Kanshi Ram Death Anniversary: कांशीराम ने सत्ता से दूर रहकर भी दलितों को दिलाई पहचान, BSP के शिल्पकार का योगदान

आज ही के दिन यानी की 09 अक्तूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की मृत्यु हो गई थी। कांशीराम बहुजन नायक, मान्यवर या साहेब नामों से भी जाने जाते हैं। वहीं 20वीं सदी के अंतिम दशक में वह भारतीय राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में चमकता हुआ सितारा बन गए थे। कांशीराम ने दलित राजनीति में एक विशिष्ठ स्थान बनाया था। कांशीराम राजनीति से अधिक दलितों के उत्थान के लिए जाने जाते थे। क्योंकि उन्होंने खुद अस्पृश्यता, जातिवाद और भेदभाव झेला था। ऐसे में दलितों को उनका हक दिलाने के लिए कांशीराम ने लड़ाई लड़ने का प्रण लिया और उसमें सफल भी रहे। उन्होंने राजनीति में खुद कभी कोई पद नहीं लिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कांशीराम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...जन्म और परिवारब्रिटिश इंडिया के पंजाब के रूपनगर यानि आज के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 को कांशीराम का जन्म हुआ था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1956 में रोपड़ के शासकीय महाविद्यालय से बीएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह पुणे की गोला बारूद फैक्ट्री में प्रथम श्रेणी के वन अधिकारी के रूप में नियुक्त हो गए। लेकिन जल्द ही कांशीराम को प्रशासन में जातिगत आधार पर भेदभाव और अपमान झेलना पड़ा।इसे भी पढ़ें: Jai Prakash Narayan Death Anniversary: जेपी नारायण ने ठुकरा दिया था PM और राष्ट्रपति पद, दिया था संपूर्ण क्रांति का नारादलित सामाजिक कार्यकर्ताकांशीराम ने अपने सरकारी दफ्तर के ऑफिस में पाया कि जो कर्मचारी आंबेडकर का जन्मदिन मनाने के लिए छुट्टी लेते थे। उन कर्मचारियों के साथ जातिवादी भेदभाव किया जा रहा था। कांशीराम ने साल 1964 ने इस जातिवादी भेदभाव को खत्म करने के लिए एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे। माना जाता है कि कांशीराम ने यह फैसला आंबेडकर की किताब 'एनीहिलिएशन ऑफ कास्ट' पढ़कर लिया था।नौकरी से निलंबनकांशीराम आंबेडकर और उनके दर्शन से काफी ज्यादा प्रभावित थे। आंबेडकर से प्रभावित होकर पहले कांशीराम ने कर्मचारियों के स्तर पर कार्यकर्ता के रूप में संघर्ष किया। लेकिन इसके कारण जल्द ही उनको नौकरी से सस्पेंड होना पड़ा। फिर उन्होंने उस अधिकारी की पिटाई की, जिसने कांशीराम को सस्पेंड किया था।राजनीति में प्रवेशसाल 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का स्थापना की थी। जोकि मूल रूप से सामाजिक संगठन था, लेकिन इसका राजनैतिक प्रभाव भी था। जल्द ही कांशीराम को समझ आ गया कि दलितों के उत्थान के लिए उनको राजनीति में आना ही पड़ेगा। ऐसे में उन्होंने 14 अप्रैल 1984 को बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती पर बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। साथ ही औपचारिक रूप से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।मायावती को आगे बढ़ायाकांशीराम ने अपना पहला चुनाव छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा से लड़ा था, वह अपनी पार्टी के प्रमुख बने रहे और उसके उत्थान के लिए अपना बाकी जीवन लगा दिया। कांशीराम ने मायावती को राजनीति में लाने के दौरान वादा किया था कि वह एक दिन उनको देश का प्रधानमंत्री बना देंगे। कांशीराम ने हमेशा मायावती को आगे बढ़ाने का काम किया। वहीं जब उत्तर प्रदेश में बीएसपी की सरकारी बनी तो मायावती ने राज्य की मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच दिया था।कांशीराम ने अपना पूरा जीवन दलितों के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने सादगी अपनाते हुए खुद को परिवार से पूरी तरह से अलग कर लिया था। हालांकि कांशीराम को हमेशा बसपा सुप्रीमो कहा जाता था। लेकिन वास्तव में वह जमीनी कार्यकर्ता थे और हमेशा लोगों को अपने आंदोलन में जोड़ने का प्रयास करते थे।निधनवहीं 09 अक्टूबर 2006 को कांशीराम का निधन हो गया। जिसके बाद उनकी जगह पार्टी में मायावती ने ली।

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Nov 3, 2025 - 17:42
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Kanshi Ram Death Anniversary: कांशीराम ने सत्ता से दूर रहकर भी दलितों को दिलाई पहचान, BSP के शिल्पकार का योगदान
आज ही के दिन यानी की 09 अक्तूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की मृत्यु हो गई थी। कांशीराम बहुजन नायक, मान्यवर या साहेब नामों से भी जाने जाते हैं। वहीं 20वीं सदी के अंतिम दशक में वह भारतीय राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में चमकता हुआ सितारा बन गए थे। कांशीराम ने दलित राजनीति में एक विशिष्ठ स्थान बनाया था। कांशीराम राजनीति से अधिक दलितों के उत्थान के लिए जाने जाते थे। क्योंकि उन्होंने खुद अस्पृश्यता, जातिवाद और भेदभाव झेला था। ऐसे में दलितों को उनका हक दिलाने के लिए कांशीराम ने लड़ाई लड़ने का प्रण लिया और उसमें सफल भी रहे। उन्होंने राजनीति में खुद कभी कोई पद नहीं लिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर कांशीराम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और परिवार

ब्रिटिश इंडिया के पंजाब के रूपनगर यानि आज के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 को कांशीराम का जन्म हुआ था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1956 में रोपड़ के शासकीय महाविद्यालय से बीएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह पुणे की गोला बारूद फैक्ट्री में प्रथम श्रेणी के वन अधिकारी के रूप में नियुक्त हो गए। लेकिन जल्द ही कांशीराम को प्रशासन में जातिगत आधार पर भेदभाव और अपमान झेलना पड़ा।

इसे भी पढ़ें: Jai Prakash Narayan Death Anniversary: जेपी नारायण ने ठुकरा दिया था PM और राष्ट्रपति पद, दिया था संपूर्ण क्रांति का नारा

दलित सामाजिक कार्यकर्ता

कांशीराम ने अपने सरकारी दफ्तर के ऑफिस में पाया कि जो कर्मचारी आंबेडकर का जन्मदिन मनाने के लिए छुट्टी लेते थे। उन कर्मचारियों के साथ जातिवादी भेदभाव किया जा रहा था। कांशीराम ने साल 1964 ने इस जातिवादी भेदभाव को खत्म करने के लिए एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे। माना जाता है कि कांशीराम ने यह फैसला आंबेडकर की किताब 'एनीहिलिएशन ऑफ कास्ट' पढ़कर लिया था।

नौकरी से निलंबन

कांशीराम आंबेडकर और उनके दर्शन से काफी ज्यादा प्रभावित थे। आंबेडकर से प्रभावित होकर पहले कांशीराम ने कर्मचारियों के स्तर पर कार्यकर्ता के रूप में संघर्ष किया। लेकिन इसके कारण जल्द ही उनको नौकरी से सस्पेंड होना पड़ा। फिर उन्होंने उस अधिकारी की पिटाई की, जिसने कांशीराम को सस्पेंड किया था।

राजनीति में प्रवेश

साल 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का स्थापना की थी। जोकि मूल रूप से सामाजिक संगठन था, लेकिन इसका राजनैतिक प्रभाव भी था। जल्द ही कांशीराम को समझ आ गया कि दलितों के उत्थान के लिए उनको राजनीति में आना ही पड़ेगा। ऐसे में उन्होंने 14 अप्रैल 1984 को बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती पर बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। साथ ही औपचारिक रूप से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।

मायावती को आगे बढ़ाया

कांशीराम ने अपना पहला चुनाव छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा से लड़ा था, वह अपनी पार्टी के प्रमुख बने रहे और उसके उत्थान के लिए अपना बाकी जीवन लगा दिया। कांशीराम ने मायावती को राजनीति में लाने के दौरान वादा किया था कि वह एक दिन उनको देश का प्रधानमंत्री बना देंगे। कांशीराम ने हमेशा मायावती को आगे बढ़ाने का काम किया। वहीं जब उत्तर प्रदेश में बीएसपी की सरकारी बनी तो मायावती ने राज्य की मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच दिया था।

कांशीराम ने अपना पूरा जीवन दलितों के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने सादगी अपनाते हुए खुद को परिवार से पूरी तरह से अलग कर लिया था। हालांकि कांशीराम को हमेशा बसपा सुप्रीमो कहा जाता था। लेकिन वास्तव में वह जमीनी कार्यकर्ता थे और हमेशा लोगों को अपने आंदोलन में जोड़ने का प्रयास करते थे।

निधन

वहीं 09 अक्टूबर 2006 को कांशीराम का निधन हो गया। जिसके बाद उनकी जगह पार्टी में मायावती ने ली।

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