशित हुआ। परियोजना का आकार कितना बड़ा था, इसको समझने के लिए इतना ही पर्याप्त होगा कि लगभग 100 वर्ष पूर्व कसाईखाने की लागत लगभग 40 लाख रुपये थी। गो-मांस के परिवहन के लिए कसाईखाने तक रेल लाइन डाली गई थी। तालाब खुदवाये गए थे। कत्लखाने का प्रबंधन सेंट्रल प्रोविंसेज टेनिंग एंड ट्रेडिंग कंपनी ने अमेरिकी कंपनी सेंट डेविन पोर्ट को सौंप दिया था, जो डिब्बाबंद बीफ को निर्यात करने के लिए ब्रिटिश सरकार की अनुमति भी ले चुकी थी। गोवंश की हत्या के लिए यह कसाईखाना प्रारंभ हो पाता उससे पहले ही दैवीय योग से महान कवि, स्वतंत्रता सेनानी और प्रख्यात संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने यात्रा के दौरान यह विज्ञापन पढ़ लिया। वह तत्काल अपनी यात्रा खत्म करके वापस जबलपुर लौटे। वहाँ उन्होंने अपने समाचार पत्र “कर्मवीर” में रतौना कसाईखाने के विरोध में तीखा संपादकीय लिखा और गो-संरक्षण के समर्थन में कसाईखाने के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाने का आह्वान किया। सुखद तथ्य यह है कि इस कसाईखाने के विरुद्ध जबलपुर के एक और पत्रकार उर्दृ दैनिक समाचार पत्र &#039;ताज&#039; के संपादक मिस्टर ताजुद्दीन मोर्चा पहले ही खोल चुके थे। उधर, सागर में मुस्लिम नौजवान और पत्रकार अब्दुल गनी ने भी पत्रकारिता एवं सामाजिक आंदोलन के माध्यम से गोकशी के लिए खोले जा रहे इस कसाईखाने का विरोध प्रारंभ कर दिया। मिस्टर ताजुद्दीन और अब्दुल गनी की पत्रकारिता में भी गोहत्या पर वह द्वंद्व नहीं था, जो आज की मीडिया में है।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Birth Anniversary: भारत के पहले फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने पाकिस्तान को चटाई थी धूल, ऐसे सेना में हुए थे भर्तीदादा माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिष्ठा संपूर्ण देश में थी। इसलिए कसाईखाने के विरुद्ध माखनलाल चतुर्वेदी की कलम से निकले आंदोलन ने जल्द ही राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। देशभर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में रतौना कसाईखाने के विरोध में लिखा जाने लगा। लाहौर से प्रकाशित लाला लाजपत राय के समाचार पत्र वंदेमातरम् ने तो एक के बाद एक अनेक आलेख कसाईखाने के विरोध में प्रकाशित किए। दादा माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता का प्रभाव था कि मध्यभारत में अंग्रेजों की पहली हार हुई। मात्र तीन माह में ही अंग्रेजों को कसाईखाना खोलने का निर्णय वापस लेना पड़ा। आज उस स्थान पर पशु प्रजनन का कार्य संचालित है। जहाँ कभी गो-रक्त बहना था, आज वहाँ बड़े पैमाने पर दुग्ध उत्पादन हो रहा है। कर्मवीर के माध्यम से गो-संरक्षण के प्रति ऐसी जाग्रती आई कि पहले से संचालित कसाईखाने भी स्वत: बंद हो गए। हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र का वातावरण बना सो अलग। दादा माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता का यह प्रसंग किसी भव्य मंदिर के शिखर कलश के दर्शन के समान है। यह प्रसंग पत्रकारिता के मूल्यों, सिद्धांतों और प्राथमिकता को रेखांकित करता है।यह ‘पत्रकारिता’ का सौभाग्य था कि उसे दादा माखनलाल जैसा सुयोग्य संपादक प्राप्त हुआ, जिसने भारत की पत्रकारिता में ‘भारतीयता’ के भाव की स्थापना की। माखनलाल चतुर्वेदी भारतीय पत्रकारिता के ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं, जिनसे आज भी भारत की पत्रकारिता आलोकित हो सकती है। - लोकेन्द्र सिंह             सहायक प्राध्यापक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्यप्रदेश) ]]></description>
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<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 15:55:48 +0530</pubDate>
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